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राजस्थान GK

लोक संगीत, वाद्ययंत्र, लोक नृत्य एवं लोक नाट्य

Folk Music, Instruments, Dance & Theatre

राजस्थान की शास्त्रीय व लोक संगीत परंपरा, अनूठे वाद्ययंत्रों, रंग-बिरंगे लोकनृत्यों एवं जीवंत लोकनाट्यों की सैर - घरानों से लेकर गवरी व घूमर तक।

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संगीत विरासत: घराने एवं गायन शैलियाँ

Musical Heritage: Gharanas & Singing Styles

वैदिक ऋचाओं से लेकर राजदरबारों तक - जानिए कैसे भारतीय शास्त्रीय संगीत का विकास हुआ और सदियों में घराने व गायन शैलियाँ किस तरह पनपीं।

🕉️उद्गम एवं विकास

  • भारतीय संगीत की परंपरा प्रागैतिहासिक काल से मानी जाती है; ऋग्वेद में वर्णित नटराज शिव का डमरू संसार का सबसे प्राचीन वाद्य माना जाता है - शिव को डमरू व पिनाक का तथा विष्णु को शंख का जनक माना जाता है।
  • चार वेदों में सामवेद संगीत से जुड़ा वेद है, और गुप्तकाल को भारतीय साहित्य व संगीत का स्वर्णयुग कहा जाता है।
  • मुगल दरबार में संगीत खूब फला-फूला - अकबर के दरबार में तानसेन व बैजू बावरा जैसे कलाकार थे - हालाँकि बाद में औरंगजेब की कट्टर नीतियों ने इसे दबाने का प्रयास किया; स्वतंत्रता के बाद भारतीय संगीत निरंतर आगे बढ़ा है और अब विदेशों में भी इसकी पहचान बनी है।
  • रवीन्द्रनाथ टैगोर ने लोक संगीत को संस्कृति की वह कला बताया जो आनंददायक व मनोहर भाव व्यक्त करती है, तो महात्मा गांधी ने लोकगीतों को जनभाषा और संस्कृति का रखवाला कहा।

🎻घराना परंपरा

  • घराना गुरु-शिष्य परंपरा की वह विशिष्ट धारा है जो एक खास गायन, वादन या नृत्य शैली को जन्म देती है; इस परंपरा की शुरुआत तानसेन के वंश से मानी जाती है।
  • जयपुर घराना, जिसके प्रवर्तक मनरंग (भूपत खाँ) दिल्ली घराने के प्रवर्तक सदारंग के पुत्र थे, ख्याल गायकी के लिए जाना जाता है; इसकी उपशाखाओं में पटियाला घराना (अली बख्श व फतेह अली द्वारा स्थापित, गायक गुलाम अली से जुड़ा) तथा महाराजा रामसिंह के दरबारी रज्जब अली खाँ बीनकार का जयपुर बीनकार घराना शामिल हैं।
  • अत्रौली घराना ध्रुवपद गायक साहब खाँ व अल्लादिया खाँ की परंपरा से विकसित हुआ और आगे चलकर किशोरी अमोणकर जैसी गायिका दी, वहीं मेवाती घराना, जिसके प्रवर्तक उस्ताद घघे नजीर खाँ थे, पं. जसराज व पं. मणिराम के कारण विख्यात है।
  • अन्य प्रमुख घरानों में डागर घराना (ध्रुपद, प्रवर्तन का श्रेय बहराम खाँ डागर को), आगरा घराना (हाजी सुजान खाँ), ग्वालियर घराना (अब्दुल्ला खाँ व कादिर बख्शा), किराना घराना (बन्दे अली खाँ, बाद में भीमसेन जोशी का घराना), दिल्ली घराना (सदारंग, ख्याल गायकी के जनक) व रमजान खाँ 'मियाँ रंगीले' का रंगीला घराना शामिल हैं; तानसेन के पुत्र सूरत सेन का जयपुर सेनिया घराना सितार-वादन में विशिष्ट था, और भानुजी महाराज द्वारा स्थापित जयपुर कथक घराना कथक नृत्य के उद्भव को 13वीं सदी के राजस्थान से जोड़ता है।

🪘ध्रुपद एवं उसकी वाणियाँ

  • ध्रुपद, हिन्दुस्तानी शास्त्रीय गायन की सबसे प्राचीन व वीर रस से ओतप्रोत शैली, ग्वालियर के राजा मानसिंह तोमर से जुड़ी मानी जाती है; अकबर के दरबार में तानसेन, उनके गुरु स्वामी हरिदास, डागर, नायक बैजू व गोपाल इसके जाने-माने गायक थे, तथा पखावज, मृदंग व तबला इसकी संगत करते हैं।
  • मधुभट्ट तैलंग को राजस्थान का पहला ध्रुपद गायक माना जाता है; ध्रुपद की चार वाणियाँ हैं - खंडार वाणी (खंडार गाँव से, राजा समोखन सिंह/नौशाद खाँ से संबद्ध), डागुर वाणी (स्वामी हरिदास से जुड़ी), नौहार वाणी (हाजी सुजान खाँ) व गोबरहार वाणी (तानसेन से संबद्ध)।

🎤ख्याल एवं धमार

  • ख्याल गायन के प्रवर्तक जौनपुर के सुल्तान हुसैन शाह शर्की माने जाते हैं, पर 18वीं सदी में मुहम्मद शाह रंगीले के दरबारी गायक नियामत खाँ 'सदारंग' व अदारंग ने इसे स्थायी प्रतिष्ठा दिलाई; यह स्वर-प्रधान शैली तबले की संगत में गाई जाती है।
  • धमार, ध्रुपद जैसी ही एक मध्यकालीन शैली, ग्वालियर नरेश मानसिंह तोमर की रानी गुर्जरी के गुरु बैजू बावरा की देन है; पखावज या मृदंग की संगत में गाई जाने वाली यह शृंगार रस व लय-प्रधान शैली है, जिसके कलाकारों में विलायत हुसैन खाँ व फैयाज खाँ शामिल हैं।

💃ठुमरी, टप्पा, दादरा एवं तराना

  • ठुमरी, तबले की संगत वाली शृंगार-प्रधान शैली, पहले मतंग व शारंगदेव द्वारा 'गौड़ी' कही जाती थी और बाद में मुगल दरबारों में नया नाम पाई; नवाब वाजिद अली शाह 'अख्तर पिया' को इसका आविष्कारक माना जाता है, गिरिजा देवी जैसी गायिकाओं के साथ।
  • टप्पा का आविष्कार लखनऊ के नवाब आसफुद्दौला (1776-97) के समय गायक मियाँ गुलाम नबी 'मियाँ शौरी' ने किया; बनारस में बड़ी मोतीबाई व गिरिजा देवी जैसे गायक इसमें प्रसिद्ध रहे, वहीं अमीर खुसरो की तराना शैली, जो वीर व चमत्कार भाव व्यक्त करती है, आज भी उत्तर भारत में लोकप्रिय है।

📜अन्य गायन विधाएँ

  • दादरा, दादरा ताल में गाई जाने वाली शृंगार-प्रधान शैली पूर्वी उत्तरप्रदेश की विशेषता है, वहीं चैती - संस्कृत के 'चैत्री' से बना नाम - चैत्र मास से गाई जाती है, जिसमें शृंगार व भक्ति दोनों भाव मिलते हैं।
  • स्वर मालिका में राग के स्वरों को अर्थपूर्ण शब्दों की बजाय बंदिश में पिरोया जाता है; लक्षण गीत मुख्यतः अभ्यास हेतु किसी राग के लक्षणों का वर्णन करते हैं; चतुरंग एक ही रचना में चार प्रकार का आनंद देता है; और सरगम किसी राग के स्वरों को एक ताल में बाँधकर मधुर रचना बनाता है।

📚राजस्थान के संगीत ग्रंथ

  • महाराणा कुंभा ने संगीतराज, संगीत मीमांसा व रसिकप्रिया (गीत गोविंद की टीका) की रचना की, जबकि जयपुर के महाराजा माधोसिंह व मानसिंह के आश्रित कवि पुण्डरीक विट्ठल ने रागमाला, रागमंजरी व नर्तन निर्णय जैसे ग्रंथ लिखे।
  • सवाई प्रतापसिंह ने स्वयं संगीत सार तथा काव्य-संग्रह 'ब्रजनिधि ग्रन्थावली' रची, वहीं उनके दरबारी कवियों ने ब्रजपाल भट्ट का राधागोविंद संगीत सार, गणपत भारती का संगीत सागर व उस्ताद चाँद खाँ का स्वर सागर जैसे ग्रंथ रचे; बीकानेर महाराजा अनूपसिंह ने संगीतानुपराग व संगीत विनोद रचवाए, और उनके दरबारी संगीतज्ञ भावभट्ट ने अनूप संगीत विलास सहित कई ग्रंथ लिखे।

🏛️संगीत शब्दावली एवं संस्थाएँ

  • मध्यकाल में मंदिरों के विध्वंस के चलते भक्ति-आराधना व उससे जुड़ी ध्रुपद-कीर्तन गायकी हवेलियों में पनपी, जिसे 'हवेली संगीत' कहा गया और जो आज भी नाथद्वारा, कांकरोली, जयपुर व कोटा के मंदिरों में जीवंत है; वहीं रागमाला ग्रंथों ने रागों से उपजे भावों को मानुषी रूप देकर संगीत, काव्य व चित्रकला का अनूठा संगम रचा।
  • महाराजा सवाई जयसिंह का 'गुणीजनखाना' विभाग कुशल गायकों, वादकों व नर्तकों को राज्याश्रय देता था, जबकि 'नक्कारखाना' महल के वाद्ययंत्रों का संग्रह-विभाग था; जनाना महलों के बाहर प्रातः-सायं गायन करने वालों को 'पुरबिये' तथा राजदरबार में गायन-नर्तन कर मनोरंजन करने वाली महिलाओं को 'गायण' कहा जाता था।
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राजस्थान के महान संगीतज्ञ एवं कलाकार

Legendary Musicians & Artists of Rajasthan

राजसी दरबारों से लेकर विश्व मंच तक - राजस्थान की संगीत-प्रतिभा को आगे बढ़ाने वाले राजसी संरक्षकों, विलक्षण वादकों व पद्म सम्मान प्राप्त कलाकारों से मिलिए।

👑संगीत के राजसी संरक्षक

  • जयपुर के सवाई प्रताप सिंह संगीत व चित्रकला के महान आश्रयदाता थे, जिन्होंने विशाल संगीत सम्मेलन आयोजित करवाया, 'राधागोविंद संगीत सार' ग्रंथ रचवाया और बाईस विद्वान संगीतज्ञों की मंडली 'गंधर्व बाईसी' रखी; वे स्वयं 'ब्रजनिधि' उपनाम से काव्य रचते थे, तथा उस्ताद चाँद खाँ उनके संगीत गुरु व गणपति भारती काव्य गुरु थे।
  • बीकानेर के महाराजा अनूपसिंह ने औरंगजेब की कट्टरता से बचकर आए शाही दरबारी संगीतज्ञों को शरण दी, जिनमें संगीतज्ञ भावभट्ट भी थे; 'अभिनव भरताचार्य' जैसी उपाधियों से सम्मानित महाराणा कुंभा ने संगीत के महत्वपूर्ण ग्रंथ रचे, और उनकी पुत्री रमाबाई भी प्रसिद्ध संगीतज्ञ थीं जिन्हें 'वागीश्वरी' कहा गया।

🎸सितार, सरोद एवं संतूर के दिग्गज

  • पं. रविशंकर - मैहर के उस्ताद अलाउद्दीन खाँ के प्रमुख शिष्य व नृत्यकार पं. उदयशंकर के छोटे भाई - विश्व के अग्रणी सितारवादकों में गिने गए और उन्हें अमेरिका का ग्रैमी पुरस्कार मिला; उदयपुर में जन्मे उदयशंकर स्वयं प्रख्यात कथक व बैले नर्तक थे।
  • जयपुर के पं. विश्वमोहन भट्ट ने 1994 में राईकूडर संग बनाई डिस्क 'A Meeting by the River' पर ग्रैमी पुरस्कार जीता व नया राग 'गौरीमा' रचा; उन्होंने पश्चिमी गिटार में 14 तार जोड़कर वीणा, सरोद व सितार के मेल वाला 'मोहनवीणा' वाद्य भी बनाया - उनके बड़े भाई शशिमोहन भट्ट भी प्रसिद्ध सितारवादक थे।
  • राजस्थान के पं. शिवकुमार शर्मा संतूर वाद्य से जुड़े हैं, बसंत काबरा (जन्म 9 मई 1959, जोधपुर) मैहर सेनिया घराने के सरोद वादक हैं, तथा अलवर के असद अली खान रुद्रवीणा से संबद्ध रहे।

🎙️डागर घराने के ध्रुपद उस्ताद

  • डागर घराने के जहीरुद्दीन व फैयाजुद्दीन डागर ने ध्रुपद में जुगलबंदी की परंपरा शुरू कर इसे नया रूप दिया; जयपुर में रामगंज चौपड़ के निकट घराने का पुश्तैनी मकान आज भी 'बहराम खाँ की चौखट' कहलाता है, और जियाउद्दीन, रहीमुद्दीन, रियाजुद्दीन व अमीनुद्दीन खाँ इसी वंश के अन्य प्रसिद्ध गायक हैं।

🐍गुलाबो सपेरा एवं कालबेलिया की विश्व-यात्रा

  • गुलाबो सपेरा, जिनका जन्म 1969 में अजमेर के कोटड़ा गाँव के सपेरा परिवार में हुआ, ने कालबेलिया नृत्य को विश्व मंच तक पहुँचाया, जिसके लिए उन्हें 2000-01 में राजस्थान संगीत नाटक अकादमी सम्मान व 2016 में पद्मश्री मिला।

🎭स्वांग-कला के उस्ताद

  • बहुरूपिया कला में निष्णात भीलवाड़ा के जानकीलाल भांड ने बंदर का स्वांग रचकर 'मंकी मैन' के रूप में विश्वभर में ख्याति पाई और 2024 में पद्मश्री प्राप्त किया; जयपुर के मूर्तिकार अर्जुन प्रजापति, जिन्हें बिल क्लिंटन ने 'मूर्तिकला का जादूगर' कहा, ने बणी-ठणी कला को नया रूप दिया और राजस्थान का पहला मूर्ति शिल्प संग्रहालय 'माटी मानस' बनाया - उन्हें 2010 में पद्मश्री मिला था (निधन 12 नवम्बर 2020)।

🏅हाल के पद्मश्री सम्मानित कलाकार

  • शास्त्रीय ध्रुपद गायकी के प्रचारक तथा 2001 से 'ध्रुवपद धाम' (राजस्थान का इकलौता ध्रुपद केंद्र) के संस्थापक-संचालक पं. लक्ष्मण भट्ट तैलंग को 2024 में पद्मश्री मिला; जयपुर के भाई अहमद हुसैन व मोहम्मद हुसैन को 2023 में तथा बीकानेर के तेजरासर गाँव के मांड गायक बंधु अली मोहम्मद व गनी मोहम्मद को 2024 में पद्मश्री मिला।
  • डीग के नौटंकी कलाकार रामदयाल शर्मा को 2022 में पद्मश्री व 2015 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार मिला; 1991 के धारावाहिक 'चाणक्य' के निर्देशन व अभिनय के लिए मशहूर सिरोही के डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी को भी 2022 में पद्मश्री मिला; और जयपुर की मांड व लोक भजन गायिका बेतुल बेगम को 2021 का राष्ट्रीय नारी शक्ति पुरस्कार (प्रदत्त 2022) व 2025 में पद्मश्री मिला।
  • 'पांडुन का कड़ा' गायन के लिए डीग के कैथवाड़ा में जन्मे (26 सितंबर 1962) भपंग वादक गफरुद्दीन मेवाती को पद्मश्री, राज्य पुरस्कार (2016) व संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (1997, 2022) मिले; जैसलमेर के अलगोजा वादक तागाराम भील को 2026 में पद्मश्री मिला, और ऊँट की खाल पर स्वर्ण मीनाकारी के लिए विख्यात बीकानेर के डुलमेरा गाँव के हिसामुद्दीन उस्ता को 31 मार्च 1986 को पद्मश्री मिला।

🎶मांड गायकी की महान गायिकाएँ

  • बीकानेर की अल्लाह जिलाई बाई (1902-1992), जिन्हें 'मरुकोकिला' कहा जाता था, ने 1987 में लंदन के अल्बर्ट हॉल में प्रस्तुति दी और 1982 में पद्मश्री पाया; उनका गाया 'पधारो म्हारे देस' राजस्थान में पर्यटकों के लिए स्वागत गीत बन गया है।
  • बाड़मेर की रुकमादेवी मांगणियार समुदाय की पहली सार्वजनिक रूप से गाने वाली महिला गायिका मानी जाती हैं; बीकानेर की गवरी देवी व जयपुर की बन्नो बेगम (गायिका-नर्तकी गौहर जान की पुत्री) ने भी मांड गायकी को समृद्ध किया, जबकि जयपुर की मधु भट्ट तैलंग राजस्थान की पहली व एकमात्र ध्रुपद गायिका मानी जाती हैं।

🎧जगजीत सिंह एवं कोमल कोठारी

  • 8 फरवरी 1941 को गंगानगर में जन्मे जगजीत सिंह को 2003 में पद्मभूषण व 2012 में मरणोपरांत राजस्थान रत्न मिला; उनका पहला एल्बम 'द अनफॉरगेटेबल' था, पत्नी चित्रा सिंह भी प्रसिद्ध गायिका हैं, और उनका निधन 10 अक्टूबर 2011 को हुआ।
  • कोमल कोठारी ने राजस्थान की लोक कलाओं को विश्व मंच पर प्रतिष्ठित करने में अहम भूमिका निभाई, पद्मश्री व पद्मभूषण से सम्मानित रहे और रूपायन संस्थान के सहसंस्थापक थे।

🖌️अन्य उल्लेखनीय कलाकार

  • गणेशी लाल व्यास रियासती (प्रजामंडल) आंदोलन काल के प्रसिद्ध लोक गायक थे; जयपुर की इला अरुण राजस्थानी लोकगीतों की मशहूर गायिका हैं; बाँसवाड़ा की डॉ. वीरबाला भावसार, स्वतंत्रता सेनानी धूलजी भाई भावसार की पुत्री, परंपरागत रंगों की जगह फेविकोल व रेत से श्वेत कैनवास पर भाव उकेरती हैं; और जयपुर के नाटककार-प्रकाश संयोजक दौलतराम वैद, जिनकी कृतियों में 'बेहद नफरत के दिनों में' शामिल है, को 2022 का संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार मिला।
  • बीकानेर के बैंड मास्टर विलियम जेम्स ने राजस्थानी लोकगीतों को पाश्चात्य शैली में स्वरांकित कर अपनी पुस्तक 'Indian Music' में व्याख्या सहित प्रस्तुत किया; नवाब वाजिद अली शाह, ठुमरी के आविष्कारक होने के अलावा, स्वयं 'ललनपिया' उपनाम से ठुमरियाँ रचते थे।

🧑‍🎤राजस्थान की संगीतजीवी जातियाँ

  • कई जातियाँ संगीत को वंशानुगत पेशे के रूप में निभाती हैं - कलावंत (तानसेन के वंश से जुड़ी, जिसमें डागर घराना भी शामिल है) व कव्वाल (अजमेर की दरगाह पर अमीर खुसरो की कव्वाली परंपरा के वाहक) शास्त्रीय गायन में दक्ष हैं, जबकि पश्चिमी राजस्थान के ढाढी व मिरासी सारंगी व रबाब की संगत में विरुदावली गाते हैं।
  • मांगणियार (कमायचा, खड़ताल, सुरणाई) व लंगा (कमायचा, सारंगी, बालोतरा के बड़नावा जागीर के आसपास केंद्रित) राज्य की प्रमुख पेशेवर लोक-गायक जातियाँ हैं; केकड़ी के नागाजी जाट से उत्पत्ति मानी जाने वाली भवाई जाति करतबी नृत्य-नाट्य के लिए प्रसिद्ध है, और मूलतः घुमंतू सपेरे रहे कालबेलिया आज अपने नृत्य के लिए विख्यात हैं।
  • रामदेवजी की भक्त कामड़ जाति, विशेषकर महिलाएँ, तेरहताली नृत्य में निपुण होती हैं; भोपा अपने इष्ट देवताओं की गाथा चित्रित 'पड़' के सामने गाकर सुनाते हैं; और नाथ पंथ के अनुयायी जोगी (मुख्यतः शेखावाटी, बीकानेर व जोधपुर में बसे) सारंगी की संगत में भजन तथा गोपीचंद-भरथरी की कथा गाकर आजीविका चलाते हैं।
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राजस्थान की लोक गायन शैलियाँ एवं लोकगीत

Folk Singing Styles & Songs of Rajasthan

रेगिस्तान की गायन परंपराओं - मांड, मांगणियार व लंगा की स्वर-विरासत - तथा हर ऋतु व जीवन-प्रसंग को रंगने वाले लोकगीतों की समृद्ध दुनिया में प्रवेश कीजिए।

🏜️मांड - राजस्थान की विशिष्ट राग

  • 10वीं सदी में जैसलमेर क्षेत्र 'मांढ' कहलाता था, जिससे वहाँ गाई जाने वाली शृंगार-प्रधान शास्त्रीय लोक राग 'मांड' नाम पड़ा, जिसके जैसलमेरी, बीकानेरी, जोधपुरी व जयपुरी रूप प्रसिद्ध हैं।
  • राज्य की प्रसिद्ध मांड गायिकाओं में स्व. गवरी देवी (बीकानेर व पाली), अल्लाह जिलाई बाई, स्वर्गीय माँगीबाई, जोधपुर की जमीला बानो, बन्नो बेगम व बतूल बेगम शामिल हैं।

🪕मांगणियार गायन परंपरा

  • मूलतः सिंध प्रांत के मुस्लिम मांगणियार बाड़मेर, बालोतरा, जैसलमेर, जोधपुर व फलौदी में यजमानों के लिए मांगलिक अवसरों पर गाते हैं, मुख्यतः 6 राग व 36 रागनियों का प्रयोग करते हुए, जिनमें कमायचा व खड़ताल प्रमुख वाद्य हैं।
  • प्रमुख मांगणियार कलाकारों में ढोलक वादक रमजान खाँ, प्रसिद्ध खड़ताल वादक सद्दीक खाँ, तथा जैसलमेर के हमीरा गाँव के कमायचा वादक साकर खाँ शामिल हैं, जिन्हें 2012 में पद्मश्री मिला।

🎻लंगा गायन परंपरा

  • बीकानेर, बाड़मेर, बालोतरा, जोधपुर, फलौदी व जैसलमेर के लंगा गायक राजपूत यजमानों के मांगलिक अवसरों पर गाते हैं, जिनके मुख्य वाद्य सारंगी व कमायचा हैं; प्रमुख कलाकार फूसे खाँ, महरदीन लंगा, अल्लादीन लंगा व करीम खाँ लंगा मांड, सोरठ व भैरवी जैसे रागों में गाते हैं।

🎼तालबंदी गायिकी

  • पूर्वी राजस्थान (भरतपुर, डीग, धौलपुर, करौली, सवाईमाधोपुर) की तालबंदी गायिकी तब जन्मी जब औरंगजेब द्वारा संगीत पर पाबंदी के दौरान ब्रज के साधु-महात्मा सवाईमाधोपुर क्षेत्र आकर बस गए; इसके मुख्य वाद्य सारंगी, हारमोनियम, ढोलक, तबला, झाँझ व नगाड़ा हैं।

💌प्रेम एवं विरह के लोकगीत

  • जैसलमेर का ऐतिहासिक प्रेमाख्यान 'मूमल' लोद्रवा की राजकुमारी मूमल के सौंदर्य का बखान करता है; सिरोही का 'ढोलामारू' ढोला-मारू की प्रेमकथा सुनाता है; 'कुरजाँ' में विरहणी अपने प्रियतम तक कुरजाँ पक्षी के माध्यम से संदेश भेजती है; और 'केसरिया बालम' पति की प्रतीक्षा करती नारी की विरह-व्यथा दर्शाता है।
  • 'झोरावा' जैसलमेर में परदेस गए पति के वियोग में गाया जाने वाला गीत है, 'पणिहारी' पानी भरने वाली स्त्री पर केंद्रित है, और 'सूंवटिया' के जरिए भीलनी स्त्री परदेस गए पति को संदेश भेजती है।

🎉पर्व एवं ऋतु गीत

  • 'गोरबंद' ऊँट के गले का आभूषण दर्शाने वाला गीत मरुस्थलीय व शेखावाटी क्षेत्रों में लोकप्रिय है; 'गणगौर गीत' गणगौर पर्व पर गाया जाता है, जिसकी पंक्तियाँ हैं 'खेलण दो गणगौर भँवर म्हाने खेलण दो गणगौर'; 'घूमर गीत' गणगौर व तीज पर घूमर नृत्य के साथ गाया जाता है; और मारवाड़ में होली के बाद घुड़ला पर्व पर कन्याएँ 'घुड़ला' गीत गाती हैं।
  • 'तेजा गीत' (तेजा टेर) किसान खेती शुरू करते समय तेजाजी की भक्ति में गाते हैं; 'पीपली' शेखावाटी, बीकानेर व मारवाड़ में वर्षा ऋतु में स्त्रियों द्वारा गाया जाने वाला गीत है; और 'लोटिया' चैत्र मास के 'लोटिया पर्व' पर गाया जाता है।

👶जीवन-प्रसंगों के गीत

  • 'रातीजगा' विवाह, पुत्र जन्मोत्सव या मन्नत पूरी होने पर रातभर देवताओं के लिए गाया जाता है; 'जच्चा' (या होलर) बालक के जन्मोत्सव पर गाया जाता है; 'घोड़ी' वर की निकासी के समय गाया जाता है; और 'हालरिया' जैसलमेर क्षेत्र में बच्चे के जन्म पर गाई जाने वाली गीत-शृंखला है, जिसमें दाई, हारलोगोरा, धतूरी व खाँखलो शामिल हैं।
  • 'पावणा' नए दामाद के ससुराल आगमन पर गाया जाता है, 'कामण' बच्चों व वर को जादू-टोने से बचाने हेतु गाया जाता है, 'सीठणे' (जिन्हें 'गाली' गीत भी कहते हैं) विवाह समारोहों में गाए जाते हैं, और 'बधावागीत' किसी शुभ कार्य के सम्पन्न होने पर गाया जाता है।

🎶अन्य उल्लेखनीय लोकगीत

  • 'ओल्यूँ' किसी की याद में गाया जाता है, जैसे बेटी की विदाई पर घर की स्त्रियों द्वारा; 'काजलियो' शृंगारिक गीत विशेषकर होली पर चंग की थाप पर गाया जाता है; 'हमसीढो' उत्तरी मेवाड़ के भीलों का प्रसिद्ध गीत है जिसे स्त्री-पुरुष मिलकर गाते हैं; और हाड़ौती क्षेत्र में लोकप्रिय 'बीछूड़ो' में बिच्छू के डसने से मृत्युशैया पर पड़ी पत्नी अपने पति को दूसरा विवाह करने का संदेश देती है।
  • राजस्थान के लोकगीत भंडार में ब्रज, भरतपुर, डीग व धौलपुर के पुरुषों द्वारा गाया जाने वाला 'रसिया', मोरध्वज-सेऊसंमन-भरथरी जैसी प्रसिद्ध 'लावणी' शैली, तथा दक्षिणी-पश्चिमी पहाड़ी क्षेत्रों के आदिवासी गीत - घूघरी-केवड़ा, बीरा, चरुआ, बादली, बीछियो व शिखर आदि - भी शामिल हैं।
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राजस्थान के वाद्ययंत्र

Musical Instruments of Rajasthan

गज से बजने वाली सारंगी से लेकर गूँजते नगाड़े तक - तार, सुषिर, अवनद्ध व घन वाद्यों के चार परिवार जो राजस्थानी संगीत को उसकी विशिष्ट आवाज़ देते हैं।

🎻सारंगी, कमायचा एवं रावणहत्था

  • सागवान, केर या रोहिड़े की लकड़ी से बनी और बकरे की आंत के तारों वाली गज-वाद्य सारंगी बाड़मेर-जैसलमेर के लंगा गायकों व अलवर-भरतपुर के जोगियों द्वारा बजाई जाती है; सुल्तान खान व रामनारायण इसके प्रसिद्ध वादक हैं।
  • 27 तार (मुख्य तीन बकरे की आंत के) वाली एकल-काष्ठ वाद्य कमायचा पेशेवर मांगणियार गायकों द्वारा बजाई जाती है, जबकि आधे कटे नारियल पर बकरे का चमड़ा मढ़कर बनी रावणहत्था - घोड़े की पूँछ के बालों वाले गज से बजती - पाबूजी की फड़ बाँचते भोपों की संगत करती है।

🪕अन्य तत् वाद्य

  • नारद जी से जुड़ा एकतंतु इकतारा नाथ, कालबेलिया व साधु-भजन मंडलियों में बजता है; चार तार वाला जन्तर देवनारायणजी की कथा सुनाने वाले गूजर भोपों की संगत करता है; और डमरू जैसी आकृति वाला एकतंतु भपंग मेवात के जोगी समुदाय द्वारा 'पांडुन का कड़ा' जैसी गाथाओं के साथ बजाया जाता है।
  • अँगुली के नाखूनों से बजने वाली बारह तार की रबाज मेवाड़ के 'रम्मत लोक नाट्य' में बजती है; तन्दूरा (तम्बूरा) कामड़ गायकों के रामदेवजी भजनों की संगत करता है; अन्य तत् वाद्यों में प्याले-सिरे वाली तीन तार की चिकारा, पाँच तार की गूजरी, रोहिड़े की लकड़ी की रिन्दा, तूंबे से बनी दुकाको, सुरमंडल, तथा दोतारा, खम्मच, अपंग व गैरिये शामिल हैं।

🎺बाँसुरी, अलगोजा, शहनाई एवं पूँगी

  • सात छिद्रों वाली बाँसुरी के सबसे प्रसिद्ध वादक हरिप्रसाद चौरसिया हैं; नाक से बजाई जाने वाली, दो चार-छेद वाली बाँसुरियों के मेल से बनी अलगोजा गूजर, मेव व धाकड़ जातियों द्वारा बजाई जाती है; और सर्वश्रेष्ठ मांगलिक सुषिर वाद्य मानी जाने वाली सात-छिद्रों की शहनाई ने बिस्मिल्लाह खाँ को 2001 में भारत रत्न दिलाया।
  • साँप को मोहित करने की क्षमता के लिए मानी जाने वाली, नाक से बजने वाली पूँगी (बीन) कालबेलिया समुदाय का प्रमुख वाद्य है; बकरी की खाल से बनी मशक (बैगपाइप) आज पुलिस व सुरक्षा बलों के बैंड का मुख्य वाद्य है; और नड़-कगौर वृक्ष से बनी लगभग एक मीटर लंबी नड़ जैसलमेर के चरवाहों, भोपों व लंगा गायकों द्वारा बजाई जाती है।

🌬️अन्य सुषिर वाद्य

  • पीतल की बिगुल जैसी बाँकियाँ सरगड़ों का खानदानी वाद्य है जो शादियों में बजता है; मेवाड़ के भवाइयों की भूँगल/भेरी कभी प्रदर्शन व युद्ध से पहले गाँव वालों को बुलाने के लिए बजाई जाती थी; होठों के बीच बजने वाला छोटा लोहे का मोरचंग पश्चिमी 'ज्यूज हार्प' जैसा है; और नोकदार पीतल के करणा व तुरही कभी रणक्षेत्रों व राजदरबारों में गूँजते थे।
  • सतारा अलगोजा, बाँसुरी व शहनाई के मेल से बनी दोहरी बाँसुरी है जो गडरियों व मेघवालों द्वारा बजाई जाती है; धनुषाकार सींगा, हिरण या भैंसे के सींग से बनी सींगी (युद्ध में प्रयोग के कारण 'रणसिंगा'), मंदिरों की सर्पाकार पीतल नागफणी, लंगा कलाकारों की पूँगी से उपजी मुरला/मुरली, तथा पेपे खाँ जैसे कलाकारों की शहनाई-सम सुरनाई - इन सबके साथ शंख, हरनाई व कथौड़ी जनजाति की तारपी/तारणी भी राज्य के सुषिर वाद्यों में शामिल हैं।

🥁मृदंग, ढोल एवं नगाड़ा

  • बीजा, सवन या बड़ की लकड़ी को खोखला कर बकरे की खाल से मढ़ा मृदंग/पखावज रावल, भवाई व राबिया जाति के नृत्य में बजता है, जिसके प्रसिद्ध वादक पं. पुरुषोत्तम दास रहे; ढोलक नगारची, साँसी, कंजर, ढाढ़ी, मिरासी व भवाई जातियाँ बजाती हैं; और थाली व बाँकिया के साथ बजने वाला ढोल भीलों के गैर नृत्य व जालौर के ढोल नृत्य में प्रयुक्त होता है।
  • नगाड़ा लोकनाट्यों व गींदड़ नृत्य में बजता है, इसके बड़े रूप को 'बम' तथा राजस्थान के सभी वाद्यों में सबसे बड़े रूप को 'बंब' कहते हैं; लोहे व भैंसे की खाल की नौबत कभी मंदिरों व महल-द्वारों पर बजती थी; और मोलेला गाँव (राजसमंद) की मिट्टी की माँदल, जिसे शिव-पार्वती का वाद्य माना जाता है, भील गौरी नृत्य में बजाते हैं।

🥁अन्य अवनद्ध वाद्य

  • मुख्यतः चंग नृत्य में बजने वाला गोल वाद्य चंग तथा आम की लकड़ी का डेरू (जिसे छोटी थाली के साथ जाहर पीर व गोगाजी के भोपे बजाते हैं) हाथ-ढोल हैं; डमरू शिव का वाद्य माना जाता है व मुख्यतः मदारी बजाते हैं, इसका छोटा रूप 'डुगडुगी' है; और आम की लकड़ी की छोटी ढप-रूप खंजरी कामड़, आदिनाथ, बलाई, भील व कालबेलिया जातियाँ बजाती हैं।
  • भैंसे की खाल की धौंसा कभी दुर्गों व मंदिरों में बजती थी; मुस्लिम समुदाय में प्रचलित 'ग्रीष्म वाद्य' तासा/ताशा तथा मेवात क्षेत्र की कढ़ाई-आकार की दमामा (टामक) बड़े लोहे के ढोल हैं; और अष्टभुजाकार घेरा तथा बकरे की खाल की डफ (छोटा रूप डफली) होली के गीत-नृत्य में बजते हैं।

🔔मंजीरा, थाली एवं करताल

  • पीतल-काँसे की मंजीरा सदा जोड़े में बजती है और कामड़ महिलाओं के तेरहताली नृत्य की संगत करती है; काँसे की थाली कालबेलिया, भील व बाहेती जातियाँ बजाती हैं और यह चरी नृत्य में भी प्रयुक्त होती है; और अँगुलियों व अँगूठे में पहनकर बजाई जाने वाली करताल मंजीरे-इकतारे से मेल खाती है तथा बाड़मेर-बालोतरा-पाली के गैर नृत्य में बजती है।

🔔अन्य घन वाद्य

  • लकड़ी के चार चिकने टुकड़ों से बनी खड़ताल मांगणियार जाति का प्रमुख वाद्य है और 'करताल' से इसका नाम बना है; बाड़मेर के सद्दीक खाँ मांगणियार इसमें दक्षता के लिए 'खड़ताल का जादूगर' कहलाते हैं, जबकि गाजी खान बरना को इसके लिए 2018 का संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार मिला।
  • घुँघरू नर्तकों के पैरों में बाँधे जाते हैं, रमझोल घुटनों तक बाँधा जाता है, और बाँस की धनुषाकार लेजिम में पीतल की छोटी गोलाकार पत्तियों की जंजीर लगी होती है; मंदिर की घण्टा (घड़ियाल), लोहे की दो पट्टियों वाली चिमटा, आरती में बजने वाली झालर, तथा भरनी, कागरच्छ व घुरालियौ जैसे वाद्य राजस्थान के घन वाद्यों की सूची पूरी करते हैं।
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राजस्थान के लोक नाट्य एवं लोक नृत्य

Folk Theatre & Folk Dance of Rajasthan

खुले मैदान के ख्याल दंगलों व पवित्र गवरी से लेकर घूमती घूमर व मोहक कालबेलिया तक - राजस्थान की गलियों-चौपालों को मंच बना देने वाली प्रदर्शन-परंपराओं से रूबरू होइए।

🎭ख्याल लोकनाट्य: पश्चिमी शैलियाँ

  • ख्याल लोकनाट्य में धार्मिक, सामाजिक, ऐतिहासिक या पौराणिक आख्यान पद्यबद्ध होकर गाए जाते हैं, जिसका सूत्रधार 'हलकारा' कहलाता है और नगाड़ा-हारमोनियम इसके प्रमुख वाद्य हैं; स्व. नानूराम राणा से प्रसिद्ध शेखावाटी का ख्याल सीकर-चिड़ावा क्षेत्र में फला-फूला, वहीं लच्छीरामजी द्वारा स्थापित नागौर का कुचामनी ख्याल ओपेरा जैसा है, जिसमें कलाकार स्वयं गाते हैं।
  • दौसा-लालसोट-सवाईमाधोपुर का हेला ख्याल बड़े नगाड़े 'बम' से शुरू होता है और इसकी पहचान लंबी 'हेला' पुकार है, वहीं अलवर का अलीबख्शी ख्याल मुण्डावर के राव अलीबख्श से जुड़ा है; करौली-भरतपुर का कन्हैया ख्याल गूजर-मीणा-माली कलाकारों के 'दंगल' के रूप में रामायण-महाभारत की कथाएँ प्रस्तुत करता है, और जयपुरी ख्याल में स्त्री पात्रों की भूमिका स्त्रियाँ स्वयं निभाती हैं।

🥁तुर्रा-कलंगी एवं रम्मत

  • तुर्रा-कलंगी की शुरुआत चंदेरी के हिन्दू संत तुकनगीर (तुर्रा, शिव का प्रतीक) व मुस्लिम संत शाह अली (कलंगी, पार्वती का प्रतीक) के बीच काव्य-प्रतिस्पर्धा से हुई; यह लगभग 400 वर्ष पूर्व मेवाड़ पहुँची, जहाँ चंग की थाप पर 20 फुट ऊँचे मंच पर होने वाले 'बैठक'/'गम्मत' दंगलों में तुर्रा अखाड़े का झण्डा भगवा व कलंगी का हरा होता है।
  • जैसलमेर व बीकानेर में ख्याल को 'रम्मत' कहा जाता है, जिसकी शुरुआत जैसलमेर में कवि तेज ने की; इसका गढ़ बीकानेर है, विशेषकर आचार्यों का चौक, जहाँ फाल्गुन शुक्ल अष्टमी से होलिका दहन तक 'अमर सिंह राठौड़ की रम्मत' जैसी रम्मतें मंचित होती हैं, जिन्हें मुख्यतः पुष्करणा ब्राह्मण 'रमतिये' निभाते हैं और मंच 'पाटा' कहलाने से यह परंपरा 'पाटा-संस्कृति' कहलाई।

🎪तमाशा एवं नौटंकी

  • महाराष्ट्र की शैली से प्रभावित जयपुर का तमाशा 1594 ई. में शुरू हुआ, जब आमेर के मानसिंह प्रथम के समक्ष मोहन कवि रचित 'धमाका मंजरी' खेली गई; महाराजा प्रतापसिंह के संरक्षण में सारंगी, तबला, नक्कारा व हारमोनियम की संगत से खेला जाने वाला यह होली पर 'जोगी-जोगन' व चैत्र अमावस्या पर 'गोपीचन्द' जैसी प्रस्तुतियाँ देता है।
  • भरतपुर-डीग-धौलपुर-करौली-सवाईमाधोपुर में प्रचलित नौटंकी, जो उत्तरप्रदेश की हाथरसी शैली से प्रभावित है, को राजस्थान में डीग के भूरीलाल लाए; नौ प्रकार के वाद्यों (मुख्यतः नगाड़ा, ढोलक व सारंगी) से खेली जाने वाली इसकी प्रसिद्ध कथाओं में राजा भर्तृहरि व सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र-तारामती शामिल हैं, तथा पद्मश्री विजेता रामदयाल शर्मा इसके प्रसिद्ध कलाकार हैं।

🐂गवरी एवं स्वांग-बहुरूपिया

  • उदयपुर-सलूम्बर-डूँगरपुर-बाँसवाड़ा के भीलों का श्रद्धेय 'मेरुनाट्य' गवरी (या राई) शिव-भस्मासुर की कथा को भाद्रपद एकम् से आश्विन नवमी तक, 40 दिन नंगे पाँव, मंचित करता है; इसे केवल भील ही खेल सकते हैं, स्त्री-भूमिका पुरुष निभाते हैं, और इसके पाँच मुख्य पात्र हैं राई, दोनों राइयाँ, झामट्या व पाट भोपा।
  • स्वांग में एक कलाकार किसी ऐतिहासिक, पौराणिक या प्रसिद्ध चरित्र की वेशभूषा धारण कर उसकी नकल करता है - भीलवाड़ा के मांडल का 'नारों का स्वांग' विशेष प्रसिद्ध है - वहीं इससे मिलती-जुलती बहुरूपिया कला में केलवा के परशुराम व पद्मश्री विजेता भीलवाड़ा के जानकी लाल माहिर रहे, जिन्होंने इसे विदेशी उत्सवों तक पहुँचाया।

🪆भवाई, लीलाएं एवं कठपुतली

  • मूलतः गुजरात से आई पर राजस्थान के सीमावर्ती क्षेत्रों में लोकप्रिय भवाई नाट्य नृत्य के साथ चमत्कारिक करतब दिखाता है और भवाई जाति द्वारा सारंगी, नफीरी, नगाड़ा व मंजीरे की संगत में खेला जाता है; रासलीला (श्रीकृष्ण-चरित्र, वल्लभाचार्य से संबद्ध, फुलेरा केंद्र) व रामलीला (श्रीराम-चरित्र, तुलसीदास द्वारा प्रारंभ, बिसाऊ व डीग-भरतपुर में विशेष) राजस्थान की दो प्रमुख लीला-परंपराएँ हैं।
  • घोसूण्डा व बस्सी में मंचित सनकादिकों की लीला विष्णु के नृसिंह अवतार द्वारा हिरण्यकश्यप वध को दर्शाती है; टोंक का चारबैंत नवाब फैजुल्ला खाँ के समय शुरू हुई संगीतमय दंगल-विधा है; और अमरसिंह राठौड़ जैसे खेलों के लिए प्रसिद्ध कठपुतली लोकनाट्य में सूत्रधार मुँह में विशेष सीटी रखकर कठपुतलियों को 'बोल' देता है।

🎬पारसी रंगमंच एवं राजस्थानी नाटक

  • राजस्थान का पहला पारसी थियेटर, जयपुर का 'रामप्रकाश थियेटर', महाराजा रामसिंह द्वितीय ने 1878 में बनवाया; झालावाड़ शासक भवानीसिंह ने 1921 में ऑपेरा शैली की 'भवानी नाट्य शाला' तथा बीकानेर के गंगासिंह ने 'गंगा थियेटर' बनवाया - इन्होंने भरतपुर ड्रामेटिक कम्पनी व जोधपुर की राजपूताना-मालवा थियेट्रिकल कम्पनी जैसी मंडलियों को पोषित किया।
  • कन्हैयालाल पँवार को राजस्थानी नाटकों का जनक माना जाता है, तो माणिक्य लाल डांगी व गणपत लाल डांगी ने राज्य के रंगमंच को नई दिशा दी; 'वल्लभ' व 'अछूत' जैसे नाटकों के लिए प्रसिद्ध देवीलाल सामर का इस परंपरा में बड़ा स्थान है, साथ ही लोकदेवता तेजाजी के आख्यान पर आधारित पं. गणेशचंद जोशी का लोकप्रिय नाटक 'सर्पदंशन' भी उल्लेखनीय है।

🏹भीलों एवं गरासियों के लोकनृत्य

  • मेवाड़-बाड़मेर में प्रसिद्ध भीलों का गैर नृत्य ढोल-बाँकिया-थाली की संगत में गोल घेरे में 'खांडा' नामक लाठियों से नकली भिड़ंत दिखाता है, वहीं 'पुरिया' (शिव) पात्र-प्रधान गवरी/राई नृत्य-नाटिका में कलाकार सवा माह घर-परिवार त्यागकर नंगे पाँव प्रस्तुति देते हैं; अन्य भील नृत्यों में युद्ध नृत्य, विवाह का द्विचकी व महिलाओं का घूमरा शामिल हैं।
  • सिरोही के गरासिया बिना वाद्य के 'वालर' नृत्य, मेलों-शादियों का 'लूर', पंक्तिबद्ध 'कूद' व वृत्ताकार 'माँदल' नृत्य (महिला या सम्मिलित) करते हैं, साथ ही गणगौर पर आनुष्ठानिक 'गौर' नृत्य व होलिका-पूर्व ढोल की गहरी थाप पर वृत्ताकार 'जवारा' नृत्य भी करते हैं।

🔥क्षेत्रीय एवं जातीय नृत्य

  • शेखावाटी का पुरुष-प्रधान गींदड़ नृत्य होली पर वृत्त में डांडिया भिड़ाता है, जिसमें साधु व सरदार जैसे पात्र होते हैं; क्षेत्र की कच्छी घोड़ी में पुरुष बाँस की घोड़ियाँ बाँधकर नकली तलवारबाजी दिखाते हैं; और जालौर के ढोल नृत्य में नर्तक मुँह में तलवार दबाए ढोल बजाता है।
  • बीकानेर के कतरियासर गाँव में जन्मी जसनाथी सम्प्रदाय की अग्नि नृत्य परंपरा में साधक जलते अंगारों ('धूणा') पर 'फतै-फतै' कहते हुए नाचते हैं; मारवाड़ का प्रतिनिधि डांडिया नृत्य गायकों-वादकों के इर्द-गिर्द डंडे भिड़ाता है; और अलवर-भरतपुर का पुरुष-प्रधान बम नृत्य, जिसे 'बमरसिया' भी कहते हैं, बड़े नगाड़े की थाप पर नई फसल का उत्सव मनाता है।

🐍कालबेलिया एवं व्यावसायिक नृत्य

  • बीन, डफ व पूँगी की संगत में होने वाला 'स्नैक चार्मर डांस' कालबेलिया नर्तकियों की अद्भुत काया-लोच - पलकों से अँगूठी उठाना, मुँह से नोट उठाना - दिखाता है और 2010 में यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची में शामिल हुआ; इसका युगल रूप 'शंकरिया' सबसे मनमोहक माना जाता है।
  • उदयपुर संभाग का भवाई नृत्य सिर पर 7-8 मटके संतुलित करते हुए थाली के किनारे पर नाचता है; तेरहताली नृत्य में बाबा रामदेव की भक्त कामड़ महिलाएँ शरीर पर नौ मंजीरे बाँधकर व मुँह में नंगी तलवार लिए बैठे-बैठे नृत्य करती हैं; और हाड़ौती क्षेत्र का चकरी नृत्य कंजर जाति द्वारा ढप, मंजीरा व नगाड़े की संगत में किया जाता है।

💃सामाजिक एवं धार्मिक नृत्य

  • राजस्थानी महिलाओं का सर्वाधिक लोकप्रिय, 'लोकनृत्यों का सिरमौर' कहा जाने वाला घूमर गणगौर व नवरात्रि पर समूह में घूमकर, केवल हाथों से भाव दर्शाते हुए, 'म्हारी घूमर छे नखराळी ऐ माँ' गीत पर किया जाता है; वीर तेजाजी नृत्य में पुरुष कच्छी घोड़ी पर सवार, गले में सर्प डाले, तलवार से युद्ध-कौशल दिखाते हुए तेजाजी की कथा प्रस्तुत करते हैं।
  • राव सातल द्वारा शुरू किया गया जोधपुर का घुड़ला नृत्य चैत्र कृष्णा 8 को स्त्रियों-बालिकाओं द्वारा सिर पर मटके में जलता दीपक रखकर 'घुड़ल्या गीत' गाते हुए किया जाता है; गोगा नवमी पर गोगाजी के भक्त ढोल-डेरू की थाप पर जुलूस निकालकर अपनी पीठ पर साँकल पीटते हुए नृत्य करते हैं।