राजस्थान के त्योहार
Festivals of Rajasthan
श्रावणी तीज से गणगौर तक और हर समुदाय के पर्वों से लेकर पंचांग प्रणालियों तक — राजस्थान के रंग-बिरंगे त्योहारी वर्ष की सैर।
श्रावण-कार्तिक पर्व-चक्र
राजस्थान के पर्व-कैलेंडर का मूल भाग — मानसूनी तीज व रक्षाबंधन से लेकर नवरात्रि-दशहरा और झिलमिलाती दीपावली शृंखला तक।
💚तीज त्योहार
- राजस्थान में त्योहारों की शुरुआत छोटी तीज (श्रावणी/हरियाली तीज) से मानी जाती है, जिसे माता पार्वती के प्रतीक रूप में मनाया जाता है; जयपुर में इस अवसर पर तीज माता की भव्य सवारी निकाली जाती है।
- तीज पर विवाहित व नवविवाहित स्त्रियाँ पति की दीर्घायु हेतु व्रत रखती हैं, लहरिया ओढ़नी धारण करती हैं और हाथों पर लहरिया व गेहर-मांडणे की मेहंदी सजाती हैं; सिरोही में इसी दिन समदरिया हिलोर भी मनाया जाता है।
- कजली (बड़ी) तीज शिव-पार्वती के पुनर्मिलन का उत्सव है, जिसे स्त्रियाँ अपने पति की मंगलकामना व दीर्घायु हेतु मनाती हैं; बूँदी में कजली तीज की सवारी नवलसागर से कुंभा स्टेडियम तक निकाली जाती है।
- हरतालिका तीज गौरी-शंकर की पूजा हेतु रखी जाती है, और इसके व्रत में परंपरागत रूप से तेरह प्रकार के व्यंजन बनाए जाते हैं।
🧵रक्षाबंधन
- रक्षाबंधन (श्रावण पूर्णिमा, जिसे नारियल पूर्णिमा भी कहते हैं) पर बहनें भाइयों की कलाई पर रक्षा-सूत्र बांधती हैं, वहीं घर की मुख्य ड्योढ़ी पर श्रवण कुमार का चित्र बनाकर पूजा जाता है।
- मान्यता है कि इसी दिन अमरनाथ धाम में बर्फ का शिवलिंग बनता है, जिससे इस पर्व को एक तीर्थ आयाम भी मिलता है।
🦚कृष्ण जन्माष्टमी व हल षष्ठी
- भाद्रपद कृष्णा अष्टमी को मनाई जाने वाली कृष्ण जन्माष्टमी पर मंदिरों में भगवान श्रीकृष्ण के जीवन-प्रसंगों की सुसज्जित झांकियाँ सजाई जाती हैं।
- हल षष्ठी श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलरामजी के जन्मोत्सव के रूप में मनाई जाती है; पुत्रवती स्त्रियाँ व्रत रखती हैं, हल की पूजा करती हैं और उस दिन गाय का दूध-दही ग्रहण नहीं करतीं।
🐘गणेश चतुर्थी, राधाष्टमी व अनंत चतुर्दशी
- गणेश चतुर्थी (जिसे चतरा चौथ भी कहते हैं) भगवान गणेश के जन्मोत्सव के रूप में मनाई जाती है और राजस्थान में विशेष रूप से बच्चों का प्रिय त्योहार मानी जाती है।
- राधाष्टमी राधाजी के जन्मोत्सव के रूप में मनाई जाती है, और इस अवसर पर अजमेर जिले के सलेमाबाद स्थित निम्बार्क पीठ में एक उल्लेखनीय मेला भरता है।
- अनंत चतुर्दशी के दिन गणेश उत्सव का समापन होता है, क्योंकि इसी दिन गणेश प्रतिमाओं का विसर्जन किया जाता है।
⚔️नवरात्रि व दशहरा
- राजस्थान में दो नवरात्र मनाए जाते हैं — चैत्र का नवरात्र, जिसे बासंतीय नवरात्रि भी कहते हैं, और आश्विन का नवरात्र, जिसके तुरंत अगले दिन दशहरा मनाया जाता है; दोनों में डांडिया खेला जाता है।
- आश्विन नवरात्र के दौरान आने वाली दुर्गाष्टमी को माता अष्टमी, वीर अष्टमी या महाअष्टमी भी कहा जाता है; इस दिन शस्त्र पूजन होता है, जो पश्चिम बंगाल में विशेष रूप से प्रचलित है।
- दशहरा (विजयादशमी) भगवान राम की रावण पर विजय की स्मृति में मनाया जाता है; शमी (खेजड़ी) वृक्ष की पूजा होती है, लीलटांस पक्षी के दर्शन शुभ माने जाते हैं, और कोटा व मैसूर में भव्य मेले लगते हैं।
🌕शरद पूर्णिमा, करवाचौथ व अहोई अष्टमी
- शरद पूर्णिमा, जिसे रास पूर्णिमा भी कहते हैं, इस मान्यता के साथ मनाई जाती है कि इस रात चंद्रमा अपनी सोलह कलाओं से पूर्ण होता है।
- करवाचौथ पर सुहागिन स्त्रियाँ पति की मंगलकामना हेतु दिनभर का व्रत रखती हैं, वहीं अहोई अष्टमी पर पुत्रवती स्त्रियाँ निर्जल व्रत रखती हैं और दीवार पर स्याऊ माता व उनके बच्चों का चित्र बनाती हैं।
🪔दीपावली पर्व-शृंखला
- दीपावली शृंखला की शुरुआत धनतेरस से होती है, जिसमें धन्वंतरि वैद्यजी व यमराज की पूजा होती है; अकाल मृत्यु से बचाव हेतु मुख्य द्वार पर यम के लिए आटे का दीपक रखा जाता है।
- स्वच्छता व सौंदर्य से जुड़ी रूप चतुर्दशी को छोटी दीपावली के रूप में भी मनाया जाता है, जो मुख्य दीपावली से ठीक पहले आती है, जब माता लक्ष्मी की पूजा हिंदुओं के सबसे बड़े पर्व के रूप में की जाती है।
- दीपावली आर्य समाज के संस्थापक महर्षि दयानंद तथा भगवान महावीर का निर्वाण दिवस भी मानी जाती है, और वैश्य समाज इसी दिन अपने बही-खाते बदलता है।
- अगले दिन गोवर्धन पूजा व अन्नकूट मनाया जाता है, जिसमें गाय के गोबर से बने गोवर्धन की पूजा होती है और छप्पन प्रकार के अन्नकूट का भोग लगाया जाता है — नाथद्वारा, कांकरोली व कोटा के अन्नकूट महोत्सव विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं; इसके बाद भैयादूज के साथ यह शृंखला संपन्न होती है, जिसमें बहनें भाई की दीर्घायु की कामना करती हैं।
🌿देवउठनी एकादशी व त्रिपुर पूर्णिमा
- देवउठनी (देवप्रबोधिनी) एकादशी पर भगवान विष्णु के चार माह की निद्रा से जागने की मान्यता है, जिसके साथ ही विवाह, मुंडन व गृह प्रवेश जैसे मांगलिक कार्य पुनः आरंभ हो जाते हैं; तुलसी-सालिगरामजी का प्रतीकात्मक विवाह कराया जाता है और नई कटी ईख की पूजा होती है।
- त्रिपुर पूर्णिमा महादेवजी द्वारा त्रिपुरासुर राक्षस के वध की स्मृति में मनाई जाती है; भक्त गंगा या पुष्कर में स्नान कर तालाबों में दीपदान करते हैं, और यह दिन विष्णु के मत्स्य अवतार से भी जुड़ा माना जाता है।
होली, गणगौर व वसंत के पर्व
इस कालखंड में रंग, गीत और घूमती सवारियों का बोलबाला रहता है — पतंगों से भरी मकर संक्रांति से लेकर अनगिनत स्थानीय होलियों व गीत-प्रधान गणगौर तक।
🪁मकर संक्रांति व बसंत पंचमी
- मकर संक्रांति पर जयपुर में प्रसिद्ध पतंग महोत्सव मनाया जाता है और रूठी सास को मनाने की प्रथा निभाई जाती है; सूर्य के मकर राशि में प्रवेश से मलमास की समाप्ति होती है, जिसे अलग-अलग राज्यों में पोंगल, माघ बिहू, उत्तरायण या खिचड़ी के नाम से जाना जाता है।
- बसंत पंचमी वसंत ऋतु के आगमन व माँ सरस्वती की पूजा का पर्व है; इस दिन लोग पीले वस्त्र पहनते हैं, कामदेव व रति की प्रमुखता से पूजा होती है, और ब्रज प्रदेश में राधा-कृष्ण की लीलाएँ रची जाती हैं।
🔱महाशिवरात्रि
- महाशिवरात्रि भगवान शिव के प्राकट्य का पर्व है; शिव पुराण के अनुसार शिव के निराकार स्वरूप 'लिंग' का इसी तिथि को आविर्भाव हुआ था, जिसे सर्वप्रथम ब्रह्मा व विष्णु ने पूजा था।
🎨होली व उसके क्षेत्रीय रूप
- होली भक्त प्रह्लाद की स्मृति में मनाई जाती है; बाड़मेर में ईलोजी की सवारी निकलती है, वहीं जयपुर के अनोखे 'जन्म, मरण एवं पड़ण' उत्सव में एक साथ बाप की अर्थी, बेटे की बारात व पौत्र के जन्म का नाट्य-प्रदर्शन किया जाता है।
- धुलंडी पर स्थानीय होलियों की विविधता देखने को मिलती है: ब्यावर का बादशाह का मेला व देवर-भाभी होली, शाहपुरा का फूलडोल उत्सव, करौली के श्रीमहावीरजी की लट्ठमार होली, तथा भिनाय की कोड़ामार होली, जिसमें खिलाड़ी कोड़ों की मार से बचने के लिए 'ढाटा' नामक 2-3 सिर के कपड़े बांधते हैं।
- आगे विविधता जयपुर के गोविंददेवजी मंदिर की फूलों की होली, जोधपुर की रोने-बिलखने की होली, बाड़मेर-डूँगरपुर व मेवाड़ के आदिवासियों की पत्थरमार व भगोरिया होली, कोटा के आवाँ-सांगोद के 200 वर्ष पुराने न्हाण, तथा बीकानेर की पुष्करणा समाज की उल्लासमय डोलची मार होली में मिलती है।
👑गणगौर पर्व
- घुड़ला 1492 ई. में अजमेर के हाकिम मल्लू खाँ और सातलदेव के मध्य हुए युद्ध में विजयी राव सातलदेव के बलिदान की स्मृति में मनाया जाता है, जिसका मेला चैत्र शुक्ला तीज के आसपास भरता है; इससे एक दिन पूर्व सिंजारा पर परिवार पुत्री-पुत्रवधुओं को साड़ी व श्रृंगार सामग्री भेजकर स्नेह प्रकट करते हैं।
- गणगौर लगभग अठारह दिनों तक चैत्र कृष्णा एकम से चैत्र शुक्ला तृतीया तक चलती है; विवाहित स्त्रियाँ पति के स्वास्थ्य व दीर्घायु हेतु पार्वती की पूजा करती हैं जबकि अविवाहित कन्याएँ अच्छे वर की कामना करती हैं, और जयपुर व उदयपुर की सवारियाँ — जिनका वर्णन कर्नल जेम्स टॉड ने भी किया है — राजस्थान के सबसे अधिक गीतों वाले उत्सवों में गिनी जाती हैं, जिनमें ईसर-ईसरी (शिव-पार्वती) की पूजा होती है।
- जयपुर में तीज व गणगौर की मूर्तियों का विसर्जन तालकटोरा में किया जाता है, जहाँ होली की राख से बनी पिंडियों की जौ के अंकुरों सहित पूजा होती है; उदयपुर की विरल धींगा गणगौर महाराणा राजसिंह (सन् 1629-80) द्वारा अपनी छोटी महारानी को प्रसन्न करने हेतु प्रचलित की गई थी, वहीं जैसलमेर में केवल गवर देवी की पूजा चैत्र शुक्ला चतुर्थी को होती है।
🏹चैत्र नवरात्रि, रामनवमी व आखा तीज
- चैत्र नवरात्र के दौरान चैत्र शुक्ला नवमी को रामनवमी भगवान राम के जन्मदिवस के रूप में मनाई जाती है, जिस दिन सरयू नदी में स्नान से पुण्य प्राप्ति मानी जाती है।
- आखा तीज (अक्षय तृतीया) को सतयुग व त्रेतायुग के आरंभ की तिथि माना जाता है और यह वर्ष का एकमात्र 'अबूझ सावा' है — यानी जिसमें अलग मुहूर्त की आवश्यकता नहीं — इसीलिए इस दिन सर्वाधिक बाल विवाह होते हैं; बीकानेर की स्थापना भी इसी दिन मानी जाती है, और किसान अच्छी वर्षा की कामना से सात प्रकार के अन्न व हल की पूजा करते हैं।
अन्य धर्मों व समुदायों के पर्व
राजस्थान के पर्व-कैलेंडर में मुस्लिम, सूफी दरगाहों, जैन, सिंधी, सिक्ख व ईसाई समुदायों के त्योहार भी बुने हुए हैं, जिनकी अपनी अलग कथा व रीति है।
🌙मुस्लिम पर्व
- हिजरी कैलेंडर के पहले महीने मोहर्रम पर हजरत इमाम हुसैन के कर्बला में शहीद होने की स्मृति मनाई जाती है; इसे दसवीं तारीख को मनाते हुए उनकी याद में ताजिए की सवारियाँ निकाली जाती हैं।
- रबी-उल-अव्वल की 12वीं तारीख को मनाई जाने वाली ईद-उल-मिलादुन्नबी (बारावफात) पैगम्बर हजरत मोहम्मद के जन्मदिवस की याद में है, जिनका जन्म सन् 570 ई. में मक्का में हुआ था; रमजान माह के तीस दिनों के रोजे के बाद ईद-उल-फितर (मीठी ईद) सामूहिक नमाज व सिवइयों के साथ मनाई जाती है।
- इदुलजुहा (बकरा ईद) कुर्बानी का पर्व है, जो पैगम्बर हजरत इब्राहीम द्वारा अपने पुत्र इस्माईल की कुर्बानी देने की तत्परता की स्मृति में है; शबेरात हजरत मुहम्मद साहब की आकाश में ईश्वर से भेंट की याद दिलाती है, वहीं शबे कद्र पर मान्यता है कि जिबरील फरिश्ते के माध्यम से उन पर कुरान अवतरित हुआ था।
🕌राजस्थान के प्रमुख उर्स मेले
- अजमेर में रज्जब माह की 1 से 6 तारीख तक मनाया जाने वाला उर्स गरीब नवाज ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती की पुण्यतिथि के रूप में मनाया जाता है; नागौर में संत काजी हमीदुद्दीन की दरगाह पर भरने वाला तारकीन का उर्स अजमेर के बाद राजस्थान का दूसरा सबसे बड़ा उर्स है।
- डूँगरपुर में माही नदी के निकट पीर फखरुद्दीन की मजार पर भरने वाला गलियाकोट का उर्स दाऊदी बोहरा समुदाय का तीर्थस्थल है; अन्य उल्लेखनीय उर्स झुंझुनूं में हजरत हाजिब शक्कर बादशाह की नरहड़ दरगाह पर (जो श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के साथ मनाया जाता है), झालावाड़ में गागरोन की पीर दुल्हेशाह दरगाह पर, तथा पाली की चौटीला पीर दरगाह पर भरते हैं।
🤍जैन पर्व
- आत्मशुद्धि के जैन पर्व पर्युषण (दशलक्षण पर्व) का समापन दिगम्बर परंपरा में अनंत चतुर्दशी पर होता है, जबकि श्वेताम्बर परंपरा में यह भाद्रपद कृष्णा बारस से भाद्रपद शुक्ला पंचमी तक मनाया जाता है और क्षमायाचना के संवत्सरी पर्व पर समाप्त होता है।
- चैत्र शुक्ला त्रयोदशी को मनाई जाने वाली महावीर जयंती 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर के जन्मोत्सव के रूप में करौली के मेले के साथ मनाई जाती है, वहीं चैत्र कृष्णा नवमी को ऋषभ जयन्ती प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव के जन्मदिवस के रूप में मनाई जाती है।
- सुगंध दशमी (धूप दशमी) पर जैन मंदिरों को सुगंधित द्रव्यों से महकाया जाता है, रोट तीज पर खीर व मोटी रोट रोटी बनाई जाती है, और आश्विन कृष्णा प्रतिपदा को पड़वा ढोक दिगम्बर समुदाय का क्षमायाचना दिवस है।
🌊सिंधी समाज के पर्व
- चैत्र शुक्ला प्रतिपदा को मनाई जाने वाली चेटीचण्ड वरुणदेव के अवतार माने जाने वाले झूलेलाल जी की जयंती है; 16 जुलाई से 24 अगस्त तक चलने वाला चालीहा महोत्सव मृखशाह के जुल्मों से सिंधी समाज को मिली राहत की स्मृति में मनाया जाता है।
- थदड़ी (बड़ी सातम) पर समाज एक दिन पहले पकाए गए बासी भोजन (बास्योड़ा) का सेवन करता है, और महिलाएँ पीपल वृक्ष पर रखी चाँदी की मूर्ति की पूजा करती हैं; फाल्गुन शुक्ला चौदस को मनाया जाने वाला असूचंड पर्व भगवान झूलेलाल के अंतर्धान होने की स्मृति में है।
☦️सिक्ख व ईसाई पर्व
- बैसाखी 13 अप्रैल 1699 ई. को 10वें गुरु गोविंद सिंह द्वारा आनन्दपुर साहिब (पंजाब) में खालसा पंथ की स्थापना की स्मृति में मनाई जाती है, और यह रबी की फसल घर लाने की खुशी में मनाया जाने वाला कृषि पर्व भी है; कार्तिक पूर्णिमा को मनाई जाने वाली गुरुनानक जयन्ती सिक्ख धर्म के प्रवर्तक गुरुनानक के सम्मान में है, वहीं लोहड़ी मकर संक्रांति से एक दिन पूर्व मनाई जाती है।
- क्रिसमस (25 दिसम्बर) ईसा मसीह के जन्मदिवस के रूप में मनाया जाता है, जिनका जन्म लगभग 4 ई.पू. बैथलेहम में हुआ था; ईसाई धर्म के दो प्रमुख मत प्रोटेस्टेन्ट व रोमन कैथोलिक हैं। ईस्टर रविवार से पूर्व वाले शुक्रवार को गुड फ्राइडे ईसा मसीह को सूली पर चढ़ाए जाने की स्मृति में मनाया जाता है, वहीं ईस्टर के 40 दिन बाद असेंसन डे उनके पुनः स्वर्ग लौटने के उपलक्ष्य में मनाया जाता है।
पंचांग व संवत् प्रणालियाँ
हर पर्व की तिथि के पीछे एक पंचांग प्रणाली होती है — रोजमर्रा के ग्रिगोरियन वर्ष से लेकर भारतीय गणना को आधार देने वाले शक, विक्रम व हिजरी संवत् तक।
📆ग्रेगोरियन कैलेंडर व राष्ट्रीय पंचांग
- 1 जनवरी से 31 दिसम्बर तक चलने वाला ग्रिगोरियन (अंग्रेजी) कैलेंडर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्य है और दैनिक व्यवहार में प्रयुक्त होता है।
- भारत का राष्ट्रीय पंचांग शक संवत् पर आधारित है, जिसका पहला माह चैत्र और अंतिम माह फाल्गुन होता है; इसे औपचारिक रूप से 22 मार्च, 1957 को अपनाया गया था।
🗓️शक संवत् व विक्रम संवत्
- शक संवत् का आरंभ 78 ई. में कुषाण शासक कनिष्क के काल में हुआ था, इसलिए यह ग्रिगोरियन कैलेंडर वर्ष से 78 वर्ष पीछे रहता है।
- इसके विपरीत विक्रम संवत् का आरंभ 57 ई.पूर्व में हुआ था, जिस कारण यह ग्रिगोरियन कैलेंडर वर्ष से 57 वर्ष आगे रहता है।
☪️हिजरी सन्
- इस्लामिक चन्द्र-आधारित हिजरी सन् की गणना 16 जुलाई, 622 ई. से की जाती है, जो पैगम्बर मोहम्मद साहब के मक्का से मदीना जाने की तिथि है।
🔄अंग्रेजी व देशी माह का सामंजस्य
- हिंदू चंद्र मास ग्रिगोरियन महीनों से ठीक मेल नहीं खाते, इसलिए हर अंग्रेजी महीना दो देशी महीनों में फैला रहता है — जैसे जनवरी पौष-माघ से, अप्रैल चैत्र-बैसाख से, और अगस्त श्रावण-भाद्रपद से मेल खाता है, और यह अतिव्यापी क्रम वर्षभर चलता रहता है।
राजसी परंपराएँ व अन्य उल्लेखनीय तथ्य
घरेलू त्योहारों से परे वे दरबारी सैन्य समारोह, मंदिर सवारियाँ व सिक्ख परंपराएँ हैं जिन्होंने कभी राजस्थान के सार्वजनिक जीवन को आकार दिया।
🗡️सैन्य व राजसी समारोह
- जयपुर में दशहरे के अगले दिन आयोजित सलक सैन्य शक्ति के प्रदर्शन का एक समारोह था — मेवाड़ की इसी तरह की परंपरा को 'मुहज्झ' कहा जाता था।
- आश्विन शुक्ला प्रतिपदा को मेवाड़ में मनाया जाने वाला खंग स्थापन एक सामरिक समारोह था, वहीं नीराजन (या लोहाभिसारिका) में नवरात्रों की नवमी पर राजा घोड़ों व सेना के समक्ष दीपक घुमाते थे, जो युद्ध अभियानों की तैयारी का प्रतीकात्मक अनुष्ठान था।
🚶शोभायात्राएँ व परिक्रमाएँ
- हेड़े की परिक्रमा जयपुर में भाद्रपद माह में आयोजित होती थी, जो पुराने घाट से आरंभ होकर गोपालजी के मंदिर में संपन्न होती थी, वहीं मारगपाली की सवारी जयपुर में कार्तिक शुक्ला प्रतिपदा को निकाली जाती थी।
- भानु सप्तमी (माघ शुक्ला सप्तमी, जिसे सूर्य सप्तमी भी कहते हैं) पर जयपुर में सूर्य की प्रतिमा को गलता तीर्थ के सूर्य मंदिर से पालकी में रामगंज बाजार तक लाया जाता था, जिसके पीछे महाराजा, सामंत व हाकिम आदि सिरह ड्योढ़ी से आमेर की चौपड़ तक आते थे।
🥘सिक्ख परंपरा के विशेष तथ्य
- लंगर, बिना किसी भेदभाव के परोसा जाने वाला निःशुल्क सामूहिक भोज, सिक्ख गुरुओं द्वारा प्रारम्भ की गई एक संस्था है, जो समानता व सेवा-भाव का प्रतीक है।
- गुरु गोविंद सिंह की परीक्षा में सफल पाँच व्यक्ति 'पंज प्यारे' कहलाए — दयाराम खत्री, धर्मदास, मोखमचंद, हिम्मतसिंह व साहिबचंद — और उनकी पहली साहित्यिक रचना 'वारश्री भगौती जी की' मानी जाती है।
🌾विविध व्रत व तथ्य
- राजस्थान का वार्षिक त्योहार-चक्र परंपरागत रूप से श्रावणी तीज से शुरू होकर गणगौर पर समाप्त माना जाता है; बड़साती अमावस बड़ (बरगद) वृक्ष की पूजा को समर्पित है, और ढिंगोली स्त्रियों द्वारा रखा जाने वाला एक व्रत है।