सहकारिता
Cooperatives
जानिए सहकारिता का असली मतलब, रॉकडेल से लेकर राजस्थान तक इसका सफर, और वे बैंक, संघ व योजनाएँ जो आज भी किसानों व ग्रामीणों की रीढ़ हैं।
सहकारिता की बुनियाद और वैश्विक शुरुआत
अधिनियमों और आँकड़ों में जाने से पहले यह समझना जरूरी है कि सहकारिता का असली मतलब क्या है और आधुनिक आंदोलन ने सबसे पहले जड़ें कहाँ जमाईं।
🌱अर्थ और मार्गदर्शक सिद्धांत
- सहकारिता को सामाजिक-आर्थिक विकास का एक अहम स्तम्भ माना जाता है, जो 'एक सबके लिए, सब एक के लिए' के आदर्श वाक्य पर टिकी है और एक लोकतांत्रिक आंदोलन के रूप में सदस्यों की अपनी, सदस्यों द्वारा चलाई और सदस्यों के लिए बनी व्यवस्था है।
- इसका केंद्रीय मकसद सामाजिक उत्थान है — आपसी सहयोग से गरीब, साधनहीन और आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को बिचौलियों के शोषण से मुक्त कराकर विकास की मुख्यधारा से जोड़ना; राज्य की ग्रामीण अर्थव्यवस्था के विकास में इस क्षेत्र की भूमिका खासतौर पर अहम रही है।
- वर्तमान में सहकारिता राज्य सूची का विषय है, पर एक से अधिक राज्यों में काम करने वाली समिति संघ सूची के दायरे में आती है, जिससे उससे जुड़ा कानून बनाने का अधिकार संसद के पास होता है; राजस्थान सहकारिता अधिनियम, 2001 की अनुसूची 'क' में आंदोलन के मार्गदर्शक सिद्धांत दर्ज हैं।
- ये छह सिद्धांत हैं — स्वैच्छिक व खुली सदस्यता, सदस्यों का लोकतांत्रिक नियंत्रण, संस्था की पूँजी में सदस्यों की आर्थिक सहभागिता, स्वयंसहायता संगठन के रूप में स्वायत्तता व स्वतंत्रता, सदस्यों-प्रतिनिधियों-कर्मचारियों के लिए शिक्षा-प्रशिक्षण-सूचना, और सहकारी संस्थाओं के बीच आपसी सहकारिता।
🌍वैश्विक शुरुआत
- आधुनिक सहकारिता आंदोलन की जड़ें सन् 1844 में मिलती हैं, जब रॉकडेल पायोनियर्स — मिलकर काम करने वाले 28 बुनकरों — ने इंग्लैंड के लंकाशायर प्रांत के रॉकडेल कस्बे में 'The Rochdale Equitable Pioneer Society' बनाई; इसी पहली आधुनिक सहकारी सोसायटी से दुनिया को 'रॉकडेल सिद्धांत' मिले।
- इंग्लैंड के रॉबर्ट ओवन को सहकारिता आंदोलन का जनक (Father of Co-operative Movement) माना जाता है, और पहली सहकारिता कांग्रेस के दौरान 19 अगस्त, 1895 को लंदन में अंतरराष्ट्रीय सहकारी संघ की स्थापना हुई।
भारत में सहकारी आंदोलन
ब्रिटिश भारत में साहूकारों से किसानों को बचाने की कोशिश से लेकर आज के संवैधानिक ढाँचे तक — भारत में सहकारी कानून और संस्थाओं के विकास की झलक।
📜प्रारंभिक चरण (1889-1930 के दशक)
- भारतीय संस्कृति में सहयोग की भावना ऋग्वैदिक काल तक जाती है (ऋग्वेद के दसवें मंडल में इसके संकेत मिलते हैं), पर आधुनिक आंदोलन मुख्यतः किसानों को शोषक साहूकारों से बचाने के लिए शुरू हुआ — इसकी शुरुआत 1889 में लिटन द्वारा स्थापित भारत की पहली क्रेडिट को-ऑपरेटिव सोसायटी से हुई।
- एडवर्ड लॉ की अध्यक्षता वाली समिति और 1901 के भारतीय दुर्भिक्ष आयोग की सिफारिशों पर 25 मार्च, 1904 को सहकारी साख समिति कानून पारित हुआ — जिसे सर डेनियल हैमिल्टन ने 'गरीबी से सम्पन्नता का मार्ग' कहा; उसी साल भारत का पहला सहकारी उपभोक्ता भंडार मद्रास में खुला, और अक्टूबर 1904 में कांजीवरम में पहली शहरी सहकारी साख समिति बनी।
- 1912 के सहकारी साख समिति अधिनियम में सहकारी संघ (Federation) बनाने का प्रावधान जुड़ा, जिससे 1914 में भारत की पहली सहकारी हाउसिंग सोसायटी 'The Madras Cooperative Union' अस्तित्व में आई; मॉण्टेग्यू-चेम्सफोर्ड के सुझावों पर भारत सरकार अधिनियम, 1919 ने सहकारिता को प्रांतीय विषय बना दिया, और पहला प्रांतीय सहकारी कानून बॉम्बे कोऑपरेटिव सोसायटी एक्ट, 1925 था।
- कृषि पर रॉयल कमीशन (1928) ने भूमि बंधक बैंकों की स्थापना का सुझाव दिया, 1929 में 'All India Association of Cooperative Institute' बनी, और उसी वर्ष मद्रास में देश का पहला केन्द्रीय भूमि बंधक बैंक खुला।
🧭समितियाँ व सुधार (1937-1982)
- मेहता समिति (1937) ने बहुउद्देशीय सहकारी समितियों के विकास का सुझाव दिया, 1942 में इसके बाद 'Multi-Unit Cooperative Societies Act' आया, और 1944 की गाडगिल समिति ने कृषि साख निगमों की स्थापना की सिफारिश की।
- रिजर्व बैंक की अखिल भारतीय ग्रामीण साख सर्वेक्षण समिति (श्री गोरवाला की अध्यक्षता में, 1951, रिपोर्ट 1954) ने वृहदाकार सहकारी समितियाँ बनाने का सुझाव दिया; द्वितीय पंचवर्षीय योजना में National Cooperative Development Fund बना, और 1958 में राष्ट्रीय विकास परिषद ने ग्राम समाज को सहकारिता की आधार इकाई बनाकर पंचायतों से तालमेल बिठाने की सिफारिश की।
- एम.एल. दांतेवाला समिति (1964) ने मंडी स्तर पर द्वि-स्तरीय विपणन समिति ढाँचे का सुझाव दिया, मिर्धा समिति (1964, रिपोर्ट अगस्त 1965) ने सहकारिता पर व्यापक सुझाव दिए, डी.जी. कर्वे आयोग (1964, रिपोर्ट 1966) ने सहकारिता के छह सिद्धांत तय किए, और वैंकटप्पैया समिति (1969) ने राज्यों में कृषि साख निगम बनाने पर जोर दिया।
- राष्ट्रीय कृषि आयोग (1971) ने Farmers Service Societies (FSS) बनाने का सुझाव दिया, दीक्षित समिति ने पंचायत स्तर की समितियों पर सुझाव दिए, रिजर्व बैंक के दाँते अध्ययन दल (1974) ने राजस्थान की कृषि साख सहकारी संस्थाओं का अध्ययन किया, आर.के. हजारी समिति (1975-76) ने राज्य-जिला-प्राथमिक स्तर के त्रि-स्तरीय ढाँचे का सुझाव दिया, और बी. शिवरमन की क्रेफिकार्ड समिति (रिपोर्ट जनवरी 1981) ने FSS, LAMPS और नाबार्ड बनाने का सुझाव दिया — नाबार्ड की स्थापना नाबार्ड अधिनियम, 1981 के तहत 12 जुलाई, 1982 को हुई।
⚖️आधुनिक कानूनी ढाँचा
- दिसंबर 1946 में पंजीकृत 'खेड़ा जिला सहकारी दुग्ध उत्पादक यूनियन' — जो आज गुजरात सहकारी दुग्ध विपणन फेडरेशन के 'अमूल' ब्रांड के रूप में जानी जाती है — आंदोलन की सबसे बड़ी सफलता गाथाओं में गिनी जाती है; 1962 में कृषि पुनर्वित्त निगम और 1963 में राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम (NCDC) बनाया गया।
- पुणे में Vaikunth Mehta National Institute of Cooperative Management की स्थापना 1967 में हुई, जिसका नाम सहकारिता आंदोलन के पथ-प्रदर्शक माने जाने वाले श्री वैकुंठ लाल मेहता के नाम पर रखा गया है।
- बहुउद्देशीय राज्य सहकारी समिति अधिनियम, 2002 (MSCS Act, 2002) ने पुराने 1984 वाले कानून (MSCA) की जगह ली, और राष्ट्रीय सहकारिता नीति 2002 में लागू हुई, जो पंडित जवाहरलाल नेहरू द्वारा 1958 में सर्वसमावेशी समाजवाद की नींव रखते हुए बनाई गई पहली 'राष्ट्रीय सहकारिता नीति' पर आधारित थी।
- संविधान (97वाँ संशोधन) अधिनियम, 2011, जो 12 जनवरी, 2012 से लागू हुआ, ने अनुच्छेद 243ZG के बाद नया भाग '9ख' जोड़ा और अनुच्छेद 243ZH से 243ZT तक डालकर सहकारी समितियों को स्पष्ट संवैधानिक मान्यता दी।
राजस्थान में सहकारिता की जड़ें
राजस्थान में सहकारिता की कहानी 1904 में अजमेर से शुरू हुई और आज यह अपने 2001 के कानून के तहत बैंकों, समितियों व संघों के घने जाल में बदल चुकी है।
🌱शुरुआत और कानूनी विकास
- किसानों को कृषि साख देकर बिचौलियों से मुक्त कराने के मकसद से राज्य में सहकारी आंदोलन की शुरुआत 1904 में अजमेर से हुई; उसी साल भरतपुर व डीग में सहकारी कृषि बैंक खुले, और अक्टूबर 1905 में अजमेर के भिनाय में राजस्थान की पहली सहकारी समिति पंजीकृत हुई।
- अजमेर को 1910 में राज्य का पहला केन्द्रीय सहकारी बैंक और 1924 में पहला भूमि बंधक बैंक मिला; देशी रियासतों में भरतपुर 1915 में सबसे पहले सहकारी कानून बनाने वाली रियासत बनी।
- 1948 में यूनाइटेड स्टेट ऑफ कोऑपरेटिव सोसायटी ऑर्डिनेंस से संयुक्त राजस्थान में सहकारी कानून लागू हुआ, इसके बाद पुराने कानूनों में एकरूपता लाने के लिए 'राजस्थान सहकारी समितियाँ अधिनियम, 1953' पारित हुआ, फिर राजस्थान सोसायटी रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1958 (1 अप्रैल 1959 से लागू) और 2 अक्टूबर, 1965 से एक संशोधित सहकारी अधिनियम आया।
- 1965 वाले अधिनियम की धारा 5(1) के अनुसार कम से कम 15 व्यक्ति — या कम से कम 5 पहले से मौजूद सहकारी समितियाँ — मिलकर नई समिति के पंजीयन हेतु आवेदन कर सकती थीं, और पंजीयन अनिवार्य है; वर्तमान सहकारी अधिनियम, 2001, 14 नवंबर, 2002 से लागू है।
📊वर्तमान विस्तार और निगरानी
- आज राज्य में शीर्ष स्तर पर 23 राज्य स्तरीय संघ हैं, और जिला स्तर पर 29 केन्द्रीय सहकारी बैंक, 24 जिला दुग्ध संघ, 38 सहकारी उपभोक्ता होलसेल भंडार तथा 36 प्राथमिक भूमि विकास बैंक पंजीकृत हैं।
- अब तक बने कुल 31 केन्द्रीय सहकारी बैंकों में से 29 चालू और रिजर्व बैंक से लाइसेंसशुदा हैं, जबकि राजसमंद व करौली के नए बैंकों को अभी रिजर्व बैंक का लाइसेंस लेना बाकी है; इनके अलावा राज्य में 37 अर्बन/नागरिक सहकारी बैंक हैं — जिनमें जयपुर, जोधपुर व बीकानेर के 3 रेलवे कर्मचारी बैंक, 6 महिला अर्बन बैंक और मल्टीस्टेट को-ऑपरेटिव एक्ट, 2002 में पंजीकृत 4 बैंक शामिल हैं (इन 37 में से 6 बंद होने की प्रक्रिया में हैं)।
- राज्य के आदिवासी क्षेत्रों में LAMPS को ग्रामीण आर्थिक गतिविधियों के प्रमुख केन्द्र के रूप में विकसित किया जा रहा है, और सहकारिता मंत्रालय के निर्देश पर मुख्य सचिव की अध्यक्षता वाली राज्य स्तरीय सहकारिता विकास समिति (SCDC) व जिला कलेक्टर की अध्यक्षता वाली जिला सहकारिता विकास समिति (DCDC) हर 2 महीने में बैठक कर इस क्षेत्र की निगरानी करती हैं।
🖊️2001 अधिनियम में संशोधन
- 2016 के संशोधन ने सहकारी चुनावों में शैक्षणिक योग्यता अनिवार्य कर दी — ऐसा करने वाला राजस्थान देश का पहला राज्य बना — और साथ ही एक भर्ती बोर्ड बनाया, समितियों को ज्यादा स्वायत्तता दी, और वित्तीय वर्ष खत्म होने के 6 महीने के भीतर ऑडिट अनिवार्य कर दिया।
- 2018 के संशोधन ने निर्वाचित संचालकों व अध्यक्षों को उसी समिति में लगातार दो और अवधियों के लिए दोबारा चुने जाने की छूट दी (2016 के संशोधन के बाद निर्वाचित प्रतिनिधियों पर लागू), जबकि 2019 के संशोधन ने — जिसे विधानसभा ने 13 फरवरी, 2019 को सर्वसम्मति से पारित कर 22 फरवरी, 2019 को अधिसूचित किया — विधायकों को भी सहकारी समिति का अध्यक्ष या उपाध्यक्ष चुने जाने की अनुमति दी।
साख, विपणन व क्षेत्रवार सहकारी ढाँचे
राजस्थान का सहकारी तंत्र साख, विपणन, उपभोक्ता वस्तुओं, डेयरी, महिला और आवास जैसी अलग-अलग शाखाओं में बँटा है, जिनकी अपनी-अपनी शीर्ष संस्था और अपने हिस्से का असर व चुनौतियाँ हैं।
🌾अल्पकालीन व मध्यकालीन साख
- अल्पकालीन व मध्यकालीन कृषि साख एक त्रि-स्तरीय ढाँचे से मिलती है — शीर्ष पर राजस्थान राज्य सहकारी बैंक (Apex Bank), जिला स्तर पर 29 केन्द्रीय सहकारी बैंक, और ग्राम पंचायत स्तर पर प्राथमिक कृषि सहकारी समितियाँ (PACS)/LAMPS, जो नकद या कृषि आदानों के रूप में ऋण देती हैं।
- Apex Bank का गठन राजस्थान राज्य सहकारी साख संघ की सिफारिश पर 14 अक्टूबर, 1953 को हुआ, और यह संसाधन जुटाकर 3-5 साल की मध्यकालीन अवधि के लिए ऋण देता है — अल्पकालीन ऋण 1 साल तक और मध्यकालीन ऋण 1-5 साल तक के लिए होता है।
🏗️दीर्घकालीन साख
- दीर्घकालीन साख (5-15 साल) राजस्थान राज्य सहकारी भूमि विकास बैंक के जरिये मिलती है, जिसका गठन 26 मार्च, 1957 को जयपुर में हुआ; यह साधारण ऋण-पत्रों के जरिये पैसा जुटाकर अपने 36 प्राथमिक भूमि विकास बैंकों व उनकी 124 शाखाओं के माध्यम से ऋण देता है।
- इन दीर्घकालीन ऋणों से लघु सिंचाई परियोजनाएँ, कृषि यंत्रीकरण, डेयरी विकास, मत्स्य पालन, कुक्कुट व सूअर पालन, हौज निर्माण और फल वृक्षारोपण जैसे काम होते हैं।
🛒विपणन सहकारिता (राजफैड)
- विपणन सहकारिता किसानों को समय पर उर्वरक, कीटनाशक और उपज का लाभकारी मूल्य दिलाना सुनिश्चित करती है; इसकी शीर्ष संस्था राजफैड (राजस्थान राज्य सहकारी क्रय-विक्रय संघ) की स्थापना 27 नवंबर, 1957 को जयपुर में हुई, जो जिला/मंडी स्तर की प्राथमिक विपणन समितियों के जरिये काम करती है।
- राजफैड क्रय-विक्रय सहकारी समितियों के जरिये न्यूनतम समर्थन मूल्य पर उपज खरीदता है, पशु आहार आपूर्ति करता है, कृषि उत्पादन व विक्रय का व्यावसायिक विकास करता है और सहकारी कार्मिकों को प्रशिक्षण देता है।
🛍️उपभोक्ता सहकारिता (कॉनफेड)
- उपभोक्ता सहकारिता जिला स्तर की सहकारी उपभोक्ता होलसेल भंडारों के जरिये रोजमर्रा का सामान वाजिब दाम पर मुहैया कराती है, जिसकी शीर्ष संस्था कॉनफेड (राजस्थान राज्य सहकारी उपभोक्ता संघ) की स्थापना 27 मार्च, 1967 को जयपुर में हुई; यह 8 'उपहार' विक्रय केन्द्र और एक प्रमाणित 'उपहार' मसाला ब्रांड भी चलाती है।
🐄डेयरी सहकारिता (RCDF)
- ग्रामीण दुग्ध उत्पादकों को उचित मूल्य और उपभोक्ताओं को शुद्ध दुग्ध पदार्थ पहुँचाने वाली डेयरी सहकारिता त्रि-स्तरीय ढाँचे पर चलती है — राज्य स्तर पर राजस्थान सहकारी डेयरी संघ (RCDF, गठन 1977-78), जिला स्तर पर जिला दुग्ध उत्पादक संघ, और ग्राम स्तर पर प्राथमिक दुग्ध उत्पादक सहकारी समितियाँ।
🏠महिला व आवास सहकारिता
- महिला सहकारिता का मकसद ग्रामीण महिलाओं का आर्थिक विकास और उचित सामाजिक स्तर सुनिश्चित करना है; राज्य में 6 महिला नागरिक सहकारी बैंक हैं (उदयपुर व जयपुर में 2-2, कोटा व भरतपुर में 1-1), जिनमें पहला — राजपूताना महिला नागरिक सहकारी बैंक, उदयपुर — 30 अगस्त, 1995 को बना।
- आवास सहकारिता सदस्यों को घर बनाने, खरीदने या विस्तार के लिए दीर्घकालीन ऋण देती है और किफायती दरों पर आवासीय कॉलोनियाँ बनाती है; इसकी शीर्ष संस्था राजस्थान राज्य सहकारी आवासन संघ है, जिसकी स्थापना दिसंबर 1970 में जयपुर में हुई।
📈महत्त्व और प्रभाव
- सहकारी साख संस्थाएँ किसानों को समय पर कम ब्याज पर ऋण, साथ ही अच्छे बीज, उर्वरक, कीटनाशक, पशु आहार व उपभोक्ता सामान वाजिब दाम पर देती हैं, और उन्हें उपज का लाभकारी मूल्य दिलाने में भी मदद करती हैं; किसानों को मिलने वाली कुल संस्थागत साख का करीब 90% और कुल कृषि आदानों का करीब 80% हिस्सा सहकारी क्षेत्र से ही आता है।
- सहकारी प्रयासों से सिंचाई सुविधाओं और आधुनिक कृषि तकनीक का विस्तार हुआ है, उद्योग व आवास के लिए ऋण मिलने लगे हैं, और महिलाओं ने भी बैंक चलाना शुरू कर दिया है — जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में बचत व बैंकिंग की आदत बढ़ी है; प्रदेश में श्वेत क्रांति और हरित क्रांति भी मुख्यतः सहकारिता के जरिये ही संभव हो सकीं।
⚠️चुनौतियाँ
- कर्ज वसूली इस क्षेत्र की सबसे बड़ी चुनौती है, जिसे संसाधनों के गलत उपयोग, लगातार धन की कमी और ऋण देने में प्राथमिकता तय न कर पाने जैसी समस्याएँ और बढ़ा देती हैं।
- पक्षपात, भाई-भतीजावाद, भ्रष्टाचार व राजनीतिक हस्तक्षेप सहकारी संस्थाओं के कामकाज को प्रभावित करते हैं, और कुशल प्रबंधन की कमी, सदस्यों की कमजोर भागीदारी तथा प्रबंधन का आम तौर पर जनप्रतिनिधियों की बजाय सरकारी प्रशासकों के हाथ में रहना इसे और बिगाड़ देता है।
💡सुधार हेतु सुझाव
- सुझाए गए सुधारों में शामिल हैं — वसूली सुनिश्चित करने के लिए कर्ज सिर्फ उत्पादक कार्यों के लिए देना, कमजोर व छोटी प्राथमिक समितियों का पुनर्गठन कर उन्हें बड़ी सक्षम समितियों में मिलाना, और कुशल-प्रशिक्षित प्रशासक व समर्पित कार्यकर्ता नियुक्त करना।
- अन्य सुझावों में शामिल हैं — नौकरशाही के दबदबे से छुटकारा पाने के लिए कामकाज सरल बनाना, क्षेत्र को अधिक वित्तीय संसाधन देना, व्यापक सहकारी शिक्षा शुरू करना, बहुउद्देशीय समितियाँ बनाना, और संस्थाओं के संचालन की जिम्मेदारी चुने हुए प्रतिनिधियों को सौंपना।
प्रमुख संस्थाएँ, योजनाएँ व खास तथ्य
बैंकों व संघों से आगे, विशेष संस्थाओं, किसान-कल्याण योजनाओं और रोचक तथ्यों का जाल राजस्थान के सहकारिता परिदृश्य को पूरा करता है।
🏢प्रमुख राज्य-स्तरीय संस्थाएँ
- 21 दिसम्बर, 1957 को बना राजस्थान राज्य सहकारी संघ प्रदेश के सहकारी आंदोलन की सबसे बड़ी प्रतिनिधि संस्था माना जाता है और जयपुर में एक सहकारी प्रशिक्षण केन्द्र चलाता है; 2001 अधिनियम की धारा 32 के तहत बनी राज्य सहकारी निर्वाचन प्राधिकरण का औपचारिक गठन 1 मार्च, 2005 को सहकारी चुनाव कराने के लिए हुआ, जबकि राजस्थान सहकारी भर्ती बोर्ड सहकारी संस्थाओं में भर्ती को पारदर्शी बनाता है।
- राइसेम (Rajasthan Institute of Co-operative Education & Management, गठन 9 मार्च, 1990) सहकारिता क्षेत्र में शिक्षा, प्रशिक्षण व शोध का केन्द्र है, जिसका अध्यक्ष प्रमुख शासन सचिव (सहकारिता) और उपाध्यक्ष रजिस्ट्रार, सहकारी समितियाँ होता है; यह 1 जून, 2020 से एक प्लेसमेंट/भर्ती एजेंसी के रूप में भी काम कर रहा है। जयपुर स्थित सहकारी प्रबंध संस्थान भी इसी तरह सहकारी व विभागीय कर्मचारियों को प्रबंधन प्रशिक्षण देता है।
- क्षेत्र-विशेष संघों में शामिल हैं — राजस्थान राज्य बुनकर सहकारी संघ (26 अगस्त, 1957), तिलहन उत्पादकों के लिए तिलम संघ (1990, हालाँकि इसकी 8 में से 5 मिलें घाटे के चलते बंद हो गईं और झुंझुनूं व जालौर की मिलें बेच दी गईं), और तीन सूत कताई मिलों व एक जिनिंग मिल को मिलाकर 7 मार्च, 1992 को बना स्पिनफैड, जिसकी बाकी इकाइयाँ भी 22 जुलाई, 2017 को कानूनी रूप से बंद कर दी गईं।
- अन्य उल्लेखनीय संस्थाओं में शामिल हैं — नागरिक सहकारी बैंकों में तालमेल बिठाने वाली राजस्थान राज्य अरबन बैंक्स फेडरेशन, अनुसूचित जातियों के आर्थिक उत्थान हेतु 1980 में बनी अनुजा निगम (राजस्थान राज्य अनुसूचित जाति वित्त एवं विकास सहकारी निगम), 27 मार्च, 1976 को बना राजस्थान राज्य जनजाति क्षेत्रीय विकास सहकारी संघ, उदयपुर, और उपभोक्ता सहकारिता की राष्ट्रीय शीर्ष संस्था राष्ट्रीय सहकारी उपभोक्ता फेडरेशन (NCCF), जो नई दिल्ली मुख्यालय से 16 अक्टूबर, 1965 से काम कर रही है।
🛡️किसान साख, बीमा व राहत योजनाएँ
- 2025-26 के लिए राज्य अल्पकालीन फसली ऋण लेने वाले किसानों के लिए 'राजस्थान सहकारी कृषक Risk Relief Fund Scheme' चला रहा है, जिसने पुरानी सहकार जीवन सुरक्षा बीमा योजना की जगह ली है; इसमें आत्महत्या को छोड़कर किसी भी वजह से किसान की मृत्यु होने पर कोष से ऋण राशि के बराबर सहायता दी जाती है, जिसे पात्र सदस्यों के खाते से हर साल ऋण राशि के 1% की कटौती से वित्तपोषित किया जाता है।
- राज सहकार व्यक्तिगत दुर्घटना बीमा योजना, जो 2006-07 से केन्द्रीय सहकारी बैंकों के जरिये चल रही है, 18 से 79 साल के किसान क्रेडिट कार्डधारकों को 10 लाख रुपये तक का कवर देती है — एक अंग की स्थाई अपंगता पर 5 लाख और दो अंगों की अपंगता या दुर्घटना में मृत्यु पर 10 लाख रुपये; अलग से, 13 अक्टूबर, 2008 को शुरू हुई सहकार जीवन सुरक्षा बीमा योजना सहकारी बैंकों व प्राथमिक ऋणदात्री समितियों के ऋणी सदस्यों, जमाकर्ताओं व स्टाफ को जीवन बीमा लाभ देती थी।
- प्राथमिक सहकारी भूमि विकास बैंकों के अवधिपार कर्जदारों की मदद के लिए राज्य ने मुख्यमंत्री अवधिपार ब्याज राहत एकमुश्त समझौता योजना, 2025-26 को 18 अप्रैल, 2025 से लागू किया, जो 1 जुलाई, 2024 तक अवधिपार हुए खातों को कवर करती है; 30 सितंबर, 2025 तक (पहले 30 जून, 2025) न्यूनतम 25% राशि जमा कराने पर, और पूरा मूलधन व प्रीमियम चुकाने पर 100% ब्याज राहत मिलती है; योजना अब 31 मार्च, 2026 तक बढ़ा दी गई है।
- राजस्थान कृषक ऋण माफी योजना 2019 (6 फरवरी, 2019 को जारी) के तहत सहकारी बैंकों के किसानों के 30 नवंबर, 2018 तक के बकाया अल्पकालीन फसली ऋण माफ किए गए, और एक समानांतर योजना में लघु व सीमांत किसानों के 2 लाख रुपये तक के मध्यकालीन/दीर्घकालीन अवधिपार ऋण माफ किए गए; ऋण माफी प्रमाण-पत्र बाँटने वाले शिविरों का प्रदेश-स्तरीय शुभारंभ उपमुख्यमंत्री ने 7 फरवरी, 2019 को सिरसी (जयपुर) में किया।
🧑🌾आजीविका, युवा व आवास ऋण योजनाएँ
- राजस्थान ग्रामीण आजीविका ऋण योजना सहकारी बैंकों के जरिये गैर-कृषि गतिविधियों से आजीविका कमाने वाले ग्रामीण कारीगरों, हस्तशिल्पियों व लघु-सीमांत किसान परिवारों को ऋण देती है; कृषि उपज गिरवी योजना में किसान उपज गिरवी रखकर सिर्फ 3% ब्याज पर ऋण ले सकते हैं, और पैक्स को प्रधानमंत्री किसान समृद्धि केन्द्र (PMKSK) के साथ-साथ किसान उत्पादक संगठन (FPOs) के रूप में भी विकसित किया जा रहा है।
- महिला विकास ऋण योजना महिलाओं को बिना जमीन गिरवी रखे (दो व्यक्तियों की गारंटी पर) 5 साल के लिए 50,000 रुपये तक का ऋण देती है; शैक्षणिक संस्थान ऋण योजना निजी स्कूल/कॉलेजों को 2-10 साल के लिए ऋण देती है, और उच्च शिक्षा ऋण योजना ऋणी सदस्यों के बच्चों को स्नातकोत्तर/प्रोफेशनल पढ़ाई के लिए 10 लाख रुपये या खर्च के 80% (जो कम हो) तक का ऋण देती है।
- मुख्यमंत्री जलधारा योजना 15 दिसंबर, 2007 से उदयपुर, डूँगरपुर, बाँसवाड़ा, प्रतापगढ़, बारां व सिरोही जैसे 6 जनजाति/सहरिया जिलों की 25 पंचायत समितियों में नलकूप निर्माण, कूप गहरा करने और पंपसेट विद्युतीकरण जैसे लघु सिंचाई कार्यों के लिए ऋण देती है; ट्रैक्टर नकद ऋण वितरण योजना 9 साल के लिए रेखांकित चेक से ट्रैक्टर खरीद हेतु ऋण देती है, और सहकारी किसान कार्ड योजना — 29 जनवरी, 1999 को शुरू हुआ देश का पहला सहकारी किसान साखपत्र — अब रुपे किसान कार्ड के रूप में मिलती है।
- अन्य लक्षित योजनाओं में शामिल हैं — राज ग्राम्या (ग्रामीण पर्यटन, नोडल एजेंसी राइसेम), संजीवनी योजना (राजफैड द्वारा 18 मई, 2001 को शुरू, कमजोर समितियों के पुनर्जीवन के लिए), बेबी ब्लैंकेट योजना (1998 से, सहकारी आवासन संघ के जरिये मकान मरम्मत ऋण), अभिनव सहकारिता (2002-03 में युवा रोजगार के लिए शुरू), ज्ञानसागर ऋण योजना (11 सितंबर, 2002 से, 18-30 साल वालों के लिए देश में 6 लाख/विदेश में 10 लाख रुपये तक शिक्षा ऋण), सहकारी आवास योजना (9.5% ब्याज पर 15 साल तक के लिए 20 लाख रुपये तक), और अपना बचतघर योजना (महिला मिनी बैंक, 17 जनवरी, 2001 को जालौर के आकोली गाँव से शुरू)।
🚀हालिया पहलें व अभियान
- केन्द्रीय सहकारिता मंत्रालय — जो 'सहकार से समृद्धि' की परिकल्पना को साकार करने के लिए 6 जुलाई, 2021 को बना — ने 19 सितंबर, 2024 को श्वेत क्रांति 2.0 शुरू की; इसी 'सहकार से समृद्धि' कार्यक्रम के तहत भारत सहकारिता क्षेत्र में दुनिया की सबसे बड़ी अन्न भंडारण योजना चला रहा है, जिसमें राजस्थान की राज्य-वित्तपोषित योजना उन जिलों में गोदाम बनाने को प्राथमिकता देती है जहाँ भंडारण क्षमता उत्पादन के मुकाबले कम है।
- सहकार सदस्यता अभियान 2 से 15 अक्टूबर, 2025 तक चलाया जा रहा है, और श्री अन्न उत्पादों को बढ़ावा देने व सहकारिता/राजीविका के स्वयं सहायता समूहों के जरिये रोजगार पैदा करने के लिए 17 जुलाई, 2025 को सहकार व रोजगार उत्सव के दौरान 64 मिलेट आउटलेट्स शुरू किए गए।
- 'म्हारो खातो, म्हारो बैंक' अभियान के तहत डेयरी सोसायटियों के खाते सहकारी बैंकों में खोले जा रहे हैं, और आंदोलन को जमीनी स्तर तक फैलाने के लिए राज्य सहकारी विकास समिति का पुनर्गठन कर मुख्य सचिव को इसका अध्यक्ष बनाया गया है।
- राजस्थान सहकारी गोपाल क्रेडिट कार्ड ऋण योजना के तहत 2.5 लाख दुग्ध उत्पादक किसान परिवारों को गौवंश शेड, खेळी निर्माण व दूध/चारा उपकरण के लिए किसान क्रेडिट कार्ड की तर्ज पर एक लाख रुपये तक का ब्याज मुक्त अल्पकालीन ऋण मिल रहा है; नई बहुउद्देशीय ग्राम सेवा सहकारी समितियों के नियम आसान किए गए हैं — हिस्सा राशि 5 लाख से घटाकर 1.5 लाख रुपये और सदस्य संख्या 500 से घटाकर 150 कर दी गई है।
✨खास तथ्य व रोचक जानकारी
- हर साल जुलाई माह के पहले शनिवार को अंतर्राष्ट्रीय सहकारिता दिवस मनाया जाता है, जबकि नवंबर में सहकार सप्ताह मनाया जाता है; सहकारिता आंदोलन के ध्वज में सात रंग होते हैं — लाल, नीला, पीला, हरा, बैंगनी, आसमानी और नारंगी।
- देश की सहकारिता क्षेत्र में पहली करेंसी चेस्ट शाखा सेवा राजस्थान राज्य सहकारी बैंक, जयपुर के अंतर्गत शुरू हुई, और नैफेड ने राज्य के सहकारी क्षेत्र का पहला जीवाणु खाद (बायो-फर्टिलाइजर) कारखाना भरतपुर में लगाया।
- सहकारी क्षेत्र में जयपुर व अलवर में शीत भंडार, आबूरोड में ईसबगोल का कारखाना और जयपुर में बर्फ का कारखाना चल रहा है; सहकारिता क्षेत्र का देश का पहला विश्वविद्यालय 'त्रिभुवन विश्वविद्यालय' गुजरात में खुला है।