🙏
राजस्थान GK
राजस्थान के लोक देवता एवं लोक देवियाँ
Folk Deities & Goddesses of Rajasthan
राजस्थान की मिट्टी में रचे-बसे रामदेवजी, गोगाजी, तेजाजी, पाबूजी, करणी माता, जीण माता जैसे लोक देवी-देवताओं की कथाएँ, उनके मंदिर, मेले और लोक-आस्था की जीवंत परंपरा।
60 टॉपिक86 फ्लैशकार्ड10 MCQ
🐎
लोक देवता
Folk Gods
राजस्थान की धरती पर वीरता, बलिदान और करुणा की जीवंत परंपरा — वे नायक जो अपने प्राणों की आहुति देकर आज भी हर गाँव-ढाणी में पूजे जाते हैं।
🛡️भोमिया जी
- भोमिया जी को भूमि की रक्षा करने वाले देवता के रूप में पूजा जाता है।
🐎रूपनाथ
- रूपनाथ, पाबूजी के बड़े भाई बूढ़ोजी के पुत्र थे, और उन्होंने अपने पिता व चाचा पाबूजी की मृत्यु का बदला जींदराव खींची का वध करके लिया। कोलूमण्ड (फलौदी) के पास पहाड़ी पर तथा बीकानेर के सिंभूदड़ा (नोखामंडी) में उनके प्रमुख थान हैं, जबकि हिमाचल प्रदेश में उन्हें 'बालकनाथ' के नाम से पूजा जाता है।
💰डूँगजी-जवाहर जी
- चाचा-भतीजे की जोड़ी डूँगजी-जवाहर जी शेखावाटी क्षेत्र में धनी लोगों को लूटकर उनका धन गरीबों और जरूरतमंदों में बाँट दिया करते थे, इसी कारण वे लोकदेवता के रूप में पूजे जाने लगे। इसके साथ ही उन्होंने 1857 ई. के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
🔱भूरिया बाबा
- दक्षिणी राजस्थान के गौड़वाड़ क्षेत्र में मीणा आदिवासी समुदाय गौतमेश्वर महादेव को श्रद्धा से भूरिया बाबा या गौतमेश्वर बाबा कहकर पूजते हैं; इनका प्रसिद्ध मंदिर सिरोही जिले के चोटीला (चाँदीला) गाँव के पास, सूकड़ी नदी के दाहिने किनारे पर स्थित है, जिसे लोग 'पतित पावनी गंगा' कहकर पुकारते हैं।
- मान्यता है कि यहीं कभी गौतम ऋषि का आश्रम हुआ करता था; मंदिर में आज भी देवी अहल्या और अंजलि की प्रतिमाएँ विराजमान हैं, साथ ही गौतमेश्वर ऋषि महादेव लिंग रूप में यहाँ प्रतिष्ठित हैं।
- हर वर्ष 13 अप्रैल से 15 मई तक यहाँ एक प्रसिद्ध मेला भरता है, जिसमें जनजाति समुदाय अपने पूर्वजों की अस्थियाँ सूकड़ी नदी के पवित्र जल में प्रवाहित करता है।
- भयंकर से भयंकर अकाल में भी मंदिर का 'गंगा कुण्ड' कभी नहीं सूखता — आस-पास तो मात्र 2-3 मीटर खोदने पर ही पानी निकल आता है — और कहा जाता है कि कोई भी मीणा भूरिया बाबा की झूठी कसम कभी नहीं खाता।
- गौतमेश्वर महादेव का एक और लोकतीर्थ प्रतापगढ़ जिले में अरनोद कस्बे के पास भी है, जिसे वहाँ का आदिवासी समुदाय पाप विमोचक तीर्थ के रूप में मानता है।
- वहाँ श्रद्धालु मानते हैं कि पापमुक्ति कुण्ड (मंदाकिनी कुण्ड) में स्नान करने से पाप धुल जाते हैं, हालाँकि इस स्थान का शिवलिंग खण्डित है; यहाँ प्रतिवर्ष बैसाख शुक्ला 11 से ज्येष्ठ कृष्णा 2 तक भव्य लक्खी मेला भरता है।
🌿देव बाबा
- पशु चिकित्सा और आयुर्वेद के गहरे ज्ञान के चलते देव बाबा गूजरों और ग्वालों के बीच पालनहार तथा कष्ट निवारक के रूप में पूजे जाने लगे। भरतपुर के नगला जहाज गाँव में स्थित उनके मंदिर में वर्ष में दो बार — भाद्रपद शुक्ला पंचमी और चैत्र शुक्ला पंचमी को — मेला भरता है।
🌧️मामादेव
- राजस्थान के लोकदेवताओं में मामादेव एक विशिष्ट स्थान रखते हैं — इनकी मिट्टी या पत्थर की कोई मूर्ति नहीं होती, बल्कि गाँव के बाहर मुख्य सड़क पर एक कलात्मक लकड़ी का तोरण प्रतिष्ठित किया जाता है। मुख्यतः गाँव के रक्षक और बरसात के देवता माने जाने वाले मामादेव को प्रसन्न करने हेतु भैंसे की बलि दी जाती है।
🐎आलमजी
- जेतमलोठ राठौड़ वंश के आलमजी को बाड़मेर जिले के मालाणी प्रदेश के राड़धरा क्षेत्र में लोकदेवता के रूप में पूजा जाता है। ढांगी नामक रेतीले टीले पर स्थित उनका थान 'आलमजी का धोरा' कहलाता है, जहाँ हर वर्ष भाद्रपद शुक्ला दूज (द्वितीया) को मेला भरता है।
🐄वीर बिग्गाजी
- जाखड़ समाज के कुल देवता वीर बिग्गाजी का जन्म 1301 ई. (विक्रम संवत् 1358) में बीकानेर (जांगलदेश) के रीड़ी (रोड़ी या बिग्गा) गाँव, श्री डूँगरगढ़ तहसील में, जाट कृषक राव मेहन्द (महेन्द्र) और माँ सुल्तानी जी के घर हुआ था।
- उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन गौ-सेवा में समर्पित कर दिया और अंततः 1336 ई. में राठ मुस्लिम लुटेरों से गायों की रक्षा करते हुए अपने प्राण न्योछावर कर दिये।
- आज उन्हें रीड़ी गाँव के शीश देवली और बिग्गा गाँव के धड़ देवली — दोनों मंदिरों में पूजा जाता है, जहाँ हर वर्ष आश्विन शुक्ला त्रयोदशी को विशाल मेला भरता है।
🛡️वीर फत्ता जी
- जालौर जिले के साथूँ गाँव में जन्मे वीर फत्ता जी ने लुटेरों से अपने गाँव की रक्षा करते हुए प्राणों की आहुति दे दी। साथूँ गाँव में स्थित उनके मंदिर में हर वर्ष भाद्रपद शुक्ला नवमी को मेला भरता है।
⚔️बाबा झुँझार जी
- स्वतंत्रता से पहले सीकर क्षेत्र के इमलोहा गाँव में एक राजपूत परिवार में जन्मे बाबा झुँझार जी ने अपने भाइयों के साथ मिलकर मुस्लिम लुटेरों से गायों और गाँव की रक्षा करते हुए अपने प्राण गँवा दिये।
- हर वर्ष रामनवमी को उनकी स्मृति में इमलोहा गाँव में मेला लगता है, और उनका थान प्रायः खेजड़ी वृक्ष के नीचे स्थापित होता है।
🗡️वीर पनराज जी
- 16वीं सदी में जैसलमेर के नगा गाँव के एक क्षत्रिय परिवार में जन्मे वीर पनराज जी पास के काठौड़ी गाँव के एक ब्राह्मण परिवार की गायों को मुस्लिम लुटेरों से बचाते हुए अपने प्राण न्योछावर कर लोकदेवता के रूप में अमर हो गये।
- उनकी स्मृति में जैसलमेर के पनराजसर गाँव में वर्ष में दो बार मेला भरता है।
🐍हरिरामजी बाबा
- हरिरामजी बाबा सर्प दंश का इलाज करने के लिए प्रसिद्ध थे; सुजानगढ़-नागौर मार्ग पर स्थित झोरड़ा गाँव (नागौर) के उनके मंदिर में साँप की बांबी और बाबा के प्रतीक स्वरूप चरण कमल विराजमान हैं, तथा यहाँ हर वर्ष मेला भरता है।
- उनके पिता का नाम रामनारायण और माता का नाम चन्दनी देवी था; शेखावाटी क्षेत्र में उन्हें विशेष रूप से पूजा जाता है।
🚩केसरिया कुँवरजी
- गोगाजी के पुत्र केसरिया कुँवरजी को स्वतंत्र लोकदेवता के रूप में पूजा जाता है; माना जाता है कि उनका भोपा सर्प दंश के रोगी के शरीर से जहर निकाल देता है, और उनके थान पर प्रतीक स्वरूप सफेद ध्वज फहराया जाता है।
🐎रामदेवजी
- तँवर वंश में जन्मे रामदेवजी का जन्म भाद्रपद शुक्ला द्वितीया को बाड़मेर की शिव तहसील के उण्डूकासमेर गाँव में पिता अजमाल जी व माता मैणादे के घर हुआ था; इन्हें अर्जुन का वंशज माना जाता है और इनके गुरु बालीनाथ थे, जबकि इनके बड़े भाई वीरमदेव को बलराम का अवतार माना जाता है।
- इनका विवाह अमरकोट के सोढ़ा राजपूत शासक दलजी सिंह की पुत्री निहालदे (नेतलदे) से हुआ था।
- बाल्यावस्था में ही रामदेवजी ने सातलमेर (पोकरण) क्षेत्र में आतंक मचाने वाले तांत्रिक राक्षस भैरव का वध कर जनता को वर्षों के कष्ट से मुक्ति दिलाई; उन्होंने पोकरण कस्बे को पुनः बसाया और रामदेवरा (रूणीचा) में रामसरोवर का निर्माण करवाया।
- रामदेवजी ने अपने समय में व्याप्त छुआछूत व अन्य जातिगत बुराइयों को मिटाकर ऐसी सामाजिक समरसता स्थापित की, जो आज भी सभी जातियों-विशेषतः निम्न जातियों-व सभी समुदायों को उनकी शरण में लाती है; हिन्दू इन्हें कृष्ण व विष्णु का अवतार मानते हैं तो मुसलमान इन्हें 'रामसा पीर' कहकर पूजते हैं। कामड़िया पंथ इन्हीं से आरंभ माना जाता है और रूणीचा के बाबा रामदेव के अनुयायी इसी पंथ में सम्मिलित हैं।
- भाद्रपदसुदी एकादशी वि.सं. 1515 (सन् 1458) को इन्होंने जैसलमेर के रूणीचा में रामसरोवर के किनारे जीवित समाधि ली।
- रामदेवरा, जिला मुख्यालय जैसलमेर शहर से पूर्व दिशा में स्थित है, जहाँ रामदेवजी का भव्य मंदिर बना हुआ है। हर वर्ष भाद्रपद शुक्ला द्वितीया से एकादशी तक यहाँ विशाल मेला भरता है, जिसकी सबसे बड़ी विशेषता साम्प्रदायिक सद्भाव है-द्वितीया को जन्मोत्सव और दशमी को समाधि उत्सव मनाया जाता है, वहीं मेले का दूसरा आकर्षण कामड़ जाति की स्त्रियों द्वारा उनकी भक्ति में किया जाने वाला तेरहताली नृत्य है।
- रामदेवजी के अन्य मंदिर जोधपुर के पश्चिम में मसूरिया पहाड़ी पर, बिरांटिया (वर्तमान रायपुर-ब्यावर) एवं सुरताखेड़ा (चित्तौड़गढ़) में भी हैं, जहाँ मेले भरते हैं, वहीं इनकी भक्ति गुजरात के 'छोटा रामदेवरा' मंदिर तक भी पहुँचती है।
- इनके जन्म स्थान उण्डूकासमेर, बाड़मेर में दिसम्बर 2019 में जैसलमेर के पीले पत्थरों से 110 फीट ऊँचा भव्य मंदिर बनकर तैयार हुआ।
- इनके मेघवाल भक्त 'रिखिया' कहलाते हैं, जो श्रद्धापूर्वक इन्हें कपड़े का बना घोड़ा भेंट करते हैं-मानो इनके अपने घोड़े 'लीला' की याद में।
- भाद्रपद शुक्ला द्वितीया को 'बाबे री बीज' (दूज) कहा जाता है, और लोक मान्यता में यही तिथि रामदेवजी के अवतरण की तिथि मानी जाती है।
🐍गोगाजी
- चौहान वंश में जन्मे गोगाजी का जन्म 11वीं सदी में चूरू जिले के ददरेवा नामक स्थान पर पिता जेवरसिंह व माता बाछल देवी के घर हुआ; उन्हें योगी गोरखनाथ और आक्रांता महमूद गजनवी दोनों का समकालीन माना जाता है।
- इनका विवाह कोलूमण्ड की राजकुमारी व पाबूजी के बड़े भाई बूढ़ोजी की पुत्री केलमदे से होना था, परन्तु विवाह से पहले ही इनकी मंगेतर को साँप ने डस लिया; क्रोधित गोगाजी जब मंत्र पढ़ने लगे तो साँप मरने लगे, और तभी नागदेवता ने इन्हें 'सर्पों के देवता' होने का वरदान दिया।
- आज भी राजस्थान का किसान वर्षा के बाद हल जोतने से पहले गोगाजी के नाम की नौ गाँठों वाली 'गोगा राखड़ी' हल व हाली दोनों को बाँधकर सर्पदंश से रक्षा माँगता है; सर्प के काटे व्यक्ति को इनके नाम की 'ताँती' बाँधी जाती है और रक्षाबंधन पर बँधी राखियाँ परम्परा से इन्हें अर्पित की जाती हैं।
- राजस्थान के पाँच पूज्य 'पीरों'-पाबूजी, गोगाजी, हड़बूजी, रामदेवजी व मेहाजी मांगलिया-में गोगाजी का महत्त्वपूर्ण स्थान है।
- अपने मौसेरे भाइयों अरजन-सुर्जन से चल रहे सम्पत्ति विवाद ने तब युद्ध का रूप ले लिया जब वे मुसलमानों की फौज लेकर गोगाजी की गायों को घेरने आए; इस भीषण युद्ध में अरजन-सुर्जन के साथ गोगाजी भी वीरगति को प्राप्त हुए।
- गौ-रक्षा एवं आक्रांता महमूद गजनवी से देश की रक्षार्थ प्राण न्योछावर करने के कारण गोगाजी लोकदेवता के रूप में पूजे जाने लगे-हिन्दू इन्हें 'नागराज' तो मुसलमान 'गोगापीर' कहते हैं, वहीं इन्हें 'जाहरपीर', 'गोगा बाप्पा' या 'गुग्गा' के नाम से भी पूजा जाता है।
- गोगामेड़ी के सभा मंदिर के द्वार की ऊँचाई पर 'बिस्मिल्लाह' अंकित पत्थर लगा है, जहाँ हर वर्ष भाद्रपद कृष्णा नवमी (गोगा नवमी) को विशाल मेला भरता है।
- गोगाजी की सवारी 'नीली घोड़ी' थी, जिसका नाम जवाड़िया था, और इन्हें हाथ में भाला लिए योद्धा के रूप में या साँप देवता के रूप में पूजा जाता है, और इनके पुजारी चाहल जाति के होते हैं।
🐄तेजाजी
- लोकदेवता तेजाजी खड़नाल (मूँडवा, नागौर) के नागवंशीय जाट थे, जिनका जन्म माघ शुक्ला चतुर्दशी, वि.सं. 1130 (1073 ई.) को पिता ताहड़जी व माता रामकुँवरी के घर हुआ।
- इनका विवाह पनेर के रामचन्द्रजी (या रायमलजी) की पुत्री पेमलदे से हुआ, जो तेजाजी की मृत्यु के बाद सती हो गईं।
- परम गौरक्षक व गायों के मुक्तिदाता के रूप में पूज्य तेजाजी को 'काला व बाला देवता', 'धोलिया वीर' तथा शिव के अवतार के रूप में भी जाना जाता है।
- लांछा गूजरी की गायें मेरों से छुड़ाने के बाद वि.सं. 1160 (1103 ई.) की भाद्रपद शुक्ला दशमी को सुरसुरा (किशनगढ़, अजमेर) में सर्पदंश से इनका प्राणोत्सर्ग हुआ-यही स्थान इनका समाधि स्थल है; भारत में कहीं भी नया तेजाजी मंदिर बनने पर वहाँ की जागती जोत इसी सुरसुरा तीर्थ से ले जाई जाती है।
- इन्हें तलवार लिए सूर्य के साथ घोड़े पर सवार योद्धा के रूप में दिखाया जाता है, जिनकी जिह्ला को सर्प डस रहा है; इनके मुख्य थान अजमेर जिले के सुरसुरा, सेंदरिया व भावतां और ब्यावर जिले में हैं, जबकि इनके जन्म स्थान खड़नाल, नागौर में इनका मुख्य तीर्थ स्थल है।
- डीडवाना-कुचामन जिले के परबतसर कस्बे में भाद्रपद शुक्ला दशमी को इनका विशाल मेला भरता है, जहाँ का मंदिर जोधपुर के तत्कालीन महाराजा अभयसिंह जी ने बनवाया था।
- इनका चबूतरा 'थान' तथा पुजारी 'घोड़ला' कहलाता है; इनकी घोड़ी का नाम लीलण (सिणगारी) था।
🐪पाबूजी
- राठौड़ वंश के पाबूजी, राठौड़ों के मूल पुरुष राव सीहा के वंशज थे, जिनका जन्म 1239 ई. में फलौदी के निकट कोलूमण्ड में पिता धाँधलजी राठौड़ व माँ कमलादे के घर हुआ; कुछ मान्यताओं में इनका जन्म वर्तमान बाड़मेर से आठ कोस दूर जूना गाँव में अप्सरा के गर्भ से हुआ बताया गया है।
- इनका विवाह अमरकोट के राजा सूरजमल सोढ़ा की पुत्री सुप्यारदे से होना था, परन्तु फेरों के बीच से ही उठकर ये अपने बहनोई जीन्दराव खींची से चारण दंपती की गायें छुड़ाने चले गए और 1276 ई. में देचूँ गाँव (फलौदी) के युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए।
- मारवाड़ में सर्वप्रथम ऊँट लाने का श्रेय पाबूजी को ही जाता है, इसीलिए ऊँट पालने वाली राइका (रेबारी) जाति इन्हें अपना आराध्य देव मानती है।
- ये थोरी व भील जाति में अत्यंत लोकप्रिय हैं तथा मेहर जाति के मुसलमान इन्हें पीर मानकर पूजते हैं; ये प्लेग से रक्षा करने वाले व ऊँटों के देवता के रूप में भी प्रसिद्ध हैं।
- कोलूमण्ड (फलौदी) में इनका सबसे प्रमुख मंदिर है, जहाँ हर वर्ष चैत्र अमावस्या को मेला भरता है।
- इनकी गाथा 'पाबूजी के पवाड़े' नायक व रेबारी जाति द्वारा गाई जाती है; इनकी महिमा 'फड़' नामक चित्रकला के माध्यम से भी बताई जाती है, जिसे नायक जाति के भोपों द्वारा 'रावणहत्था' वाद्य के साथ बाँचा जाता है। ग्रामीण जनमानस में इन्हें लक्ष्मणजी का अवतार माना जाता है।
- गौ-रक्षक होने के साथ-साथ पाबूजी अछूतोद्धारक भी थे, और इन्हें अपने पाँच प्रमुख साथियों-चाँदोजी, सावंतजी, डेमाजी, हरमलजी राइका व सलजी सोलंकी-पर अटूट विश्वास था।
- इनकी पहचान केसर कालमी घोड़ी और बायीं ओर झुकी पाग से होती है; इनका बोध चिह्न हाथ में भाला लिए अश्वारोही है।
🙏मल्लीनाथ जी
- लोकदेवता के रूप में पूज्य मल्लीनाथजी का जन्म 1358 ई. में मारवाड़ के राव तीड़ाजी (सलखाजी) व जाणीदे के ज्येष्ठ पुत्र के रूप में हुआ।
- भविष्यद्रष्टा व चमत्कारी पुरुष मल्लीनाथजी ने विदेशी आक्रांताओं से जनसाधारण की रक्षा करने व जनता का मनोबल बढ़ाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई, और आगे चलकर 'कुंडा पंथ' के प्रणेता बने।
- मण्डोर पर राठौड़ शासन के संस्थापक राव चूँडा इनके भतीजे थे, जिन्हें मल्लीनाथजी ने मण्डोर (1394 ई.) व नागौर (1397 ई.) की विजय में सहायता दी।
- 1399 ई. में इन्होंने मारवाड़ के समस्त संतों को एकत्र कर एक वृहत् हरि-कीर्तन आयोजित करवाया, और उसी वर्ष इनका स्वर्गवास हो गया।
- लूनी नदी के तट पर तिलवाड़ा (बालोतरा) में इनका प्रसिद्ध मंदिर है, जहाँ हर वर्ष 15-दिवसीय तिलवाड़ा पशु मेला भरता है, जो बड़े पैमाने पर पशुओं के क्रय-विक्रय के लिए जाना जाता है।
- इनकी रानी रूपादे का अलग मंदिर तिलवाड़ा से कुछ दूर मालाजाल गाँव में स्थित है, और बाड़मेर का मालाणी क्षेत्र इन्हीं के नाम पर पड़ा है।
⚔️मेहाजी मांगलिया
- राजस्थान के जनजीवन में पूज्य 'पंच पीरों' में से एक मेहाजी मांगलिया हैं।
- पँवार क्षत्रिय परिवार में जन्मे मेहाजी का पालन-पोषण अपने ननिहाल में मांगलिया गोत्र में हुआ, इसी कारण इन्हें 'मेहाजी मांगलिया' कहा जाता है, और ये समस्त मांगलियों के इष्ट देव के रूप में पूजे जाते हैं।
- जैसलमेर के राव राणंगदेव भाटी से युद्ध करते हुए ये वीरगति को प्राप्त हुए; इनका प्रिय घोड़ा 'किरड़ काबरा' था।
- राठौड़ शासक राव चूँडा के समकालीन मेहाजी शकुनशास्त्र के भी अच्छे ज्ञाता थे।
- बापणी (फलौदी) में इनका मंदिर है, जहाँ भाद्रपद माह की कृष्णअष्टमी (जन्माष्टमी) को मेला भरता है, और मांगलिया राजपूत इसे मेहाजी की अष्टमी के रूप में मनाते हैं।
🗡️हड़बूजी
- हड़बूजी भूंडेल (नागौर) के साँखलावंशीय राजा मेहाजी साँखला के पुत्र थे और मारवाड़ के राव जोधा के समकालीन थे।
- अपने मौसेरे भाई, लोकदेवता रामदेवजी से प्रेरित होकर हड़बूजी ने अस्त्र-शस्त्र त्यागकर योगी बालीनाथ से दीक्षा ली और बाबा रामदेव के समाज सुधार के लक्ष्य के लिए आजीवन पूर्ण निष्ठा से कार्य किया।
- बेंगटी (फलौदी) में इनका मुख्य पूजा स्थल है, जहाँ इनके पुजारी साँखला राजपूत होते हैं; श्रद्धालुओं की मनौती या कार्य सिद्ध होने पर यहाँ स्थापित मंदिर में 'हड़बू जी की गाड़ी' की पूजा की जाती है।
- शकुनशास्त्र के भी अच्छे जानकार व भविष्यद्रष्टा हड़बूजी 'मारवाड़ के पंच पीरों' में गिने जाते हैं; इनके आशीर्वाद व इनके द्वारा भेंट की गई कटार के माहात्म्य से जोधपुर के संस्थापक राव जोधा ने मण्डोर दुर्ग पर पुनः अधिकार कर उसे मेवाड़ के आधिपत्य से मुक्त कराया, और बदले में जोधा ने इन्हें बेंगटी गाँव प्रदान किया।
🔱देवनारायण जी
- देवनारायण जी का जन्म लगभग 1243 ई. में आसीन्द (भीलवाड़ा) में बगड़ावत कुल के नागवंशीय गुर्जर परिवार में हुआ; इनका जन्म नाम उदयसिंह था।
- इनके जन्म से पूर्व ही पिता सवाईभोज अपने 23 भाइयों सहित भिनाय शासक से संघर्ष में मारे गए थे, और माता सेढू ने इनका पालन-पोषण किया; बड़े होकर इनका विवाह धार नरेश जयसिंह देव की पुत्री पीपलदे से हुआ, और इनका घोड़ा 'लीलागर' कहलाता था।
- बड़े होने पर देवनारायण ने भिनाय ठाकुर को मारकर पिता का बदला लिया, उससे गायें छुड़ाईं और अपने पैतृक गाँव को पुनः बसाया।
- देवनारायणजी को भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है; इन्होंने देवमाली (ब्यावर) में देह त्यागी, जिसे बगड़ावतों का गाँव भी कहते हैं।
- इनका मूल 'देवरा' आसींद के निकट गोठां दड़ावत में है, जबकि अन्य प्रमुख देवरे देवमाली (ब्यावर), देवधाम जोधपुरिया (निवाई, टोंक) व देव डूँगरी पहाड़ी (चित्तौड़गढ़) में हैं; इनके देवरों में मूर्ति के स्थान पर बड़ी ईंटों की पूजा की जाती है-इनके प्रमुख अनुयायी गुर्जर जाति के हैं।
- गूजर भोपों द्वारा 'जंतर वाद्य' की संगत में गाई जाने वाली 'देवजी की फड़' राजस्थान की सबसे बड़ी व सर्वाधिक लोकप्रिय फड़ है-इसमें 335 गीत, लगभग 1200 पृष्ठ व करीब 15,000 पंक्तियाँ हैं।
- इनका मेला भाद्रपद शुक्ला सप्तमी को भरता है, और ये औषधिशास्त्र के भी ज्ञाता थे तथा इन्होंने गोबर व नीम को औषधि के रूप में प्रयोग करने के महत्त्व का प्रचार किया।
- 3 सितम्बर, 2011 को केन्द्र सरकार के संचार मंत्रालय ने इन पर 5 रुपये का डाक टिकट जारी किया-ऐसा सम्मान पाने वाले ये प्रथम लोकदेवता हैं।
🐲कल्ला जी
- वीर कल्ला राठौड़ का जन्म मारवाड़ के सामियाना गाँव में वि.सं. 1601 (1544 ई.) को राव अचलाजी के घर हुआ; भक्त शिरोमणि मीरा इनकी चचेरी बहन थीं और प्रसिद्ध योगी भैरवनाथ इनके गुरु थे।
- मेवाड़ के शासक उदयसिंह के समकालीन कल्लाजी 1567 ई. में चित्तौड़ के तीसरे साके में महाराणा उदयसिंह की ओर से अकबर के विरुद्ध लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए।
- इन्होंने घायल वीर जयमल को अपने कंधे पर बिठाकर युद्ध किया, और दोनों ही युद्ध करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए; युद्धभूमि में चतुर्भुज-सी दिखाई गई वीरता के कारण इन्हें 'चार हाथ वाले लोकदेवता' की ख्याति मिली।
- ऐसी मान्यता है कि सिर कटने के बाद भी इनका धड़ मुगलों से लड़ते हुए रुण्डेला तक जा पहुँचा था; चित्तौड़गढ़ दुर्ग की भैरव पोल पर इनकी एक छतरी बनी हुई है।
- वीर कल्लाजी की पूजा प्रायः नाग के रूप में की जाती है, और इन्हें शेषनाग का अवतार भी कहा जाता है। गुजरात में ये 'भाथी खत्री' तथा मालवा में 'जुझारू वीर नायक' के नाम से जाने जाते हैं, और 'रनेला' इनका सिद्ध पीठ है।
🩹तल्लीनाथ जी
- जालौर जिले के अत्यंत प्रसिद्ध लोकदेवता तल्लीनाथजी का जन्म जोधपुर में गांगदेव राठौड़ के नाम से हुआ; ये शेरगढ़ (मारवाड़) ठिकाने के शासक रहे और इनके गुरु जालन्धर नाथ थे।
- गाँव में किसी व्यक्ति या पशु के बीमार पड़ने या जहरीले कीड़े के काटने पर इनके नाम का डोरा बाँधा जाता है।
- आहोर (जालौर) के पाँचोटा गाँव के निकट पंचमुखी पहाड़ी के बीच घोड़े पर सवार बाबा तल्लीनाथ की मूर्ति स्थापित है।
🙏
लोक देवियाँ
Folk Goddesses
शक्ति, करुणा और रक्षा की प्रतीक ये देवियाँ राजस्थान के हर कुल और समुदाय की आस्था का केंद्र हैं।
🐀करणी माता
- करणी माता को बीकानेर के राठौड़ शासकों की आराध्य देवी और राजपरिवार तथा चारण जाति की कुल देवी माना जाता है। उनका जन्म सन् 1387 में फलौदी के सुआप गाँव में चारण परिवार के मेहाजी-देवलबाई के घर हुआ था, और बचपन में उनका नाम रिद्धिबाई रखा गया था।
- देशनोक में उनका मूल मंदिर राव बीका ने बनवाया था, और यह मान्यता है कि करणीजी ने स्वयं देशनोक कस्बे को बसाया। बीकानेर जिले की नोखा तहसील में स्थित यह मंदिर हजारों चूहों के कारण 'चूहों का मंदिर' के नाम से प्रसिद्ध है, जहाँ सफेद चूहे को 'काबा' कहकर उसका दर्शन साक्षात करणीजी के दर्शन के समान माना जाता है; मंदिर को 'मठ' भी कहा जाता है।
- मंदिर में सावन-भादों नाम की दो विशाल कड़ाइयाँ रखी हैं। करणीजी की इष्ट देवी 'तेमड़ाताई जी' थीं और मंदिर के निकट तेमड़ा राय देवी का भी एक मंदिर है, जबकि यह भी माना जाता है कि करणी देवी 'सफेद चील' के रूप में भी प्रकट होती हैं।
- मंदिर से कुछ दूरी पर 'नेहड़ी' नामक दर्शनीय स्थल है, जहाँ करणी देवी सबसे पहले रही थीं; वहाँ स्थित एक शमी (खेजड़ी) के वृक्ष पर वे रस्सी बाँधकर दही बिलोया करती थीं, और आज भी भक्त उस वृक्ष की छाल नाखूनों से उतारकर साथ ले जाते हैं, जिसे चाँदी जितना पवित्र माना जाता है।
- मठ के पुजारी परंपरागत रूप से चारण जाति से आते हैं, और उनकी स्तुति में रचे गीत 'चारण चरजा' कहलाते हैं। ऐसी मान्यता है कि करणीजी के ही आशीर्वाद से राठौड़ शासक राव बीका बीकानेर क्षेत्र में अपने वंश का शासन स्थापित कर सके।
🐝जीण माता
- जीण माता को चौहान वंश की इष्ट व कुल देवी माना जाता है; शेखावाटी क्षेत्र की यह लोकदेवी 'मधुमक्खियों की देवी' के नाम से भी जानी जाती हैं और धंध राय की पुत्री तथा हर्ष की बहन थीं।
- उनका मंदिर 1121 ई. में पृथ्वीराज चौहान-प्रथम के शासनकाल में मोहिल राजा हठ्ठड़ द्वारा बनवाया गया था, जिसमें देवी की अष्टभुजी प्रतिमा स्थापित है; यह एक तांत्रिक शक्तिपीठ माना जाता है। मंदिर सीकर शहर के निकट रैवासा गाँव की आडावाला पहाड़ियों के बीच स्थित है, और इसका सभा मंडप संगमरमर के 24 खंभों पर टिका है।
- कुष्ठ रोग से मुक्ति की कामना से औरंगजेब ने यहाँ स्वर्ण छत्र भेंट किया था, और मंदिर में जलने वाली अखंड ज्योति से 'काजल शिखर' पर काजल तैयार किया जाता है। पास ही हर्ष की पहाड़ियों पर उनके भाई हर्ष का मंदिर भी है, और पहाड़ के समतल हिस्से पर 'जोगी तालाब' स्थित है।
- जीण माता का उल्लेख भागवत पुराण के नवें स्कंध में भी मिलता है। उनके मंदिर में वर्ष में दो बार, चैत्र और आश्विन माह की शुक्ला नवमी को मेला भरता है, और उनसे जुड़ा गीत राजस्थानी लोक साहित्य का सबसे लंबा गीत है, जिसे कनफटे जोगी डमरू और सारंगी की संगत में गाते हैं।
- अष्टभुजी जीण माता को दुर्गा का अवतार माना जाता है; वे पुराणों में वर्णित जयंती देवी हैं और उन्हें भ्रामरी देवी (भूरी की राणी) के नाम से भी पुकारा जाता है। मंदिर के निकट ही जगदेव पँवार का पीतल से बना छिन्न मस्तक एक गुफा में प्रतिष्ठापित है।
👑कैला देवी
- कैला देवी करौली के यदुवंशी (यादव वंश) शासकों की कुल देवी हैं, और इस क्षेत्र की मीणा जनजाति व गुर्जर जाति के लोगों की भी वे इष्ट देवी मानी जाती हैं। उनका मंदिर करौली के निकट त्रिकूट पर्वत की घाटी में कालीसिल नदी के किनारे स्थित है और सन् 1100 में स्थापित हुआ था; कैला देवी को महालक्ष्मी का अवतार माना जाता है।
- करौली के महाराजा गोपालसिंह ने मंदिर का नया भवन बनवाया, जिसके सामने प्रांगण में हनुमानजी, गणेशजी और भैरवजी की मूर्तियाँ स्थापित हैं, जिन्हें स्थानीय ब्रजभाषा में 'लाँगुरिया' कहा जाता है।
- इस मंदिर की एक विशेषता 'कनक दण्डवत' है, और भक्तगण अलगोजे की धुन पर प्रसिद्ध 'लाँगुरिया गीत' गाकर देवी की आराधना करते हैं। चैत्र नवरात्र में चैत्र शुक्ला अष्टमी को यहाँ विशाल लक्खी मेला भरता है, और मंदिर के सामने 'बोहरा की छतरी' स्थित है।
⚔️शिला देवी
- शिलादेवी की यह अष्टभुजी काली पाषाण प्रतिमा मूलतः दुर्गा की है, जिसे 16वीं सदी के अंत में आमेर के महाराजा मानसिंह-प्रथम पूर्वी बंगाल के राजा केदार (जो जैसोर के राजा प्रतापादित्य के सामंत थे) से लेकर आए थे और राजमहल के निकट संरक्षक देवी के रूप में स्थापित किया। यहाँ शिलादेवी महिषासुर मर्दिनी के रूप में विराजमान हैं, और उनके बाईं ओर अष्टधातु से बनी हिंगलाज माता की खड़ी प्रतिमा भी प्रतिष्ठित है।
- शिलादेवी जयपुर के कछवाहा राजवंश की आराध्य देवी मानी जाती हैं (हुकुमचंद जैन के अनुसार वे आमेर के कछवाहा वंश की कुल देवी हैं), और उनका मंदिर आमेर किले के राजमहलों में मोहनबाड़ी के कोने पर स्थित है।
🐄जमुवाय माता
- युद्ध में विजय पाने के बाद कछवाहा शासक दूलहराय ने अपनी कुलदेवी जमुवाय माता का मंदिर बनवाया; यह ढूँढाड़ के कछवाहा राजवंश की कुल देवी हैं और उनका मंदिर जमुवारामगढ़ (जयपुर) में स्थित है। जमुवाय माता का प्राचीन नाम जामवन्ती था, और यहाँ उनकी मूर्ति गाय व बछड़े के साथ प्रतिष्ठित है।
🔥आईजी माता
- आईजी माता को नवदुर्गा/अम्बे माता (मानी देवी) का अवतार माना जाता है, और वे सीरवी जाति के क्षत्रियों की कुल देवी हैं; उनका अवतरण गुजरात के अम्बापुर में हुआ था और उनका थान 'बडेर' कहलाता है।
- उनके थान पर विगत 550 वर्षों से अखंड ज्योति जल रही है, जिससे निरंतर केसर टपकता रहता है; जोधपुर के बिलाड़ा में स्थित उनका भव्य मंदिर इसी कारण 'केसर ज्योति मंदिर' कहलाता है, और यहाँ माता की एकमात्र तस्वीर गद्दी पर विराजमान अवस्था में सुशोभित है।
🙏राणी सती
- अग्रवाल जाति में जन्मीं राणी सती का वास्तविक नाम नारायणी बाई था। उनका विवाह तनधन दास से हुआ था, परन्तु उनकी मृत्यु के बाद नारायणी सती हो गईं, और तभी से वे राणी सती के नाम से पूजी जाने लगीं।
- राणी सती के मंदिर में प्रतिवर्ष भाद्रपद कृष्णा अमावस्या को मेला भरता है, और उन्हें श्रद्धा से 'दादी जी' भी कहा जाता है।
🫏शीतला माता
- चेचक की देवी के रूप में विख्यात शीतला माता को सैढल माता और महामाई के नाम से भी पुकारा जाता है। चाकसू की शील की डूँगरी पर बना इनका मंदिर मूलतः पुराना था, जिसका जीर्णोद्धार जयपुर के महाराजा माधोसिंहजी द्वितीय ने करवाया।
- होली बीतने के बाद चैत्र कृष्ण अष्टमी, जिसे शीतलाष्टमी कहा जाता है, के दिन इनकी वार्षिक पूजा होती है और चाकसू के मंदिर में विशाल मेला भरता है। इस दिन भक्त 'बास्योड़ा' मनाते हुए एक रात पहले बनाया गया ठण्डा भोजन ग्रहण करते हैं।
- गधा इनकी सवारी है, और ये बच्चों की रक्षक देवी मानी जाती हैं, जिस कारण संतानहीन स्त्रियाँ भी संतान-प्राप्ति की कामना लेकर इनकी पूजा करती हैं।
- अक्सर जांटी यानी खेजड़ी के पेड़ को ही शीतला का साक्षात् रूप मानकर पूजा जाता है। देवी की प्रतिमा खंडित (टूटी हुई) रूप में पूजी जाती है, और इनकी पूजा-अर्चना का दायित्व कुम्हार जाति के पुजारियों के पास होता है।
- उत्तर भारत में इन्हें महामाई या मातामाई और पश्चिमी भारत में माई अनामा के नाम से भी जाना जाता है, तथा इनकी आराधना 'चेचक निवारक देवी' के रूप में भी की जाती है।
- इनका एक और मंदिर जोधपुर के कागा क्षेत्र में है, जबकि शुरुआत में इनका मंदिर मेहरानगढ़ दुर्ग के भीतर ही स्थित था।
🌿शीतला माता
- होली के बाद चैत्र कृष्ण अष्टमी यानी शीतलाष्टमी को शीतला माता की वार्षिक पूजा होती है, जब चाकसू के मंदिर में बड़ा मेला लगता है; इस दिन लोग बास्योड़ा मनाकर रातभर पहले बना ठण्डा भोजन खाते हैं।
- गधे पर सवार होने वाली यह देवी बच्चों की संरक्षिका मानी जाती हैं, इसलिए संतान की चाह रखने वाली निःसंतान स्त्रियाँ भी इनकी पूजा करती हैं।
- जांटी यानी खेजड़ी के वृक्ष को अक्सर शीतला का ही रूप मानकर पूजा जाता है; इनकी प्रतिमा खंडित अवस्था में पूजी जाती है और इनके पुजारी कुम्हार जाति से आते हैं।
- उत्तर भारत में इन्हें महामाई (मातामाई) और पश्चिम भारत में माई अनामा भी पुकारा जाता है।
- जोधपुर के कागा क्षेत्र में इनका एक मंदिर है, जबकि आरंभ में इनका मंदिर मेहरानगढ़ दुर्ग के भीतर स्थित था।
- शीतला माता की आराधना 'चेचक निवारक देवी' के रूप में भी की जाती है।
🐦आवड़ माता
- जैसलमेर के भाटी राजवंश की कुलदेवी आवड़ माता का मंदिर जैसलमेर के तेमड़ी भाखर पर्वत पर स्थित है, और सुगनचिड़ी (एक शुभ पक्षी) को इनका ही स्वरूप माना जाता है।
- भक्त इन्हें हिंगलाज माता का अवतार मानते हैं; इनका जन्म चारण कुल में मामड़जी के घर हुआ था, और इन्हें तेमड़ाताई के नाम से भी पुकारा जाता है।
🛡️स्वांगिया माता
- आवड़ देवी का ही एक स्वरूप स्वांगिया माता, जिन्हें आईनाथजी भी कहा जाता है, जैसलमेर के निकट विराजमान हैं और जैसलमेर के भाटी राजाओं की कुलदेवी मानी जाती हैं।
- जैसलमेर के राजचिह्न में देवी को हाथ में मुड़ा हुआ स्वांग (भाला) थामे दिखाया गया है, और चिह्न के सबसे ऊपर पालम चिड़िया यानी सुगनचिड़ी इस देवी की प्रतीक के रूप में अंकित है।
🏛️अम्बिका माता
- अम्बिका माता का मंदिर सलूम्बर के निकट जगत नामक गाँव में स्थित है, इसी कारण इसे जगत मंदिर भी कहा जाता है, और इसे एक शक्तिपीठ माना जाता है। अपनी बेजोड़ मूर्तिकला के चलते यह जगत-अम्बिका मंदिर 'मेवाड़ का खजुराहो' कहलाता है।
- यह मंदिर राजा अल्लट के शासनकाल में दसवीं शताब्दी के पूर्वार्ध में महामारू शैली में बनवाया गया था और मातृदेवियों को समर्पित है। यहाँ नृत्य करते हुए गणपति की एक विशाल प्रतिमा भी स्थापित है।
🚶पथवारी माता
- राजस्थान में पथवारी माता को तीर्थयात्रा की सफल पूर्ति की कामना लेकर एक लोक देवी के रूप में पूजा जाता है।
⚔️सुगाली माता
- आउवा के ठाकुर परिवार (चंपावतों) की कुलदेवी सुगाली माता पूरे मारवाड़ क्षेत्र की जनता की आराध्य रही हैं; उनकी प्रतिमा की विशेषता यह है कि इसमें दस सिर और चौपन भुजाएँ हैं।
- 1857 ई. के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में आउवा के ठाकुर कुशाल सिंह चंपावत का योगदान अविस्मरणीय रहा, और सुगाली माता का यही स्थान उनके इस विद्रोह का मुख्य केंद्र बना।
🛕नकटी माता
- जयपुर के जय भवानीपुरा में स्थित नकटी माता का मंदिर प्रतिहारकालीन है।
🎪ब्राह्मणी माता
- बाराँ जिले के अन्ता कस्बे के निकट सोरसन गाँव के पास ब्राह्मणी माता का एक विशाल प्राचीन मंदिर है, जहाँ अनूठी परंपरा के तहत देवी की पीठ का ही शृंगार और पूजा-अर्चना होती है, और भक्तगण भी देवी की पीठ के ही दर्शन करने आते हैं।
- यहाँ प्रतिवर्ष माघ शुक्ला सप्तमी को गधों का एक विशेष मेला भी आयोजित होता है।
🙏जिलानी माता
- कोटपूतली-बहरोड़ जिले की बहरोड़ तहसील में स्थित जिलाणी माता का मंदिर काफी प्रसिद्ध है; यह अलवर और कोटपूतली-बहरोड़ क्षेत्र की लोकदेवी मानी जाती हैं, और उनके मंदिर में हर वर्ष दो बार मेला भरता है।
🏔️कैवायमाता
- किणसरिया गाँव, परबतसर (डीडवाना-कुचामन) में लगभग 1000 फुट ऊँची एक पहाड़ी की चोटी पर कैवायमाता का प्राचीन मंदिर बना हुआ है, जो भवानी (अम्बिका) माता को समर्पित है।
- मंदिर के सभामण्डप की दीवार पर उत्कीर्ण विक्रम संवत 1056 (सन् 999) के एक शिलालेख से पता चलता है कि सांभर के चौहान शासक दुर्लभराज के सामन्त चच्चदेव (दधीचिक/दहिया वंश) ने अक्षय तृतीया (बैसाख सुदी 3), वि.सं. 1056 के दिन इस मंदिर का निर्माण करवाया था।
- कैवायमाता दहिया राजवंश की कुल देवी मानी जाती हैं।
🌿शाकम्भरी देवी
- शाकम्भरी देवी का मंदिर सांभर (जयपुर) में स्थित है, और वे चौहान वंश की कुलदेवी मानी जाती हैं।
- चौहानों का आरंभिक राज्य भी सांभर के आसपास के इसी क्षेत्र में था, जिसे उस समय 'सपादलक्ष' कहा जाता था।
🦁आशापुरा माता
- आशापुरा माता — जिन्हें महिषासुर मर्दिनी, मोदरां माता या महोदरी माता के नामों से भी जाना जाता है — का मंदिर जालौर के मोदरां स्थान पर स्थित है।
- वे जालौर के सोनगरा चौहान शासकों की कुलदेवी मानी जाती हैं।
🐦आवड़ माता
- आवड़ माता जैसलमेर के भाटी राजवंश की कुलदेवी हैं, और उनका मंदिर जैसलमेर के तेमड़ी भाखर पर्वत पर स्थित है — इसी कारण उन्हें तेमड़ाताई भी कहा जाता है।
- उनका जन्म चारण कुल में मामड़जी के घर हुआ था, और भक्तजन उन्हें हिंगलाज माता का अवतार मानते हैं।
- सुगनचिड़ी नामक पक्षी को आवड़ माता का साक्षात स्वरूप माना जाता है।
🙏नागणेची माता
- राव धूहड़ के शासनकाल में लूम्ब नामक एक ब्राह्मण कन्नौज से चक्रेश्वरी देवी की मूर्ति मारवाड़ लाया, जिसे राव धूहड़ ने नगाणा गाँव (बालोतरा) में स्थापित करवाया — यही देवी आगे चलकर नागणेची माता के नाम से पूजी जाने लगीं।
- बाद में राव जोधा ने जोधपुर के मेहरानगढ़ दुर्ग में नागणेची माता की अठारह भुजाओं वाली प्रतिमा स्थापित करवाई।
- नागणेची जोधपुर के राठौड़ वंश की कुलदेवी मानी जाती हैं।
🛕नकटी माता
- जयपुर के जय भवानीपुरा में नकटी माता का एक प्रतिहारकालीन मंदिर स्थित है।
🦉सकराय माता
- सीकर के नीम का थाना क्षेत्र में, लोहार्गल तीर्थ के परिक्रमापथ पर उदयपुर वाटी के निकट बसे सकराय गाँव में, मलयकेतु पर्वत पर सकराय माता का मंदिर स्थित है — जिन्हें शाकम्भरी देवी भी कहा जाता है, यही नाम सांभर स्थित उनके एक अन्य मंदिर से भी जुड़ा है।
- उनकी प्रतिमा के पास उल्लू की मूर्ति रखी है, और वे खंडेलवाल समाज की कुलदेवी मानी जाती हैं; पुराणों में इन्हें शताक्षी एवं दुर्गा भी कहा गया है।
- चैत्र और आश्विन माह के नवरात्रों के दौरान देवी के मंदिर में विशाल मेला भरता है।
⚔️सच्चिका माता
- सच्चिका माता (सचिया माता) का प्रसिद्ध मंदिर ओसियाँ, जोधपुर में स्थित है, जिसे संभवतः परमार राजकुमार उपलदेव ने बनवाया था।
- मंदिर में देवी की काले पत्थर से बनी महिषासुर मर्दिनी की प्रतिमा विराजमान है, और सचिया माता को ओसवाल समाज की कुलदेवी माना जाता है।
💧सुंधा माता
- जालौर जिले के भीनमाल स्थित जसवंतगढ़ कस्बे के पास दाँतलावास गाँव में, सुंडा (सुगंधाद्रि) पर्वत पर सुंधा माता का प्रसिद्ध मंदिर है — एक प्राचीन तांत्रिक शक्तिपीठ, जो पौराणिक काल से ही पुण्यस्थली माना जाता रहा है। इन्हें चामुण्डा देवी और सूंघा माता के नाम से भी पुकारा जाता है।
- मंदिर तक जाने के मार्ग में पहले काडियादरा नामक जलकुण्ड और महात्मा राबड़नाथ का धूणा मिलता है, फिर पाटलियों की पाँज आती है जहाँ लगभग 40 फीट ऊँचाई से एक झरना गिरता है, और अंत में नागिनी तीर्थ स्थित है।
- मंदिर के अग्रभाग में भूरेश्वर महादेव का शिवलिंग स्थित है, जबकि देवी सुंधा की प्रतिमा पहली गुफा में विराजमान है; यहाँ केवल देवी के सिर की ही पूजा होती है, और मूर्ति में धड़ न होने के कारण उन्हें अथरेश्वरी माता भी कहा जाता है।
- बैसाख और भाद्रपद माह में शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी से पूर्णिमा तक यहाँ विशाल मेले लगते हैं।
💠त्रिपुरा सुंदरी माता
- वागड़ प्रदेश में बाँसवाड़ा शहर के निकट तलवाड़ा गाँव से 5 किमी दूर उमराई गाँव के पास माँ त्रिपुरा सुंदरी का प्रसिद्ध मंदिर स्थित है, जिन्हें तुरताई माता भी कहा जाता है। वे गुजरात के सोलंकी राजा सिद्धराज जयसिंह की इष्टदेवी थीं, और 12वीं शताब्दी के प्रारंभ में चाँदा भाई (उर्फ पाता लुहार) ने इस मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था।
- मंदिर के गर्भगृह में देवी (काली माँ) की अठारह भुजाओं वाली आकर्षक काले पत्थर की प्रतिमा विराजमान है, जिसके निचले भाग में श्रीयंत्र उत्कीर्ण है; मंदिर के उत्तरी भाग में सम्राट कनिष्क के समय का एक शिवलिंग है, जिससे कहा जाता है कि यह स्थान कनिष्क से भी पहले से प्रतिष्ठित रहा है।
- पंचाल समाज माँ त्रिपुरा को अपनी कुलदेवी मानकर उपासना करता है और उसने 2006 में यहाँ एक स्वर्ण कीर्ति स्तंभ बनवाया; चैत्र व आश्विन के नवरात्रों में यहाँ बड़ा मेला भरता है।
🛕दधिमति माता
- नागौर जिले में रोलगाँव के पास बसे गोठ और मांगलोद नामक दो छोटे गाँवों की साझी सीमा पर माता दधिमति का प्रसिद्ध मंदिर खड़ा है, और यह पूरा क्षेत्र 'कपालपीठ' के नाम से भी जाना जाता है।
- देवी की प्रतिमा के ठीक सामने संवत् 289 (धुलाना गुप्त काल) का एक शिलालेख है, जो देवी सरस्वती की प्रार्थना से शुरू होकर एक दाहिमा ब्राह्मण द्वारा रचित दधिमति माता की वन्दना में आगे बढ़ता है; मंदिर का निर्माण अविच्छिनाग नामक दायमा ब्राह्मण के संरक्षण में हुआ था।
- दाहिमा, दायमा और दाधीच ब्राह्मणों की कुलदेवी मानी जाने वालीं दधिमति माता के दर्शन के लिए चैत्र और आश्विन नवरात्रों में तथा नागौर में लगने वाले विशेष मेले के अवसर पर भारी भीड़ उमड़ती है, और श्रद्धालु पूजा-वंदना से पहले निकटस्थ कपालकुण्ड में स्नान करते हैं।
🏔️वीरातरा माता
- बाड़मेर जिले के चौहटन के निकट पहाड़ी क्षेत्र के बीच माता वीरातरा का भव्य मंदिर है, जिन्हें भोपों की कुलदेवी माना जाता है।
- वर्ष में तीन बार — चैत्र, भाद्रपद और माघ माह की शुक्ल पक्ष चतुर्दशी को — यहाँ मेले भरते हैं, जिनमें दूर-दूर से श्रद्धालु उमड़ते हैं।
🪨अर्बुदा देवी
- माउंट आबू कस्बे के उत्तर में लगभग 4200 फीट ऊँची पहाड़ी पर अर्बुदांचल क्षेत्र की अधिष्ठात्री देवी अर्बुदा देवी का भव्य मंदिर है, जिसे इसी दुर्गम चढ़ाई के कारण 'राजस्थान की वैष्णो देवी' भी कहा जाता है।
- मंदिर एक विशाल शिला के नीचे स्थित होने के कारण यहाँ पहुँचने के लिए एक सँकरे मार्ग से झुककर जाना पड़ता है, और दूर से देखने पर देवी की मूर्ति मानो भूमि को छूती ही नहीं दिखती — इसीलिए उन्हें 'अथर देवी' भी कहा जाता है।
- अर्बुदा देवी को परमार शासकों की कुलदेवी के रूप में पूजा जाता है, और हर वर्ष चैत्र पूर्णिमा तथा आश्विन पूर्णिमा को उनके सम्मान में विशाल मेले लगते हैं।
🤧छींक माता
- जयपुर में गोपालजी के रास्ते पर छींक माता का मंदिर स्थित है, जिनकी पूजा राज्यभर में माघ सुदी सप्तमी को की जाती है।
⚔️भद्रकाली माता
- हनुमानगढ़ टाउन से 5 किमी दूर स्थित इस मंदिर में माँ दुर्गा की भव्य प्रतिमा भद्रकाली रूप में विराजमान है, और यहाँ हर वर्ष चैत्र व आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की नवरात्रों में भव्य मेला लगता है।
🏞️विंध्यवासिनी देवी
- उदयपुर जिले में एकलिंगजी मंदिर के निकट विंध्यवासिनी देवी का प्राचीन मंदिर स्थित है, जिनकी स्थापना अरावली की इस घाटी में योगीराज हारीत ऋषि ने की थी, ऐसा माना जाता है।
- पास की पहाड़ी पर उन्हीं ऋषि के नाम पर हारीत गुफा भी स्थित है।
👑दाँतमाता (द्रष्टामाता)
- कोटा शहर के निकट दाँतमाता का प्रसिद्ध मंदिर है, जिन्हें यहाँ द्रष्टामाता या श्रीद्रष्टा मोर डेरू माता के नाम से भी जाना जाता है और जो कभी कोटा राजपरिवार की कुलदेवी मानी जाती थीं।
🔥चौथमाता
- सवाईमाधोपुर जिले में चौथ का बरवाड़ा कस्बे के निकट एक ऊँची पहाड़ी पर चौथमाता का प्रसिद्ध मंदिर है, जिसके ठीक पास एक अखण्ड ज्योति निरंतर जलती रहती है।
- मंदिर के पीछे गोरे और काले भैरव की प्रतिमाएँ स्थापित हैं, जो मानो देवी की रखवाली करती हैं।
📿गायत्री माता
- पुष्कर (अजमेर) में सावित्री मंदिर के ठीक सामने एक सुरम्य पहाड़ी पर माता गायत्री का प्राचीन मंदिर स्थित है, जिसे भगवती के इक्यावन शक्तिपीठों में गिना जाता है।
- यहाँ देवी के मणिबंधों (कलाइयों) की पूजा की जाती है, और उन्हें 'शापविमोचनी देवी' के रूप में पूजा जाता है, जो अपने भक्तों को शाप से मुक्ति दिलाती हैं।
🌸सावित्री माता मंदिर
- पुष्कर के दक्षिणी भाग में रत्नागिरि पहाड़ी पर माता सावित्री (प्रजापिता ब्रह्मा की प्रथम पत्नी) का पौराणिक मंदिर स्थित है, जहाँ प्रतिवर्ष भाद्रपद शुक्ला अष्टमी को विशाल मेला लगता है।