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राजस्थान के खनिज — खनन, प्रमुख खनिज एवं जिले

Minerals of Rajasthan — Mining, Major Minerals & Districts

12 मिनटintermediate✓ अपडेटेड: जुलाई 2026· Geography of World and India

अवलोकन: राजस्थान का खनिज वैभव

राजस्थान को अक्सर "भूवैज्ञानिकों का स्वर्ग" कहा जाता है, क्योंकि इसके लगभग 3.42 लाख वर्ग किमी क्षेत्रफल में चट्टानों और खनिजों की अद्भुत विविधता समाई हुई है। कुल खनिज उत्पादन के मूल्य की दृष्टि से राज्य झारखंड के बाद देश में दूसरे स्थान पर है, परंतु खनिजों की विविधता के मामले में राजस्थान देश में सबसे आगे है — यहाँ 82 विभिन्न प्रकार के खनिजों के भंडार चिह्नित किए जा चुके हैं, जिनमें से 57 का व्यावसायिक खनन वर्तमान में किया जा रहा है। यही कारण है कि देश के कुल खनिज उत्पादन मूल्य में राज्य का योगदान 23% से अधिक है (ओडिशा के बाद दूसरा स्थान), और यही वजह है कि RAS, पटवारी, REET जैसी राजस्थान-केंद्रित परीक्षाओं की तैयारी करने वाले अभ्यर्थी इस अध्याय को भूगोल के सबसे महत्वपूर्ण विषयों में गिनते हैं।

राजस्थान की सबसे खास बात यह है कि यहाँ कई खनिजों के मामले में राज्य को देश का एकमात्र स्रोत होने का गौरव प्राप्त है। वर्तमान में छह खनिजों — केल्साइट, चाँदी, जिप्सम, जस्ता अयस्क, वोलास्टोनाइट और सेलेनाइट — के उत्पादन में राज्य का पूर्ण एकाधिकार है, अर्थात इन खनिजों का लगभग शत-प्रतिशत व्यावसायिक उत्पादन अकेले राजस्थान से होता है। इसके अतिरिक्त राज्य चूना पत्थर, सीसा-जस्ता अयस्क, गार्नेट, बैराइट्स, सिलिका सैंड, ग्रेनाइट, मार्बल तथा ताँबे के उत्पादन में भी देश में अग्रणी है। वर्ष 2024-25 में राजस्थान ने देश के किसी भी राज्य की तुलना में सबसे अधिक 34 प्रमुख खनिज ब्लॉकों की ई-नीलामी की, जो खोज और खनन के क्षेत्र में राज्य की तेज़ प्रगति को दर्शाता है।

धात्विक खनिज

धात्विक खनिजों को सामान्यतः दो वर्गों में बाँटा जाता है — लौह खनिज (जैसे लौह अयस्क, मैंगनीज़, टंगस्टन) और अलौह खनिज (ताँबा, सीसा, जस्ता, चाँदी, सोना, बॉक्साइट)। राजस्थान दोनों वर्गों में महत्वपूर्ण स्थान रखता है, परंतु अलौह धातुओं में इसकी बादशाहत विशेष रूप से उल्लेखनीय है।

ताँबा (कॉपर)

ताँबा आग्नेय, अवसादी और कायांतरित चट्टानों में पाया जाता है और इसका रंग विशिष्ट लाल-भूरा होता है। झुंझुनूं को राजस्थान का "कॉपर डिस्ट्रिक्ट" कहा जाता है क्योंकि आसपास के खनन क्षेत्रों से कच्चा ताँबा अयस्क प्रसंस्करण के लिए यहीं लाया जाता है, जबकि सीकर स्थित प्राचीन गणेश्वर सभ्यता को भारत की ताम्रयुगीन सभ्यता की जननी माना जाता है। उदयपुर का आहड़ स्थल भी प्राचीन "ताम्र नगरी" के रूप में जाना जाता है। 1 अप्रैल 2020 तक के आँकड़ों के अनुसार ताँबे के भंडार में राजस्थान देश में प्रथम स्थान पर था (मध्यप्रदेश व झारखंड बाद में), जबकि वर्ष 2023-24 के वास्तविक उत्पादन में यह मध्यप्रदेश के बाद दूसरे स्थान पर तथा झारखंड तीसरे स्थान पर रहा। वर्ष 1974 में स्थापित खेतड़ी ताम्र गलानशाला (कॉपर स्मेल्टर) आज भी राज्य का प्रमुख ताँबा प्रसंस्करण संयंत्र है। अन्य उत्पादक क्षेत्रों में झुंझुनूं का खेतड़ी-सिंघाना व कोलिहान, अलवर का खो-दरीबा व थानागाजी तथा उदयपुर के निकट अंजनी शामिल हैं।

जस्ता और सीसा (जिंक-लेड)

प्रकृति में जस्ता और सीसा प्रायः साथ-साथ पाए जाते हैं, अक्सर चाँदी के अंश के साथ, और इन दोनों धातुओं की राजधानी निर्विवाद रूप से राजस्थान है — देश के कुल सीसा-जस्ता भंडार का लगभग 89.32% भाग अकेले राजस्थान में है, जिससे राज्य को इनके उत्पादन में लगभग एकाधिकार प्राप्त है (आंध्रप्रदेश बहुत पीछे दूसरे स्थान पर है)। जस्ता का सबसे बड़ा उपभोक्ता गैल्वनाइजिंग उद्योग है, जबकि सीसे का सबसे बड़ा उपभोक्ता बैटरी उद्योग है। राज्य के भीतर सीसा सांद्र मुख्यतः राजसमंद में तथा जस्ता सांद्र मुख्यतः भीलवाड़ा में उत्पादित होता है। उदयपुर के निकट स्थित जावर खान समूह (मोचिया, बलारिया, जावरमाला व बरोई) भारत का सबसे पुराना और प्रसिद्ध भूमिगत सीसा-जस्ता खनन परिसर है, जबकि भीलवाड़ा की रामपुरा-आगूचा खान विश्व की दूसरी सबसे बड़ी सीसा-जस्ता खान मानी जाती है और राजसमंद की सिंदेसर खुर्द खान भारत की सबसे बड़ी भूमिगत सीसा-जस्ता खान है। देश की सबसे बड़ी जस्ता-सीसा उत्पादक कंपनी हिन्दुस्तान जिंक लिमिटेड (मुख्यालय उदयपुर) चंदेरिया (चित्तौड़गढ़), दरीबा (राजसमंद) और देबारी (उदयपुर) में प्रमुख जस्ता गलानशालाएँ संचालित करती है।

चाँदी

चाँदी प्रकृति में शायद ही कभी शुद्ध रूप में मिलती है — यह प्रायः सीसा, जस्ता, ताँबा या सोने के अशुद्ध अयस्कों के साथ मिली होती है; इसके मुख्य अयस्क अर्जेन्टाइट, पायरारजिराइट और हॉर्न सिल्वर हैं। चाँदी के भंडार और उत्पादन, दोनों में राजस्थान देश में प्रथम स्थान पर है, कर्नाटक बहुत पीछे दूसरे स्थान पर है। देश की अधिकांश चाँदी हिन्दुस्तान जिंक की राजसमंद स्थित सिंदेसर खुर्द खान और चित्तौड़गढ़ स्थित चंदेरिया संयंत्र से प्राप्त होती है; उदयपुर और भीलवाड़ा इसके मुख्य उत्पादक क्षेत्र हैं।

टंगस्टन

राजस्थान में टंगस्टन वोल्फ्रेमाइट और शीलाइट अयस्कों के रूप में पाया जाता है। राज्य देश का सबसे बड़ा टंगस्टन उत्पादक है और भंडार में कर्नाटक के बाद दूसरे स्थान पर है। इसके प्रमुख स्रोत नागौर का डेगाना, पाली का नाना कराब तथा सिरोही का आबू-रेवदर-बाल्दा क्षेत्र हैं।

लौह अयस्क, मैंगनीज़ और सोना

राजस्थान में लौह अयस्क मुख्यतः शिस्ट और आग्नेय चट्टानों से प्राप्त होता है। रासायनिक दृष्टि से हेमेटाइट बेहतर गुणवत्ता का अयस्क है, परंतु राज्य के भंडारों में मैग्नेटाइट किस्म का ही बोलबाला है। मैग्नेटाइट भंडार में राजस्थान देश में तीसरे तथा हेमेटाइट भंडार में 11वें स्थान पर है; कुल लौह अयस्क उत्पादन में राज्य सातवें स्थान पर है, परंतु लौह अयस्क सांद्र (कंसंट्रेट) के उत्पादन में यह प्रथम स्थान पर है। प्रमुख भंडार जयपुर-मोरीजा-बानोला, नीमला राइसेला (दौसा), डाबला व सिंघाना (झुंझुनूं) तथा उदयपुर क्षेत्र में मिलते हैं, जबकि नए भंडार भीलवाड़ा के कजलोदिया (बानेड़ा), थुलखेड़ा-जिपिया व जाहजपुर में तथा करौली के हिंडौन तहसील के खोहरा, देदरोली, तोड़पुरा व लीलोटी गाँवों में मिले हैं। मैंगनीज़, जिसे उसके बहुआयामी औद्योगिक उपयोग के कारण "जैक ऑफ ऑल ट्रेड्स" कहा जाता है, चाँदी-स्लेटी रंग का, कठोर परंतु भंगुर खनिज है, जो मुख्यतः अवसादी चट्टानों (मुख्य अयस्क: सिलोमिलेन) से मिलता है; भंडार में राजस्थान देश में दसवें तथा उत्पादन में सातवें स्थान पर है, बाँसवाड़ा का लीलवानी-तलवाड़ा-नरडिया क्षेत्र इसका प्रमुख स्रोत है। सोने के भंडार बाँसवाड़ा के भूकिया-जगपुरा क्षेत्र में (जहाँ एक ऑस्ट्रेलियाई कंपनी ने 2007 में करोड़ों टन भंडार का अनुमान लगाया था) तथा उदयपुर के रायपुर-खेड़ा क्षेत्र में मिले हैं, हालाँकि राज्य में सोने का व्यावसायिक खनन अभी शुरू नहीं हुआ है; सोने के अयस्क भंडार में राजस्थान बिहार के बाद दूसरे तथा धातु सामग्री की दृष्टि से कर्नाटक के बाद दूसरे स्थान पर है।

अधात्विक खनिज

यह वह श्रेणी है जिसमें राजस्थान वास्तव में सबसे आगे निकल जाता है, देश को सजावटी भवन-निर्माण पत्थर से लेकर औद्योगिक मिट्टी तक हर तरह के अधात्विक खनिज की आपूर्ति करते हुए।

मार्बल, बलुआ पत्थर और ग्रेनाइट

भारत के सबसे बड़े मार्बल भंडार और सबसे बड़ा मार्बल उत्पादन, दोनों राजस्थान के हिस्से में आते हैं। डूँग्वाकुचामन का मकराना शुद्ध सफेद संगमरमर का ऐतिहासिक स्रोत है (जिससे प्रसिद्ध रूप से ताजमहल बना), जबकि आज सर्वाधिक मार्बल उत्पादन राजसमंद के राजनगर से होता है और किशनगढ़ को देश का सबसे बड़ा मार्बल व्यापार बाज़ार माना जाता है। रंग-बिरंगी किस्में भी उतनी ही प्रसिद्ध हैं: डूँगरपुर, कोटा व भैंसलाना (जयपुर) से हरा-काला मार्बल; धौलपुर से लाल मार्बल; जैसलमेर से पीला मार्बल; बाँसवाड़ा से बैंगनी मार्बल; तथा पाली के देसूरी से नीला मार्बल। बलुआ पत्थर राजस्थान की एक और विशेषता है — देश के सबसे बड़े बलुआ पत्थर भंडार और उत्पादन राज्य में ही हैं, जिनमें धौलपुर का गुलाबी बलुआ पत्थर तथा करौली की लाल व चित्तीदार किस्म निर्माण कार्यों में विशेष रूप से पसंद की जाती है। ग्रेनाइट के मामले में भी सबसे बड़ा राष्ट्रीय उत्पादन राजस्थान में ही होता है (यद्यपि भंडार में कर्नाटक अब भी आगे है); सिवाणा-बालोतरा गुलाबी व मरकरी लाल ग्रेनाइट देता है, जैसलमेर के पींथला गाँव से पीला ग्रेनाइट तथा जयपुर के कालाडेरा से काला ग्रेनाइट मिलता है। सिवाणा तहसील के मकराना डेजर्ट ब्राउन ग्रेनाइट का उपयोग अयोध्या में भगवान श्रीराम की 251 मीटर ऊँची प्रतिमा बनाने में किया गया।

जिप्सम और पोटाश

जिप्सम, जिसे हरसौठ भी कहा जाता है, सेलेनाइट, एलाबास्टर व सैटिन स्पार जैसे रूपों में मिलता है, और राजस्थान के पास इसके सबसे बड़े भंडार और सबसे बड़ा उत्पादन, दोनों हैं — व्यावहारिक रूप से किसी अन्य राज्य का इससे मुकाबला नहीं। बीकानेर की RSMML की बल्लार खान इसकी प्रमुख जिप्सम खान है, और कंपनी राज्य का संपूर्ण सेलेनाइट उत्पादन संभालती है। प्रमुख जिप्सम पट्टियाँ नागौर (भदवासी), श्रीगंगानगर, बीकानेर (बिसरासर, जामसर), हनुमानगढ़, बाड़मेर, बालोतरा व जैसलमेर (फलसूण्ड) से होकर गुजरती हैं। मुख्यतः उर्वरक के रूप में उपयोग होने वाला पोटाश एक और ऐसा खनिज है जिसमें राजस्थान लगभग एकमात्र राष्ट्रीय स्रोत है — अनुमान है कि देश के 95% से अधिक पोटाश भंडार राज्य में हैं, जो चूरू, बीकानेर, हनुमानगढ़ व श्रीगंगानगर जिलों में फैले नागौर-गंगानगर बेसिन में केंद्रित हैं। वर्ष 2024 में हनुमानगढ़ के सतीपुरा उप-बेसिन के जोखिया साउथ व खुंजा नॉर्थ ब्लॉक में 340 मिलियन टन पोटाश भंडार पाए गए। भारत में अभी तक पोटाश का व्यावसायिक उत्पादन शुरू नहीं हुआ है, इसलिए भविष्य में इसकी संभावनाएँ अपार हैं।

चूना पत्थर और रॉक फॉस्फेट

सीमेंट-ग्रेड और स्टील-ग्रेड, दोनों प्रकार के चूना पत्थर उत्पादन में राजस्थान देश में प्रथम स्थान पर है, तथा केमिकल-ग्रेड में गुजरात के बाद दूसरे स्थान पर है। सीमेंट-ग्रेड में अग्रणी चित्तौड़गढ़ को राजस्थान का "लाइमस्टोन डिस्ट्रिक्ट" कहा जाता है; स्टील-ग्रेड में जैसलमेर तथा केमिकल-ग्रेड में नागौर आगे है। उर्वरक निर्माण में उपयोगी रॉक फॉस्फेट भी एक ऐसा खनिज है जिसके उत्पादन में राजस्थान देश में प्रथम है (मध्यप्रदेश दूसरे स्थान पर), हालाँकि भंडार में झारखंड आगे है। उदयपुर के निकट RSMML की झामरकोटड़ा खान देश का सबसे बड़ा स्रोत है, जो भारत के लगभग 90% रॉक फॉस्फेट उत्पादन की आपूर्ति करती है; हिन्दुस्तान जिंक भी पास के माटोन में एक फॉस्फेट खान संचालित करता है। इस पट्टी के निम्न-श्रेणी फॉस्फेट से "राजफॉस" ब्रांड का उर्वरक बनाया जाता है।

अभ्रक, फेल्सपार, एस्बेस्टस और वोलास्टोनाइट

भीलवाड़ा को प्यार से भारत की "अभ्रक नगरी" (मीका सिटी) कहा जाता है, जहाँ राज्य का सबसे अधिक अभ्रक उत्पादन होता है और जहाँ 1948 में गंगापुर के निकट गुंडली गाँव में देश का पहला अभ्रक-ईंट उद्योग स्थापित हुआ था। अभ्रक भंडार में राजस्थान आज आंध्रप्रदेश के बाद देश में दूसरे स्थान पर है, परंतु वास्तविक उत्पादन में यह अन्य सभी राज्यों को पीछे छोड़कर प्रथम स्थान पर आ गया है। सिरेमिक, काँच निर्माण व टाइल घर्षक उद्योगों में उपयोगी फेल्सपार में राजस्थान के पास देश के सबसे बड़े भंडार और सबसे बड़ा उत्पादन, दोनों हैं, जिसका मुख्य स्रोत अजमेर है। एस्बेस्टस यहाँ क्राइसोटाइल व ट्रेमोलाइट किस्मों में मिलता है (क्राइसोटाइल बेहतर गुणवत्ता की मानी जाती है), जिससे राजस्थान को देश का सबसे बड़ा भंडार प्राप्त है, उदयपुर के ऋषभदेव, खैरवाड़ा व झाड़ेल इसकी मुख्य खनन पट्टियाँ हैं। वोलास्टोनाइट लगभग विशेष रूप से राजस्थान का खनिज ही है — भारत के लगभग 89% भंडार और लगभग संपूर्ण उत्पादन यहीं से होता है, मुख्यतः उदयपुर के खारतरला व कोटड़ा क्षेत्र से।

अन्य उल्लेखनीय अधात्विक खनिज

2015 से लघु खनिज घोषित सोपस्टोन (टैल्क/स्टीएटाइट) के भंडार और उत्पादन, दोनों में राजस्थान देश में प्रथम स्थान पर है — भीलवाड़ा के निकट घेवरिया भंडार देश के सबसे बड़े सोपस्टोन भंडार हैं, जबकि सलूंबर-उदयपुर पट्टी राज्य उत्पादन का लगभग 45% भाग देती है। कैल्साइट (जिसे कैल्क स्पार या आइसलैंड स्पार भी कहा जाता है) में भी राजस्थान भंडार व उत्पादन में शीर्ष स्थान रखता है, जो मुख्यतः उदयपुर व सिरोही में निजी क्षेत्र द्वारा खनित किया जाता है। लौह-इस्पात उद्योग में प्रयुक्त बैंगनी फ्लोरस्पार के उत्पादन में राजस्थान प्रथम है (2023-24 में जालौर अग्रणी रहा), यद्यपि भंडार में गुजरात अब भी थोड़ा आगे है। गार्नेट खनन का केंद्र टोंक, अजमेर, भीलवाड़ा व उदयपुर हैं, जहाँ अपघर्षक (एब्रेसिव) गार्नेट उत्पादन में राजस्थान देश में प्रथम है। तेल-कुआं खनन, सौंदर्य प्रसाधन व वनस्पति तेल शोधन में उपयोगी बेंटोनाइट ("ब्लीचिंग क्ले") में राजस्थान के पास देश के सबसे बड़े भंडार (लगभग 73%) और सर्वाधिक उत्पादन है, जो बाड़मेर में केंद्रित है। नमक राजस्थान की अंतर्देशीय खारी झीलों से विशिष्ट रूप से प्राप्त होता है (भारत में कहीं और नहीं), जयपुर की साँभर झील अकेले देश के कुल नमक उत्पादन का लगभग 8.7% योगदान देती है; कुल नमक उत्पादन में राज्य गुजरात व तमिलनाडु के बाद तीसरे स्थान पर है, और आयोडीनयुक्त नमक उत्पादन में गुजरात के बाद दूसरे स्थान पर है।

ईंधन खनिज: लिग्नाइट, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस

ईंधन खनिजों में लिग्नाइट (निम्न श्रेणी का कोयला) राजस्थान की सबसे बड़ी ताकत है — राज्य के पास भारत के कुल लिग्नाइट भंडार का लगभग 14.06% भाग है, जो तमिलनाडु के बाद दूसरे स्थान पर है, तथा उत्पादन में तमिलनाडु व गुजरात के बाद तीसरे स्थान पर है। अकेले बाड़मेर जिले में राज्य के सबसे बड़े लिग्नाइट भंडार और उत्पादन हैं, जहाँ कपूरड़ी, जालीपा, गिराल व सोनाड़ी जैसी खानें स्थित हैं; 1994 में शुरू हुई गिराल खान RSMML की पहली ओपन-कास्ट लिग्नाइट परियोजना थी। बीकानेर की बरसिंगसर व बीठनोक खानें NLC इंडिया लिमिटेड द्वारा संचालित 250-250 मेगावाट के तापीय विद्युत संयंत्रों को ईंधन देती हैं, जबकि नागौर की कसनाऊ-मातासुख खान 2003 से चालू है। पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस में भी राजस्थान की महत्वपूर्ण भूमिका है — राज्य भारत के कुल कच्चे तेल उत्पादन में लगभग 12% (लगभग 3.42 मिलियन टन वार्षिक) का योगदान देता है और भंडार व उत्पादन दोनों में देश में चौथे स्थान पर है; केयर्न वेदांता द्वारा विकसित बाड़मेर-साँचौर बेसिन में प्रसिद्ध मंगला, भाग्यम, ऐश्वर्या व सरस्वती तेल क्षेत्र शामिल हैं, तथा मंगला क्षेत्र में देश का सबसे बड़ा तटीय (ऑनशोर) कच्चा तेल प्रसंस्करण टर्मिनल स्थित है। जैसलमेर राज्य के प्राकृतिक गैस उत्पादन का केंद्र है, जहाँ ONGC, ऑयल इंडिया व निजी कंपनियाँ सक्रिय हैं; प्राकृतिक गैस उत्पादन में राजस्थान वर्तमान में ऑफशोर व असम के बाद देश में तीसरे स्थान पर है।

प्रमुख खनिजों में राजस्थान की राष्ट्रीय स्थिति और एकाधिकार

खनिजराजस्थान की राष्ट्रीय स्थिति
कैल्साइट, चाँदी, जिप्सम, जस्ता अयस्क, वोलास्टोनाइट, सेलेनाइटएकमात्र उत्पादक / पूर्ण एकाधिकार
सीसा-जस्ता भंडारप्रथम (लगभग 89.32% राष्ट्रीय भंडार)
पोटाश भंडारप्रथम (95% से अधिक राष्ट्रीय भंडार)
मार्बल, बलुआ पत्थर, रॉक फॉस्फेट, चूना पत्थर (सीमेंट व स्टील ग्रेड), फेल्सपार, सोपस्टोन, कैल्साइट, क्वार्ट्ज़, मुल्तानी मिट्टी भंडार, बेंटोनाइटसबसे बड़े भंडार व सर्वाधिक उत्पादन
ताँबा भंडारप्रथम (उत्पादन में मध्यप्रदेश के बाद दूसरा)
टंगस्टन उत्पादनप्रथम (भंडार में कर्नाटक के बाद दूसरा)
एस्बेस्टस भंडारप्रथम (कर्नाटक दूसरे स्थान पर)
गार्नेट (अपघर्षक) उत्पादनप्रथम
लौह अयस्क सांद्र उत्पादनप्रथम (कुल लौह अयस्क उत्पादन में सातवाँ)
बैराइट्सआंध्रप्रदेश के बाद दूसरा
फ्लोरस्पार उत्पादनप्रथम (भंडार में गुजरात के बाद दूसरा)
अभ्रक उत्पादनप्रथम (भंडार में आंध्रप्रदेश के बाद दूसरा)
कुल नमक उत्पादनगुजरात व तमिलनाडु के बाद तीसरा
लिग्नाइट भंडारतमिलनाडु के बाद दूसरा (उत्पादन में तीसरा)
भारत के कच्चे तेल उत्पादन में योगदानलगभग 12% (भंडार व उत्पादन में चौथा)

प्रमुख खनन जिले

खनिजप्रमुख उत्पादक जिला
ताँबाझुंझुनूं (खेतड़ी-सिंघाना, कोलिहान), अलवर
सीसा-जस्ताउदयपुर (जावर), राजसमंद (राजपुरा-दरीबा), भीलवाड़ा (रामपुरा-आगूचा)
चाँदीराजसमंद (सिंदेसर खुर्द), चित्तौड़गढ़ (चंदेरिया)
टंगस्टननागौर (डेगाना), पाली, सिरोही
लौह अयस्कजयपुर (मोरीजा-बानोला), दौसा, भीलवाड़ा, करौली (हिंडौन)
मार्बलराजसमंद (मकराना, राजनगर), डूँगरपुर, कोटा
बलुआ पत्थरधौलपुर (बंसी-पहाड़पुर), करौली
ग्रेनाइटबालोतरा (सिवाणा), जैसलमेर, जयपुर (कालाडेरा), जालौर
जिप्समबीकानेर, नागौर, श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़
रॉक फॉस्फेटउदयपुर (झामरकोटड़ा, माटोन)
चूना पत्थरचित्तौड़गढ़, जैसलमेर, नागौर
अभ्रकभीलवाड़ा, उदयपुर, अजमेर
फेल्सपारअजमेर, भीलवाड़ा, ब्यावर, जयपुर
एस्बेस्टसउदयपुर (ऋषभदेव, खैरवाड़ा)
वोलास्टोनाइटउदयपुर (खारतरला, कोटड़ा)
पोटाशनागौर, बीकानेर, चूरू, हनुमानगढ़, श्रीगंगानगर
बेंटोनाइटबाड़मेर, बीकानेर
लिग्नाइटबाड़मेर (कपूरड़ी, जालीपा, गिराल), बीकानेर, नागौर
पेट्रोलियमबाड़मेर (मंगला, भाग्यम, ऐश्वर्या), बालोतरा
प्राकृतिक गैसजैसलमेर, बाड़मेर

खनिज-आधारित उद्योग

राजस्थान के खनिज वैभव ने एक व्यापक औद्योगिक तंत्र को जन्म दिया है। उदयपुर मुख्यालय वाली और देश की सबसे बड़ी सीसा-जस्ता उत्पादक कंपनी हिन्दुस्तान जिंक लिमिटेड चंदेरिया (चित्तौड़गढ़), दरीबा (राजसमंद) व देबारी (उदयपुर) में जस्ता व सीसा गलानशालाएँ संचालित करती है। झुंझुनूं स्थित खेतड़ी ताम्र गलानशाला 1974 से ताँबा अयस्क का प्रसंस्करण कर रही है। राजस्थान राज्य खान एवं खनिज निगम लिमिटेड (RSMML), जिसका मुख्यालय उदयपुर (पंजीकृत कार्यालय जयपुर) में है, बीकानेर जिप्सम लिमिटेड (1947) से अपनी जड़ें जोड़ता है और आज रॉक फॉस्फेट (झामरकोटड़ा), जिप्सम (बीकानेर), चूना पत्थर (जोधपुर) व लिग्नाइट (जयपुर, बाड़मेर व नागौर की खानों सहित) — इन चार प्रमुख व्यावसायिक इकाइयों का संचालन करता है। सीमेंट उद्योग राज्य के प्रचुर चूना पत्थर भंडार का लाभ उठाते हुए चित्तौड़गढ़, नागौर व पाली के आसपास व्यापक रूप से केंद्रित है। भीलवाड़ा की अभ्रक-ईंट निर्माण इकाइयाँ और किशनगढ़ की मार्बल कटाई-पॉलिशिंग इकाइयाँ अपने-अपने जिलों में रोजगार के बड़े स्रोत हैं। उर्वरक उत्पादन भी राजस्थान के खनिजों पर निर्भर है — झामरकोटड़ा का रॉक फॉस्फेट "राजफॉस" उर्वरक ब्रांड को कच्चा माल देता है, और RSMML ने राष्ट्रीय केमिकल्स एंड फर्टिलाइजर्स के साथ मिलकर चित्तौड़गढ़ के कापासन में एक DAP संयंत्र स्थापित किया है। ऊर्जा क्षेत्र में, बालोतरा जिले में बन रहा पचपदरा रिफाइनरी-सह-पेट्रोकेमिकल कॉम्प्लेक्स — जो एक ही स्थान पर रिफाइनरी और पेट्रोकेमिकल इकाई को जोड़ने वाली देश की पहली परियोजना है — पूर्ण होने पर पश्चिमी राजस्थान के डाउनस्ट्रीम उद्योग को नया आयाम देगा।

त्वरित तथ्य

  • कुल खनिज संपदा में राजस्थान भारत में दूसरे स्थान पर (झारखंड के बाद) है, परंतु खनिजों की विविधता में प्रथम स्थान पर है, जहाँ 82 खनिजों के भंडार पाए गए हैं, जिनमें से 57 का व्यावसायिक खनन हो रहा है।
  • राजस्थान छह खनिजों — कैल्साइट, चाँदी, जिप्सम, जस्ता अयस्क, वोलास्टोनाइट व सेलेनाइट — का भारत में एकमात्र उत्पादक राज्य है।
  • राज्य के पास देश के लगभग 89.32% सीसा-जस्ता भंडार और 95% से अधिक पोटाश भंडार हैं, तथा यहाँ भारत की सबसे पुरानी सीसा-जस्ता खनन पट्टी जावर खानें (उदयपुर) स्थित हैं।
  • लिग्नाइट और कच्चे तेल, दोनों में बाड़मेर जिला राज्य में अग्रणी है, जहाँ मंगला तेल क्षेत्र (देश का सबसे बड़ा तटीय कच्चा तेल प्रसंस्करण टर्मिनल) तथा कपूरड़ी, जालीपा व गिराल जैसी प्रमुख लिग्नाइट खानें स्थित हैं।

त्वरित रिवीजन — One-Liners

  • थार मरुस्थल विश्व का 9वाँ सबसे बड़ा मरुस्थल है; यह राजस्थान के पश्चिमी भाग में है।
  • चंबल नदी राजस्थान की एकमात्र बारहमासी नदी है; यह यमुना में मिलती है।
  • भारत में दक्षिण-पश्चिम मानसून जून में केरल पहुंचता है; यह अरब सागर और बंगाल की खाड़ी दोनों से आता है।
  • कर्क रेखा (23.5°N) राजस्थान के बांसवाड़ा जिले से गुजरती है।
  • मकराना (नागौर) का सफेद संगमरमर ताजमहल में प्रयुक्त।
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राजस्थान के किस जिले को उसके सीसा-जस्ता खनन के लिए प्रसिद्ध 'जावर खान समूह' के लिए जाना जाता है?

2

राजस्थान का कौन-सा जिला लिग्नाइट के सबसे बड़े भंडार व उत्पादन के लिए जाना जाता है, जहाँ कपूरड़ी व गिराल जैसी खानें स्थित हैं?

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