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राजस्थान की मृदा — प्रकार, वर्गीकरण एवं वितरण

Soils of Rajasthan — Types, Classification & Distribution

11 मिनटintermediate✓ अपडेटेड: जुलाई 2026· Geography of World and India

राजस्थान की मृदा: एक परिचय

मृदा पृथ्वी की सतह पर पाई जाने वाली वह पतली परत है जो लाखों वर्षों में तापमान, वर्षा, वायु तथा जैविक क्रियाओं के संयुक्त प्रभाव से चट्टानों के टूटने और विघटित होने से बनती है। राजस्थान में पश्चिम के शुष्क बालू सागर से लेकर पूर्व की उपजाऊ नदी घाटियों तक मृदा का स्वरूप निरंतर बदलता रहता है, जिससे यह प्रतियोगी परीक्षार्थियों के लिए एक बेहद रोचक अध्ययन-क्षेत्र बन जाता है। भारत में पाए जाने वाले लगभग सभी प्रमुख मृदा प्रकार — पवन द्वारा उड़ाई गई मरुस्थलीय बालू से लेकर उपजाऊ काली कपास मृदा तक — राजस्थान में किसी न किसी रूप में विद्यमान हैं।

राजस्थान में मृदा की उर्वरता मुख्यतः तीन कारकों पर निर्भर करती है — वर्षा की मात्रा व नियमितता, वह मूल चट्टान जिससे मृदा का निर्माण हुआ है, तथा वनस्पति आवरण की सीमा जो ऊपरी मिट्टी को वायु या जल द्वारा बहने से बचाती है। चूँकि राज्य का लगभग 61 प्रतिशत भाग मरुस्थलीय अथवा अर्द्धशुष्क परिस्थितियों में आता है, अतः अधिकांश मृदा मोटे कणों वाली, पोषक तत्वों में कमी वाली तथा अपरदन-प्रवण है, जबकि तुलनात्मक रूप से अधिक वर्षा वाले दक्षिणी व पूर्वी जिलों में गहरे रंग की, अधिक उपजाऊ मृदा पाई जाती है।

राजस्थान की प्रमुख मृदा प्रकार

1. रेतीली/बलुई (मरुस्थलीय) मृदा

रेतीली या बलुई मृदा राजस्थान के सबसे बड़े भू-भाग पर फैली हुई है, जो जैसलमेर, बाड़मेर, बालोतरा, बीकानेर, फलौदी, जोधपुर, नागौर, चूरू, डीडवाना-कुचामन तथा झुंझुनूँ जिलों में प्रमुख रूप से पाई जाती है। इसके कण मोटे होते हैं, जल तुरंत रिसकर नीचे चला जाता है और नमी धारण करने की क्षमता बहुत कम होती है। इसमें नाइट्रोजनी व कार्बनिक लवण अल्प मात्रा में जबकि कैल्सियम लवण व pH मान अधिक होता है, जिससे प्राकृतिक उर्वरता कम रहती है। कण हल्के व ढीले होने के कारण वायु इन्हें आसानी से उड़ाकर एक स्थान से दूसरे स्थान ले जाती है, जिससे बालू के टीले (सैंड ड्यून्स) बनते हैं। कम उर्वरता के बावजूद सिंचाई मिलने पर इसमें खरीफ की बाजरा, मोठ व मूँग जैसी फसलें सफलतापूर्वक उगाई जाती हैं।

इस व्यापक वर्ग के अंतर्गत भूगोलविद आगे कुछ उप-प्रकार भी पहचानते हैं — बालू टिब्बा मृदा (जहाँ औसत वर्षा 100 मिमी से कम है और जल लगभग तुरंत रिस जाता है), लाल बलुई मृदा (नागौर, डीडवाना-कुचामन, जोधपुर, पाली, जालौर, चूरू व झुंझुनूँ में मिलती है, जिसकी जलधारण क्षमता भूरी बलुई मिट्टी से अधिक है और सिंचाई मिलने पर उपजाऊ बन जाती है), तथा पीली-भूरी बलुई दोमट मृदा (नागौर, डीडवाना-कुचामन व पाली में पाई जाती है, जिसमें तीन-चार फुट की गहराई पर चूना-मिश्रित परत मिलती है, जिसे 'स्टेपी मृदा' भी कहा जाता है)।

2. लवणीय मृदा

लवणीय मृदा मुख्यतः गंगानगर, हनुमानगढ़, बीकानेर, बाड़मेर, नागौर, बालोतरा, जालौर व डीडवाना-कुचामन जिलों में, विशेष रूप से लवणीय झीलों के आसपास, केंद्रित है। इन मिट्टियों में जल-निकास ठीक न होने के कारण निचले भागों में सोडियम व मैग्नीशियम लवण अत्यधिक मात्रा में जमा हो जाते हैं, जिससे भूमि कृषि योग्य नहीं रह जाती। राज्य में आंतरिक जल-प्रवाह वाले आठ क्षेत्र हैं जहाँ लवण समुद्र में बहकर नहीं जा पाते और वहीं संचित होते रहते हैं; सांभर, पचपद्रा व डीडवाना जैसी लवणीय झीलों के आसपास बनने वाली मृदा को विशेष रूप से 'सोलनचॉक मृदा' कहा जाता है।

3. लाल व लाल दोमट (लैटेराइट) मृदा

लाल दोमट या लैटेराइट मृदा दक्षिणी राजस्थान के उदयपुर, सलूंबर, डूँगरपुर, बाँसवाड़ा, प्रतापगढ़ तथा चित्तौड़गढ़ के कुछ भागों में पाई जाती है। यह स्फटिक व कायांतरित चट्टानों के अपक्षय से बनती है और लौह-ऑक्साइड की उपस्थिति के कारण इसका रंग लाल होता है। यह बारीक कणों वाली होती है और इसमें नमी धारण करने की अद्भुत क्षमता होती है, यद्यपि इसमें नाइट्रोजन, फास्फोरस व कैल्सियम की कमी तथा पोटाश व लौह की अधिकता पाई जाती है। इसमें मक्का, चावल व गन्ने की खेती सफलतापूर्वक की जाती है।

4. काली मृदा (रेगुर)

काली या रेगुर मृदा राज्य के दक्षिणी-पूर्वी भाग, अर्थात कोटा, बूँदी, बाराँ, झालावाड़ व सवाई माधोपुर में प्रमुखता से पाई जाती है। यह प्राचीन ज्वालामुखी बेसाल्ट चट्टानों के अपरदन से बनती है और गहरे भूरे से काले रंग की होती है। यह बारीक कणों वाली तथा उत्कृष्ट नमी-धारण क्षमता वाली मृदा है, जिसमें फॉस्फेट, नाइट्रोजन व जैविक पदार्थों की कमी परंतु कैल्सियम व पोटाश की पर्याप्त मात्रा पाई जाती है। रेगुर मृदा कपास, मूँगफली, दालों, सोयाबीन व धनिया जैसी नकदी फसलों के लिए आदर्श है, इसीलिए इसे 'काली कपास मृदा' भी कहा जाता है। इसकी एक विशिष्ट पहचान यह है कि शुष्क ऋतु में इसमें चौड़ी व गहरी दरारें पड़ जाती हैं, जिससे यह स्वतः जुत जाती है — इसीलिए इसे 'स्वतः जुताई वाली मृदा' (self-ploughing soil) भी कहते हैं।

5. मिश्रित लाल व काली मृदा

यह संक्रमणकालीन मृदा उदयपुर, सलूंबर, चित्तौड़गढ़, डूँगरपुर, बाँसवाड़ा व भीलवाड़ा जिलों में पाई जाती है और वस्तुतः मालवा के पठार की काली मृदा का राजस्थान में विस्तार है। यह बलुई दोमट से बलुई मटियार रूप में मिलती है, जिसकी गहराई व उर्वराशक्ति स्थान-स्थान पर भिन्न होती है, और इसमें फॉस्फेट, नाइट्रोजन, कैल्सियम व कार्बनिक पदार्थों की कमी रहती है। यह कपास, मक्का व गन्ने की खेती के लिए उपयुक्त है।

6. जलोढ़ (कछारी) मृदा

नदियों द्वारा सदियों से बहाकर लाई गई जलोढ़ मृदा राजस्थान की सर्वाधिक उपजाऊ मृदा है। यह राज्य के पूर्वी मैदानी भाग — कोटपूतली-बहरोड़, खैरथल-तिजारा, अलवर, भरतपुर, डीग, धौलपुर, टोंक, सवाई माधोपुर, करौली व जयपुर — में प्रमुखता से पाई जाती है। इसमें नाइट्रोजन प्रचुर मात्रा में जबकि फॉस्फेट व कैल्सियम अपेक्षाकृत कम मात्रा में पाया जाता है; जलधारण क्षमता पर्याप्त होती है और इसका रंग स्थान के अनुसार लाल से पीला तक भिन्न होता है। यह राज्य की सर्वोत्तम कृषि मृदा है और गेहूँ, चावल, कपास व तम्बाकू के लिए उपयुक्त है।

7. भूरी मृदा

भूरी मृदा भीलवाड़ा, दौसा, अजमेर, ब्यावर, टोंक व जयपुर के क्षेत्रों में, मुख्यतः बनास नदी के प्रवाह-क्षेत्र में पाई जाती है। इसमें नाइट्रोजन व फॉस्फोरस तत्वों का अभाव रहता है, परंतु सतह से 100–150 सेमी नीचे प्रायः चूना-मिश्रित परत मिलती है, और यह कृषि के लिए उपयुक्त मानी जाती है।

8. सीरोजम (धूसर मरुस्थलीय) मृदा

सीरोजम या धूसर-भूरी मरुस्थलीय मृदा जोधपुर, डीडवाना-कुचामन, पाली, नागौर, जालौर, झुंझुनूँ, सीकर व सिरोही के कुछ भागों में फैली हुई है। इसका रंग पीला-भूरा होता है, इसमें रेत की प्रधानता तथा नाइट्रोजन व कार्बनिक पदार्थों की कमी रहती है, जबकि फॉस्फेट पर्याप्त मात्रा में पाया जाता है; पर्याप्त सिंचाई मिलने पर इसमें अच्छी फसल उत्पन्न की जा सकती है।

आधुनिक (USDA) मृदा वर्गीकरण

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रचलित USDA मृदा वर्गीकरण प्रणाली के अनुसार राजस्थान की मृदाएँ पाँच प्रमुख वर्गों में बाँटी जाती हैं। एरिडिसॉल्स — शुष्क जलवायु की विशिष्ट खनिज मृदाएँ — लगभग पूरे पश्चिमी राजस्थान में फैली हैं, जिनमें बाड़मेर, बालोतरा, जैसलमेर, बीकानेर, गंगानगर, हनुमानगढ़, चूरू, सीकर, झुंझुनूँ, नागौर, डीडवाना-कुचामन, फलौदी, जोधपुर, पाली व जालौर शामिल हैं। एल्फिसॉल्स पूर्वी व दक्षिण-पूर्वी राजस्थान के अधिकांश भाग — जयपुर, अलवर, भरतपुर, कोटा, उदयपुर, चित्तौड़गढ़, बाँसवाड़ा व झालावाड़ में पाए जाते हैं और इनमें मिट्टी की निचली परतों में मृत्तिका (क्ले) की अधिकता होती है। एन्टिसॉल्स एकमात्र ऐसा मृदा-वर्ग है जो विभिन्न जलवायु क्षेत्रों में पाया जाता है; ये लगभग पूरे पश्चिमी राजस्थान में विस्तृत हैं और सामान्यतः हल्के पीले-भूरे रंग के होते हैं। इंसेप्टिसॉल्स — जो पूर्णतः शुष्क जलवायु में कभी नहीं बनते — सिरोही, पाली, ब्यावर, राजसमंद, उदयपुर, भीलवाड़ा व चित्तौड़गढ़ के साथ-साथ जयपुर, अलवर व सवाई माधोपुर के जलोढ़ मैदानों में मिलते हैं। वर्टिसॉल्स — अत्यंत मृत्तिका-प्रधान मृदाएँ जो काली मृदा पट्टी की विशेषता हैं — झालावाड़, बाराँ, कोटा व बूँदी के अधिकांश भाग में फैली हैं।

क्षेत्रवार मृदा वितरण

भौगोलिक प्रदेशप्रमुख मृदा
दक्षिणी-पूर्वी पठारी प्रदेश (हाड़ौती)मध्यम काली व काली मटियार दोमट मृदा
चम्बल एवं माही बेसिनलाल-काली व मध्यम काली मृदा
बनास बेसिनपीली-भूरी व भूरी मटियार दोमट मृदा
छप्पन का मैदानमिश्रित लाल दोमट व लाल-काली मृदा
पूर्वी अर्द्ध शुष्क मैदानजलोढ़ एवं भूरी मृदा
लूनी बेसिनभूरी रेतीली मृदा
पश्चिमी शुष्क मैदान (थार मरुस्थल)रेतीली/बलुई मृदा
घग्घर मैदानभूरी मटियार दोमट मृदा

राजस्थान में मृदा अपरदन

राजस्थान की कृषि उत्पादकता को प्रभावित करने वाली दो प्रमुख मृदा-समस्याएँ हैं — मृदा अपरदन तथा भूमि की लवणीयता व क्षारीयता। मृदा अपरदन को 'रेंगती हुई मृत्यु' भी कहा जाता है क्योंकि यह धीरे-धीरे परंतु निरंतर भूमि को नष्ट करता है, और इसके लिए मानवीय गतिविधियाँ काफी हद तक उत्तरदायी हैं। मृदा अपरदन के दो शक्तिशाली कारक हैं — पवन और जल।

वायु अपरदन

पश्चिमी राजस्थान के शुष्क व अर्द्धशुष्क क्षेत्रों में वायु अपरदन अत्यंत तीव्र है, जहाँ तेज पवनें ऊपरी उपजाऊ मिट्टी को उड़ाकर दूसरी जगह ले जाती हैं, जिससे धीरे-धीरे उपजाऊ भूमि बंजर होती जाती है। राजस्थान में वायु अपरदन से प्रभावित क्षेत्रफल, जल अपरदन से प्रभावित क्षेत्रफल की तुलना में अधिक है, जिससे यह राज्य की सबसे बड़ी मृदा-क्षरण चुनौती बन जाती है।

जल अपरदन

जल अपरदन राज्य के अधिक वर्षा वाले दक्षिणी व पूर्वी जिलों में अधिक गंभीर है और यह तीन रूपों में देखा जाता है। परतदार अपरदन (Sheet Erosion) तेज वर्षा के बाद समतल या हल्की ढाल वाली बंजर भूमि से ऊपरी उपजाऊ परत को समान रूप से बहा ले जाता है — यह विशेष रूप से हानिकारक है क्योंकि यह सबसे बारीक व सर्वाधिक पोषक-तत्व युक्त मिट्टी को पहले हटाता है। अवनालिका अपरदन (Gully Erosion) ढाल वाली भूमि पर तेज वर्षा के दौरान गहरी नालियाँ बना देता है, जिससे खेत छोटे-छोटे टुकड़ों में बँटकर कृषि योग्य नहीं रह जाते; ऐसे क्षेत्र को 'बीहड़ भूमि' (badland topography) कहा जाता है। यह परिघटना चम्बल नदी के किनारे, विशेषकर हाड़ौती क्षेत्र तथा सवाई माधोपुर, करौली व धौलपुर जिलों में सर्वाधिक व्यापक है — इनमें भी धौलपुर जिले में बीहड़ भूमि का सबसे अधिक विस्तार है, इसके बाद सवाई माधोपुर व करौली का स्थान आता है। रिल अपरदन (Rill Erosion) प्रारंभिक व सबसे छोटी अवस्था है, जिसमें बहता जल मिट्टी की सतह पर उँगली जैसी महीन नालियाँ बना देता है। समग्र रूप से चम्बल बेसिन के बाद घग्घर क्षेत्र में जल अपरदन का स्तर सबसे अधिक दर्ज किया जाता है।

मृदा अपरदन के कारण

  • वनोन्मूलन मिट्टी को बाँधे रखने वाली जड़ों तथा उसे पोषित करने वाली पत्तियों को समाप्त कर देता है, और बढ़ती जनसंख्या के दबाव में तेजी से हो रही वृक्ष-कटाई मिट्टी को पवन व वर्षा के प्रति असुरक्षित बना देती है।
  • अर्द्धशुष्क चारागाह क्षेत्रों में भेड़-बकरियों द्वारा अत्यधिक चराई से वनस्पति पूरी तरह समाप्त हो जाती है, जिससे ऊपरी मिट्टी ढीली पड़ जाती है।
  • पहाड़ी ढलानों पर, विशेषकर दक्षिण-पूर्वी राजस्थान में, आदिवासियों द्वारा अपनाई जाने वाली झूम या वालरा जैसी परंपरागत कृषि पद्धतियाँ बंजर भूमि को तीव्र अपरदन के प्रति उजागर कर देती हैं।
  • मानसून-पूर्व की धूल भरी आँधियाँ व तेज मरुस्थलीय पवनें पश्चिमी राजस्थान तथा पहाड़ी ढलानों दोनों में मिट्टी को उड़ाकर स्थानांतरित करती हैं।
  • अत्यधिक सिंचाई मिट्टी की गहरी परतों में जमा लवणों को सतह पर ले आती है, जिससे धीरे-धीरे उर्वरता नष्ट होती जाती है।
  • पर्याप्त ह्यूमस के अभाव में रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक प्रयोग से मिट्टी समय के साथ कठोर हो जाती है और उसकी दीर्घकालिक उत्पादकता घट जाती है।
  • अवैज्ञानिक कृषि पद्धतियाँ — ढाल की समोच्च रेखाओं (contour lines) के समानान्तर जुताई न करना, त्रुटिपूर्ण फसल चक्र तथा असावधानीपूर्वक बुवाई — अपरदन को और बढ़ा देती हैं।

उल्लेखनीय है कि अरावली पर्वतीय क्षेत्रों में अपरदन का मुख्य कारण वनोन्मूलन, अत्यधिक चराई व अवैज्ञानिक कृषि है, जबकि पश्चिमी मरुस्थलीय जिलों में अपरदन का प्रमुख कारण पवन ही है।

लवणीयता व क्षारीयता की समस्या

अपरदन के अतिरिक्त, राजस्थान की लगभग 7 से 8 लाख हैक्टेयर कृषि भूमि — मुख्यतः जोधपुर, पाली, भीलवाड़ा, बीकानेर, गंगानगर, हनुमानगढ़, टोंक, सिरोही, अलवर, भरतपुर, चित्तौड़गढ़ व नागौर में — लवणीयता व क्षारीयता से ग्रस्त है। लवणीय मृदा तब बनती है जब कैल्सियम, मैग्नीशियम व पोटाशियम के अतिरिक्त घुलनशील क्लोराइड व सल्फेट लवण सतह के पास जमा हो जाते हैं, जिससे बीज का अंकुरण रुक जाता है; इसकी पहचान सूखने पर सतह पर बनने वाली सफेद परत, जल का तेजी से रिसना, खारा भूजल तथा फसल की छोटी व असमान वृद्धि से की जा सकती है। इसके विपरीत, क्षारीय मृदा तब बनती है जब अतिरिक्त विनिमेय सोडियम मिट्टी की भौतिक संरचना को बिगाड़ देता है और जड़ क्षेत्र में वायु संचार को अवरुद्ध कर देता है; यह गीली होने पर काली दिखाई देती है, सूखने पर उसमें बारीक दरारें पड़ जाती हैं, और इसमें केवल दूब घास, धाक व मदार जैसे कुछ लवण-सहिष्णु पौधे ही उग पाते हैं।

इंदिरा गांधी नहर के अंतर्गत गंगानगर, हनुमानगढ़ व बीकानेर के नहर-सिंचित क्षेत्रों में अत्यधिक सिंचाई तथा नीचे की कठोर परत के कारण भूजल स्तर ऊपर उठ गया है, जिससे गंभीर जल-भराव (स्थानीय भाषा में 'सेम') की समस्या पैदा हुई है, जो मृदा उर्वरता को नष्ट करने के साथ-साथ खरपतवार की समस्या को भी बढ़ाती है।

मृदा संरक्षण के उपाय

मृदा संरक्षण वैज्ञानिक व परंपरागत विधियों के संयोजन से मृदा की उर्वरता को सुरक्षित व पुनर्स्थापित करने का प्रयास है:

  • अत्यधिक चराई व स्थानांतरी कृषि (झूम खेती) को नियंत्रित करना तथा ढाल वाली भूमि पर सीढ़ीदार खेती (टेरेस फार्मिंग) को बढ़ावा देना।
  • अवनालिकाओं को सीढ़ीदार खेत बनाकर, गड्ढों को पाटकर या सुरक्षात्मक वनस्पति लगाकर अवनालिका अपरदन को रोकना।
  • शुष्क व अर्द्धशुष्क क्षेत्रों में रेत के टीलों को कृषि भूमि पर फैलने से रोकने हेतु वृक्षों की सुरक्षा पट्टी (शेल्टरबेल्ट) व कृषि-वानिकी अपनाना; कृषि-अयोग्य भूमि को चारागाह में परिवर्तित करना।
  • बड़े पैमाने पर वनरोपण, जिसे पवन व जल दोनों प्रकार के अपरदन को नियंत्रित करने का सबसे प्रभावी उपाय माना जाता है।
  • दो या तीन फसली चक्र अपनाना तथा भूमि को समय-समय पर परती छोड़ना, ताकि एक फसल द्वारा उपयोग किए गए पोषक तत्वों की पूर्ति अगली फसल से हो सके।
  • पहाड़ी व हल्की ढाल वाली भूमि पर ढाल की सीध में जुताई करने के बजाय समोच्च रेखा जुताई (contour ploughing) व पट्टीदार कृषि (strip cropping) अपनाना।
  • राजस्थान, मध्यप्रदेश व महाराष्ट्र जैसे राज्यों में सामान्य दीर्घकालिक परती भूमि को कृषि, चारागाह या बाग-बगीचे में बदलकर पुनः उपयोग योग्य बनाना।
  • रिसाव रोकने हेतु नहरों की परत बनाना, जिससे निचले क्षेत्रों में जल-भराव को नियंत्रित किया जा सके।
  • लवणीय व क्षारीय भूमि के सुधार हेतु जिप्सम व गोबर खाद का प्रयोग, साथ ही जैव-उर्वरकों, हरी खाद (ढैंचा, ग्वार) व घरेलू-नगरीय अपशिष्ट को खाद के रूप में सुरक्षित उपयोग।
  • ढाल वाले क्षेत्रों में छोटे तालाब, एनीकट, चेक डैम व वाटरशेड बनाकर अतिरिक्त बाढ़ के पानी की गति व मात्रा को नियंत्रित करना, तथा पहले से बह रही मिट्टी को रोकने हेतु आड़ी खाइयाँ (transverse trenches) खोदना।
  • 15 से 25 प्रतिशत या उससे अधिक ढाल वाली भूमि पर कृषि को प्रतिबंधित करना, तथा मरुस्थलीय क्षेत्रों में उड़ती बालू को रोकने हेतु पवन की दिशा में लगभग 1.5 से 2 मीटर ऊँची लोहे की चादरें लगाना।

लवणीयता से प्रभावित खेतों में किसानों को सलाह दी जाती है कि वे ढाल के निचले भाग में जल-निकास नाली बनाएँ ताकि लवण बह जाएँ, मेड़-कूँड (doli-kund) पद्धति की मध्य ढाल पर बुवाई करें, तथा सरसों, तारामीरा व जौ जैसी लवण-सहिष्णु फसलें लगभग 25 प्रतिशत अतिरिक्त बीज व खाद के साथ बोएँ। क्षारीय मृदा के लिए गहरी ग्रीष्मकालीन जुताई, मिट्टी जाँच के आधार पर मई-जून में जिप्सम का प्रयोग, सोडियम को बहाने हेतु वर्षा जल को खेत में रोकना, तथा खरीफ ऋतु में ढैंचा की हरी खाद अपनाना अनुशंसित उपाय हैं। दीर्घकालिक उर्वरता बनाए रखने के लिए लाभदायक सूक्ष्मजीवों व केंचुओं की सुरक्षा को भी आवश्यक माना गया है।

स्मरण ट्रिक — राजस्थान की 8 प्रमुख मृदाएँ (क्रमानुसार)

यह वाक्य याद रखें:

"रेतीली धरती लवणीय हुई, लाल-काली मिश्रित मिट्टी में जलोढ़, भूरी और सीरोजम मिली।"

डिकोड (वाक्य का हर शब्द सीधे मृदा-प्रकार का नाम है, क्रम वही है जो इस गाइड में दिया गया है — इसलिए यह गलत भ्रमित नहीं करेगा):

  1. रेतीली → रेतीली/बलुई (मरुस्थलीय) मृदा — सबसे बड़े क्षेत्रफल पर
  2. लवणीय → लवणीय मृदा — लवणीय झीलों के आसपास
  3. लाल → लाल व लाल दोमट (लैटेराइट) मृदा — उदयपुर, डूँगरपुर क्षेत्र
  4. काली → काली मृदा (रेगुर) — कोटा, बूँदी, बाराँ, झालावाड़, सवाई माधोपुर
  5. मिश्रित → मिश्रित लाल व काली मृदा — मालवा पठार का विस्तार
  6. जलोढ़ → जलोढ़ (कछारी) मृदा — राज्य की सर्वाधिक उपजाऊ मृदा
  7. भूरी → भूरी मृदा — बनास नदी के प्रवाह-क्षेत्र में
  8. सीरोजम → सीरोजम (धूसर मरुस्थलीय) मृदा — जोधपुर, पाली, नागौर क्षेत्र
कन्फ्यूज़न बस्टर — लवणीय (Saline) बनाम क्षारीय (Alkaline) मृदा
लवणीय मृदाक्षारीय मृदा
कैल्सियम, मैग्नीशियम व पोटाशियम के अतिरिक्त घुलनशील क्लोराइड व सल्फेट लवण सतह के पास जमा होते हैं, जिससे बीज का अंकुरण रुक जाता है।अतिरिक्त विनिमेय सोडियम मिट्टी की भौतिक संरचना को बिगाड़ देता है और जड़ क्षेत्र में वायु संचार को अवरुद्ध कर देता है।
पहचान: सूखने पर सफेद परत (crust), जल का तेज़ रिसाव, खारा भूजल, फसल की छोटी व असमान वृद्धि।पहचान: गीली होने पर काली दिखती है, सूखने पर बारीक दरारें, केवल दूब घास, धाक व मदार जैसे लवण-सहिष्णु पौधे उगते हैं।
सुधार: निचले ढाल पर जल-निकास नाली, मेड़-कूँड की मध्य ढाल पर बुवाई, सरसों/तारामीरा/जौ (लगभग 25% अतिरिक्त बीज-खाद के साथ)।सुधार: गहरी ग्रीष्मकालीन जुताई, मिट्टी-जाँच के बाद मई-जून में जिप्सम, सोडियम बहाने हेतु वर्षा जल रोकना, खरीफ में ढैंचा की हरी खाद।

याद रखने की कुंजी: लवणीय मृदा सूखने पर सफेद दिखती है (नमक जैसी), जबकि क्षारीय मृदा गीली होने पर काली दिखती है — रंग ही दोनों को अलग करने की सबसे आसान पहचान है।

जल अपरदन के तीन रूप — योजनाबद्ध चित्र / Three Forms of Water Erosion — Schematic
योजनाबद्ध चित्र, वास्तविक मानचित्र नहीं / Schematic diagram, not to scaleपरतदार अपरदन (Sheet Erosion): तेज़ वर्षा के बाद समतल/हल्की ढाल वाली भूमि की ऊपरी उपजाऊ परत समान रूप से बह जाती है — सबसे पोषक-तत्व-युक्त मिट्टी पहले हटती है।बहकर हटती ऊपरी उपजाऊ परत / Top fertile layer washed away uniformlyवर्षा जल प्रवाह / rainfall runoffपरतदार / Sheetरिल अपरदन (Rill Erosion): प्रारंभिक व सबसे छोटी अवस्था — बहता जल मिट्टी की सतह पर उँगली जैसी महीन नालियाँ बनाता है।रिल / Rillअवनालिका अपरदन (Gully Erosion): ढाल वाली भूमि पर तेज़ वर्षा में गहरी नालियाँ बन जाती हैं, खेत टुकड़ों में बँट जाता है — इसे 'बीहड़/बैडलैंड' भूमि कहा जाता है। सर्वाधिक विस्तार धौलपुर में, इसके बाद सवाई माधोपुर व करौली में।गहरी अवनालिका कटाव — बीहड़/बैडलैंड भूमि / Deep gully cut — badland topographyअवनालिका / Gullyयोजनाबद्ध चित्र है, दूरी/आकार वास्तविक अनुपात में नहीं / Schematic only — not to scale

त्वरित तथ्य

  • रेतीली/मरुस्थलीय मृदा राजस्थान के सबसे बड़े क्षेत्रफल पर फैली है, जो जैसलमेर, बाड़मेर, बीकानेर, जोधपुर व चूरू जैसे जिलों में प्रमुख है।
  • कोटा, बूँदी, बाराँ, झालावाड़ व सवाई माधोपुर में ज्वालामुखी बेसाल्ट के अपक्षय से बनी काली मृदा (रेगुर) को 'स्वतः जुताई वाली मृदा' कहा जाता है क्योंकि शुष्क ऋतु में इसमें चौड़ी दरारें पड़ जाती हैं।
  • पूर्वी मैदान (भरतपुर, अलवर, धौलपुर, जयपुर) की जलोढ़ मृदा राजस्थान की सर्वाधिक उपजाऊ मृदा है, जबकि सांभर, पचपद्रा व डीडवाना झीलों के आसपास की मृदा 'सोलनचॉक मृदा' कहलाती है।
  • अवनालिका अपरदन चम्बल नदी के किनारे सर्वाधिक होता है, जिसमें धौलपुर जिले में बीहड़ भूमि का सबसे बड़ा विस्तार है, इसके बाद सवाई माधोपुर व करौली का स्थान है।

त्वरित रिवीजन — One-Liners

  • थार मरुस्थल विश्व का 9वाँ सबसे बड़ा मरुस्थल है; यह राजस्थान के पश्चिमी भाग में है।
  • चंबल नदी राजस्थान की एकमात्र बारहमासी नदी है; यह यमुना में मिलती है।
  • भारत में दक्षिण-पश्चिम मानसून जून में केरल पहुंचता है; यह अरब सागर और बंगाल की खाड़ी दोनों से आता है।
  • कर्क रेखा (23.5°N) राजस्थान के बांसवाड़ा जिले से गुजरती है।
  • मकराना (नागौर) का सफेद संगमरमर ताजमहल में प्रयुक्त।
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राजस्थान में मृदा अपरदन के कारण बनी बीहड़ (बैडलैंड) भूमि का सबसे अधिक विस्तार किस जिले में है?

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निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: कथन-A: रेगुर (काली) मृदा प्राचीन ज्वालामुखी बेसाल्ट चट्टानों के अपक्षय से बनती है और शुष्क ऋतु में इसमें चौड़ी-गहरी दरारें पड़ने के कारण इसे 'स्वतः जुताई वाली मृदा' कहा जाता है। कथन-B: मिश्रित लाल-काली मृदा मालवा के पठार की काली मृदा का राजस्थान में विस्तार है तथा यह उदयपुर, डूँगरपुर व बाँसवाड़ा जिलों में पाई जाती है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

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सूची-I (मृदा प्रकार) को सूची-II (विशिष्ट पहचान) से सुमेलित कीजिए तथा नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए: सूची-I: (A) काली मृदा (B) जलोढ़ मृदा (C) लाल दोमट मृदा (D) सीरोजम मृदा सूची-II: (i) कोटा, बूँदी, बाराँ, झालावाड़, सवाई माधोपुर में मिलती है, स्वतः जुताई वाली (ii) राज्य की सर्वाधिक उपजाऊ मृदा, पूर्वी मैदान में मिलती है (iii) उदयपुर, डूँगरपुर, बाँसवाड़ा में मिलती है, लौह-ऑक्साइड के कारण लाल रंग (iv) जोधपुर, पाली, नागौर आदि में मिलती है, पीली-धूसर रंग

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मृदा अपरदन से बनी बीहड़ (बैडलैंड) भूमि के विस्तार के आधार पर निम्नलिखित जिलों को घटते क्रम (सर्वाधिक से न्यूनतम) में व्यवस्थित कीजिए: 1. सवाई माधोपुर 2. धौलपुर 3. करौली

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