परिचय
भारत की IT क्रांति केवल कंप्यूटर और कोडिंग की कहानी नहीं है — RPSC RAS प्रीलिम्स के लिए इसे सार्वजनिक नीति और सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन की कहानी के रूप में समझना बेहतर है। 1990 के दशक के आर्थिक उदारीकरण के बाद से भारत ने एक वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी सॉफ्टवेयर सेवा निर्यात उद्योग खड़ा किया, और 2015 से सरकार ने इसके ऊपर एक सुविचारित राष्ट्रीय नीति — डिजिटल इंडिया — जोड़ी है, ताकि डिजिटल प्रौद्योगिकी के लाभ कॉरपोरेट IT पार्कों से आगे बढ़कर गांवों, सरकारी कार्यालयों और आम नागरिकों तक पहुंचें। यह अध्ययन सामग्री उसी नीति और सामाजिक-आर्थिक पहलू पर केंद्रित है: डिजिटल इंडिया कार्यक्रम का विज़न और स्तंभ (पिलर्स), प्रशासनिक सुधार के उपकरण के रूप में ई-गवर्नेंस, एक आर्थिक क्षेत्र के रूप में भारत के IT/सॉफ्टवेयर सेवा उद्योग की वृद्धि, बढ़ती इंटरनेट पहुंच का भारतीय समाज और अर्थव्यवस्था पर प्रभाव, और डिजिटल विभाजन (digital divide) की सतत चुनौती। यह जानबूझकर कंप्यूटर हार्डवेयर, सॉफ्टवेयर या मेमोरी की मूल बातें शामिल नहीं करती, जो विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी पाठ्यक्रम के एक अलग विषय का हिस्सा हैं।
मुख्य अवधारणाएं
1. भारत का IT/सॉफ्टवेयर सेवा उद्योग — विकास की कहानी
भारत का आधुनिक सॉफ्टवेयर सेवा उद्योग 1991 के आर्थिक उदारीकरण के बाद आकार में आया, जिसने अर्थव्यवस्था को विदेशी निवेश, कंप्यूटिंग उपकरणों के आसान आयात और निर्यात-उन्मुख नीतियों के लिए खोल दिया। सॉफ्टवेयर टेक्नोलॉजी पार्क्स ऑफ इंडिया (STPI) योजना, निर्यात प्रोत्साहनों और IT/ITES इकाइयों के लिए विशेष आर्थिक क्षेत्रों (SEZ) ने भारतीय कंपनियों को एक वैश्विक डिलीवरी मॉडल बनाने के लिए प्रोत्साहित किया — कुशल, अंग्रेजी बोलने वाले कार्यबल के साथ प्रतिस्पर्धी लागत पर विदेशी ग्राहकों को सॉफ्टवेयर विकास, रखरखाव और व्यवसाय प्रक्रिया सेवाएं प्रदान करना। बेंगलुरु भारत का प्रमुख IT केंद्र बनकर उभरा और लोकप्रिय रूप से "भारत की सिलिकॉन वैली" कहलाता है, जबकि हैदराबाद, पुणे, चेन्नई और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR, विशेषकर गुरुग्राम और नोएडा) प्रमुख द्वितीयक केंद्रों के रूप में विकसित हुए। नैसकॉम (NASSCOM — नेशनल एसोसिएशन ऑफ सॉफ्टवेयर एंड सर्विस कंपनीज) अपनी स्थापना के बाद से इस उद्योग की प्रमुख प्रतिनिधि और पैरवी संस्था के रूप में कार्य करता रहा है। समय के साथ, यह उद्योग निम्न-मूल्य वाले "बॉडी-शॉपिंग" (प्रोग्रामरों को विदेश भेजना) से आगे बढ़कर उच्च-मूल्य वाले ऑफशोर सॉफ्टवेयर विकास, IT परामर्श, प्रोडक्ट कंपनियों, स्टार्टअप्स और हाल ही में ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (GCC) की ओर विकसित हुआ, जो बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा भारतीय शहरों में स्थापित इन-हाउस प्रौद्योगिकी और अनुसंधान इकाइयां हैं। यह क्षेत्र आज प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से एक बहुत बड़े कार्यबल को रोजगार देता है, और सॉफ्टवेयर तथा IT-सक्षम सेवाओं का निर्यात भारत के कुल सेवा निर्यात का एक महत्वपूर्ण और लगातार बढ़ता हिस्सा है, यद्यपि सटीक आंकड़े वर्ष-दर-वर्ष बदलते रहते हैं और इन्हें ठीक-ठीक रटने के बजाय गुणात्मक रूप से समझना बेहतर है।
2. डिजिटल इंडिया कार्यक्रम — विज़न और स्तंभ
डिजिटल इंडिया कार्यक्रम की शुरुआत 1 जुलाई 2015 को इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) द्वारा एक छत्र (umbrella) पहल के रूप में की गई, ताकि भारत के अनेक अलग-अलग ई-गवर्नेंस और डिजिटल अवसंरचना प्रयासों को एक राष्ट्रीय विज़न के अंतर्गत समन्वित और दिशा दी जा सके। इसका घोषित लक्ष्य भारत को डिजिटल रूप से सशक्त समाज और ज्ञान अर्थव्यवस्था में बदलना है। यह कार्यक्रम तीन व्यापक विज़न क्षेत्रों पर टिका है: पहला, हर नागरिक के लिए एक मूल उपयोगिता (core utility) के रूप में डिजिटल अवसंरचना, ठीक वैसे ही जैसे सड़कों या बिजली को बुनियादी सार्वजनिक उपयोगिता माना जाता है; दूसरा, मांग पर शासन और सेवाएं, अर्थात सरकारी सेवाएं विभागों और क्षेत्राधिकारों में डिजिटल रूप से, वास्तविक समय में उपलब्ध होनी चाहिए; और तीसरा, नागरिकों का डिजिटल सशक्तिकरण, अर्थात सार्वभौमिक डिजिटल साक्षरता और स्थानीय भाषाओं में डिजिटल संसाधनों तक पहुंच। ये तीन विज़न क्षेत्र आगे नौ विषयगत स्तंभों के माध्यम से क्रियान्वित होते हैं, जो ग्रामीण और शहरी भारत में ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी, मोबाइल कनेक्टिविटी तक सार्वभौमिक पहुंच, कम सेवा प्राप्त क्षेत्रों के लिए सार्वजनिक इंटरनेट पहुंच कार्यक्रम, सरकारी प्रक्रियाओं में ई-गवर्नेंस सुधार, सेवाओं की इलेक्ट्रॉनिक डिलीवरी के लिए "ई-क्रांति", खुले डेटा और सूचना की ऑनलाइन उपलब्धता को बढ़ावा देने वाला "सूचना सबके लिए" स्तंभ, आयात निर्भरता कम करने हेतु घरेलू इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण को प्रोत्साहन, विशेषकर छोटे शहरों में IT-संबंधित रोजगार सृजन, तथा शीघ्र, दृश्यमान परिणाम दिखाने वाले "अर्ली हार्वेस्ट" कार्यक्रमों को कवर करते हैं। अभ्यर्थियों को सभी नौ स्तंभों को अलग-अलग याद करने से पहले तीन विज़न क्षेत्रों को एक याद रखने योग्य समूह के रूप में सीखना चाहिए।
3. ई-गवर्नेंस: अवधारणा, उद्देश्य और प्रमुख पहल
ई-गवर्नेंस का अर्थ है सरकारी निकायों द्वारा सेवाएं देने, सूचना साझा करने, और नागरिकों, व्यवसायों तथा अन्य सरकारी एजेंसियों के साथ अधिक कुशलता और पारदर्शिता से बातचीत करने के लिए सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी का उपयोग। इसका सामान्यतः चार संबंध मॉडलों के माध्यम से विश्लेषण किया जाता है: सरकार-से-नागरिक (G2C), जिसमें नागरिक प्रमाण-पत्र, आवेदन और शिकायत निवारण जैसी सेवाएं ऑनलाइन प्राप्त करते हैं; सरकार-से-व्यवसाय (G2B), जो उद्यमों के लिए लाइसेंस, पंजीकरण, कर दाखिल करने और खरीद पोर्टलों को कवर करता है; सरकार-से-सरकार (G2G), जो विभिन्न विभागों, मंत्रालयों या सरकार के स्तरों को डेटा साझा करने और समन्वय करने में सक्षम बनाता है; और सरकार-से-कर्मचारी (G2E), जो सरकार के भीतर वेतन, सेवा रिकॉर्ड और आंतरिक संचार जैसे आंतरिक प्रशासनिक कार्यों को कवर करता है। डिजिटल इंडिया के प्रमुख ई-गवर्नेंस प्लेटफॉर्मों में, UMANG (यूनिफाइड मोबाइल एप्लिकेशन फॉर न्यू-एज गवर्नेंस) एक ही मोबाइल ऐप के रूप में कार्य करता है जो केंद्र और राज्य सरकार की बहुत बड़ी और बढ़ती संख्या की सेवाओं तक पहुंच को एकत्रित करता है, जिससे नागरिकों को हर विभाग के लिए अलग ऐप इंस्टॉल करने की आवश्यकता नहीं रहती। डिजीलॉकर (DigiLocker) हर नागरिक को एक व्यक्तिगत, क्लाउड-आधारित डिजिटल भंडारण स्थान देता है जहां प्रमाण-पत्र और अंक-तालिका जैसे दस्तावेज बिना भौतिक प्रतियों की आवश्यकता के संग्रहीत, साझा और डिजिटल रूप से सत्यापित किए जा सकते हैं। जमीनी स्तर पर, कॉमन सर्विस सेंटर (CSC) भौतिक पहुंच बिंदुओं के रूप में कार्य करते हैं — जो सामान्यतः गांवों और छोटे कस्बों में स्थानीय उद्यमियों द्वारा संचालित होते हैं — जिनके माध्यम से जिनके पास व्यक्तिगत उपकरण या डिजिटल कौशल नहीं है, वे भी सहायता के साथ ऑनलाइन सरकारी और बैंकिंग सेवाओं तक पहुंच सकते हैं। सामूहिक रूप से, इन पहलों का उद्देश्य नागरिकों की सरकारी कार्यालयों की बार-बार भौतिक यात्राओं की आवश्यकता को कम करना, नियमित लेनदेन में प्रत्यक्ष मानवीय विवेकाधिकार घटाकर छोटे भ्रष्टाचार की संभावनाओं को कम करना, और सरकारी कामकाज को अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनाना है। ई-गवर्नेंस का यह प्रशासनिक-सुधार आयाम एक आवर्ती विषय है जो विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के प्रश्नों को RAS पाठ्यक्रम के लोक प्रशासन और शासन-व्यवस्था के प्रश्नों से जोड़ता है।
4. इंटरनेट पहुंच और उसका सामाजिक-आर्थिक प्रभाव
2010 के दशक के मध्य से भारत में इंटरनेट और मोबाइल कनेक्टिविटी का तेज़ — यद्यपि अभी भी असमान — विस्तार देखा गया है, जो सस्ते स्मार्टफोन, गिरती डेटा लागत और विस्तारित दूरसंचार नेटवर्क कवरेज से प्रेरित है। इसे सटीक आंकड़ों के एक समूह के बजाय दिशा और प्रवृत्ति के रूप में समझना बेहतर है, क्योंकि सटीक उपयोगकर्ता और उपयोग संख्याएं दूरसंचार नियामकों और सर्वेक्षणों द्वारा बार-बार संशोधित की जाती हैं। इस विस्तार के सामाजिक-आर्थिक परिणाम व्यापक रहे हैं। वित्तीय समावेशन में, व्यापक कनेक्टिविटी ने वह आधार प्रदान किया जिस पर भारत का डिजिटल भुगतान पारिस्थितिकी तंत्र (जिसमें नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया द्वारा संचालित UPI शामिल है) तेजी से विस्तारित हो सका, जिससे बैंकिंग-लिंक्ड भुगतान पहुंच पारंपरिक शहरी, बैंकयुक्त आबादी से कहीं आगे बढ़ी। शिक्षा में, बढ़ती कनेक्टिविटी ने ऑनलाइन और मिश्रित (blended) शिक्षण मॉडलों को सक्षम बनाया, जो महामारी संबंधी स्कूल बंदी के दौरान विशेष रूप से महत्वपूर्ण बन गए और अब भी सीमित गुणवत्तापूर्ण संस्थानों वाले क्षेत्रों में पूरक शिक्षा को समर्थन देना जारी रखते हैं। स्वास्थ्य सेवा में, टेलीमेडिसिन और स्वास्थ्य-सूचना प्लेटफॉर्मों ने विशेषज्ञ परामर्श और स्वास्थ्य मार्गदर्शन को उन क्षेत्रों तक विस्तारित करना शुरू किया है जहां अन्यथा चिकित्सा अवसंरचना बहुत सीमित है। डिजिटल प्लेटफॉर्मों ने नई आय के अवसर भी खोले हैं — छोटे कस्बों और ग्रामीण कारीगरों को सीधे उपभोक्ताओं तक पहुंचाने वाले ई-कॉमर्स से लेकर, ऐप-आधारित गिग वर्क की वृद्धि तक, तथा महिला एवं ग्रामीण उद्यमियों द्वारा भौतिक दुकान की आवश्यकता के बिना सोशल मीडिया और मार्केटप्लेस प्लेटफॉर्मों का उपयोग करके सामान और सेवाएं बेचने तक। साथ ही, ये लाभ असमान रूप से वितरित रहे हैं, जो हमें डिजिटल विभाजन की चुनौती की ओर ले जाता है।
5. डिजिटल विभाजन (Digital Divide) — आयाम और सरकारी प्रतिक्रियाएं
डिजिटल विभाजन उन लोगों के बीच के अंतर को दर्शाता है जिनकी डिजिटल प्रौद्योगिकियों तक प्रभावी पहुंच और उनके सार्थक उपयोग की क्षमता है, और जिनके पास यह नहीं है। RPSC RAS की दृष्टि से, इसे एक ही अविभेदित अंतर के बजाय कई अलग-अलग आयामों के रूप में समझना उपयोगी है। एक अवसंरचना अंतर है, क्योंकि दूरदराज़, पहाड़ी, मरुस्थलीय और वन क्षेत्रों में नेटवर्क और ब्रॉडबैंड कवरेज शहरों की तुलना में कमजोर बना हुआ है। एक वहनीयता (affordability) अंतर है, क्योंकि स्मार्टफोन और डेटा प्लान की लागत, भले ही घट रही हो, फिर भी कई ग्रामीण और निम्न-आय वाले परिवारों की आय के सापेक्ष एक सार्थक बोझ बनी हुई है। एक डिजिटल साक्षरता अंतर है, क्योंकि केवल उपकरण होना या नेटवर्क पहुंच होना स्वतः ही सरकारी डिजिटल सेवाओं, बैंकिंग ऐप्स या ऑनलाइन शिक्षण उपकरणों को सुरक्षित और प्रभावी ढंग से उपयोग करने के कौशल में परिणत नहीं होता। एक लैंगिक अंतर है, जो देश के कई हिस्सों में पुरुषों की तुलना में महिलाओं में मोबाइल फोन और इंटरनेट पहुंच तथा स्वतंत्र उपयोग की सामान्यतः कम दरों में परिलक्षित होता है। और एक भाषा अंतर है, क्योंकि डिजिटल सामग्री, इंटरफेस और सरकारी प्लेटफार्मों का एक बड़ा हिस्सा ऐतिहासिक रूप से अंग्रेजी और कुछ प्रमुख भाषाओं की ओर झुका रहा है, जिससे अन्य क्षेत्रीय भाषाएं बोलने वालों के लिए उपयोगिता सीमित होती है। सरकार ने लक्षित योजनाओं के साथ प्रतिक्रिया दी है: प्रधानमंत्री ग्रामीण डिजिटल साक्षरता अभियान (PMGDISHA) एक प्रमुख ग्रामीण डिजिटल साक्षरता कार्यक्रम है जिसका उद्देश्य पात्र ग्रामीण परिवारों के कम से कम एक सदस्य को डिजिटल रूप से साक्षर बनाना है; भारतनेट (BharatNet) परियोजना का उद्देश्य ग्राम पंचायत स्तर तक ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी को भौतिक अवसंरचना के रूप में विस्तारित करना है; और कॉमन सर्विस सेंटर कम सेवा प्राप्त क्षेत्रों में साक्षरता और उपकरण अंतर को पाटने वाले सहायता-प्राप्त पहुंच बिंदुओं के रूप में कार्य करना जारी रखते हैं। डिजिटल विभाजन को पाटना डिजिटल इंडिया के समावेशन लक्ष्यों को सार्थक रूप से साकार करने की एक पूर्व-शर्त माना जाता है, क्योंकि अकेले अवसंरचना और कनेक्टिविटी डिजिटल अर्थव्यवस्था में समान भागीदारी की गारंटी नहीं देती।
RPSC RAS प्रीलिम्स के लिए महत्वपूर्ण तथ्य
- डिजिटल इंडिया की शुरुआत 1 जुलाई 2015 को इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) के अंतर्गत हुई।
- डिजिटल इंडिया तीन विज़न क्षेत्रों पर टिका है: मूल उपयोगिता के रूप में डिजिटल अवसंरचना, मांग पर शासन और सेवाएं, तथा नागरिकों का डिजिटल सशक्तिकरण।
- डिजिटल इंडिया का ढांचा नौ स्तंभों के इर्द-गिर्द संगठित है, जिनमें ब्रॉडबैंड हाईवे, सार्वभौमिक मोबाइल कनेक्टिविटी, सार्वजनिक इंटरनेट पहुंच, ई-गवर्नेंस, ई-क्रांति, सूचना सबके लिए, इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण, IT के लिए रोजगार, और अर्ली हार्वेस्ट कार्यक्रम शामिल हैं।
- नैसकॉम (NASSCOM) भारत के IT-BPM क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने वाला प्रमुख उद्योग निकाय है।
- सॉफ्टवेयर टेक्नोलॉजी पार्क्स ऑफ इंडिया (STPI) योजना ने 1991 के उदारीकरण के बाद भारत के सॉफ्टवेयर निर्यात उद्योग के प्रारंभिक विकास को समर्थन दिया।
- UMANG (यूनिफाइड मोबाइल एप्लिकेशन फॉर न्यू-एज गवर्नेंस) एक एकल मोबाइल प्लेटफॉर्म है जो केंद्र व राज्य सरकार की अनेक ई-सेवाओं तक पहुंच को एकत्रित करता है।
- डिजीलॉकर नागरिकों को आधिकारिक दस्तावेजों को संग्रहीत और डिजिटल रूप से सत्यापित करने के लिए क्लाउड-आधारित स्थान प्रदान करता है।
- कॉमन सर्विस सेंटर (CSC) ग्रामीण और दूरदराज़ क्षेत्रों में गांव-स्तरीय, सहायता-प्राप्त पहुंच बिंदुओं के माध्यम से ई-गवर्नेंस और डिजिटल सेवाओं का विस्तार करते हैं।
- प्रधानमंत्री ग्रामीण डिजिटल साक्षरता अभियान (PMGDISHA) ग्रामीण डिजिटल साक्षरता के लिए लक्षित एक प्रमुख योजना है।
- भारतनेट (BharatNet) वह सरकारी परियोजना है जिसका उद्देश्य भौतिक डिजिटल अवसंरचना के रूप में ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी को ग्राम पंचायतों तक विस्तारित करना है।
- बेंगलुरु, हैदराबाद, पुणे, चेन्नई और NCR (गुरुग्राम, नोएडा) भारत के प्रमुख IT/सॉफ्टवेयर सेवा केंद्रों में शामिल हैं।
- ई-गवर्नेंस के चार सामान्य मॉडल हैं: सरकार-से-नागरिक (G2C), सरकार-से-सरकार (G2G), सरकार-से-व्यवसाय (G2B), और सरकार-से-कर्मचारी (G2E)।
RPSC RAS प्रीलिम्स के लिए परीक्षा सुझाव
- डिजिटल इंडिया की शुरुआत की तारीख (1 जुलाई 2015) और इसके प्रायोजक मंत्रालय (MeitY) को सटीक रूप से याद रखें; दोनों अक्सर पूछे जाने वाले विवरण हैं।
- सभी नौ स्तंभों को अलग-अलग याद करने से पहले तीन विज़न क्षेत्रों — अवसंरचना, मांग पर सेवाएं, सशक्तिकरण — को एक समूह के रूप में सीखें।
- डिजिटल इंडिया कार्यक्रम (2015 में शुरू हुई एक सरकारी नीति छत्र) को भारत के IT/सॉफ्टवेयर सेवा उद्योग (एक निजी क्षेत्र का निर्यात-उन्मुख उद्योग जो इससे दो दशक से भी पहले से अस्तित्व में है) के साथ भ्रमित न करें — दोनों संबंधित लेकिन विश्लेषणात्मक रूप से अलग हैं, और प्रश्न अक्सर इसी अंतर की परीक्षा लेते हैं।
- ई-गवर्नेंस प्लेटफार्मों को उनके कार्य के अनुसार अलग रखें: UMANG एक ऐप में सेवाओं को एकत्रित करता है, डिजीलॉकर दस्तावेजों को संग्रहीत और सत्यापित करता है, और CSC गांव स्तर पर सहायता-प्राप्त पहुंच प्रदान करते हैं।
- PMGDISHA को विशेष रूप से ग्रामीण डिजिटल साक्षरता से और भारतनेट को विशेष रूप से ग्रामीण ब्रॉडबैंड अवसंरचना से जोड़ें — दोनों को आपस में न बदलें।
- डिजिटल विभाजन को एक अविभेदित अंतर के बजाय उसके अलग-अलग आयामों — अवसंरचना, वहनीयता, साक्षरता, लिंग और भाषा — के रूप में सोचें; प्रश्न कभी-कभी पूछते हैं कि कोई विशेष योजना किस आयाम को संबोधित करती है।
- इंटरनेट पहुंच, IT निर्यात या योजना बजट के सटीक आंकड़े किसी एक स्रोत से रटने से बचें, क्योंकि ऐसे आंकड़े समय-समय पर संशोधित होते हैं; इसके बजाय प्रवृत्तियों, परिवर्तन की दिशा और अवधारणात्मक समझ पर ध्यान केंद्रित करें।
- डिजिटल इंडिया के ई-गवर्नेंस स्तंभ को प्रशासनिक सुधार, पारदर्शिता और भ्रष्टाचार में कमी के व्यापक विषय से जोड़ें — यह विषय RAS पाठ्यक्रम के लोक प्रशासन और शासन-व्यवस्था खंडों से भी जुड़ता है।
तीनों विज़न क्षेत्रों को अंग्रेज़ी वाक्यांश "Indians Seek Empowerment" — I-S-E — से याद रखें। I = Infrastructure/अवसंरचना (हर नागरिक के लिए मूल उपयोगिता के रूप में डिजिटल अवसंरचना), S = Services on demand/मांग पर सेवाएं (शासन और सेवाएं डिजिटल रूप से, वास्तविक समय में उपलब्ध), E = Empowerment/सशक्तिकरण (साक्षरता और डिजिटल संसाधनों तक पहुंच के माध्यम से नागरिकों का डिजिटल सशक्तिकरण)। जब भी कोई प्रश्न डिजिटल इंडिया के बुनियादी विज़न के बारे में पूछे, "Indians Seek Empowerment" याद करें और उसे इसी क्रम में अवसंरचना, मांग पर सेवाएं और सशक्तिकरण में विभाजित करें।
अभ्यर्थी अक्सर "भारत में IT" को एक ही अविभेदित विषय मान लेते हैं, लेकिन ई-गवर्नेंस और भारत का IT/सॉफ्टवेयर उद्योग दो अलग-अलग धागे हैं जिनकी उत्पत्ति और उद्देश्य अलग हैं। ई-गवर्नेंस एक सार्वजनिक-क्षेत्र की नीतिगत क्रिया है — सरकार का अपना डिजिटल प्रौद्योगिकी का उपयोग, जिसे 2015 से डिजिटल इंडिया के अंतर्गत राष्ट्रीय स्तर पर औपचारिक रूप दिया गया, ताकि नागरिकों, व्यवसायों और अन्य सरकारी निकायों को सेवाएं व सूचना (UMANG, डिजीलॉकर, CSC जैसे प्लेटफार्मों के माध्यम से) दी जा सके। इसके विपरीत, भारत का IT/सॉफ्टवेयर सेवा उद्योग एक निजी-क्षेत्र, निर्यात-उन्मुख आर्थिक क्षेत्र है — जो 1990 के दशक से आर्थिक उदारीकरण के बाद कंपनियों द्वारा निर्मित किया गया, जो दुनिया भर के ग्राहकों की सेवा करके रोजगार और निर्यात राजस्व उत्पन्न करता है, और नैसकॉम जैसी संस्थाओं द्वारा प्रतिनिधित्व किया जाता है। संक्षिप्त जांच: यदि प्रश्न किसी नागरिक द्वारा सरकारी सेवा या योजना तक पहुंच के बारे में है, तो ई-गवर्नेंस/डिजिटल इंडिया सोचें; यदि यह सॉफ्टवेयर निर्यात, IT केंद्रों, या प्रमुख भारतीय IT कंपनियों जैसी कंपनियों के बारे में है, तो IT/सॉफ्टवेयर सेवा उद्योग सोचें।
Q1. डिजिटल इंडिया कार्यक्रम कब शुरू हुआ, और किस मंत्रालय के अंतर्गत?
✅ इसकी शुरुआत 1 जुलाई 2015 को इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) के अंतर्गत हुई।
Q2. डिजिटल इंडिया के तीन विज़न क्षेत्र कौन से हैं?
✅ हर नागरिक के लिए मूल उपयोगिता के रूप में डिजिटल अवसंरचना, मांग पर शासन और सेवाएं, तथा नागरिकों का डिजिटल सशक्तिकरण।
Q3. UMANG और डिजीलॉकर के बीच मुख्य कार्यात्मक अंतर क्या है?
✅ UMANG एक एकल मोबाइल ऐप है जो केंद्र व राज्य सरकार की अनेक सेवाओं तक पहुंच को एकत्रित करता है, जबकि डिजीलॉकर प्रमाण-पत्र जैसे व्यक्तिगत दस्तावेजों को संग्रहीत और डिजिटल रूप से सत्यापित करने के लिए एक क्लाउड-आधारित स्थान है।
Q4. डिजिटल इंडिया के अंतर्गत विशेष रूप से ग्रामीण डिजिटल साक्षरता को कौन सी योजना लक्षित करती है?
✅ प्रधानमंत्री ग्रामीण डिजिटल साक्षरता अभियान (PMGDISHA), जिसका उद्देश्य पात्र ग्रामीण परिवारों के कम से कम एक सदस्य को डिजिटल रूप से साक्षर बनाना है।
Q5. डिजिटल इंडिया कार्यक्रम को भारत के IT/सॉफ्टवेयर सेवा उद्योग की वृद्धि के बराबर क्यों नहीं माना जाना चाहिए?
✅ डिजिटल इंडिया 2015 में शुरू की गई एक सार्वजनिक-क्षेत्र की ई-गवर्नेंस नीति है जो सरकारी सेवाओं को डिजिटल रूप से देने के लिए है, जबकि IT/सॉफ्टवेयर सेवा उद्योग एक निजी-क्षेत्र का, निर्यात-उन्मुख आर्थिक क्षेत्र है जो 1991 के उदारीकरण के बाद बढ़ना शुरू हुआ — दोनों अपनी उत्पत्ति, कर्ताओं और उद्देश्यों में भिन्न हैं, भले ही दोनों भारत की व्यापक IT कहानी के अंतर्गत आते हों।
सारांश
भारत की IT क्रांति को नीति और सामाजिक-आर्थिक दृष्टिकोण से देखने पर दो संबंधित परंतु अलग-अलग धागे दिखाई देते हैं। एक है 1991 के उदारीकरण के बाद से एक निजी, निर्यात-उन्मुख सॉफ्टवेयर सेवा उद्योग की वृद्धि, जो बेंगलुरु, हैदराबाद और पुणे जैसे केंद्रों के इर्द-गिर्द बना और नैसकॉम द्वारा प्रतिनिधित्व किया जाता है। दूसरा है एक सुविचारित सरकारी नीति प्रयास — सबसे स्पष्ट रूप से 1 जुलाई 2015 को शुरू किया गया डिजिटल इंडिया कार्यक्रम — जो डिजिटल अवसंरचना, UMANG और डिजीलॉकर जैसी ई-गवर्नेंस सेवाओं, तथा PMGDISHA जैसी योजनाओं के माध्यम से डिजिटल साक्षरता को शहरी और ग्रामीण, हर नागरिक तक विस्तारित करता है। बढ़ती इंटरनेट पहुंच ने वित्तीय समावेशन, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा पहुंच और आजीविका को नया आकार दिया है, लेकिन ये लाभ असमान रूप से वितरित रहे हैं, यही कारण है कि अवसंरचना, वहनीयता, साक्षरता, लिंग और भाषा के आयामों में डिजिटल विभाजन को पाटना डिजिटल इंडिया के घोषित लक्ष्यों के केंद्र में बना हुआ है। RPSC RAS प्रीलिम्स के लिए, अभ्यर्थियों को डिजिटल इंडिया और ई-गवर्नेंस के नीतिगत ढांचे को IT/सॉफ्टवेयर उद्योग की अर्थव्यवस्था से अलग पहचानने में सहज होना चाहिए, साथ ही दोनों को भारत के व्यापक डिजिटल परिवर्तन के पूरक हिस्सों के रूप में समझना चाहिए।
⚡ त्वरित रिवीजन — One-Liners
- •DNA की खोज 1953 में वॉटसन और क्रिक ने की; यह एक द्विकुण्डलित संरचना है।
- •ISRO की स्थापना 1969 में हुई; चंद्रयान-3 ने 23 अगस्त 2023 को चंद्रमा पर सफल लैंडिंग की।
- •भारत ने पहला परमाणु परीक्षण 1974 में 'स्माइलिंग बुद्धा' के नाम से पोखरण में किया।
- •सुपर कंप्यूटर PARAM 8000 1991 में CDAC द्वारा विकसित किया गया — यह भारत का पहला स्वदेशी सुपर कंप्यूटर था।
- •डेंगू एडीस मच्छर से फैलता है; वायरस DENV 1-4।