परिचय
RAS प्रारंभिक परीक्षा में "संगठनात्मक व्यवहार एवं प्रत्यक्षीकरण" (Organisational Behaviour & Perception) प्रबंधन खंड का वह भाग है जो मानव-व्यवहार को संगठन के परिप्रेक्ष्य में समझने पर केंद्रित है। संगठनात्मक व्यवहार (OB) वह अंतर-अनुशासनात्मक ज्ञान-क्षेत्र है जो यह अध्ययन करता है कि व्यक्ति, समूह तथा संरचनाएँ संगठन के भीतर व्यवहार को किस प्रकार प्रभावित करते हैं, ताकि इस ज्ञान का प्रयोग संगठनात्मक प्रभावशीलता बढ़ाने में किया जा सके। इस टॉपिक की नींव व्यक्तिगत व्यवहार के निर्धारक तत्वों (प्रत्यक्षीकरण, अभिवृत्ति, मूल्य, व्यक्तित्व, अधिगम) को समझने में है, जिनमें से प्रत्यक्षीकरण (Perception) — विशेषकर इसकी त्रुटियाँ जैसे प्रभामंडल प्रभाव, रूढ़िबद्धीकरण, चयनात्मक प्रत्यक्षीकरण तथा गुणारोपण सिद्धांत — RAS प्रीलिम्स में सर्वाधिक बार पूछा जाने वाला उप-भाग है। यह टॉपिक अभिप्रेरणा व नेतृत्व जैसे आगामी टॉपिक की आधारशिला भी है।
मुख्य अवधारणाएँ
1. संगठनात्मक व्यवहार: अर्थ, परिभाषाएँ एवं प्रकृति
संगठनात्मक व्यवहार (OB) दो शब्दों से मिलकर बना है — "संगठन" (दो या अधिक व्यक्तियों का संरचित समूह जो साझा लक्ष्य की प्राप्ति हेतु मिलकर कार्य करता है) तथा "व्यवहार" (उद्दीपनों के प्रति व्यक्ति की प्रतिक्रिया)। स्टीफन पी. रॉबिन्स के अनुसार OB वह अध्ययन-क्षेत्र है जो यह जाँचता है कि व्यक्ति, समूह तथा संरचनाएँ संगठन के भीतर व्यवहार को किस प्रकार प्रभावित करते हैं, ताकि इस ज्ञान का प्रयोग संगठनात्मक प्रभावशीलता बढ़ाने में किया जा सके। बैरन एवं ग्रीनबर्ग ने इसे व्यक्ति, समूह तथा संगठनात्मक प्रक्रियाओं के व्यवस्थित अध्ययन के रूप में परिभाषित किया, जबकि जो केली ने इसे मानव-व्यवहार के कारणों व प्रभावों की पहचान से जोड़ा। डैनियल गोलमैन ने भावनात्मक बुद्धिमत्ता (Emotional Intelligence) के दृष्टिकोण से परिभाषा दी — लोग तब संबंधों का प्रबंधन सबसे प्रभावी ढंग से करते हैं जब वे अपनी भावनाओं को समझ-नियंत्रित कर सकें तथा दूसरों के प्रति सहानुभूति रख सकें। परीक्षा में अक्सर पूछा जाता है कि किस विद्वान ने OB को "प्रभावशीलता हेतु ज्ञान के प्रयोग" से जोड़ा — उत्तर रॉबिन्स है।
2. OB की प्रकृति एवं विशेषताएँ
OB की प्रकृति को पाँच प्रमुख विशेषताओं से समझा जाता है। यह बहु-विषयक (Multidisciplinary) है — मनोविज्ञान (व्यक्तिगत व अंतर-वैयक्तिक व्यवहार), समाजशास्त्र (टीम गतिकी, संगठनात्मक शक्ति व सामाजिक प्रणालियाँ), मानवशास्त्र (संगठनात्मक संस्कृति) तथा राजनीति विज्ञान (शक्ति व राजनीति) से अवधारणाएँ उधार लेकर बना एक मिश्रित ज्ञान-क्षेत्र है। यह एक वैज्ञानिक पद्धति (Scientific Method) अपनाता है — व्यवस्थित प्रेक्षण, तथ्यों का संकलन, आँकड़ों का विश्लेषण, वस्तुनिष्ठ निष्कर्ष तथा व्यवहार का पूर्वानुमान। यह एक प्रासंगिकता उपागम (Contingency Approach) अपनाता है — किसी एक समस्या का कोई "सर्वश्रेष्ठ" (one-best-way) समाधान नहीं होता, समाधान परिस्थिति पर निर्भर करता है (जो नेतृत्व-शैली एक स्थिति में कारगर हो, वही दूसरी स्थिति में असफल हो सकती है)। यह विश्लेषण के बहु-स्तरों (Multiple Levels of Analysis) पर आधारित है — वैयक्तिक, अंतर-वैयक्तिक, समूह, संगठनात्मक तथा पर्यावरणीय स्तर, क्योंकि संगठन में घटित घटनाएँ इन सभी स्तरों की अंतःक्रिया का परिणाम होती हैं। अंततः, संगठन को एक खुली प्रणाली (Open System) माना जाता है, जो निवेश (Input) → प्रक्रिया (Process) → निर्गत (Output) → प्रतिपुष्टि (Feedback) के निरंतर चक्र के माध्यम से अपने बाह्य वातावरण के साथ सतत अंतःक्रिया करता है, न कि किसी बंद डिब्बे की तरह पृथक रहकर कार्य करता है।
3. संगठनात्मक व्यवहार का क्षेत्र (Scope)
OB का क्षेत्र पाँच स्तरों में बँटा है। वैयक्तिक स्तर पर व्यक्तित्व, प्रत्यक्षीकरण, अधिगम, मूल्य व अभिप्रेरणा जैसे तत्वों का अध्ययन होता है — जैसे बहिर्मुखी कर्मचारी टीम-कार्य में आनंद लेता है जबकि अंतर्मुखी स्वतंत्र कार्य को प्राथमिकता देता है। अंतर-वैयक्तिक स्तर पर संचार, संघर्ष-प्रबंधन तथा अंतर-वैयक्तिक संबंधों का अध्ययन होता है — जैसे टीम-लीडर नियमित बैठकों से सदस्यों को अद्यतन रखता है। समूह स्तर पर समूह व्यवहार, टीम निर्माण तथा नेतृत्व का अध्ययन होता है — जैसे विभागाध्यक्ष कठिन प्रोजेक्ट के दौरान कर्मचारियों को प्रेरित करता है। संगठनात्मक स्तर पर शक्ति व राजनीति, संगठनात्मक संरचना, संगठनात्मक संस्कृति, परिवर्तन-प्रबंधन तथा निर्णय-निर्माण का अध्ययन होता है — जैसे गूगल की संस्कृति नवाचार व टीम-वर्क को प्रोत्साहित करती है। पर्यावरणीय स्तर पर बाह्य वातावरण, प्रौद्योगिकी, वैश्वीकरण तथा सामाजिक उत्तरदायित्व का अध्ययन होता है — जैसे भारतीय IT कंपनियाँ विश्वभर के ग्राहकों को सेवाएँ देती हैं। ये पाँचों स्तर परस्पर गुँथे हुए हैं और परीक्षा में इनकी सूची व उदाहरण दोनों पूछे जाते हैं।
4. व्यक्तिगत व्यवहार के निर्धारक तत्व
किसी भी कर्मचारी का कार्यस्थल-व्यवहार मुख्यतः पाँच परस्पर-संबंधित कारकों से निर्धारित होता है — व्यक्तित्व (Personality), जो व्यक्ति के अद्वितीय गुण, स्वभाव व व्यवहार-पैटर्न हैं जो यह तय करते हैं कि वह परिस्थितियों व लोगों के प्रति कैसी प्रतिक्रिया देगा; प्रत्यक्षीकरण (Perception), जिसके द्वारा व्यक्ति अपने वातावरण से मिलने वाली सूचना की व्याख्या व अर्थ-निर्धारण करता है; अधिगम (Learning), अर्थात अनुभव या प्रशिक्षण से उत्पन्न अपेक्षाकृत स्थायी व्यवहार-परिवर्तन; मूल्य (Values), जो सही व वांछनीय के बारे में गहरे विश्वास हैं जो निर्णय-प्रक्रिया व नैतिक व्यवहार को दिशा देते हैं; तथा अभिप्रेरणा (Motivation), वह आंतरिक शक्ति जो व्यक्ति को लक्ष्य-प्राप्ति हेतु प्रेरित करती है। इन पाँच तत्वों में से प्रत्यक्षीकरण को OB में सर्वाधिक केंद्रीय माना जाता है, क्योंकि लोग वास्तविकता के अनुसार नहीं बल्कि वास्तविकता के बारे में अपने प्रत्यक्षीकरण के अनुसार व्यवहार करते हैं।
5. प्रत्यक्षीकरण: अर्थ, महत्व एवं सीमाएँ
एस.पी. रॉबिन्स के अनुसार, "प्रत्यक्षीकरण वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा व्यक्ति अपने वातावरण को अर्थ प्रदान करने हेतु अपने संवेदी अनुभवों (sensory impressions) को संगठित व व्याख्यायित करता है।" यह प्रक्रिया तीन प्रकार के चरों से प्रभावित होती है — जिस वस्तु को देखा जा रहा है, जिस वातावरण में देखना घटित हो रहा है, तथा स्वयं देखने वाला व्यक्ति (perceiver)। प्रत्यक्षीकरण का महत्व इसलिए केंद्रीय है क्योंकि यह जटिल व बदलते वातावरण को समझने, संवेदी सूचना को सार्थक ढंग से व्यवस्थित करने, कार्यस्थल पर निर्णय-निर्माण व अंतर-वैयक्तिक संबंधों को प्रभावित करने, तथा प्रत्यक्षिक स्थिरता (perceptual constancies) के कारण वस्तुओं को स्थिर मानकर देखने में सहायक होता है। किंतु प्रत्यक्षीकरण की भी सीमाएँ हैं — यह कभी-कभी संवेदी सूचना की गलत या विकृत व्याख्या (भ्रम/illusions) का कारण बन सकता है, जो भौतिक कारणों (जैसे मृगतृष्णा) या मानसिक-सांज्ञानिक प्रक्रियाओं से उत्पन्न हो सकते हैं, तथा प्रत्यक्षिक त्रुटियाँ निर्णय, निर्णय-निर्माण व व्यवहार को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर सकती हैं।
6. प्रत्यक्षीकरण को प्रभावित करने वाले कारक
प्रत्यक्षीकरण तीन मुख्य वर्गों के कारकों से प्रभावित होता है। देखने वाले व्यक्ति से संबंधित कारक (Perceiver Variables) में आत्म-अवधारणा, दृष्टिकोण, उद्देश्य/अभिप्रेरणा, रुचियाँ, भूतकाल के अनुभव तथा अपेक्षाएँ शामिल हैं — व्यक्ति प्रायः चीज़ों को वैसे ही देखता है जैसी वह अपेक्षा रखता है। लक्ष्य/विषय से संबंधित कारक (Target Variables) में शारीरिक रूप-रंग, मौखिक-अमौखिक संचार, प्रस्थिति, व्यवसाय (जो रूढ़िबद्ध छवियाँ बनाता है), व्यक्तिगत विशेषताएँ, नवीनता, गति, ध्वनि, आकार, पृष्ठभूमि तथा समीपता शामिल हैं — गतिशील, बड़ी व असामान्य वस्तुएँ स्थिर व सामान्य वस्तुओं की तुलना में अधिक ध्यान खींचती हैं। परिस्थितिजन्य कारक (Situational Variables) में सामाजिक संदर्भ, संगठनात्मक भूमिका, कार्य-परिवेश, घटना-स्थल तथा समय शामिल हैं। इन तीनों वर्गों की पहचान परीक्षा में विशेष रूप से पूछी जाती है, क्योंकि प्रत्येक वर्ग के अंतर्गत कई उप-कारक हैं जिन्हें उदाहरणों सहित याद रखना उपयोगी है।
7. प्रत्यक्षीकरण की प्रक्रिया (चार चरण)
प्रत्यक्षीकरण एक सतत, चार-चरणीय प्रक्रिया है जो उद्दीपन प्राप्त होने से लेकर व्यवहार में परिणत होने तक चलती रहती है। पहला चरण प्रात्यक्षिक निवेश (Perceptual Inputs) है, जिसमें देखने वाला व्यक्ति वातावरण से विभिन्न उद्दीपन (सूचना, वस्तुएँ, घटनाएँ, लोग, परिस्थितियाँ) ग्रहण करता है। दूसरा चरण प्रात्यक्षिक तंत्र (Perceptual Mechanisms) है, जिसमें उद्दीपनों का चयन (selection), संगठन (organisation) व व्याख्या (interpretation) होती है — यही कारण है कि अलग-अलग व्यक्ति एक ही उद्दीपन की अलग-अलग व्याख्या करते हैं। तीसरा चरण प्रात्यक्षिक निर्गत (Perceptual Outputs) है, जिसमें उद्दीपनों के प्रसंस्करण से दृष्टिकोण, विचार, भावनाएँ व मूल्य उत्पन्न होते हैं — प्रात्यक्षिक त्रुटियाँ इन्हीं निर्गतों को विकृत कर सकती हैं। चौथा व अंतिम चरण व्यवहार का प्रतिमान (Pattern of Behaviour) है, जिसमें प्रात्यक्षिक निर्गत वास्तविक व्यवहार को प्रभावित करते हैं, और यह व्यवहार पुनः नई प्रतिक्रियाएँ उत्पन्न कर एक निरंतर चलने वाला चक्र बनाता है।
8. सटीक प्रत्यक्षीकरण में बाधाएँ (Barriers to Accurate Perception)
व्यक्ति प्रायः कुछ सामान्य मानसिक पूर्वाग्रहों (biases) के कारण दूसरों का सही आकलन नहीं कर पाता — यह RAS प्रीलिम्स का सर्वाधिक बार पूछा जाने वाला उप-भाग है। रूढ़िबद्धीकरण (Stereotyping) में व्यक्ति का आकलन उसके वैयक्तिक गुणों के बजाय उस समूह की विशेषताओं के आधार पर किया जाता है जिससे वह संबंधित है — जैसे यह मान लेना कि सभी युवा कर्मचारी लापरवाह होते हैं। प्रभामंडल प्रभाव (Halo Effect) में किसी एक गुण पर व्यक्ति की समग्र छवि बना ली जाती है — जैसे अच्छा संवाद करने वाले कर्मचारी को हर क्षेत्र में सक्षम मान लेना। मुझ-जैसा प्रभाव या प्रक्षेपण (Similar-to-Me Effect / Projection) में अपने समान लोगों के अधिक अनुकूल मूल्यांकन की प्रवृत्ति होती है — जैसे प्रबंधक द्वारा समान शैक्षणिक पृष्ठभूमि वाले कर्मचारियों को वरीयता देना। चयनात्मक प्रत्यक्षीकरण (Selective Perception) में अपनी रुचियों, दृष्टिकोण, अनुभवों व अपेक्षाओं के आधार पर सूचना की चयनात्मक व्याख्या की जाती है — दो कर्मचारी एक ही प्रबंधकीय प्रतिक्रिया की अलग-अलग व्याख्या कर सकते हैं। विकृतिकरण (Distortion) में अपनी मान्यताओं व आत्म-अवधारणा के अनुरूप सूचना को तोड़-मरोड़कर समझा जाता है — जैसे नकारात्मक प्रतिक्रिया को नज़रअंदाज़ कर केवल सकारात्मक टिप्पणियों पर ध्यान देना। अंततः, विरोधाभास प्रभाव (Contrast Effect) में किसी व्यक्ति का मूल्यांकन हाल ही में मिले अन्य व्यक्तियों से तुलना कर किया जाता है — कमज़ोर प्रदर्शन करने वालों की तुलना में औसत प्रदर्शन करने वाला भी उत्कृष्ट दिखाई देता है। इन छहों बाधाओं को याद रखने की युक्ति है "SHSSDC" — Stereotyping, Halo effect, Similar-to-me, Selective perception, Distortion, Contrast effect।
9. गुणारोपण सिद्धांत (Theory of Attribution)
गुणारोपण सिद्धांत यह बताता है कि लोग दूसरों के व्यवहार के कारणों की व्याख्या व मूल्यांकन कैसे करते हैं। जब हम किसी व्यक्ति का व्यवहार देखते हैं, तो हम यह तय करने का प्रयास करते हैं कि वह व्यवहार आंतरिक कारकों (व्यक्तिगत विशेषताओं — योग्यता, प्रयास, व्यक्तित्व, दृष्टिकोण, जो व्यक्ति के नियंत्रण में हैं) से उपजा है या बाह्य कारकों (परिस्थितिजन्य प्रभावों — भाग्य, वातावरण, कार्य की कठिनाई, परिस्थितियाँ, जो व्यक्ति के नियंत्रण से बाहर हैं) से। उदाहरण के लिए, "कर्मचारी कड़ी मेहनत के कारण सफल होता है" आंतरिक गुणारोपण है, जबकि "कर्मचारी अनुकूल बाज़ार-परिस्थितियों के कारण सफल होता है" बाह्य गुणारोपण है। हेरोल्ड केली (Harold Kelley) ने कारणात्मक गुणारोपण सिद्धांत (Theory of Causal Attribution) प्रस्तुत किया, जिसके अनुसार व्यक्ति व्यवहार के कारणों का निर्धारण तीन प्रकार की सूचनाओं के आधार पर करते हैं — विशिष्टता (Distinctiveness) — क्या व्यक्ति अलग-अलग परिस्थितियों में समान ढंग से व्यवहार करता है (निम्न विशिष्टता = आंतरिक कारण; उच्च विशिष्टता = बाह्य कारण); सर्वसम्मति (Consensus) — क्या समान परिस्थिति में अन्य लोग भी वैसा ही व्यवहार करते हैं (उच्च सर्वसम्मति = बाह्य कारण; निम्न सर्वसम्मति = आंतरिक कारण); तथा संगति/निरंतरता (Consistency) — क्या व्यवहार समय के साथ बार-बार दोहराया जाता है (उच्च संगति = आंतरिक कारण; निम्न संगति = बाह्य कारण)। इसे संक्षेप में "3-C मॉडल" कहा जाता है। सही गुणारोपण बेहतर प्रत्यक्षीकरण की ओर ले जाता है, जबकि गलत गुणारोपण प्रात्यक्षिक त्रुटियों को जन्म देता है।
10. अभिवृत्ति एवं मूल्य (Attitudes and Values)
अभिवृत्ति (Attitude) किसी वस्तु, व्यक्ति या घटना के प्रति व्यक्ति के अपेक्षाकृत स्थायी मूल्यांकनात्मक कथन (सकारात्मक या नकारात्मक) हैं, जो उसके व्यवहार को दिशा देते हैं। अभिवृत्ति के तीन घटक माने जाते हैं — संज्ञानात्मक घटक (Cognitive Component), जो व्यक्ति की मान्यताओं, विचारों व ज्ञान से संबंधित है; भावात्मक घटक (Affective Component), जो भावनाओं व अनुभूतियों (जैसे "मुझे अपना काम पसंद है") से संबंधित है; तथा व्यवहारात्मक घटक (Behavioural Component), जो किसी विशेष ढंग से कार्य करने की मंशा से संबंधित है। कार्यस्थल पर तीन प्रमुख अभिवृत्तियाँ अध्ययन की जाती हैं — कार्य-संतुष्टि (Job Satisfaction), कार्य-सम्बद्धता (Job Involvement) तथा संगठनात्मक प्रतिबद्धता (Organisational Commitment)। मूल्य (Values) सही व वांछनीय के बारे में व्यक्ति के गहरे, अपेक्षाकृत स्थायी विश्वास हैं जो प्राथमिकताओं व नैतिक निर्णयों को दिशा देते हैं। मिल्टन रोकीच ने मूल्यों को दो श्रेणियों में बाँटा — अंतिम मूल्य (Terminal Values), जो वांछित अंतिम अवस्थाओं (जैसे सुखी जीवन, समानता, आत्म-सम्मान) से संबंधित हैं, तथा साधनभूत मूल्य (Instrumental Values), जो वांछित व्यवहार-पद्धतियों (जैसे ईमानदारी, महत्वाकांक्षा, स्वतंत्र चिंतन) से संबंधित हैं जिनके द्वारा अंतिम मूल्य प्राप्त किए जाते हैं। परीक्षा में अभिवृत्ति के तीन घटकों (संज्ञानात्मक, भावात्मक, व्यवहारात्मक) तथा रोकीच के दो प्रकार के मूल्यों को याद रखना उपयोगी है।
11. व्यक्तित्व सिद्धांत (Personality Theories)
व्यक्तित्व (Personality) किसी व्यक्ति के स्थिर मनोवैज्ञानिक गुणों व व्यवहार-पैटर्न का वह अनूठा योग है जो यह निर्धारित करता है कि वह विभिन्न परिस्थितियों के प्रति कैसे अनुकूलित व प्रतिक्रिया करता है। इसे समझाने वाला सर्वाधिक स्वीकृत आधुनिक मॉडल बिग फाइव व्यक्तित्व मॉडल (Big Five / OCEAN) है, जो पाँच आयामों पर आधारित है — अनुभवशीलता (Openness to Experience): कल्पनाशीलता, जिज्ञासा व नवाचार की प्रवृत्ति; कर्तव्यनिष्ठा (Conscientiousness): अनुशासन, सावधानी व लक्ष्य-उन्मुखता; बहिर्मुखता (Extraversion): मिलनसारिता, ऊर्जा व सामाजिकता (इसके विपरीत अंतर्मुखता); सहमतता (Agreeableness): सहयोगिता, दयालुता व विश्वसनीयता; तथा तंत्रिकाताप/संवेगात्मक अस्थिरता (Neuroticism): चिंता, असुरक्षा व भावनात्मक अस्थिरता की प्रवृत्ति (इसके विपरीत संवेगात्मक स्थिरता)। इसके अतिरिक्त, मायर्स-ब्रिग्स प्रकार सूचक (Myers-Briggs Type Indicator — MBTI) कैथरीन ब्रिग्स व इसाबेल मायर्स द्वारा कार्ल युंग के मनोवैज्ञानिक प्रकारों पर आधारित विकसित एक लोकप्रिय (यद्यपि वैज्ञानिक रूप से विवादास्पद) उपकरण है, जो व्यक्तियों को चार द्विभाजी आयामों — बहिर्मुखी/अंतर्मुखी (E/I), संवेदनात्मक/अंतर्ज्ञानात्मक (S/N), विचारात्मक/भावात्मक (T/F), तथा निर्णयात्मक/प्रत्यक्षिक (J/P) — के आधार पर सोलह व्यक्तित्व-प्रकारों में वर्गीकृत करता है। अन्य महत्वपूर्ण अवधारणाओं में जूलियन रॉटर का नियंत्रण-स्थान (Locus of Control) — आंतरिक (सफलता को अपने प्रयासों का श्रेय देना) बनाम बाह्य (सफलता को भाग्य/परिस्थितियों का श्रेय देना) — तथा फ्रीडमैन व रोज़नमैन का टाइप A बनाम टाइप B व्यक्तित्व (टाइप A: प्रतिस्पर्धी, अधीर, समय-दबाव में; टाइप B: शांत, धैर्यवान, सहज) शामिल हैं।
12. अधिगम सिद्धांत (Learning Theories)
अधिगम (Learning) अनुभव के परिणामस्वरूप व्यवहार में आने वाला अपेक्षाकृत स्थायी परिवर्तन है। इसे समझाने वाले तीन प्रमुख सिद्धांत हैं। शास्त्रीय अनुबंधन (Classical Conditioning) इवान पावलोव द्वारा प्रस्तुत सिद्धांत है, जिसमें एक तटस्थ उद्दीपन (जैसे घंटी) को एक स्वाभाविक उद्दीपन (जैसे भोजन) के साथ बार-बार जोड़कर एक अनुबंधित प्रतिक्रिया (जैसे लार टपकना) उत्पन्न की जाती है — यह एक अनैच्छिक, प्रतिवर्ती (reflexive) प्रकार का अधिगम है। क्रियाप्रसूत अनुबंधन (Operant Conditioning) बी.एफ. स्किनर द्वारा प्रस्तुत सिद्धांत है, जिसके अनुसार व्यवहार अपने परिणामों (पुनर्बलन या दंड) का प्रकार्य है — जिस व्यवहार के बाद सकारात्मक पुनर्बलन (Reinforcement) मिलता है, वह दोहराए जाने की संभावना बढ़ती है, जबकि दंड (Punishment) मिलने पर वह व्यवहार कम होता है; यह एक स्वैच्छिक प्रकार का अधिगम है, जिसका प्रयोग संगठनों में कर्मचारी-व्यवहार को आकार देने (शेपिंग) हेतु किया जाता है। सामाजिक अधिगम सिद्धांत (Social Learning Theory) अल्बर्ट बंडूरा द्वारा प्रस्तुत सिद्धांत है, जो यह बताता है कि लोग प्रत्यक्ष अनुभव के अतिरिक्त दूसरों को देखकर, उनका अनुकरण करके तथा उनके व्यवहार के परिणामों को देखकर भी सीखते हैं (प्रतिरूपण/Modelling) — इसमें ध्यान, धारण, प्रतिकृति व पुनर्बलन चार प्रमुख प्रक्रियाएँ हैं। संगठनों में इन तीनों सिद्धांतों का उपयोग प्रशिक्षण-कार्यक्रम डिज़ाइन करने, कर्मचारी-व्यवहार को आकार देने तथा रोल-मॉडल के माध्यम से संगठनात्मक संस्कृति स्थापित करने में किया जाता है।
13. संगठनात्मक व्यवहार के मॉडल (OB Models)
कीथ डेविस ने संगठनात्मक व्यवहार के चार प्रमुख मॉडल प्रस्तुत किए, जो यह दर्शाते हैं कि समय के साथ प्रबंधकीय सोच किस प्रकार विकसित हुई। निरंकुश मॉडल (Autocratic Model) शक्ति व प्राधिकार पर आधारित है, जिसमें प्रबंधन आदेश देता है व कर्मचारी आज्ञाकारिता दिखाते हैं (कर्मचारी की मनोवैज्ञानिक परिणति: निर्भरता)। संरक्षक मॉडल (Custodial Model) आर्थिक संसाधनों पर आधारित है, जिसमें प्रबंधन धन व लाभ प्रदान करता है व कर्मचारी सुरक्षा-भावना से प्रेरित होकर संगठन के प्रति निष्ठा दिखाते हैं (परिणति: संगठन पर निर्भरता)। सहायक मॉडल (Supportive Model) नेतृत्व पर आधारित है, जिसमें प्रबंधन कर्मचारियों को सहयोग व समर्थन देता है व कर्मचारी कार्य-निष्पादन में सहभागिता दिखाते हैं (परिणति: सहभागिता व जागरूकता)। सामूहिक मॉडल (Collegial Model) भागीदारी पर आधारित है, जिसमें प्रबंधन व कर्मचारी एक टीम की तरह कार्य करते हैं तथा आत्म-अनुशासन प्रदर्शित होता है (परिणति: आत्म-नियंत्रण)। बाद में इसमें एक पाँचवाँ, तंत्र मॉडल (System Model), जोड़ा गया, जो विश्वास, सामुदायिकता व अर्थपूर्णता पर बल देते हुए कर्मचारियों में स्वामित्व-भावना (आत्म-सिद्धि) उत्पन्न करने का प्रयास करता है। ये चारों/पाँचों मॉडल किसी एक संगठन में क्रमिक विकास-चरणों के रूप में या स्थिति के अनुरूप एक साथ भी विद्यमान हो सकते हैं।
महत्वपूर्ण तथ्य
- OB परिभाषा के प्रवर्तक: रॉबिन्स — "प्रभावशीलता हेतु ज्ञान का प्रयोग"; गोलमैन — भावनात्मक बुद्धिमत्ता दृष्टिकोण।
- OB की 5 विशेषताएँ: बहु-विषयक, वैज्ञानिक पद्धति, प्रासंगिकता उपागम, बहु-स्तरीय विश्लेषण, खुली प्रणाली।
- OB का क्षेत्र 5 स्तरों में: वैयक्तिक, अंतर-वैयक्तिक, समूह, संगठनात्मक, पर्यावरणीय।
- व्यक्तिगत व्यवहार के 5 निर्धारक: व्यक्तित्व, प्रत्यक्षीकरण, अधिगम, मूल्य, अभिप्रेरणा।
- प्रत्यक्षीकरण की परिभाषा — एस.पी. रॉबिन्स; प्रत्यक्षीकरण की प्रक्रिया के 4 चरण: निवेश, तंत्र, निर्गत, व्यवहार-प्रतिमान।
- सटीक प्रत्यक्षीकरण की 6 बाधाएँ (SHSSDC): रूढ़िबद्धीकरण, प्रभामंडल प्रभाव, मुझ-जैसा प्रभाव, चयनात्मक प्रत्यक्षीकरण, विकृतिकरण, विरोधाभास प्रभाव।
- गुणारोपण सिद्धांत: आंतरिक बनाम बाह्य; केली का 3-C मॉडल — विशिष्टता, सर्वसम्मति, संगति।
- अभिवृत्ति के 3 घटक: संज्ञानात्मक, भावात्मक, व्यवहारात्मक; रोकीच के मूल्य: अंतिम बनाम साधनभूत।
- बिग फाइव (OCEAN): अनुभवशीलता, कर्तव्यनिष्ठा, बहिर्मुखता, सहमतता, तंत्रिकाताप; MBTI — युंग पर आधारित, 4 आयाम, 16 प्रकार।
- अधिगम के 3 सिद्धांत: पावलोव — शास्त्रीय अनुबंधन; स्किनर — क्रियाप्रसूत अनुबंधन; बंडूरा — सामाजिक अधिगम सिद्धांत।
- कीथ डेविस के 4 OB मॉडल: निरंकुश, संरक्षक, सहायक, सामूहिक (+ तंत्र मॉडल)।
परीक्षा टिप्स
- प्रत्यक्षिक त्रुटियों (halo, stereotyping, selective perception, contrast, similar-to-me, distortion) की परिभाषाओं व उदाहरणों को परस्पर न मिलाएँ — प्रश्न अक्सर एक जैसे लगने वाले विकल्पों के बीच सूक्ष्म अंतर पर आधारित होते हैं।
- केली के 3-C मॉडल में हर कारक की उच्च/निम्न स्थिति किस प्रकार आंतरिक या बाह्य गुणारोपण की ओर ले जाती है, इसे तालिका के रूप में याद रखें।
- शास्त्रीय अनुबंधन (अनैच्छिक, पावलोव) व क्रियाप्रसूत अनुबंधन (स्वैच्छिक, परिणाम-आधारित, स्किनर) के बीच अंतर तथा उदाहरण याद रखें — यह जोड़ी बार-बार उलट कर पूछी जाती है।
- बिग फाइव का संक्षिप्त नाम "OCEAN" तथा डेविस के OB मॉडल के क्रम (निरंकुश → संरक्षक → सहायक → सामूहिक → तंत्र) को विकासात्मक क्रम में याद रखें।
Stereotyping, Halo effect, Similar-to-me, Selective perception, Distortion, Contrast effect — इन छह अक्षरों को "शह-स-सद-सी" जैसी ध्वनि-श्रृंखला के रूप में याद रखें। बिग फाइव के लिए "OCEAN" (Openness, Conscientiousness, Extraversion, Agreeableness, Neuroticism) एक समुद्र की तरह याद रखें — पाँच अक्षर, पाँच आयाम।
दोनों प्रात्यक्षिक त्रुटियाँ हैं इसलिए मिलाई जाती हैं। प्रभामंडल प्रभाव (Halo Effect) एक व्यक्ति-विशेष के एक गुण के आधार पर उसकी समग्र छवि बनाना है (जैसे "यह कर्मचारी समय का पाबंद है, तो ज़रूर कुशल भी होगा")। रूढ़िबद्धीकरण (Stereotyping) किसी व्यक्ति का आकलन उसके समूह की सामान्य विशेषताओं के आधार पर करना है (जैसे "यह युवा है, तो लापरवाह होगा")। त्वरित पहचान: यदि आकलन एक व्यक्ति के एक गुण से समग्र छवि तक जाए तो हेलो इफ़ेक्ट; यदि आकलन समूह-सदस्यता से व्यक्ति तक जाए तो स्टीरियोटाइपिंग।
Q1. "प्रत्यक्षीकरण वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा व्यक्ति अपने वातावरण को अर्थ प्रदान करने हेतु अपने संवेदी अनुभवों को संगठित व व्याख्यायित करता है" — यह परिभाषा किसने दी?
✅ एस.पी. रॉबिन्स (S.P. Robbins)।
Q2. जब एक प्रबंधक किसी कर्मचारी के अच्छे संचार-कौशल के आधार पर उसे हर क्षेत्र में सक्षम मान लेता है, तो यह किस प्रात्यक्षिक त्रुटि का उदाहरण है?
✅ प्रभामंडल प्रभाव (Halo Effect)।
Q3. हेरोल्ड केली के कारणात्मक गुणारोपण सिद्धांत के तीन कारक कौन-से हैं?
✅ विशिष्टता (Distinctiveness), सर्वसम्मति (Consensus) तथा संगति/निरंतरता (Consistency) — 3-C मॉडल।
Q4. बी.एफ. स्किनर द्वारा प्रस्तुत अधिगम सिद्धांत, जिसमें व्यवहार अपने परिणामों (पुनर्बलन/दंड) का प्रकार्य होता है, क्या कहलाता है?
✅ क्रियाप्रसूत अनुबंधन (Operant Conditioning)।
Q5. कीथ डेविस के अनुसार, जिस OB मॉडल में प्रबंधन व कर्मचारी एक टीम की भाँति कार्य करते हैं तथा आत्म-अनुशासन प्रदर्शित होता है, उसे क्या कहते हैं?
✅ सामूहिक मॉडल (Collegial Model)।
सारांश
संगठनात्मक व्यवहार (OB) एक बहु-विषयक, वैज्ञानिक व प्रासंगिकता-आधारित ज्ञान-क्षेत्र है जो व्यक्ति, समूह व संगठन को पाँच स्तरों (वैयक्तिक, अंतर-वैयक्तिक, समूह, संगठनात्मक, पर्यावरणीय) पर समझने का प्रयास करता है। व्यक्तिगत व्यवहार व्यक्तित्व, प्रत्यक्षीकरण, अधिगम, मूल्य व अभिप्रेरणा से निर्धारित होता है, जिनमें प्रत्यक्षीकरण — विशेषकर इसकी छह बाधाएँ (हेलो प्रभाव, रूढ़िबद्धीकरण, चयनात्मक प्रत्यक्षीकरण, विकृतिकरण, विरोधाभास प्रभाव, मुझ-जैसा प्रभाव) तथा केली का गुणारोपण सिद्धांत — परीक्षा-दृष्टि से सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। बिग फाइव व MBTI व्यक्तित्व को, तथा पावलोव, स्किनर व बंडूरा के सिद्धांत अधिगम को समझाते हैं, जबकि कीथ डेविस के OB मॉडल (निरंकुश, संरक्षक, सहायक, सामूहिक, तंत्र) यह दर्शाते हैं कि प्रबंधकीय दृष्टिकोण समय के साथ नियंत्रण से सहभागिता की ओर विकसित हुआ है। RAS प्रीलिम्स के लिए इन सभी अवधारणाओं व उनके प्रवर्तकों को जोड़े में याद रखना सर्वाधिक फलदायी रणनीति है।