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राजस्थान का भौतिक भूगोल — प्रदेश, नदियां और उच्चावच

Physical Geography of Rajasthan — Regions, Rivers and Relief

14 मिनटintermediate✓ अपडेटेड: जुलाई 2026· Geography of World and India

परिचय

राजस्थान के भौतिक भूगोल को समझने का सबसे अच्छा तरीका इसे बिखरी हुई पहाड़ियों, मरुस्थल और नदियों के ढेर के रूप में नहीं, बल्कि पश्चिम से पूर्व की ओर फैली चार जुड़ी हुई पट्टियों के रूप में देखना है, जिनमें से हर एक का अपना उच्चावच, जलवायु और अपवाह-स्वभाव है। अरावली पर्वतमाला इन पट्टियों के बीच की रीढ़ है: इसके पश्चिम में जो कुछ भी है वह भीतर की ओर बहता है या खारे दलदल में विलीन हो जाता है, जबकि इसके पूर्व में जो कुछ भी है वह चम्बल-यमुना-गंगा की बड़ी नदी-प्रणाली में जा मिलता है। पश्चिम से पूर्व की यह प्रदेश-दर-प्रदेश दृष्टि — रेतीले थार से शुरू होकर, अरावली को पार करते हुए, उपजाऊ पूर्वी मैदान से गुजरते हुए, और अंत में दक्षिण-पूर्व के हाड़ौती पठार तक — तथा हर पट्टी से जुड़ा अपवाह-तंत्र, यही वह ढाँचा है जिसमें RAS Prelims में राजस्थान के उच्चावच से जुड़े प्रश्न प्रायः पूछे जाते हैं, और यही इस सामग्री का केंद्र-बिंदु है।

मुख्य अवधारणाएँ

1. पश्चिमी रेतीला प्रदेश / थार मरुस्थल

अरावली के पश्चिम में फैला यह क्षेत्रफल की दृष्टि से राजस्थान का सबसे बड़ा भौतिक विभाग है — प्रायः राज्य के लगभग तीन-पंचमांश भाग के बराबर बताया जाता है — हालाँकि यहाँ जनसंख्या का हिस्सा उसकी तुलना में काफी कम है। इस पट्टी को स्थानीय रूप से मरुस्थली कहा जाता है। इसकी पहचान हैं विशाल रेत के टीले (जिन्हें स्थानीय भाषा में धोरा या धरियन कहा जाता है), जो कई रूपों में मिलते हैं — बरखान (अर्द्धचंद्राकार), अनुदैर्ध्य (सीफ), अनुप्रस्थ, परवलयिक व तारा-आकार के टीले — और इनके बीच-बीच में फलौदी व पोकरण जैसे स्थानों पर टीला-रहित चट्टानी व कंकरीली भूमि भी मिलती है। यहाँ की जलवायु शुष्क से अर्द्धशुष्क है: वर्षा कम व अनियमित होती है, अत्यंत पश्चिमी भाग में वार्षिक वर्षा प्रायः 25 सेमी से भी कम रहती है, दिन-रात के तापमान में भारी अंतर रहता है, और प्राकृतिक वनस्पति विरल व कँटीली है। मूल मरुस्थलीय जिलों में जैसलमेर, बाड़मेर व बीकानेर शामिल हैं, जबकि यह शुष्क स्वभाव जोधपुर, नागौर, चुरू, झुंझुनू व सीकर तक भी फैला है; श्रीगंगानगर व हनुमानगढ़ भौगोलिक रूप से इसी पट्टी में आते हैं, परंतु इंदिरा गांधी नहर ने इन्हें कृषि की दृष्टि से पूरी तरह बदल दिया है। वर्षा की कमी के कारण ही यह क्षेत्र कई खारे पानी की झीलों का घर भी है, जो उथले गर्तों में बनी हैं — सांभर (सबसे बड़ी) के साथ-साथ पचपदरा, डीडवाना व डेगाना — और ये झीलें स्वयं इस क्षेत्र के आंतरिक व अल्पकालिक अपवाह का प्रमाण हैं।

2. अरावली पर्वतीय प्रदेश

अरावली पृथ्वी की सबसे प्राचीन वलित पर्वत-श्रृंखलाओं में से एक है और राजस्थान में मोटे तौर पर उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम दिशा में फैली है — उत्तर-पूर्व में खेतड़ी-झुंझुनू क्षेत्र से राज्य में प्रवेश करते हुए यह दक्षिण-पश्चिम में गुजरात सीमा के निकट सिरोही-माउंट आबू खंड तक चलती है। यह कोई एक अखंड दीवार नहीं है, बल्कि पहाड़ियों, कटकों व बिखरी हुई टेकरियों की एक शृंखला है, जिसमें कई दर्रे व अंतराल हैं जो ऐतिहासिक रूप से पूर्वी व पश्चिमी राजस्थान के बीच आवागमन के गलियारे रहे हैं। ऊँचाई दक्षिण में माउंट आबू पर सबसे अधिक है, जहाँ सिरोही जिले में स्थित गुरु शिखर (1,722 मीटर) — राजस्थान व समूची अरावली शृंखला का सर्वोच्च बिंदु — है; उत्तर-पूर्व की ओर बढ़ने पर श्रृंखला की ऊँचाई व निरंतरता घटती जाती है और खेतड़ी-अलवर के आसपास यह छितरी हुई निचली चट्टानी टेकरियों में सिमट जाती है। अरावली का सबसे बड़ा महत्व इसकी कार्यात्मक भूमिका में है: यह राजस्थान का मुख्य जलवायु व अपवाह-विभाजक है, जो दक्षिण-पश्चिम मानसून को आंशिक रूप से रोकती है और शुष्क पश्चिम को अपेक्षाकृत आर्द्र पूर्व से अलग करती है, साथ ही यह मरुस्थल की पश्चिम की ओर बहने वाली आंतरिक नदियों तथा अंततः चम्बल-यमुना-गंगा तंत्र में मिलने वाली पूर्वी नदियों के बीच जल-विभाजक का काम भी करती है। लंबे समय के अपरदन के साथ-साथ कहीं-कहीं खनन व वनोन्मूलन के दबाव ने इस प्राचीन श्रृंखला को नई पर्वत-श्रृंखलाओं की तुलना में काफी घिसा हुआ बना दिया है।

3. पूर्वी मैदान

अरावली के पूर्व में उपजाऊ, हल्के लहरदार जलोढ़ मैदानों की पट्टी फैली है, जिसका निर्माण समय के साथ बनास, बाणगंगा, गंभीरी व पार्वती नदियों तथा उनकी सहायक धाराओं ने किया है। इस पट्टी को दो जुड़े हुए अपवाह-बेसिनों के रूप में समझा जा सकता है: बनास बेसिन, जो भीलवाड़ा-टोंक-सवाई माधोपुर की पट्टी को समेटे है और जहाँ बनास आगे चलकर चम्बल में मिलती है, तथा बाणगंगा बेसिन, जो जयपुर-दौसा-भरतपुर की पट्टी को समेटे है, जिसका पानी अंततः यमुना तंत्र की ओर बढ़ता है। इस मैदान से सबसे अधिक जुड़े जिलों में जयपुर, अलवर, भरतपुर, दौसा, टोंक, सवाई माधोपुर, धौलपुर व करौली शामिल हैं। चूँकि यह भूमि उस बेसिन में जमा जलोढ़ मिट्टी से बनी है जिसकी उत्पत्ति प्राचीन टेथिस सागर के हटने से जुड़ी है, और चूँकि इसकी नदियाँ संरचनात्मक रूप से चम्बल-यमुना-गंगा तंत्र से जुड़ती हैं, इसलिए पूर्वी मैदान को प्रायः भारत के विशाल उत्तरी (गंगा) मैदान के पश्चिमी विस्तार के रूप में वर्णित किया जाता है, हालाँकि प्रशासनिक रूप से यह उसका हिस्सा नहीं है। यहाँ की मिट्टी उपजाऊ जलोढ़ मिट्टी है, जो गेहूँ, सरसों, बाजरा व अन्य रबी-खरीफ फसलों को सहारा देती है, जिससे यह राज्य के सर्वाधिक घनी आबादी वाले व कृषि की दृष्टि से उत्पादक भागों में गिना जाता है। वर्षा यहाँ मध्यम है — मोटे तौर पर 55 से 80 सेमी के बीच — और अरावली से दूर भरतपुर-अलवर की ओर बढ़ने पर सामान्यतः बढ़ती जाती है।

4. दक्षिणी-पूर्वी पठार (हाड़ौती)

राज्य के दक्षिण-पूर्वी कोने में — मुख्यतः कोटा, बूंदी, झालावाड़ व बारां जिलों में — फैला यह विभाग मध्य प्रदेश के मालवा पठार के उत्तर-पश्चिमी विस्तार के रूप में माना जाता है। इसका उच्चावच समतल मैदान नहीं बल्कि एक कटा-छँटा पठार है, और कई हिस्सों में यहाँ बेसाल्ट-जनित काली (रेगुर) मिट्टी मिलती है, जो कपास और वर्तमान फसल-प्रारूप में सोयाबीन के लिए उपयुक्त है — यह पूर्वी मैदान की जलोढ़ मिट्टी से बिल्कुल अलग है। ऊँचे विन्ध्यन-मालवा पठारी क्षेत्र से निकटता के कारण, जो दक्षिण-पश्चिम मानसून को अधिक प्रभावी ढंग से रोकते हैं, इस पठार को राज्य के बाकी हिस्सों की तुलना में अपेक्षाकृत अधिक व अधिक भरोसेमंद वर्षा मिलती है — झालावाड़ के कुछ भागों में यह लगभग 80 से 100 सेमी तक पहुँच जाती है — जिससे यह राजस्थान के सबसे हरे-भरे व कृषि की दृष्टि से सुरक्षित भागों में गिना जाता है। चम्बल नदी व इसकी प्रमुख सहायक नदियाँ — कालीसिंध, पार्वनआहू — इस पठार को सामान्यतः उत्तर-पूर्व दिशा में पार करती हैं, अक्सर कंदराओं व पठार के किनारे बीहड़ जैसी भूमि को गढ़ते हुए, इसके बाद चम्बल राज्य की सीमा से बाहर निकलती है।

5. चारों प्रदेशों से जुड़ा अपवाह-तंत्र

राजस्थान की नदियों को एक अलग-थलग सूची के रूप में याद करने की बजाय इन चार प्रदेशों से जोड़कर समझना कहीं बेहतर है, क्योंकि अरावली की जल-विभाजक रेखा ही वास्तव में तय करती है कि किसी नदी का पानी अंततः कहाँ जाकर मिलता है। अरावली के पश्चिम में, थार मरुस्थल की पट्टी में, अपवाह छोटा, मौसमी व मुख्यतः आंतरिक (अंतःस्थलीय) है: धाराएँ या तो रेत में समा जाती हैं, उथली खारी झीलों को भरती हैं, या राज्य की मुख्य पश्चिमी नदी — लूनी — के मामले में, कभी खुले समुद्र तक पहुँचे बिना ही राज्य से बाहर निकल जाती हैं। लूनी अरावली में पुष्कर-अजमेर क्षेत्र के आसपास से निकलती है, बाड़मेर व जालौर होते हुए दक्षिण-पश्चिम दिशा में बहती है, और अंततः कच्छ के रण के दलदली खारे मैदानों में विलीन हो जाती है; अपने निचले प्रवाह में यह काफी खारी हो जाती है, इसीलिए इसे लोकप्रिय रूप से "नमकीन नदी" कहा जाता है। मरुस्थली पट्टी के उत्तर में, मौसमी नदी घग्घर भी इसी तरह राजस्थान-हरियाणा-पंजाब क्षेत्र के आसपास रेत में विलीन हो जाती है, और इसे प्रायः पौराणिक सरस्वती नदी के सूख चुके प्राचीन मार्ग से जोड़ा जाता है। इसके विपरीत, अरावली के पूर्व में अपवाह मानसून-पोषित तो होता ही है, साथ ही यह कहीं अधिक व्यवस्थित रूप से बड़े तंत्र से जुड़ा होता है: पूर्वी मैदान की बनास व बाणगंगा प्रणालियाँ, तथा हाड़ौती में चम्बल व इसकी कालीसिंध-पार्वन-आहू सहायक नदियाँ, सभी अपना पानी उत्तर-पूर्व दिशा में यमुना की ओर और उसके माध्यम से गंगा की ओर ले जाती हैं — जिससे राजस्थान का यह पूर्वी आधा भाग पूरी तरह बंगाल की खाड़ी अपवाह-तंत्र के अंतर्गत आता है। संक्षेप में कहें तो: अरावली के पश्चिम में नदियाँ मरुस्थल या खारे दलदल में समाप्त हो जाती हैं; अरावली के पूर्व में नदियाँ बढ़कर गंगा को पोषित करने वाले बड़े तंत्र का हिस्सा बन जाती हैं।

महत्वपूर्ण तथ्य

  • अरावली पर्वतमाला राजस्थान का मुख्य अपवाह-विभाजक है, जो पश्चिम के आंतरिक (अंतःस्थलीय) अपवाह को पूर्व के बंगाल की खाड़ी अपवाह से अलग करती है।
  • सिरोही जिले में माउंट आबू पर स्थित गुरु शिखर (1,722 मीटर) राजस्थान व अरावली पर्वतमाला दोनों का सर्वोच्च बिंदु है।
  • लूनी पश्चिमी राजस्थान की मुख्य नदी है; यह कभी खुले समुद्र तक नहीं पहुँचती बल्कि कच्छ के रण के दलदली भाग में समाप्त हो जाती है, इसीलिए इसे "नमकीन नदी" कहा जाता है।
  • थार मरुस्थल (मरुस्थली) राजस्थान के लगभग तीन-पंचमांश क्षेत्रफल को घेरता है, जिसके मूल जिले जैसलमेर, बाड़मेर व बीकानेर हैं।
  • हाड़ौती (कोटा-बूंदी-झालावाड़-बारां) मालवा पठार का भौतिक व भूगर्भिक विस्तार है, जो काली मिट्टी व अपेक्षाकृत अधिक वर्षा के लिए जाना जाता है।
  • चम्बल दक्षिण-पूर्वी राजस्थान की मुख्य नदी है, जो अपनी सहायक नदियों कालीसिंध, पार्वन व आहू के माध्यम से अंततः यमुना-गंगा तंत्र को पोषित करती है।
  • बनास व बाणगंगा प्रणालियों से बना पूर्वी मैदान अपने कृषि-स्वभाव में भारत के गंगा-मैदान से जुड़ा माना जाता है, यद्यपि प्रशासनिक रूप से यह उसका भाग नहीं है।
  • राजस्थान की सबसे बड़ी खारे पानी की झील सांभर, मरुस्थल-अरावली सीमा क्षेत्र के एक गर्त में स्थित है और स्वयं इस क्षेत्र के आंतरिक अपवाह का परिणाम है।

परीक्षा टिप्स

  • यदि प्रश्न में किसी नदी के "समुद्र तक न पहुँचने" या "आंतरिक/अंतःस्थलीय अपवाह" का उल्लेख हो, तो उत्तर लगभग हमेशा पश्चिमी राजस्थान की ओर इशारा करता है — लूनी या घग्घर के बारे में सोचें।
  • यदि प्रश्न में राजस्थान की काली (रेगुर) मिट्टी का उल्लेख हो, तो उत्तर हाड़ौती/दक्षिणी-पूर्वी पठार है, न कि जलोढ़ पूर्वी मैदान — यह मिट्टी-भेद परीक्षकों का पसंदीदा भ्रामक बिंदु है।
  • अरावली की दिशा उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम याद रखें, और इसे केवल एक पर्वत श्रृंखला के रूप में नहीं बल्कि जल-विभाजक की अपनी कार्यात्मक भूमिका से भी जोड़कर याद रखें।
  • "मालवा पठार का विस्तार" — यह वाक्यांश MCQ में लगभग विशेष रूप से हाड़ौती/दक्षिणी-पूर्वी पठार की पहचान कराता है।
  • चारों प्रदेशों में वर्षा का क्रम याद रखें: थार मरुस्थल (सबसे कम) < पूर्वी मैदान (मध्यम) < हाड़ौती पठार (अपेक्षाकृत अधिक, मालवा पठारी क्षेत्र से निकटता के कारण)।
  • गुरु शिखर की ऊँचाई (1,722 मीटर) व स्थान (माउंट आबू, सिरोही) अक्सर सीधे पूछे जाते हैं — दोनों तथ्यों को साथ याद रखें।
🧠 स्मरण ट्रिक — पश्चिम से पूर्व: थार-अरावली-पूर्वी मैदान-हाड़ौती

राजस्थान को पश्चिम से पूर्व की ओर चलते हुए याद करें — "थार-अरावली-पूर्वी मैदान-हाड़ौती": थार मरुस्थल (टीले, आंतरिक अपवाह) → अरावली (जल-विभाजक, गुरु शिखर) → पूर्वी मैदान (जलोढ़ मिट्टी, बनास-बाणगंगा यमुना की ओर) → हाड़ौती पठार (काली मिट्टी, चम्बल-कालीसिंध-पार्वन यमुना की ओर)। अपवाह याद रखने के लिए साथ में यह पंक्ति भी रखें: "अरावली के पश्चिम में नदियाँ रेत या दलदल में मरती हैं; अरावली के पूर्व में नदियाँ बढ़कर गंगा को पोषित करती हैं।"

⚠️ कन्फ्यूज़न बस्टर — पूर्वी मैदान बनाम हाड़ौती (दक्षिणी-पूर्वी पठार)

दोनों प्रदेश उपजाऊ हैं और दोनों अरावली के पूर्व में स्थित हैं, इसलिए छात्र प्रायः इन्हें एक जैसा मान बैठते हैं — लेकिन इनमें स्पष्ट अंतर है। मिट्टी: पूर्वी मैदान में बनास-बाणगंगा प्रणाली द्वारा जमा जलोढ़ मिट्टी है, जबकि हाड़ौती में मालवा पठार से जुड़ी बेसाल्ट-जनित काली (रेगुर) मिट्टी है। उच्चावच: पूर्वी मैदान वास्तव में समतल से हल्का लहरदार मैदान है, जबकि हाड़ौती एक कटा-छँटा पठार है, जिसमें चम्बल के किनारे कंदराएँ व बीहड़ मिलते हैं। वर्षा: हाड़ौती को पूर्वी मैदान (लगभग 55-80 सेमी) की तुलना में सामान्यतः अधिक व अधिक भरोसेमंद वर्षा (झालावाड़ के कुछ भागों में लगभग 80-100 सेमी) मिलती है, क्योंकि यह ऊँचे मालवा-विन्ध्यन पठारी क्षेत्र के निकट है। नदियाँ: पूर्वी मैदान का निर्माण बनास व बाणगंगा से हुआ है, जबकि हाड़ौती में चम्बल की मुख्यधारा व इसकी सहायक नदियाँ कालीसिंध, पार्वन व आहू प्रमुख हैं। यदि प्रश्न में "काली मिट्टी" या "मालवा पठार का विस्तार" दिया गया हो, तो उत्तर हाड़ौती है, पूर्वी मैदान नहीं।

राजस्थान के चार भौतिक प्रदेशों तथा उनके सामान्यीकृत अपवाह की पश्चिम-से-पूर्व रेखाचित्र (पैमाने पर नहीं, भौगोलिक रूप से सटीक नहीं)राजस्थान: प्रदेश व अपवाह, पश्चिम से पूर्व (रेखाचित्र)पश्चिमी रेतीला/थार मरुस्थल प्रदेश — रेत के टीले, शुष्क जलवायु, जिले जैसलमेर-बाड़मेर-बीकानेर; आंतरिक (अंतःस्थलीय) अपवाह, लूनी कच्छ के रण के दलदल में समाप्तलूनी व अन्य पश्चिमी धाराएँ खुले समुद्र तक पहुँचने के बजाय भीतर की ओर/दक्षिण-पश्चिम में कच्छ के रण के खारे दलदल की ओर बहती हैंअरावली पर्वतीय प्रदेश — उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम दिशा में फैली श्रृंखला व राजस्थान का मुख्य अपवाह-विभाजक; माउंट आबू पर गुरु शिखर (1,722 मीटर) सर्वोच्च बिंदुपूर्वी मैदान — बनास व बाणगंगा प्रणालियों से बना उपजाऊ जलोढ़ मैदान, जो उत्तर-पूर्व दिशा में चम्बल-यमुना-गंगा तंत्र की ओर बहता हैबनास-बाणगंगा नदी-तंत्र की चम्बल-यमुना तंत्र की ओर सामान्य उत्तर-पूर्व प्रवाह दिशादक्षिणी-पूर्वी पठार (हाड़ौती) — मालवा पठार का विस्तार; काली मिट्टी, अपेक्षाकृत अधिक वर्षा; चम्बल, कालीसिंध, पार्वन व आहू नदियाँचम्बल व इसकी सहायक नदियाँ हाड़ौती पठार से उत्तर-पूर्व दिशा में यमुना-गंगा तंत्र की ओर बहती हैंभूमि संदर्भ रेखाथार मरुस्थलअरावलीपूर्वी मैदानहाड़ौती
📝 अभ्यास प्रश्न
प्रश्न 1. वह कौन-सी भौतिक विशेषता राजस्थान के मुख्य अपवाह-विभाजक का काम करती है, जो पश्चिमी आंतरिक अपवाह वाली नदियों को पूर्वी बंगाल-की-खाड़ी की ओर बहने वाली नदियों से अलग करती है?

✅ अरावली पर्वतमाला। यह पश्चिमी मरुस्थल के अंतःस्थलीय (आंतरिक) अपवाह को राज्य के पूर्वी आधे हिस्से के चम्बल-यमुना-गंगा तंत्र की ओर जाने वाले अपवाह से अलग करती है।

प्रश्न 2. पश्चिमी राजस्थान की मुख्य नदी लूनी अंततः कहाँ जाकर समाप्त होती है?

✅ यह कच्छ के रण के दलदली खारे मैदानों में विलीन हो जाती है, बिना कभी खुले समुद्र तक पहुँचे — यही आंतरिक समापन इसके निचले खारे प्रवाह में इसे "नमकीन नदी" कहलाने का कारण बनता है।

प्रश्न 3. हाड़ौती क्षेत्र (कोटा, बूंदी, झालावाड़, बारां) को भौतिक दृष्टि से किस पठार का विस्तार बताया जाता है, और कौन-सी मिट्टी इसे पूर्वी मैदान से अलग करती है?

✅ इसे मालवा पठार का विस्तार बताया जाता है, और यह बेसाल्ट-जनित काली (रेगुर) मिट्टी के लिए जाना जाता है, जबकि पूर्वी मैदान में जलोढ़ मिट्टी मिलती है।

प्रश्न 4. हाड़ौती पठार को अपवाहित करने वाली चम्बल की तीन मुख्य सहायक नदियों के नाम बताएं।

✅ कालीसिंध, पार्वन व आहू — ये सभी हाड़ौती में सामान्यतः उत्तर-पूर्व दिशा में बहकर चम्बल में मिलती हैं।

प्रश्न 5. राजस्थान का सर्वोच्च बिंदु कौन-सा है, उसकी ऊँचाई कितनी है, और यह किस जिले व पर्वतीय प्रदेश में स्थित है?

✅ गुरु शिखर, ऊँचाई 1,722 मीटर, सिरोही जिले में माउंट आबू पर, अरावली पर्वतीय प्रदेश के अंतर्गत स्थित है।

सारांश

राजस्थान का भौतिक भूगोल अरावली जल-विभाजक के इर्द-गिर्द बनी चार पश्चिम-से-पूर्व पट्टियों में समाहित है: पश्चिम में शुष्क, टीलों से भरा थार मरुस्थल — जिसका अपवाह आंतरिक है और जिसकी लूनी नदी खारे दलदल में समाप्त होती है; प्राचीन, जल-विभाजक बनाती अरावली श्रृंखला जो गुरु शिखर पर अपनी चरम ऊँचाई पाती है; बनास व बाणगंगा से बना उपजाऊ जलोढ़ पूर्वी मैदान, जो संरचनात्मक रूप से गंगा तंत्र से जुड़ा है; और दक्षिण-पूर्व में काली मिट्टी वाला, अपेक्षाकृत वर्षा-समृद्ध हाड़ौती पठार, जो मालवा पठार का विस्तार है और चम्बल तथा इसकी सहायक नदियों कालीसिंध, पार्वन व आहू से अपवाहित होता है। राज्य की नदियों को इन चारों प्रदेशों से जोड़कर याद करना — न कि एक अलग-थलग सूची के रूप में — RAS Prelims के लिए उच्चावच व अपवाह दोनों को याद रखने का सबसे भरोसेमंद तरीका है।

त्वरित रिवीजन — One-Liners

  • थार मरुस्थल विश्व का 9वाँ सबसे बड़ा मरुस्थल है; यह राजस्थान के पश्चिमी भाग में है।
  • चंबल नदी राजस्थान की एकमात्र बारहमासी नदी है; यह यमुना में मिलती है।
  • भारत में दक्षिण-पश्चिम मानसून जून में केरल पहुंचता है; यह अरब सागर और बंगाल की खाड़ी दोनों से आता है।
  • कर्क रेखा (23.5°N) राजस्थान के बांसवाड़ा जिले से गुजरती है।
  • मकराना (नागौर) का सफेद संगमरमर ताजमहल में प्रयुक्त।
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