राजस्थान की अपवाह प्रणाली: नदियाँ एवं झीलें
Rajasthan's Drainage System: Rivers & Lakes
अरावली से निकलकर अरब सागर व बंगाल की खाड़ी तक बहने वाली नदियों से लेकर मरुस्थल की खारी झीलों तक — जानिए राजस्थान की जलधाराओं की पूरी कहानी।
परिचय एवं अपवाह तंत्र की बनावट
राजस्थान की भौगोलिक बनावट और अरावली पर्वतमाला मिलकर तय करती हैं कि यहाँ की नदियाँ किस दिशा में बहेंगी और कौन-सी बरसात के भरोसे रहेंगी।
🌵सूखी धरती की नदियाँ
- राजस्थान एक शुष्क मरुप्रदेश है जहाँ वर्षा कम व अनियमित होती है, इसलिए चंबल के अलावा राज्य में लगभग कोई बारहमासी नदी नहीं बहती।
- लूनी, बनास, माही, बाणगंगा, कोठारी व बेड़च समेत अधिकांश नदियाँ बरसाती हैं और केवल वर्षा ऋतु में ही सक्रिय रहती हैं; माही कभी नित्यवाही थी, पर अब गर्मियों में उसका जल भी घट या सूख जाता है।
- फिर भी ये नदियाँ पेयजल, सिंचाई व जलविद्युत देकर राज्य के औद्योगिक विकास तथा आर्थिक-धार्मिक एकता में अहम भूमिका निभाती हैं।
⛰️अरावली — महान जल विभाजक
- राज्य के मध्य में फैली अरावली पर्वतमाला 'भारत के महान जल विभाजक' का काम करती है और राजस्थान की अपवाह प्रणाली को तीन भागों — बंगाल की खाड़ी में गिरने वाली, अरब सागर में गिरने वाली, और आन्तरिक अपवाह वाली नदियों — में बाँटती है।
- राज्य के प्रवाह क्षेत्र का लगभग 24% भाग (चंबल, बनास, कालीसिंध, बाणगंगा आदि सहित) बंगाल की खाड़ी में तथा लगभग 16% भाग (लूनी, माही, पश्चिमी बनास, साबरमती आदि सहित) अरब सागर में जाता है; शेष लगभग 60% भाग आन्तरिक अपवाह का हिस्सा है।
- भारत की महान जल विभाजक रेखा अरावली के उत्तरी अक्ष से शुरू होकर अलवर, साँभर झील, अजमेर व ब्यावर से गुजरती हुई उदयपुर के दक्षिण तक फैली है।
🏺प्राचीन सरस्वती व हाकड़ा
- भूगर्भशास्त्रियों के अनुसार प्रागैतिहासिक काल में प्राचीन सरस्वती व यमुना नदियाँ मिलकर उत्तरी राजस्थान में 'हाकड़ा' नाम से बहती थीं और दक्षिण-पश्चिम दिशा में कच्छ की खाड़ी (अरब सागर) में जा गिरती थीं।
- विद्वान वाकनकर के अनुसार लगभग 2000 ई.पू. यह विशाल सरस्वती नदी हिमालय से निकलकर हरियाणा, पंजाब, राजस्थान व गुजरात से होते हुए भरूच के पास अरब सागर में मिलती थी, जिसकी सहायक नदी दृषद्वती (चौतांग) थी; लगभग 1900 ई.पू. तक यह सूखकर विलुप्त हो गई।
- इसके प्राचीन प्रवाह के ठोस प्रमाण आज भी इसके पुराने मार्ग में मिलने वाले पुरा-अपवाह व ढके हुए अपवाह चिन्हों से मिलते हैं; सरस्वती व दृषद्वती को राजस्थान की ऋग्वैदिक नदियाँ माना जाता है।
🏛️नदियाँ और आरंभिक सभ्यताएँ
- बेड़च व बनास नदियों के किनारे ताम्रपाषाणकालीन आहड़ सभ्यता पनपी, जबकि भीलवाड़ा की कोठारी नदी के सहारे बागोर में मध्य पाषाणकालीन संस्कृति और सीकर में काँतली नदी किनारे गणेश्वर में ताम्रयुगीन सभ्यता विकसित हुई।
🏜️आन्तरिक अपवाह तंत्र व नदीविहीन जिले
- आन्तरिक (अन्तःप्रवाही) नदियाँ वर्षा ऋतु में कुछ दूरी बहकर अपने ही क्षेत्र में विलुप्त हो जाती हैं, किसी झील में मिल जाती हैं या सूख जाती हैं, इनका जल कभी समुद्र तक नहीं पहुँचता; काकनी, काँतली, साबी, घग्घर, मेंथा, बाण्डी, रूपनगढ़, खण्डेल, तुरतमती व रूपारेल जैसी नदियाँ इसी श्रेणी में आती हैं।
- यह आन्तरिक अपवाह अरावली के पश्चिमी भाग में साँभर, काँतली व लूनी जैसे कई बेसिनों में फैला है, जबकि साबी व रूपारेल जैसी कुछ आन्तरिक नदियाँ पूर्वी राजस्थान में भी बहती हैं; राज्य की लवणीय झीलों का क्षेत्र इसी आन्तरिक तंत्र का हिस्सा है।
- चूरू, बीकानेर व फलौदी जिलों में कोई नदी नहीं बहती; गंगानगर की भी अपनी अलग नदी नहीं है, पर अधिक वर्षा में घग्घर का बाढ़ का पानी सूरतगढ़ व अनूपगढ़ तक और कभी-कभी सीमा पार फोर्ट अब्बास (पाकिस्तान) तक पहुँच जाता है।
- किसी नदी के अपनी सहायक धाराओं सहित जिस भूभाग का जल बहाकर ले जाती है, उसे उसका प्रवाह क्षेत्र, नदी द्रोणी या जल ग्रहण क्षेत्र कहते हैं, जबकि छोटी नदी-नालों के प्रवाह क्षेत्र को 'जल संभर' कहा जाता है; राज्य में कुल 15 प्रमुख बेसिन व उनके 58 उपबेसिन हैं।
💧जल संसाधन: एक नजर में
- राज्य की कुल सतही जल संभाव्यता लगभग 15.86 मिलियन एकड़ फुट (MAF) आँकी गई है, जबकि नदियों का कुल जल ग्रहण क्षेत्र लगभग 1,69,470 वर्ग किमी है, जिसमें बनास बेसिन (27.48%) व लूनी बेसिन (20.21%) का हिस्सा सबसे बड़ा है।
- राज्य के भूजल ब्लॉकों की स्थिति चिंताजनक बनी हुई है — 2024 में 302 में से 214 ब्लॉक 'अति दोहित' श्रेणी में थे और भूजल दोहन की दर 148.77% (2023) से बढ़कर 149.86% (2024) हो गई, यानी निकाला जा रहा पानी उपलब्ध पुनर्भरण से कहीं अधिक है।
अरब सागर की ओर बहने वाली नदियाँ
पश्चिमी व दक्षिणी अरावली से निकलकर गुजरात होते हुए अरब सागर में जल पहुँचाने वाली नदियों में लूनी, माही व साबरमती जैसी राज्य की जीवनरेखाएँ शामिल हैं।
🏞️लूनी — मरुस्थल की बड़ी बरसाती नदी
- लूनी अजमेर की नाग पहाड़ियों (अरावली) से निकलती है; उद्गम पर इसे सागरमती कहा जाता है और गोविन्दगढ़ के पास पुष्कर से आने वाली सरस्वती नदी के मिलने के बाद ही यह 'लूनी' कहलाती है। इसके पुराने नाम लवणाद्रि, लवणावरी व लवणवती भी मिलते हैं।
- यह नागौर, ब्यावर, पाली, जोधपुर, बालोतरा, बाड़मेर व जालौर के अर्धशुष्क इलाकों से होकर बहती हुई गुजरात के कच्छ जिले में प्रवेश कर 'कच्छ के रन' में विलुप्त हो जाती है; यह पूर्णतः बरसाती नदी है और अरावली को बीच से काटती हुई बहती है।
- लूनी का पानी बालोतरा तक मीठा रहता है, उसके बाद नमक के कण मिलने से खारा हो जाता है — यही इसके नाम 'लूनी' (लवण से जुड़ा) का आधार है; बालोतरा के रंगाई-छपाई उद्योग का प्रदूषित जल भी नदी में मिलकर इसे और प्रदूषित करता है।
- राज्य के कुल अपवाह क्षेत्र का लगभग 10.4% भाग लूनी बेसिन में आता है और इसका जल क्षेत्र 11 पुराने जिलों में फैला है; इसके उत्तर का इलाका 'थली' कहलाता है और इसके पश्चातवर्ती प्रवाह क्षेत्र (पाली-जालौर) को 'गौड़वाड़' कहते हैं।
🧵लूनी की सहायक नदियाँ
- अरावली से निकलकर लूनी में बायीं ओर से मिलने वाली सहायक नदियों में जवाई, खारी (हेमावास), सूकड़ी, बाण्डी (हेमावास), सागी, लीलड़ी व मीठड़ी प्रमुख हैं — जोजड़ी इसकी एकमात्र ऐसी सहायक नदी है जो दायीं ओर से मिलती है और अरावली से नहीं, बल्कि नागौर के पोंडलू गाँव की पहाड़ियों से निकलती है।
- सुमेरपुर (पाली) के पास जवाई नदी पर बना जवाई बाँध 'मारवाड़ का अमृत सरोवर' कहलाता है और पाली की जीवनरेखा है; जवाई की सहायक मथाई नदी के तट पर ही रणकपुर के भव्य जैन मंदिर बने हैं।
- सूकड़ी नदी पर जालौर के बाँकली गाँव में बाँकली बाँध बना है और सूकड़ी प्रथम नदी बाली (पाली) के सरदारसमंद बाँध में गिरती है; अजमेर-पुष्कर पहाड़ियों में तेज़ बारिश होने पर चौड़े पाट व समतल धरातल के कारण बालोतरा क्षेत्र में अक्सर बाढ़ आ जाती है।
🧭पश्चिमी बनास व गुजरात की ओर
- पश्चिमी बनास सिरोही के दक्षिण में 'नया सानवारा' (सोनवारा) गाँव के निकट अरावली की पहाड़ियों से निकलती है और सिरोही से होकर गुजरात के बनासकाँठा जिले में प्रवेश कर 'लिटिल रन' (कच्छ के रन का एक भाग) में विलुप्त हो जाती है; इसकी लंबाई लगभग 260 किमी है।
- गुजरात का डीसा नगर व सिरोही का आबू रोड इसी नदी के किनारे बसे हैं; इसकी सहायक नदियों में सूकली, सीपू, नाड़ी, खारी, सुकेत व बलराम प्रमुख हैं, जिनमें सूकली मुख्य सहायक मानी जाती है।
🕊️साबरमती व दक्षिणी सहायक नदियाँ
- साबरमती उदयपुर की कोटड़ा तहसील में अरावली की पहाड़ियों से निकलती है, गुजरात के साबरकाँठा जिले से गुजरते हुए खम्भात की खाड़ी में गिरती है; गाँधीनगर व महात्मा गांधी का साबरमती आश्रम इसी नदी के तट पर बसे हैं।
- इसकी सहायक नदियाँ — वाकल, सेई, हथमती, मेश्वा, वेतरक व माजम — सभी डूँगरपुर या उदयपुर से निकलती हैं; वाकल उदयपुर की गोगुन्दा पहाड़ियों में सुरन गाँव से जन्म लेती है और सेई नदी पर बने बाँध का पानी सुरंग द्वारा जवाई बाँध तक पहुँचाया जाता है।
🌾माही — वागड़-कांठल की जीवनरेखा
- माही का उद्गम मध्यप्रदेश के धार जिले में अमरोरु की पहाड़ियों में मेहद झील से होता है; यह मध्यप्रदेश, राजस्थान व गुजरात — तीन राज्यों से गुजरती है और राजस्थान में उल्टे 'U' आकार (∩) में बहते हुए कर्क रेखा को दो बार पार करती है।
- इसकी कुल लंबाई 576 किमी है, जिसमें से 171 किमी राजस्थान में बहती है; राज्य में इसके अपवाह क्षेत्र को बाँसवाड़ा में 'छप्पन का मैदान' व प्रतापगढ़ में 'कांठल का मैदान' कहा जाता है, और इसे वागड़-कांठल की गंगा तथा दक्षिण राजस्थान की स्वर्ण रेखा भी कहते हैं।
- बाँसवाड़ा के बोरखेड़ा गाँव के पास बनी माही बजाज सागर परियोजना इसकी सबसे बड़ी सिंचाई-जलविद्युत योजना है; डूँगरपुर के बेणेश्वर स्थान पर सोम व जाखम नदियों के इसमें मिलने पर बनने वाले त्रिवेणी संगम पर हर माघ पूर्णिमा को आदिवासियों का प्रसिद्ध बेणेश्वर मेला (कुंभ) लगता है।
🌿सोम, जाखम और माही की अन्य सहायक नदियाँ
- सोम नदी उदयपुर की खेरवाड़ा तहसील में बीछामेड़ा की पहाड़ियों से निकलकर बेणेश्वर में माही में मिलती है; इसकी सहायक गोमती नदी पर सलूम्बर की जयसमन्द झील बनी है, जबकि जाखम प्रतापगढ़ की छोटी सादड़ी के निकट से निकलकर बेणेश्वर के पास सोम में मिल जाती है।
- माही की अन्य सहायक नदियाँ अनास, मोरेन, इरू व चाप हैं; अनास मध्यप्रदेश के विंध्याचल क्षेत्र से निकलकर डूँगरपुर के गलियाकोट के पास माही में मिलती है, जबकि इरू माही बाँध बनने से पहले ही नदी में मिल जाती है।
- माही तंत्र में बना जाखम बाँध राजस्थान का सबसे ऊँचा बाँध (81 मी.) है, वहीं माही बजाज सागर बाँध राज्य का सबसे लंबा बाँध (3109 मी.) है; इसी क्षेत्र में सोम-कागदर व सोम-कमला-अम्बा जैसी सिंचाई परियोजनाएँ भी चलती हैं।
बंगाल की खाड़ी की ओर बहने वाली नदियाँ
अरावली के पूर्व की ओर बहने वाली नदियाँ चंबल व यमुना के रास्ते अपना जल बंगाल की खाड़ी तक पहुँचाती हैं, और इसी समूह में राज्य की सबसे लंबी व सबसे विशाल जलराशि वाली नदियाँ शामिल हैं।
🐊चंबल — राज्य की एकमात्र बारहमासी नदी
- चंबल का उद्गम मध्यप्रदेश के इन्दौर जिले में महू के निकट विंध्याचल की जानापाव पहाड़ी से होता है; यह चौरासीगढ़ (मंदसौर) के निकट राजस्थान की भैंसरोड़गढ़ तहसील में प्रवेश करती है और चित्तौड़गढ़-कोटा-बूँदी की सीमा बनाती हुई आगे बढ़ती है।
- यह सवाईमाधोपुर, करौली व धौलपुर से गुजरते हुए उत्तरप्रदेश के इटावा जिले में यमुना से मिल जाती है; यह मध्यप्रदेश, राजस्थान व उत्तरप्रदेश तीन राज्यों में बहती है और राजस्थान-मध्यप्रदेश की एकमात्र अंतर्राज्यीय सीमा बनाने वाली नदी है, जो लगभग 252 किमी तक यह सीमा बनाती है।
- राज्य में इसकी सतही जल-राशि सर्वाधिक है और यह चौरासीगढ़ से कोटा तक एक लंबी गार्ज (महाखड्ड) में बहती है; इसकी कुल लंबाई और राजस्थान में बहाव की दूरी को लेकर पुराने व नए सर्वेक्षणों (WAPCOS) में मतभेद है, पर यह राज्य की एकमात्र सच्ची बारहमासी नदी मानी जाती है।
- धौलपुर, सवाई माधोपुर व करौली में इसके किनारे राज्य के सर्वाधिक बीहड़ व कंदराएँ (Ravines) फैली हैं, जो उत्खात स्थलाकृति (Bad Land Topography) का बेहतरीन उदाहरण हैं और खेती के लिए पूरी तरह अनुपयुक्त हैं; इसे चर्मण्यवती व कामधेनु भी कहा जाता है।
🔗चंबल की सहायक नदियाँ
- चंबल की तीन मुख्य सहायक नदियाँ बनास, कालीसिंध व पार्वती हैं। बायें किनारे से गुंजाली, बामनी, बनास, कुराल, मेज व चाकण जैसी नदियाँ मिलती हैं, जबकि दायें किनारे से छोटी कालीसिंध, कालीसिंध, पार्वती, सीप, कुनु व आलनिया जैसी नदियाँ आकर मिलती हैं।
- कालीसिंध मध्यप्रदेश के देवास से निकलकर झालावाड़ में राजस्थान में प्रवेश करती है और कोटा के नोनेरा गाँव के पास चंबल में मिलती है; इसकी अपनी सहायक नदी आहू नदी है, जो झालावाड़ के गागरोन में इससे आ मिलती है, ठीक वहीं जहाँ गागरोन का प्रसिद्ध किला दोनों नदियों के संगम पर खड़ा है।
- पार्वती नदी मध्यप्रदेश की विंध्य श्रेणी से निकलकर बारां व कोटा से बहती हुई सवाईमाधोपुर में चंबल में मिलती है; बारां का रामगढ़ क्रेटर इसी नदी के पूर्वी तट पर स्थित है और इसकी सहायक परवन नदी पर बना शेरगढ़ अभयारण्य भी उल्लेखनीय है।
- बनास नदी चंबल की सबसे विशाल सहायक है और अपने रास्ते में कोठारी, खारी, बेड़च व मेनाल जैसी अनेक नदियों को समेटती हुई सवाईमाधोपुर के रामेश्वर धाम में चंबल से मिलती है।
🌿बनास — राज्य की सबसे लंबी नदी
- बनास नदी राजसमंद में गोगुन्दा के पठार (कुंभलगढ़ के दक्षिण) की खमनौर पहाड़ियों से निकलती है और मेवाड़ के बीच से अरावली को काटती हुई चित्तौड़गढ़, भीलवाड़ा, अजमेर व टोंक से बहकर सवाईमाधोपुर के रामेश्वर धाम में चंबल से मिल जाती है।
- यह पूर्णतः राजस्थान में बहने वाली सबसे लंबी नदी है (लगभग 512 किमी) और राज्य में इसका जल ग्रहण क्षेत्र भी सबसे बड़ा है; यह पूरी तरह बरसाती नदी है। इसके उपनामों में वन की आशा, वन की आत्मा व वशिष्ठी की कन्या शामिल हैं।
- भीलवाड़ा के बीगोद के निकट बनास, बेड़च व मेनाल नदियों का त्रिवेणी संगम बनता है, जिससे लगभग 26 किमी दूर मेनाल का प्रसिद्ध जलप्रपात स्थित है — यही 'विंध्यन कागार प्रदेश' चंबल व बनास नदियों के बीच फैला भूभाग है।
🌱बनास की सहायक नदियाँ
- बनास की दायीं ओर से बेड़च (जो उदयसागर झील से पहले आयड़ नदी कहलाती है) व मेनाल आकर मिलती हैं, जबकि बायीं ओर से कोठारी, खारी, माशी, डाई, ढील, सोहादरा, मोरेल व कालीसिल जैसी कई नदियाँ इसमें समाहित होती हैं।
- कोठारी नदी राजसमंद व भीलवाड़ा से बहती है और प्राचीन बागोर सभ्यता इसी के तट पर पनपी थी; इसी पर भीलवाड़ा को पेयजल देने वाला मेजा बाँध बना है। मोरेल नदी की सहायक ढूँढ नदी जयपुर से निकलती है, और ढूँढ की अपनी सहायक द्रव्यवती नदी (अमानी शाह का नाला) जयपुर शहर के बीच से गुजरती है, जिसे पुनर्जीवित करने हेतु सरकार ने विशेष परियोजना शुरू की है।
- मोरेल नदी जयपुर की बस्सी तहसील से निकलकर दौसा व सवाईमाधोपुर से बहती हुई बनास में मिलती है, और इसकी सहायक कालीसिल नदी करौली में कैलादेवी के प्रसिद्ध मंदिर के पास से गुजरती है; मांगली नदी पर स्थित बूँदी का भीमलत जलप्रपात भी इसी बनास-तंत्र का हिस्सा है।
🏗️बाँध, जलप्रपात व संगम
- चंबल पर गांधी सागर (म.प्र.-राजस्थान सीमा), राणा प्रताप सागर (रावतभाटा), जवाहर सागर बाँध व कोटा बैराज जैसी शृंखला बनी है, जबकि बनास पर बीसलपुर बाँध (राज्य की सबसे बड़ी पेयजल परियोजना), मातृकुण्डिया बाँध (मेवाड़ का हरिद्वार, सर्वाधिक गेटों वाला बाँध) व नदसमंद बाँध (राजसमंद की जीवनरेखा) स्थित हैं।
- भैंसरोड़गढ़ (चित्तौड़गढ़) के निकट चंबल पर लगभग 60 फुट ऊँचाई से गिरने वाला चूलिया जलप्रपात स्थित है, जबकि मेनाल नदी पर मेनाल जलप्रपात और मांगली नदी पर बूँदी का भीमलत जलप्रपात इसी क्षेत्र के अन्य प्रमुख जलप्रपात हैं।
- गागरोन (आहू-कालीसिंध संगम), भैंसरोड़गढ़ (चंबल-बामनी संगम) व चित्तौड़गढ़ (गंभीरी-बेड़च संगम के निकट) जैसे किले नदी-संगमों पर बने हैं, वहीं बनास-मेनाल-बेड़च का त्रिवेणी संगम बीगोद और बनास-चंबल-सीप का संगम रामेश्वर घाट (सवाईमाधोपुर) पर होता है।
पूर्वी राजस्थान व शेखावाटी की अन्तःप्रवाही नदियाँ
पूर्वी मैदानों व शेखावाटी की कई नदियाँ न तो समुद्र तक पहुँचती हैं और न ही किसी बड़ी नदी में मिलती हैं — वे बस बहती हैं, बिखरती हैं और रेत या मैदान में विलीन हो जाती हैं।
💀घग्घर — वैदिक सरस्वती की 'मृत नदी'
- घग्घर हिमाचल प्रदेश में कालका के निकट शिवालिक पहाड़ियों से निकलती है और पौराणिक काल में यह सरस्वती नदी की सहायक मानी जाती थी; यह वैदिक-युगीन सरस्वती के ही पुराने पाट में बहती है, इसीलिए इसे 'मृत नदी' (Dead River) व 'राजस्थान का शोक' भी कहा जाता है — पाकिस्तान में इसे हकरा नाम से जाना जाता है।
- राजस्थान में यह हनुमानगढ़ की टिब्बी तहसील के तलवाड़ा गाँव के पास प्रवेश करती है और भटनेर के निकट विलुप्त हो जाती है, पर तेज़ बारिश में इसका जल गंगानगर के सूरतगढ़ व अनूपगढ़ तक और कभी-कभी सीमा पार पाकिस्तान के फोर्ट अब्बास तक पहुँच जाता है; तलवाड़ा से गंगानगर तक इसकी बाढ़ प्रायः चावल की फसल को नुकसान पहुँचाती है, और यहाँ इसके पाट को स्थानीय रूप से 'नाली' कहा जाता है।
- घग्घर व सतलज नदियों के मिले-जुले निक्षेपण से गंगानगर-हनुमानगढ़ में एक उपजाऊ दोआब मैदान बना है; इसी नदी क्षेत्र में ढके हुए अपवाह व पुरा-अपवाह के अवशेष मिलते हैं, जो इसके प्राचीन सरस्वती-संबंध का पुख्ता प्रमाण हैं।
🌾पूर्वी राजस्थान की अन्तःप्रवाही नदियाँ
- साबी नदी जयपुर की सेवर पहाड़ियों से निकलकर हरियाणा में प्रवेश करती है और पटौदी के उत्तर में भूमि में विलीन हो जाती है, पर अत्यधिक वर्षा में यह नजफगढ़ झील होते हुए यमुना तक अपना जल पहुँचा देती है; प्राचीन जोधपुरा स्थल इसी के तट पर बसा है।
- बाणगंगा 240 किमी बहकर जयपुर, दौसा व भरतपुर से गुजरते हुए उत्तरप्रदेश में यमुना से मिलती है, पर कम वर्षा में यह भरतपुर के आसपास फैलकर विलुप्त हो जाती है, इसलिए इसे आन्तरिक अपवाह की नदी तथा अवसादों में खो जाने के कारण 'रुण्डित नदी' (Braided/Beheaded River) भी कहा जाता है।
- रूपारेल (वाराह/लसवारी) अलवर के थानागाजी रिजर्व वन में सरिस्का अभयारण्य के निकट उदयनाथ पहाड़ी से निकलकर अलवर व भरतपुर से बहती हुई भरतपुर के कुसलपुर गाँव के पास विलुप्त हो जाती है; इसके निकट कनफटे नाथों का प्रमुख तीर्थ भर्तृहरि धाम स्थित है।
- गंभीर नदी करौली-भरतपुर से उत्तरप्रदेश में जाकर पुनः धौलपुर लौटती है और अंततः यूपी के मैनपुरी में यमुना से मिलती है — मुगलकालीन खानवा युद्ध का मैदान इसी के निकट स्थित है; पार्वती (करौली-धौलपुर) इसकी सहायक है और इस पर अंगाई बाँध बना है।
🐪शेखावाटी की लुप्त होती धाराएँ
- काँतली नदी सीकर के खण्डेला की पहाड़ियों से निकलकर नीम का थाना व झुंझुनूँ से बहती हुई चूरू सीमा पर विलुप्त हो जाती है; इसका बहाव क्षेत्र 'तोरावाटी' कहलाता है और ताम्रयुगीन गणेश्वर सभ्यता इसी की द्रोणी में फली-फूली थी।
- शेखावाटी क्षेत्र की अन्य अन्तःप्रवाही नदियों में दोहन, मेंथा (जो सांभर झील में उत्तर से गिरती है), कृष्णावती, रघुनाथगढ़, कसावती व साहिबी शामिल हैं — इनमें से अधिकांश केवल कुछ किलोमीटर बहकर ही रेत या मैदान में लुप्त हो जाती हैं।
🏜️जैसलमेर की मरुस्थलीय जलधाराएँ
- काकनी (काकनेय) नदी जैसलमेर शहर के दक्षिण में कोटरी गाँव से निकलकर मात्र 4-5 किमी बहने के बाद विलुप्त हो जाती है, अधिक पानी आने पर यह जैसलमेर की 'बुझ' झील में जा गिरती है; अच्छी बारिश में इसे स्थानीय भाषा में 'मसूरदी नदी' भी कहा जाता है।
- मसूरदी नाला सत्तों की ढाणी व कुलधरा गाँव के पास से निकलकर 12-13 किमी बहकर रेत के धोरों में समा जाता है, जबकि जैसलमेर की सूकड़ी नदी (मुख्य लूनी बेसिन की सूकड़ी से अलग) खुरों का तला, मदासर, नेरना व चाँदन गाँवों से होकर 40-45 किमी बहती है, और घूगरी नदी भैरव गाँव से चाँदन तक लगभग 25-26 किमी का सफर तय कर विलुप्त हो जाती है।
राजस्थान की झीलें: खारे व मीठे पानी की
पश्चिमी मरुस्थल की चमचमाती खारी झीलें और मेवाड़-अजमेर की हरी-भरी मीठे पानी की झीलें मिलकर राजस्थान को नमक उत्पादन से लेकर पर्यटन तक हर तरह से समृद्ध बनाती हैं।
🧂पश्चिमी झीलें खारी क्यों हैं?
- राजस्थान में दो तरह की झीलें मिलती हैं — खारे पानी की, जो मुख्यतः उत्तर-पश्चिमी मरुस्थल में हैं, और मीठे पानी की, जो प्रायः अरावली के पूर्वी भाग में पाई जाती हैं।
- इनके खारेपन के तीन कारण माने जाते हैं: पहला, यह क्षेत्र प्राचीन टेथिस सागर का अवशेष है; दूसरा, आसपास की अन्तःप्रवाही नदियाँ हर साल नमक के कण बहाकर झीलों में लाती हैं (बाह्य स्रोत); और तीसरा — सबसे महत्त्वपूर्ण — झील तल के नीचे मौजूद माइकाशिष्ट लवणीय चट्टानों से केशाकर्षण विधि द्वारा नमक धीरे-धीरे पानी में घुलता रहता है (आंतरिक स्रोत)।
🦩साँभर झील — भारत की सबसे बड़ी अंतर्देशीय खारी झील
- साँभर झील जयपुर जिले के साँभर कस्बे के पास स्थित है और चिल्का के बाद भारत की दूसरी सबसे बड़ी खारे पानी की झील है, साथ ही अंतर्देशीय जलक्षेत्रों में देश की सबसे बड़ी खारी झील है; भारत के कुल नमक उत्पादन का लगभग 8.7% यहीं से आता है, और यहाँ मुगलकाल से नमक बनाया जा रहा है।
- यह लगभग 32 किमी लंबी व 3-12 किमी चौड़ी है तथा जयपुर, अजमेर व डीडवाना-कुचामन — तीन जिलों की सीमा बनाती है; इसमें मेंथा, रूपनगढ़, खारी, बाण्डी का नाला व खण्डेल सहित पाँच नदियों का पानी आता है, और इसका आन्तरिक अपवाह क्षेत्र लगभग 5702.6 वर्ग किमी में फैला है।
- शीत ऋतु में उत्तरी एशिया व रूस से हजारों फ्लेमिंगो यहाँ आते हैं, हालाँकि 2019 में यहाँ बड़ी संख्या में पक्षियों की मौत की घटना सुर्खियों में रही थी; झील के एकीकृत प्रबंधन व विकास के लिए राज्य सरकार ने 'साँभर लेक मैनेजमेंट प्रोजेक्ट' शुरू किया है और यहाँ 4000 मेगावाट का सौर ऊर्जा संयंत्र भी प्रस्तावित है।
🧂अन्य खारी झीलें
- डीडवाना झील (डीडवाना-कुचामन) की तली में लवणीय चट्टानें व खारे जल के भंडार हैं, पर यहाँ का नमक सोडियम की जगह सल्फेट अधिक होने से प्रायः खाने योग्य नहीं होता; इसके उलट बालोतरा की पचपदरा झील में उत्तम श्रेणी का नमक बनता है, जहाँ पानी में सोडियम क्लोराइड की मात्रा 98% तक पहुँच जाती है और खारवाल समुदाय मोरली झाड़ी के उपयोग से नमक के स्फटिक तैयार करता है।
- फलौदी जिले की फलौदी झील और बीकानेर के लूणकरणसर कस्बे की लूणकरणसर झील भी नमक झीलों में गिनी जाती हैं, हालाँकि लूणकरणसर से नमक उत्पादन बहुत सीमित मात्रा में होता है; इनके अलावा कावोद (जैसलमेर), डेगाना (नागौर), कुचामन, तालछापर (चूरू), कछोर-रेवासा (सीकर), झखराड़ा (बाड़मेर) व थोब (बालोतरा) जैसी छोटी खारी झीलें भी राज्य भर में फैली हैं।
- फलौदी के खींचन गाँव में भी शीत ऋतु में उत्तरी एशिया के ठंडे प्रदेशों से हजारों 'कुरजाँ' (डेमॉइज़ेल क्रेन) पक्षी आकर डेरा डालते हैं, जो राज्य के इस मरुस्थलीय क्षेत्र को पक्षी-प्रेमियों के लिए एक खास ठिकाना बनाते हैं।
👑उदयपुर की राजसी झीलें
- जयसमंद झील (सलूम्बर) का निर्माण 1685-1691 के बीच महाराणा जयसिंह ने गोमती नदी पर बाँध बाँधकर करवाया था; गोविंद सागर (भाखरा बाँध) के बाद यह एशिया की सबसे बड़ी व सबसे पुरानी मानव-निर्मित मीठे पानी की झील है, जिसमें भील व मीणा जनजातियों के निवास वाले 7 बड़े टापू हैं।
- राजसमंद झील का निर्माण महाराणा राजसिंह ने 1662 में कांकरौली के निकट अकाल-राहत कार्य के तहत आरंभ करवाया, जो 1676 में पूरा हुआ — इसे राज्य का सबसे पुराना ज्ञात अकाल-राहत कार्य माना जाता है; इसकी दक्षिणी पाल 'नौचौकी की पाल' कहलाती है, जहाँ मेवाड़ के इतिहास को दर्ज करती 25 शिलालेखों वाली राजसिंह प्रशस्ति उत्कीर्ण है।
- उदयपुर की पिछोला झील 14वीं सदी के अंत में राणा लाखा के समय एक बंजारे ने बनवाई थी, जिसे बाद में महाराणा उदयसिंह ने संवारा; इसके दो टापुओं पर बने जगमंदिर व जगनिवास महल आज लेक पैलेस होटल के रूप में मशहूर हैं, और यहीं शहज़ादा खुर्रम (शाहजहाँ) ने बगावत के दिनों में शरण ली थी। सीसारमा व बुझड़ा नदियाँ इसे भरती हैं।
- फतेहसागर झील को महाराणा फतेहसिंह ने 1888 में पुनर्निर्मित करवाया, जबकि उदयसागर झील महाराणा उदयसिंह ने 1559-1564 के बीच बनवाई थी; आयड़ नदी इसी उदयसागर में गिरकर आगे बेड़च नदी कहलाती है।
🌊अजमेर व अन्य मीठे पानी की झीलें
- अजमेर की आनासागर झील पृथ्वीराज चौहान के दादा अरणोराज (अनाजी) ने 1137 में बनवाई थी; इसके किनारे जहाँगीर ने दौलत बाग व शाहजहाँ ने संगमरमर की बारहदरी बनवाई। पास ही वरुण सागर (फॉयसागर) झील अंग्रेज़ इंजीनियर फॉय की देखरेख में बांडी नदी को रोककर अकाल-राहत परियोजना के तहत बनी, जिसका अतिरिक्त पानी आनासागर में जाता है।
- अजमेर से 11 किमी दूर पुष्कर झील सभी हिन्दू तीर्थों में श्रेष्ठ मानी जाती है, जहाँ विश्वप्रसिद्ध ब्रह्मा मंदिर है और हर कार्तिक पूर्णिमा को विशाल मेला लगता है; माउंट आबू की नक्की झील राजस्थान की सबसे ऊँची झील है, जिसके बारे में मान्यता है कि इसे देवताओं ने नाखूनों से खोदा था।
- अलवर की सिलीसेढ़ झील अरावली की सुरम्य पहाड़ियों में बसी है, जहाँ 1845 में महाराजा विनयसिंह ने अपनी रानी के लिए महल बनवाया था, जो आज लेक पैलेस होटल है; बीकानेर की कोलायत झील कपिल मुनि की तपोभूमि है और जोधपुर की बालसमंद झील 1159 में प्रतिहार शासक बालक राव ने बनवाई थी।
- राज्य में गेब सागर (डूँगरपुर), नवलखा (बूँदी), कायलाना व तख्तसागर (जोधपुर), गजनेर (बीकानेर), तालाबशाही (धौलपुर) व जलमहल-मानसागर (जयपुर) जैसी और भी अनेक मीठे पानी की झीलें फैली हैं, जिनमें से जयपुर की सूखी पड़ी रामगढ़ झील को पुनर्जीवित करने के प्रयास चल रहे हैं।