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राजस्थान GK

राजस्थान का एकीकरण

Integration of Rajasthan

19 बिखरी रियासतों से एक संयुक्त राजस्थान तक — उन सात ऐतिहासिक चरणों, अपना सिंहासन त्यागने वाले शासकों, और राज्य की अंतिम सीमाएँ तय करने वाली राजनीतिक खींचतान की कहानी।

19 टॉपिक21 फ्लैशकार्ड15 MCQ
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पृष्ठभूमि: साम्राज्य से संघ तक

Background: From Empire to Union

राजस्थान के मानचित्र पर अपना परिचित रूप पाने से पहले, देशी रियासतों की दुनिया को टुकड़ा-टुकड़ा तोड़कर फिर से गढ़ना पड़ा — यह प्रक्रिया ब्रिटिश आधिपत्य समाप्त होते ही शुरू हो गई थी।

🏛️ब्रिटिश वापसी व रियासती विभाग

  • जुलाई 1945 में ब्रिटेन में विंस्टन चर्चिल की कंज़र्वेटिव सरकार की जगह क्लीमेंट एटली की लेबर सरकार आने से सत्ता-हस्तांतरण की गति तेज़ हुई, और फरवरी 1947 में ब्रिटिश संसद ने घोषणा की कि जून 1948 तक भारत को स्वतंत्रता दे दी जाएगी।
  • वायसराय पद पर लॉर्ड वेवेल के स्थान पर लॉर्ड माउंटबेटन आए, जिन्होंने 3 जून 1947 को विभाजन-योजना घोषित की, और इसके अगले दिन 4 जून की प्रेस वार्ता में सत्ता-हस्तांतरण की आगे बढ़ाई गई तारीख — 15 अगस्त 1947 — की घोषणा की।
  • भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 की धारा 7 ने रियासतों पर ब्रिटिश आधिपत्य पूरी तरह समाप्त कर दिया और हर शासक के सामने तीन विकल्प रख दिए — भारत में विलय, पाकिस्तान में विलय, या स्वतंत्र अस्तित्व का प्रयास।
  • इस संक्रमण को संभालने के लिए 5 जुलाई 1947 को सरदार वल्लभभाई पटेल के नेतृत्व में रियासती विभाग बनाया गया, जिसके सचिव वी.पी. मेनन बने; विलय करने वाली हर रियासत को केवल रक्षा, संचार व विदेशी मामले संघ को सौंपने थे, बाकी आंतरिक प्रशासन में वह स्वतंत्र रहती थी।

🗂️'ए', 'बी' व 'सी' श्रेणी के राज्य

  • स्वतंत्र भारत ने शुरू में अपनी इकाइयों को तीन श्रेणियों में बाँटा — 'ए' श्रेणी में बिहार, बम्बई व मद्रास जैसे प्रत्यक्ष ब्रिटिश-शासित प्रांत थे जिनके प्रमुख राज्यपाल होते थे, 'बी' श्रेणी में राजस्थान व मध्य भारत जैसे रियासतों के विलय से बने राज्य थे जिनके प्रमुख राजप्रमुख कहलाते थे, और 'सी' श्रेणी में अजमेर व दिल्ली जैसे छोटे पूर्व चीफ कमिश्नर प्रांत आते थे।
  • यह व्यवस्था स्थायी नहीं रही — संविधान के सातवें संशोधन (1956) ने 'ए' व 'बी' श्रेणी का भेद ही मिटा दिया, हर राजप्रमुख की जगह राज्यपाल का पद बना दिया, और भारत में अब केवल दो ही तरह के क्षेत्र रह गए — 'राज्य' और 'केंद्रशासित प्रदेश'।

🗺️राजस्थान की 19 रियासतें, 3 चीफशिप व अजमेर-मेरवाड़ा

  • 16 दिसंबर 1947 को भारत सरकार ने तय किया कि सुचारु शासन के लिए छोटी रियासतों को बड़ी पड़ोसी रियासतों में मिला दिया जाए; केवल वही रियासत पृथक रह सकती थी जिसकी वार्षिक आय कम-से-कम 1 करोड़ रुपए और जनसंख्या 10 लाख हो — यह शर्त केवल जयपुर, बीकानेर, उदयपुर व जोधपुर ही पूरी करते थे।
  • स्वतंत्रता के समय इस क्षेत्र में 19 देशी रियासतें थीं — अलवर, भरतपुर, करौली, धौलपुर, उदयपुर, बाँसवाड़ा, डूँगरपुर, प्रतापगढ़, शाहपुरा, कोटा, बूँदी, झालावाड़, किशनगढ़, टोंक, जोधपुर, जयपुर, बीकानेर, जैसलमेर व सिरोही — साथ ही तीन छोटी नॉन-सैल्यूट चीफशिप (कुशलगढ़, लावा, नीमराणा) और अलग से चीफ कमिश्नर द्वारा प्रशासित 'अजमेर-मेरवाड़ा' प्रदेश।
  • इन सबको एक राज्य में पिरोना कोई रातों-रात हुआ काम नहीं था — यह एकीकरण सात अलग-अलग चरणों में, कुल 8 वर्ष, 7 माह व 14 दिन (3150 दिन) में पूरा हुआ और अंततः 1 नवम्बर 1956 को साकार हुआ।
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अंतिम शासक और उनके प्रिवीपर्स

The Last Rulers and Their Privy Purses

जैसे-जैसे हर राजघराने ने अपनी संप्रभु सत्ता त्यागी, भारत सरकार ने बदले में हर शासक के लिए वार्षिक प्रिवीपर्स तय किया — विलय की दहलीज़ पर कौन कहाँ का शासक था और किस कीमत पर, इसकी एक झलक।

💰बड़ी रियासतों के शासक

  • जयपुर के महाराजाधिराज मानसिंह का प्रिवीपर्स सबसे अधिक 18 लाख रुपए वार्षिक था; इसके क़रीब बीकानेर के महाराजाधिराज सादुल (शार्दूल) सिंह को 17 लाख तथा जोधपुर के महाराजाधिराज हनुवंत सिंह को 17.50 लाख रुपए मिलते थे।
  • उदयपुर के महाराजाधिराज भूपाल सिंह को 10 लाख, कोटा के महाराव भीमसिंह को 7 लाख रुपए मिलते थे, जबकि मध्यम आकार की मत्स्य-क्षेत्र रियासतों में अलवर के महाराजा तेजसिंह (5.20 लाख) व भरतपुर के महाराजा ब्रजेन्द्र सिंह (5.02 लाख) प्रमुख थे।

🏰छोटी रियासतों व चीफशिप के शासक

  • मध्यम स्तर की रियासतों में बूँदी के महाराव बहादुरसिंह को 2.81 लाख, टोंक के नवाब अज़ीज़उद्दौला वज़ीर-उल-मुल्क मो. इस्माइल अली खान को 2.78 लाख तथा धौलपुर के महाराजाधिराज उदयभानसिंह को 2.64 लाख रुपए का प्रिवीपर्स मिला।
  • डूँगरपुर (महारावल लक्ष्मणसिंह, 1.98 लाख), जैसलमेर (महाराजाधिराज रघुनाथ सिंह बहादुर, 1.80 लाख), झालावाड़ (महाराजाधिराज हरिश्चंद्र बहादुर) व किशनगढ़ (महाराजाधिराज सुमेरसिंह) — अंतिम दोनों को 1.36-1.36 लाख रुपए मिलते थे — अगली श्रेणी में आते थे।
  • करौली (महाराजा गणेशपाल देव, 1.05 लाख), प्रतापगढ़ (महारावल अंबिका प्रताप सिंह, 1.02 लाख) व शाहपुरा (राजाधिराज सुदर्शन देव, 90,000 रुपए) सबसे छोटी रियासतों में रहीं, वहीं सिरोही के महाराव अभयसिंह तथा कुशलगढ़, लावा व नीमराणा के चीफों के प्रिवीपर्स का कोई अंकित आँकड़ा उपलब्ध नहीं है।
रियासतशासकवार्षिक प्रिवीपर्स (लाख ₹)
जयपुरमहाराजाधिराज मानसिंह18
जोधपुरमहाराजाधिराज हनुवंत सिंह17.50
बीकानेरमहाराजाधिराज शार्दूल सिंह17
उदयपुरमहाराजाधिराज भूपाल सिंह10
कोटामहाराव भीमसिंह7
अलवरमहाराजा तेजसिंह5.20
भरतपुरमहाराजा ब्रजेन्द्र सिंह5.02
बूँदीमहाराव बहादुर सिंह2.81
टोंकनवाब मो. इस्माइल अली खान2.78
धौलपुरमहाराजाधिराज उदयभान सिंह2.64
डूँगरपुरमहारावल लक्ष्मण सिंह1.98
जैसलमेरमहाराजाधिराज रघुनाथ सिंह बहादुर1.80
झालावाड़महाराजाधिराज हरिश्चंद्र बहादुर1.36
किशनगढ़महाराजाधिराज सुमेर सिंह1.36
करौलीमहाराजा गणेशपाल देव1.05
प्रतापगढ़महारावल अंबिका प्रताप सिंह1.02
शाहपुराराजाधिराज सुदर्शन देव0.90
सिरोही, कुशलगढ़, लावा, नीमराणामहाराव अभयसिंह व चीफदर्ज नहीं
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एकीकरण के सात चरण

The Seven Phases of Integration

राजस्थान का निर्माण एक झटके में नहीं हुआ — यह चरण-दर-चरण, संघ-दर-संघ जुड़ता गया, जब तक कि पूरा मानचित्र साकार नहीं हो गया।

🗺️सात चरण एक नज़र में

  • हर चरण की विस्तृत कहानी से पहले, त्वरित रिवीज़न के लिए सभी सात चरणों की एक संक्षिप्त सारांश तालिका यहाँ दी गई है।
तिथिसंघ का नामशामिल रियासतेंराजप्रमुखप्रधानमंत्रीराजधानीउद्घाटनकर्ता
18 मार्च 1948मत्स्य संघअलवर, भरतपुर, धौलपुर, करौली + नीमराणाउदयभान सिंह (धौलपुर)शोभाराम कुमावतअलवरएन.वी. गाडगिल
25 मार्च 1948राजस्थान संघ (पूर्व राजस्थान)बाँसवाड़ा, बूँदी, डूँगरपुर, झालावाड़, कोटा, प्रतापगढ़, टोंक, किशनगढ़, शाहपुरा + कुशलगढ़/लावाभीमसिंह (कोटा)गोकुललाल असावाकोटाएन.वी. गाडगिल
18 अप्रैल 1948संयुक्त राजस्थानउदयपुर, राजस्थान संघ में मिलाभूपाल सिंह (उदयपुर)माणिक्यलाल वर्माउदयपुरपं. जवाहरलाल नेहरू
30 मार्च 1949बृहद् राजस्थानजयपुर, जोधपुर, बीकानेर, जैसलमेरसवाई मानसिंह द्वितीय (जयपुर)हीरालाल शास्त्रीजयपुरसरदार वल्लभभाई पटेल
15 मई 1949संयुक्त बृहत्तर राजस्थानमत्स्य संघ (अलवर, भरतपुर, धौलपुर, करौली) बृहद् राजस्थान में मिलासवाई मानसिंह द्वितीयहीरालाल शास्त्रीजयपुरशंकरराव देव समिति की सिफारिश पर प्रशासनिक हस्तांतरण
26 जनवरी 1950सिरोही का विलयसिरोही (आबू-देलवाड़ा छोड़कर)सवाई मानसिंह द्वितीयहीरालाल शास्त्रीजयपुरसंविधान लागू होने के साथ (धारा 290-ए, भारत सरकार अधिनियम 1935)
1 नवम्बर 1956वर्तमान राजस्थानअजमेर-मेरवाड़ा, आबू-देलवाड़ा, सुनेल टप्पा जुड़े; सिरोंज मध्यप्रदेश को गयापद समाप्तमोहनलाल सुखाड़िया (मुख्यमंत्री)जयपुरराज्य पुनर्गठन अधिनियम; सरदार गुरुमुख निहालसिंह ने राज्यपाल पद की शपथ ली

🐟मत्स्य संघ (18 मार्च, 1948)

  • साझा भूगोल, जाति व अर्थव्यवस्था के कारण अलवर, भरतपुर, धौलपुर व करौली के शासकों को 27 फरवरी 1948 को दिल्ली बुलाकर विलय का प्रस्ताव दिया गया, जिसे उन्होंने स्वीकार किया और अगले ही दिन, 28 फरवरी को, विलय-दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर कर दिए।
  • इन चार रियासतों में नीमराणा चीफशिप जुड़कर 18 मार्च 1948 को मत्स्य संघ बना।
  • इसका उद्घाटन केन्द्रीय मंत्री एन.वी. गाडगिल ने किया; धौलपुर के उदयभानसिंह राजप्रमुख बने (हालाँकि स्रोतों में मतभेद है कि उपराजप्रमुख करौली के गणेशपाल देव थे या अलवर के तेजसिंह), और अलवर प्रजामंडल के नेता शोभाराम कुमावत नई राजधानी अलवर से प्रधानमंत्री के रूप में मंत्रिमंडल का नेतृत्व करते रहे।
  • के.एम. मुंशी के सुझाव पर महाभारतकालीन मत्स्य राज्य के नाम पर रखा गया यह संघ लगभग 7589 वर्ग मील क्षेत्र, 18 लाख जनसंख्या व लगभग 2 करोड़ रुपए वार्षिक आय वाला था।

🌄राजस्थान संघ / पूर्व राजस्थान (25 मार्च, 1948)

  • 3 मार्च 1948 को रियासती विभाग द्वारा प्रस्तावित इस दूसरे संघ में नौ रियासतें — बाँसवाड़ा, बूँदी, डूँगरपुर, झालावाड़, कोटा, प्रतापगढ़, टोंक, किशनगढ़ व शाहपुरा — तथा कुशलगढ़ व लावा चीफशिप मिलकर 'राजस्थान संघ' या 'पूर्व राजस्थान' बनीं।
  • मेवाड़ को भी इसमें शामिल होने का न्योता मिला था, पर उसके महाराणा व प्रधानमंत्री सर रामामूर्ति ने इस चरण में शामिल होने से इनकार कर दिया।
  • विलय करने वाली रियासतों में सबसे बड़ी होने के कारण कोटा के महाराव भीमसिंह राजप्रमुख बने और कोटा शहर राजधानी बनी, बूँदी के महाराजा बहादुरसिंह उपराजप्रमुख तथा प्रो. गोकुललाल असावा प्रधानमंत्री बने; उद्घाटन फिर एन.वी. गाडगिल ने ही किया।
  • उदयपुर की सहमति 23 मार्च को ही मिली, इसलिए मंत्रिमंडल गठन रोक दिया गया था; इस संघ का क्षेत्रफल 16807 वर्ग मील, जनसंख्या 23.5 लाख व आय 1.90 करोड़ रुपए थी।

🤝संयुक्त राजस्थान (18 अप्रैल, 1948)

  • मेवाड़ के शासक ने 11 अप्रैल 1948 को विलय-पत्र पर हस्ताक्षर कर उदयपुर को राजस्थान संघ में मिला दिया, जिससे 'संयुक्त राजस्थान' बना — इसका उद्घाटन स्वयं पंडित जवाहरलाल नेहरू ने किया।
  • महाराणा भूपालसिंह राजप्रमुख तथा माणिक्यलाल वर्मा प्रधानमंत्री बने, उदयपुर राजधानी बनी; कोटा के भीमसिंह वरिष्ठ उपराजप्रमुख तथा बूँदी के बहादुरसिंह व डूँगरपुर के लक्ष्मणसिंह कनिष्ठ उपराजप्रमुख बने।
  • विस्तृत मंत्रिमंडल में पूरे संघ से मंत्री शामिल थे — शाहपुरा के गोकुललाल असावा उपप्रधानमंत्री, कोटा के अभिन्नहरि, उदयपुर के तीन मंत्री (मोहनलाल सुखाड़िया, भूरेलाल बया, प्रेमनारायण माथुर) तथा बूँदी के बृजसुन्दर शर्मा।
  • इस चरण तक राज्य का क्षेत्रफल बढ़कर 29977 वर्ग मील, जनसंख्या 42,60,918 तथा आय 3.16 करोड़ रुपए हो गई थी।

🏔️बृहद् राजस्थान (30 मार्च, 1949)

  • अब केवल जयपुर, जोधपुर, बीकानेर, जैसलमेर व सिरोही ही एकीकरण से बाहर रह गए थे; नवम्बर 1948 में उदयपुर में जयप्रकाश नारायण की माँग और राम मनोहर लोहिया के नेतृत्व वाली राजस्थान आंदोलन समिति जैसे बढ़ते जन-दबाव के चलते सरदार पटेल ने 14 जनवरी 1949 को उदयपुर की एक विशाल सभा में पूर्ण विलय की घोषणा कर दी।
  • जयपुर, जोधपुर, बीकानेर व जैसलमेर संयुक्त राजस्थान में मिल गए, और उप-प्रधानमंत्री सरदार पटेल ने 30 मार्च 1949 को जयपुर में 'बृहद् राजस्थान' का विधिवत उद्घाटन किया — लावा चीफशिप पहले ही 19 जुलाई 1948 को जयपुर में तथा कुशलगढ़ बाँसवाड़ा में मिल चुकी थी।
  • जयपुर के महाराजा सवाई मानसिंह द्वितीय राजस्थान के पहले (और आजीवन) राजप्रमुख बने, उदयपुर के भूपालसिंह को महाराज प्रमुख कहा गया, जोधपुर के हनुवंतसिंह व कोटा के भीमसिंह वरिष्ठ उपराजप्रमुख बने, तथा बूँदी के बहादुरसिंह व डूँगरपुर के लक्ष्मणसिंह कनिष्ठ उपराजप्रमुख बने रहे; हीरालाल शास्त्री ने 4 अप्रैल को प्रधानमंत्री पद संभाला और 7 अप्रैल 1949 को मंत्रिमंडल बनाया।
  • पी. सत्यनारायण राव समिति की सिफारिश पर जयपुर को राजधानी घोषित किया गया, जबकि प्रमुख विभाग अपने पूर्व-अनुभव के आधार पर बिखेरे गए — हाईकोर्ट जोधपुर, शिक्षा बीकानेर, खनिज व कस्टम-एक्साइज उदयपुर, वन व सहकारिता कोटा तथा कृषि विभाग भरतपुर में; चार प्रमुख शासकों के प्रिवीपर्स क्रमशः 18, 17.50, 17 व 1.80 लाख रुपए तय हुए, जयपुर महाराजा को राजप्रमुख पद के लिए अतिरिक्त 5.50 लाख रुपए भी मिले।

🌊संयुक्त बृहत्तर राजस्थान (15 मई, 1949)

  • भरतपुर की किसान सभा तक अलग 'ब्रजप्रदेश' पहचान की माँग उठा चुकी थी, जिससे मत्स्य संघ का अस्तित्व डगमगाने लगा; इसके चार शासकों को 13 फरवरी 1949 को दिल्ली बुलाकर यह तय करने को कहा गया कि वे राजस्थान के साथ रहें या पड़ोसी संयुक्त प्रांत (आज का उत्तर प्रदेश) के साथ — अलवर व करौली राजस्थान के पक्ष में थे, भरतपुर व धौलपुर उत्तर प्रदेश के।
  • 23 मार्च को वी.पी. मेनन से आगे की बातचीत के बाद भारत सरकार ने तीन सदस्यीय शंकरराव देव समिति बनाई, जिसकी सिफारिश से मामला राजस्थान के पक्ष में तय हो गया।
  • 10 मई 1949 को मत्स्य संघ के चारों शासकों और बृहद् राजस्थान के राजप्रमुख सवाई मानसिंह द्वितीय ने दिल्ली में विलय-पत्र पर हस्ताक्षर किए, और 15 मई तक मत्स्य का प्रशासन विधिवत सौंप दिया गया, जिससे 'संयुक्त बृहत्तर राजस्थान' बना।
  • मत्स्य संघ के प्रधानमंत्री रह चुके शोभाराम को हीरालाल शास्त्री के मंत्रिमंडल में शामिल कर लिया गया, और नीमराणा ठिकाना भी शेष संघ के साथ इसमें आ मिला।

🏞️सिरोही का विलय (26 जनवरी, 1950)

  • सिरोही का शासक स्वयं नाबालिग था, इसलिए दोवागढ़ की महारानी की अध्यक्षता वाली एजेंसी कौंसिल इसका कामकाज देखती थी; 1 फरवरी 1948 को रियासती विभाग सिरोही को राजपूताना एजेंसी से हटाकर गुजरात एजेंसी में डाल चुका था, जिसका राजस्थान के नेताओं व जनता ने कड़ा विरोध किया।
  • गृहमंत्री पटेल व अन्य नेता सिरोही को बम्बई प्रांत से जोड़ना चाहते थे जबकि राजस्थानी नेता पूरा जिला चाहते थे; हीरालाल शास्त्री ने अप्रैल 1948 में पटेल को लिखे पत्र में यह भावना जताई कि 'हमारे लिए सिरोही का अर्थ है गोकुल भाई — बिना गोकुलभाई के हम राजस्थान नहीं चला सकते।'
  • गोकुलभाई भट्ट की सलाह पर पटेल ने 8 नवंबर 1948 को सिरोही रिजेन्सी कौंसिल से समझौता कर इसका प्रशासन केंद्र को सौंप दिया, जो 5 जनवरी 1949 को बम्बई सरकार को दे दिया गया; अंततः भारत सरकार अधिनियम, 1935 की धारा 290-ए के तहत 26 जनवरी 1950 को सिरोही का विभाजन हुआ — आबू व देलवाड़ा तहसीलें बम्बई को, शेष राजस्थान को — जिसे 7 फरवरी 1950 से लागू किया गया।
  • आबू-देलवाड़ा को बम्बई को दिए जाने में पटेल के प्रभाव ने राजस्थानवासियों में स्थायी नाराज़गी पैदा की, और छह साल बाद राज्यों के पुनर्गठन के समय ये तहसीलें वापस लौटानी पड़ीं; इसी 26 जनवरी 1950 को, संविधान लागू होने के साथ, राजपूताना का यह भू-भाग विधिवत भारतीय संघ के राज्य 'राजस्थान' में बदल गया — हालांकि 'राजस्थान' नाम स्वयं 25 मार्च 1948 के राजस्थान संघ से ही प्रयोग में आ चुका था।

🏁अंतिम चरण: वर्तमान राजस्थान (1 नवम्बर, 1956)

  • अजमेर-मेरवाड़ा अब भी अलग-थलग था — अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद् की राजपूताना प्रांतीय सभा लंबे समय से इसे राजस्थान में मिलाना चाहती थी, लेकिन अजमेर के अपने कांग्रेस नेतृत्व, विशेषकर 1952 के बाद हरिभाऊ उपाध्याय के मंत्रिमंडल ने, प्रशासनिक सुविधा के लिए इसे अलग रखने की वकालत की; वी.पी. मेनन ने सवाल उठाया कि जब शेष राजपूताना मिल चुका है तो यह अकेला बाहर क्यों रहे।
  • फजल अली की अध्यक्षता वाले राज्य पुनर्गठन आयोग ने अंततः इसे सुलझाया — सिरोही की शेष आबू व देलवाड़ा तहसीलें, मध्यप्रदेश के मंदसौर जिले की मानपुरा तहसील का सुनेल टप्पा, और पूरा अजमेर-मेरवाड़ा राजस्थान में मिल गए, जबकि राजस्थान के कोटा जिले का सिरोंज क्षेत्र मध्यप्रदेश को दे दिया गया।
  • उसी दिन राजप्रमुख का पद समाप्त कर दिया गया और सरदार गुरुमुख निहालसिंह ने राजस्थान के प्रथम राज्यपाल के रूप में शपथ ली, जिससे मत्स्य संघ की स्थापना के 8 वर्ष 7 माह से अधिक बाद, 1 नवम्बर 1956 को यह प्रक्रिया वास्तव में पूर्ण हुई।
  • पारंपरिक पंचांग के अनुसार यह सातवाँ व अंतिम चरण गुरुवार, विक्रम संवत् 2013 की कार्तिक कृष्ण पक्ष चतुर्दशी को पड़ा।
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प्रमुख व्यक्तित्व और राजनीतिक टकराव

Key Figures and Political Contests

एकीकरण महज़ काग़ज़ी प्रक्रिया नहीं थी — इसमें स्वतंत्र रहने की एक विफल कोशिश, प्रतिद्वंद्वी क्षेत्रीय संघ, और सीमाओं व राजधानी को लेकर कड़ी सौदेबाज़ी भी शामिल थी।

🗡️जोधपुर का स्वतंत्रता-दांव

  • क्षेत्र के शासकों में सबसे पहले बीकानेर के शार्दूलसिंह ने 7 अगस्त 1947 को विलय-पत्र पर हस्ताक्षर किए, और 14 अगस्त तक बाक़ी सभी रियासतें भी शामिल हो गईं — सिवाय जोधपुर के।
  • जोधपुर के हनुवंतसिंह ने, कुछ समय के लिए धौलपुर व जैसलमेर के शासकों के साथ मिलकर, पाकिस्तान के गवर्नर जनरल मोहम्मद अली जिन्ना तथा नरेन्द्र मंडल के अध्यक्ष भोपाल नवाब से गुपचुप संपर्क साधा, ताकि अपनी रियासत को स्वतंत्र रखा जा सके।
  • जैसे ही वी.पी. मेनन व लॉर्ड माउंटबेटन को इसकी भनक लगी, उन्होंने कुशल कूटनीति से हनुवंतसिंह को मना लिया — उन्होंने 11 अगस्त 1947 को विलय-पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए, और धौलपुर-जैसलमेर के शासक भी चुपचाप भारत संघ में लौट आए।

🧭बड़े संघ बनाने के असफल प्रयास

  • एकीकरण से वर्षों पहले, मेवाड़ के महाराणा भूपालसिंह ने एक बड़ा सपना देखा था — उन्होंने 25-26 जून 1946 को उदयपुर में राजपूताना, गुजरात व मालवा के शासकों की एक बैठक बुलाई और इस 'राजस्थान यूनियन' के लिए के.एम. मुंशी को संवैधानिक सलाहकार नियुक्त किया — पर यह योजना कभी साकार नहीं हुई।
  • जयपुर के सवाई मानसिंह, कोटा के भीमसिंह (कोटा-बूँदी-झालावाड़ का प्रस्तावित हाड़ौती संघ) व डूँगरपुर के लक्ष्मणसिंह (प्रस्तावित वागड़ संघ) के इसी तरह के सपने भी परवान नहीं चढ़े, और अंततः सात-चरणीय रास्ता ही सफल हुआ।
  • 1945-46 में ही उदयपुर में हुए अखिल भारतीय राज्य जनता सम्मेलन (AISPC) में यह प्रस्ताव रखा गया था कि संघीय भारत में केवल उन्हीं राज्यों (या राज्य-समूहों) को स्वतंत्र इकाई का दर्जा मिले जिनकी जनसंख्या कम-से-कम 50 लाख व राजस्व 3 करोड़ रुपए हो — यह मानक राजस्थान की कोई भी अकेली रियासत पूरा नहीं कर सकती थी।

⚔️भरतपुर-धौलपुर की दुविधा

  • भरतपुर के महाराजा ने 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता दिवस नहीं मनाया, जिससे दिल्ली ने उन्हें बुलाकर भरतपुर को सीधे केंद्रीय प्रशासन में लाने का विचार रखा; दीवान रायबहादुर सूरजमल ने 14 फरवरी 1948 को त्यागपत्र दिया और एस.एन. सप्रू को प्रशासक बनाया गया, हालाँकि बाद में महाराजा को दोषमुक्त कर दिया गया।
  • मत्स्य संघ का स्वागत सभी ने नहीं किया — भरतपुर महाराजा के भाई मानसिंह और किसान नेता देशराज ने इसके उद्घाटन समारोह का खुला विरोध किया, वहीं बाँसवाड़ा के महारावल चंद्रवीरसिंह ने राजस्थान संघ के विलय-पत्र पर हस्ताक्षर करते हुए इसे 'अपने डेथ वारंट पर दस्तखत' बताया था।
  • जब शंकरराव देव समिति ने जनभावना जानी, तो धौलपुर की जनता राजस्थान के बजाय उत्तर प्रदेश के साथ विलय के पक्ष में निकली — हालाँकि अंततः जब मत्स्य संघ बृहद् राजस्थान में मिला, तो यह पसंद अमान्य कर दी गई।

🖋️संविधान परिषद् प्रतिनिधि व राजधानी का प्रश्न

  • मेवाड़ ने सर टी.वी. राघवाचारी व माणिक्यलाल वर्मा को भारतीय संविधान परिषद् में भेजा, जबकि जोधपुर का प्रतिनिधित्व सी.एस. वैंकटाचारी व जयनारायण व्यास ने किया।
  • बृहद् राजस्थान को अंतिम रूप देने से पहले वी.पी. मेनन ने जयपुर के दीवान सर वी.टी. कृष्णामाचारी व बीकानेर के दीवान एस. वैंकटाचारी से सलाह ली; कृष्णामाचारी ने इसके बजाय राजपूताना को तीन इकाइयों में बाँटने का सुझाव दिया — संयुक्त राजस्थान यथावत रहे, जयपुर-अलवर-करौली की एक इकाई बने, और जोधपुर-बीकानेर-जैसलमेर की 'पश्चिमी राजपूताना यूनियन' बने, साथ ही भरतपुर-धौलपुर उत्तर प्रदेश को दे दिए जाएँ।
  • मेनन व वैंकटाचारी ने इसे नामंज़ूर कर दिया और जनभावना के आधार पर एक ही राजपूताना इकाई बनाने पर ज़ोर दिया; 1949 में पेप्सू के मुख्य सचिव बी.आर. पटेल की अध्यक्षता वाली समिति, जिसके सदस्य लेफ्टिनेंट कर्नल एच.सी. पुरी व एच.पी. सिन्हा थे, ने राजधानी के सवाल पर जयपुर की सिफारिश की।

🏙️अजमेर-मेरवाड़ा का अलग रास्ता

  • किशनगढ़ भी थोड़ी देर के लिए मुख्य कथा से अलग हट गया था — इसके महाराजा सुमेरसिंह ने 26 सितंबर 1947 को केंद्र-शासित अजमेर-मेरवाड़ा प्रदेश में विलय का दस्तावेज़ हस्ताक्षरित किया, जिसे बाद में प्रांतीय नेताओं के कड़े विरोध पर रद्द कर दिया गया।
  • राज्य के गठन के दौरान अजमेर-मेरवाड़ा राजस्थान से बाहर रहने के कारण उसकी अपनी 30-सदस्यीय विधानसभा थी, जिसे 'धारा सभा' कहा जाता था।
  • 1 नवम्बर 1956 को जब यह अंततः मिला, तो राजस्थान विधानसभा की सदस्य संख्या बढ़कर 190 हो गई; राज्य 'बी' श्रेणी में ही रहा, और अजमेर-मेरवाड़ा के अपने एकमात्र मुख्यमंत्री हरिभाऊ उपाध्याय रहे थे।
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विरासत और उल्लेखनीय तथ्य

Legacy and Landmark Facts

आख़िरी हस्ताक्षर की स्याही सूखने के बाद भी एकीकरण की गूँज बाक़ी है — एक राजकीय अवकाश में, एक कीर्तिमानी रियासत में, और रेगिस्तान के सबसे भव्य क़िले के बारे में नेहरू की एक पंक्ति में।

📅राजस्थान स्थापना दिवस

  • चूँकि 30 मार्च 1949 को जयपुर, जोधपुर, जैसलमेर व बीकानेर के विलय से बृहद् राजस्थान अस्तित्व में आया था, इसी तारीख को लंबे समय से 'राजस्थान स्थापना दिवस' के रूप में मनाया जाता रहा है।
  • हालाँकि वर्ष 2025 से यह तय किया गया कि यह दिवस अब हर वर्ष पारंपरिक पंचांग की चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को मनाया जाएगा।

🏅कीर्तिमान व उल्लेखनीय तथ्य

  • क्षेत्रफल की दृष्टि से मारवाड़ (जोधपुर) स्वतंत्रता-कालीन राजस्थान की सबसे बड़ी रियासत थी, और नया राज्य संबंधित अधिनियम की धारा 10 के तहत विधिवत गठित हुआ; 26 जनवरी 1950 को संविधान ने इसे 'बी' श्रेणी का राज्य माना, और सातवें संशोधन द्वारा राजप्रमुख पद समाप्त होने के बाद सरदार गुरुमुख निहालसिंह इसके प्रथम राज्यपाल बने।
  • सिरोही का विलय असल में दो टुकड़ों में हुआ — प्रभावशाली गोकुल भाई भट्ट के जन्मस्थान हाथल गाँव सहित एक भाग छठे चरण में 26 जनवरी 1950 को राजस्थान में आया, जबकि आबू-देलवाड़ा सातवें चरण में ही 1 नवम्बर 1956 को जुड़ा — इसी दौर में पड़ोसी पालनपुर व विजयनगर 1948 में गुजरात एजेंसी में जा चुके थे।
  • मोहनलाल सुखाड़िया — जो संयुक्त राजस्थान के पहले मंत्रिमंडल में मंत्री रह चुके थे — सातवें व अंतिम चरण के समय, यानी 1 नवम्बर 1956 को, राज्य के मुख्यमंत्री थे, जब एकीकरण की कहानी पूर्ण हुई।
  • और यह जैसलमेर ही था — 1949 में जिन चार रियासतों के विलय से बृहद् राजस्थान बना, उनमें से एक — जिसे पंडित जवाहरलाल नेहरू ने कभी 'दुनिया का आठवाँ आश्चर्य' कहा था।