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राजस्थान के वन — प्रकार, वनावरण एवं वितरण

Forests of Rajasthan — Types, Cover & Distribution

13 मिनटintermediate✓ अपडेटेड: जुलाई 2026· Geography of World and India

राजस्थान के वनों का महत्त्व

क्षेत्रफल की दृष्टि से राजस्थान भारत का सबसे बड़ा राज्य है, फिर भी यह वन आवरण की दृष्टि से सबसे कम सम्पन्न राज्यों में गिना जाता है, क्योंकि इसका लगभग दो-तिहाई भाग शुष्क व अर्द्धशुष्क थार क्षेत्र में आता है। यही कारण है कि जो भी वन आवरण राज्य में शेष बचा है, वह पारिस्थितिक दृष्टि से अत्यंत मूल्यवान है। वन मिट्टी को बांधे रखते हैं, भूजल स्तर को रिचार्ज करते हैं, रेगिस्तान के अत्यधिक तापमान को संतुलित करते हैं तथा लकड़ी, ईंधन, चारा एवं अनेक गौण वनोपजों की आपूर्ति करते हैं, जिन पर ग्रामीण व आदिवासी परिवारों की आजीविका निर्भर करती है। परीक्षा की दृष्टि से यह अध्याय अत्यंत महत्त्वपूर्ण है क्योंकि इसमें वनावरण प्रतिशत, जिलेवार क्रम, वन प्रकारों का वर्गीकरण तथा वनीकरण अभियानों के नाम जैसे सटीक व संख्यात्मक तथ्य बार-बार पूछे जाते हैं, जिन्हें व्यवस्थित रूप से याद करना आसान है।

राजस्थान में वनावरण कितना है?

राजस्थान के वन आंकड़ों के लिए सामान्यतः दो स्रोतों का उल्लेख किया जाता है, और परीक्षाओं में दोनों को मिलाकर प्रश्न पूछे जाते हैं, अतः दोनों को सावधानी से याद रखना चाहिए।

  • भारतीय वन स्थिति रिपोर्ट (ISFR) 2023: राजस्थान का अभिलिखित वन क्षेत्र 32,869 वर्ग किमी है, जो राज्य के 3,42,239 वर्ग किमी भौगोलिक क्षेत्र का 9.60% है। वास्तविक वनावरण (सघनता आधारित) मात्र 16,548.21 वर्ग किमी अर्थात् 4.84% है — जो 2021 के आकलन की तुलना में 106.75 वर्ग किमी की कमी दर्शाता है। इसके विपरीत, अभिलिखित वन क्षेत्र के बाहर का वृक्षाच्छादन तीव्रता से बढ़कर 10,841.12 वर्ग किमी (3.17%) हो गया है, जो 2021 की तुलना में 2,108.12 वर्ग किमी अधिक है। वनावरण व वृक्षाच्छादन को जोड़ने पर कुल हरित आवरण 27,389.33 वर्ग किमी अर्थात् राज्य के क्षेत्रफल का 8.00% होता है, जो 2021 की तुलना में 2,001.37 वर्ग किमी अधिक है। प्रति व्यक्ति औसत वनावरण व वृक्षावरण मात्र 0.037 हैक्टेयर है — यह दर्शाता है कि इस मरुस्थलीय राज्य में हरियाली कितनी विरल है।
  • आर्थिक समीक्षा 2025-26: इस अधिक हाल की सरकारी रिपोर्ट के अनुसार राज्य का वन क्षेत्र 33,020 वर्ग किमी (भौगोलिक क्षेत्र का 9.65%) है, जबकि वनावरण 4.84% व वृक्षाच्छादन 3.17% है — यह ISFR के आंकड़ों से मिलता-जुलता है, केवल अभिलिखित क्षेत्र थोड़ा अधिक दर्शाया गया है।

अभिलिखित वन क्षेत्र की दृष्टि से राजस्थान का देश में लगभग 10वां स्थान है — यह एक सामान्य स्थिति है, जिसे राज्य के मरुस्थलीय भूगोल से जोड़कर याद रखना आसान है, न कि इसे एक अलग-थलग संख्या के रूप में।

वन भूमि का विधिक वर्गीकरण

राजस्थान वन अधिनियम, 1953 राज्य की विधिक रूप से अधिसूचित वन भूमि को तीन श्रेणियों में विभाजित करता है, और यह वर्गीकरण इस अध्याय में सबसे अधिक पूछे जाने वाले विषयों में से एक है।

श्रेणीमुख्य विशेषतावन क्षेत्र में हिस्सा (2025)सर्वाधिक क्षेत्र वाला जिला
आरक्षित वन (Reserved Forest)पूर्ण सरकारी नियंत्रण; लकड़ी काटने व पशु चराई पर पूर्ण प्रतिबंध12,198.71 वर्ग किमी (36.94%)उदयपुर
रक्षित वन (Protected Forest)वन विभाग की अनुमति से सीमित मात्रा में सूखी लकड़ी की कटाई व पशु चारण की सुविधा18,671.49 वर्ग किमी (56.55%) — सर्वाधिक हिस्साबारां
अवर्गीकृत वन (Unclassed Forest)निम्न श्रेणी के छितरे वन; पशु चराई व लकड़ी काटने पर कोई प्रतिबंध नहीं2,150.12 वर्ग किमी (6.51%) — न्यूनतम हिस्साबीकानेर

स्वतंत्रता के समय (1949-50) कुल विधिक रूप से वर्गीकृत वन क्षेत्र 44,133 वर्ग किमी था, जिसमें अकेले रक्षित वन 28,589 वर्ग किमी था। 31 मार्च 2025 तक यह कुल घटकर 33,020.32 वर्ग किमी रह गया है, जो दर्शाता है कि सात दशकों में कितना वन भूमि कृषि, खनन व बस्तियों के लिए परिवर्तित या विअधिसूचित हुई है। उदयपुर राज्य का ऐसा जिला बना हुआ है जिसमें किसी भी प्रकार की कुल विधिक वन भूमि सर्वाधिक है।

राजस्थान के वनों के पारिस्थितिक प्रकार

विधिक वर्गीकरण के अलावा, वनविज्ञानी राजस्थान की वनस्पति को जलवायु व वर्षा के आधार पर अलग-अलग पारिस्थितिक प्रकारों में बांटते हैं।

1. उष्णकटिबंधीय कंटीले वन (Tropical Thorn Forest)

यह पश्चिमी शुष्क क्षेत्र में पाए जाते हैं जहां औसत वार्षिक वर्षा 50 सेमी से कम होती है — जैसलमेर, बाड़मेर, बालोतरा, बीकानेर, जोधपुर, नागौर, डीडवाना-कुचामन, चूरू, सीकर, फलौदी, झुंझुनूं, जालौर, श्रीगंगानगर व हनुमानगढ़। यह कांटेदार झाड़ियों का क्षेत्र है: खेजड़ी, बबूल, केर और थूहर की प्रधानता है, साथ ही सेवन, धामण, अंजन व करड़ जैसी सुदृढ़ चारा घासें भी पाई जाती हैं। यहां के पौधों की मोटी छाल, छोटी मांसल पत्तियां व लंबी जड़ें जलक्षय कम करने हेतु मरुद्भिद (xerophyte) अनुकूलन का उदाहरण हैं। यह वन प्रकार राज्य के कुल वन क्षेत्र का मात्र लगभग 6.26% है।

2. उष्णकटिबंधीय शुष्क एवं मिश्रित पर्णपाती वन ("मानसूनी वन")

यह राजस्थान का सर्वाधिक प्रभावी वन प्रकार है, जो राज्य के कुल वन क्षेत्र के 90% से अधिक भाग को कवर करता है। यह दक्षिणी व दक्षिण-पूर्वी अरावली की मध्यम ऊंचाई की ढलानों पर विकसित होता है जहां वर्षा औसतन 50-100 सेमी होती है, और उदयपुर, सलूंबर, बांसवाड़ा, सिरोही, राजसमंद, चित्तौड़गढ़, भीलवाड़ा, सवाई माधोपुर, कोटा, बारां, झालावाड़, डूंगरपुर व बूंदी में सबसे अधिक विस्तृत है। इन वृक्षों की पत्तियां वर्ष में एक बार, प्रायः मार्च-अप्रैल में झड़ती हैं; इनमें आम, खैर, ढाक, धोकड़ा, गूलर, बरगद, तेंदू, सेमल, साल व बांस शामिल हैं। इस व्यापक श्रेणी में कई महत्वपूर्ण उप-प्रकार आते हैं:

  • शुष्क सागवान वन (Dry Teak Forest) — 250-450 मीटर ऊंचाई पर 75-100 सेमी वर्षा वाले क्षेत्रों में पाया जाता है, बांसवाड़ा में सर्वाधिक सघन है, तथा प्रतापगढ़, डूंगरपुर, दक्षिणी उदयपुर, सलूंबर, माउंट आबू के कुछ भाग एवं बारां, कोटा व झालावाड़ में मिश्रित रूप में मिलता है। यह कुल वन क्षेत्र का लगभग 6.86% है।
  • सालर (साल) वन — 450 मीटर से ऊंचाई पर उदयपुर, सलूंबर, राजसमंद, चित्तौड़गढ़, सिरोही, अजमेर, ब्यावर, अलवर, कोटपूतली-बहरोड़, जयपुर व सीकर में पाया जाता है। साल वृक्ष गोंद का उत्तम स्रोत है और भगवान विष्णु के लिए पवित्र माना जाता है; यह छत्तीसगढ़ व झारखंड का राज्य वृक्ष भी है।
  • धोकड़ा वन — राजस्थान का सबसे व्यापक वन प्रकार, जो राज्य के कुल वन क्षेत्र का लगभग 58.11% (19,027 वर्ग किमी से अधिक) कवर करता है। यह अरावली के अर्द्धशुष्क पश्चिमी भाग — सीकर, झुंझुनूं, जालौर, जोधपुर का पूर्वी भाग, टोंक, सवाई माधोपुर व जयपुर — में पाया जाता है, जहां वर्षा औसतन 30-60 सेमी तथा ऊंचाई 245-760 मीटर होती है। मुख्य वृक्षों में धोकड़ा, बबूल, खेजड़ी, रोहिड़ा, बेर व केर शामिल हैं।
  • बांस वन — बांसवाड़ा, चित्तौड़गढ़, उदयपुर, सलूंबर, सिरोही, कोटा व बारां में फैला हुआ है।
  • पलाश (ढाक) वन — मुख्यतः राजसमंद में केंद्रित; इसके चमकीले लाल-नारंगी पुष्पों के कारण इसे "जंगल की ज्वाला" कहा जाता है।
  • खैर वन — कोटा, बारां, झालावाड़, चित्तौड़गढ़, उदयपुर व सवाई माधोपुर के पठारी भाग में फैला है; कथौड़ी जनजाति खैर की छाल व लकड़ी उबालकर कत्था निकालती है।
  • मिश्रित पर्णपाती वन — सिरोही, उदयपुर, राजसमंद, चित्तौड़गढ़, कोटा व बारां की पहाड़ियों में व्यापक है, जिसमें आंवला, शीशम, सालर, तेंदू व जामुन जैसे वृक्ष शामिल हैं।

3. उपोष्णकटिबंधीय पर्वतीय वन (Sub Tropical Mountain Forest)

यह सिरोही जिले के माउंट आबू क्षेत्र की ऊंची ऊंचाई तक ही सीमित है, जहां वार्षिक वर्षा 150 सेमी से अधिक होती है। ये वन सघन व सदाबहार होते हैं तथा वनस्पति विविधता की दृष्टि से राज्य का सर्वाधिक समृद्ध क्षेत्र माने जाते हैं, जिसमें सिरिस, बांस, बेल, जामुन व रोहिड़ा प्रमुख हैं। इतनी समृद्धि के बावजूद यह प्रकार राज्य के वन क्षेत्र का मुश्किल से 0.39% ही है।

राजस्थान वन नीति 2023 वनस्पति का एक अन्य व्यापक वर्गीकरण भी प्रस्तुत करती है: उत्तरी शुष्क पर्णपाती वन (40.07%), एनोगीसस पेंडुला/धोकड़ा वन (15.21%), शुष्क पर्णपाती झाड़ी (10.96%), मरुस्थलीय टिब्बा झाड़ी (6.62%) व मरुस्थलीय कंटीला वन (6.17%) — यह ऊपर दिए गए उप-प्रकारों की सूची से अलग एक उपयोगी वैकल्पिक वर्गीकरण है, जिसे अलग से याद रखना चाहिए।

जिलेवार वितरण: वन कहां केंद्रित हैं?

राजस्थान का वनावरण दक्षिण व दक्षिण-पूर्व की ओर अत्यधिक झुका हुआ है। राज्य के कुल वन क्षेत्र का लगभग 50% मात्र आठ जिलों — उदयपुर, प्रतापगढ़, चित्तौड़गढ़, बारां, अलवर, करौली, सिरोही व बूंदी — में केंद्रित है, जबकि पश्चिमी व उत्तर-पश्चिमी मरुस्थलीय जिलों में वृक्षावरण लगभग नगण्य है।

मापदंडसर्वाधिकन्यूनतम
कुल वनावरण (ISFR 2023)उदयपुरचूरू
अतिसघन वन (VDF)अलवर
सामान्य सघन वन (MDF)उदयपुरचूरू
खुले वन (OF)उदयपुरचूरू
झाड़ियां (Scrub)पालीहनुमानगढ़
आरक्षित वन क्षेत्रउदयपुर
रक्षित वन क्षेत्रबारां
अवर्गीकृत वन क्षेत्रबीकानेर

ध्यान दें कि उदयपुर लगभग हर श्रेणी में शीर्ष पर है — अभिलिखित वन क्षेत्र, कुल वनावरण, सामान्य सघन वन व खुले वन — जिससे यह स्पष्ट रूप से राजस्थान का सर्वाधिक वनाच्छादित जिला बन जाता है। शुष्क क्षेत्र में गहराई से स्थित चूरू आवरण संबंधी अधिकांश मापदंडों में सूची के अंत में आता है, जबकि अलवर की सरिस्का पट्टी उसे राज्य का सबसे बड़ा अतिसघन वन क्षेत्र दिलाती है।

राजस्थान की प्रमुख वनोपज

राजस्थान की वनोपज में इमारती लकड़ी व गोंद से लेकर चारा घासों व औषधीय जड़ी-बूटियों तक बहुत विविधता है, और कई वस्तुएं आर्थिक व सांस्कृतिक दृष्टि से वास्तव में महत्वपूर्ण हैं:

  • तेंदू पत्ता (टिमरू): बीड़ी बनाने में उपयोग होने वाला तेंदू व्यापार मूल्य की दृष्टि से राजस्थान की गौण वनोपज में प्रथम स्थान रखता है। राज्य ने राजस्थान तेंदू पत्ता (व्यापार विनियमन) अधिनियम, 1974 के माध्यम से तेंदू व्यापार का राष्ट्रीयकरण किया, और इसकी वैज्ञानिक कटाई के लिए एक समर्पित तेंदू पत्ता योजना संचालित है। इसकी गहरी चमकदार पत्ती के कारण तेंदू को "वागड़ का चीकू" भी कहा जाता है।
  • खेजड़ी (राज्य वृक्ष): इसकी फली "सांगरी" एक प्रसिद्ध सूखी सब्जी है और प्रसिद्ध पंचकूटा व्यंजन (कुमट के बीज, केर, सांगरी, कचरी व गूंदा से बना) का मुख्य घटक है; इसकी पत्तियों को "लूंग" कहते हैं और चारे के रूप में उपयोग होता है। 31 अक्टूबर 1983 को राज्य वृक्ष घोषित खेजड़ी को थार का कल्पवृक्ष व "भारतीय मरुस्थल का स्वर्णिम वृक्ष" कहा जाता है।
  • गोंद: मुख्यतः पश्चिमी राजस्थान के बबूल वृक्षों से प्राप्त होता है; बाड़मेर जिले के चौहटन का गोंद विशेष रूप से प्रसिद्ध है।
  • साल/सालर गोंद व कत्था: सालर वृक्षों से व्यावसायिक रूप से उपयोगी गोंद प्राप्त होता है, जबकि कथौड़ी समुदाय खैर की छाल व लकड़ी उबालकर कत्था (पान में प्रयुक्त) निकालता है।
  • चंदन: राजसमंद के हल्दीघाटी (खमनोर) वन तथा सिरोही के देलवाड़ा क्षेत्र चंदन (संतालम एल्बम) वृक्षों की बहुलता के कारण चंदन वन क्षेत्र के रूप में जाने जाते हैं।
  • महुआ: आदिवासियों का कल्पवृक्ष कहलाने वाले इस वृक्ष के फूल/फलों से तेल तथा पारंपरिक मदिरा "मोकड़" बनाई जाती है; यह मुख्यतः उदयपुर, सलूंबर, डूंगरपुर व सिरोही में पाया जाता है।
  • बांस: आदिवासियों का "हरा सोना" कहलाने वाला बांस माउंट आबू तथा बांसवाड़ा, उदयपुर, सलूंबर व कोटा में पाया जाता है। राजस्थान वन (संशोधन) अधिनियम, 2018 ने बांस को कानूनी रूप से "वृक्ष" की श्रेणी से हटाकर "घास" की श्रेणी में रखा, ताकि सामान्य किसान भी इसे अपनी भूमि पर उगा सकें।
  • सुगंधित व चारा घासें: खस व पामारोसा (इत्र व शरबत में प्रयुक्त) टोंक, सवाई माधोपुर, डीग व भरतपुर में उगते हैं; मोतिया व बूर (नींबू घास जैसी) बीकानेर व फलौदी के ओसियां-लोहावट क्षेत्र में पाई जाती हैं; जैसलमेर की सेवण घास राज्य पक्षी गोडावण के प्रजनन स्थल के रूप में प्रसिद्ध है; धामण, अंजन व करड़ शुष्क क्षेत्र की मूल्यवान चारा घासें हैं।
  • गुग्गल: एक राल-उत्पादक औषधीय पौधा, जिसके संवर्धन हेतु जैसलमेर व बाड़मेर में समर्पित औषधीय पादप विकास क्षेत्र (MPDA) बनाए गए हैं।

वन नीति, कानून एवं प्रशासन

राजस्थान का वन प्रशासन एक स्तरित विधिक व संस्थागत इतिहास पर आधारित है:

  • वन विभाग की स्थापना 1949-50 में हुई, जब वनावरण राज्य के भौगोलिक क्षेत्र का मात्र 13% था; विभाग का वर्तमान प्रमुख प्रधान मुख्य वन संरक्षक (हैड ऑफ फॉरेस्ट फोर्स) है, जो जयपुर में स्थित है, और विभागीय मुख्यालय "अरण्य भवन" झालाना, जयपुर में है।
  • राजस्थान वन अधिनियम, 1953 ने वन भूमि को विधिक रूप से आरक्षित, रक्षित व अवर्गीकृत श्रेणियों में बांटा (विस्तार ऊपर दिया गया है)।
  • संशोधित वन (संरक्षण एवं संवर्धन) अधिनियम, 1980 के प्रावधान 1 दिसंबर 2023 से प्रभावी हैं।
  • राजस्थान की प्रथम वन नीति 18 फरवरी 2010 को घोषित की गई, जिसमें संपूर्ण राज्य में 20% वनावरण का लक्ष्य रखा गया।
  • राजस्थान वन नीति 2023, जो 5 जून 2023 को अधिसूचित हुई, ने लक्ष्य को संशोधित कर 2040 तक 20% वनावरण निर्धारित किया, और राजस्थान देश का पहला राज्य बना जिसने संयुक्त वन एवं पर्यावरण नीति तैयार की।
  • प्रशासनिक दृष्टि से राज्य को 18 वन्यजीव वृत्त, 64 प्रादेशिक (क्षेत्रीय) प्रभागों व 463 रेंजों में बांटा गया है, जिसमें "बीट" वन प्रशासन की सबसे छोटी इकाई है।
  • प्रमुख अनुसंधान व विकास संस्थाओं में शामिल हैं: शुष्क वन अनुसंधान संस्थान (AFRI), जोधपुर (1985 में ICFRE के अंतर्गत स्थापित); केंद्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान (CAZRI), जिसकी स्थापना 1952 में हुई व 1959 में नामकरण हुआ, जो मरुस्थलीय वनीकरण, मृदा व जल संरक्षण पर कार्य करता है; वन प्रवर्धन वृत्त (Silviculture Forest Circle, 1956), जिसका प्रमुख राज्य वन प्रवर्धक होता है; राजस्थान राज्य वन विकास निगम (RSFDC, स्थापना 16 दिसंबर 2020), जो इमारती लकड़ी, बांस व गौण वनोपज के मूल्य-संवर्धन हेतु कार्य करता है; तथा राजस्थान CAMPA प्राधिकरण (गठन 14 सितंबर 2018), जो प्रतिकारी वनीकरण निधि के प्रबंधन हेतु कार्य करता है।

वनीकरण अभियान एवं अरावली को हरा-भरा बनाना

राजस्थान का हालिया वनीकरण अभियान असामान्य रूप से सुदृढ़ वित्त-पोषित है और राज्य की पारिस्थितिक रीढ़ अरावली पर्वतमाला के संरक्षण से गहराई से जुड़ा है।

  • मिशन हरियालो राजस्थान: 2023-24 के बजट में घोषित तथा जुलाई 2024 में औपचारिक रूप से शुरू किया गया यह महाअभियान पांच वर्षों में लगभग 4,000 करोड़ रुपए की लागत से 50 करोड़ पौधे लगाने का लक्ष्य रखता है, जो प्रधानमंत्री के "एक पेड़ माँ के नाम" अभियान से संरेखित है। 2024-25 में 7 करोड़ पौधों के लक्ष्य के मुकाबले 7.22 करोड़ पौधे लगाए गए; 2025-26 में 10 करोड़ के लक्ष्य को पार करते हुए लगभग 11.75 करोड़ (कुछ अभिलेखों में 11.73 करोड़) पौधे लगाए गए, और 2026 का लक्ष्य पुनः 10 करोड़ है। यह मिशन एक त्रि-स्तरीय टास्क फोर्स — राज्य स्तर (मुख्य सचिव की अध्यक्षता में), जिला स्तर (जिला कलेक्टर) व उपखंड स्तर (उपखंड अधिकारी) — के माध्यम से संचालित होता है, तथा इसके अंतर्गत प्रत्येक जिले में एक "मातृ वन", एक जिला-एक प्रजाति कार्यक्रम व 2,000 स्थानीय "वन मित्रों" की सहभागिता शामिल है।
  • अरावली ग्रीन वॉल परियोजना: 25 मार्च 2023 (अंतरराष्ट्रीय वानिकी दिवस) को हरियाणा के टीकली में शुरू की गई यह अंतर-राज्यीय पहल हरियाणा, राजस्थान, गुजरात व दिल्ली के 29 जिलों में अरावली पर्वतमाला के साथ लगभग 5 किमी बफर क्षेत्र को हरा-भरा करने का लक्ष्य रखती है, जहां पहाड़ियां लगभग 60 लाख हैक्टेयर में फैली हैं। इसके प्रथम चरण में 75 जल स्रोतों के पुनरुद्धार पर ध्यान केंद्रित है, जिसकी शुरुआत प्रति जिला पांच जलाशयों से हुई।
  • हरित अरावली विकास परियोजना (Harit Aravali Development Project): अरावली पर्वतमाला के संरक्षण व हरियाली हेतु राजस्थान में 250 करोड़ रुपए की एक समर्पित पहल।
  • हरित अरावली विकास परियोजना (Harit Aravalli Vikas Pariyojana): राज्य के प्रथम ग्रीन बजट (2025-26) में घोषित तथा 27 मार्च 2025 को 19 जिलों — अजमेर, अलवर, भरतपुर, बांसवाड़ा, भीलवाड़ा, चित्तौड़गढ़, दौसा, डूंगरपुर, जयपुर, झुंझुनूं, करौली, नागौर, प्रतापगढ़, पाली, राजसमंद, सिरोही, सीकर, सवाई माधोपुर व उदयपुर — में शुरू की गई, जिसमें वृक्षारोपण, चेक डैम व औषधीय पादप विकास के साथ-साथ कंटूर बंड, गेबियन संरचनाएं तथा परंपरागत बावड़ियों-झालरों के जीर्णोद्धार जैसे मृदा-नमी संरक्षण कार्य शामिल हैं।
  • CRESEP (राजस्थान जलवायु परिवर्तन प्रतिक्रिया एवं पारिस्थितिकी सेवा संवर्धन परियोजना): जापान की JICA द्वारा वित्त-पोषित 1,774.30 करोड़ रुपए की यह परियोजना (1,493.20 करोड़ ऋण घटक + 281.10 करोड़ राज्यांश) अक्टूबर 2024 से 2034-35 तक राज्य के 25 जिलों में क्रियान्वित हो रही है, जिसका लक्ष्य सतत पारिस्थितिकी प्रबंधन व जैव विविधता संरक्षण है।
  • राजस्थान वानिकी एवं जैव विविधता विकास परियोजना (RFBDP): फ्रांस की AFD के सहयोग से 1,693.91 करोड़ रुपए की यह परियोजना 2023-24 से 2030-31 तक राज्य के 13 जिलों (अलवर, बारां, भीलवाड़ा, भरतपुर, बूंदी, दौसा, धौलपुर, जयपुर, झालावाड़, करौली, कोटा, सवाई माधोपुर व टोंक) में क्रियान्वित है, जिसका लक्ष्य 55,000 हैक्टेयर वृक्षारोपण, 3,000 हैक्टेयर ओरण विकास व कृषि-वानिकी हेतु 55 लाख पौधे तैयार करना है।
  • वन-बाह्य वृक्ष नीति (ToFR Policy): वित्त विभाग द्वारा 21 अगस्त 2025 को स्वीकृत यह नीति अधिसूचित वन भूमि के बाहर संगठित वृक्षारोपण अभियानों के साथ कृषि-वानिकी को एकीकृत करती है।
  • धरातलीय प्रगति: 2025-26 में (दिसंबर 2025 तक) 1,49,404.03 हैक्टेयर क्षेत्र में वृक्षारोपण किया गया और 822 लाख पौधे जनता में वितरित किए गए — यह इस बात का प्रमाण है कि ये अभियान किस विशाल स्तर पर क्रियान्वित हो रहे हैं। हर जिला मुख्यालय पर "नमो नर्सरी" स्थापित करके तथा उदयपुर, सिरोही व बांसवाड़ा में "चंदन वन" की योजना बनाकर नर्सरी व हरित अवसंरचना का भी विस्तार किया जा रहा है।

स्मरण ट्रिक — मानसूनी वन (उष्णकटिबंधीय शुष्क एवं मिश्रित पर्णपाती वन) के 7 उप-प्रकार

साथ साला धोखा बांटे, पर खैर मिला

साथसागवान वन (शुष्क सागवान / Dry Teak)
सालासालर (साल) वन
धोखाधोकड़ा वन
बांटेबांस वन
परलाश (ढाक) वन
खैरखैर वन (स्वयं)
मिलामिश्रित पर्णपाती वन

ये सातों उप-प्रकार उष्णकटिबंधीय शुष्क एवं मिश्रित पर्णपाती वन (मानसूनी वन) श्रेणी के अंतर्गत आते हैं, जो राज्य के कुल वन क्षेत्र के 90% से अधिक भाग को कवर करती है।

कन्फ्यूज़न बस्टर — आरक्षित वन बनाम रक्षित वन

आरक्षित वन (Reserved Forest): पूर्ण सरकारी नियंत्रण; लकड़ी काटने व पशु चराई पर पूर्ण प्रतिबंध। क्षेत्रफल 12,198.71 वर्ग किमी (36.94%)। सर्वाधिक क्षेत्र उदयपुर में।

रक्षित वन (Protected Forest): वन विभाग की अनुमति से सूखी लकड़ी की सीमित कटाई व चराई की अनुमति। क्षेत्रफल 18,671.49 वर्ग किमी (56.55%) — वन क्षेत्र में सबसे बड़ा हिस्सा। सर्वाधिक क्षेत्र बारां में।

याद रखें: आरक्षित नाम सुनकर लगता है कि यह सबसे बड़ी श्रेणी होगी, पर वास्तव में सबसे अधिक क्षेत्रफल रक्षित वन का है (56.55%) — आरक्षित वन तो सबसे अधिक प्रतिबंधित (कड़ा नियंत्रण) श्रेणी है, सबसे बड़ी नहीं।

वन भूमि का विधिक वर्गीकरण — योजनाबद्ध चित्र, वास्तविक अनुपात में नहीं / Legal Classification of Forest Land — schematic, not to scale

राजस्थान वन भूमि का विधिक वर्गीकरण — योजनाबद्ध चित्र आरक्षित वन / Reserved Forest: 12,198.71 वर्ग किमी, 36.94% — पूर्ण प्रतिबंध, सर्वाधिक उदयपुर में / full ban, highest in Udaipur 36.94% आरक्षित / Reserved (उदयपुर / Udaipur) रक्षित वन / Protected Forest: 18,671.49 वर्ग किमी, 56.55% — सबसे बड़ा हिस्सा, सर्वाधिक बारां में / largest share, highest in Baran 56.55% रक्षित / Protected (बारां / Baran) अवर्गीकृत वन / Unclassed Forest: 2,150.12 वर्ग किमी, 6.51% — न्यूनतम हिस्सा, सर्वाधिक बीकानेर में / smallest share, highest in Bikaner 6.51% अवर्गीकृत / Unclassed (बीकानेर / Bikaner)

त्वरित तथ्य

  • ISFR 2023 के अनुसार राजस्थान का अभिलिखित वन क्षेत्र 32,869 वर्ग किमी (भौगोलिक क्षेत्र का 9.60%) है, जबकि वास्तविक वनावरण मात्र 16,548.21 वर्ग किमी (4.84%) है; उदयपुर का अभिलिखित वन क्षेत्र व कुल वनावरण सर्वाधिक है, जबकि चूरू न्यूनतम है।
  • राजस्थान वन अधिनियम, 1953 के अंतर्गत वन भूमि को आरक्षित वन (सर्वाधिक उदयपुर में), रक्षित वन (कुल मिलाकर सर्वाधिक हिस्सा, सर्वाधिक बारां में) व अवर्गीकृत वन (न्यूनतम हिस्सा, सर्वाधिक बीकानेर में) में विधिक रूप से वर्गीकृत किया गया है।
  • धोकड़ा (एनोगीसस पेंडुला) वन राजस्थान का सर्वाधिक व्यापक वन प्रकार है, जो राज्य के कुल वन क्षेत्र का लगभग 58.11% भाग, मुख्यतः अरावली के अर्द्धशुष्क पश्चिमी भाग में, कवर करता है।
  • राजस्थान वन नीति 2023 (अधिसूचित 5 जून 2023) ने 2040 तक 20% वनावरण का लक्ष्य रखा, जिससे राजस्थान संयुक्त वन एवं पर्यावरण नीति बनाने वाला देश का पहला राज्य बना; मिशन हरियालो राजस्थान का लक्ष्य पांच वर्षों में 50 करोड़ पौधे लगाना है।

त्वरित रिवीजन — One-Liners

  • थार मरुस्थल विश्व का 9वाँ सबसे बड़ा मरुस्थल है; यह राजस्थान के पश्चिमी भाग में है।
  • चंबल नदी राजस्थान की एकमात्र बारहमासी नदी है; यह यमुना में मिलती है।
  • भारत में दक्षिण-पश्चिम मानसून जून में केरल पहुंचता है; यह अरब सागर और बंगाल की खाड़ी दोनों से आता है।
  • कर्क रेखा (23.5°N) राजस्थान के बांसवाड़ा जिले से गुजरती है।
  • मकराना (नागौर) का सफेद संगमरमर ताजमहल में प्रयुक्त।
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राजस्थान में सर्वाधिक अभिलिखित वन क्षेत्र किस जिले में पाया जाता है?

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राजस्थान वन नीति 2023 के अनुसार राज्य में 20% वनावरण प्राप्त करने का लक्ष्य किस वर्ष तक निर्धारित है?

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निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. भारतीय वन स्थिति रिपोर्ट (ISFR) 2023 के अनुसार, राजस्थान का वास्तविक वनावरण 2021 के आकलन की तुलना में 106.75 वर्ग किमी घटा है। 2. अभिलिखित वन क्षेत्र के बाहर का वृक्षाच्छादन 2021 की तुलना में 2,108.12 वर्ग किमी बढ़ा है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

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निम्नलिखित को सुमेलित कीजिए: | सूची-I (श्रेणी) | सूची-II (सर्वाधिक क्षेत्र वाला जिला) | | (A) आरक्षित वन | (i) बारां | | (B) रक्षित वन | (ii) बीकानेर | | (C) अवर्गीकृत वन | (iii) उदयपुर | | (D) अतिसघन वन (VDF) | (iv) अलवर | नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

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राजस्थान के निम्नलिखित पारिस्थितिक वन प्रकारों को राज्य के कुल वन क्षेत्र में उनके हिस्से के अवरोही (घटते) क्रम में व्यवस्थित कीजिए: 1. उष्णकटिबंधीय कंटीले वन (Tropical Thorn Forest) 2. उष्णकटिबंधीय शुष्क एवं मिश्रित पर्णपाती वन (मानसूनी वन) 3. उपोष्णकटिबंधीय पर्वतीय वन (Sub-Tropical Mountain Forest) नीचे दिए गए कूट में से सही उत्तर चुनिए:

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