परिचय एवं परीक्षा प्रासंगिकता
आपातकाल भारतीय संविधान का एक महत्वपूर्ण और संवेदनशील विषय है जो संघीय सरकार को असाधारण परिस्थितियों में व्यापक शक्तियां प्रदान करता है। RPSC RAS परीक्षा के पिछले वर्षों के प्रश्नपत्रों में इस विषय से नियमित रूप से प्रश्न आए हैं। आपातकाल का अध्ययन न केवल संविधान के अनुच्छेदों को समझने के लिए आवश्यक है बल्कि भारतीय राजनीतिक इतिहास को भी समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। विशेषकर 1975-1977 की आपातकालीन अवधि परीक्षा की दृष्टि से विशेष महत्व रखती है।
मुख्य अवधारणाएं
1. आपातकाल की परिभाषा और प्रकार
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 352, 356 और 360 के अंतर्गत तीन प्रकार की आपातकालीन स्थितियों का प्रावधान किया गया है। आपातकाल वह असाधारण परिस्थिति है जिसमें सामान्य संवैधानिक व्यवस्था को स्थगित कर दिया जाता है और केंद्रीय सत्ता को अतिरिक्त शक्तियां प्रदान की जाती हैं। प्रथम प्रकार का आपातकाल राष्ट्रीय आपातकाल कहलाता है जो युद्ध, बाहरी आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह के कारण देश या उसके किसी भाग की सुरक्षा को खतरा होने पर घोषित किया जाता है। दूसरा प्रकार राज्य आपातकाल है जिसे संवैधानिक तंत्र की विफलता की स्थिति में घोषित किया जा सकता है। तीसरा प्रकार वित्तीय आपातकाल है जो भारत की वित्तीय स्थिरता या साख को खतरा होने पर घोषित किया जाता है।
2. अनुच्छेद 352 - राष्ट्रीय आपातकाल
अनुच्छेद 352 राष्ट्रीय आपातकाल से संबंधित है। यह राष्ट्रपति को यह अधिकार देता है कि यदि युद्ध, बाहरी आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह से भारत या उसके किसी भाग की सुरक्षा संकट में हो तो वह आपातकाल की घोषणा कर सके। 44वें संशोधन के बाद राष्ट्रपति यह घोषणा केवल मंत्रिमंडल की लिखित सिफारिश मिलने पर ही कर सकता है। राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा के बाद संघ को व्यापक अधिकार मिल जाते हैं। इस अवस्था में मौलिक अधिकारों को सीमित किया जा सकता है, वित्तीय व्यवस्था को नियंत्रित किया जा सकता है, और राज्यों की शक्तियों को कम किया जा सकता है। घोषणा को एक माह के भीतर संसद के दोनों सदनों से विशेष बहुमत से अनुमोदित कराना आवश्यक है; अनुमोदन के बाद आपातकाल 6 माह चलता है और हर 6 माह में संसद की मंजूरी से बढ़ाया जा सकता है। 44वें संवैधानिक संशोधन (1978) ने 'आंतरिक अशांति' के स्थान पर 'सशस्त्र विद्रोह' शब्द रखा।
अनुच्छेद 358 के अनुसार युद्ध या बाहरी आक्रमण के आधार पर आपातकाल घोषित होते ही अनुच्छेद 19 के अधिकार स्वतः निलंबित हो जाते हैं (सशस्त्र विद्रोह के आधार पर नहीं)। अनुच्छेद 359 के अंतर्गत राष्ट्रपति आदेश द्वारा मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए न्यायालय जाने का अधिकार निलंबित कर सकता है, किंतु अनुच्छेद 20 और 21 के अधिकार किसी भी स्थिति में निलंबित नहीं हो सकते (44वां संशोधन)।
3. अनुच्छेद 356 - राज्य आपातकाल
अनुच्छेद 356 के अंतर्गत जब किसी राज्य की संवैधानिक मशीनरी विफल हो जाए तो राष्ट्रपति राज्य आपातकाल की घोषणा कर सकता है। इसे राष्ट्रपति शासन भी कहा जाता है। राष्ट्रपति शासन में राज्य की विधानसभा को भंग या निलंबित किया जा सकता है और राज्य का प्रशासन राष्ट्रपति की ओर से राज्यपाल के माध्यम से संचालित किया जाता है। यह उद्घोषणा सामान्यतः राज्यपाल की रिपोर्ट पर की जाती है। यह स्थिति मुख्यतः चुनाव परिणामों के बाद सरकार बनने में असफलता, सरकार का गिरना, या संवैधानिक तंत्र की नितांत विफलता की परिस्थितियों में आती है। उद्घोषणा को 2 माह के भीतर संसद से अनुमोदन आवश्यक है; यह प्रारंभ में 6 माह के लिए लागू रहती है और अधिकतम 3 वर्ष तक बढ़ाई जा सकती है। एक वर्ष से अधिक बढ़ाने के लिए (44वें संशोधन के अनुसार) देश में राष्ट्रीय आपातकाल लागू होना और चुनाव आयोग का प्रमाणन आवश्यक है। एस.आर. बोम्मई मामले (1994) में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि राष्ट्रपति शासन की उद्घोषणा न्यायिक समीक्षा के अधीन है।
4. अनुच्छेद 360 - वित्तीय आपातकाल
अनुच्छेद 360 वित्तीय आपातकाल से संबंधित है। जब राष्ट्रपति को यह विश्वास हो कि राष्ट्र की वित्तीय स्थिरता को खतरा है तो वह वित्तीय आपातकाल की घोषणा कर सकता है। इस प्रकार के आपातकाल में राष्ट्रपति राज्यों को वित्तीय औचित्य के सिद्धांतों के पालन का निर्देश दे सकता है तथा राज्य के कर्मचारियों और उच्च न्यायालय व सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों सहित सभी के वेतन-भत्तों में कटौती का निर्देश दे सकता है। उद्घोषणा को 2 माह के भीतर संसद से अनुमोदन आवश्यक है। यह सबसे कम प्रयोग किया जाने वाला आपातकाल है और अभी तक भारत में इसे कभी लागू नहीं किया गया है। इसका आधार अनुच्छेद 360 में केवल "भारत की वित्तीय स्थिरता या साख को खतरा" है।
| बिंदु | अनु. 352 (राष्ट्रीय) | अनु. 356 (राज्य) | अनु. 360 (वित्तीय) |
|---|---|---|---|
| आधार | युद्ध, बाहरी आक्रमण, सशस्त्र विद्रोह | राज्य में संवैधानिक तंत्र की विफलता | भारत की वित्तीय स्थिरता या साख को खतरा |
| संसदीय अनुमोदन की समयसीमा | 1 माह (विशेष बहुमत) | 2 माह | 2 माह |
| अवधि | 6 माह; हर 6 माह में संसद की मंजूरी से बढ़ेगी | 6 माह; अधिकतम 3 वर्ष | कोई निश्चित अवधि नहीं |
| अब तक प्रयोग | 3 बार (1962, 1971, 1975) | अनेक बार | कभी नहीं |
5. संवैधानिक संशोधन और आपातकाल पर प्रतिबंध
44वां संवैधानिक संशोधन (1978) आपातकाल पर सबसे महत्वपूर्ण नियंत्रण लाया। इस संशोधन के तहत संसद की मंजूरी की समयसीमा 2 माह से घटाकर 1 माह की गई, मंत्रिमंडल की लिखित सिफारिश आवश्यक की गई, लोकसभा के कुल सदस्यों के दसवें भाग को आपातकाल की समाप्ति पर विचार के लिए बैठक बुलाने का अधिकार मिला, और अनुच्छेद 20 व 21 को निलंबन से बाहर रखा गया। 42वें संवैधानिक संशोधन (1976) ने राष्ट्रीय आपातकाल को देश के किसी एक भाग तक सीमित घोषित करने की व्यवस्था की। मूल संविधान के 'आंतरिक अशांति' आधार को 44वें संशोधन ने हटाकर 'सशस्त्र विद्रोह' किया। आपातकाल पर लगाए गए ये संवैधानिक प्रतिबंध यह सुनिश्चित करते हैं कि आपातकाल का दुरुपयोग न हो और लोकतांत्रिक मूल्यों को बनाए रखा जाए।
महत्वपूर्ण तथ्य
- प्रथम राष्ट्रीय आपातकाल: 26 अक्टूबर 1962 को चीनी आक्रमण के समय राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन द्वारा घोषित किया गया।
- दूसरा राष्ट्रीय आपातकाल: 3 दिसंबर 1971 को पाकिस्तान से युद्ध के समय राष्ट्रपति वी.वी. गिरि द्वारा घोषित किया गया।
- तीसरा राष्ट्रीय आपातकाल: 25 जून 1975 को 'आंतरिक अशांति' के आधार पर राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद द्वारा (प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सलाह पर) घोषित किया गया जो 21 मार्च 1977 तक रहा।
- आपातकाल की समाप्ति: 21 मार्च 1977 को इंदिरा गांधी सरकार की सिफारिश पर आपातकाल हटाया गया; मोरारजी देसाई ने 24 मार्च 1977 को प्रधानमंत्री पद की शपथ ली।
- संसद की मंजूरी: 44वें संशोधन के बाद राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा के एक महीने के अंदर संसद की मंजूरी लेना आवश्यक है।
- लोकसभा का कार्यकाल: राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान संसद विधि द्वारा लोकसभा का कार्यकाल एक बार में एक वर्ष तक बढ़ा सकती है।
- मौलिक अधिकार: अनुच्छेद 20 और 21 के अधिकार आपातकाल के दौरान भी निलंबित नहीं किए जा सकते; अनुच्छेद 19 युद्ध/बाहरी आक्रमण के आधार पर घोषित आपातकाल में स्वतः निलंबित हो जाता है।
- 26 अक्टूबर 1962चीन युद्ध; राष्ट्रपति राधाकृष्णन (10 जनवरी 1968 को समाप्त)
- 3 दिसंबर 1971पाकिस्तान युद्ध; राष्ट्रपति वी.वी. गिरि
- 25 जून 1975आंतरिक अशांति; राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद
- 21 मार्च 1977आपातकाल की समाप्ति
- 197844वां संशोधन: 'सशस्त्र विद्रोह', 1 माह में संसदीय अनुमोदन
राजस्थान विशेष
राजस्थान में अब तक चार बार राष्ट्रपति शासन (अनुच्छेद 356) लागू हुआ है: 1967, 1977, 1980 और 1992-93। परीक्षा की दृष्टि से इनके वर्ष और कारण याद रखना उपयोगी है।
| वर्ष | कारण |
|---|---|
| 13 मार्च 1967 | विधानसभा चुनाव में किसी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला |
| अप्रैल-जून 1977 | केंद्र में पहली गैर-कांग्रेसी सरकार बनने के बाद राज्य सरकार बर्खास्त |
| फरवरी-जून 1980 | केंद्र में कांग्रेस की वापसी के बाद राज्य सरकार बर्खास्त |
| दिसंबर 1992 - दिसंबर 1993 | अयोध्या घटना के बाद राज्य सरकार बर्खास्त, विधानसभा भंग |
परीक्षा पैटर्न
RPSC RAS परीक्षा में आपातकाल से निम्नलिखित प्रकार के प्रश्न पूछे जाते हैं:
- प्रश्न 1: कौन सा अनुच्छेद राष्ट्रीय आपातकाल से संबंधित है? - सीधा तथ्यात्मक प्रश्न
- प्रश्न 2: भारत में कितने राष्ट्रीय आपातकाल घोषित किए गए हैं? - ऐतिहासिक प्रश्न
- प्रश्न 3: 44वें संवैधानिक संशोधन का आपातकाल पर क्या प्रभाव पड़ा? - विश्लेषणात्मक प्रश्न
- प्रश्न 4: आपातकाल के दौरान राष्ट्रपति की शक्तियों की सीमाएं क्या हैं? - वैचारिक प्रश्न
- प्रश्न 5: वित्तीय आपातकाल और राष्ट्रीय आपातकाल में अंतर बताइए - तुलनात्मक प्रश्न
स्मरण युक्तियां
अनुच्छेद क्रम: 352 (राष्ट्रीय), 356 (राज्य), 360 (वित्तीय) - संख्याएं बढ़ते क्रम में याद रखें।
1975-1977: यह सबसे विवादास्पद राष्ट्रीय आपातकाल था; इसके बाद 1978 में 44वां संशोधन आया जिसने आपातकाल पर कठोर नियंत्रण लगाए।
अभ्यास प्रश्न (उत्तर सहित)
- भारतीय संविधान में कितने प्रकार के आपातकाल का प्रावधान है? - तीन (राष्ट्रीय, राज्य, वित्तीय)
- अनुच्छेद 360 किस आपातकाल से संबंधित है? - वित्तीय आपातकाल
- 1975 का आपातकाल किसके द्वारा और किस आधार पर घोषित किया गया? - राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद द्वारा, 'आंतरिक अशांति' के आधार पर
- 44वें संवैधानिक संशोधन ने आपातकाल पर क्या प्रभाव डाला? - 'आंतरिक अशांति' की जगह 'सशस्त्र विद्रोह', मंत्रिमंडल की लिखित सिफारिश और 1 माह में संसदीय अनुमोदन आवश्यक
- आपातकाल के दौरान कौन से मौलिक अधिकार निलंबित नहीं किए जा सकते? - अनुच्छेद 20 और 21
⚡ त्वरित रिवीजन — One-Liners
- •अनुच्छेद 32 को डॉ. अंबेडकर ने 'संविधान की आत्मा' कहा था।
- •DPSP भाग IV में हैं; ये वाद योग्य नहीं हैं किन्तु शासन में मूलभूत हैं।
- •भारतीय संसद की राज्यसभा में अधिकतम 250 सदस्य हो सकते हैं; 12 राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत।
- •73वें संविधान संशोधन (1992) द्वारा पंचायती राज को संवैधानिक दर्जा मिला।
- •सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना 28 जनवरी 1950 को हुई; इसके पास मूल, अपील और सलाहकार क्षेत्राधिकार है।