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राजस्थान GK

जलवायु एवं मृदाएँ

Climate & Soils

राजस्थान की जलवायु — मानसून की चाल, मरुस्थलीय गर्मी से लेकर मावठ की फुहार तक — और मिट्टी की विविधता को एक साथ समझें, जो राज्य की खेती, वनस्पति और जनजीवन की बुनियाद है।

25 टॉपिक35 फ्लैशकार्ड14 MCQ
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जलवायु के मूल तत्व एवं नियंत्रक कारक

Climate Basics & Controlling Factors

किसी भू-भाग की जलवायु को समझना ही राजस्थान के भूगोल की नींव है — आइए जानें कि यह विशाल रेगिस्तानी राज्य मानसूनी जलवायु का हिस्सा होते हुए भी इतना शुष्क क्यों है।

📖जलवायु की परिभाषा

  • किसी भू-भाग पर लंबे समय तक की विविध वायुमंडलीय दशाओं — तापमान, वायुदाब, आर्द्रता, वर्षा व पवन-वेग — की औसत स्थिति को उस स्थान की जलवायु कहा जाता है।
  • भारत की जलवायु मूलतः मानसूनी है, और देश के सबसे बड़े राज्य राजस्थान की जलवायु भी इसी मानसून तंत्र का हिस्सा है, फिर भी राज्य का पश्चिमी 61% भू-भाग मरुस्थलीय दशाओं से घिरा है।

🏜️मरुस्थलीय जलवायु वाले जिले

  • दिलचस्प बात यह है कि थार मरुस्थल की जलवायु विश्व के अन्य रेगिस्तानों जितनी असहनीय नहीं है; राज्य के 16 जिलों — जैसलमेर, बाड़मेर, बालोतरा, फलौदी, बीकानेर, गंगानगर, जोधपुर, हनुमानगढ़, चूरू, जालौर, पाली, नागौर, डीडवाना-कुचामन, ब्यावर, सीकर एवं झुंझुनूँ — में मरुस्थलीय जलवायु पाई जाती है।
  • शेष भागों में अर्द्धशुष्क दशाएँ मिलती हैं, जबकि बाराँ, झालावाड़ व बाँसवाड़ा जैसे जिले पूरी तरह आर्द्र जलवायु का अनुभव करते हैं — यानी एक ही राज्य में शुष्कता से लेकर नमी तक की पूरी शृंखला मौजूद है।

⛰️अरावली — जलवायु की विभाजक रेखा

  • राज्य का अधिकांश हिस्सा कर्क रेखा के उत्तर, उपोष्ण कटिबंध में स्थित है — केवल डूँगरपुर व बाँसवाड़ा का कुछ भाग उष्ण कटिबंध में आता है — और अरावली पर्वत शृंखलाएँ जलवायु की दृष्टि से राज्य को दो हिस्सों में बाँट देती हैं।
  • अरावली के पश्चिम में तापमान की अतियाँ, धूल भरी आँधियाँ, शुष्क झुलसाने वाली हवाएँ और अनियमित-अत्यल्प वर्षा मिलती है; मेघरहित आकाश व कम नमी के कारण यहाँ अधिकतम दैनिक तापान्तर 15° सेल्सियस से भी ऊपर चला जाता है।
  • चूँकि अरावली अरब सागर से उठने वाली दक्षिणी-पश्चिमी मानसूनी हवाओं के समानान्तर पड़ती है, यह उनके मार्ग में बाधा नहीं बनती — पवनें घाटियों से होकर सीधे पंजाब व हिमाचल प्रदेश की ओर निकल जाती हैं, इसलिए पश्चिमी राजस्थान अक्सर सूखा रह जाता है।
  • इसके विपरीत अरावली के पूर्व में तापमान अपेक्षाकृत एकसमान रहता है, आर्द्रता अधिक होती है और सामयिक वर्षा मिलती है — यही कारण है कि यहाँ अर्द्धशुष्क व उपआर्द्र जलवायु पनपती है।

🧭जलवायु को प्रभावित करने वाले कारक

  • राजस्थान की अक्षांशीय स्थिति (23°3' से 30°12' उत्तर) इसकी जलवायु तय करती है — कर्क रेखा राज्य के दक्षिणी भाग (डूँगरपुर-बाँसवाड़ा) से गुजरती है, और अधिकांश भूभाग उपोष्ण कटिबंध में होने से यहाँ तापान्तर अधिक रहता है।
  • समुद्र तट से बड़ी दूरी होने के कारण समुद्र का समकारी प्रभाव यहाँ नहीं पहुँच पाता, इसलिए राज्य में महाद्वीपीय जलवायु जैसी अतियाँ — अधिक गर्मी, अधिक सर्दी और कम नमी — देखने को मिलती हैं।
  • धरातल की नीची बनावट भी भूमिका निभाती है — अधिकांश भाग समुद्रतल से 370 मीटर से भी कम ऊँचा है, जबकि दक्षिणी व दक्षिण-पश्चिमी भाग तथा माउण्ट आबू की ऊँचाई गर्मी में तापमान थामे रखती है और सर्दी में इसे हिमांक बिंदु से भी नीचे ले जाती है; वनस्पति की कमी अलग से तापमान व नमी को प्रभावित करती है, और पश्चिम से आने वाली बिलोचिस्तान की शुष्क-गर्म पवनें आर्द्रता को और घटा देती हैं।

🌦️खण्डवृष्टि — बूँद-बूँद की असमानता

  • राज्य में हवाओं की दिशा हर ऋतु में बदलती है और धरातलीय बनावट भी अलग-अलग है, इसलिए विभिन्न मौसमों व स्थानों पर वायु की आर्द्रता में काफी अंतर पाया जाता है।
  • कभी-कभी किसी एक गाँव या छोटे इलाके में भारी बारिश हो जाती है जबकि पड़ोसी गाँव सूखे ही रह जाते हैं — वर्षा के इस अत्यंत स्थानीय व असमान वितरण को 'खण्डवृष्टि' कहा जाता है।
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ऋतुचक्र एवं मानसून पवनें

The Seasonal Cycle & Monsoon Winds

मार्च की गर्मी से लेकर जुलाई की उमस और दिसंबर की मावठ तक — राजस्थान की तीन ऋतुएँ और मानसून की दोनों शाखाएँ मिलकर राज्य के मौसम की कहानी गढ़ती हैं।

☀️ग्रीष्म ऋतु — लू और आँधियों का मौसम

  • मार्च से मध्य जून तक चलने वाली ग्रीष्म ऋतु में सूर्य के उत्तरायण होने पर तापमान चढ़ना शुरू होता है और 21 जून को सूर्य के कर्क रेखा पर सीधे चमकने के साथ यह अपने चरम पर पहुँचता है, जब पूरे राजस्थान का औसत तापमान लगभग 38° सेल्सियस रहता है।
  • इसी दौरान बना निम्न वायुदाब केन्द्र धूल भरी आँधियों को जन्म देता है — सबसे ज्यादा आँधियाँ गंगानगर जिले में आती हैं, और इनकी संख्या व अवधि पूर्व से पश्चिम की ओर बढ़ती जाती है।
  • पश्चिम से पूर्व की ओर चलने वाली तेज गर्म हवाओं को 'लू' कहा जाता है, जबकि रेतभरी आँधियों से बनने वाले स्थानीय वायु-भँवर को 'भभूल्या' कहते हैं; पश्चिमी जिलों व धौलपुर में दिन का तापमान 45°-49° सेल्सियस तक पहुँच जाता है जबकि अरावली की पहाड़ियों में यह घटकर करीब 30° सेल्सियस रह जाता है।
  • गर्मियों में सुबह की आर्द्रता 30-35 प्रतिशत रहती है जो दोपहर तक घटकर लगभग 10% या उससे भी कम रह जाती है, जिससे मौसम असह्य हो जाता है; रेगिस्तानी रेत रात में जल्दी ठंडी हो जाती है, इसलिए वहाँ रात का तापमान 14-15°C तक गिर जाता है और दैनिक तापान्तर 32-33° तक पहुँच सकता है।

वर्षा ऋतु — मानसून की दो शाखाएँ

  • मध्य जून के बाद मानसूनी पवनों के आगमन से वर्षा शुरू होती है; अप्रैल-जून की भीषण गर्मी उत्तर-पश्चिम भारत में निम्न वायुदाब केन्द्र बना देती है जबकि हिंद महासागर व बंगाल की खाड़ी अपेक्षाकृत ठंडी रहकर उच्च दाब बनाए रखती हैं, और फेरल के नियम के अनुसार उत्तरी गोलार्द्ध में पवनें दाहिनी ओर मुड़कर 'दक्षिणी-पश्चिमी मानसून' कहलाती हैं।
  • यह मानसून दो शाखाओं में बँट जाता है — बंगाल की खाड़ी की शाखा (स्थानीय नाम 'पुरवाई'), जो गंगा-यमुना के मैदान पार करने से पहले ही अपनी अधिकांश नमी खो चुकी होती है, इसलिए राजस्थान में इससे वर्षा कम होती है; और अरब सागर की शाखा, जो उत्तरी-मध्य अरावली के 400 मीटर से नीची चोटियों को बिना रुके पार कर जाती है, फिर भी दक्षिणी व दक्षिण-पूर्वी भागों में सबसे अधिक वर्षा इसी से होती है।
  • अरब सागर की मानसूनी पवनें आगे तीन उपशाखाओं में बँटती हैं — एक केरल के मालाबार तट पर बरसती है, दूसरी नर्मदा घाटी होते हुए महाराष्ट्र-मध्यप्रदेश-कर्नाटक के कुछ भागों में वर्षा करती है, और तीसरी कच्छ-सौराष्ट्र से होकर अरावली के समानान्तर बढ़ते हुए हिमालय से टकराकर लौटती है और राजस्थान में थोड़ी वर्षा दे जाती है।
  • राज्य की लगभग 90% वर्षा जून के अंत से मध्य सितम्बर के बीच, विशेष रूप से जुलाई-अगस्त में मिलती है; वर्षा ऋतु में अधिकांश भागों का सामान्य तापमान 18° से 30° सेंटीग्रेड के बीच रहता है, जबकि विषुवत रेखा के दोनों ओर व्यापारिक हवाओं की शांत पेटी को 'डोलड्रम' कहा जाता है।

❄️मानसून की वापसी और शीत ऋतु

  • 23 सितम्बर के बाद सूर्य दक्षिणायन होकर मकर रेखा की ओर खिसकता है, जिससे उत्तर-पश्चिम का निम्न दाब क्षेत्र कमजोर पड़ने लगता है और हिन्द महासागर में नए निम्न दाब केन्द्र बनते हैं — अक्टूबर से नवम्बर के अंत तक चलने वाले इस दौर को 'मानसून का प्रत्यावर्तन' कहा जाता है, जब पवनें दिशा बदलकर उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम की ओर बहने लगती हैं।
  • वास्तविक शीत ऋतु दिसंबर से फरवरी के अंत तक रहती है, जब उत्तरी व मध्य एशिया में उच्च वायुदाब तथा हिन्द महासागर में निम्न वायुदाब बनने से पवनें फिर उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम बहने लगती हैं; कुछ रेगिस्तानी इलाकों में रात का तापमान शून्य या उससे नीचे चला जाता है, जिससे पड़ने वाला पाला रबी की फसलों को नुकसान पहुँचाता है।
  • मध्य एशिया व भूमध्यसागरीय क्षेत्रों से आने वाले शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात (पश्चिमी विक्षोभ) कुछ नमी साथ लाते हैं और शीत ऋतु में हल्की वर्षा कराते हैं, जिसे स्थानीय भाषा में 'मावठ' कहा जाता है — यह रबी की फसलों के लिए बेहद लाभदायक सिद्ध होती है।
  • सर्दी की अतिरिक्त ठंडक के पीछे तीन कारण हैं — समुद्र से दूरी के चलते महाद्वीपीय जलवायु का असर, हिमालय में बर्फबारी से आने वाली तीव्र शीत पवनें, तथा कैस्पियन सागर व तुर्कमेनिस्तान से फरवरी में उत्तर भारत की ओर बहने वाली शीत लहरें, जो राजस्थान तक सर्दी का प्रकोप ले आती हैं।

🗺️वर्षा का असमान वितरण

  • अरावली की मुख्य जल-विभाजक रेखा के साथ-साथ गुजरने वाली 50 सेमी समवर्षा रेखा राज्य को दो भिन्न जलवायु प्रदेशों में बाँट देती है — इसके पश्चिम में वर्षा, आर्द्रता व वनस्पति की कमी तथा कम जनसंख्या घनत्व मिलता है, जबकि पूर्व में अधिक नमी, बेहतर खेती व घनी आबादी दिखाई देती है।
  • राज्य की सामान्य औसत वार्षिक वर्षा लगभग 57-58 सेमी है, पर वितरण बेहद असमान है — पश्चिमी भाग में औसतन मात्र 10-20 सेमी वर्षा होती है, पूर्वी मैदानों में सामान्यतः 50-75 सेमी, जबकि सिरोही की पहाड़ियों, दक्षिण-पश्चिमी राजस्थान व दक्षिण-पूर्वी पठारी भाग में यह 100 सेमी से भी ऊपर पहुँच जाती है।
  • बंगाल की खाड़ी की मानसूनी हवाएँ राजस्थान पहुँचने से पहले ही गंगा के मैदान में अपनी अधिकांश नमी गँवा चुकी होती हैं, जबकि अरावली अरब सागरीय पवनों के समानान्तर होने से उन्हें रोक नहीं पाती और रेगिस्तान की तीव्र गर्मी बची-खुची नमी को भी सुखा देती है — इन तीन कारणों से राज्य में वर्षा की भारी कमी रहती है; भारतीय मौसम विभाग के अनुसार 50% या अधिक की कमी को भीषण सूखा माना जाता है।

🏆जलवायु के कीर्तिमान एवं स्थानीय शब्दावली

  • जून राज्य का सबसे गर्म महीना है और जनवरी सबसे ठंडा; दैनिक तापान्तर में जैसलमेर और वार्षिक तापान्तर में चूरू सबसे आगे हैं, जबकि माउण्ट आबू में तापान्तर सबसे कम रहता है।
  • सर्वाधिक वर्षा एवं आर्द्रता वाला स्थान माउण्ट आबू है (इसे 'राजस्थान का मासिनराम' भी कहा जाता है) और झालावाड़ सर्वाधिक वर्षा, आर्द्रता व वज्र-तूफानों वाला जिला है; इसके उलट सम (जैसलमेर) सबसे कम वर्षा वाला स्थान और जैसलमेर सबसे कम वर्षा वाला जिला है, जबकि अगस्त सर्वाधिक वर्षा का महीना है।
  • सर्वाधिक धूल भरी आँधियाँ गंगानगर में और सबसे कम झालावाड़ में आती हैं, जबकि वज्र-तूफान झालावाड़ में सबसे अधिक व बीकानेर में सबसे कम आते हैं; कोटा संभाग सबसे अधिक और जोधपुर संभाग सबसे कम वर्षा प्राप्त करता है।
  • कुछ प्रचलित स्थानीय शब्द याद रखने लायक हैं — मानसून-पूर्व की हल्की वर्षा को 'दोगड़ा' कहा जाता है, रेगिस्तान के आगे बढ़ने की प्रक्रिया को 'रेगिस्तान की मार्च' कहते हैं, और ऊँचाई के साथ हर 165 मीटर पर तापमान लगभग 1° सेल्सियस घटता जाता है; सापेक्ष आर्द्रता मार्च-अप्रैल में सबसे कम और जुलाई-अगस्त में सबसे अधिक रहती है।
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जलवायु प्रदेश एवं वर्गीकरण पद्धतियाँ

Climatic Regions & Classification Systems

भूगोलवेत्ताओं ने वर्षा, तापमान, वाष्पीकरण व वनस्पति के आधार पर राजस्थान को कई जलवायु प्रदेशों में बाँटा है — भारतीय मौसम विभाग से लेकर कोपेन, थार्नवेट व ट्रिवार्था तक, हर वर्गीकरण राज्य के मौसम को अपने नज़रिए से देखता है।

🏜️IMD वर्गीकरण — शुष्क व अर्द्धशुष्क प्रदेश

  • भारतीय मौसम विभाग ने तापक्रम, वर्षा व आर्द्रता के आधार पर राज्य को पाँच जलवायु प्रदेशों — शुष्क, अर्द्धशुष्क, उपआर्द्र, आर्द्र व अति-आर्द्र — में बाँटा है; शुष्क प्रदेश (जैसलमेर, उत्तरी-पश्चिमी बाड़मेर, गंगानगर व बीकानेर का पश्चिमी भाग आदि) में वाष्पीकरण वर्षा से अधिक रहता है, गर्मी में तापमान 48-49° तक पहुँचता है और शीत रातें हिमांक से नीचे चली जाती हैं, जबकि वनस्पति नाममात्र की काँटीली झाड़ियों तक सीमित रहती है।
  • अर्द्धशुष्क प्रदेश (चूरू, गंगानगर, जोधपुर, पाली, नागौर व सीकर आदि के भाग) में वर्षा अनियमित व अनिश्चित रहती है, आंतरिक प्रवाह के कारण खारे पानी की झीलें मिलती हैं, यहाँ नागौरी बैल, राठी गाय, मालानी घोड़े व बीकानेरी ऊँट जैसे पशु पाले जाते हैं और बाजरा, मोठ, चना, मूँग, जीरा व ईसबगोल जैसी फसलें उगाई जाती हैं।

🌳IMD वर्गीकरण — उपआर्द्र, आर्द्र व अति-आर्द्र प्रदेश

  • उपआर्द्र प्रदेश (अलवर, जयपुर, अजमेर, भीलवाड़ा व टोंक आदि) में औसत वर्षा 40-60 सेमी रहती है और नीम, पीपल, बरगद व आम जैसे पतझड़ी पेड़ों के बीच जौ, चना, गेहूँ व सरसों की खेती होती है।
  • आर्द्र प्रदेश — राज्य का पूर्वी व दक्षिण-पूर्वी हिस्सा (अलवर, भरतपुर, धौलपुर, कोटा, बूँदी, चित्तौड़गढ़ आदि) — में 60-80 सेमी वर्षा होती है और यहीं प्रसिद्ध रणथंभौर व केवलादेव घना अभयारण्य स्थित हैं, जबकि सघन वनस्पति में नीम, आम, गुलाब व बरगद के साथ चावल, गेहूँ, गन्ना व सरसों की फसलें उगती हैं।
  • राज्य की सर्वाधिक वर्षा (80-150 सेमी) अति-आर्द्र प्रदेश में होती है, जो दक्षिण-पूर्वी कोटा, बाराँ, झालावाड़, बाँसवाड़ा, डूँगरपुर व माउण्ट आबू (सिरोही) तक फैला है; यहाँ आम, शीशम, सागवान व बाँस जैसी घनी मानसूनी सवाना वनस्पति के बीच गेहूँ, चावल, सोयाबीन व सौंफ की खेती होती है, और माउण्ट आबू पर गर्मी में भी तापमान 25°C तक ही रहता है जबकि सर्दी में यह 9-10°C तक गिर जाता है।

🌐कोपेन का वर्गीकरण

  • प्रसिद्ध भूगोलवेत्ता डॉ. ब्लादिमीर कोपेन ने वनस्पति के आधार पर विश्व की जलवायु को वर्गीकृत किया, जिसके अनुसार राजस्थान में चार प्रदेश मिलते हैं — Aw (उष्ण कटिबंधीय आर्द्र, दक्षिणी बाँसवाड़ा-डूँगरपुर व माउण्ट आबू, वार्षिक वर्षा 80 सेमी या अधिक) और Bshw (अर्द्धशुष्क या स्टेपी, अरावली के पश्चिम में फैला राज्य का सबसे बड़ा जलवायु क्षेत्र, वर्षा 20-40 सेमी)।
  • शेष दो प्रदेश हैं Bwhw (उष्णकटिबंधीय शुष्क, फलौदी-बाड़मेर-जैसलमेर-बीकानेर का विशाल मरुस्थली भाग, वर्षा मात्र 10-20 सेमी, जिसे इंदिरा गाँधी नहर ने अब काफी हद तक बदल दिया है) और Cwg (उपआर्द्र मानसूनी, हाड़ौती-डांग-मेवात क्षेत्र के जयपुर, कोटा व भरतपुर जैसे जिले, जहाँ चम्बल के बीहड़ भी मिलते हैं)।

📐थार्नवेट व ट्रिवार्था के वर्गीकरण

  • अमेरिकी जलवायु विज्ञानी थार्नवेट ने वनस्पति, वाष्पीकरण तथा वर्षा-तापमान के मासिक वितरण के आधार पर राजस्थान को चार प्रदेशों में बाँटा — CA'w (उपआर्द्र, दक्षिण-पूर्वी कोटा-बाराँ-झालावाड़-बाँसवाड़ा, जहाँ वर्षा केवल दक्षिणी-पश्चिमी मानसून से होती है), DA'w (अर्द्धशुष्क, जालौर-अजमेर-जयपुर सहित अनेक जिले, वर्षा 40-80 सेमी), DB'w (अर्द्धशुष्क मिश्रित, गंगानगर-बीकानेर-चूरू-हनुमानगढ़ आदि) और EA'd (उष्ण शुष्क या मरुद्भिद, बाड़मेर-जैसलमेर-फलौदी, जहाँ गर्मी में 49-50° व सर्दी में शून्य से नीचे तक तापमान पहुँचता है)।
  • प्रो. ट्रिवार्था ने कोपेन के वर्गीकरण को संशोधित कर एक सरल पद्धति दी, जिसके अनुसार राजस्थान में भी चार प्रदेश हैं — Aw (उष्ण कटिबंधीय आर्द्र, दक्षिणी बाँसवाड़ा-डूँगरपुर-सिरोही, औसत वर्षा 100 सेमी व तापमान 21°C), Bsh (उष्ण-अर्द्ध उष्ण स्टेपी तुल्य, मध्यवर्ती पश्चिमी-उत्तरी जिले, जहाँ वर्षा पूर्व से पश्चिम व दक्षिण से उत्तर घटती जाती है), Bwh (शुष्क मरुस्थली, राज्य के उत्तर-पश्चिमी व पश्चिमी जिले) और Caw (अर्द्ध उष्ण आर्द्र, पूर्वी-दक्षिणी जिले जिनका एक भाग चम्बल के बीहड़ों वाले विंध्यन पठार पर टिका है, औसत वर्षा 60-80 सेमी)।
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राजस्थान की मृदाएँ

Soils of Rajasthan

जलवायु जैसा विविध राजस्थान का धरातल भी है — रेतीले टीलों से लेकर काली मिट्टी की दरारों तक, राज्य में एक दर्जन से अधिक मिट्टी के प्रकार मिलते हैं, हर एक की अपनी बनावट, खनिज संरचना और फसल-अनुकूलता।

📖मृदा की परिभाषा

  • मृदा भूमि की वह ऊपरी सतह है जो चट्टानों के निरंतर टूटने-विघटित होने से बनी सामग्री पर जलवायु, वनस्पति व अन्य जैविक प्रभावों की लंबी भूगर्भिक प्रक्रिया से तैयार होती है और पौधों को जीवांश व खनिज तत्व प्रदान करती है — जिसमें पौधे व फसलें सरलता से उग जाएँ उसे उर्वर तथा जिसमें कुछ भी न उगे उसे अनुर्वर या ऊसर मृदा कहा जाता है।

🏖️रेतीली, लाल दोमट व काली मिट्टी

  • रेतीली/बलुई मिट्टी राज्य के सबसे बड़े भू-भाग — जैसलमेर, बाड़मेर, बीकानेर, फलौदी, जोधपुर, नागौर व चूरू आदि — में फैली है; मोटे कणों के कारण इसकी नमी धारण क्षमता कम रहती है, नाइट्रोजनी व कार्बनिक तत्व सीमित पर कैल्सियम व pH अधिक रहता है, और यह खरीफ की बाजरा, मोठ व मूँग के लिए उपयुक्त मानी जाती है।
  • लोहे की उपस्थिति से लाल रंग वाली लाल दोमट (लैटेराइट) मिट्टी दक्षिणी राजस्थान — उदयपुर, डूँगरपुर, बाँसवाड़ा व प्रतापगढ़ के हिस्सों — में मिलती है; इसके बारीक कण नमी को बखूबी थामते हैं, नाइट्रोजन-फॉस्फोरस-कैल्सियम की कमी पर पोटाश व लौह प्रचुर रहते हैं, और यह मक्का, चावल व गन्ने के लिए उपयुक्त है।
  • काली मिट्टी या रेगुर राज्य के दक्षिण-पूर्वी भाग — कोटा, बूँदी, बाराँ, झालावाड़ व सवाई माधोपुर — में ज्वालामुखी बेसाल्ट चट्टानों के अपरदन से बनी है; यह इतनी नमी सोखती है कि सूखने पर चौड़ी दरारें पड़ जाती हैं, इसलिए इसे 'स्वतः जुताई वाली मिट्टी' कहा जाता है, और यह कपास, मूँगफली, दलहन व सोयाबीन के लिए आदर्श है।

🪨मिश्रित एवं जलोढ़ मृदाएँ

  • उदयपुर, चित्तौड़गढ़, डूँगरपुर व बाँसवाड़ा में मिश्रित लाल-काली मिट्टी मिलती है जो कपास, मक्का व गन्ने के लिए उपयुक्त है, जबकि सवाई माधोपुर, भीलवाड़ा व अजमेर के कुछ हिस्सों में मिश्रित लाल-पीली मिट्टी पाई जाती है, जो ग्रेनाइट-नीस चट्टानों के विखंडन से बनकर मूँगफली व कपास के लिए उपयुक्त बनती है।
  • राज्य की सबसे उपजाऊ मिट्टी जलोढ़ या कछारी मिट्टी है, जो नदी-नालों द्वारा बहाकर लाई गई है और अलवर, भरतपुर, धौलपुर व जयपुर जैसे पूर्वी मैदानी जिलों में फैली है; नाइट्रोजन से भरपूर व पर्याप्त जलधारण क्षमता वाली यह मिट्टी गेहूँ, चावल, कपास व तम्बाकू के लिए सर्वोत्तम मानी जाती है।
  • भीलवाड़ा, अजमेर व टोंक में मिलने वाली भूरी मिट्टी बनास नदी के प्रवाह क्षेत्र में जमी है, जिसकी सतह से 100-150 सेमी नीचे चूने की परत मिलती है और यह कृषि के लिए उपयुक्त है।

🧂मरुस्थलीय, लवणीय व पर्वतीय मृदाएँ

  • पीले-भूरे रंग की सीरोजम या धूसर मरुस्थलीय मिट्टी जोधपुर, नागौर, जालौर व सीकर के हिस्सों में मिलती है और पानी उपलब्ध होने पर ही अच्छी उपज देती है, जबकि गंगानगर, बीकानेर, बाड़मेर व लवणीय झीलों के आसपास फैली लवणीय मिट्टी क्षारीय-लवणीय तत्वों की अधिकता से अनुपजाऊ रहती है।
  • अरावली की तराई में सिरोही, उदयपुर, पाली व अलवर जैसे जिलों में मिलने वाली पर्वतीय मिट्टी (लिथोसोल्स) भूरी-लाल व कँकरीली होने के साथ इतनी उथली है कि खेती के लायक नहीं है, जबकि गंगानगर, अलवर व भरतपुर के उत्तरी हिस्सों की भूरी-रेतीली कछारी मिट्टी नदियों द्वारा लाई गई होने से अपेक्षाकृत उपजाऊ है।
  • रेतीली मिट्टी के भीतर भी विविधता है — लाल रेतीली मृदा (नागौर, जोधपुर, पाली आदि) की जल-सोखने की क्षमता भूरी रेतीली मिट्टी से अधिक है और पर्याप्त पानी मिलने पर उपजाऊ बन जाती है, जबकि नागौर-पाली की पीली-भूरी रेतीली मिट्टी में तीन-चार फीट गहराई पर मिलने वाली चूने की परत को 'स्टेपी मिट्टी' कहा जाता है; राज्य के 8 आंतरिक-प्रवाह बेसिनों की खारी मृदाओं में तो कृषि संभव ही नहीं होती।

🔬आधुनिक (USDA) मृदा वर्गीकरण

  • आधुनिक वर्गीकरण में पश्चिमी राजस्थान की एरिडीसोल्स शुष्क जलवायु की खनिज मृदाएँ हैं, जबकि जयपुर-अलवर-भरतपुर से लेकर उदयपुर-कोटा तक फैली अल्फीसोल्स में ऊपरी सतह से अधिक मटियारी अंश वाली 'ऑर्जिलिक संस्तर' मिलती है।
  • एन्टिसोल्स ही एकमात्र मृदावर्ग है जो अलग-अलग जलवायु में मिलता है और पश्चिमी राजस्थान में हल्के पीले-भूरे रंग की दिखती है; इनसेप्टीसोल्स अर्द्धशुष्क से आर्द्र जलवायु तक (सिरोही, उदयपुर, चित्तौड़गढ़ आदि) मिलती हैं पर शुष्क जलवायु में कभी नहीं, जबकि झालावाड़-बाराँ-कोटा-बूँदी में फैली वर्टीसोल्स की अत्यधिक मटियारी बनावट सभी क्लासिक काली-मिट्टी विशेषताएँ दिखाती है।

🗺️भू-भौतिकी प्रदेशों की मृदाएँ

  • राज्य के हर भौगोलिक प्रदेश की अपनी मिट्टी की पहचान है — दक्षिण-पूर्वी पठार व चम्बल-माही बेसिन में काली-मटियार दोमट मिट्टी, बनास बेसिन में पीली-भूरी व भूरी मटियार मिट्टी, तो लूनी बेसिन में भूरी रेतीली मिट्टी मिलती है।
  • पूर्वी अर्द्धशुष्क मैदान में जलोढ़ व भूरी मिट्टी, छप्पन के मैदान में लाल दोमट मिश्रित व लाल-काली मृदा, घग्घर मैदान में भूरी मटियार दोमट मिट्टी मिलती है, जबकि पश्चिमी शुष्क मैदान अर्थात् थार मरुस्थल पूरी तरह रेतीली बलुई मिट्टी से ढका है।
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मृदा अपरदन, संरक्षण एवं वनस्पति

Soil Erosion, Conservation & Native Grasses

उपजाऊ मिट्टी को बचाना उतना ही ज़रूरी है जितना उसे पहचानना — जानिए राजस्थान में मिट्टी कैसे कटती है, कैसे लवणीय-क्षारीय होती है, और किसान इसे कैसे बचाते हैं।

🌬️मृदा अपरदन के प्रकार

  • मिट्टी के आवरण के विनाश को मृदा अपरदन कहते हैं, जिसे 'रेंगती हुई मृत्यु' भी कहा जाता है क्योंकि यह धीरे-धीरे लेकिन लगातार भूमि को निगल जाता है; इसके दो प्रमुख कारक हैं — पवन, जो शुष्क-अर्द्धशुष्क प्रदेशों में सर्वाधिक सक्रिय रहती है, और जल, जो भारी वर्षा व खड़ी ढाल वाले इलाकों में उपजाऊ परत बहा ले जाता है।
  • जल अपरदन तीन रूपों में होता है — समतल भूमि पर मूसलाधार वर्षा से होने वाला परत अपरदन (सबसे हानिकारक, क्योंकि यह उपजाऊ ऊपरी परत को ही बहा ले जाता है), तीव्र ढालों पर बनने वाला अवनालिका अपरदन जो खेत को टुकड़ों में बाँटकर 'उत्खात भूमि स्थलाकृति' रच देता है, और उँगलियों जैसी नालियाँ बनाने वाला रिल अपरदन।
  • राज्य में जल-अपरदन सबसे अधिक चम्बल नदी के हाड़ौती, सवाई माधोपुर, करौली व धौलपुर वाले प्रवाह क्षेत्र में होता है (यहीं राज्य के सबसे विस्तृत बीहड़ भी मिलते हैं, धौलपुर में सर्वाधिक), उसके बाद घग्घर क्षेत्र का स्थान आता है; पर कुल मिलाकर वायु-अपरदन से प्रभावित क्षेत्र जल-अपरदन से भी बड़ा है।

🪓मृदा अपरदन के कारण

  • वनोन्मूलन इसका सबसे बड़ा कारण है — पेड़ों की जड़ें मिट्टी को बाँधे रखती हैं और गिरी पत्तियाँ ह्यूमस बढ़ाती हैं, पर बढ़ती आबादी के दबाव में तेज़ी से कट रहे जंगल उपजाऊ तत्वों को हवा व पानी के साथ बहा ले जाते हैं; इसी तरह अत्यधिक पशुचारण भूमि को नंगा कर देता है और दक्षिण-पूर्वी राजस्थान में आदिवासियों की परंपरागत झूमिंग (वालरा) कृषि जंगल काटकर खुली भूमि को तेज़ी से कटने योग्य बना देती है।
  • वर्षा-पूर्व के मरुस्थलीय अंधड़ व तीव्र तूफान पश्चिमी राजस्थान में मिट्टी को उड़ा ले जाते हैं, जबकि अति-सिंचाई सिंचित भूमि को धीरे-धीरे लवणीय बना देती है और रासायनिक उर्वरक — पर्याप्त ह्यूमस के अभाव में — मिट्टी को कठोर बना कर उर्वरता घटा देते हैं; समोच्च रेखाओं के विपरीत जुताई या दोषपूर्ण फसल-चक्र जैसी अवैज्ञानिक कृषि पद्धतियाँ भी किसान के हाथों ही क्षरण बढ़ा देती हैं।

🛡️मृदा संरक्षण के उपाय

  • सबसे प्रभावी उपाय वृक्षारोपण है, जो हवा व पानी दोनों तरह के अपरदन को रोकता है; इसके साथ अति-चराई व स्थानांतरी कृषि पर नियंत्रण, वेदिका (टेरेस) कृषि को बढ़ावा, तथा पहाड़ी ढलानों पर समोच्च रेखा के अनुरूप जुताई व पट्टी कृषि जैसे तरीके अपनाए जाते हैं; शुष्क क्षेत्रों में रेत के टीलों को रोकने के लिए वृक्षों की रक्षक मेखला (शेल्टरबेल्ट) व वन-कृषि कारगर हैं।
  • जोती गई भूमि को फसल-चक्र व कुछ समय परती रखकर सुरक्षा दी जाती है, अवनालिकाओं को सीढ़ीदार खेत बनाकर या आवरण वनस्पति लगाकर बंद किया जाता है, नहरों की लाइनिंग से रिसाव रोका जाता है, और छोटे तालाब, एनीकट, वाटरशेड व चेक-डैम बनाकर बहते पानी की गति और मात्रा दोनों घटाई जाती है — साथ ही मेड़बंदी व खेतों में मेड़ों से बहते जल का वेग थामा जाता है; नियम है कि 15-25% से अधिक ढाल वाली भूमि पर खेती नहीं होनी चाहिए।
  • दीर्घ परती भूमि को खेती, चरागाह व फलोद्यान के रूप में फिर बसाने से भी अनियंत्रित अपरदन थमता है, चिपको जैसे जन-आंदोलन वृक्षों के महत्त्व को उजागर करते हैं, और जल-अपरदन के लिए भूमि को जोतने के बाद वनस्पति से ढकना जबकि वायु-अपरदन के लिए मल्च का उपयोग व बोए-अनबोए खेतों को बारी-बारी काम में लेना कारगर उपाय हैं; रेगिस्तानी इलाकों में उड़ती मिट्टी थामने को हवा की दिशा में डेढ़-दो मीटर ऊँची लोहे की चादरें भी लगाई जाती हैं।

🧂लवणीयता व क्षारीयता की समस्या

  • पश्चिमी-उत्तरी राजस्थान में खारे भूजल, कम वर्षा, ऊँची वाष्पीकरण दर व नहरी क्षेत्रों में अपर्याप्त जल-निकासी के मेल से भूमि लवणीय व क्षारीय हो जाती है; लवणीय मिट्टी की पहचान सूखने पर दिखने वाली सफेद नमक की परत, खारा भूजल व छोटी-असमान फसलों से होती है, जबकि क्षारीय मिट्टी गीली होने पर काली दिखती है और सूखने पर बंद होने वाली महीन दरारें छोड़ती है।
  • लवणीय मिट्टी के सुधार में ढलान के नीचे जल-निकास नाली बनाकर लवण बहाया जाता है और सरसों, तारामीरा व जौ जैसी लवण-सहनशील फसलें बोई जाती हैं, जबकि क्षारीय मिट्टी में गर्मी में गहरी जुताई के बाद जिप्सम मिलाया जाता है, वर्षा जल भरकर सोडियम को धोया जाता है और खरीफ में ढेंचा उगाकर हरी खाद तैयार की जाती है; धमासा व सुबबूल जैसी वनस्पति मिलाना भी लवणीयता घटाता है।
  • गंगानगर, हनुमानगढ़ व बीकानेर जैसे नहरी-सिंचित (इंदिरा गाँधी नहर) जिलों में अत्यधिक जल-उपयोग व सख्त उपमृदा परत ने भूजल स्तर ऊँचा कर 'सेम' (जलभराव) की समस्या बढ़ा दी है, जिससे उर्वरता घटती व खरपतवार बढ़ते हैं; बूँद-बूँद व फव्वारा सिंचाई अपनाना, समुचित खेत-निकासी और नहर किनारे वृक्षारोपण इसका उपाय है — कुल मिलाकर राज्य की लगभग 7-8 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि इस समस्या से जूझ रही है।

🌾राजस्थान की प्रमुख घासें

  • शुष्क-अर्द्धशुष्क इलाकों में उगने वाली भुरूट घास (Cenchrus biflorus) पकने से पहले पशुओं द्वारा चाव से खाई जाती है, जबकि करड़ घास (Dichanthium annulatum) अपनी गहरी जड़ों से मृदा अपरदन रोकने में मदद करती है।
  • पश्चिमी रेगिस्तानी क्षेत्र में सूखा-सहनशील अंजन घास (Cenchrus ciliaris, 'बफेल घास') और धामन घास (Cenchrus setigerus, 'बर्डवुड ग्रास') व्यापक रूप से पाई जाती हैं, इनके अतिरिक्त ग्रामणा (Panicum antidotale), मूरट (Panicum turgidum), गिनी (Panicum maximum) व लांप (Aristida depressa) घासें भी राज्य के चरागाहों की पहचान हैं।