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Patwari परीक्षा · Hindi Grammar

अपठित पद्यांश: भाव, रस, अलंकार पहचानने की विधि — Patwari नोट्स

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इस पेज में अपठित पद्यांश (कविता-अंश) को पढ़कर उसके भाव, संदेश, रस, अलंकार, काव्य गुण और भाषा-शैली पहचानने की पूरी विधि दी गई है। यह हिंदी खंड के सबसे अधिक पूछे जाने वाले टॉपिकों में है, इसलिए यहाँ की तैयारी सीधे अंकों में बदलती है।

  • कक्षा 9–12 काव्य-बोध स्तर
  • 7 मिनट पढ़ें
21 सितंबर 2026 को सत्यापित · स्रोत: NCERT पाठ्यपुस्तकें (हिंदी — क्षितिज, आरोह आदि)

पद्यांश को कैसे पढ़ें: भाव पक्ष और कला पक्ष

अपठित पद्यांश में गद्यांश की तुलना में शब्द कम और अर्थ अधिक होता है। कवि प्रतीक, बिंब और अलंकार से बात कहता है, इसलिए पहले पठन में केवल 'कविता किसके बारे में है और किस मनोदशा में है' — इतना पकड़ें। दूसरे पठन में कठिन शब्दों का अर्थ संदर्भ से निकालें और तीसरी बार प्रश्नों के अनुसार पंक्तियाँ खोजें।

किसी भी कविता के दो पक्ष होते हैं। भाव पक्ष — कविता का विषय, भाव, संदेश, रस और जीवन-मूल्य (जैसे राष्ट्र प्रेम, प्रकृति प्रेम, जागरण)। कला पक्ष — भाषा (तत्सम/तद्भव/देशज), शब्द-शक्ति, अलंकार, छंद, लय, तुक, नाद-सौंदर्य और काव्य गुण। परीक्षा के प्रश्न इन्हीं दो पक्षों में से पूछे जाते हैं; 'भाव-सौंदर्य' शब्द आए तो भाव पक्ष, 'शिल्प-सौंदर्य' या 'भाषा की विशेषता' आए तो कला पक्ष देखें।

एक सावधानी: प्रतीकात्मक शब्दों को शब्दशः न लें। 'अराति सैन्य-सिंधु में सुवाडवाग्नि से जलो' में कवि किसी वास्तविक समुद्र की बात नहीं कर रहा — शत्रु की सेना को समुद्र मानकर वीरों से उसमें बड़वानल (समुद्र के भीतर की आग) की तरह जलने का आह्वान कर रहा है। इसी तरह 'आँखों में भरे विहाग' (विहाग रात्रि का राग है) नींद भरी आँखों का संकेत है, आधी रात के गीत का वर्णन नहीं।

प्रसिद्ध पद्यांश: एक नज़र में

कविता-अंशकविमुख्य भावभाषा/शिल्प की विशेषता
हिमाद्रि तुंग शृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारतीजयशंकर प्रसाद (नाटक 'चंद्रगुप्त' का गीत)राष्ट्र प्रेम, स्वतंत्रता के लिए बढ़ते रहने का आह्वान (वीर रस)संस्कृतनिष्ठ शब्दावली, ओज गुण, 'बढ़े चलो, बढ़े चलो' की आवृत्ति से प्रभावी नाद
बीती विभावरी जाग रीजयशंकर प्रसाद ('लहर' संग्रह)प्रभात का वर्णन और सखी को जागने की प्रेरणातत्सम शब्द (विभावरी, खग-कुल, किसलय, मलयज), माधुर्य गुण, समान तुक (नागरी–गागरी, जाग री–विहाग री)
राम की शक्ति पूजा (अंश)सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'साधना में बाधा पर राम का आत्म-धिक्कार और पश्चात्ताप; राम का मानवीय रूपतत्सम प्रधान, दीर्घ सामासिक पदावली, गंभीर शैली

प्रसिद्ध कविताओं के कवि और भाव याद हों तो पद्यांश पढ़ने में आधा समय बचता है।

रस और स्थायी भाव

रसस्थायी भावपहचान
शृंगाररतिप्रेम; संयोग और वियोग दो भेद
हास्यहासविचित्र वेशभूषा, वचन या चेष्टा पर हँसी
करुणशोकप्रिय के नाश या वियोग का दुःख
रौद्रक्रोधअपमान या अन्याय पर क्रोध
वीरउत्साहयुद्ध, दान, दया या धर्म के लिए उत्साह
भयानकभयडरावनी वस्तु या स्थिति
वीभत्सजुगुप्साघृणित दृश्य से उत्पन्न घृणा
अद्भुतविस्मयआश्चर्यजनक वस्तु या घटना
शांतनिर्वेदसंसार से विरक्ति
वात्सल्यवत्सलता (संतान-विषयक रति)माता-पिता का संतान के प्रति स्नेह
भक्तिभगवद्विषयक रतिईश्वर के प्रति अनुराग

काव्यशास्त्र में मूल रूप से 9 रस माने गए; बाद में वात्सल्य और भक्ति को जोड़कर 11 रस गिने जाते हैं।

प्रमुख अलंकार: पहचान के संकेत के साथ

अलंकारपहचानउदाहरण
अनुप्रासएक ही वर्ण की बार-बार आवृत्तिखग-कुल कुल-कुल-सा बोल रहा; चारु चंद्र की चंचल किरणें
यमकएक ही शब्द बार-बार, हर बार अलग अर्थकनक कनक ते सौ गुनी मादकता अधिकाय (सोना/धतूरा)
श्लेषशब्द एक बार, पर अर्थ अनेकरहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून (चमक, इज़्ज़त, जल)
उपमाउपमेय-उपमान में समानता; सा, सी, सम, सरिस जैसे वाचक शब्दपीपर पात सरिस मन डोला
रूपकउपमेय पर उपमान का अभेद आरोप; प्रायः योजक-चिह्नसैन्य-सिंधु, चरण-कमल, मैया मैं तो चंद्र-खिलौना लैहों
उत्प्रेक्षाउपमेय में उपमान की संभावना; मानो, मनु, जनु, जानोसोहत ओढ़े पीत पट, स्याम सलोने गात। मनहुँ नीलमनि सैल पर, आतप परयो प्रभात॥
अतिशयोक्तिबढ़ा-चढ़ाकर वर्णनहनुमान की पूँछ में लगन न पाई आग, लंका सिगरी जल गई
मानवीकरणजड़ प्रकृति पर मानवीय क्रियाओं का आरोपमेघ आए बड़े बन-ठन के सँवर के (बादलों को सजे-धजे मेहमान की तरह दिखाना)
वक्रोक्तिकहने वाले के आशय से भिन्न अर्थ निकालना (श्लेष या काकु से)प्रश्न के उत्तर में शब्द का दूसरा अर्थ लेना

रूपक और उत्प्रेक्षा में भ्रम सबसे आम है: 'मानो/जनु' दिखे तो उत्प्रेक्षा, 'रूपी' या सीधा अभेद (सेना ही समुद्र) हो तो रूपक।

काव्य गुण और भाषा पहचान: झट से दोहराएँ

माधुर्य गुण
कोमल वर्ण, समास कम, शृंगार/करुण/शांत रस में — 'बीती विभावरी जाग री'
ओज गुण
ट, ठ, ड जैसे कठोर वर्ण, संयुक्ताक्षर, लंबे समास; वीर/रौद्र रस में
प्रसाद गुण
सरल, सुबोध भाषा; सुनते ही अर्थ स्पष्ट
तत्सम शब्दावली की पहचान
संस्कृत के ज्यों-के-त्यों शब्द — विभावरी, अंबर, नयनद्वय, उद्धार, दैन्य; ऐसी भाषा 'संस्कृतनिष्ठ' कहलाती है
नाद-सौंदर्य के स्रोत
वर्णों की आवृत्ति (अनुप्रास), समान तुक, पदों की आवृत्ति और लय
भाव शब्दों के संकेत
'धिक्', 'हाय' = आत्मग्लानि/पश्चात्ताप; 'बढ़े चलो' = उत्साह; 'जाग री' = जागरण

याद रखने की ट्रिक / परीक्षा टिप

अलंकार का प्रश्न आए तो क्रम से जाँचें: वाचक शब्द (सा/सी/सम) → उपमा; 'मानो/जनु' → उत्प्रेक्षा; योजक-चिह्न से जुड़ा अभेद (चरण-कमल) → रूपक; वर्ण की आवृत्ति → अनुप्रास; शब्द दोबारा अलग अर्थ में → यमक; शब्द एक बार, अर्थ अनेक → श्लेष। 'असंगत' प्रश्न में सबसे पहले वह विकल्प जाँचें जिसमें 'अप्रभावी', 'पलायन' जैसा नकारात्मक शब्द हो — प्रसिद्ध कविताओं के लिए ऐसे विकल्प प्रायः असंगत होते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

रूपक और उत्प्रेक्षा अलंकार में क्या अंतर है?+

रूपक में उपमेय को ही उपमान मान लिया जाता है (सैन्य-सिंधु — सेना ही समुद्र)। उत्प्रेक्षा में उपमेय में उपमान की संभावना व्यक्त की जाती है और 'मानो, मनु, जनु' जैसे शब्द आते हैं।

कविता की भाषा 'तत्सम प्रधान' है, यह कैसे पहचानें?+

यदि विभावरी, अंबर, नयन, उद्धार, दैन्य जैसे संस्कृत के मूल रूप वाले शब्द अधिक हों और आम बोलचाल के तद्भव शब्द (आँख, रात, आग) कम हों, तो भाषा तत्सम प्रधान या संस्कृतनिष्ठ है।

'हिमाद्रि तुंग शृंग से' किसकी रचना है?+

यह जयशंकर प्रसाद की रचना है, जो उनके नाटक 'चंद्रगुप्त' में आई है। इसमें राष्ट्र प्रेम और स्वतंत्रता के लिए आगे बढ़ने का आह्वान है।

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आधिकारिक स्रोत

  1. NCERT पाठ्यपुस्तकें (हिंदी — क्षितिज, आरोह आदि)