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राजस्थान की मृदा और फसलें - प्रकार, जिले, खरीफ-रबी

Soils and Crops of Rajasthan: Types, Kharif-Rabi

⏱ 13 मिनटintermediate✓ अपडेटेड: जुलाई 2026· Geography of World and India

परिचय

राजस्थान की कृषि-संपन्नता को समझने की कुंजी उसके मृदा-मानचित्र में छिपी है। पश्चिम में थार मरुस्थल के उड़ते बालू टीलों से लेकर पूर्व में सिंचित उपजाऊ मैदानों तक फैला यह राज्य भारत में पाई जाने वाली लगभग हर प्रमुख मृदा-किस्म को अपने भीतर समेटे हुए है — और पीढ़ियों के अनुभव से किसानों ने हर मृदा के साथ उसकी सबसे उपयुक्त फसल को जोड़ा है। यह गाइड राजस्थान की मृदाओं को अलग-थलग न देखकर कृषि के नज़रिए से देखती है — कौन-सी मृदा किस फसल को सहारा देती है, क्यों देती है, और खरीफ-रबी का फसल-चक्र इन्हीं मृदा-फसल संबंधों पर कैसे टिका है। RAS प्रारंभिक परीक्षा के लिए यह मृदा-फसल जोड़ी — साथ ही सरसों, बाजरा व ग्वार जैसी फसलों में राजस्थान की राष्ट्रीय रैंकिंग — राज्य के भूगोल के महत्वपूर्ण अंशों में से एक है।

मुख्य अवधारणाएँ

1. मरुस्थलीय व बलुई मृदा — बाजरा-मोठ-ग्वार की पट्टी

पश्चिमी राजस्थान की मोटे कणों वाली बलुई मृदा — जैसलमेर, बाड़मेर, बीकानेर, जोधपुर, नागौर व चूरू में फैली — राज्य के सबसे बड़े भू-भाग को घेरती है, परंतु प्राकृतिक रूप से सबसे कम उपजाऊ भी है। कार्बनिक पदार्थों की कमी, जल-धारण क्षमता का अभाव तथा निरंतर वायु अपरदन के कारण बिना सिंचाई के केवल वे ही फसलें यहाँ टिक पाती हैं जो सूखे से बचकर तेज़ी से पक जाती हैं। बाजरा इस पट्टी की सबसे पहचानी फसल है — इसका बढ़वार काल छोटा होता है, यह उच्च तापमान सहन कर लेता है और बहुत कम पानी में तैयार हो जाता है, यही कारण है कि राजस्थान बाजरा उत्पादन में देश का अग्रणी राज्य है। इसके साथ मोठ व ग्वार (क्लस्टर बीन) खरीफ की वर्षा-आधारित दलहनी फसलों के रूप में उगाई जाती हैं, जो मानसून की पहली फुहार के साथ ही अंकुरित हो जाती हैं और मिट्टी की नमी वाष्पित होने से पहले पक जाती हैं। ग्वार का विशेष उल्लेख आवश्यक है क्योंकि राजस्थान इसका देश का सबसे बड़ा उत्पादक है, और इसके बीज से बनने वाला ग्वार गम एक औद्योगिक गाढ़ा करने वाला पदार्थ है जो विश्वभर में निर्यात होता है — इसी फसल के बल पर जोधपुर एक प्रमुख ग्वार-गम प्रसंस्करण केंद्र बनकर उभरा है।

2. लवणीय मृदा — फसल से पहले नमक

सांभर झील (भारत की सबसे बड़ी अंतर्देशीय लवणीय झील) तथा नागौर, डीडवाना व पचपद्रा जैसे निचले, जल-निकास-रहित क्षेत्रों में कम वर्षा और जल-निकास के अभाव के कारण वाष्पीकरण के साथ लवण सतह पर जमा होते रहते हैं। ऐसे लवणीय भागों में परंपरागत कृषि लगभग असंभव है; इसके बजाय ऐतिहासिक रूप से इन्हें नमक उत्पादन के लिए महत्वपूर्ण माना गया है। जहाँ इनके किनारों पर खेती का प्रयास होता भी है, वहाँ केवल तारामीरा जैसी लवण-सहिष्णु तिलहनी फसल ही उगाई जा सकती है, और वहाँ भी उपज सीमित रहती है। लवणीय मृदा की उपस्थिति यह याद दिलाती है कि राजस्थान में केवल मिट्टी की बनावट नहीं बल्कि उसका रासायनिक स्वभाव भी तय करता है कि किसान क्या बो सकता है।

3. जलोढ़ मृदा — पूर्व की गेहूँ, सरसों व गन्ने की भूमि

बनास, बाणगंगा व चम्बल जैसी नदियों द्वारा लाई गई मिट्टी से निर्मित पूर्वी राजस्थान राज्य की सबसे उपजाऊ मृदा — जलोढ़ मृदा — का धनी है, जो पोषक तत्वों व नमी दोनों में समृद्ध है। अलवर, भरतपुर, धौलपुर, जयपुर, टोंक व सवाई माधोपुर जैसे जिले अपनी कृषि-समृद्धि इसी मृदा के कारण पाते हैं। यहीं राजस्थान की दो सबसे प्रमुख रबी फसलें — सरसों व गेहूँ — बड़े पैमाने पर उगाई जाती हैं, तथा जहाँ नहरी या नलकूप सिंचाई सुनिश्चित है वहाँ गन्ना भी। जलोढ़ मृदा नमी अच्छी तरह धारण करती है और उर्वरक के प्रति सशक्त प्रतिक्रिया देती है, इसीलिए यह पट्टी सब्जियों व चने की खेती को भी सहारा देती है — यही अंश राजस्थान को पड़ोसी उत्तर प्रदेश व हरियाणा के सघन कृषि-क्षेत्रों के सबसे निकट लाता है।

4. लाल व लाल-पीली मृदा — दक्षिण की मक्का-चावल भूमि

दक्षिणी राजस्थान के पहाड़ी, अपेक्षाकृत अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों — उदयपुर, डूँगरपुर, बाँसवाड़ा व प्रतापगढ़ — में लौह-ऑक्साइड मिट्टी को उसका विशिष्ट लाल-पीला रंग देता है। यह मृदा नमी को ठीक-ठाक धारण कर लेती है, और राज्य के शेष भाग से तुलनात्मक रूप से अधिक वर्षा के साथ मिलकर मक्का तथा कहीं-कहीं धान (चावल) की खेती को भी संभव बनाती है, साथ ही ज्वार को भी। यह राजस्थान के उन गिने-चुने भागों में से एक है जहाँ बिना भारी सिंचाई निवेश के धान की खेती कृषि-वैज्ञानिक दृष्टि से व्यावहारिक है।

5. काली (रेगुर) मृदा — हाड़ौती की सोयाबीन, चना व धनिया

हाड़ौती क्षेत्र — कोटा, बूँदी, बाराँ व झालावाड़ — में काली या रेगुर मृदा पाई जाती है, जो मालवा पठार की काली मृदा का राजस्थान में विस्तार है। प्राचीन ज्वालामुखी बेसाल्ट के अपक्षय से बनी यह मृदा गहरे रंग की, मृत्तिका-प्रधान तथा उत्कृष्ट नमी-धारक होती है; शुष्क ऋतु में इसमें चौड़ी दरारें पड़ जाती हैं जिससे यह मानो स्वयं ही जुत जाती है। यही नमी-धारण क्षमता इसे राजस्थान की सर्वश्रेष्ठ सोयाबीन-मृदा बनाती है, जिसने हाड़ौती को राज्य का सोयाबीन-हृदय बना दिया है; इसके साथ चना, धनिया, तथा जहाँ सिंचाई उपलब्ध है वहाँ गेहूँ भी उगाया जाता है। देश में काली मृदा को 'काली कपास मृदा' भी कहा जाता है, परंतु राजस्थान की मुख्य कपास-पट्टी हाड़ौती नहीं, बल्कि इंदिरा गांधी नहर से सिंचित श्रीगंगानगर-हनुमानगढ़ क्षेत्र है। याद रखें: काली मृदा = हाड़ौती = सोयाबीन (साथ में चना, धनिया)।

मृदाप्रमुख क्षेत्र / जिलेप्रमुख फसलेंविशेषता
मरुस्थलीय / बलुईजैसलमेर, बाड़मेर, बीकानेर, जोधपुर, नागौर, चूरूबाजरा, मोठ, ग्वारसबसे बड़ा क्षेत्र, प्राकृतिक रूप से सबसे कम उपजाऊ
लवणीयसांभर झील व निचले जल-निकास-रहित क्षेत्रतारामीरा (सीमित)नाममात्र कृषि, नमक उत्पादन
जलोढ़अलवर, भरतपुर, धौलपुर, जयपुर, टोंक, सवाई माधोपुरगेहूँ, सरसों, गन्ना (सिंचित), चनासर्वाधिक उपजाऊ मृदा
लाल-पीलीउदयपुर, डूँगरपुर, बाँसवाड़ा, प्रतापगढ़मक्का, धान, ज्वारलौह-ऑक्साइड से लाल-पीला रंग
काली (रेगुर)कोटा, बूँदी, बाराँ, झालावाड़ (हाड़ौती)सोयाबीन, चना, धनिया, गेहूँ (सिंचित)उत्कृष्ट नमी-धारक, शुष्क ऋतु में दरारें

6. फसल ऋतुएँ — खरीफ व रबी

राजस्थान की फसलें मानसून के अनुसार दो बड़े मौसमी वर्गों में बँटती हैं। खरीफ ऋतु दक्षिण-पश्चिम मानसून के आगमन (जून-जुलाई) से शुरू होकर सितम्बर-अक्टूबर के आसपास कटाई के साथ समाप्त होती है; इसमें ताप- व सूखा-सहिष्णु फसलों का प्रभुत्व रहता है, जो वर्षा से नम मिट्टी में सीधे बोई जाती हैं — बाजरा, मोठ, ग्वार, मूँगफली, ज्वार, मक्का व कपास। रबी ऋतु मानसून की वापसी के बाद शुरू होती है — बुवाई अक्टूबर-नवम्बर में तथा कटाई मार्च-अप्रैल में; चूँकि राजस्थान में शीतकालीन वर्षा (कभी-कभार आने वाले पश्चिमी विक्षोभों तक सीमित) बहुत कम होती है, अतः रबी फसलें भंडारित मृदा-नमी, नहरी जल या भूजल पर बहुत अधिक निर्भर करती हैं। गेहूँ, सरसों, चना, जौ व ईसबगोल रबी की प्रमुख फसलें हैं। ऊपर बताई गई मृदाओं पर यह खरीफ-रबी विभाजन इस विषय का सबसे अधिक परीक्षा में पूछा जाने वाला संगठनात्मक विचार है।

7. राजस्थान की प्रमुख फसलें — राष्ट्रीय रैंकिंग

कई फसलों में राजस्थान को राष्ट्रीय स्तर पर अग्रणी स्थान प्राप्त है, और प्रारंभिक परीक्षा में अक्सर यह पूछा जाता है कि ठीक-ठीक कौन-सी फसलें। सरसों (रेपसीड-मस्टर्ड) अलवर, भरतपुर, सवाई माधोपुर, टोंक व श्रीगंगानगर-हनुमानगढ़ जैसे जिलों में व्यापक रूप से उगाई जाती है, और राजस्थान लगातार भारत के सबसे बड़े सरसों-उत्पादक राज्य के रूप में स्थान पाता रहा है, हाल के अधिकांश वर्षों में राष्ट्रीय उत्पादन के एक बड़े हिस्से का योगदान देते हुए। पश्चिम की बलुई मृदा में बाजरा भी इसी पैटर्न का अनुसरण करता है, जहाँ राजस्थान पुनः देश का शीर्ष उत्पादक है। देश के कुल ग्वार उत्पादन का अधिकांश हिस्सा राजस्थान से आता है, जिससे राजस्थान ग्वार गम का प्रमुख राष्ट्रीय उत्पादक व निर्यातक है। चना एक और फसल है जिसमें राजस्थान शीर्ष उत्पादक राज्यों में गिना जाता है। गेहूँ, यद्यपि राष्ट्रीय स्तर पर राजस्थान की सबसे बड़ी ताकत नहीं है, राज्य के सिंचित उत्तर-पश्चिम में एक प्रमुख क्षेत्रीय महत्व की फसल है।

फसलऋतुराजस्थान की स्थिति
सरसोंरबीदेश का सबसे बड़ा उत्पादक राज्य
बाजराखरीफदेश का अग्रणी उत्पादक राज्य
ग्वारखरीफदेश के अधिकांश उत्पादन का स्रोत; ग्वार गम का प्रमुख उत्पादक व निर्यातक
चनारबीशीर्ष उत्पादक राज्यों में
गेहूँरबीसिंचित उत्तर-पश्चिम में क्षेत्रीय महत्व की फसल

8. सिंचाई और बदलता फसल-प्रतिरूप — IGNP का प्रभाव

राजस्थान में मृदा-फसल का सबसे नाटकीय परिवर्तन शायद मृदा से नहीं बल्कि सिंचाई से आया है। इंदिरा गांधी नहर (IGNP), जो ब्यास-सतलुज का जल श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़ व बीकानेर के कुछ भागों के मरुस्थलीय जिलों तक पहुँचाती है, ने प्राकृतिक रूप से कम उपजाऊ बलुई मृदा के बड़े भू-भाग को उत्पादक कृषि भूमि में बदल दिया है। जहाँ वर्षा-आधारित बलुई मृदा केवल बाजरा व मोठ को सहारा दे सकती थी, वहाँ अब IGNP-सिंचित भूमि गेहूँ, कपास तथा अन्य जल-गहन फसलें भी उगाती है, जो अन्यथा मरुस्थलीय जलवायु में असंभव होतीं। यह दर्शाता है कि राजस्थान में फसल-प्रतिरूप मृदा-प्रकार व सिंचाई-सुविधा दोनों का फलन है — यह एक ऐसा बिंदु है जिसे परीक्षक अक्सर यह पूछकर परखते हैं कि श्रीगंगानगर जैसा 'मरुस्थलीय जिला' गेहूँ का अग्रणी उत्पादक क्यों है।

महत्वपूर्ण तथ्य

  • मरुस्थलीय/बलुई मृदा (पश्चिम) — राज्य का सबसे बड़ा क्षेत्रफल — बाजरा, मोठ व ग्वार जैसी प्रमुख खरीफ फसलों को सहारा देती है।
  • लवणीय मृदा सांभर झील व इसी प्रकार के निम्न-जल-निकास क्षेत्रों के आसपास केंद्रित है; कृषि नाममात्र होती है, और तारामीरा इन परिस्थितियों को सहन करने वाली गिनी-चुनी फसलों में से एक है।
  • पूर्वी राजस्थान (अलवर, भरतपुर, धौलपुर, जयपुर, टोंक) की जलोढ़ मृदा राज्य की सर्वाधिक उपजाऊ मृदा है और गेहूँ, सरसों तथा सिंचाई मिलने पर गन्ना उगाती है।
  • दक्षिणी राजस्थान (उदयपुर, डूँगरपुर, बाँसवाड़ा) की लाल-पीली मृदा मक्का व कहीं-कहीं धान की खेती को सहारा देती है।
  • हाड़ौती (कोटा, बूँदी, बाराँ, झालावाड़) की काली/रेगुर मृदा राजस्थान की सोयाबीन (साथ में चना, धनिया) की हृदयस्थली है; राजस्थान की मुख्य कपास-पट्टी श्रीगंगानगर-हनुमानगढ़ है; यह शुष्क ऋतु में दरारें पड़कर मानो 'स्वयं जुत' जाती है।
  • खरीफ ऋतु: जून-जुलाई में बुवाई, सितम्बर-अक्टूबर में कटाई — बाजरा, मोठ, ग्वार, मूँगफली, ज्वार, मक्का, कपास।
  • रबी ऋतु: अक्टूबर-नवम्बर में बुवाई, मार्च-अप्रैल में कटाई — गेहूँ, सरसों, चना, जौ, ईसबगोल।
  • राजस्थान भारतीय राज्यों में सरसों, बाजरा व ग्वार का अग्रणी उत्पादक है।
  • इंदिरा गांधी नहर (IGNP) ने श्रीगंगानगर व हनुमानगढ़ की मरुस्थलीय बलुई मृदा को गेहूँ व कपास की प्रमुख उत्पादक पट्टी में बदल दिया है।

परीक्षा टिप्स

  • मृदा-फसल जोड़ियों को दो अलग सूचियों की बजाय एक इकाई के रूप में याद करें: मरुस्थलीय→बाजरा/मोठ/ग्वार; जलोढ़→गेहूँ/सरसों; काली→सोयाबीन/चना/धनिया; लाल-पीली→मक्का/धान; लवणीय→न्यूनतम कृषि।
  • खरीफ (मानसून में बोई जाने वाली, जैसे बाजरा, ग्वार) व रबी (शीत ऋतु में बोई जाने वाली, जैसे गेहूँ, सरसों) को कभी न मिलाएँ — यह समय-भेद प्रारंभिक परीक्षा का सबसे बार-बार दोहराया जाने वाला जाल है।
  • याद रखें कि सरसों व ग्वार के सटीक राष्ट्रीय-उत्पादन प्रतिशत/रैंकिंग नए कृषि आँकड़ों के साथ वर्ष-दर-वर्ष बदल सकते हैं — एक निश्चित संख्या रटने के बजाय प्रवृत्ति (राजस्थान अग्रणी है) को समझें।
  • हाड़ौती = काली मृदा = सोयाबीन (साथ में चना, धनिया) एक महत्वपूर्ण जोड़ी है, कपास की नहीं; इसे पूर्वी राजस्थान की जलोढ़-गेहूँ जोड़ी के साथ न बदलें। कपास = श्रीगंगानगर-हनुमानगढ़ (IGNP क्षेत्र)।
  • सिंचाई परियोजनाओं (IGNP) को बदले हुए फसल-प्रतिरूप से जोड़ें — गेहूँ उगाने वाला मरुस्थलीय जिला लगभग हमेशा सिंचाई-प्रेरित अपवाद होता है, न कि मृदा-प्रेरित।
🧠 स्मरण ट्रिक — राजस्थान की मृदा-से-फसल श्रृंखला

पश्चिम से पूर्व की ओर बढ़ते हुए हर मृदा के लिए एक फसल-परिवार याद रखें: मरुस्थलीय → बाजरा-मोठ-ग्वार (टीलों की "BMG" तिकड़ी), लवणीय → लगभग कुछ नहीं (बीज से पहले नमक), जलोढ़ → गेहूँ-सरसों (पूर्व का रबी इंजन), लाल-पीली → मक्का-धान (अधिक वर्षा वाला दक्षिण), काली → सोयाबीन-धनिया (हाड़ौती की रेगुर पट्टी)। इसे एक श्रृंखला की तरह बोलें — "BMG, नमक, गेहूँ-सरसों, मक्का-धान, सोया-धनिया" — पश्चिम से पूर्व की ओर चलते हुए, और फिर आप कभी किसी मृदा को गलत फसल के साथ नहीं जोड़ेंगे।

⚠️ कन्फ्यूज़न बस्टर — राजस्थान में खरीफ बनाम रबी

खरीफ फसलें मानसून के आगमन (जून-जुलाई) के साथ बोई जाती हैं और सितम्बर-अक्टूबर तक काट ली जाती हैं — बाजरा, मोठ, ग्वार, मूँगफली, ज्वार, मक्का व कपास के बारे में सोचें, ये सभी फसलें बलुई या काली मृदा में वर्षा-आधारित नमी पर तेज़ी से परिपक्व हो जाती हैं। रबी फसलें मानसून की वापसी के बाद बोई जाती हैं (अक्टूबर-नवम्बर) और मार्च-अप्रैल में काटी जाती हैं — गेहूँ, सरसों, चना, जौ व ईसबगोल के बारे में सोचें, इन सभी को जलोढ़ मृदा, नहरी जल या भूजल की सुनिश्चित नमी चाहिए क्योंकि राजस्थान की सर्दियों में वर्षा बहुत कम होती है। एक त्वरित जाँच: यदि किसी फसल को खड़े पानी या भारी सिंचाई की आवश्यकता है और वह सर्दी में पकती है, तो वह रबी है (गेहूँ, सरसों); यदि यह एक कठोर, कम अवधि की फसल है जो एक ही मानसून की वर्षा पर पनपती है, तो वह खरीफ है (बाजरा, ग्वार, मोठ)।

राजस्थान का खरीफ-रबी फसल-कैलेंडर — योजनाबद्ध चित्र, वास्तविक अनुपात में नहीं खरीफ ऋतु: मानसून के साथ जून-जुलाई में बुवाई, सितम्बर-अक्टूबर में कटाई रबी ऋतु: मानसून की वापसी के बाद अक्टूबर-नवम्बर में बुवाई, मार्च-अप्रैल में कटाई खरीफ व रबी ऋतुओं के बीच विभाजक रेखा खरीफ ऋतु शीर्षक, जून से अक्टूबरखरीफ (जून-अक्टू) बाजरा राजस्थान की प्रमुख खरीफ फसल है, मरुस्थलीय बलुई मृदा में उगाई जाती हैबाजरा मोठ, पश्चिमी राजस्थान की सूखा-सहिष्णु खरीफ दलहनमोठ ग्वार (क्लस्टर बीन), राजस्थान की प्रमुख खरीफ नकदी फसल, ग्वार गम हेतुग्वार मूँगफली, राजस्थान के कुछ भागों में उगाई जाने वाली सिंचित खरीफ तिलहनमूँगफली कपास, श्रीगंगानगर-हनुमानगढ़ (IGNP क्षेत्र) की प्रमुख खरीफ फसलकपास रबी ऋतु शीर्षक, अक्टूबर से मार्चरबी (अक्टू-मार्च) गेहूँ, राजस्थान की जलोढ़ व नहर-सिंचित मृदा की प्रमुख रबी फसलगेहूँ सरसों, राष्ट्रीय रैंकिंग में राजस्थान की अग्रणी रबी फसलसरसों चना, पूर्वी व सिंचित राजस्थान में उगाई जाने वाली रबी दलहनचना जौ, राजस्थान के कुछ भागों में उगाई जाने वाली कठोर रबी फसलजौ ईसबगोल, जालोर व बाड़मेर में केंद्रित रबी फसलईसबगोल योजनाबद्ध फसल-कैलेंडर, वास्तविक अनुपात में नहींराजस्थान खरीफ-रबी फसल कैलेंडर
📝 अभ्यास प्रश्न
प्रश्न 1. राजस्थान में सबसे बड़े क्षेत्रफल पर कौन-सी मृदा पाई जाती है, और यह मुख्यतः किन तीन फसलों को सहारा देती है?

✅ मरुस्थलीय/बलुई मृदा, जो जैसलमेर, बाड़मेर, बीकानेर व जोधपुर जैसे पश्चिमी जिलों में प्रमुख है; यह मुख्यतः बाजरा, मोठ व ग्वार को सहारा देती है।

प्रश्न 2. राजस्थान की काली (रेगुर) मृदा किस क्षेत्र में केंद्रित है, और किस फसल ने उस क्षेत्र को राज्य की उत्पादन-हृदयस्थली बना दिया है?

✅ हाड़ौती क्षेत्र (कोटा, बूँदी, बाराँ, झालावाड़); सोयाबीन इसकी प्रमुख फसल है, साथ में चना व धनिया।

प्रश्न 3. खरीफ ऋतु की बुवाई सामान्यतः किन महीनों में शुरू होती है, और तब बोई जाने वाली दो फसलों के नाम बताएँ।

✅ जून-जुलाई में, दक्षिण-पश्चिम मानसून के आगमन के साथ; जैसे बाजरा व ग्वार (या मोठ, मूँगफली, कपास)।

प्रश्न 4. किस नहर परियोजना ने श्रीगंगानगर व हनुमानगढ़ में फसल-प्रतिरूप को बाजरा/मोठ से बदलकर गेहूँ व कपास में परिवर्तित किया?

✅ इंदिरा गांधी नहर (इंदिरा गांधी नहर परियोजना, IGNP), जो ब्यास-सतलुज के जल से पोषित है।

प्रश्न 5. सांभर झील के आसपास की लवणीय मृदा बहुत कम कृषि को क्यों सहारा देती है?

✅ कम वर्षा और खराब जल-निकास के कारण वाष्पीकरण के साथ घुलनशील लवण सतह के पास जमा हो जाते हैं, जिससे मिट्टी अधिकांश फसलों के लिए रासायनिक रूप से प्रतिकूल हो जाती है, सिवाय तारामीरा जैसी कुछ लवण-सहिष्णु फसलों के।

सारांश

राजस्थान का मृदा-मानचित्र और उसका फसल-मानचित्र वस्तुतः एक ही मानचित्र को दो तरीकों से पढ़ना है। पश्चिम की मरुस्थलीय बलुई मृदा खरीफ ऋतु में बाजरा, मोठ व ग्वार को सहारा देती है; सांभर के आसपास की लवणीय पट्टी कृषि को लगभग पूरी तरह सीमित कर देती है; पूर्व की जलोढ़ मृदा रबी ऋतु में राज्य की सरसों व गेहूँ अर्थव्यवस्था को वहन करती है, तथा सिंचाई मिलने पर गन्ना भी; दक्षिण की लाल-पीली मृदा मक्का व कुछ धान के अनुकूल है; और हाड़ौती की काली रेगुर मृदा कोटा-बूँदी-बाराँ-झालावाड़ को सोयाबीन-चना-धनिया पट्टी बनाती है। इस सबके ऊपर सिंचाई की परत है — सबसे स्पष्ट रूप से इंदिरा गांधी नहर — जिसने किसानों को प्राकृतिक रूप से निम्न-उर्वरता वाली मरुस्थलीय मृदा पर भी गेहूँ व कपास उगाने में सक्षम बनाया है। RAS प्रारंभिक परीक्षा के लिए, मृदा-फसल-ऋतु-सिंचाई के इन संबंधों में निपुणता मृदाओं या फसलों को अलग-अलग रटने से कहीं अधिक मूल्यवान है।

⚡ त्वरित रिवीजन — One-Liners

  • •थार मरुस्थल विश्व का 9वाँ सबसे बड़ा मरुस्थल है; यह राजस्थान के पश्चिमी भाग में है।
  • •चंबल नदी राजस्थान की एकमात्र बारहमासी नदी है; यह यमुना में मिलती है।
  • •भारत में दक्षिण-पश्चिम मानसून जून में केरल पहुंचता है; यह अरब सागर और बंगाल की खाड़ी दोनों से आता है।
  • •कर्क रेखा (23.5°N) राजस्थान के बांसवाड़ा जिले से गुजरती है।
  • •मकराना (नागौर) का सफेद संगमरमर ताजमहल में प्रयुक्त।
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आधिकारिक प्रश्नपत्रों के असली प्रश्न, उत्तर सहित।

  1. RAS 2024

    जयपुर, दौसा और अलवर जिलों में किस प्रकार की मृदा प्रमुख है ?

    1. (A) एंटीसोल
    2. (B) इंसेप्टिसोल
    3. (C) वर्टिसोल
    4. (D) अल्फिसोल

    उत्तर: (D) अल्फिसोल

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