राजस्थानी भाषा एवं साहित्य — REET Mains नोट्स
राजस्थानी भाषा व साहित्य राजस्थान की सांस्कृतिक पहचान की नींव हैं — डिंगल-पिंगल जैसी काव्य-शैलियों से लेकर आधुनिक साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेताओं तक, यह टॉपिक REET Mains के राजस्थान GK खंड में नियमित रूप से पूछा जाता है। यहाँ रचनाकार-रचना जोड़े व प्रमुख साहित्यिक शैलियाँ व्यवस्थित ढंग से दी गई हैं।
- REET Mains राजस्थान GK
- सांस्कृतिक-साहित्यिक टॉपिक
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REET Mains में यह टॉपिक कैसे पूछा जाता है
REET Mains, RSSB द्वारा आयोजित शिक्षक भर्ती परीक्षा है और यह BSER की पात्रता परीक्षा REET से अलग है — REET Mains में आयु-सीमा, आरक्षण व मेरिट-आधारित चयन जैसे तत्व शामिल होते हैं। इस टॉपिक पर अभी तक कोई आधिकारिक प्रश्न-पत्र सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है (0 PYQs), इसलिए यह पेज राजस्थान GK पाठ्यक्रम में स्थापित तथ्यों पर आधारित है। परीक्षा में आमतौर पर डिंगल-पिंगल के अंतर, रचनाकार-रचना जोड़े और भाषा-संरक्षण संस्थाओं से जुड़े प्रत्यक्ष तथ्यात्मक प्रश्न पूछे जाने की प्रवृत्ति रहती है।
राजस्थानी भाषा का परिचय
राजस्थानी भारतीय-आर्य (Indo-Aryan) भाषा-परिवार की सदस्य है और राजस्थान में बोली जाने वाली परस्पर संबंधित बोलियों के समूह के रूप में जानी जाती है। भाषाविदों व साहित्यकारों का एक बड़ा वर्ग लंबे समय से यह मांग करता रहा है कि इसे भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची (Eighth Schedule) में शामिल किया जाए, परन्तु अभी तक यह अनुसूची में शामिल नहीं है, यद्यपि विधानसभा में भी इस आशय के प्रस्ताव पारित हो चुके हैं।
परंपरागत रूप से राजस्थानी देवनागरी लिपि में लिखी जाती है। ऐतिहासिक दस्तावेज़ों, राजस्व बहीखातों व व्यापारिक लेखा-जोखा में महाजनी व मोड़ी जैसी स्थानीय लिपियों के प्रयोग के प्रमाण भी मिलते हैं, जिनका उपयोग विशेष रूप से व्यापारी व महाजन वर्ग अपने हिसाब-किताब में करते थे।
राजस्थानी की साहित्यिक परंपरा केवल लिखित ग्रंथों तक सीमित नहीं है — लोकगीत, कठपुतली, ख्याल (पारंपरिक लोक-नाट्य) व मौखिक गाथाओं के माध्यम से भी यह भाषा पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित रही है। भोपों द्वारा फड़ चित्रों के साथ गाई जाने वाली गाथाएँ इसी मौखिक परंपरा का हिस्सा हैं।
इसके अतिरिक्त कठपुतली (कठपुतली-नाट्य) व स्वांग जैसी लोक-प्रदर्शन कलाएँ भी राजस्थानी भाषा में ही प्रस्तुत की जाती रही हैं, जो ग्रामीण मनोरंजन के साथ-साथ सामाजिक संदेश देने का भी माध्यम रही हैं।
डिंगल और पिंगल — दो प्रमुख साहित्यिक शैलियाँ
| शैली | स्वरूप | प्रमुख उदाहरण |
|---|---|---|
| डिंगल | चारण कवियों की वीर रस-प्रधान काव्य-भाषा, मारवाड़ी से निकटता | पृथ्वीराज रासो (चंद बरदाई), वीर सतसई (सूर्यमल्ल मिश्रण) |
| पिंगल | ब्रज व खड़ी बोली के निकट, श्रृंगार व भक्ति रस-प्रधान काव्य-शैली | भक्ति व श्रृंगार परक रचनाएँ |
डिंगल राजस्थान की मौलिक वीर-काव्य परंपरा है, जबकि पिंगल हिन्दी की व्यापक काव्य-परंपरा के अधिक निकट मानी जाती है।
चारण परंपरा व राजस्थानी साहित्य का सामाजिक संदर्भ
चारण समुदाय ने राजस्थानी साहित्य, विशेषकर डिंगल काव्य, के संरक्षण व सृजन में केंद्रीय भूमिका निभाई। चारण कवि रियासती दरबारों से जुड़े होते थे और वीर योद्धाओं की गाथाओं को काव्य-रूप में संजोते थे। इसी कारण डिंगल साहित्य में वीरता, बलिदान व स्वामिभक्ति जैसे विषय प्रमुखता से मिलते हैं।
इसके समानांतर ख्यात, वात, वंशावली व विगत जैसी गद्य-विधाओं ने रियासतों व वंशों के कालक्रमबद्ध इतिहास को दर्ज करने का कार्य किया, जो आज भी इतिहासकारों के लिए मूल स्रोत का काम करती हैं।
प्रमुख साहित्यकार एवं उनकी रचनाएँ
- चंद बरदाई
- 'पृथ्वीराज रासो' के रचयिता — पृथ्वीराज चौहान पर आधारित सबसे पुराने डिंगल वीर-काव्यों में गिना जाता है।
- मुहणोत नैणसी
- मारवाड़ी गद्य-लेखन के जनक माने जाते हैं; 'नैणसी री ख्यात' व 'मारवाड़ रा परगना री विगत' प्रमुख ऐतिहासिक रचनाएँ हैं, जिनमें मारवाड़ की प्रशासनिक व सामाजिक व्यवस्था का विस्तृत ब्यौरा मिलता है।
- सूर्यमल्ल मिश्रण
- बूँदी दरबार से जुड़े कवि; 'वीर सतसई' डिंगल की प्रसिद्ध वीर-काव्य रचना है।
- कविराजा श्यामलदास
- मेवाड़ के इतिहासकार-कवि; 'वीर विनोद' (मेवाड़ का इतिहास-ग्रंथ) के रचयिता।
- विजयदान देथा ('बिज्जी')
- आधुनिक राजस्थानी कथाकार; लोक-कथा संग्रह 'बातां री फुलवारी' के लिए 1974 में साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त हुआ।
- कन्हैयालाल सेठिया
- राजस्थानी के सुप्रसिद्ध आधुनिक कवि; भाषा व साहित्य-सेवा हेतु पद्मश्री से सम्मानित।
राजस्थानी साहित्य में सम्मान व पुरस्कार परंपरा
साहित्य अकादमी द्वारा राजस्थानी भाषा में लिखी गई श्रेष्ठ रचनाओं को नियमित रूप से पुरस्कृत किया जाता है, भले ही राजस्थानी आठवीं अनुसूची में शामिल न हो। यह दर्शाता है कि राष्ट्रीय स्तर पर भी राजस्थानी साहित्य की गुणवत्ता व समृद्धि को मान्यता प्राप्त है। इसके अतिरिक्त राज्य सरकार भी राजस्थानी भाषा व साहित्य अकादमी के माध्यम से स्थानीय स्तर पर लेखकों को सम्मानित करती है।
ऐतिहासिक गद्य-विधाएँ एवं संरक्षण संस्थाएँ
ख्यात, वात, वंशावली और विगत — राजस्थानी की प्रमुख ऐतिहासिक गद्य-विधाएँ हैं, जिनमें रियासतों, वंशों व प्रशासनिक व्यवस्था का विस्तृत विवरण मिलता है। ख्यात में सामान्यतः किसी रियासत या वंश का कालक्रमबद्ध इतिहास दर्ज होता है, जबकि वात लोक-कथाओं व प्रचलित जनश्रुतियों को समेटती है। इन्हीं विधाओं ने राजस्थान के मध्यकालीन इतिहास-लेखन की नींव रखी और आज भी इतिहासकारों के लिए मूल स्रोत का काम करती हैं।
राजस्थानी भाषा व साहित्य के संरक्षण व संवर्धन हेतु राजस्थान सरकार ने राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर की स्थापना की है, जो भाषा के विकास, प्रकाशन व शोध-कार्यों को बढ़ावा देती है। यह अकादमी नियमित रूप से राजस्थानी की मौलिक व अनूदित रचनाओं का प्रकाशन करती है तथा नए लेखकों को पुरस्कार व सम्मान देकर प्रोत्साहित करती है।
आधुनिक दौर में राजस्थानी भाषा का उपयोग लोक-नाट्य (ख्याल), फिल्म संवाद व सोशल मीडिया कंटेंट में भी बढ़ा है, जिससे नई पीढ़ी में भी इसकी पहचान बनी रहे। हालांकि औपचारिक शिक्षा व प्रशासन में इसकी सीमित उपस्थिति भाषा-संरक्षण की चुनौती बनी हुई है।
REET Mains में इसका महत्व
राजस्थान GK खंड में भाषा-साहित्य से जुड़े प्रश्न प्रायः रचनाकार-रचना जोड़ों, डिंगल-पिंगल के अंतर और साहित्य अकादमी जैसी संस्थाओं पर केंद्रित होते हैं। उम्मीदवारों को इन जोड़ों को तालिका के रूप में व्यवस्थित कर याद रखना चाहिए, क्योंकि भ्रामक विकल्प अक्सर मिलते-जुलते नामों (जैसे नैणसी व श्यामलदास, दोनों इतिहासकार-लेखक) पर आधारित होते हैं।
साथ ही, आठवीं अनुसूची से जुड़ा तथ्य — कि राजस्थानी अभी इसमें शामिल नहीं है — भी बार-बार पूछा जाने वाला प्रश्न है, इसलिए इसे स्पष्ट रूप से याद रखना चाहिए। भावी शिक्षकों के लिए यह टॉपिक इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वे कक्षा में विद्यार्थियों को स्थानीय भाषा-साहित्य के प्रति गर्व व जागरूकता से परिचित करा सकते हैं।
याद रखने की ट्रिक
रचनाकार-रचना जोड़े याद करने के लिए तुक बनाएं — 'चंद का रासो, नैणसी की ख्यात, मिश्रण की सतसई, श्यामलदास का विनोद' — इस क्रम को दोहराकर याद रखना परीक्षा में जल्दी उत्तर देने में मदद करता है।
अभ्यास प्रश्न
प्रश्न 1
'पृथ्वीराज रासो' किस काव्य-शैली की रचना मानी जाती है?
- Aपिंगल
- Bडिंगल
- Cब्रजभाषा
- Dअवधी
व्याख्या
'पृथ्वीराज रासो' चंद बरदाई द्वारा रचित डिंगल शैली का वीर-काव्य है, जो चारण परंपरा की वीर रस-प्रधान भाषा में लिखा गया है।
प्रश्न 2
'नैणसी री ख्यात' के रचयिता कौन हैं?
- Aसूर्यमल्ल मिश्रण
- Bश्यामलदास
- Cमुहणोत नैणसी
- Dचंद बरदाई
व्याख्या
मुहणोत नैणसी को मारवाड़ी गद्य-लेखन का जनक माना जाता है और उन्होंने 'नैणसी री ख्यात' की रचना की।
प्रश्न 3
'वीर सतसई' रचना किस कवि से संबंधित है?
- Aसूर्यमल्ल मिश्रण
- Bकन्हैयालाल सेठिया
- Cविजयदान देथा
- Dमुहणोत नैणसी
व्याख्या
बूँदी दरबार के कवि सूर्यमल्ल मिश्रण ने डिंगल शैली में 'वीर सतसई' की रचना की, जो वीर रस की प्रसिद्ध कृति है।
प्रश्न 4
'बातां री फुलवारी' के लिए 1974 में साहित्य अकादमी पुरस्कार किसे मिला?
- Aकन्हैयालाल सेठिया
- Bविजयदान देथा
- Cकविराजा श्यामलदास
- Dसूर्यमल्ल मिश्रण
व्याख्या
आधुनिक राजस्थानी कथाकार विजयदान देथा ('बिज्जी') को उनके लोक-कथा संग्रह 'बातां री फुलवारी' के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला।
प्रश्न 5
राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी किस शहर में स्थित है?
- Aजयपुर
- Bजोधपुर
- Cबीकानेर
- Dउदयपुर
व्याख्या
राजस्थानी भाषा-साहित्य के संरक्षण हेतु स्थापित यह अकादमी बीकानेर में स्थित है।
प्रश्न 6
'वीर विनोद' (मेवाड़ के इतिहास पर आधारित ग्रंथ) के रचयिता कौन हैं?
- Aकविराजा श्यामलदास
- Bचंद बरदाई
- Cमुहणोत नैणसी
- Dकन्हैयालाल सेठिया
व्याख्या
मेवाड़ के इतिहासकार-कवि कविराजा श्यामलदास ने मेवाड़ के इतिहास पर आधारित ग्रंथ 'वीर विनोद' की रचना की।
प्रश्न 7
राजस्थानी की किस साहित्यिक गद्य-विधा में रियासतों व वंशों का ऐतिहासिक विवरण मिलता है?
- Aरासो
- Bख्यात
- Cदोहा
- Dसोरठा
व्याख्या
ख्यात, वात, वंशावली व विगत राजस्थानी की ऐतिहासिक गद्य-विधाएँ हैं; ख्यात में वंशों व रियासतों का विवरण मिलता है, जबकि रासो पद्य-शैली (काव्य) है।
प्रश्न 8
राजस्थानी भाषा को लेकर निम्न में से कौन-सा कथन सही है?
- Aयह संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल है
- Bयह अभी संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल नहीं है
- Cयह केवल जयपुर संभाग में बोली जाती है
- Dइसकी कोई लिपि परंपरा नहीं रही
व्याख्या
राजस्थानी भाषा को आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग वर्षों से है, परन्तु अभी तक यह अनुसूची में शामिल नहीं है।
प्रश्न 9
पिंगल शैली मुख्यतः किस काव्य-परंपरा के निकट मानी जाती है?
- Aचारणी डिंगल परंपरा
- Bब्रज-खड़ी बोली काव्य परंपरा
- Cफारसी काव्य परंपरा
- Dतमिल संगम परंपरा
व्याख्या
पिंगल शैली ब्रज व खड़ी बोली की काव्य-परंपरा के निकट है और इसमें श्रृंगार व भक्ति रस प्रधान रचनाएँ मिलती हैं, जबकि डिंगल मारवाड़ी-चारणी परंपरा से जुड़ी है।
प्रश्न 10
'मारवाड़ रा परगना री विगत' रचना किससे संबंधित है?
- Aमुहणोत नैणसी
- Bकन्हैयालाल सेठिया
- Cसूर्यमल्ल मिश्रण
- Dविजयदान देथा
व्याख्या
मुहणोत नैणसी ने 'मारवाड़ रा परगना री विगत' की रचना की, जिसमें मारवाड़ की प्रशासनिक व्यवस्था का विस्तृत विवरण मिलता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
क्या राजस्थानी भाषा संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल है?+
नहीं, अभी तक राजस्थानी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल नहीं किया गया है, यद्यपि इसकी मांग लंबे समय से चल रही है।
डिंगल और पिंगल में क्या अंतर है?+
डिंगल चारण कवियों की वीर रस-प्रधान काव्य-भाषा है जो मारवाड़ी से निकट है, जबकि पिंगल ब्रज-खड़ी बोली के निकट श्रृंगार व भक्ति रस-प्रधान काव्य-शैली है।
'पृथ्वीराज रासो' के रचयिता कौन हैं?+
'पृथ्वीराज रासो' के रचयिता चंद बरदाई माने जाते हैं, जो पृथ्वीराज चौहान के दरबारी कवि थे।
राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी कहाँ स्थित है?+
यह अकादमी बीकानेर में स्थित है और राजस्थानी भाषा-साहित्य के संरक्षण व संवर्धन का कार्य करती है।
विजयदान देथा को किस रचना के लिए सम्मानित किया गया?+
विजयदान देथा ('बिज्जी') को उनके लोक-कथा संग्रह 'बातां री फुलवारी' के लिए 1974 में साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था।
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आधिकारिक स्रोत
बदलाव लॉग
- 16 सितंबर 2026 — पेज प्रकाशित — तथ्य स्वतंत्र रूप से जाँचे गए