राजस्थान में राजनीतिक जन-जागरण
Political Awakening in Rajasthan
आर्य समाज के उदय से लेकर प्रजामंडलों के संघर्ष और उत्तरदायी शासन की स्थापना तक — राजस्थान की रियासतों में राष्ट्रीय चेतना जगाने वाले पत्रकारों, संगठनों और वीर सेनानियों की कहानी।
जन-जागृति का उदय
राजस्थान का स्वाधीनता आंदोलन उस रियासती परिवेश में पनपा जहाँ राष्ट्रवादी भावना को सामंती नियंत्रण और अंग्रेजी आधिपत्य, दोनों से जूझना पड़ा।
🏰1857 और रियासती पृष्ठभूमि
- अजमेर-मेरवाड़ा क्षेत्र को छोड़कर शेष सम्पूर्ण राजपूताना में अंग्रेजी आधिपत्य के अधीन देशी रियासतों का शासन चलता था; 1818 ई. की अधीनस्थ पार्थक्य संधियों के बाद रियासतों में अंग्रेजी सेनाएँ तैनात हो गईं, जिससे 1857 की क्रांति में राजस्थान की भूमिका अन्य प्रांतों की तुलना में अपेक्षाकृत कम सक्रिय रही।
- फिर भी 1857 की क्रांति में क्रांतिकारियों ने कोटा, टोंक, बाँसवाड़ा, झालावाड़, भरतपुर व धौलपुर पर कुछ समय के लिए अधिकार कर लिया था; वहीं अंग्रेजों पर आश्रित शासकों ने राष्ट्रवादी भावनाओं को पनपने से रोकने का प्रयास किया।
- दमनकारी परिस्थितियों के बावजूद प्रदेश के स्वतंत्रता प्रेमियों ने अंग्रेजी शासन तथा सामंती शोषण, दोनों से जनता को मुक्त कराने के लिए संघर्ष किया और उनकी स्वराज्य व स्वाभिमान की चाह कभी कमजोर नहीं पड़ी।
🔥आर्य समाज व स्वामी दयानन्द सरस्वती
- 10 अप्रैल 1875 ई. को बम्बई में आर्य समाज की स्थापना करने वाले स्वामी दयानन्द सरस्वती को स्वदेशी और स्वराज्य का शंख फूँकने वाला आरंभिक समाज सुधारक माना जाता है; वे 1865 से 1883 के बीच बार-बार राजस्थान आए, जिसकी शुरुआत महाराजा मदनपाल के अतिथि के रूप में करौली से हुई।
- बाद की यात्राओं में उन्होंने मार्च 1881 ई. में जयपुर में 'वैदिक धर्म सभा' की स्थापना की, जो आगे चलकर आर्य समाज में परिवर्तित हो गई; इससे पहले ही उनके अनुयायियों ने 13 फरवरी 1881 ई. को अजमेर में आर्य समाज की शाखा स्थापित कर दी थी।
- उन्होंने 27 फरवरी 1883 ई. को उदयपुर में 'परोपकारिणी सभा' की स्थापना की, जो बाद में अजमेर स्थानांतरित हो गई; जोधपुर यात्रा के दौरान कथित रूप से विष दिए जाने से उनका स्वास्थ्य बिगड़ गया और 30 अक्टूबर 1883 ई. को अजमेर में उनका देहांत हुआ।
- 1888-1890 ई. के बीच राजस्थान में आर्य समाज की और शाखाएँ स्थापित हुईं तथा अजमेर में 'वैदिक यंत्रालय' नामक छापाखाना लगाया गया; स्वराज्य की भावना जगाने का आरंभिक श्रेय चाँदकरण शारदा और हरविलास शारदा जैसे सहयोगियों को भी जाता है।
🎓मध्यम वर्ग व प्रथम विश्वयुद्ध का प्रभाव
- राजस्थान के आम व्यक्ति में भी विद्रोह की सामर्थ्य थी, परंतु योग्य नेतृत्व शिक्षित मध्यम वर्ग से ही मिला — यह नेतृत्व शिक्षक, वकील व पत्रकार वर्ग से आया, जिनमें जयनारायण व्यास, मास्टर भोलानाथ, मघाराम वैद्य, अर्जुनलाल सेठी व विजय सिंह पथिक प्रमुख थे।
- राजस्थान की लगभग सभी रियासतों की सेनाओं ने प्रथम विश्वयुद्ध में हिस्सा लिया और लौटकर सैनिकों ने अपने अनुभव लोगों से बाँटे, जिससे नई वैचारिक जागृति आई; वहीं युद्ध के भार से पड़े कर के बोझ ने अंग्रेजी सत्ता के प्रति असंतोष को और गहरा कर दिया।
🌐बाह्य वातावरण व राष्ट्रीय संपर्क
- राजस्थान शेष भारत में चल रही राजनीतिक गतिविधियों से अनभिज्ञ नहीं था; जहाँ हरिभाऊ उपाध्याय व जमनालाल बजाज गांधीवादी नीतियों का अनुसरण कर रहे थे, वहीं रासबिहारी बोस से प्रेरित अर्जुनलाल सेठी, गोपालसिंह खरवा व बारहठ परिवार सशस्त्र प्रतिरोध की अलख जगाए हुए थे।
- 19वीं शताब्दी के अंतिम वर्षों में अजमेर राजनीतिक जागरूकता व सामाजिक-आर्थिक कार्यकलाप का महत्त्वपूर्ण केंद्र बन गया था; 1888 ई. के कांग्रेस के इलाहाबाद अधिवेशन में अजमेर-मेरवाड़ा से गोपीनाथ माथुर, किशनलाल व हरविलास शारदा प्रतिनिधि बनकर गए।
पत्रकारिता और देशभक्ति साहित्य
समाचार-पत्रों व देशभक्ति साहित्य ने स्वाधीनता का संदेश प्रदेश के हर कस्बे तक पहुँचाया, प्रायः इसके लेखकों व संपादकों को इसकी भारी कीमत भी चुकानी पड़ी।
🗞️प्रारंभिक समाचार-पत्र
- राजपूताना का प्रथम समाचार-पत्र 'मजहरुल सरूर' 1849 ई. में भरतपुर से प्रकाशित हुआ; ईसाई मिशनरियों ने 1864 ई. में ब्यावर में प्रथम लिथो प्रेस स्थापित की।
- 1856 ई. में जयपुर से द्विभाषी 'रोजतुल तालीम' (राजपूताना अखबार) प्रकाशित हुआ; 19वीं सदी के उत्तरार्ध तक सुधारवादी स्वर वाले पत्र फैल चुके थे — जयपुर का 'जगहितकारक', जोधपुर के 'जोधपुर गवर्नमेंट गजट' व 'मरुधर मित्र', तथा उदयपुर का 'उदयपुर गजट', जिसका नाम 1879 ई. में 'सज्जन कीर्ति सुधाकर' रखा गया।
- अजमेर पत्रकारिता का केंद्र बन गया — द्विभाषी राजपूताना गजट (1885), अँग्रेजी भाषा के राजस्थान हेराल्ड व राजस्थान टाइम्स (1885) तथा राजस्थान समाचार (1889, 1904 ई. में दैनिक बना) जैसे पत्रों ने सामंती अन्याय की खुलकर आलोचना की, जिसकी कीमत संपादकों को अक्सर जुर्माने या जेल से चुकानी पड़ी।
✊राजस्थान केसरी और राजनीतिक पत्रकारिता
- 1920 ई. में विजय सिंह पथिक ('पथिकजी') ने जमनालाल बजाज की आर्थिक सहायता से वर्धा से 'राजस्थान केसरी' का प्रकाशन शुरू किया, जिसने अंग्रेजी नीतियों व सामंती शोषण के विरुद्ध आवाज उठाई।
- 1922 ई. में राजस्थान सेवा संघ ने कृषक आंदोलनों के समर्थन में 'नवीन राजस्थान' अखबार निकाला, जिसका नाम 1923 ई. में 'तरुण राजस्थान' रखा गया; बाद में प्रभात (1932), नवज्योति (1936), नवजीवन (1939) व लोकवाणी (1943) जैसे पत्रों ने राजस्थान की समस्याओं को राष्ट्रीय स्तर तक पहुँचाया।
- ऐसी पत्रकारिता का दमन भी हुआ: 10 अप्रैल 1940 ई. को अजमेर की अमर प्रिंटिंग प्रेस की भारतीय सुरक्षा अधिनियम, 1932 के अंतर्गत तलाशी ली गई, क्योंकि उस पर प्रतिबंधित पुस्तक 'उस पार रोशनी' की प्रतियाँ रखने का आरोप था।
✍️देशभक्ति साहित्यकार व कवि
- ठाकुर केसरी सिंह बारहठ, जयनारायण व्यास और पं. हीरालाल शास्त्री की कविताओं में देशप्रेम की चरम अभिव्यक्ति देखने को मिलती है, वहीं अर्जुनलाल सेठी की कृतियों ने राजस्थान में वैचारिक जागृति उत्पन्न की।
- महाकवि सूर्यमल्ल मिश्रण रचित 'वीर सतसई' वीर रस व स्वदेश-प्रेम के अनूठे संगम के लिए स्मरणीय है, जो स्वाधीनता आंदोलन में साहित्य के अविस्मरणीय योगदान का उदाहरण है।
- केसरीसिंह बारहठ द्वारा रचित 13 सोरठों 'चेतावनी रा चूँगट्या' (1903) ने मेवाड़ महाराणा फतहसिंह को लॉर्ड कर्जन के दिल्ली दरबार में जाने से रोक दिया — यह साहित्य द्वारा किया गया उस युग का सबसे तीक्ष्ण राजनीतिक हस्तक्षेप था।
संगठन, प्रजामंडल व उत्तरदायी शासन
छोटी सुधारवादी सभाओं से लेकर सुगठित प्रजामंडलों तक, राजस्थान ने वह संस्थागत आधार खड़ा किया जिसने अंततः रियासतों को उत्तरदायी शासन की दिशा में बढ़ने पर विवश किया।
🕊️प्रारंभिक सुधारवादी संस्थाएँ
- सुधारवादी संस्थाएँ आरंभ में ही उभरीं — उदयपुर की देश हितैषणी सभा (1877, महाराणा सज्जनसिंह के अधीन), जयपुर की वैदिक धर्म सभा (1881) व उदयपुर की परोपकारिणी सभा (1883), जो स्वामी दयानंद से जुड़ी थीं, तथा भीलों को संगठित करने हेतु गुरु गोविन्द गिरी द्वारा स्थापित सम्प सभा (1883)।
- इसके पश्चात शिक्षा-सह-क्रांतिकारी संस्थाएँ स्थापित हुईं, विशेष रूप से अर्जुनलाल सेठी द्वारा स्थापित जयपुर का जैन वर्धमान विद्यालय (1907) — जो प्रदेश का प्रथम राष्ट्रीय विद्यापीठ था और जोरावर सिंह, प्रतापसिंह, मानिकचंद, मोतीचंद व विष्णुदत्त जैसे युवा क्रांतिकारियों का प्रशिक्षण-केंद्र बना।
🤝राजपूताना मध्य भारत सभा व राजस्थान सेवा संघ
- 1918 ई. के दिल्ली कांग्रेस अधिवेशन के बाद गणेश शंकर विद्यार्थी, विजयसिंह पथिक, जमनालाल बजाज व चाँदकरण शारदा जैसे नेताओं के प्रयासों से 1919 ई. में दिल्ली के मारवाड़ी पुस्तकालय में 'राजपूताना मध्य भारत सभा' की स्थापना हुई; 1920 ई. के नागपुर अधिवेशन में इसे कांग्रेस की सहयोगी संस्था मान लिया गया।
- विजयसिंह पथिक, रामनारायण चौधरी व अर्जुनलाल सेठी ने महात्मा गांधी की सलाह पर 1919 ई. में वर्धा में राजस्थान सेवा संघ की स्थापना की, जिसे 1920 ई. में अजमेर स्थानांतरित किया गया; इसका उद्देश्य जागीरदारों व जनता में मैत्री संबंध बनाना तथा राजनीतिक चेतना का प्रसार करना था।
- राजपूताना मध्य भारत सभा से ही आगे चलकर अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद् (1927) का उदय हुआ, जिसकी शाखा 'राजपूताना प्रांतीय सभा' का मुख्यालय जयपुर में स्थापित हुआ।
🚩प्रजामंडल आंदोलन का विस्तार
- 1920 और 1930 के दशकों में क्षेत्रीय प्रजामंडल व युवक संगठन तेजी से फैले — जोधपुर में जयनारायण व्यास के नेतृत्व में मारवाड़ सेवा संघ (1920) व बाद में मारवाड़ यूथ लीग (1931), सागरमल गोपा के नेतृत्व में जैसलमेर प्रजामंडल (1932), तथा मघाराम वैद्य के नेतृत्व में बीकानेर प्रजामंडल (1936)।
- माणिक्यलाल वर्मा ने 1938 ई. में मेवाड़ प्रजामंडल की स्थापना की, वहीं जयनारायण व्यास के मार्गदर्शन व रणछोड़दास गट्टानी की अध्यक्षता वाली मारवाड़ लोक परिषद् (1938) ने कठिन 1940 के दशक में भी आंदोलन को आगे बढ़ाया।
✊🏽भारत छोड़ो आंदोलन व जेंटिलमेंस एग्रीमेंट
- 9 अगस्त, 1942 को महात्मा गांधी के आह्वान पर 'अंग्रेजो भारत छोड़ो' और 'करो या मरो' के नारों के साथ शुरू हुआ 'भारत छोड़ो आंदोलन' 1857 के बाद अंग्रेजों के विरुद्ध सबसे बड़ा आंदोलन बना; रियासतों में उत्तरदायी शासन की माँग को लेकर प्रजामंडलों ने भी समानांतर तीव्र आंदोलन चलाए।
- कोटा में आंदोलन इतना उग्र हो गया कि जनता ने पुलिस को बैरकों में बंद कर चौकियों व थानों पर नियंत्रण कर लिया, जिसका नेतृत्व बेणीमाधव शर्मा व नाथूलाल जैन जैसे क्रांतिकारी कर रहे थे; इसके विपरीत जयपुर प्रजामंडल इस दौर में लगभग निष्क्रिय रहा।
- इसके बजाय, सितंबर 1942 ई. में जयपुर प्रजामंडल अध्यक्ष हीरालाल शास्त्री ने प्रधानमंत्री सर मिर्जा इस्माइल के साथ 'जेंटिलमेंस एग्रीमेंट' पर हस्ताक्षर किए: राज्य ने भविष्य में युद्ध में अंग्रेजों की मदद न करने व शीघ्र उत्तरदायी शासन स्थापित करने का वचन दिया तथा अंग्रेज-विरोधी गतिविधियों व कांग्रेस ध्वज को बर्दाश्त करने पर सहमति जताई — बदले में प्रजामंडल ने महाराजा के विरुद्ध संघर्ष त्याग दिया।
- इस समझौते से असंतुष्ट होकर बाबा हरिश्चंद्र, दौलतराम भंडारी, चिरंजीलाल मिश्र व रामकरण जोशी ने अलग होकर 'आजाद मोर्चे' का गठन किया और जयपुर रियासत में भारत छोड़ो आंदोलन को फिर से प्रज्ज्वलित किया; 1945 ई. में यह मोर्चा प्रजामंडल में विलीन हो गया।
🗳️अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद् व सत्ता हस्तांतरण
- माणिक्यलाल वर्मा ने 31 दिसंबर, 1945 व 1 जनवरी, 1946 को उदयपुर के सलैटिया मैदान में पं. जवाहरलाल नेहरू के सान्निध्य में अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद् के सातवें अधिवेशन की अध्यक्षता की, जिससे रियासतों में जागृति को नई गति मिली; नेहरू ने स्वयं भी 1945-46 में उदयपुर में हुए इसके नवें सत्र की अध्यक्षता की।
- 2 सितम्बर, 1946 को जवाहरलाल नेहरू ने अंतरिम सरकार के प्रधानमंत्री के रूप में देश की बागडोर संभाली; स्वतंत्रता के समय लॉर्ड माउंटबेटन स्वतंत्र भारत के प्रथम गवर्नर जनरल बने, जबकि सी. राजगोपालाचारी पहले व एकमात्र भारतीय गवर्नर जनरल बने।
- 30 जनवरी, 1948 ई. को महात्मा गांधी की हत्या के बाद, अलवर की संभावित संलिप्तता के संदेह में भारत सरकार ने अलवर के दीवान डॉ. एन.बी. खरे व महाराव तेजसिंह को नजरबंद कर अलवर का प्रशासन सीधे अपने हाथ में ले लिया।
🏛️रियासतों में उत्तरदायी सरकारों की स्थापना
- शाहपुरा वह पहली रियासत बनी जहाँ राजा सुदर्शन देव ने 14 अगस्त, 1947 ई. को संविधान लागू कर पूर्ण उत्तरदायी शासन स्थापित किया; झालावाड़ में भी उसी वर्ष लोकप्रिय मंत्रिमंडल बना, जिसके प्रधानमंत्री स्वयं महाराजा हरिश्चंद्र बने।
- 1948 ई. तक हीरालाल शास्त्री के नेतृत्व में जयपुर में उत्तरदायी सरकार बनी, जयनारायण व्यास जोधपुर के प्रधानमंत्री बने, गौरीशंकर उपाध्याय डूँगरपुर मंत्रिमंडल के मुख्यमंत्री बने तथा भूपेंद्रनाथ त्रिवेदी बाँसवाड़ा के मुख्यमंत्री बने; बूँदी, अलवर आदि लगभग सभी अन्य रियासतों में भी समानांतर संवैधानिक सुधार हुए।
- जैसलमेर एकमात्र ऐसी रियासत रही जिसने न तो 1942 ई. के भारत छोड़ो आंदोलन में भागीदारी की और न ही अपने यहाँ उत्तरदायी शासन स्थापित किया।
प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी
वे नायक जिन्होंने आंदोलन को विचार, संस्थाएँ और बार-बार अपने प्राणों की आहुति दी।
⚔️अर्जुनलाल सेठी
- 9 सितंबर, 1880 ई. को जयपुर में जन्मे अर्जुनलाल सेठी को राजस्थान का प्रथम क्रांतिकारी और जन-जागरण का अग्रदूत माना जाता है; उन्होंने महाराजा सवाई माधोसिंह द्वितीय के दीवान बनाने के प्रस्ताव को यह कहकर ठुकरा दिया कि यदि वे राज्य की चाकरी करेंगे तो भारत माता को गुलामी से कौन मुक्त कराएगा।
- 1907 ई. में उन्होंने जयपुर में जैन वर्धमान विद्यालय, प्रदेश का प्रथम राष्ट्रीय विद्यापीठ, क्रांतिकारियों के प्रशिक्षण हेतु स्थापित किया; बाद में वे हार्डिंग बम काण्ड, आरा हत्याकांड व काकोरी कार्रवाई से जुड़े रहे।
- हार्डिंग बम केस के दौरान वैल्लूर जेल में रहते हुए उन्होंने 70 दिन का अनशन किया, जिसे देश का पहला राजनीतिक अनशन माना जाता है; उनका निधन 23 दिसम्बर, 1941 को अजमेर में हुआ, उनकी इच्छा थी कि उन्हें जलाने की बजाय दफनाया जाए।
🌾विजयसिंह पथिक
- मूल नाम भूपसिंह वाले विजयसिंह पथिक का जन्म 24 मार्च, 1882 ई. को उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर के गुठावली गाँव में हुआ; उन्हें 'राजस्थान में किसान आंदोलन का जनक' कहा जाता है, और अर्जुनलाल सेठी ने उन्हें 'राजस्थान का शेर' कहा था।
- उन्होंने वीर भारत सभा, राजपूताना मध्य भारत सभा व राजस्थान सेवा संघ की स्थापना की, तथा 1916 ई. के महत्त्वपूर्ण बिजौलिया किसान आंदोलन का नेतृत्व किया; ब्रिटिश प्रशासकों ने उनकी उग्रता के कारण उन्हें 'बोल्शेविक' कहा।
- उन्हें देश का सबसे पहला झंडा गीत देने का श्रेय प्राप्त है, और उन्होंने राजस्थान केसरी (1920) तथा नवीन राजस्थान/तरुण राजस्थान (1921) समाचार-पत्र शुरू किए; उनकी मृत्यु 28 मई, 1954 को टॉडगढ़ जेल में हुई।
🗡️बारहठ परिवार — केसरीसिंह, जोरावरसिंह व प्रतापसिंह
- 21 नवंबर, 1872 ई. को शाहपुरा में जन्मे कवि-क्रांतिकारी केसरीसिंह बारहठ ने 13 सोरठों 'चेतावनी रा चूँगट्या' की रचना कर महाराणा फतहसिंह को 1903 ई. के दिल्ली दरबार में जाने से रोका; रासबिहारी बोस ने उन्हें राजस्थान में सशस्त्र क्रांतिकारी दल का सम्पूर्ण दायित्व सौंपा था, और उनका निधन 1941 ई. में हजारीबाग जेल में हुआ।
- उनके भाई जोरावर सिंह बारहठ, जिन्हें 'राजस्थान का चन्द्रशेखर' कहा जाता है, ने 23 दिसंबर, 1912 ई. को दिल्ली के चाँदनी चौक में वायसराय लॉर्ड हार्डिंग पर बम फेंका और आजीवन पुलिस की पकड़ से बचे रहे; 1939 ई. में उनकी मृत्यु 'अमरदास बैरागी' के छद्म नाम से हुई।
- केसरीसिंह के किशोर पुत्र प्रतापसिंह बारहठ, जो इसी बम काण्ड में शामिल थे, को 1918 ई. के बनारस षड्यंत्र अभियोग में गिरफ्तार किया गया, और जेल यातनाओं से 7 मई, 1918 को बरेली जेल में उनका निधन हुआ; उन्होंने कहा था कि शरीर की बोटी-बोटी कटने पर भी वे अपने पथ से नहीं डिगेंगे।
🪔सेठ जमनालाल बजाज
- 4 नवंबर, 1889 ई. को काशी का बास (सीकर) में जन्मे जमनालाल बजाज को गांधीजी का 'पाँचवाँ पुत्र' कहा जाता था; 1921 ई. के असहयोग आंदोलन के दौरान उन्होंने अंग्रेजों से मिला 'रायबहादुर' का खिताब लौटा दिया और भामाशाह की भाँति अपनी सम्पूर्ण पूँजी देशहित में लगा दी।
- वे 1938-42 ई. तक जयपुर प्रजामंडल के अध्यक्ष रहे, 1921 ई. में वर्धा में सत्याग्रह आश्रम व राष्ट्रभाषा प्रचार समिति तथा 1942 ई. में जयपुर में चरखा संघ की स्थापना की, और नवजीवन, राजस्थान केसरी व त्यागभूमि जैसे पत्रों को वित्तीय सहायता दी।
- 53 वर्ष की आयु में 11 फरवरी, 1942 को उनका निधन हुआ; 1970 ई. में उनकी स्मृति में एक डाक टिकट जारी किया गया।
📣जयनारायण व्यास
- 18 फरवरी, 1899 ई. को जोधपुर में जन्मे जयनारायण व्यास, जिन्हें 'शेर-ए-राजस्थान' कहा गया, राजस्थान के वे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने जागीरदारी प्रथा की समाप्ति व उत्तरदायी शासन की स्थापना की माँग उठाई।
- उन्होंने 1927 ई. से 'तरुण राजस्थान' का सम्पादन किया, मारवाड़ हितकारिणी सभा, मारवाड़ यूथ लीग व मारवाड़ लोक परिषद् की स्थापना की, तथा भारत छोड़ो आंदोलन (1942) के दौरान सिवाणा किले में नजरबंद रहे।
- 1948 ई. में वे जोधपुर रियासत की उत्तरदायी सरकार के प्रधानमंत्री बने, और बाद में दो बार 1951-52 व 1952-54 में राजस्थान के मुख्यमंत्री रहे; जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय का नामकरण उन्हीं के सम्मान में किया गया।
🌱माणिक्यलाल वर्मा
- 4 दिसंबर, 1887 ई. को बिजौलिया (भीलवाड़ा) में जन्मे और 'मेवाड़ के गांधी' कहे जाने वाले माणिक्यलाल वर्मा ने 1934 ई. में नारेली में सेवाश्रम व 1938 ई. में मेवाड़ प्रजामंडल की स्थापना की।
- उनकी पुस्तक 'मेवाड़ का वर्तमान शासन' में किसानों पर हुए सामंती अत्याचारों का वर्णन है; वे आगे चलकर संयुक्त राजस्थान राज्य के प्रधानमंत्री बने।
🎖️पं. हीरालाल शास्त्री
- 24 नवंबर, 1899 ई. को जोबनेर (जयपुर) में जन्मे हीरालाल शास्त्री ने 1929 ई. में 'जीवन कुटीर' की स्थापना की, जो आगे चलकर प्रसिद्ध वनस्थली विद्यापीठ बनी, और जयपुर प्रजामंडल अध्यक्ष के रूप में 1942 ई. के जेंटिलमेंस एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर किए।
- 1948 ई. में उन्होंने जयपुर के लोकप्रिय मंत्रिमंडल का नेतृत्व किया और आगे चलकर राजस्थान के प्रथम मुख्यमंत्री बने; उनका निधन 28 दिसंबर, 1974 को हुआ।
🕯️सागरमल गोपा
- 3 नवंबर, 1900 ई. को जैसलमेर में जन्मे सागरमल गोपा ने जैसलमेर प्रजामंडल (1932) व जैसलमेर प्रजा परिषद् (1936-37) की स्थापना की, और उन्हें जैसलमेर के निरंकुश शासन के विरुद्ध राजनीतिक जागरण का श्रेय दिया जाता है।
- राजद्रोह के आरोप में उन्हें महारावल जवाहरसिंह के आदेश पर जेल में यातनाएँ दी गईं, और 3 अप्रैल, 1946 को उन्हें जिंदा जला दिया गया, जिससे अगले दिन उनका निधन हो गया — यह आंदोलन के सबसे मार्मिक बलिदानों में से एक है।
🩸बालमुकुंद बिस्सा
- 'राजस्थान के जतिनदास' कहे जाने वाले बालमुकुंद बिस्सा का जन्म 1908 ई. में पीलवा गाँव (डीडवाना-कुचामन) में हुआ; उन्होंने चरखा संघ व खद्दर भण्डार की स्थापना की।
- 9 जून, 1942 को भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान वे जेल गए, जहाँ यातना, भूख हड़ताल व भीषण गर्मी की लू के कारण गंभीर रूप से बीमार हो गए, और 19 जून, 1942 को उनका निधन हुआ।
🏹आदिवासी नेता — गोविन्द गिरी व मोतीलाल तेजावत
- 20 दिसंबर, 1858 ई. को बेडसा (डूँगरपुर) में जन्मे गोविन्द गिरी ने सम्प सभा (1883) के माध्यम से भील समुदाय को संगठित किया; 17 नवंबर, 1913 ई. को मानगढ़ पहाड़ी पर एकत्र उनके अनुयायियों पर अंग्रेजी सेना ने गोलियाँ चलाईं, जिसमें भीषण नरसंहार हुआ।
- 1888 ई. में कोलियारी (उदयपुर) में जन्मे मोतीलाल तेजावत, जिन्हें 'आदिवासियों के बावजी' कहा जाता है, ने शोषण के विरुद्ध आदिवासी समुदायों को एकजुट करने हेतु 1921 ई. में 'एकी आंदोलन' का नेतृत्व किया।
महिला स्वतंत्रता सेनानी व अमर शहीद
वे महिलाएँ जो सामाजिक बंधनों को तोड़कर संघर्ष में उतरीं, और वे शहीद जिनके बलिदान ने अंततः स्वाधीनता का मार्ग प्रशस्त किया।
🕊️जानकी देवी बजाज
- 7 जनवरी, 1893 ई. को जावरा में जन्मी जानकी देवी बजाज — जमनालाल बजाज की पत्नी — ने खादी, गौ-सेवा व कूप-निर्माण जैसे कार्यों के माध्यम से महिलाओं को संगठित किया, और अखिल भारतीय मारवाड़ी महिला सम्मेलन (1933) की अध्यक्षता की।
- 1956 ई. में वे भूदान व कूपदान आंदोलनों में सक्रिय भूमिका के लिए पद्मविभूषण पाने वाली प्रथम महिला — तथा राजस्थान की प्रथम हस्ती — बनीं।
🌾नारायणी देवी वर्मा
- 1902 ई. में सिंगोली में जन्मी नारायणी देवी वर्मा — माणिक्यलाल वर्मा की पत्नी — ने 1939 ई. में उनके जेल जाने पर मेवाड़ प्रजामंडल का संचालन किया, और 1942 ई. में भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लेने पर स्वयं भी जेल गईं।
- उन्होंने भीलवाड़ा में महिला आश्रम (1944) तथा अपने पति के साथ मिलकर आदिवासी कन्या छात्रावास (1952-53) की स्थापना की, और आगे चलकर 1970 से 1976 तक राज्यसभा की सदस्य रहीं।
🌸कालीबाई भील
- डूँगरपुर की 13 वर्षीय भील बालिका कालीबाई को जून 1947 ई. में रास्तापाल में रियासती पुलिस ने गोली मार दी, जब वह सेवा संघ द्वारा संचालित पाठशालाओं पर हो रही कार्रवाई के दौरान अपनी शिक्षिका सेंगाबाई की रक्षा करने का प्रयास कर रही थी।
- वह आंदोलन के दौरान कभी जेल नहीं गईं, फिर भी वे इसके सबसे मार्मिक शहीदों में गिनी जाती हैं; रास्तापाल में उनका स्मारक तथा डूँगरपुर के गैब सागर के निकट उनकी प्रतिमा स्थापित है।
🚶♀️अंजना देवी चौधरी
- रामनारायण चौधरी की पत्नी अंजना देवी चौधरी ने 1939 ई. के सीकर सत्याग्रह का नेतृत्व किया और बिजौलिया व बूँदी किसान आंदोलनों में महिलाओं को संगठित किया; वे स्वाधीनता आंदोलन के दौरान गिरफ्तार होकर निर्वासित की जाने वाली प्रथम राजस्थानी महिला थीं।
🎗️रतनशास्त्री एवं अन्य उल्लेखनीय महिलाएँ
- हीरालाल शास्त्री की पत्नी रतनशास्त्री ने वनस्थली विद्यापीठ का संचालन किया और बाल-कल्याण में योगदान हेतु पद्मश्री (1955) व पद्मभूषण (1975) दोनों पाने वाली राजस्थान की प्रथम व एकमात्र महिला बनीं।
- बूँदी की सत्यभामा, जिन्हें 'गांधीजी की मानस पुत्री' कहा जाता है, ने 1932 ई. के ब्यावर-अजमेर आंदोलन का नेतृत्व किया और अपने दो बच्चों के साथ जेल गईं; उदयपुर की शांता त्रिवेदी ने 1947 ई. में महिला परिषद की स्थापना की, और कहा कि आर्थिक सशक्तीकरण के बिना राजनैतिक स्वतंत्रता का कोई अर्थ नहीं।
🕯️अमर शहीद
- ठाकुर छत्रसिंह व ठाकुर पंचमसिंह को 12 नवंबर, 1946 को तसीमो (धौलपुर) में एक प्रजामंडल सभा के दौरान तिरंगे की रक्षा करते हुए गोली मार दी गई; किसान चुन्नीलाल शर्मा, रघुराम, रामाराम व पन्नाराम चौधरी लाडनूँ के निकट 13 मार्च, 1947 ई. को किसान सम्मेलन में जागीरदारों की गोलीबारी में मारे गए।
- 19 जून, 1947 ई. को रास्तापाल (डूँगरपुर) में पुलिस ने नानाभाई खाँट को पीट-पीटकर मार डाला और कालीबाई भील को गोली मार दी, जब दोनों सेवा संघ द्वारा संचालित पाठशाला की रक्षा कर रहे थे; जयपुर में 20 मई, 1948 को किसान लूणकरण, खूबाराम, रामकरण व मोरिजा जागीरदारों की अतिरिक्त लाग-बाग वसूली का विरोध करते हुए गोली से मारे गए।