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राजस्थान GK

राजस्थान के लोक संत

Folk Saints

भक्ति आंदोलन की सगुण-निर्गुण धाराओं से लेकर दादू, जांभोजी, मीरा और ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती तक — राजस्थान के लोक संतों, सम्प्रदायों और उनकी जीवंत परंपराओं की पूरी यात्रा।

35 टॉपिक36 फ्लैशकार्ड13 MCQ
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भक्ति परंपरा एवं शास्त्रीय सम्प्रदाय

Bhakti Tradition & Classical Sects

राजस्थान के अपने लोक संतों के उभरने से पहले, शैव, शाक्त और वैष्णव उपासना की गहरी धारा तथा साकार सगुण व निराकार निर्गुण भक्ति के स्पष्ट विभाजन ने आगे की पूरी कहानी की नींव रखी।

📜भक्ति आंदोलन: सगुण-निर्गुण धाराएँ

  • सनातन धर्म को विश्व के सबसे प्राचीन धर्मों में गिना जाता है; समय के साथ मध्यकालीन भक्ति चिंतन दो धाराओं में बँट गया — सगुण धारा (रामानंद, वल्लभ, निम्बार्क आदि सम्प्रदाय) जो ईश्वर को साकार रूप में पूजती थी, और निर्गुण धारा जो निराकार, निर्गुण ब्रह्म की उपासना करती थी।
  • निर्गुण धारा ने मूर्तिपूजा और कर्मकांड का विरोध करते हुए यह संदेश दिया कि परमात्मा कण-कण में व्याप्त है, और भजन, कीर्तन, नाम-स्मरण तथा गुरु-सान्निध्य के माध्यम से जाति-भेद मिटाकर सबको भक्ति में बराबरी का अधिकार दिया।
  • राजस्थान में दोनों धाराएँ साथ-साथ पनपीं — प्राचीन काल से चली आ रही शैव और शाक्त परंपराएँ, तथा बाद में विकसित हुई वैष्णव शाखाएँ — और 15वीं सदी के बाद यहाँ अनेक स्वदेशी निर्गुणी संत-सम्प्रदाय उभरे।

🔱शैव सम्प्रदाय

  • शिव-उपासकों की जड़ें सिंधु घाटी सभ्यता में मिली योगी-मुद्रा वाली मूर्तियों और लिंग-आकृतियों तक जाती हैं; मध्यकाल तक यह परंपरा कापालिक, पाशुपत, लिंगायत (वीरशैव) और काश्मीरक शाखाओं में बँट गई, जिनमें से कापालिक व पाशुपत राजस्थान में गहराई से जमे।
  • तांत्रिक, भस्म रमाए और श्मशान में निवास करने वाले कापालिक साधु भैरव को शिव का अवतार मानते थे, जबकि दंडधारी पाशुपत सम्प्रदाय के प्रवर्तक लकुलीश को शिव का अंतिम अवतार माना जाता है; रावल बाप्पा द्वारा बनवाया मेवाड़ का एकलिंगजी मंदिर इसका प्रमुख तीर्थ है।
  • लिंगायत सम्प्रदाय मुख्यतः कर्नाटक में और काश्मीरक कश्मीर में फला-फूला, जबकि राजस्थान में लकुलीश-पाशुपत धारा का प्रभाव मेवाड़ में अधिक रहा और नाथ सम्प्रदाय का बोलबाला मारवाड़ में रहा।

🧘नाथ सम्प्रदाय

  • प्रारंभिक मध्यकाल में शैव विचारधारा के नए रूप के रूप में उभरा नाथ पंथ, संस्थापक के रूप में नाथ मुनि से जुड़ा है, पर इसे असली प्रसिद्धि गोरखनाथ ने दिलाई; आगे चलकर जोधपुर के महाराजा मानसिंह राठौड़ इसके प्रमुख राजसी संरक्षक बने।
  • नाथपंथी साधु भगवा वस्त्र, ऊँची काली टोपी और कान छिदवाने से पहचाने जाते हैं, साथ ही ललाट पर भस्म, जटाएँ और शिवलिंग-पूजा भी उनकी पहचान है; राज्य में उनकी प्रमुख पीठ जालोर का सिरे का मंदिर है, जहाँ उन्होंने जालंधरनाथ का मंदिर भी बनवाया।
  • जालंधरनाथ के शिष्य कानपानाथ ने कानपा पंथ की शुरुआत की, जिसे कालबेलिया समुदाय अपनी गुरु-परंपरा के रूप में मानता है।

🌺शाक्त सम्प्रदाय

  • शक्ति के विभिन्न रूपों की उपासना करने वाले शाक्त कहलाते हैं — इस परंपरा की जड़ें भी लिंग-पूजा की तरह सिंधु घाटी सभ्यता की मातृदेवी मूर्तियों तक जाती हैं, और मध्यकाल में यह वामाचार व दक्षिणाचार धाराओं में बँट गई।
  • राजपूत राजवंशों ने अपनी कुलदेवियों को आराध्य के रूप में अपनाया — मेवाड़ शासक बाणमाता को पूजते थे, जबकि आमेर के कछवाहा जामवाय माता और अन्नपूर्णा (शीलादेवी) को कुलदेवी मानते थे — और उनके सम्मान में अनेक मंदिर बनवाए।

🪷वैष्णव सम्प्रदाय की शुरुआत

  • विष्णु और उनके दस अवतारों के उपासक वैष्णवों ने जटिल कर्मकांड और पशुबलि की जगह भक्ति, कीर्तन और नृत्य को प्राथमिकता दी; राजस्थान में इसका सबसे पुराना प्रमाण दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व का घोसुंडी शिलालेख है, जिसमें संकर्षण-वासुदेव व बलराम की पूजा और अश्वमेध यज्ञ का उल्लेख है।
  • दक्षिण भारत में तमिल आलवार संतों ने पहले ही वैष्णव भक्ति आंदोलन को गति दी थी, और मंडोर (जोधपुर) में मिले गुप्तकालीन शिलापट्टों पर गोवर्धन-धारण जैसी कृष्ण-लीला के दृश्य उकेरे मिलते हैं।

🏛️रामानुज सम्प्रदाय

  • दक्षिण भारतीय आचार्य यमुनाचार्य ने वैष्णव विचार को वैदिक परंपरा से जोड़ने का पहला प्रयास किया; उनके शिष्य रामानुजाचार्य ने, जिनका जन्म तिरुपति (तमिलनाडु) में हुआ, ब्रह्मसूत्र पर 'श्रीभाष्य' लिखा, राम को परब्रह्म मानते हुए विशिष्टाद्वैत दर्शन का प्रतिपादन किया, और शंकराचार्य के अद्वैतवाद को चुनौती दी।
  • ईश्वर को निर्गुण नहीं बल्कि सगुण मानने वाले रामानुज को उत्तर व दक्षिण भारत की भक्ति-धाराओं के बीच सेतु माना जाता है; उत्तर भारत में इस सम्प्रदाय की प्रमुख पीठें अयोध्या मठ और गलताजी (जयपुर) हैं, जिसे उत्तर तोताद्रि भी कहा जाता है।

🎭रामानंदी सम्प्रदाय व कृष्णदासजी पयहारी

  • रामानुज की शिष्य-परंपरा में आने वाले गुरु रामानंद को उत्तर भारत के भक्ति आंदोलन का जनक माना जाता है; प्रयाग में जन्मे और गुरु राघवानंदजी के शिष्य रामानंद ने जाति-भेद रखने वाले गुरु-भाइयों से अलग होकर रामानंदी (रामावत) सम्प्रदाय की स्थापना की, जिसमें राम-सीता की दास्य-भाव से उपासना होती है, साथ ही उन्होंने निर्गुण भक्ति का मार्ग भी खोला।
  • राजस्थान में इस सम्प्रदाय की शाखा की स्थापना पयहारीजी ने की, जो अनंतानंदजी के प्रमुख शिष्य थे; उन्होंने गलताजी (जयपुर) में शास्त्रार्थ में नाथपंथियों को पराजित कर 1503 ई. में वहाँ इस सम्प्रदाय की प्रमुख पीठ स्थापित की; उनके शिष्य अग्रदासजी ने बाद में रैवासा (सीकर) में रसिक सम्प्रदाय की स्थापना की, जो राम की उपासना कृष्ण-सी माधुर्य-भाव में करता है।
  • जयपुर के सवाई जयसिंह ने गलताजी शाखा को संरक्षण दिया और दरबारी कवि कृष्ण भट्ट कलानिधि से 'राम रासा' ग्रंथ लिखवाया; रामानंदजी की शिष्य-परंपरा से जुड़े बालानंद के नागा साधुओं के दल ने 1760 ई. में अहमदशाह अब्दाली के विरुद्ध जयपुर व भरतपुर को सैन्य सहायता तक दी।

🌙निम्बार्क सम्प्रदाय

  • 12वीं सदी के तैलंग ब्राह्मण विद्वान आचार्य निम्बार्क द्वारा स्थापित यह सम्प्रदाय, जिसे हंस सम्प्रदाय भी कहा जाता है, ने 'वेदांत पारिजात' टीका के माध्यम से द्वैताद्वैत (भेदाभेद) दर्शन का प्रतिपादन किया और कृष्ण को परब्रह्म तथा राधा को उनकी शक्ति मानकर पूजा की; अनुयायी माथे पर गोपीचंदन की दो रेखाओं के बीच कृष्ण-बिंदु लगाते हैं।
  • शिष्य आचार्य परशुरामजी देवाचार्य ने किशनगढ़ (अजमेर) के निकट सालेमाबाद में सम्प्रदाय की प्रमुख पीठ स्थापित की, जो आज भी वहीं है; उनकी रचना 'परशुराम सागर' प्रसिद्ध है, और सहयोगी शिष्य हरिदासजी ने आगे चलकर सखी सम्प्रदाय की स्थापना की, जो कृष्ण की उपासना सखा-भाव में करता है।

🛕वल्लभ सम्प्रदाय (पुष्टिमार्ग)

  • 16वीं सदी के आरंभ में वल्लभाचार्य द्वारा स्थापित यह सम्प्रदाय 'अनुभाष्य' ग्रंथ के माध्यम से शुद्धाद्वैत दर्शन प्रतिपादित करता है और भक्ति को ही रस-रूप मानता है; उनके पुत्र विट्ठलनाथ ने आगे चलकर अष्टछाप कवि-मंडली गठित की और सम्राट अकबर का सम्मान भी अर्जित किया।
  • औरंगजेब के मंदिर-विध्वंस आदेश की आशंका में विट्ठलनाथ के वंशजों ने 1669 में श्रीनाथजी की प्रतिमा गोवर्धन से राजस्थान लाकर मेवाड़ के महाराणा राजसिंह की अनुमति से 1671 में बनास नदी किनारे सिहाड़ गाँव में स्थापित की — यही आज का नाथद्वारा है, सम्प्रदाय की प्रमुख पीठ, जिसके गर्भगृह पर कलश, सुदर्शन चक्र और सात ध्वज एक साथ फहराए जाते हैं, यह विशेषता किसी अन्य पीठ में नहीं मिलती।
  • मुगलकाल में विध्वंस की आशंका से पुष्टिमार्ग के अधिकांश मंदिर हवेलियों के भीतर बने, जहाँ से हवेली संगीत की परंपरा जन्मी; इस सम्प्रदाय में कृष्ण के बाल-स्वरूप की नित्य 'सेवा' होती है, दर्शन को 'झाँकी' कहा जाता है, और मूर्ति के पीछे टँगे चित्रित पर्दे 'पिछवाई' कहलाते हैं — नाथद्वारा की पिछवाइयाँ स्वयं में प्रसिद्ध कलाकृतियाँ हैं।

🎶गौड़ीय सम्प्रदाय

  • मूलतः स्वामी मध्वाचार्य (12वीं सदी) द्वारा ब्रह्म सम्प्रदाय के रूप में स्थापित और द्वैतवाद दर्शन का प्रतिपादन करने वाला यह सम्प्रदाय आगे चलकर बंगाल के चैतन्य महाप्रभु द्वारा नया रूप पाकर लोकप्रिय हुआ, जिन्होंने वृंदावन में रासलीला व संकीर्तन को कृष्ण-भक्ति का माध्यम बनाया और इसे गौड़ीय सम्प्रदाय नाम दिया।
  • आमेर के मानसिंह प्रथम इस सम्प्रदाय से प्रभावित होकर 1593 में वृंदावन में गोविंददेवजी मंदिर बनवाया; बाद में रूप गोस्वामी राधागोविंदजी की प्रतिमा जयपुर लाए, जहाँ सवाई जयसिंह ने चंद्रमहल के पीछे उनके लिए मंदिर बनवाया — जयपुर के शासक गोविंददेवजी को नगर का वास्तविक राजा और स्वयं को उनका दीवान मात्र मानने लगे।
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निर्गुण संत और उनके पंथ

Nirgun Saints and Their Panths

साधारण लोगों द्वारा गढ़े गए राजस्थान के अपने पंथ — एक रुई धुनने वाला, एक लकड़हारा, एक गोद लिया पुत्र — जिन्होंने मूर्ति और जाति दोनों को नकारा, और आज भी जीवित पीठें, मेले व आचार-नियम पीछे छोड़ गए।

🕺जसनाथजी - जसनाथी सम्प्रदाय

  • 1482 ई. में कटारियासर (बीकानेर) में हमीरजी जानी जाट के गोद लिए पुत्र के रूप में जन्मे जसनाथजी ने नाथ-दीक्षा ली, गोरख मलिया में बारह वर्ष तपस्या की, और 1504 ई. में जसनाथी सम्प्रदाय की स्थापना की; मात्र 24 वर्ष की आयु में उन्होंने अपनी मंगेतर कालडांदे के साथ जीवित समाधि ली।
  • नाथ परंपरा से जुड़ा होते हुए भी वैष्णव भक्ति में आस्था रखने वाला यह सम्प्रदाय मूर्तिपूजा नहीं करता — इसके स्थलों पर ध्वजयुक्त 'थान' स्थापित होता है — और मुख्यतः जाट समुदाय के अनुयायी 36 आचार-नियमों से बँधे हैं, जो पशुबलि, मूर्तिपूजा और धार्मिक आडंबर का विरोध करते हैं।
  • इसका सबसे प्रसिद्ध अनुष्ठान 'अग्नि नृत्य' है — दहकते अंगारों पर नंगे पैर चलना — जो प्रमुख पीठ कटारियासर (बीकानेर) में होता है, जहाँ वर्ष में तीन बार मेले लगते हैं; मुगल सम्राट औरंगजेब ने भी इसके सिद्धों को देशभर में भ्रमण हेतु निशान-नक्कारा प्रदान किया था।

🌳जांभोजी - विश्नोई सम्प्रदाय

  • 1451 ई. में पीपासर (नागौर) में जन्मे जांभोजी ने माता-पिता के निधन के बाद गृहत्याग किया, नाथ-दीक्षा ली, और 1485 ई. में साम्भराथल (बीकानेर) में विश्नोई सम्प्रदाय की स्थापना की, जो निराकार विष्णु की उपासना सिखाता है; अनुयायी उन्हें विष्णु का अवतार मानते हैं।
  • उनकी शिक्षाएँ — हरे पेड़ न काटने, जीवों पर दया और नशे से परहेज़ सहित 29 आचार-नियम, साथ ही नित्य स्नान व विष्णु-भजन — 'जम्भ सागर शब्दावली' में संकलित हैं, जिसे अनुयायी पाँचवाँ वेद मानते हैं; सम्प्रदाय का नाम स्वयं विष्णु-पूजा और इन्हीं 'उनतीस' (29) नियमों से जुड़ा है।
  • पेड़ों व वन्यजीवों की रक्षा के लिए प्राण देने तक की विश्नोई समुदाय की परंपरा ने जांभोजी को 'पर्यावरण वैज्ञानिक' की उपाधि दिलाई है; सम्प्रदाय की प्रमुख पीठ मुकाम-तालवा (नोखा, बीकानेर) है, जहाँ 1536 में उन्हें समाधिस्थ किया गया, और वर्ष में दो बार मेले लगते हैं।

🧵संत दादूजी - दादू पंथ

  • 'राजस्थान के कबीर' के नाम से प्रसिद्ध दादूजी का जन्म 1544 ई. में अहमदाबाद में धुनिया (रुई धुनने वाले) समुदाय में हुआ; लगभग 1568 ई. में साम्भर बसने के बाद उन्होंने साधुक्कड़ी बोली में आम जन को ब्रह्म व मोक्ष की शिक्षा देनी शुरू की, जो 1574 ई. में दादू पंथ के रूप में स्थापित हुई।
  • परब्रह्म (दादू) पंथ निराकार, निष्कलंक ब्रह्म की उपासना करता है; इसकी प्रमुख पीठ नारायणा (जयपुर) है, जहाँ दादूजी ने 1603 ई. में देह त्यागी — इससे पहले सम्राट अकबर ने स्वयं फतेहपुर सीकरी में उनके साथ चालीस दिन तक सत्संग किया था।
  • दादूजी के 152 प्रमुख शिष्यों में से 52 ने आगे चलकर अपनी-अपनी गद्दियाँ स्थापित कीं, जिन्हें सामूहिक रूप से दादू पंथ के 'बावन थंभ' कहा जाता है; दादूपंथी साधु आपस में 'सतराम' कहकर अभिवादन करते हैं, विवाह नहीं करते, और परंपरानुसार मृत शरीर को दाह-संस्कार या दफन के बजाय जंगल में छोड़ देते हैं।

🪓संत लालदासजी - लालदासी सम्प्रदाय

  • पेशे से लकड़हारा मेव (मुस्लिम) संत लालदासजी का जन्म 1540 ई. में ढोलीदूब गाँव (अलवर) में हुआ; तिजारा के सूफी संत गद्दन चिश्ती से दीक्षा लेकर उन्होंने निर्गुण भक्ति का प्रचार करते हुए लालदासी सम्प्रदाय की स्थापना की, जिसके अधिकांश अनुयायी आज भी अलवर-भरतपुर क्षेत्र के मेव मुस्लिम हैं।
  • यह पंथ हिंदू-मुस्लिम एकता और जातिगत भेदभाव मिटाने पर विशेष बल देता है, तथा अपने ब्रह्म को सीधे 'राम' कहकर पुकारता है; इसकी प्रमुख पीठ नागला गाँव (बाड़ी, भरतपुर) है, अन्य स्थल शेरपुर व ढोली दूब हैं, और यह भिक्षावृत्ति को हतोत्साहित करते हुए हर साधु से स्वयं आजीविका कमाने की अपेक्षा रखता है।

📿चरणदासजी - चरणदासी पंथ

  • 1703 ई. में मेवात क्षेत्र के देहरा गाँव (अलवर) में जन्मे चरणदासजी — मूल नाम रणजीत — ने 19 वर्ष की आयु में मुनि शुकदेव से दीक्षा ली, आजीवन ब्रह्मचारी रहे, और चरणदासी पंथ की स्थापना की; इसका साहित्य मेवाती बोली में है और यह श्रीमद्भागवत को अपना पूज्य ग्रंथ मानता है।
  • सगुण और निर्गुण दोनों मार्गों का अनूठा संगम प्रस्तुत करने वाला यह पंथ निर्गुण ब्रह्म की उपासना सखी-भाव में करता है, साथ ही राधा-कृष्ण भक्ति को भी अपनाता है; इसकी प्रमुख पीठ दिल्ली में है, जयपुर में गद्दी पानों का दरीबा में तथा अलवर में दो मंदिर हैं, और यह 42 नियमों का पालन करता है।
  • उनके 52 शिष्यों में कवयित्री दयाबाई ('दयाबोध', 'विनयमालिका') और सहजोबाई ('सहज प्रकाश', 'सबदवाणी') विशेष उल्लेखनीय हैं; अनुयायी गृहस्थ (कंठी धारण करने वाले) और विरक्त (पीत वस्त्र व तुलसी माला धारण करने वाले) वर्गों में बँटे हैं।

🕊️संत रामचरणजी - रामस्नेही सम्प्रदाय (शाहपुरा)

  • 1720 ई. में सोडा गाँव (मालपुरा) में एक वैश्य परिवार में जन्मे रामचरणजी — मूल नाम रामकिशन — को 1751 ई. में दांतड़ा में स्वामी कृपाराम से दीक्षा मिली; भीलवाड़ा व कुहाड़ा में प्रचार के बाद वे शासक रणसिंह के आमंत्रण पर शाहपुरा बसे, जहाँ लगभग 1760 ई. में उन्होंने रामस्नेही सम्प्रदाय की स्थापना की।
  • निराकार राम के नाम-स्मरण को यहाँ मुक्ति का एकमात्र मार्ग माना जाता है; रामस्नेही संत मुंडित सिर व गुलाबी वस्त्रों में रामद्वारों पर रहते हैं, और प्रमुख पीठ शाहपुरा में हर चैत्र माह फूलडोल उत्सव मनाया जाता है, जहाँ महाराजा रणसिंह द्वारा बनवाई गई स्मृति-छतरी भी स्थित है।

🌿रामस्नेही सम्प्रदाय की शाखाएँ: रैण, सिंहथल व खेड़ापा

  • रैण (नागौर) में संत दरियाव जी (1676-1758 ई.) — जिन्हें 1712 ई. में गुरु बालकनाथ जी से दीक्षा मिली — ने रैण शाखा की स्थापना की, और हिंदू-मुस्लिम सद्भाव के संदेश के रूप में 'रा' अक्षर को राम व 'म' को मुहम्मद का प्रतीक बताया; उनकी रैण स्थित समाधि पर आज भी हर चैत्र पूर्णिमा को विशाल मेला लगता है।
  • गृहस्थ जीवन जीते हुए संत हरिरामदास जी (1719-1778 ई.) ने 1743 ई. में दुलचासर में दीक्षा लेकर सिंहथल (बीकानेर) शाखा की स्थापना की; उनकी रचना 'घाघर निशानी', जो प्राणायाम व हठयोग पर आधारित है, बीकानेर के बड़ा रामद्वारा में सम्प्रदाय के सबसे पुराने वाणी-साहित्य के रूप में सुरक्षित है।
  • हरिरामदास जी के शिष्य संत रामदास जी (1726-1798 ई.) ने 1756 ई. में खेड़ापा (जोधपुर) शाखा — सम्प्रदाय की चौथी पीठ — स्थापित की, और 'गुरु ग्रंथ महिमा' सहित 24 प्रमुख ग्रंथों की रचना की; उनके उत्तराधिकारी दयालदास के समय से साधुओं को निर्वस्त्र विरक्त से लेकर गृहस्थ तक पाँच श्रेणियों में बाँटा गया।

🪔संत हरिदासजी - निरंजनी सम्प्रदाय

  • 1455 ई. में डीडवाना के निकट कापड़ोद में हरिसिंह सांखला के रूप में जन्मे हरिदासजी ने डकैती के जीवन से मुड़कर आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त किया, टीखी डूंगरी में कठोर तपस्या की, और निरंजनी सम्प्रदाय की स्थापना की, जो परमात्मा को 'अलख निरंजन' कहकर पूजता है; डीडवाना के गढ़ा स्थित उनकी समाधि आज भी सम्प्रदाय की प्रमुख पीठ है।
  • पूर्णतः निर्गुण सम्प्रदायों से अलग, यह पंथ सगुण शैली की नवधा व प्रेम भक्ति को भी स्वीकारता है और मूर्तिपूजा या वर्णाश्रम व्यवस्था का विरोध नहीं करता, जिससे यह नाथ पंथ और व्यापक संत परंपरा के बीच समन्वयकारी सेतु बन जाता है; अनुयायी विरक्त निहंग या गृहस्थ घरबारी वर्ग में बँटे हैं।
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निर्गुण भक्ति के कवि-संत

Poet-Saints of Nirgun Bhakti

एक राजकुमार, एक विद्वान, एक दूल्हा, एक किसान और एक मोची — पाँच बिल्कुल अलग जीवन जो रामानंद या दादू की शिष्य-परंपरा से होते हुए ऐसी वाणी तक पहुँचे जो आज भी राजस्थान भर में भक्ति जगाती है।

👑संत पीपाजी

  • 1425 ई. में गागरोन के शासक-पुत्र प्रताप सिंह के रूप में जन्मे पीपाजी रामानंद के बारह प्रमुख शिष्यों में गिने जाते हैं; उन्होंने राजसी सुख-सुविधाएँ त्याग कर काशी में रामानंद से दीक्षा ली, और उन्हें राजस्थान में भक्ति आंदोलन की ज्योति जलाने वाला पहला संत माना जाता है।
  • दर्जी समुदाय द्वारा अपने आराध्य के रूप में पूजे जाने वाले पीपाजी ने जाति व सम्प्रदाय-भेद की कड़ी निंदा की और सिखाया कि निर्गुण उपासना, गुरु-मार्गदर्शन व भक्ति मिलकर ही मुक्ति दिलाते हैं; उनका एक पद सिख धर्मग्रंथ गुरु ग्रंथ साहिब में भी शामिल है।
  • समदड़ी (बालोतरा) स्थित भव्य मंदिर में हर चैत्र शुक्ल पूर्णिमा को बड़ा मेला लगता है, और उन्हें दिल्ली सुल्तान फिरोजशाह तुगलक द्वारा गागरोन किले पर किए हमले को विफल करने के लिए भी याद किया जाता है।

📚संत सुंदरदासजी

  • दादूजी के सबसे निपुण शिष्य सुंदरदासजी (छोटे) का जन्म 1596 ई. में दौसा में एक खंडेलवाल वैश्य परिवार में हुआ; उन्होंने 'ज्ञान समुद्र' व 'सुंदर विलास' जैसी प्रसिद्ध ज्ञानमार्गी रचनाएँ लिखीं, जिससे उन्हें 'हिंदी साहित्य के शंकराचार्य' की उपाधि मिली।
  • उनके पाँच प्रमुख शिष्य — दयालदास, श्यामदास, दामोदरदास, निर्मलदास व नारायणदास — सामूहिक रूप से 'बड़े थंभ' कहलाते हैं; उनका मुख्य कार्यक्षेत्र फतेहपुर शेखावाटी था, इसीलिए उन्हें 'सुंदरदास फतेहपुरिया' भी कहा जाता है; भारतीय डाक ने 1997 में उनकी 400वीं जयंती पर डाक टिकट जारी किया।
  • दादू सम्प्रदाय में एक अन्य वरिष्ठ शिष्य, जो मूलतः भीमसिंह नाम से जाने जाते थे, को भी सुंदरदास (बड़े) नाम दिया गया, और उन्होंने ही दादू सम्प्रदाय के भीतर नागा साधु पंथ की नींव रखी — यह याद दिलाता है कि दादूजी की परंपरा में इस नाम के एक से अधिक संत हुए।

💍संत रज्जबजी

  • 1567 ई. में सांगानेर (जयपुर) के एक पठान परिवार में जन्मे रज्जबजी अपनी शादी के दिन ही दादूजी की शिक्षा सुनकर उनके शिष्य बन गए — और आजीवन दूल्हे की वेशभूषा में ही उनकी शिक्षाओं का प्रचार करते रहे।
  • उनकी प्रमुख रचनाएँ 'अंगबधू' (दादूजी की वाणी का संकलन) और 'सर्वांगी' (137 पूर्ववर्ती संत-कवियों की वाणी का संकलन) उन्हें एक भक्त के साथ-साथ संकलनकर्ता-विद्वान भी सिद्ध करती हैं; उनके अनुयायी 'रज्जबपंथी' कहलाते हैं, और उनकी मुख्य गद्दी आज भी सांगानेर में है।

🌾संत धन्नाजी

  • 1415 ई. में टोंक के निकट एक जाट किसान परिवार में जन्मे धन्नाजी ने काशी में रामानंद से दीक्षा ली और निर्गुण उपासक बनने के बावजूद गृहस्थ जीवन जीते रहे; उन्हें राजस्थान के धार्मिक जीवन को भक्ति की ओर पहला वास्तविक मोड़ देने का श्रेय दिया जाता है।
  • कर्मकांड व मूर्तिपूजा के कट्टर आलोचक धन्नाजी ने सिखाया कि ईश्वर की प्राप्ति बाहरी आडंबर से नहीं, भीतरी खोज से होती है; उनकी रचना 'धन्नाजी की आरती' उपलब्ध है, और उनकी कुछ शिक्षाएँ सिख धर्मग्रंथ गुरु ग्रंथ साहिब में भी संरक्षित हैं।

👞संत रैदासजी

  • बनारस में जन्मे और रेगर (मोची) समुदाय से आने वाले रामानंद के शिष्य रैदास ने राजस्थान में समय बिताया और मीरा के काल में चित्तौड़ आए; चित्तौड़गढ़ के मीरा मंदिर के सामने उनकी छतरी स्थित है, जबकि मांडोगढ़ में उनकी कुटी व कुंड हैं।
  • राम और रहीम को एक मानने वाले रैदास ने जाति व्यवस्था का विरोध किया और सत्संगति के महत्त्व पर बल दिया; उन्होंने सिखाया कि ब्रह्म को अपने ही हृदय में खोजना चाहिए, और अहंकार मिटने पर ही भक्ति संभव होती है।
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सगुण भक्ति की संत नारियाँ व संत मावजी

Sagun Bhakti's Women Saints & Sant Mavji

जहाँ निर्गुण संत निराकार का गुणगान करते थे, वहीं सगुण भक्ति की एक समानांतर धारा — जिसे मुख्यतः परंपरा को चुनौती देने वाली स्त्रियों ने आगे बढ़ाया — कृष्ण-भक्ति में समर्पित हो गई, और आदिवासी राजस्थान के अपने घोषित अवतार तक बेणेश्वर में जा पहुँची।

🎶मीराबाई - राजस्थान की राधा

  • 1498 ई. में मेड़ता के निकट कुड़की गाँव में पेमल नाम से जन्मीं मीराबाई का पालन-पोषण माता के असामयिक निधन के बाद उनके दादा राव दूदा ने किया; 1516 ई. में उनका विवाह मेवाड़ के महाराणा संग्रामसिंह (राणा सांगा) के ज्येष्ठ पुत्र भोजराज से हुआ, जिनका देहांत विवाह के कुछ वर्षों बाद ही हो गया।
  • संतों के साथ सत्संग के कारण मेवाड़ राजपरिवार द्वारा प्रताड़ित होने पर मीरा ने मेवाड़ छोड़ दिया, कुछ समय वृंदावन में बिताया, और केवल गिरधर गोपाल (कृष्ण) को ही भवसागर पार कराने में सक्षम मानते हुए माधुर्य भाव में भक्ति व्यक्त की।
  • 1547 ई. में गुजरात के डाकोर स्थित रणछोड़ मंदिर में वे अपने गिरधर गोपाल में विलीन हो गईं; उनकी प्रसिद्ध पदावलियाँ 'मीरा वृहत् पदावली' जैसे संकलनों में तथा स्वयं मीरा द्वारा रचित 'सत्यभामाजी नौ रासौं' में संरक्षित हैं।

🤫संत भूरी बाई अलख

  • 'मेवाड़ की दूसरी मीरा' के नाम से प्रसिद्ध भूरी बाई का जन्म सरदारगढ़ (राजसमंद) के एक सुथार परिवार में हुआ और कम उम्र में ही नाथद्वारा के विधुर फतेहलाल जी से उनका विवाह हुआ; उनका कार्यक्षेत्र मेवाड़ रहा।
  • उनकी शिक्षा मात्र 'चुप' थी — मौन रहो, और मन के भीतर ही ईश्वर की उपासना करो, बाहरी दिखावे के बजाय उन्हीं में लीन रहो।

🎼गवरी बाई - वागड़ की मीरा

  • डूंगरपुर के नागर कुल में जन्मीं गवरी बाई ने मीरा की भक्ति-धारा को वागड़ क्षेत्र तक पहुँचाया, और कृष्ण को अपना पति मानकर इतनी गहन कृष्ण-भक्ति की कि डूंगरपुर के महारावल शिवसिंह प्रभावित होकर उनके लिए बालमुकुंद मंदिर बनवाया।
  • उनका प्रमुख ग्रंथ 'कीर्तन माला' है, जिसमें गुजराती, राजस्थानी और ब्रजभाषा के मिश्रण में रचे 801 पद हैं; उन्होंने 1875 ई. में यमुना तट पर समाधि ली।

🌸संत राणा बाई

  • 'राजस्थान की दूसरी मीरा' कहलाने वाली राणा बाई का जन्म 1504 ई. में हरनावा गाँव-मकराना में एक जाट परिवार में हुआ; संत चतुर्दास की शिष्या के रूप में उन्होंने कृष्ण-भक्ति में जीवन समर्पित किया, और 1570 ई. में 60 वर्ष की आयु में हरनावा में जीवित समाधि ली।
  • आजीवन अविवाहित रहने के कारण उनकी समाधि की परिक्रमा नहीं की जाती; उनके भाई भुवानजी ने वह चबूतरा बनवाया जो आज भी विद्यमान है, और वहाँ हर भाद्रपद शुक्ल त्रयोदशी को बड़ा मेला लगता है।

🐴संत मावजी - निष्कलंकी सम्प्रदाय

  • 1714 ई. में सबला (डूंगरपुर) में एक औदीच्य ब्राह्मण परिवार में जन्मे मावजी को 1727 ई. में बेणेश्वर में ज्ञान-प्राप्ति हुई, और उन्होंने निष्कलंकी (निष्कलंक) सम्प्रदाय की स्थापना कर मही नदी तट पर सबला स्थित अपने मुख्य मंदिर में स्वयं को विष्णु के कल्कि अवतार के रूप में प्रतिष्ठित किया।
  • ढोलागढ़ में एकांतवास करते हुए उन्होंने श्रीमद्भागवत की कृष्ण-लीलाओं को वागड़ी भाषा में पाँच चौपड़ों (पुस्तिकाओं) में रचा, और एक चौपड़े में स्वयं को कृष्ण का दसवाँ (कल्कि) अवतार घोषित किया।
  • उनकी पुत्रवधू जानकुँवरी ने उनकी स्मृति में बेणेश्वर धाम बनवाया — सर्वधर्म समन्वय का प्रतीक तीर्थ, जहाँ सम्प्रदाय का मठाधीश आजीवन ब्रह्मचारी रहता है; इसका सबसे बड़ा मेला माघ शुक्ल पूर्णिमा को मही, सोम व जाखम नदियों के त्रिवेणी संगम पर लगता है, जिसे 'आदिवासियों का कुंभ' कहा जाता है।
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सूफी संत, जैन आचार्य व अन्य परंपराएँ

Sufi Saints, Jain Acharyas & Other Traditions

हिंदू भक्ति-धारा से परे, अजमेर की सूफी दरगाहें, जैन तेरापंथ के जीवंत आचार्य-क्रम, और छोटे पर गहरे जमे सिख, पारसी, ईसाई व बौद्ध समुदाय मिलकर राजस्थान की सम्पूर्ण आध्यात्मिक विविधता को पूरा करते हैं।

ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती

  • 1143 ई. में फारस के संजरी में जन्मे ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती ने समरकंद व बुखारा में कुरान की शिक्षा ली और पृथ्वीराज चौहान तृतीय के शासनकाल में 1191 ई. में मुल्तान-दिल्ली होते हुए अजमेर पहुँचे, जहाँ उन्होंने भारत में चिश्तिया सूफी सम्प्रदाय की स्थापना की और अपनी खानकाह बनाई।
  • भारत के सूफियों द्वारा 'आफताब-ए-हिंद' की उपाधि से सम्मानित गरीब नवाज़ ने अल्लाह को प्रसन्न करने का माध्यम हिंसा या आडंबर नहीं बल्कि कव्वाली संगीत को बनाया; अजमेर स्थित उनकी दरगाह पर हर रजब माह की 1 से 6 तारीख तक भव्य उर्स लगता है, जिसे हिंदू-मुस्लिम सद्भाव का उज्ज्वल उदाहरण माना जाता है — सम्राट अकबर तक अपने पुत्र के जन्म के बाद पैदल चलकर वहाँ पहुँचे थे।

🌙राजस्थान के अन्य सूफी संत

  • हज़रत शक्कर बार, जिन्हें नरहड़ के पीर या 'बांगड़ के धणी' कहा जाता है, की दरगाह चिड़ावा (झुंझुनू) के निकट नरहड़ गाँव में है — सांप्रदायिक सद्भाव का उल्लेखनीय केंद्र, जहाँ उर्स जन्माष्टमी के दिन ही लगता है; उनके शिष्य शेख सलीम चिश्ती के नाम पर ही अकबर ने अपने पुत्र सलीम — भावी सम्राट जहाँगीर — का नामकरण किया।
  • दाऊदी बोहरा समुदाय के प्रमुख पूज्य संत पीर फखरुद्दीन की दरगाह मही नदी तट पर स्थित गलियाकोट (डूंगरपुर) में है, जहाँ हर वर्ष मुहर्रम की 27वीं तारीख को उर्स लगता है; बोहरा संत अब्दुल रसूल (अब्दुल्ला पीर) का मकबरा इसी तरह बांसवाड़ा में स्थित है।
  • 1113 ई. में बुखारा में जन्मे और ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती के शिष्य हमीदुद्दीन नागौरी ने सुवाल गाँव से नागौर क्षेत्र में चिश्ती परंपरा की स्थापना की और 'सुल्तान-ए-तारकीन' की उपाधि पाई — मुहम्मद बिन तुगलक के शासनकाल में उनकी दरगाह पर बुलंद दरवाज़ा बनवाया गया।

🙏जैन तेरापंथ आचार्य परंपरा

  • 1726 ई. में कांटलिया (मारवाड़) में जन्मे जैन श्वेतांबर आचार्य भिक्षु स्वामी (भीखणजी) ने 1760 ई. में तेरह साधुओं व तेरह गृहस्थ अनुयायियों के साथ अलग से जैन श्वेतांबर तेरापंथ सम्प्रदाय की स्थापना की और इसके प्रथम आचार्य बने; उनकी रचनाएँ 'भिक्षु ग्रंथ रत्नावली' में संकलित हैं।
  • लाडनूं में जन्मे 9वें आचार्य आचार्य तुलसी ने अणुव्रत सिद्धांत का प्रतिपादन किया और 1949 में सरदारशहर से अणुव्रत आंदोलन आरंभ किया; 5 फरवरी 1995 को उनके उत्तराधिकारी बने झुंझुनू में जन्मे आचार्य महाप्रज्ञ (मुनि नथमल), जिन्होंने प्रेक्षाध्यान का प्रतिपादन किया और अंतरधर्म प्रयासों का नेतृत्व किया, जिसकी परिणति 2003 के 'सूरत आध्यात्मिक घोषणा-पत्र' में हुई।
  • महाप्रज्ञ के उत्तराधिकारी और 11वें आचार्य, सरदारशहर में जन्मे आचार्य श्री महाश्रमण (मूल नाम मोहन) ने 1974 में श्वेतांबर दीक्षा ली और 'सुखी बनो' व 'सम्पन्न बनो' जैसी रचनाएँ लिखीं, जिससे तेरापंथ की विद्वान-आचार्यों की परंपरा आगे बढ़ती रही।

🏔️राजस्थान के अन्य संत व मठ

  • 1827 ई. में भरतपुर में जन्मे श्वेतांबर जैन मुनि आचार्य राजेंद्र सूरि ने मठवासी परंपराओं में सुधार किया और प्राकृत भाषा का शब्दकोश 'अभिधान राजेंद्र कोश' रचा; लक्ष्मणगढ़ (सीकर) के श्रद्धानाथ आश्रम के पीठाधीश्वर संत बैजनाथ महाराज, जो 1985 से इस पद पर हैं, को 2025 में पद्मश्री सम्मान मिला।
  • 1696 ई. में वागड़ क्षेत्र में जन्मे भक्त कवि दुर्लभ ने बांसवाड़ा-डूंगरपुर को कृष्ण-भक्ति में डुबो दिया और 'राजस्थान का नृसिंह' की उपाधि पाई; सीकर स्थित सांगलिया धूणी आश्रम, जिसे 1649 ई. में लक्कड़दास महाराज ने स्थापित किया, बाबा खिंवादास महाविद्यालय चलाता है और आगंतुकों का अभिवादन 'जय साहिब' कहकर करता है।

🌱लघु निर्गुण सम्प्रदाय

  • जामनगर के श्री प्राणनाथ द्वारा स्थापित परनामी सम्प्रदाय कृष्ण की उपासना करता है और 'कुजलम स्वरूप' ग्रंथ को पूज्य मानता है, जिसकी मुख्य पीठ पन्ना (मध्य प्रदेश) में और एक बड़ा मंदिर जयपुर में है; चूरू के स्वामी लालगिरि द्वारा स्थापित अलखिया सम्प्रदाय की पीठ बीकानेर में है, इसका ग्रंथ 'अलख स्तुति प्रकाश' है, और लालगिरि की समाधि गलताजी में है।
  • फटे-पुराने वस्त्र (गुदड़) धारण करने के कारण नामित संतदासजी द्वारा स्थापित गुदड़ सम्प्रदाय की पीठ दांतड़ा (शाहपुरा) में है; नागौर में जन्मे नवलदास जी द्वारा स्थापित नवल सम्प्रदाय की पीठ जोधपुर में है और इसका ग्रंथ 'नवलेश्वर अनुभववाणी' है; दोनों निराकार, निर्गुण ईश्वर की उपासना सिखाते हैं।
  • दो वाम-मार्गी सम्प्रदाय इस सूची को पूरा करते हैं — जयसमंद झील के निकट भीलों में प्रचलित उंदरिया पंथ, और रावल मल्लिनाथ द्वारा स्थापित कुंडा पंथ; राजाराम सम्प्रदाय के संस्थापक संत राजाराम ने विश्नोई सम्प्रदाय की तरह ही वृक्ष न काटने का उपदेश दिया।

📖सिक्ख सम्प्रदाय

  • सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक देव का जन्म 1469 ई. में लाहौर के निकट वर्तमान ननकाना साहिब (पाकिस्तान) में हुआ; अवतारवाद को न मानते हुए उन्होंने सिखाया कि अहंकार त्याग और भक्ति ही ईश्वर से मिलन का मार्ग है; उनका देहांत 1538 ई. में हुआ।
  • उनकी शिक्षाएँ गुरु ग्रंथ साहिब में संकलित हैं; दसवें व अंतिम गुरु, गुरु गोविंद सिंह ने मानव गुरु-परंपरा समाप्त कर ग्रंथ को ही गुरु घोषित किया और खालसा पंथ की स्थापना की, जिसमें हर खालसा के लिए पंच ककार — केश, कंघा, कृपाण, कच्छा व कड़ा — अनिवार्य किए; राजस्थान में अधिकांश अनुयायी गंगानगर व हनुमानगढ़ में बसे हैं।

🌍राजस्थान के अन्य धर्म-समुदाय

  • अजमेर, उदयपुर व बाड़मेर में अल्प संख्या में बसे सूर्य-उपासक पारसियों की एक दिलचस्प छाप भीनमाल के वराहश्याम मंदिर में मिलती है, जहाँ सूर्य प्रतिमा पारसी शैली के जूते पहने दिखाई गई है; प्रोटेस्टेंट व कैथोलिक दो शाखाओं में बँटे ईसाई मुख्यतः अजमेर, जयपुर व उदयपुर में तथा आदिवासी बांसवाड़ा, प्रतापगढ़ व डूंगरपुर में बसे हैं।
  • बैराठ में मौर्यकालीन बौद्ध स्तूप व विहार अवशेष तथा झालावाड़ के कौलवी, विनायक, हाथीयागौड़ व गुनई स्थलों पर चट्टान-काट बौद्ध मंदिर इस बात की पुष्टि करते हैं कि यहाँ कभी बौद्ध धर्म फला-फूला था; आज अलवर, जयपुर व झुंझुनू जैसे जिलों में हीनयान व महायान के छोटे-छोटे बौद्ध समुदाय ही शेष हैं।