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समूह गतिकी एवं टीम निर्माण — परिभाषा, टकमैन मॉडल, सामंजस्य, समूह निर्णय-निर्माण

Group Dynamics & Team Building — Definition, Tuckman's Model, Cohesiveness, Group Decision-Making

13 मिनटintermediate✓ अपडेटेड: अगस्त 2026· Management

परिचय

RAS प्रारंभिक परीक्षा के प्रबंधन खंड में "समूह गतिकी एवं टीम निर्माण" (Group Dynamics & Team Building) एक अत्यंत परीक्षा-प्रासंगिक टॉपिक है, क्योंकि इसमें परिभाषाएँ, विचारकों के नाम-सिद्धांत जोड़े (होमन्स, न्यूकॉम्ब, टकमैन), क्रमबद्ध मॉडल (फॉर्मिंग-स्टॉर्मिंग-नॉर्मिंग-परफॉर्मिंग-एडजर्निंग) तथा तकनीकी शब्दावली (ग्रुपथिंक, सोशल लोफिंग, डेल्फी तकनीक) एक साथ पूछी जाती है। समूह गतिकी उन शक्तियों के अध्ययन को कहते हैं जो किसी समूह के भीतर सक्रिय रहती हैं और सदस्यों के व्यवहार, अंतःक्रिया एवं निर्णय-निर्माण को दिशा देती हैं। चूँकि आधुनिक संगठन तेजी से टीम-आधारित कार्य-संरचना अपना रहे हैं, अतः समूह किस प्रकार बनते हैं, विकसित होते हैं, एकजुट रहते हैं और अंततः एक प्रभावी टीम में परिवर्तित होते हैं — यह समझना प्रबंधन के व्यावहारिक एवं परीक्षा दोनों दृष्टिकोण से अनिवार्य है।

मुख्य अवधारणाएँ

1. समूह गतिकी की अवधारणा एवं समूह के प्रकार

समूह गतिकी (Group Dynamics) शब्द सर्वप्रथम मनोवैज्ञानिक कर्ट लेविन (Kurt Lewin) ने प्रयोग किया था। इसका आशय उन शक्तियों के अध्ययन से है जो समूह के भीतर सक्रिय रहती हैं तथा सदस्यों के बीच होने वाली पारस्परिक अंतःक्रिया (interaction) व अन्योन्याश्रयता (interdependence) को स्पष्ट करती हैं — यह केवल "बैठक करना" नहीं, बल्कि एक साझा लक्ष्य की प्राप्ति हेतु घटित होने वाली सतत प्रक्रिया है। समूह (Group) को दो या दो से अधिक व्यक्तियों के ऐसे संग्रह के रूप में परिभाषित किया जाता है जो आपस में अंतःक्रिया करते हैं, साझा उद्देश्यों की दिशा में कार्य करते हैं, और स्वयं को एक ही इकाई का सदस्य मानते हैं — इसकी प्रमुख विशेषताओं में न्यूनतम दो सदस्य, साझा उद्देश्य, निरंतर अंतःक्रिया, अन्योन्याश्रयता, समूह-पहचान (belongingness) तथा साझा मानदंड (norms) शामिल हैं।

कार्यक्षेत्र के आधार पर समूहों को मुख्यतः तीन प्रकार से वर्गीकृत किया जाता है। पहला, औपचारिक बनाम अनौपचारिक समूह — औपचारिक समूह संगठन द्वारा जान-बूझकर संगठनात्मक लक्ष्यों की पूर्ति हेतु बनाया जाता है, जिसकी संरचना सुव्यवस्थित तथा नियम लिखित होते हैं; जबकि अनौपचारिक समूह व्यक्तिगत आवश्यकताओं (जैसे मित्रता, सामाजिक अंतःक्रिया) की पूर्ति हेतु स्वतः/स्वाभाविक रूप से बन जाता है, जिसके नियम अलिखित व लचीले होते हैं। दूसरा, लघु बनाम वृहद समूह — लघु समूहों में अंतःक्रिया व सामंजस्य (cohesion) अधिक तथा नियंत्रण सरल होता है, जबकि वृहद समूहों में संप्रेषण व नियंत्रण अपेक्षाकृत कठिन होता है। तीसरा, प्राथमिक बनाम द्वितीयक समूह — प्राथमिक समूह (जैसे परिवार) आकार में छोटे, आमने-सामने की अंतःक्रिया वाले तथा गहरे भावनात्मक लगाव वाले होते हैं और प्रायः दीर्घकालिक होते हैं; जबकि द्वितीयक समूह (जैसे विद्यालय, संगठन) आकार में बड़े, अवैयक्तिक (impersonal) तथा लक्ष्य-केंद्रित होते हैं।

व्यक्ति विभिन्न कारणों से समूहों से जुड़ते हैं — मनोवैज्ञानिक कारक (भावनात्मक सहारा, अपनत्व-बोध), सामाजिक कारक (धर्म-जाति-समुदाय आधारित अंतःक्रिया), सुरक्षा कारक (संकट में संरक्षण, जैसे सहकारी समितियाँ), आर्थिक कारक (जैसे स्वयं सहायता समूह-SHGs, किसान उत्पादक संगठन-FPOs), सांस्कृतिक कारक, शक्ति कारक (जैसे मोल-भाव करने वाले श्रमिक संघ/ट्रेड यूनियन) तथा प्रतिष्ठा व मान्यता कारक (जैसे व्यावसायिक निकायों की सदस्यता)। परीक्षा-दृष्टि से ध्यान रहे कि SHGs व FPOs को "आर्थिक कारक" में तथा ट्रेड यूनियन को "शक्ति कारक" में वर्गीकृत किया जाता है — इन्हें आपस में बदलना एक आम त्रुटि है।

2. समूह निर्माण के सिद्धांत

विभिन्न विचारकों ने समझाया है कि व्यक्ति समूहों से क्यों जुड़ते हैं। जॉर्ज सी. होमन्स (1950) के अनुसार समूह-निर्माण तीन परस्पर जुड़े तत्वों — क्रियाएँ (Activities), अंतःक्रियाएँ (Interactions) एवं भावनाएँ/संवेग (Sentiments) — के माध्यम से होता है: जब लोग साथ मिलकर कार्य करते हैं तो अंतःक्रिया बढ़ती है, जिससे मित्रता व भावनात्मक लगाव जन्म लेता है, और यह लगाव अंतःक्रिया को और सुदृढ़ करता है — यह एक चक्रीय, परस्पर-पुष्टिकरण वाली प्रक्रिया है। थियोडोर न्यूकॉम्ब (1961) का संतुलन सिद्धांत (Balance Theory) बताता है कि लोग समान दृष्टिकोण, विश्वास, मूल्य तथा लक्ष्य वाले व्यक्तियों की ओर आकर्षित होते हैं ताकि मनोवैज्ञानिक संतुलन बना रहे; यदि इस संतुलन में असंतुलन आता है, तो सदस्य उसे पुनः स्थापित करने का प्रयास करते हैं अन्यथा संबंध कमजोर पड़ जाता है।

थिबॉट व केली (1959) का विनिमय सिद्धांत/प्रतिफल सिद्धांत (Exchange Theory) यह मानता है कि व्यक्ति तभी किसी समूह से जुड़ते हैं जब उन्हें लगता है कि सदस्यता से प्राप्त होने वाला प्रतिफल (rewards) उस पर आने वाली लागत (costs) से अधिक है — अर्थात व्यक्ति निरंतर "प्रतिफल बनाम लागत" के तराजू पर अपने संबंधों का मूल्यांकन करता रहता है। इन तीनों सिद्धांतों को याद रखने की सरल कुंजी है — होमन्स = "अंतःक्रिया + भावना का चक्र", न्यूकॉम्ब = "समानता व संतुलन", थिबॉट-केली = "लाभ बनाम लागत"।

3. समूह सामंजस्य (Group Cohesiveness)

समूह सामंजस्य वह अदृश्य बंधनकारी शक्ति है जो सदस्यों के बीच पाए जाने वाले पारस्परिक आकर्षण की मात्रा तथा समूह की सदस्यता बनाए रखने की उनकी इच्छा की तीव्रता को दर्शाती है। उच्च सामंजस्य वाले समूहों में सक्रिय सहभागिता, साझा लक्ष्य, उच्च निष्ठा, संकट में एकजुटता, त्वरित संप्रेषण, पारस्परिक विश्वास तथा सुदृढ़ पहचान-बोध जैसी विशेषताएँ पाई जाती हैं। समूह सामंजस्य के महत्व में टीम-भावना को प्रगाढ़ करना, कार्य-संतुष्टि में वृद्धि करना, अनुपस्थिति (absenteeism) की दर घटाना तथा उत्पादकता बढ़ाना शामिल है।

समूह सामंजस्य को कई कारक प्रभावित करते हैं — समूह का आकार (छोटे समूह प्रायः अधिक सामंजस्यपूर्ण होते हैं), सजातीयता/homogeneity (सदस्यों में समानता सामंजस्य बढ़ाती है), समूह की सफलता (सफलता एकता को मजबूत करती है), अन्य समूहों से बाह्य प्रतिस्पर्धा (आंतरिक एकता बढ़ाती है), तथा विशिष्टता/अनन्यता (exclusiveness — सदस्यता कठिन होने पर प्रतिष्ठा-बोध बढ़ता है)। ध्यान देने योग्य बात यह है कि अत्यधिक सामंजस्य सदैव लाभकारी नहीं होता — जब समूह-एकता इतनी प्रबल हो जाए कि सदस्य आलोचनात्मक चिंतन छोड़कर सर्वसम्मति की ओर झुक जाएँ, तो इससे "ग्रुपथिंक" जैसी समस्या उत्पन्न हो सकती है (जिसकी चर्चा आगे विस्तार से की गई है)।

4. समूह/टीम विकास के चरण — ब्रूस टकमैन का पंच-चरण मॉडल

किसी भी समूह की कार्यक्षमता एक झटके में स्थापित नहीं होती — वह एक उच्च-निष्पादक टीम (high-performing team) बनने से पहले विकास के कई क्रमिक चरणों से गुजरता है। ब्रूस टकमैन (1965) ने मूल रूप से इस विकास को चार चरणों में वर्गीकृत किया — निर्माण (Forming): प्रारंभिक चरण, जहाँ सदस्य एक-दूसरे से परिचित होते हैं और लक्ष्यों-भूमिकाओं को लेकर अनिश्चितता बनी रहती है; संघर्ष (Storming): सदस्य प्रभाव व भूमिकाओं के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं, जिससे सत्ता-संघर्ष, टकराव व मतभेद उभरते हैं; मानकीकरण (Norming): सदस्य एक-दूसरे को स्वीकारना शुरू करते हैं, सहयोग बढ़ता है और साझा मानदंड व मूल्यों का विकास होता है; तथा निष्पादन (Performing): समूह पूर्ण रूप से क्रियाशील होकर लक्ष्य-प्राप्ति पर केंद्रित होता है, जिसमें उच्च निष्पादन, मजबूत सहयोग व प्रभावी संप्रेषण देखने को मिलता है।

1977 में टकमैन ने जीन जेंसन के साथ मिलकर इस मॉडल में पाँचवाँ चरण — समापन (Adjourning) — जोड़ा, जिसमें लक्ष्य प्राप्ति के बाद समूह विघटित हो जाता है (इसे कभी-कभी "मॉर्निंग" या "डीफॉर्मिंग" भी कहा जाता है)। परीक्षा की दृष्टि से यह अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्य है कि "Adjourning" चरण को बाद में जोड़ा गया था — मूल 1965 के मॉडल में केवल चार चरण थे। सभी टीमें इन चरणों से एक ही रैखिक क्रम में नहीं गुजरतीं — कभी-कभी कोई टीम पिछले चरण में वापस लौट सकती है (जैसे नए सदस्य के जुड़ने पर पुनः "स्टॉर्मिंग" शुरू हो सकती है), इसलिए इसे एक चक्रीय व गतिशील प्रक्रिया के रूप में भी देखा जाता है।

5. समूह बनाम टीम — अंतर एवं टीम के प्रकार

यद्यपि बोलचाल में "समूह" (Group) व "टीम" (Team) शब्दों का प्रयोग प्रायः परस्पर-विनिमेय ढंग से किया जाता है, प्रबंधन-सिद्धांत में इनमें स्पष्ट अंतर है। समूह में सदस्य मुख्यतः सूचना साझा करने व निर्णय लेने में एक-दूसरे की सहायता करते हैं, किंतु प्रत्येक सदस्य अपने कार्यक्षेत्र के लिए व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी होता है — यहाँ कार्य-निष्पादन केवल प्रत्येक सदस्य के व्यक्तिगत योगदान के योग (sum) के बराबर होता है। इसके विपरीत, टीम में सदस्य सामूहिक कार्य-निष्पादन के प्रति संयुक्त रूप से उत्तरदायी होते हैं तथा सकारात्मक तालमेल (positive synergy) उत्पन्न करते हैं — अर्थात टीम का समग्र प्रदर्शन व्यक्तिगत योगदानों के योग से अधिक होता है (1+1=3 का सिद्धांत)। दूसरे शब्दों में, हर टीम एक समूह होती है, परंतु हर समूह टीम नहीं होता।

कार्यक्षेत्र के आधार पर टीमों को मुख्यतः चार प्रकारों में वर्गीकृत किया जाता है — समस्या-समाधान टीम (Problem-Solving Teams): एक ही विभाग के 5-12 कर्मचारी सप्ताह में कुछ घंटे मिलकर कार्य-गुणवत्ता, दक्षता व कार्य-वातावरण सुधारने पर चर्चा करते हैं (जैसे क्वालिटी सर्कल); स्व-प्रबंधित कार्य-टीम (Self-Managed Work Teams): बिना किसी प्रबंधक के, 10-15 सदस्यों वाली टीम कार्य-योजना, गति-निर्धारण व निर्णय-निर्माण की जिम्मेदारी स्वयं वहन करती है; बहु-कार्यात्मक टीम (Cross-Functional Teams): विभिन्न विभागों (जैसे मार्केटिंग, वित्त, उत्पादन) के समान पदानुक्रम-स्तर वाले सदस्य किसी विशिष्ट कार्य हेतु एक साथ आते हैं (जैसे नए उत्पाद के लिए टास्क-फोर्स); तथा आभासी टीम (Virtual Teams): भौगोलिक रूप से बिखरे सदस्य तकनीक (वीडियो-कॉन्फ्रेंसिंग, ईमेल) के माध्यम से एक साझा लक्ष्य पर कार्य करते हैं, जहाँ आमने-सामने की सामाजिक अंतःक्रिया सीमित होती है।

6. टीम निर्माण (Team Building) — प्रक्रिया एवं प्रभावी टीम के कारक

टीम निर्माण एक व्यवस्थित एवं नियोजित प्रक्रिया है जिसके माध्यम से किसी टीम की प्रभावशीलता, सहयोग, समन्वय एवं कार्य-निष्पादन को सुधारा जाता है। स्टीवन एवं मैरी ऐन वॉन के अनुसार, टीम निर्माण किसी कार्य-टीम के विकास व क्रियाशीलता को बेहतर बनाने की दिशा में किया गया कोई भी औपचारिक हस्तक्षेप (formal intervention) है। इसकी पाँच-चरण प्रक्रिया है — समस्या की पहचान (कमजोर संप्रेषण, न्यून उत्पादकता जैसे मुद्दों को चिह्नित करना), सूचना संकलन (साक्षात्कार, प्रश्नावली व प्रेक्षण के माध्यम से), फीडबैक एवं आमना-सामना/Confrontation (मुद्दों पर खुली चर्चा), समस्या-समाधान (ब्रेनस्टॉर्मिंग जैसी तकनीकों से समाधान विकसित करना), तथा अनुवर्तन/Follow-up (समाधानों को लागू कर मूल्यांकन करना)। टीम निर्माण के चार प्रमुख उपागम हैं — भूमिका-निर्धारण (Role Definition), अंतर-वैयक्तिक प्रक्रिया (Interpersonal Process), लक्ष्य-निर्धारण (Goal Setting) तथा समस्या-समाधान (Problem Solving)।

किसी टीम की प्रभावशीलता चार प्रमुख कारकों पर निर्भर करती है — सहायक वातावरण (खुला संप्रेषण व पारस्परिक विश्वास), उपयुक्त कौशल एवं भूमिका-स्पष्टता, अधिश्रेष्ठ लक्ष्य (Superordinate Goals — ऐसे उच्च-स्तरीय उद्देश्य जो सभी सदस्यों को एकसूत्र में जोड़ें) तथा टीम पुरस्कार। इसके साथ ही टीमों की कुछ अंतर्निहित सीमाएँ भी हैं — हर कार्य के लिए टीम आवश्यक नहीं होती, टीम-कार्य में समय व संसाधनों की अधिक खपत होती है, संगठनात्मक समर्थन के अभाव में प्रभावशीलता प्रभावित होती है, तथा "सामाजिक आलस्य" (Social Loafing) — वह प्रवृत्ति जिसमें व्यक्ति समूह में कार्य करते समय अकेले काम करने की तुलना में कम प्रयास करता है, क्योंकि व्यक्तिगत योगदान का मूल्यांकन कठिन हो जाता है — एक सामान्य समस्या के रूप में उभर सकती है।

7. समूह निर्णय-निर्माण की तकनीकें

व्यक्तिगत निर्णय की तुलना में समूह निर्णय-निर्माण अधिक विचारों व दृष्टिकोणों को समाहित करता है, इसके लिए कई संरचित तकनीकें विकसित की गई हैं। मंथन/ब्रेनस्टॉर्मिंग (Brainstorming — एलेक्स ओसबॉर्न) में विचारों की मात्रा पर बल दिया जाता है — सदस्य बिना किसी आलोचना के जितने अधिक विचार दे सकें उतना अच्छा, आलोचना बाद के चरण के लिए टाल दी जाती है, ताकि रचनात्मकता बाधित न हो। नाममात्र समूह तकनीक (Nominal Group Technique — NGT) में सदस्य पहले स्वतंत्र रूप से मौन रहकर अपने विचार लिखते हैं, फिर बारी-बारी से उन्हें समूह के सामने प्रस्तुत करते हैं, इसके बाद संरचित चर्चा व गुप्त मतदान द्वारा सर्वश्रेष्ठ विचार चुना जाता है — यह तकनीक "समूह के दबाव" (सामाजिक प्रभाव) के बिना व्यक्तिगत रचनात्मकता को संरक्षित रखने में सहायक है।

डेल्फी तकनीक (Delphi Technique — रैंड कॉरपोरेशन द्वारा विकसित) में भौगोलिक रूप से बिखरे विशेषज्ञों की गुमनाम (anonymous) राय एक समन्वयक के माध्यम से कई चरणों में एकत्र की जाती है — प्रत्येक चरण के बाद विशेषज्ञों को पूर्व-चरण के सामूहिक फीडबैक से अवगत कराया जाता है, जिससे धीरे-धीरे राय एक सहमति (consensus) की ओर अभिसरित होती है; क्योंकि सदस्य आमने-सामने नहीं मिलते, इसमें प्रभावशाली व्यक्तियों के पक्षपात/दबाव की संभावना न्यूनतम रहती है। इनके अतिरिक्त सिनेक्टिक्स (Synectics — विलियम गॉर्डन) तकनीक असंबंधित व प्रतीत होने वाले विरोधाभासी विचारों को जोड़कर नवीन समाधान खोजने पर बल देती है। इन तकनीकों के बीच अंतर याद रखने की कुंजी है — ब्रेनस्टॉर्मिंग में सदस्य आमने-सामने व मुखर होते हैं, NGT में सदस्य साथ बैठते हैं पर पहले मौन रहकर लिखते हैं, जबकि डेल्फी में विशेषज्ञ कभी आमने-सामने मिलते ही नहीं।

8. समूहचिंतन/ग्रुपथिंक (Groupthink) — इरविंग जेनिस

मनोवैज्ञानिक इरविंग जेनिस (Irving Janis, 1972) ने "ग्रुपथिंक" शब्द गढ़ा, जो अत्यंत सामंजस्यपूर्ण (highly cohesive) समूहों में उत्पन्न होने वाली एक निर्णय-निर्माण विकृति को दर्शाता है — जब समूह की एकजुटता व सर्वसम्मति की इच्छा इतनी प्रबल हो जाती है कि सदस्य वास्तविक विकल्पों का यथार्थवादी मूल्यांकन करने के बजाय आलोचनात्मक चिंतन को दबा देते हैं, तो निर्णय की गुणवत्ता में गिरावट आती है। ग्रुपथिंक के लक्षणों में अजेयता का भ्रम (illusion of invulnerability), समूह की नैतिकता में अंधविश्वास, असहमति जताने वालों पर आत्म-सेंसरशिप का दबाव, तथा विरोधी विचारों को रखने वालों को "माइंडगार्ड" द्वारा रोकना शामिल है। इसका सबसे प्रसिद्ध ऐतिहासिक उदाहरण अमेरिका का 1961 का "बे ऑफ पिग्स" (Bay of Pigs) आक्रमण-निर्णय माना जाता है।

ग्रुपथिंक से बचने के उपायों में समूह के नेता को शुरुआत में तटस्थ रहना, प्रत्येक सदस्य को "क्रिटिकल इवैल्युएटर" की भूमिका सौंपना, बाहरी विशेषज्ञों की राय आमंत्रित करना, तथा निर्णय से पहले "डेविल्स एडवोकेट" (जानबूझकर विरोधी दृष्टिकोण रखने वाला सदस्य) नियुक्त करना शामिल है। ध्यान रहे कि ग्रुपथिंक व समूह सामंजस्य के बीच संबंध विरोधाभासी प्रतीत होता है — सामंजस्य सामान्यतः लाभकारी माना जाता है, परंतु जब यह अत्यधिक हो जाए और बाहरी दबाव व पृथक्करण (isolation) के साथ जुड़ जाए, तो यह ग्रुपथिंक को जन्म दे सकता है — यही विरोधाभास परीक्षा में अक्सर पूछा जाता है।

महत्वपूर्ण तथ्य

  • समूह गतिकी शब्द के प्रवर्तक — कर्ट लेविन (Kurt Lewin)।
  • समूहों के प्रकार: औपचारिक-अनौपचारिक, लघु-वृहद, प्राथमिक-द्वितीयक।
  • समूह निर्माण के सिद्धांत: होमन्स (1950 — क्रिया+अंतःक्रिया+भावना), न्यूकॉम्ब (1961 — संतुलन सिद्धांत), थिबॉट-केली (1959 — विनिमय/प्रतिफल सिद्धांत)।
  • ब्रूस टकमैन (1965) — पंच-चरण मॉडल: Forming → Storming → Norming → Performing → Adjourning; "Adjourning" 1977 में टकमैन व जेंसन द्वारा जोड़ा गया।
  • समूह बनाम टीम: समूह में व्यक्तिगत उत्तरदायित्व, टीम में सामूहिक उत्तरदायित्व व सकारात्मक तालमेल (synergy)।
  • टीमों के प्रकार: समस्या-समाधान, स्व-प्रबंधित, बहु-कार्यात्मक (cross-functional), आभासी (virtual)।
  • समूह निर्णय-निर्माण तकनीकें: ब्रेनस्टॉर्मिंग (ओसबॉर्न), NGT (मौन-लेखन फिर संरचित चर्चा), डेल्फी (गुमनाम विशेषज्ञ-राय, रैंड कॉरपोरेशन), सिनेक्टिक्स (गॉर्डन)।
  • ग्रुपथिंक — इरविंग जेनिस (1972); उदाहरण — बे ऑफ पिग्स आक्रमण (1961); उपाय — डेविल्स एडवोकेट नियुक्ति।
  • सामाजिक आलस्य (Social Loafing) — समूह में छिपकर कम मेहनत करने की प्रवृत्ति, जो टीम की एक व्यावहारिक समस्या है।

परीक्षा टिप्स

  • टकमैन मॉडल का क्रम (Forming-Storming-Norming-Performing-Adjourning) व यह तथ्य कि "Adjourning" बाद में जोड़ा गया, RAS प्रारंभिक परीक्षा का लोकप्रिय प्रश्न है — इसे याद रखें।
  • समूह निर्माण के तीन सिद्धांतकार (होमन्स, न्यूकॉम्ब, थिबॉट-केली) व उनके वर्ष (1950, 1961, 1959) को नाम-सिद्धांत जोड़ी के रूप में याद करें।
  • ब्रेनस्टॉर्मिंग, NGT व डेल्फी तकनीक के बीच के अंतर (आमने-सामने बनाम मौन-लेखन बनाम पूर्णतः गुमनाम) बार-बार पूछे जाते हैं।
  • ग्रुपथिंक व समूह सामंजस्य के विरोधाभासी संबंध को समझें — अत्यधिक सामंजस्य ग्रुपथिंक को जन्म दे सकता है।
🧠 स्मरण ट्रिक — टकमैन का पंच-चरण मॉडल

"फॉर्म करो, स्टॉर्म से जूझो, नॉर्म बनाओ, परफॉर्म करो, फिर एडजर्न (विदा) हो जाओ" — Forming, Storming, Norming, Performing, Adjourning का यह क्रमिक वाक्य याद रखें। ध्यान रहे: मूल 1965 मॉडल में केवल पहले चार चरण थे; "Adjourning" 1977 में टकमैन-जेंसन द्वारा जोड़ा गया — यही जोड़ी परीक्षा में पूछी जाती है।

⚠️ कन्फ्यूज़न बस्टर — ब्रेनस्टॉर्मिंग बनाम नाममात्र समूह तकनीक (NGT) बनाम डेल्फी तकनीक

तीनों समूह निर्णय-निर्माण की तकनीकें हैं, इसलिए मिलाई जाती हैं। ब्रेनस्टॉर्मिंग में सदस्य आमने-सामने बैठकर खुलकर विचार बोलते हैं, आलोचना वर्जित। NGT में सदस्य साथ बैठते तो हैं पर पहले मौन रहकर स्वतंत्र रूप से विचार लिखते हैं, फिर बारी-बारी प्रस्तुत कर संरचित चर्चा व गुप्त मतदान करते हैं। डेल्फी तकनीक में विशेषज्ञ कभी आमने-सामने मिलते ही नहीं — उनकी राय समन्वयक द्वारा गुमनाम रूप से कई चरणों में एकत्र की जाती है। त्वरित पहचान: "गुमनाम व दूरस्थ विशेषज्ञ" → डेल्फी; "मौन-लेखन फिर चर्चा" → NGT; "स्वतंत्र मुखर चर्चा" → ब्रेनस्टॉर्मिंग।

📝 अभ्यास प्रश्न
Q1. "समूह गतिकी" (Group Dynamics) शब्द के प्रवर्तक कौन माने जाते हैं?

✅ कर्ट लेविन (Kurt Lewin)।

Q2. ब्रूस टकमैन के मूल 1965 मॉडल में कुल कितने चरण थे, और पाँचवाँ चरण कब व किसके साथ मिलकर जोड़ा गया?

✅ मूल मॉडल में चार चरण थे (Forming, Storming, Norming, Performing); पाँचवाँ चरण "Adjourning" 1977 में टकमैन ने जीन जेंसन के साथ मिलकर जोड़ा।

Q3. समूह (Group) और टीम (Team) के बीच मूल अंतर क्या है?

✅ समूह में सदस्य व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी होते हैं (निष्पादन = व्यक्तिगत योगदानों का योग); टीम में सदस्य सामूहिक रूप से उत्तरदायी होते हैं और सकारात्मक तालमेल (synergy) उत्पन्न करते हैं।

Q4. किस समूह निर्णय-निर्माण तकनीक में विशेषज्ञों की राय पूर्णतः गुमनाम रूप से एकत्र की जाती है और वे कभी आमने-सामने नहीं मिलते?

✅ डेल्फी तकनीक (Delphi Technique)।

Q5. "ग्रुपथिंक" (Groupthink) की अवधारणा किसने दी, और यह किस परिस्थिति में उत्पन्न होती है?

✅ इरविंग जेनिस (Irving Janis, 1972); यह अत्यंत सामंजस्यपूर्ण समूहों में उत्पन्न होती है जब सर्वसम्मति की इच्छा आलोचनात्मक चिंतन को दबा देती है।

सारांश

समूह गतिकी (कर्ट लेविन द्वारा प्रवर्तित शब्द) समूह के भीतर सक्रिय अंतःक्रिया व अन्योन्याश्रयता की शक्तियों का अध्ययन है, जो होमन्स, न्यूकॉम्ब व थिबॉट-केली के सिद्धांतों से समझी जा सकती है। समूह सामंजस्य टीम-भावना को मजबूत करता है, परंतु अत्यधिक होने पर इरविंग जेनिस द्वारा वर्णित "ग्रुपथिंक" जैसी विकृति को जन्म दे सकता है। ब्रूस टकमैन का पंच-चरण मॉडल (Forming-Storming-Norming-Performing-Adjourning) समूह/टीम के विकास-पथ को समझाता है, जबकि समूह व टीम के बीच का अंतर सामूहिक उत्तरदायित्व व सकारात्मक तालमेल में निहित है। टीम निर्माण एक व्यवस्थित प्रक्रिया है जो समस्या-पहचान से अनुवर्तन तक चलती है, और ब्रेनस्टॉर्मिंग, NGT व डेल्फी जैसी तकनीकें समूह निर्णय-निर्माण को अधिक व्यवस्थित व प्रभावी बनाती हैं। RAS प्रारंभिक परीक्षा के लिए हर मॉडल का क्रम, हर तकनीक का अंतर तथा हर सिद्धांतकार का नाम-वर्ष सटीक रूप से याद रखना सर्वाधिक फलदायी रणनीति है।

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