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राजस्थान का भौतिक स्वरूप — भूगर्भिक संरचना एवं भौतिक विभाजन

Physiography of Rajasthan — Geological Structure & Physical Divisions

9 मिनटintermediate✓ अपडेटेड: जुलाई 2026· Geography of World and India

राजस्थान के भौतिक आधार को समझना

राजस्थान पृथ्वी की सतह के सबसे प्राचीन भू-खंडों में से एक पर बसा है, और इसका आज का स्वरूप — जहाँ एक ऊबड़-खाबड़ पर्वत श्रृंखला रेतीले पश्चिम को उपजाऊ पूर्व से अलग करती है — दरअसल अरबों वर्ष पुरानी प्रक्रियाओं का ही दृश्य परिणाम है। हिमालय के अस्तित्व में आने से भी बहुत पहले, पृथ्वी की भूपर्पटी दो विशाल भूखंडों में बंटी थी — उत्तर में अंगारालैंड और दक्षिण में गोंडवाना लैंड — जिनके बीच उथला टेथिस सागर फैला हुआ था। राजस्थान की कहानी इन दोनों से जुड़ी है: इसका उत्तर-पश्चिमी मरुस्थल और पूर्वी मैदान मूलतः टेथिस सागर के बेसिन के भरे हुए अवशेष हैं, जबकि अरावली पर्वत श्रृंखला और दक्षिण-पूर्व का हाड़ौती पठार अपनी उत्पत्ति गोंडवाना लैंड से मानते हैं। यही दोहरी उत्पत्ति है जिसके कारण भूवैज्ञानिक राजस्थान को एक प्राकृतिक प्रयोगशाला मानते हैं — बहुत कम भारतीय राज्यों में आद्य महाकल्प (आर्कियन) से लेकर चतुर्थक कल्प (क्वार्टर्नरी) तक लगभग हर भूगर्भिक युग की चट्टानें एक ही सीमा के भीतर मिलती हैं। इस जटिल शैल-अभिलेख का पहला व्यवस्थित सर्वेक्षण भूवैज्ञानिक ए.एम. हैरोन के नाम दर्ज है, जिनके बीसवीं सदी के आरंभिक अध्ययन आज भी राज्य के शैल समूहों के नामकरण और वर्गीकरण का आधार बने हुए हैं।

भूगर्भिक काल-यात्रा: राजस्थान के प्रमुख शैल समूह

भीलवाड़ा सुपर समूह — सबसे प्राचीन आधार

पूर्वी राजस्थान के अधिकांश भाग के नीचे की आधार शैलें भीलवाड़ा सुपर समूह से संबंधित हैं, जिनमें बुन्देलखण्ड नीस व पट्टित नीस शामिल हैं — ये राज्य में मिलने वाली सबसे प्राचीन चट्टानों में गिनी जाती हैं। यह पट्टी पूर्वी राजस्थान में लगभग उत्तर से दक्षिण दिशा में फैली है, जिसमें ग्रेनाइट का बड़ा हिस्सा दिखाई देता है। नीस, जो आद्य महाकल्प (आर्कियन युग) की कायांतरित चट्टान है, विशेष रूप से उदयपुर व चित्तौड़गढ़ के आसपास तथा शेष दक्षिणी राजस्थान में फैली मिलती है।

अरावली सुपर समूह और सीमा भ्रंश (Great Boundary Fault)

भीलवाड़ा शैलों के ऊपर अरावली सुपर समूह स्थित है — मुड़ी हुई, कायांतरित शैलें जिनमें क्वार्टजाइट, फाइलाइट, डोलोमाइट, संगुटिकाश्म, चूना पत्थर व मिश्रित नीस प्रधानता से पाए जाते हैं। अलवर, अजमेर व उदयपुर जैसे जिलों में शिष्ट व मिश्रित नीस के साथ चूना पत्थर मिलता है, यहाँ तक कि सवाई माधोपुर के आसपास का बलुआ पत्थर भी इसी सिस्टम से जोड़ा जाता है। संरचना के आधार पर भूवैज्ञानिक अरावली शैलों को दो इकाइयों — झाड़ोल समूह व उदयपुर समूह — में बाँटते हैं। अरावली श्रृंखला के मध्य से गुजरने वाली एक विशाल वलन (समभिनति) दिल्ली सुपर ग्रुप, अरावली सुपर ग्रुप व रायलो ग्रुप की शैलों को एक साथ ले आती है, और यह वलन इसके पूर्व में स्थित एक बड़े संरचनात्मक भ्रंश — 'विशाल सीमा भ्रंश' या ग्रेट बाउंड्री फॉल्ट — के समानांतर चलती है, जो भारतीय भूविज्ञान की सबसे महत्वपूर्ण भ्रंश रेखाओं में से एक मानी जाती है और प्राचीन अरावली-विन्ध्यन क्षेत्र को नए तलछटी बेसिनों से अलग करती है। चूँकि यहाँ लक्ष्य भूगर्भिक व भौतिक बनावट का समग्र चित्र देना है, अरावली श्रृंखला के आंतरिक विवरण के लिए अलग विस्तृत सामग्री उपलब्ध है।

दिल्ली सुपर समूह — रायलो, अलवर व अजबगढ़

दिल्ली सुपर समूह राजस्थान के एक बड़े भू-भाग में फैला है, जो सैद्धांतिक रूप से उत्तर-पूर्व में दिल्ली से दक्षिण-पश्चिम में गुजरात तक विस्तृत है, और अजमेर व पश्चिमी मेवाड़ में इसकी शैलें ही अरावली की मनोरम पहाड़ियों का निर्माण करती हैं। इसे तीन समूहों में बाँटा गया है: रायलो समूह, जिसमें संगमरमर, चूना पत्थर, संगुटिकाश्म व क्वार्टजाइट प्रचुर मात्रा में मिलते हैं — यहीं से वर्तमान डीडवाना-कुचामन जिले में स्थित प्रसिद्ध मकराना संगमरमर की उत्पत्ति होती है; अलवर समूह, जिसकी चट्टानें अलवर नगर के आसपास की पर्वत श्रृंखलाओं का निर्माण करती हैं; और अजबगढ़ समूह, जिसकी आधार शैल मुख्यतः बायोटाइट शिष्ट है, जिसे पेगमेटाइट व एपेलाइट नामक आग्नेय अंतर्वेधों ने काटा है।

प्री-कैंब्रियन शैलों में समाए खनिज

आर्थिक दृष्टि से आद्य महाकल्प की चट्टानें राज्य में सबसे मूल्यवान हैं, क्योंकि राजस्थान की अधिकांश खनिज संपदा इन्हीं से प्राप्त होती है। मैंगनीज, लौह अयस्क, ताँबा, क्रोमाइट, यूरेनियम, टाइटेनियम, मोनाजाइट, अभ्रक, कोरण्डम, जरकॉन, गार्नेट, एपेटाइट, कायनाइट, ग्रेनाइट, संगमरमर, सिलिमेनाइट व चार्नोकाइट — ये सभी इसी प्राचीन शैल आधार से निकलते हैं, जिसके कारण राजस्थान को अक्सर भारत का 'खनिज भंडार' कहा जाता है।

विन्ध्यन सुपर समूह व मारवाड़ बेसिन (पुराजीव महाकल्प)

पुराजीव महाकल्प की ओर बढ़ें तो विन्ध्यन सुपर समूह मुख्यतः पूर्वी राजस्थान के विन्ध्यन बेसिन में मिलता है, जो उत्तर-पूर्व में करौली-धौलपुर से दक्षिण-पश्चिम में निम्बाहेड़ा व सुकेत तक फैला है — एक ऊबड़-खाबड़, बलुआ पत्थर-प्रधान भू-भाग, जिसे भूवैज्ञानिक पारीख ने 1984 में औपचारिक रूप से 'विन्ध्यन' नाम दिया। पश्चिम की ओर, इसी काल की परंतु विच्छेदित शैलों को मारवाड़ सुपर समूह में रखा गया है, जो जोधपुर से पश्चिम में पोकरण तक तथा उत्तर में बीकानेर-गंगानगर क्षेत्र तक फैला है।

पश्चिमी राजस्थान के मरुस्थलीय बेसिन

पश्चिमी राजस्थान की तलछटी संरचना तीन प्रमुख बेसिनों में संगठित है — मारवाड़ बेसिन, बाड़मेर बेसिन व जैसलमेर बेसिन। विन्ध्यन सुपर समूह के समकालीन शैलों को यहाँ आगे नागौर बेसिन व छोटे बिरमानिया बेसिन में बाँटा गया है, जिनमें से बिरमानिया बेसिन जैसलमेर क्षेत्र के ठीक दक्षिण में स्थित है; इन सभी की शैलों को व्यापक मारवाड़ सुपर समूह में रखा जाता है।

मालानी आग्नेय समूह — ग्रेनाइट व रायोलाइट का क्षेत्र

मारवाड़ बेसिन की शैलों को काटता हुआ एक विशिष्ट आग्नेय समूह पाया जाता है, जिसे मालानी शैल कहते हैं, जो मुख्यतः जालौर, एरिनपुरा व सिवाना क्षेत्र में केंद्रित है, जहाँ ग्रेनाइट व ज्वालामुखीय रायोलाइट की प्रधानता है। इन चट्टानों का जन्म अरावली श्रृंखला के पार्श्वों में हुए भ्रंश से हुआ, जिसने लावा उद्गार की घटनाओं को जन्म दिया। इससे संबंधित एक अन्य इकाई, मालानी श्रेणी, रायोलाइटिक लावा से बनी है जो पुरानी अरावली शिष्ट के ऊपर टिकी है और इसका नाम मालानी स्थान के नाम पर रखा गया है; प्रसिद्ध जालौर, सिवाना व एरिनपुरा ग्रेनाइट सभी इसी परिवार से संबंधित हैं।

हिमयुग के निशान: परमियन-कार्बोनिफेरस हिमानीकरण

पुराजीव महाकल्प के अंतिम चरण में, कार्बोनिफेरस व परमियन काल के दौरान, अरावली क्षेत्र पूर्ण रूप से हिमाच्छादित हो गया था, और इस शीत चरण के शैल बेड आज बाप बोल्डर बेड के रूप में सुरक्षित हैं, जो फलौदी जिले (पूर्व में जोधपुर का भाग) के बाप क्षेत्र में मिलते हैं, तथा जीवाश्मयुक्त भादुरा बालुकाश्म के रूप में, जो बाप व भादुरा के आसपास पाए जाते हैं।

मध्यजीवी महाकल्प — जैसलमेर व बाड़मेर की कहानी

मध्यजीवी महाकल्प की शैलें लगभग पूरी तरह जैसलमेर व बाड़मेर जिलों तक सीमित हैं, जो पुराने मालानी आग्नेय आधार के सीधे ऊपर जमा हुई हैं। यहाँ केवल जुरैसिक व क्रिटेशियस युग की शैलें बनीं, जिनमें जुरैसिक शैलों की प्रधानता विशेष रूप से जैसलमेर के आसपास देखी जाती है। क्रिटेशियस शैलें आबुर, पारवार व फतेहगढ़ श्रेणियों में आती हैं और इनमें बालुकाश्म, फास्फेटिक बालुकाश्म, चूना पत्थर व क्ले शामिल हैं। जुरैसिक शैलों में बेडेसर, बैसाख, जैसलमेर व लाठी श्रेणियाँ शामिल हैं, जो चूना पत्थर, मोटे रवे के जीवाश्मयुक्त बालुकाश्म व संगुटिकाश्म बालुकाश्म से बनी हैं — जैसलमेर के नेशनल पार्क स्थित आकल वुड फॉसिल पार्क में प्रदर्शित जीवाश्म लकड़ी इसी काल की प्रत्यक्ष उपज है। बाड़मेर-जैसलमेर-पलाना-गंगानगर शेल्फ में परतदार क्रम में फैली इन मध्यजीवी शैलों में ही पलाना व कपूरड़ी-जालीपा के लिग्नाइट (खनिज कोयला) भंडार भी मिलते हैं।

नवजीवी महाकल्प — टर्शियरी व क्वार्टर्नरी निक्षेप

भूगर्भिक अभिलेख का सबसे नवीनतम अध्याय, नवजीवी महाकल्प, टर्शियरी व क्वार्टर्नरी कल्पों में बंटा है। टर्शियरी काल की शैलें नागौर, डीडवाना-कुचामन, बीकानेर, जैसलमेर तथा बाड़मेर-बालोतरा क्षेत्र में मिलती हैं, जिनसे नरम बालुकाश्म, जीवाश्मयुक्त चूना पत्थर, बेन्टोनिटिक मृदा, मुल्तानी मिट्टी व लिग्नाइट का निर्माण हुआ — और इन्हीं टर्शियरी चट्टानों के भीतर ही बाड़मेर व जैसलमेर क्षेत्र में राजस्थान के विशाल तेल व गैस भंडार खोजे गए हैं। इसके बाद आने वाला क्वार्टर्नरी काल सबसे नवीनतम है और मानव-उपयोग की दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण भी: नदियों, नालों व हवा द्वारा गढ़े जाने के कारण इसमें संगुटिकाश्म, जलोढ़ मिट्टी व उड़ने वाली रेत का निर्माण हुआ, जो आज राजस्थान में दिखाई देने वाले अधिकांश भू-आकारों का आधार बनाती है।

राजस्थान के भौतिक स्वरूप का वर्गीकरण: तब और अब

वी.सी. मिश्रा का सप्तविभाजन (1968)

राजस्थान को भौतिक प्रदेशों में बाँटने का पहला व्यवस्थित प्रयास प्रो. वी.सी. मिश्रा ने किया, जो नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित उनकी 1968 की पुस्तक 'राजस्थान का भूगोल' में सामने आया। उनकी योजना में सात भौतिक प्रदेश पहचाने गए: पश्चिमी शुष्क प्रदेश (शुष्क मरुस्थलीय मैदान), अर्द्धशुष्क प्रदेश (अरावली के पश्चिम का शुष्क भाग), नहरी क्षेत्र (सिंचित मरुस्थलीय मैदान), अरावली पहाड़ी प्रदेश (स्वयं अरावली की पहाड़ियाँ), पूर्वी कृषि-औद्योगिक प्रदेश (मैदान व पठार का अर्द्धशुष्क क्षेत्र), दक्षिणी-पूर्वी कृषि प्रदेश (विन्ध्यन व लावा पठार क्षेत्र), और चम्बल बीहड़ प्रदेश (चम्बल नदी द्वारा गढ़े गए बीहड़)।

सक्सेना-तिवारी वर्गीकरण (1994)

बाद में एक अधिक विस्तृत योजना हरिमोहन सक्सेना व प्रो. तिवारी ने प्रस्तुत की, जो 1994 में 'राजस्थान का प्रादेशिक भूगोल' पुस्तक में प्रकाशित हुई। इस वर्गीकरण ने साधारण सप्तविभाजन से आगे बढ़कर राज्य के भीतर प्रमुख, गौण, तृतीयक व सूक्ष्म प्रदेशों का एक क्रमबद्ध ढाँचा तैयार किया, जो मिश्रा की पहले की योजना की तुलना में कहीं अधिक बारीक क्षेत्रीय चित्र प्रस्तुत करता है।

राजस्थान के वर्तमान चार भौतिक विभाग

प्रतियोगी परीक्षाओं व सामान्य संदर्भ के लिए, आज राजस्थान के उच्चावच को पुराने वर्गीकरणों के बजाय वर्तमान भू-आकृति व संरचना के आधार पर परंपरागत रूप से चार व्यापक भौतिक विभागों में संगठित किया जाता है:

भौतिक विभागउत्पत्ति कालपूर्वज भू-भागक्षेत्रफल हिस्साजनसंख्या हिस्सा
उत्तर-पश्चिमी मरुस्थलीय प्रदेशप्लीस्टोसीनटेथिस सागर का अवशेष61.11%40%
अरावली पर्वतीय प्रदेशप्री-कैंब्रियनगोंडवाना लैंड का अवशेष9%10%
पूर्वी मैदानी प्रदेशप्लीस्टोसीन (बाद में जलोढ़ से भरा)टेथिस सागर का अवशेष23%39%
दक्षिणी-पूर्वी पठारी प्रदेशक्रिटेशियसगोंडवाना लैंड का अवशेष6.89%11%

इसके पीछे का तर्क ध्यान देने योग्य है: उत्तर-पश्चिमी मरुस्थल व पूर्वी मैदान — दोनों का अस्तित्व टेथिस सागर के हटने व भर जाने का परिणाम है, जबकि अरावली पर्वतीय प्रदेश व दक्षिणी-पूर्वी पठार दोनों प्राचीन गोंडवाना लैंड के टुकड़े हैं। संरचनात्मक दृष्टि से, पूर्वी मैदान भारत के विशाल उत्तरी मैदान का हिस्सा है, और दक्षिणी-पूर्वी पठार (हाड़ौती पठार) भारत के प्रायद्वीपीय पठार का ही विस्तार है।

1. उत्तर-पश्चिमी मरुस्थलीय प्रदेश

राज्य के लगभग 61 प्रतिशत क्षेत्रफल को घेरने के बावजूद यहाँ मात्र लगभग 40 प्रतिशत जनसंख्या ही निवास करती है। यह शुष्क भाग रेतीले शुष्क मैदान व अर्द्धशुष्क रेतीले मैदान में बंटा है। रेतीले शुष्क मैदान में स्वयं बालुकास्तूप-युक्त भाग शामिल है — जिसमें पवनानुवर्ती, बरखान (अर्द्धचन्द्राकार), अनुप्रस्थ, पेरोबोलिक, तारा, नेटवर्क, अवरोधी व शुब-कापीस जैसे स्तूप प्रकार मिलते हैं — साथ ही फलौदी व पोकरण जैसे बालुकास्तूप-मुक्त भाग भी। अर्द्धशुष्क रेतीला मैदान आगे घग्घर के मैदान, लूनी-जवाई बेसिन, नागौरी उच्च भूमि व शेखावाटी के आंतरिक प्रवाह क्षेत्र में विभाजित है। चूँकि मरुस्थलीय प्रदेश का विस्तृत विवरण अन्यत्र अलग से उपलब्ध है, यहाँ इसे केवल चार प्रमुख विभागों में से एक के रूप में पहचानना पर्याप्त है।

2. मध्यवर्ती अरावली पर्वतीय प्रदेश

राज्य के लगभग 9 प्रतिशत क्षेत्रफल व 10 प्रतिशत जनसंख्या को समेटे यह पर्वतीय पट्टी तीन उप-भागों में बंटी है — उत्तर-पूर्वी पहाड़ी प्रदेश, मध्यवर्ती अरावली प्रदेश व दक्षिणी अरावली प्रदेश। मध्यवर्ती अरावली में स्थित मेवाड़ का चट्टानी भाग जरगा चोटी, कुम्भलगढ़, लीलागढ़, नागपानी, कमलनाथ की पहाड़ी, सज्जनगढ़, ऋषभदेव, गोगुंदा, सायरा व कोटड़ा जैसी चोटियों को समेटे है, जबकि दक्षिणी अरावली का आबू पर्वत खण्ड गुरु शिखर (राज्य का सर्वोच्च बिंदु, 1722 मीटर), सेर, दिलवाड़ा, अचलगढ़, माउंट आबू, ऋषिकेश, धोणियाँ, जयराज व मानगाँव को समेटे है। मरुस्थल की तरह, अरावली श्रृंखला का बारीक विवरण एक अलग विस्तृत सामग्री के लिए सुरक्षित रखा गया है — यहाँ इसे केवल चार भौतिक विभागों में से दूसरे के रूप में देखा गया है।

3. पूर्वी मैदानी प्रदेश

राज्य के लगभग 23 प्रतिशत क्षेत्रफल में फैला किंतु लगभग 39 प्रतिशत जनसंख्या को आश्रय देने वाला यह उपजाऊ भाग टेथिस सागर का अवशेष है, जिसे बाद में बनास व चम्बल जैसी नदियों द्वारा लाई गई जलोढ़ मिट्टी ने भर दिया। यह बनास बेसिन, चम्बल बेसिन व छप्पन बेसिन (जिसे मध्य माही बेसिन भी कहते हैं) में संगठित है।

4. दक्षिणी-पूर्वी पठारी प्रदेश

हाड़ौती के पठार के नाम से भी जाना जाने वाला यह क्षेत्रफल की दृष्टि से सबसे छोटा विभाग (लगभग 6.89 प्रतिशत) है, जो लगभग 11 प्रतिशत जनसंख्या को समेटे है और अपनी उत्पत्ति क्रिटेशियस काल में, गोंडवाना लैंड के अवशेष के रूप में मानता है। यह विन्ध्यन कागार भूमि व दक्कन के लावा पठार में विभाजित है, और भूगर्भिक दृष्टि से राजस्थान को मध्य भारत के व्यापक दक्कन ट्रैप व विन्ध्यन तंत्र से जोड़ता है।

राजस्थान के भौतिक मानचित्रों में सामान्यतः इन्हीं विभागों को — शुष्क मरुस्थलीय प्रदेश, अर्द्धमरुस्थलीय प्रदेश, मध्यवर्ती पर्वतीय प्रदेश, पूर्वी मैदान व हाड़ौती का पठार — के रूप में अंकित किया जाता है, साथ ही घग्घर का मैदान, वागड़, बनास बेसिन, लूनी बेसिन, भोराठ का पठार व छप्पन का मैदान (माही बेसिन) जैसे परिचित उप-क्षेत्र भी दर्शाए जाते हैं।

त्वरित तथ्य

  • राजस्थान का भूगर्भिक अभिलेख आद्य महाकल्प (भीलवाड़ा व अरावली सुपर समूह) से लेकर पुराजीव महाकल्प (विन्ध्यन/मारवाड़ बेसिन), मध्यजीवी महाकल्प (जैसलमेर-बाड़मेर) से होते हुए नवजीवी महाकल्प के टर्शियरी-क्वार्टर्नरी कल्पों तक फैला है, जिससे यह भारत के सबसे भूगर्भिक रूप से विविध राज्यों में गिना जाता है।
  • विशाल सीमा भ्रंश (Great Boundary Fault) अरावली श्रृंखला के मध्य स्थित मुख्य समभिनति के समानांतर चलता है और प्राचीन अरावली-विन्ध्यन शैलों को सटे हुए बेसिनों से अलग करने वाली संरचनात्मक सीमा बनाता है।
  • राजस्थान में वर्तमान में चार स्वीकृत भौतिक विभाग हैं — उत्तर-पश्चिमी मरुस्थल (61.11% क्षेत्रफल), अरावली पर्वतीय प्रदेश (9% क्षेत्रफल), पूर्वी मैदान (23% क्षेत्रफल) व दक्षिणी-पूर्वी पठार (6.89% क्षेत्रफल) — जिन्होंने वी.सी. मिश्रा (1968) के पुराने सप्तविभाजन तथा सक्सेना-तिवारी (1994) के विस्तृत क्षेत्रीय ढाँचे का स्थान लिया है।
  • ताजमहल के लिए प्रसिद्ध मकराना संगमरमर दिल्ली सुपर समूह के रायलो समूह से प्राप्त होता है, जबकि राजस्थान की अधिकांश धात्विक व अधात्विक खनिज संपदा प्री-कैंब्रियन (आद्य महाकल्प) शैलों में केंद्रित है।

त्वरित रिवीजन — One-Liners

  • थार मरुस्थल विश्व का 9वाँ सबसे बड़ा मरुस्थल है; यह राजस्थान के पश्चिमी भाग में है।
  • चंबल नदी राजस्थान की एकमात्र बारहमासी नदी है; यह यमुना में मिलती है।
  • भारत में दक्षिण-पश्चिम मानसून जून में केरल पहुंचता है; यह अरब सागर और बंगाल की खाड़ी दोनों से आता है।
  • कर्क रेखा (23.5°N) राजस्थान के बांसवाड़ा जिले से गुजरती है।
  • मकराना (नागौर) का सफेद संगमरमर ताजमहल में प्रयुक्त।
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राजस्थान के वर्तमान चार भौतिक विभागों में से क्षेत्रफल की दृष्टि से सबसे बड़ा विभाग कौन-सा है?

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