परिचय
संविधान के भाग IV में अनुच्छेद 36 से 51 तक राज्य नीति के निदेशक तत्त्व (DPSP) दिए गए हैं — ये राज्य को एक न्यायपूर्ण, कल्याणकारी समाज बनाने की दिशा देने वाले निर्देश हैं। अधिकांश RAS अभ्यर्थी DPSP को केवल याद करने योग्य अनुच्छेदों की एक सूची के रूप में देखते हैं, लेकिन यह विषय तब कहीं अधिक रोचक और परीक्षा की दृष्टि से उपयोगी बन जाता है जब हम यह देखें कि यह विचार कहाँ से आया और सर्वोच्च न्यायालय का इसके साथ संबंध समय के साथ कैसे बदला। यह गाइड जानबूझकर अनुच्छेद-दर-अनुच्छेद सूची से हटकर DPSP की ऐतिहासिक उत्पत्ति और DPSP बनाम मौलिक अधिकारों के बीच हुई लंबी न्यायिक लड़ाई पर केंद्रित है — एक ऐसी लड़ाई जिसने आधारभूत संरचना सिद्धांत सहित भारतीय संवैधानिक इतिहास के कुछ सबसे महत्वपूर्ण निर्णय दिए। यदि आप व्यक्तिगत अनुच्छेदों को पहले से अच्छी तरह जानते हैं, तो यह गाइड आपको उन कठिन "केस लॉ" और "संशोधन" प्रश्नों के उत्तर देने में मदद करेगी जो RAS प्रारंभिक परीक्षा में लगातार पूछे जा रहे हैं।
मुख्य अवधारणाएँ
1. ऐतिहासिक उत्पत्ति: आयरलैंड से प्रेरणा
भारतीय संविधान के निर्माताओं ने गैर-प्रवर्तनीय राज्य-निर्देशों का विचार शून्य से नहीं गढ़ा। निदेशक तत्त्वों की अवधारणा आयरलैंड के 1937 के संविधान के अनुच्छेद 45 से ली गई थी, जो स्वयं 1931 के स्पेनिश संविधान से प्रेरित था। आयरलैंड ने "सामाजिक नीति के निदेशक सिद्धांतों" का उपयोग अपने विधानमंडल के लिए मार्गदर्शन के रूप में किया, बिना उन्हें कानूनी रूप से प्रवर्तनीय बनाए, और भारत की संविधान सभा को यह व्यवस्था एक नए स्वतंत्र, गरीब और विविधतापूर्ण देश के लिए आकर्षक लगी जो अभी अपनी प्रशासनिक क्षमता बना ही रहा था। संविधान सभा के संवैधानिक सलाहकार बी.एन. राव ने आयरलैंड सहित कई विदेशी संविधानों का अध्ययन करने के बाद यह सुझाव दिया कि भारत एक प्रवर्तनीय अधिकार-पत्र (Bill of Rights) के साथ-साथ एक गैर-प्रवर्तनीय सिद्धांतों का सेट भी अपनाए। विचार यह था कि एक युवा गणराज्य पहले ही दिन महंगे सामाजिक-आर्थिक अधिकारों — मुफ्त शिक्षा, पर्याप्त आजीविका, स्वास्थ्य सेवा — को प्रवर्तनीय अधिकारों के रूप में वास्तविक रूप से गारंटी नहीं दे सकता, लेकिन शासन-दर्शन के रूप में राज्य को उनकी ओर लगातार काम करने के लिए प्रतिबद्ध किया जा सकता है।
2. गैर-न्यायसंगत क्यों? अनुच्छेद 37 और अंतर्निहित दर्शन
अनुच्छेद 37 वह संवैधानिक धुरी है जिस पर पूरी DPSP योजना टिकी है। यह घोषित करता है कि निदेशक तत्त्व "किसी न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय नहीं होंगे," लेकिन तुरंत यह भी जोड़ता है कि वे फिर भी "देश के शासन में मूलभूत" हैं और "कानून बनाते समय इन सिद्धांतों को लागू करना राज्य का कर्तव्य होगा।" यह एक जानबूझकर विरोधाभासी सूत्र है: DPSP को रिट याचिका के माध्यम से लागू नहीं कराया जा सकता, फिर भी उन्हें नजरअंदाज करने का इरादा भी नहीं है। डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने संविधान सभा में इस रचना का बचाव करते हुए तर्क दिया कि DPSP भविष्य की सरकारों के लिए "निर्देशों का साधन" (instrument of instructions) हैं, कुछ वैसे ही जैसे गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट, 1935 के तहत गवर्नर-जनरल को जारी किए जाने वाले निर्देश-पत्र होते थे — यानी एक कानूनी रूप से प्रवर्तनीय संहिता के बजाय एक नैतिक और राजनीतिक दिशासूचक। चूँकि DPSP गैर-न्यायसंगत हैं, कोई नागरिक केवल किसी निदेशक तत्त्व को लागू न किए जाने पर सरकार को अदालत नहीं घसीट सकता, लेकिन न्यायालयों ने मौलिक अधिकारों, विशेषकर अनुच्छेद 21, की व्याख्या के दायरे को बढ़ाने के लिए DPSP का बढ़ता हुआ उपयोग किया है।
3. निदेशक तत्त्वों की तीन धाराएँ
यद्यपि संविधान स्वयं इन्हें वर्गीकृत नहीं करता, विद्वान परंपरागत रूप से DPSP को तीन वैचारिक धाराओं में बाँटते हैं, और RAS प्रारंभिक परीक्षा में अक्सर किसी दिए गए अनुच्छेद को सही धारा में वर्गीकृत करने के लिए कहा जाता है। गांधीवादी सिद्धांत महात्मा गांधी की ग्राम स्वावलंबन और सामाजिक उत्थान की दृष्टि को दर्शाते हैं — अनुच्छेद 40 (ग्राम पंचायतों का संगठन), अनुच्छेद 43 (कुटीर उद्योगों को बढ़ावा), अनुच्छेद 46 (अनुसूचित जाति, जनजाति और अन्य कमजोर वर्गों के शैक्षिक व आर्थिक हितों को बढ़ावा) और अनुच्छेद 48 (कृषि व पशुपालन का आधुनिक ढंग से संगठन, गाय-बछड़ों के वध पर रोक)। समाजवादी सिद्धांत आर्थिक लोकतंत्र और कल्याण को लक्ष्य बनाते हैं — अनुच्छेद 38 (लोगों के कल्याण को बढ़ावा देने वाली सामाजिक व्यवस्था), अनुच्छेद 39 (भौतिक संसाधनों का न्यायसंगत वितरण, समान कार्य के लिए समान वेतन, पर्याप्त आजीविका का अधिकार), अनुच्छेद 41 (कुछ मामलों में काम, शिक्षा व सार्वजनिक सहायता का अधिकार) और अनुच्छेद 42 (काम की न्यायसंगत व मानवीय परिस्थितियाँ तथा प्रसूति सहायता)। उदार-बौद्धिक सिद्धांत पश्चिमी संवैधानिक आदर्शों से प्रेरित हैं — अनुच्छेद 44 (नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता), अनुच्छेद 45 (प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल व शिक्षा), अनुच्छेद 48A (पर्यावरण, वन व वन्यजीवों का संरक्षण), अनुच्छेद 49 (राष्ट्रीय महत्व के स्मारकों व स्थलों का संरक्षण), अनुच्छेद 50 (कार्यपालिका से न्यायपालिका का पृथक्करण) और अनुच्छेद 51 (अंतर्राष्ट्रीय शांति व सुरक्षा को बढ़ावा)।
4. पहला टकराव: स्टेट ऑफ मद्रास बनाम चंपकम दोराईराजन (1951)
DPSP और मौलिक अधिकारों के बीच पहला बड़ा टकराव संविधान लागू होने के एक वर्ष के भीतर ही सामने आ गया। मद्रास सरकार ने राज्य के चिकित्सा व इंजीनियरिंग कॉलेजों में जाति व समुदाय के आधार पर सीटें आरक्षित करते हुए एक सांप्रदायिक सरकारी आदेश जारी किया था, जिसे पिछड़े वर्गों के शैक्षिक हितों को बढ़ावा देने का प्रयास बताया गया — यह उद्देश्य अनुच्छेद 46 के निदेशक तत्त्व से मेल खाता है। चंपकम दोराईराजन ने इस आदेश को अनुच्छेद 15 और 29(2) के तहत समानता और भेदभाव-निषेध के मौलिक अधिकार का उल्लंघन बताते हुए चुनौती दी। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने शुरुआती संवैधानिक निर्णयों में से एक में मौलिक अधिकारों का दृढ़ता से पक्ष लिया और कहा कि कोई भी DPSP किसी मौलिक अधिकार को अध्यारोहित या सीमित नहीं कर सकता — निदेशक तत्त्वों को संविधान के भाग III के अनुरूप और उसके अधीन रहना होगा। इस निर्णय ने DPSP-बनाम-मौलिक-अधिकार संबंध का पहला और सबसे स्थायी नियम स्थापित किया, और इसी ने सीधे भारत के पहले संवैधानिक संशोधन को जन्म दिया: संविधान (प्रथम संशोधन) अधिनियम, 1951, जिसने अनुच्छेद 15(4) जोड़ा — जो राज्य को सामाजिक व शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों, अनुसूचित जातियों व जनजातियों की उन्नति के लिए विशेष प्रावधान बनाने का अधिकार देता है, ताकि अनुच्छेद 46 के उद्देश्य को समानता की संहिता के साथ सामंजस्य में लाया जा सके, न कि किसी DPSP को मौलिक अधिकार पर हावी होने दिया जाए।
5. गोलकनाथ मामला (1967): क्या संसद मौलिक अधिकारों को छू भी सकती है?
चंपकम दोराईराजन ने यह तय कर दिया था कि DPSP मौलिक अधिकारों पर हावी नहीं हो सकते, लेकिन इसने एक बड़ा सवाल खुला छोड़ दिया: क्या संसद अनुच्छेद 368 की अपनी सामान्य संशोधन-शक्ति के तहत स्वयं मौलिक अधिकारों में संशोधन कर सकती है, शायद निदेशक तत्त्वों को अधिक स्थान देने के लिए? आई.सी. गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य (1967) में सर्वोच्च न्यायालय की ग्यारह-न्यायाधीशों की पीठ ने इसका दृढ़ता से नकारात्मक उत्तर दिया। एक संकीर्ण बहुमत से न्यायालय ने कहा कि मौलिक अधिकार एक "पारलौकिक" (transcendental) स्थिति रखते हैं और अनुच्छेद 368 के तहत संसद की शक्ति भाग III द्वारा प्रदत्त किसी भी अधिकार को कम करने या छीनने तक विस्तारित नहीं होती — न्यायालय के अनुसार, संवैधानिक संशोधन स्वयं अनुच्छेद 13(2) के अर्थ में "कानून" है, और अनुच्छेद 13(2) राज्य को ऐसा कोई कानून बनाने से रोकता है जो मौलिक अधिकारों को छीने या कम करे। पहले से हो चुके संशोधनों को अस्थिर न करने के लिए न्यायालय ने भावी-उन्मूलन (prospective overruling) के सिद्धांत का प्रयोग किया, जिससे यह निर्णय केवल भविष्य के लिए प्रभावी रहा। गोलकनाथ ने प्रभावी रूप से संसद की उस क्षमता को रोक दिया जिससे वह मौलिक अधिकारों की कीमत पर DPSP का विस्तार कर सकती थी, और इसने एक सीधी विधायी प्रतिक्रिया की जमीन तैयार कर दी।
6. केशवानंद भारती मामला (1973): आधारभूत संरचना सिद्धांत
संसद ने गोलकनाथ के जवाब में 24वाँ संविधान संशोधन (1971) पारित किया, जिसने स्पष्ट रूप से पुष्टि की कि संसद अनुच्छेद 368 के तहत भाग III सहित संविधान के किसी भी हिस्से में संशोधन कर सकती है, और 25वाँ संशोधन (1971) पारित किया, जिसने अनुच्छेद 31C जोड़ा — यह प्रावधान घोषित करता है कि अनुच्छेद 39(b) और 39(c) (भौतिक संसाधनों का न्यायसंगत वितरण और धन-संकेन्द्रण की रोकथाम) के निदेशक तत्त्वों को लागू करने वाला कोई कानून केवल अनुच्छेद 14, 19 या 31 से असंगत होने के कारण अमान्य नहीं होगा, और आगे यह भी कोशिश की कि न्यायालयों को यह प्रश्न पूछने से भी रोका जाए कि क्या ऐसा कानून वास्तव में उस नीति को लागू करता है। इसी पृष्ठभूमि में ऐतिहासिक मामला केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973) सामने आया, जिसकी सुनवाई भारतीय न्यायिक इतिहास की अब तक की सबसे बड़ी पीठ — तेरह न्यायाधीशों — ने की। न्यायालय ने एक बेहद संकीर्ण 7-6 बहुमत से गोलकनाथ को पलटते हुए संसद की मौलिक अधिकारों सहित संविधान के किसी भी हिस्से में संशोधन करने की शक्ति को बरकरार रखा। लेकिन साथ ही, बहुमत ने एक महत्वपूर्ण सीमा भी गढ़ी: संसद अनुच्छेद 368 के तहत अपनी संशोधन-शक्ति का उपयोग संविधान की "आधारभूत संरचना" (basic structure) या मूलभूत ढाँचे को बदलने के लिए नहीं कर सकती — यह सिद्धांत तब से भारतीय संवैधानिक कानून का सबसे महत्वपूर्ण सुरक्षा-कवच बन गया है। अनुच्छेद 31C के संबंध में, न्यायालय ने पहले हिस्से (अनुच्छेद 39(b)/(c) को लागू करने वाले कानूनों को अनुच्छेद 14 व 19 की चुनौती से बचाना) को बरकरार रखा, लेकिन दूसरे हिस्से को रद्द कर दिया जिसने न्यायिक समीक्षा को पूरी तरह समाप्त करने की कोशिश की थी, यह कहते हुए कि न्यायिक समीक्षा स्वयं आधारभूत संरचना का हिस्सा है।
7. 42वाँ संशोधन (1976): संतुलन को DPSP की ओर झुकाना
निदेशक तत्त्वों को मौलिक अधिकारों से ऊपर उठाने का सबसे व्यापक प्रयास आपातकाल के दौरान संविधान (बयालीसवाँ संशोधन) अधिनियम, 1976 के माध्यम से हुआ — इसे किए गए परिवर्तनों की व्यापकता के कारण अक्सर "मिनी-संविधान" कहा जाता है। इसने अनुच्छेद 31C में संशोधन कर उसकी सुरक्षा-छतरी को भाग IV के किसी भी निदेशक तत्त्व को लागू करने वाले कानून तक बढ़ा दिया, न कि केवल अनुच्छेद 39(b) और 39(c) तक — यानी ऐसे कानूनों को अनुच्छेद 14 या 19 के उल्लंघन के आधार पर बिल्कुल भी चुनौती नहीं दी जा सकती थी। 42वें संशोधन ने नए DPSP भी जोड़े — अनुच्छेद 39A (समान न्याय व निःशुल्क कानूनी सहायता), अनुच्छेद 43A (प्रबंधन में श्रमिकों की भागीदारी) और अनुच्छेद 48A (पर्यावरण, वन व वन्यजीवों का संरक्षण) — और, महत्वपूर्ण रूप से, स्वर्ण सिंह समिति (1976) की सिफारिशों के आधार पर नए अनुच्छेद 51A (भाग IVA के माध्यम से) में नागरिकों के मूल कर्तव्य भी जोड़े। इसने संवैधानिक संशोधनों की स्वयं की न्यायिक समीक्षा पर भी प्रतिबंध लगाने का प्रयास किया। कुल मिलाकर, इस संशोधन का उद्देश्य निर्वाचित सरकार को समाजवादी और निदेशक-तत्त्व-आधारित नीतियों को बिना मौलिक अधिकार संबंधी मुकदमेबाजी के आड़े आए, कहीं अधिक स्वतंत्र हाथ देना था।
8. मिनर्वा मिल्स मामला (1980): सामंजस्य की पुनर्स्थापना
आपातकाल समाप्त होने और सामान्य संवैधानिक शासन लौटने के बाद, 42वें संशोधन द्वारा विस्तारित अनुच्छेद 31C का स्वरूप मिनर्वा मिल्स लिमिटेड बनाम भारत संघ (1980) मामले में सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष आया। न्यायालय ने संशोधित अनुच्छेद 31C के उस व्यापक नियम को रद्द कर दिया जिसके अनुसार किसी भी निदेशक तत्त्व को लागू करने वाला कोई भी कानून अनुच्छेद 14 व 19 की चुनौती से मुक्त होता, यह कहते हुए कि इससे मौलिक अधिकारों और निदेशक तत्त्वों के बीच वह सामंजस्य व संतुलन नष्ट हो जाता है जिसे संविधान निर्माताओं ने सावधानीपूर्वक गढ़ा था — और यह सामंजस्य स्वयं केशवानंद भारती मामले में पहचानी गई आधारभूत संरचना का हिस्सा है। एक व्यापक रूप से उद्धृत टिप्पणी में न्यायालय ने मौलिक अधिकारों और निदेशक तत्त्वों को एक ही रथ के दो पहिये बताया, जिनमें से कोई भी दूसरे से कम महत्वपूर्ण नहीं है, और प्रसिद्ध रूप से कहा कि "भाग IV में निर्धारित लक्ष्यों को भाग III द्वारा प्रदत्त साधनों को समाप्त किए बिना प्राप्त करना होगा।" मिनर्वा मिल्स के निर्णय ने 42वें संशोधन के उन प्रावधानों को भी रद्द किया जिन्होंने संवैधानिक संशोधनों को न्यायिक समीक्षा से परे रखने की कोशिश की थी, यह पुनः पुष्टि करते हुए कि सीमित शासन और न्यायिक समीक्षा स्वयं आधारभूत संरचना का हिस्सा हैं। मूल, संकीर्ण अनुच्छेद 31C (केवल अनुच्छेद 39(b)/(c) से संबंधित कानूनों की रक्षा करने वाला) कायम रहा और बाद में संजीव कोक मैन्युफैक्चरिंग कंपनी बनाम भारत कोकिंग कोल लिमिटेड (1983) मामले में पुनः बरकरार रखा गया।
9. परिणाम: 44वाँ संशोधन और आज की स्थिति
संविधान (चौवालीसवाँ संशोधन) अधिनियम, 1978, जो आपातकाल की कई ज्यादतियों को पलटने के लिए आपातकाल के बाद लाया गया था, ने एक महत्वपूर्ण संरचनात्मक बदलाव किया जो इस बहस को परोक्ष रूप से प्रभावित करता है: इसने अनुच्छेद 19(1)(f) और 31 के तहत संपत्ति के मौलिक अधिकार को समाप्त कर दिया और इसे नए अनुच्छेद 300A के तहत केवल एक विधिक अधिकार (legal right) बना दिया। इसने DPSP-बनाम-मौलिक-अधिकार टकराव के सबसे अधिक मुकदमेबाजी वाले बिंदुओं में से एक को हटा दिया, क्योंकि भूमि सुधार और संसाधन-पुनर्वितरण कानूनों (जो अनुच्छेद 39(b)/(c) से निकटता से जुड़े हैं) को अब संपत्ति के आधार पर मौलिक अधिकार की चुनौती की ऊँची बाधा पार नहीं करनी पड़ती थी। आज, स्थापित संवैधानिक स्थिति सामंजस्यपूर्ण व्याख्या (harmonious construction) का दृष्टिकोण है: न्यायालय जहाँ तक संभव हो मौलिक अधिकारों और निदेशक तत्त्वों को साथ-साथ पढ़ते हैं, DPSP का उपयोग मौलिक अधिकारों — विशेषकर अनुच्छेद 21, जिसमें न्यायालयों ने संबंधित निदेशक तत्त्वों के आधार पर स्वच्छ पर्यावरण, निःशुल्क कानूनी सहायता, शिक्षा व आजीविका जैसे अधिकार पढ़े हैं — की व्याख्या को समृद्ध व विस्तृत करने के लिए करते हैं, जबकि यह सुनिश्चित करते हैं कि कोई साधारण कानून केवल किसी निदेशक तत्त्व को लागू करने का दावा करके किसी मौलिक अधिकार को पूरी तरह समाप्त न कर सके, सिवाय उस संकीर्ण, आधारभूत-संरचना-अनुरूप स्थान के जो अनुच्छेद 39(b) व 39(c) के लिए बनाया गया है।
महत्वपूर्ण तथ्य
- DPSP संविधान के भाग IV, अनुच्छेद 36-51 में हैं, और सीधे आयरलैंड के 1937 के संविधान के अनुच्छेद 45 से लिए गए हैं, जो स्वयं 1931 के स्पेनिश संविधान से प्रेरित था।
- अनुच्छेद 37 DPSP को गैर-न्यायसंगत (किसी भी न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय नहीं) बनाता है, फिर भी उन्हें "देश के शासन में मूलभूत" घोषित करता है।
- DPSP को परंपरागत रूप से तीन धाराओं में बाँटा जाता है: गांधीवादी (अनुच्छेद 40, 43, 46, 48), समाजवादी (अनुच्छेद 38, 39, 41, 42) और उदार-बौद्धिक (अनुच्छेद 44, 45, 48A, 49, 50, 51)।
- चंपकम दोराईराजन (1951) ने तय किया कि टकराव की स्थिति में मौलिक अधिकार DPSP पर हावी रहेंगे, जिससे सीधे प्रथम संशोधन (1951) आया, जिसने अनुच्छेद 15(4) जोड़ा।
- गोलकनाथ (1967) ने कहा कि संसद अनुच्छेद 368 की शक्ति से भाग III के मौलिक अधिकारों में संशोधन नहीं कर सकती; 24वें संशोधन (1971) ने इस स्थिति को पलट दिया।
- 25वें संशोधन (1971) ने अनुच्छेद 31C जोड़ा, जो अनुच्छेद 39(b)/(c) को लागू करने वाले कानूनों को अनुच्छेद 14 व 19 की चुनौती से बचाता है।
- केशवानंद भारती (1973), जिसे 13-न्यायाधीशों की पीठ ने तय किया, ने आधारभूत संरचना सिद्धांत प्रतिपादित किया — संसद संविधान के किसी भी भाग में संशोधन कर सकती है, पर उसकी आधारभूत संरचना में नहीं।
- 42वें संशोधन (1976) ने अनुच्छेद 31C को सभी DPSP तक विस्तृत किया और स्वर्ण सिंह समिति की सिफारिशों के आधार पर अनुच्छेद 39A, 43A, 48A व मूल कर्तव्य (अनुच्छेद 51A) जोड़े।
- मिनर्वा मिल्स (1980) ने विस्तारित अनुच्छेद 31C को रद्द किया, यह कहते हुए कि मौलिक अधिकारों व निदेशक तत्त्वों के बीच सामंजस्य स्वयं आधारभूत संरचना का हिस्सा है।
- 44वें संशोधन (1978) ने संपत्ति के मौलिक अधिकार को हटाकर इसे अनुच्छेद 300A के तहत एक विधिक अधिकार बना दिया।
परीक्षा सुझाव
- केस-लॉ अनुक्रम को कालानुक्रमिक रूप से याद रखें — चंपकम दोराईराजन (1951) → गोलकनाथ (1967) → केशवानंद भारती (1973) → मिनर्वा मिल्स (1980) — क्योंकि RAS प्रश्न अक्सर इन मामलों को उनके परिणामों से मिलान या क्रमबद्ध करने के लिए कहते हैं।
- 24वें संशोधन (जिसने संसद की मौलिक अधिकार संशोधित करने की शक्ति बहाल की) को 25वें संशोधन (जिसने अनुच्छेद 31C जोड़ा) के साथ मिलाएँ नहीं — दोनों 1971 में आए पर अलग-अलग काम किए।
- याद रखें कि केशवानंद भारती ने सामान्यतः संसद की संशोधन-शक्ति को बरकरार रखा लेकिन सीमित करने वाले सिद्धांत के रूप में आधारभूत संरचना का आविष्कार किया — इसने न तो केवल DPSP का और न ही केवल मौलिक अधिकारों का पक्ष लिया।
- DPSP के विचार के स्रोत से जुड़े प्रश्नों पर ध्यान दें — उत्तर है आयरलैंड का संविधान (1937), न कि ब्रिटिश या अमेरिकी संविधान, जिन्होंने भारतीय संविधान के अन्य हिस्सों को प्रेरित किया।
- अनुच्छेद 37 एक पसंदीदा एक-पंक्ति प्रश्न है: यह DPSP को गैर-न्यायसंगत बनाता है जबकि उन्हें "देश के शासन में मूलभूत" कहता है — इस वाक्य के दोनों हिस्से परीक्षा में पूछे जाते हैं।
क्रम याद रखें "चंपा गई किस करने मिनर्वा को": चंपकम दोराईराजन (1951, मौलिक अधिकार जीते) → गोलकनाथ (1967, संसद मौलिक अधिकार नहीं छू सकती) → केशवानंद भारती (1973, आधारभूत संरचना का जन्म) → मिनर्वा मिल्स (1980, सामंजस्य बहाल)। शुरुआती अक्षर C-G-K-M भी DPSP-बनाम-मौलिक-अधिकार लड़ाई के कालानुक्रमिक क्रम से मेल खाते हैं — हर मामला पिछले मामले से खुले छूटे प्रश्न का उत्तर देता है।
छात्र प्रायः मौलिक अधिकारों और निदेशक तत्त्वों को केवल इसलिए एक साथ रख देते हैं क्योंकि दोनों को नागरिकों को प्रभावित करने वाले "अधिकार" या "सिद्धांत" कहा जाता है, लेकिन ये प्रवर्तनीयता की रेखा के विपरीत छोरों पर स्थित हैं। मौलिक अधिकार (भाग III, अनुच्छेद 12-35) न्यायसंगत हैं — कोई नागरिक अनुच्छेद 32 या 226 के तहत सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालय जाकर उल्लंघन को रद्द करवा सकता है। निदेशक तत्त्व (भाग IV, अनुच्छेद 36-51) अनुच्छेद 37 के तहत गैर-न्यायसंगत हैं — कोई न्यायालय सरकार को उन्हें सीधे लागू करने के लिए बाध्य नहीं कर सकता। त्वरित नियम: मौलिक अधिकार = प्रवर्तनीय, राज्य पर नकारात्मक प्रतिबंध (अधिकतर "राज्य ... नहीं करेगा"); निदेशक तत्त्व = गैर-प्रवर्तनीय, राज्य को सकारात्मक निर्देश (अधिकतर "राज्य प्रयास करेगा...")। जब भी प्रश्न पूछे कि किस पर नागरिक मुकदमा कर सकता है, उत्तर मौलिक अधिकार ही है।
प्रश्न 1. भारत ने राज्य नीति के निदेशक तत्त्वों की अवधारणा किस देश के संविधान से उधार ली?
✅ आयरलैंड — आयरलैंड के 1937 के संविधान का अनुच्छेद 45, जो स्वयं 1931 के स्पेनिश संविधान से प्रेरित था।
प्रश्न 2. किस मामले ने कहा कि मौलिक अधिकार निदेशक तत्त्वों पर हावी रहेंगे, और इससे सीधे प्रथम संवैधानिक संशोधन हुआ?
✅ स्टेट ऑफ मद्रास बनाम चंपकम दोराईराजन (1951) — इसने जाति-आधारित आरक्षण आदेश को अनुच्छेद 15 व 29(2) से असंगत होने के कारण रद्द किया, जिससे प्रथम संशोधन द्वारा अनुच्छेद 15(4) जोड़ा गया।
प्रश्न 3. किस ऐतिहासिक मामले ने आधारभूत संरचना सिद्धांत प्रस्तुत किया, और पीठ में कितने न्यायाधीश थे?
✅ केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973), जिसे 13-न्यायाधीशों की पीठ ने 7-6 के संकीर्ण बहुमत से तय किया — यह भारतीय न्यायिक इतिहास की सबसे बड़ी पीठ थी।
प्रश्न 4. 42वें संशोधन (1976) ने अनुच्छेद 31C में क्या बदलाव किया, और किस मामले ने इस बदलाव को रद्द किया?
✅ 42वें संशोधन ने अनुच्छेद 31C की सुरक्षा को सभी निदेशक तत्त्वों (केवल अनुच्छेद 39(b)/(c) तक सीमित नहीं) तक बढ़ाया; मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ (1980) ने इस विस्तारित सुरक्षा को आधारभूत संरचना के उल्लंघन के रूप में रद्द किया।
प्रश्न 5. अनुच्छेद 37 के तहत क्या निदेशक तत्त्व न्यायालयों द्वारा प्रवर्तनीय हैं, और यह अनुच्छेद उन्हें फिर भी क्या दर्जा देता है?
✅ नहीं, वे गैर-न्यायसंगत हैं और किसी भी न्यायालय द्वारा प्रवर्तित नहीं किए जा सकते, लेकिन अनुच्छेद 37 फिर भी उन्हें "देश के शासन में मूलभूत" घोषित करता है और कानून बनाते समय इन्हें लागू करना राज्य का कर्तव्य बताता है।
सारांश
भाग IV (अनुच्छेद 36-51) में राज्य नीति के निदेशक तत्त्व आयरलैंड के 1937 के संविधान से उधार लिए गए थे, ताकि भारत को सामाजिक व आर्थिक कल्याण के लक्ष्यों के प्रति प्रतिबद्ध किया जा सके, बिना इन्हें तत्काल प्रवर्तनीय बनाए — यह समझौता अनुच्छेद 37 के गैर-न्यायसंगतता खंड से पक्का हुआ। DPSP का इतिहास वास्तव में मौलिक अधिकारों के साथ उनकी खींचतान का ही इतिहास है: चंपकम दोराईराजन (1951) ने स्थापित किया कि मौलिक अधिकार DPSP पर हावी रहेंगे और इससे प्रथम संशोधन आया; गोलकनाथ (1967) ने संसद को मौलिक अधिकारों में किसी भी प्रकार का संशोधन करने से रोक दिया; केशवानंद भारती (1973) ने उस रोक को पलटा पर संसद की संशोधन-शक्ति पर स्थायी सीमा के रूप में आधारभूत संरचना सिद्धांत गढ़ा; 42वें संशोधन (1976) ने विस्तारित अनुच्छेद 31C के माध्यम से DPSP को मौलिक अधिकारों पर व्यापक वरीयता देने की कोशिश की; और मिनर्वा मिल्स (1980) ने उस वरीयता को रद्द करते हुए कहा कि मौलिक अधिकारों व निदेशक तत्त्वों के बीच सामंजस्य स्वयं संविधान की आधारभूत संरचना का हिस्सा है। बाद में 44वें संशोधन (1978) ने संपत्ति को मौलिक अधिकार से हटाकर इस टकराव को काफी हद तक कम कर दिया। RAS प्रारंभिक परीक्षा के लिए, केस-लॉ अनुक्रम, प्रत्येक मामले से जुड़े संशोधन, और अनुच्छेद 37 के सटीक शब्द इस विषय के सबसे अधिक अंक दिलाने वाले बिंदु हैं।
⚡ त्वरित रिवीजन — One-Liners
- •अनुच्छेद 32 को डॉ. अंबेडकर ने 'संविधान की आत्मा' कहा था।
- •DPSP भाग IV में हैं; ये वाद योग्य नहीं हैं किन्तु शासन में मूलभूत हैं।
- •भारतीय संसद की राज्यसभा में अधिकतम 250 सदस्य हो सकते हैं; 12 राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत।
- •73वें संविधान संशोधन (1992) द्वारा पंचायती राज को संवैधानिक दर्जा मिला।
- •सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना 28 जनवरी 1950 को हुई; इसके पास मूल, अपील और सलाहकार क्षेत्राधिकार है।