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राजस्थान का थार मरुस्थल — भू-आकृतियाँ, बालुका स्तूप एवं विशेषताएँ

Thar Desert of Rajasthan — Landforms, Sand Dunes & Features

13 मिनटintermediate✓ अपडेटेड: जुलाई 2026· Geography of World and India

उत्तर-पश्चिमी मरुस्थलीय प्रदेश का परिचय

राजस्थान का उत्तर-पश्चिमी हिस्सा भारत के सबसे विशिष्ट शुष्क भू-भागों में गिना जाता है और राज्य के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का लगभग 61.11% भाग घेरता है - यानी राज्य के लगभग तीन-पाँचवें हिस्से पर मरुस्थल फैला है। 29 दिसंबर 2024 को हुए जिलों के पुनर्गठन के बाद यह मरुस्थलीय पट्टी अब 16 जिलों में फैली है - जैसलमेर, बाड़मेर, बालोतरा, बीकानेर, श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़, फलौदी, जोधपुर, नागौर, डीडवाना-कुचामन, पाली, चूरू, सीकर, झुंझुनूं, जालौर और ब्यावर।

यह प्रदेश लगभग 24°30' से 30°12' उत्तरी अक्षांश तथा 69°30' से 75°40' पूर्वी देशांतर के मध्य विस्तृत है, जो उत्तर-पश्चिम से दक्षिण-पूर्व तक करीब 640 किमी लंबा तथा लगभग 300 किमी चौड़ा है, और इसका क्षेत्रफल लगभग 2,09,000 वर्ग किमी आँका जाता है (कुछ पुराने स्रोतों में यह 1,75,000 वर्ग किमी बताया गया है)। राज्य की लगभग 40% जनसंख्या इसी शुष्क पट्टी में रहती है, जहाँ वार्षिक वर्षा 20 से 50 सेमी के बीच झूलती रहती है और तापमान गर्मियों में 49° सेल्सियस तक तो सर्दियों में -3° सेल्सियस तक गिर जाता है। परंपरागत रूप से यहाँ बाजरा, मोठ व ग्वार की खेती होती थी, हालाँकि इंदिरा गांधी नहर आने के बाद फसल विविधता काफी बढ़ गई है। यहाँ की प्रमुख वनस्पति में बबूल, फोग, खेजड़ा, कैर, बेर, थोर, कैक्टस व सेवण घास शामिल हैं, जबकि नमक साँभर, पचपदरा, डीडवाना व लूणकरणसर की खारे पानी की झीलों से प्राप्त होता है।

प्राचीन टेथिस सागर और मरुस्थल का खारापन

यह मरुस्थल कभी समुद्र की तली हुआ करता था। जैसलमेर क्षेत्र की चट्टानों में मिले समुद्री जीवाश्म बताते हैं कि अपर टर्शियरी काल तक टेथिस सागर इस पश्चिमी भाग को ढके हुए था, जब तक भूगर्भिक हलचलों ने इसे पीछे नहीं धकेल दिया। सागर के पीछे हटने के बाद उजागर हुई तली सिकुड़ते हुए ऊपर उठी, जिससे आज का यह मरुस्थलीय भू-भाग बना - यानी यह वास्तव में टेथिस सागर की पुरानी तली ही है।

इसी समुद्री विरासत के कारण यहाँ इतनी सारी खारी झीलें मिलती हैं। गहराई में मौजूद माइकायुक्त नमकीन चट्टानों से केशाकर्षण (कैपिलैरिटी) की प्रक्रिया द्वारा नमक सतह पर खिंच आता है, जबकि नदियाँ भी नमक के कण बहाकर लाती हैं और उन्हें जमा करती रहती हैं। इन्हीं टर्शियरी कालीन चट्टानों के कारण बाड़मेर व जैसलमेर में तेल व प्राकृतिक गैस के विशाल भंडार मिलते हैं - भूवैज्ञानिकों के अनुसार टर्शियरी काल की चट्टानें ही विश्व भर में खनिज तेल व गैस की सबसे समृद्ध स्रोत मानी जाती हैं।

मरुस्थलीय प्रदेश की सीमाएँ

पाकिस्तान से लगी अंतरराष्ट्रीय सीमा रेखा - रेडक्लिफ लाइन - इस पट्टी की पश्चिमी सीमा बनाती है। पूर्व में भारत की महान जल विभाजक रेखा कही जाने वाली अरावली पर्वतमाला तथा 50 सेमी वार्षिक वर्षा रेखा मिलकर राज्य को दो अलग-अलग जलवायवीय भागों में बाँटती हैं। दक्षिण में गुजरात राज्य स्थित है, जबकि उत्तर में पंजाब व हरियाणा इस पट्टी की सीमा बनाते हैं।

मरुस्थलीय प्रदेश की प्रमुख विशेषताएँ

अरावली के उत्तर-पश्चिम व पश्चिम में स्थित होने के कारण यह भाग वृष्टि छाया प्रदेश में आता है, इसलिए दक्षिण-पश्चिमी मानसून की दोनों शाखाएँ - अरब सागर व बंगाल की खाड़ी - यहाँ बहुत कम वर्षा करती हैं, जिससे औसत वार्षिक वर्षा केवल 20-50 सेमी रह जाती है। यह भाग पश्चिमी एशिया के फिलीस्तीन, अरब व ईरान से होते हुए भारत तक फैले विशाल पेलियोआर्कटिक अफ्रीका मरुस्थल पट्टी का ही विस्तार है। भूमि का सामान्य ढाल उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम की ओर है, तथा ऊँचाई दक्षिण में लगभग 200 मीटर से उत्तर में 300 मीटर तक बदलती है। रेत के विशाल बालुका स्तूप इस भू-दृश्य की पहचान हैं, जिनके नीचे लिग्नाइट, खनिज तेल, प्राकृतिक गैस व लाइम स्टोन के भंडार छिपे हैं। इयोसीन-प्लीस्टोसीन काल के टेथिस सागर के अवशेष होने के कारण यहाँ खारे पानी की झीलें बिखरी पड़ी हैं, और यह भू-भाग गुजरात, राजस्थान, हरियाणा व पंजाब - चार राज्यों में फैला हुआ है। अध्ययन की दृष्टि से इस प्रदेश को दो उप-भागों में बाँटा जाता है - रेतीला शुष्क मैदान व अर्द्धशुष्क मैदान - जिन्हें 25 सेमी सम वर्षा रेखा अलग करती है।

मापदंडविवरण
क्षेत्रफलराज्य का लगभग 61.11% भाग (लगभग 2,09,000 वर्ग किमी; कुछ स्रोतों में 1,75,000 वर्ग किमी); लंबाई लगभग 640 किमी, चौड़ाई लगभग 300 किमी
जनसंख्याराज्य की कुल जनसंख्या का लगभग 40%
वर्षावार्षिक 20-50 सेमी - इसीलिए इसे 'शुष्क बालू का मैदान' भी कहते हैं
तापमानगर्मियों में 49° सेल्सियस तक; सर्दियों में -3° सेल्सियस तक
जलवायु व मिट्टीअत्यंत विषम शुष्क जलवायु व रेतीली-बलुई मिट्टी
मुख्य फसलेंपरंपरागत रूप से बाजरा, मोठ, ग्वार; इंदिरा गांधी नहर के बाद विविध फसलें
वनस्पतिबबूल, फोग, खेजड़ा, कैर, बेर, थोर, कैक्टस, सेवण घास
नमक स्रोतसाँभर, पचपदरा, डीडवाना, लूणकरणसर

महान भारतीय मरुस्थल - रेतीला शुष्क मैदान

यह पश्चिमी रेतीला शुष्क मैदान, जिसे महान मरुस्थल भी कहा जाता है, में वार्षिक वर्षा मुश्किल से 20 सेमी होती है। इसमें बाड़मेर, बालोतरा, जैसलमेर, बीकानेर, श्रीगंगानगर व फलौदी जिले पूरी तरह तथा जोधपुर व चूरू का पश्चिमी भाग शामिल है। इसका अधिकांश हिस्सा बालुका स्तूपों से ढका है, जो कच्छ (गुजरात) से लेकर हरियाणा व पंजाब तक पाकिस्तान सीमा के सहारे-सहारे फैले हैं, तथा यह 25 सेमी सम वर्षा रेखा के पश्चिम व रेडक्लिफ रेखा के पूर्व में स्थित है। इसे आगे दो भागों में बाँटा जाता है - बालुकास्तूप युक्त प्रदेश व बालुकास्तूप मुक्त (रहित) क्षेत्र।

बालुकास्तूप युक्त प्रदेश

यहाँ रेत के विशाल टीले तेज हवाओं के साथ लगातार अपनी जगह बदलते रहते हैं - जो हवा के अपरदन तथा हवा द्वारा रेत के निक्षेपण की संयुक्त प्रक्रिया का परिणाम हैं। इन स्तूपों का स्थानांतरण मार्च से जुलाई के बीच सर्वाधिक होता है। यह पट्टी कच्छ की खाड़ी से पंजाब तक सीमा के सहारे फैली है, और महान मरुस्थल के लगभग 58.5% (करीब 60%) भू-भाग पर ये स्तूप फैले हैं। दो महत्वपूर्ण शब्द याद रखने योग्य हैं - पवनानुवर्ती ढाल वह मंद ढाल है जो हवा की दिशा की ओर होता है, जबकि फिसल फलक (विपरीत ढाल) हवा की उल्टी दिशा वाला तीव्र ढाल है।

बालुका स्तूपों के प्रकार

स्तूप प्रकारप्रमुख विशेषताएँ व स्थान
अनुदैर्ध्य/रेखीय (सीफ)मुख्यतः जैसलमेर, जोधपुर, फलौदी व बाड़मेर में; हवा की दिशा के समानांतर पंक्तियाँ; ऊँचाई 10-60 मी.; तीन उपप्रकार - सीफ, वनस्पतियुक्त रेखीय व पवनानुवर्ती रेखीय; प्रायः किसी एकाकी पहाड़ी के पार्श्व पर विकसित; उत्तर-पूर्वी थार में प्राचीन दृष्ट्वती व साँभर की मेंथा नदी की शुष्क घाटियों में भी ऐसे ही घुमावदार स्तूप मिलते हैं।
बरखान (अर्द्धचन्द्राकार)चूरू (भालेरी-रतनगढ़), जैसलमेर, सीकर (मेंथा घाटी), लूणकरणसर, सूरतगढ़, बाड़मेर, बालोतरा व ओसियाँ में; गतिशील, रंध्रयुक्त, शृंखलाबद्ध, प्रायः वनस्पतिविहीन; पवनानुवर्ती भुजा लंबी व पूँछनुमा, शीर्ष अर्द्धचन्द्राकार, अंतिम छोर समतल-उपजाऊ गर्तनुमा; दोनों भुजाओं के बीच वर्षा जल भरकर 'थली' या 'ढण्ड' बनता है; दिशा मार्च-सितंबर की दक्षिण-पश्चिमी पवनों के अनुरूप; ऊँचाई 10-20 मी., चौड़ाई 100-200 मी., बीच में सर्वाधिक ऊँचे; आदर्श उदाहरण भालेरी-रतनगढ़, पश्चिमी जोधपुर, देशनोक, झुंझुनूं तथा जायल व डीडवाना-कुचामन; पवनमुखी ढाल मंद, पवनाभिमुखी ढाल तीव्र।
अनुप्रस्थदीर्घकाल तक एक ही दिशा में बहने वाली हवा के लंबवत बनते हैं; अर्द्धशुष्क भागों में अपेक्षाकृत स्थिर; पूर्वी व उत्तरी भागों में अधिक; अर्द्धचन्द्राकार भी हो सकते हैं; पूगल, सूरतगढ़, रावतसर, चूरू व झुंझुनूं में मिलते हैं; ऊँचाई 10-40 मी., बनावट लहरदार।
परवलयिक (पेराबोलिक)सभी मरुस्थलीय जिलों में; वनस्पति व समतल मैदान के बीच उत्पाटन (deflation) से बनते हैं; हेयरपिन/U-आकार; दक्षिण-पश्चिम में भुजाएँ 3-4 किमी लंबी (शेवरॉन पैटर्न), उत्तर-पूर्व में लगभग 500 मी.; ऊँचाई 10-25 मी.; 'हॉर्न' हवा की विपरीत दिशा में; वनस्पति इन्हें स्थिरता देती है।
ताराबालुका स्तूपविभिन्न दिशाओं से चलने वाली तेज, अनियमित व मिश्रित हवाओं के क्षेत्र में बनते हैं; बहु-नुकीले तारे जैसी आकृति, शृंखलाबद्ध रूप; औसत ऊँचाई 10-25 मी.; मुख्यतः मोहनगढ़, पोकरण व सूरतगढ़ में।
नेटवर्कउत्तर-पूर्वी मरुस्थल में हनुमानगढ़ से हिसार-भिवानी (हरियाणा) तक जुड़े हुए; रेखीय, अनुप्रस्थ व पेराबोलिक स्तूपों के पार्श्व व बीच के क्षेत्रों में बनते हैं; औसत ऊँचाई 8-12 मी.
अवरोधीकिसी अवरोध के दोनों ओर (पवनानुमुखी व पवनविमुखी) रेत जमने से बनते हैं, जैसे बूढ़ा पुष्कर, नाग पहाड़, सीकर, कुचामन (इन्हें अवशिष्ट/जीवाश्मयुक्त अवरोधी स्तूप भी कहते हैं); सघन वनस्पति क्षेत्रों में स्थिर रहते हैं; पूर्वी अरावली के चाकसू, बगरू आदि में भी मिलते हैं; ऊँचाई 10-50 मी.; बालू सघन, चूनायुक्त व ऑक्सीकृत।
श्रब कापीस (नेबखा)छोटी झाड़ियों व घास के झुंडों के इर्द-गिर्द रेत जमने से बनते हैं; मरुस्थल के लगभग सभी हिस्सों में; औसत ऊँचाई 5 मी. से कम; अस्थिर, बिना निश्चित आकार के।
प्रतिध्वनि (Echo)सम (जैसलमेर) क्षेत्र में; ऊँचाई के कारण आवाज गूँजती है; ऊँचाई 10-20 मी.; मूलतः बरखान स्तूप ही हैं।

बालुकास्तूप मुक्त क्षेत्र

रेतीले शुष्क मैदान का पूर्वी हिस्सा पूरी तरह बालुका स्तूपों से मुक्त है। फलौदी जिला व पोकरण तहसील का कुछ हिस्सा जैसलमेर व बीकानेर के बीच प्रमुख स्तूप-मुक्त क्षेत्र बनाता है, जिसे जैसलमेर-बाड़मेर का चट्टानी प्रदेश भी कहा जाता है। यहाँ आधार चट्टानें भू-सतह पर खुली अवस्था में हैं, जिनमें जुरैसिक काल की परतदार चट्टानों के साथ टर्शियरी व प्लीस्टोसीन कालीन चट्टानें भी हैं; चूना पत्थर व बलुआ पत्थर मुख्य हैं। जैसलमेर शहर स्वयं जुरैसिक काल की बलुआ पत्थर से बनी चट्टानी मैदान पर बसा है, जिसमें जुरैसिक व मायोसीन काल की वनस्पतियों के जीवाश्म मिलते हैं - राष्ट्रीय मरुउद्यान में स्थित आकल वुड फॉसिल पार्क इसका अनूठा उदाहरण है, तथा कुलधरा गाँव में मछली के जीवाश्म मिले हैं।

इन अवसादी चट्टानी परतों में भूमिगत जल का विशाल भंडार भी है; जैसलमेर में मोहनगढ़ से पोकरण तक फैली लाठी सीरीज इसका सबसे अच्छा उदाहरण है, जहाँ का चांदन नलकूप 'थार का घड़ा' कहलाता है। यहाँ सेवण-लीलौण घास (लेसीयूरस सिंडिकस) पाई जाती है। इन्हीं टर्शियरी चट्टानों के कारण गुढ़ामालानी (बाड़मेर), बायतु (बालोतरा) व जैसलमेर क्षेत्र में तेल व गैस मिलते हैं। महान मरुस्थल के लगभग 41.5% (करीब 40%) भाग को स्तूप-मुक्त माना जाता है। स्थानीय भाषा में चट्टानी/पथरीली मरुभूमि को 'हम्मादा' (पोकरण-फलौदी-बालोतरा के बीच) तथा मिश्रित प्रकार की मरुभूमि को 'रैग' कहते हैं।

लघु मरुस्थल और रन

कच्छ के रन से शुरू होकर बीकानेर की महान मरुभूमि तक - यानी पश्चिमी महान मरुस्थल के पूर्वी हिस्से को लघु मरुस्थल कहा जाता है। इसके स्तूपों के बीच-बीच निम्न भूमि पाई जाती है, जहाँ वर्षा जल भरने से अस्थायी प्लाया झीलें व दलदल बनते हैं, जिन्हें 'रन' कहा जाता है। प्रमुख रन हैं - बरमसर, बाप, थोब, कानोड़, पोकरण, लावा व भाकरी।

अर्द्धशुष्क मैदान (राजस्थान बांगड़)

महान शुष्क रेतीले प्रदेश के पूर्व तथा अरावली पहाड़ियों के पश्चिम में स्थित अर्द्धशुष्क मैदान, जिसे राजस्थान बांगड़ भी कहते हैं, मुख्यतः लूनी नदी के जल प्रवाह क्षेत्र में स्थित है - 25 सेमी सम वर्षा रेखा (पश्चिम) व अरावली पर्वतमाला (पूर्व) के बीच। पूरा क्षेत्र आंतरिक जल प्रवाह वाला है तथा शुष्क व अर्द्धशुष्क जलवायु के बीच की संक्रमणीय जलवायु रखता है, और इसे चार उप-भागों में समझना उपयोगी है - उत्तर में घग्घर का मैदान, उत्तर-पूर्व में शेखावाटी का आंतरिक जल प्रवाह क्षेत्र, दक्षिण-पश्चिम में लूनी बेसिन तथा मध्य में नागौरी उच्च भूमि।

घग्घर का मैदान

अर्द्धशुष्क प्रदेश के उत्तरी भाग में स्थित यह मैदान घग्घर, वैदिक सरस्वती, सतलज व चौतांग नदियों की जलोढ़ मिट्टी से बना है, जो क्वाटरनरी काल में हिमालय से निकलकर यहाँ बहती थीं, पर जलवायु परिवर्तन से धीरे-धीरे सूख गईं। यह मैदान मुख्यतः हनुमानगढ़ व श्रीगंगानगर जिलों में फैला है। घग्घर नदी आज भी यहाँ बहती है, जिसे 'मृत नदी' भी कहा जाता है, क्योंकि यह भटनेर के पास रेगिस्तान में लगभग विलुप्त हो जाती है; वर्षा ऋतु में इसमें बाढ़ आने से हनुमानगढ़ जलमग्न हो जाता है और पानी सूरतगढ़-अनूपगढ़ होते हुए पाकिस्तान के फोर्ट अब्बास तक पहुँच जाता है। पौराणिक रूप से यह लुप्त सरस्वती नदी की सहायक नदी थी, और आज यह अर्द्धशुष्क मैदान की उत्तरी सीमा बनाती है। चलायमान पवनों की अधिकता के कारण श्रीगंगानगर व हनुमानगढ़ में धूलभरी आँधियाँ सबसे अधिक चलती हैं; यहाँ खाद्यान्न उत्पादन भी सर्वाधिक होता है, जिसमें अमेरिकन कपास (नरमा) प्रमुख फसल है, और यह राज्य का सर्वाधिक नहरी सिंचित क्षेत्र भी है। प्राचीन काल में इसे 'यौद्धेय प्रदेश' कहा जाता था; हनुमानगढ़ में घग्घर के तल को स्थानीय रूप से 'नाली' कहते हैं।

लूनी-जवाई (गौड़वाड़) बेसिन

लूनी नदी व उसकी सहायक नदियों के अपवाह क्षेत्र को गौड़वाड़ प्रदेश कहते हैं, जिसमें जोधपुर, जालौर, पाली, बालोतरा व बाड़मेर के क्षेत्र शामिल हैं। यहाँ की जालौर-सिवाना पहाड़ियाँ ग्रेनाइट के लिए प्रसिद्ध हैं, रायोलाइट पहाड़ियाँ गुम्बदाकार/इंसेलबर्ग रूप में हैं, तथा मालानी पहाड़ियाँ व चूने के पत्थर की चट्टानें भी मिलती हैं। बालोतरा के बाद लूनी का पानी नमकयुक्त चट्टानों व मरुस्थली अपवाह तंत्र के कारण खारा हो जाता है। काळाभूरा डूँगर बेसिन की पूर्वी सीमा बनाता है। छप्पन की गोलाकार पहाड़ियों में नाकोड़ा (राजस्थान का मेवानगर) तथा पीपलूद गाँव (पश्चिमी राजस्थान का लघु माउंट आबू) स्थित हैं। यहाँ के प्रमुख बाँधों में जसवंतसागर (पिचियाक बाँध), सरदारसमन्द, जवाई बाँध, हेमावास बाँध, पचपदरा झील व नयागाँव बाँध शामिल हैं।

नागौरी उच्च भूमि

राजस्थान बांगड़ के मध्यवर्ती भाग को नागौरी उच्च भूमि कहा जाता है, जहाँ नमकयुक्त झीलें, आंतरिक जल प्रवाह, प्राचीन चट्टानें व ऊँचा-नीचा धरातल मिलता है। मिट्टी में सोडियम क्लोराइड की अधिकता से भूमि बंजर व रेतीली है। डीडवाना-कुचामन, साँभर व नावा की खारे पानी की झीलों से व्यावसायिक नमक उत्पादन होता है, जो गहराई की माइकायुक्त नमकीन चट्टानों से केशाकर्षण द्वारा सतह पर आता है, और नदियाँ भी हर साल नमक के कण जमा करती रहती हैं। इस भू-भाग की औसत ऊँचाई 300 से 500 मीटर के बीच है। नागौर, डीडवाना-कुचामन व अजमेर जिलों में भूमिगत जल में अधिक फ्लोराइड से 'फ्लोरोसिस' रोग होता है - दाँत पीले पड़ना, हड्डियाँ टेढ़ी होना व पीठ झुक जाना - जिससे जायल से पुष्कर तक की पट्टी 'कूबड़पट्टी' या 'बाँकापट्टी' कहलाती है। नागौर की उच्च भूमि व सरिस्का अभयारण्य (अलवर) में हरे कबूतर (हरियल) पाए जाते हैं, जो कभी जमीन पर पैर नहीं रखते, यद्यपि यह पक्षी मूलतः उत्तर प्रदेश का है। नागौरी उच्च भूमि को आगे मकराना श्रेणी, गोठ मांगलोद श्रेणी व जायल श्रेणी में बाँटा गया है।

शेखावाटी का आंतरिक जल प्रवाह क्षेत्र

बांगड़ प्रदेश के इस भाग में चूरू, सीकर, झुंझुनूं तथा डीडवाना-कुचामन व नागौर के उत्तरी हिस्से शामिल हैं। इसके उत्तर में घग्घर का मैदान, पूर्व में अरावली पर्वतमाला व 50 सेमी सम वर्षा रेखा, तथा पश्चिम में 25 सेमी सम वर्षा रेखा है, जो इसे महान शुष्क मरुस्थल से अलग करती है। यहाँ बरखान प्रकार के बालुका स्तूपों की बहुलता है, और कम वर्षा, स्तूपों की दीवार व बलुई मिट्टी के कारण पूरा क्षेत्र आंतरिक जल प्रवाह वाला है - काँतली, मेंथा, रूपनगढ़, खारी, बाण्डी का नाला व खंडेल जैसी नदियाँ वर्षा ऋतु में या तो किसी झील में मिल जाती हैं या मैदान में विलुप्त हो जाती हैं। जल आपूर्ति के लिए यहाँ 'जोहड़' या 'नाड़ा' नामक कच्चे-पक्के कुएँ बनाए जाते हैं, तथा बालुका स्तूपों के बीच वर्षा जल इकट्ठा होकर 'सर' या 'सरोवर' बनाता है, जैसे मानासर, पूलासर, सालासर, कानासर, जस्सूसर व मलसीसर। इस भू-भाग की औसत ऊँचाई लगभग 450 मीटर है, और इसे पर्वतों से घिरा आंतरिक जल प्रवाह क्षेत्र होने के कारण 'बोल्सोन' भी कहा जाता है।

इंदिरा गांधी नहर - मरुस्थल की जीवन रेखा

इंदिरा गांधी नहर को सही मायने में उत्तर-पश्चिमी शुष्क प्रदेश की मुख्य नहर व जीवन रेखा कहा जाता है। इसके आने के बाद कभी बंजर व रेतीले रहे विशाल भू-भाग धीरे-धीरे हरे-भरे व उपजाऊ हो गए हैं, जिससे परंपरागत बाजरा-मोठ-ग्वार से आगे बढ़कर खेती में विविधता आई है और श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़, बीकानेर तथा जैसलमेर के कुछ हिस्सों जैसे जिलों की अर्थव्यवस्था बदल गई है।

राष्ट्रीय मरु उद्यान

राष्ट्रीय मरु उद्यान (Rashtriya Maru Udyan) राज्य का सबसे बड़ा वन्य जीव अभयारण्य है, जो जैसलमेर व बाड़मेर जिलों में फैला हुआ है। इसके भीतर स्थित आकल वुड फॉसिल पार्क जुरैसिक काल की लकड़ी के जीवाश्मों के लिए प्रसिद्ध है, जो मरुस्थल के प्राचीन समुद्री व वनाच्छादित अतीत की झलक देता है।

थार मरुस्थल की सामान्य विशेषताएँ

'थली' या शुष्क बालू के मैदान के नाम से भी जाना जाने वाला तथा महान भारतीय मरुस्थल कहलाने वाला थार मरुस्थल, जिसका लगभग 62% क्षेत्र अकेले राजस्थान में स्थित है, विश्व का सबसे अधिक आबादी वाला तथा सबसे अधिक जैव विविधता वाला मरुस्थल है - वनस्पति, पशु संपदा व जनसंख्या घनत्व की दृष्टि से यह विश्व के मरुस्थलों में सर्वोत्कृष्ट है। इस समूचे मरुस्थल में बालुका स्तूपों के बीच निम्न भूमि पर वर्षा जल भरने से जगह-जगह अस्थायी प्लाया झीलें व दलदली 'रन' बनते हैं। 50 सेमी सम वर्षा रेखा इसे राज्य के शेष भागों से अलग करती है, तथा रेडक्लिफ रेखा इसकी अंतरराष्ट्रीय पश्चिमी सीमा है।

इस प्रदेश की प्रमुख नदी लूनी है, जो नागपहाड़ (अजमेर) से निकलकर नागौर, ब्यावर, जोधपुर, बालोतरा, बाड़मेर व जालौर से होते हुए अंततः कच्छ के रन (गुजरात) में विलुप्त हो जाती है। पश्चिमी शुष्क मरुस्थल का लगभग 60% भाग बालुका स्तूपों से ढका है, शेष 40% स्तूप-मुक्त है; स्तूपों का अपरदन व स्थानांतरण मार्च से जुलाई तक सर्वाधिक होता है। उत्तर में पंजाब, उत्तर-पूर्व में हरियाणा, पश्चिम में पाकिस्तान तथा दक्षिण में गुजरात इसकी सीमाएँ बनाते हैं, और नागौर, बाड़मेर, जालौर, कुचामन व सीकर जैसी चट्टानी पहाड़ियाँ यहाँ-वहाँ बिखरी हैं।

एक उल्लेखनीय व परीक्षापयोगी तथ्य यह है कि थार विश्व का एकमात्र ऐसा मरुस्थल है, जिसके निर्माण में मुख्य योगदान मानसूनी हवाओं - विशेषतः दक्षिण-पश्चिमी मानसून - का रहा है। यह मरुस्थल भारतीय उपमहाद्वीप के ऋतु चक्र को भी नियंत्रित करता है - ग्रीष्मकाल की तेज गर्मी से यहाँ न्यून वायुदाब केंद्र बनता है, जो दक्षिण-पश्चिमी मानसूनी हवाओं को आकर्षित कर पूरे उपमहाद्वीप में वर्षा कराता है। सघन आबादी, समृद्ध वनस्पति, असाधारण जैव विविधता व विशाल पशुधन संपदा के इसी अनूठे संयोजन के कारण थार विश्व के मरुस्थलों में विख्यात है।

मरुस्थलीय भू-आकृति शब्दावली

शब्दअर्थ
बरखानअर्द्धचन्द्राकार, गतिशील बालुका स्तूप जिसका पवनानुवर्ती ढाल मंद व फिसल फलक तीव्र होता है
सीफ/अनुदैर्ध्य स्तूपहवा की दिशा के समानांतर बनने वाला लंबा, कटकनुमा स्तूप
पवनानुवर्ती ढालहवा की दिशा की ओर वाला स्तूप का मंद ढाल
फिसल फलकहवा की विपरीत दिशा वाला स्तूप का तीव्र ढाल
हम्मादाचट्टानी/पथरीली मरुभूमि, पोकरण-फलौदी-बालोतरा के बीच पाई जाती है
रैगमिश्रित प्रकार की मरुभूमि - आंशिक चट्टानी, आंशिक रेतीली
धरियनजैसलमेर में गतिशील बालुका स्तूपों का स्थानीय नाम
धोरेलहरदार आकृति वाले रेत के बड़े टीले
थली/ढण्डबरखान की दोनों भुजाओं के बीच हवा से बना गर्त, जिसमें वर्षा जल भरने से प्लाया झील बनती है
मरहोथार मरुस्थल में बालुका स्तूपों के मध्यवर्ती-निम्नवर्ती गर्त
रनस्तूपों के बीच निम्न भूमि में वर्षा जल भरने से बनी अस्थायी प्लाया झील/दलदल
खड़ीनजैसलमेर के पालीवाल ब्राह्मणों द्वारा 15वीं सदी में विकसित वर्षा जल संचयन तकनीक, कृषि हेतु उपयोगी
नेबखाझाड़ियों/घास के झुंडों के इर्द-गिर्द बना अस्थिर, निम्न रेत का टीला
स्मरण ट्रिक — थार के 6 प्रमुख बालुका स्तूप

वाक्य याद रखें: "बरखान चाँद बना, सीफ लाइन तना, अनुप्रस्थ आड़ा खड़ा, परवलयिक 'U' मुड़ा, तारा जड़ा चमके, नेबखा झाड़ी में अड़े"

  • बरखान चाँद बना → अर्द्धचन्द्राकार (crescent) स्तूप, मंद पवनमुखी व तीव्र पवनाभिमुखी ढाल
  • सीफ लाइन तना → हवा की दिशा के समानांतर पंक्तिबद्ध अनुदैर्ध्य स्तूप
  • अनुप्रस्थ आड़ा खड़ा → हवा की दिशा के लंबवत बनने वाला स्तूप
  • परवलयिक 'U' मुड़ा → हेयरपिन/U-आकार, भुजाएँ हवा की विपरीत दिशा में
  • तारा जड़ा चमके → बहु-नुकीली तारे जैसी आकृति, अनियमित बहु-दिशीय हवाओं से
  • नेबखा झाड़ी में अड़े → झाड़ी/घास के झुंड के इर्द-गिर्द बनने वाला अस्थिर स्तूप

सत्यापन: हर शब्द उसी स्तूप के आकार/दिशा-सम्बन्धी तथ्य से जुड़ता है जो गाइड में पहले से वर्णित है।

कन्फ्यूज़न बस्टर — बरखान बनाम सीफ (अनुदैर्ध्य) स्तूप
बिंदुबरखानसीफ/अनुदैर्ध्य
आकृतिअर्द्धचन्द्राकार, शीर्ष अर्द्धचन्द्राकारलंबी, समानांतर कटकनुमा पंक्ति
हवा से दिशा-सम्बन्धपवनानुवर्ती भुजा लंबी व पूँछनुमा; मार्च-सितंबर की SW पवनों के अनुरूप उन्मुखहवा की दिशा के समानांतर पंक्तिबद्ध
ऊँचाई10-20 मी. (चौड़ाई 100-200 मी.)10-60 मी.
प्रमुख स्थानचूरू (भालेरी-रतनगढ़), जैसलमेर, सीकर, लूणकरणसर, सूरतगढ़, बाड़मेर, बालोतरा, ओसियाँजैसलमेर, जोधपुर, फलौदी, बाड़मेर
विशेषभुजाओं के बीच गर्त में वर्षा जल भरकर 'थली'/'ढण्ड' बनता हैतीन उपप्रकार - सीफ, वनस्पतियुक्त रेखीय, पवनानुवर्ती रेखीय

याद रखें: बरखान का 'चाँद' आकार व छोटी ऊँचाई (अधिकतम 20 मी.) परीक्षा में सीफ के लंबे, समानांतर, ऊँचे (अधिकतम 60 मी.) कटकों से अलग पहचानें - दोनों को घुमाकर पूछा जाना आम गलती है।

Schematic diagram (not to scale) contrasting Barchan and Sief/Longitudinal dune shapesSchematic only — not to scaleBarchan (crescent)Wind direction approaching the barchan duneWind arrow headBarchan dune: crescent shape, gentle windward slope, steep leeward slip face, height 10-20 m, trailing arms point downwindgentle windward slopesteep leeward slip faceSief / LongitudinalWind direction blowing parallel to the ridgeWind arrow headSief/Longitudinal dune: long parallel ridge aligned with wind direction, height 10-60 mRidge crest running parallel to the windridge parallel to wind, 10-60 m highHeight 10-20 mHeight 10-60 m

त्वरित तथ्य

  • राजस्थान का उत्तर-पश्चिमी मरुस्थल राज्य के क्षेत्रफल का लगभग 61.11% भाग घेरता है तथा 16 जिलों में फैला है, जिसकी पश्चिमी सीमा रेडक्लिफ रेखा तथा पूर्वी सीमा अरावली पर्वतमाला व 50 सेमी सम वर्षा रेखा बनाती है।
  • थार विश्व का एकमात्र ऐसा मरुस्थल है, जिसका निर्माण मुख्यतः दक्षिण-पश्चिमी मानसूनी हवाओं से हुआ है; संपूर्ण थार मरुस्थल का लगभग 62% भाग राजस्थान में स्थित है।
  • महान भारतीय मरुस्थल के लगभग 58.5% (करीब 60%) भाग पर बालुका स्तूप (बरखान, अनुदैर्ध्य/सीफ, अनुप्रस्थ, परवलयिक, ताराबालुका, नेटवर्क, अवरोधी व श्रब कापीस/नेबखा प्रकार) फैले हैं, जबकि लगभग 41.5% (करीब 40%) भाग बालुकास्तूप-मुक्त चट्टानी क्षेत्र है।
  • इंदिरा गांधी नहर उत्तर-पश्चिमी शुष्क प्रदेश की जीवन रेखा है, तथा जैसलमेर-बाड़मेर में फैला राष्ट्रीय मरु उद्यान - जहाँ आकल वुड फॉसिल पार्क स्थित है - राजस्थान का सबसे बड़ा वन्य जीव अभयारण्य है।

त्वरित रिवीजन — One-Liners

  • थार मरुस्थल विश्व का 9वाँ सबसे बड़ा मरुस्थल है; यह राजस्थान के पश्चिमी भाग में है।
  • चंबल नदी राजस्थान की एकमात्र बारहमासी नदी है; यह यमुना में मिलती है।
  • भारत में दक्षिण-पश्चिम मानसून जून में केरल पहुंचता है; यह अरब सागर और बंगाल की खाड़ी दोनों से आता है।
  • कर्क रेखा (23.5°N) राजस्थान के बांसवाड़ा जिले से गुजरती है।
  • मकराना (नागौर) का सफेद संगमरमर ताजमहल में प्रयुक्त।
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✍️ 5 सवाल हल करें

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1

राजस्थान के मरुस्थलीय प्रदेश में रेतीले शुष्क मैदान (महान मरुस्थल) को अर्द्धशुष्क मैदान (राजस्थान बांगड़) से कौन-सी सम वर्षा रेखा अलग करती है?

2

आकल वुड फॉसिल पार्क, जो राष्ट्रीय मरु उद्यान के अंतर्गत आता है, किस जिले में स्थित है?

3

निम्नलिखित कथनों पर विचार करें: कथन I: बरखान स्तूप अर्द्धचन्द्राकार होते हैं, जिनका पवनमुखी ढाल मंद तथा पवनाभिमुखी (फिसल फलक) ढाल तीव्र होता है। कथन II: सीफ (अनुदैर्ध्य) स्तूप हवा की दिशा के समानांतर पंक्तियों में बनते हैं। उपर्युक्त कथनों के संदर्भ में सही विकल्प चुनिए:

4

सूची-I (बालुका स्तूप प्रकार) को सूची-II (प्रमुख स्थान) से सुमेलित कीजिए और नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए: सूची-I A. ताराबालुका स्तूप B. नेटवर्क स्तूप C. प्रतिध्वनि (इको) स्तूप D. अवरोधी स्तूप सूची-II 1. मोहनगढ़, पोकरण, सूरतगढ़ 2. हनुमानगढ़ से हिसार-भिवानी (हरियाणा) 3. सम (जैसलमेर) 4. बूढ़ा पुष्कर, नाग पहाड़

5

निम्नलिखित में से कौन-सा थार मरुस्थल के बालुका स्तूपों के बीच बनने वाले प्रमुख 'रन' में से एक नहीं है?

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