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Patwari परीक्षा · Hindi Grammar

वर्ण विचार: स्वर, व्यंजन और वर्ण-विच्छेद — Patwari नोट्स

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वर्ण विचार हिंदी व्याकरण की नींव है — स्वर, व्यंजन, उनके उच्चारण-स्थान और वर्ण-विच्छेद के नियम यहीं से शुरू होते हैं। परीक्षाओं में इस टॉपिक से वर्ण-विच्छेद और शब्दकोश-क्रम के प्रश्न अक्सर पूछे जाते हैं।

  • कक्षा 6-8 स्तर की गहराई
  • 9 मिनट पढ़ें
21 सितंबर 2026 को सत्यापित

वर्ण, स्वर और व्यंजन

मुँह से निकलने वाली सबसे छोटी, अविभाज्य ध्वनि को वर्ण कहते हैं। देवनागरी लिपि में वर्णों को दो मुख्य वर्गों में बाँटा जाता है — स्वर और व्यंजन।

स्वर वे वर्ण हैं जिनका उच्चारण बिना किसी अन्य वर्ण की सहायता के, कंठ से स्वतंत्र रूप से होता है। हिंदी में 11 स्वर हैं — अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ए, ऐ, ओ, औ। उच्चारण में लगने वाले समय के आधार पर इन्हें तीन भागों में बाँटा जाता है: ह्रस्व स्वर (अ, इ, उ, ऋ — एक मात्रा का समय), दीर्घ स्वर (आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ — दो मात्रा का समय) और प्लुत स्वर (तीन मात्रा से अधिक समय, जैसे किसी को दूर से पुकारते समय 'राऽऽऽम')। बनावट के आधार पर अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ को मूल स्वर तथा ए, ऐ, ओ, औ को संयुक्त स्वर (दो मूल स्वरों के मेल से बने) कहा जाता है। अं (अनुस्वार) और अः (विसर्ग) को स्वर के साथ चलने वाले अयोगवाह कहा जाता है।

व्यंजन वे वर्ण हैं जिनके उच्चारण के लिए स्वर की सहायता जरूरी होती है — हर व्यंजन में स्वर 'अ' अंतर्निहित माना जाता है (जैसे 'क' वास्तव में क् + अ है)। हिंदी में 33 मूल व्यंजन (क से ह तक), 2 द्विगुण व्यंजन (ड़, ढ़) और 4 संयुक्त व्यंजन (क्ष, त्र, ज्ञ, श्र — दो व्यंजनों के मेल से बने) माने जाते हैं।

अनुस्वार (अं) और अनुनासिक में भ्रम बहुत आम है — अनुस्वार शुद्ध नासिक्य ध्वनि है जो स्वर के बाद बिंदी (ं) से दिखाई जाती है (जैसे 'गंगा'), जबकि अनुनासिक स्वर को नासिका से बोलने पर उस पर चंद्रबिंदु (ँ) लगाया जाता है (जैसे 'चाँद', 'हँसी')। दोनों उच्चारण में नाक की भागीदारी तो रखते हैं, पर अनुस्वार व्यंजन-जैसा और अनुनासिक शुद्ध स्वर-जैसा व्यवहार करता है — परीक्षा में शब्द की सही वर्तनी पहचानने के प्रश्नों में यह भेद काम आता है।

उच्चारण-स्थान के अनुसार व्यंजनों का वर्गीकरण

उच्चारण स्थानव्यंजनउदाहरण शब्द
कंठ्य (गले से)क, ख, ग, घ, ङकमल
तालव्य (तालु से)च, छ, ज, झ, ञचरण
मूर्धन्य (मूर्धा से)ट, ठ, ड, ढ, णटमाटर
दंत्य (दाँतों से)त, थ, द, ध, नतालाब
ओष्ठ्य (होठों से)प, फ, ब, भ, मपानी
अंतःस्थ (आंशिक स्वर-जैसे)य, र, ल, वयमुना
ऊष्म (रगड़ के साथ हवा)श, ष, स, हशरद

स्पर्श व्यंजन 5 वर्गों (क-वर्ग से प-वर्ग तक) में बँटे हैं; य-र-ल-व अंतःस्थ और श-ष-स-ह ऊष्म व्यंजन कहलाते हैं।

वर्ण-विच्छेद के नियम

किसी शब्द को उसके मूल वर्णों (स्वर + व्यंजन) में तोड़ना वर्ण-विच्छेद कहलाता है। नियम: हर व्यंजन के साथ लगी मात्रा को उसके पूरे स्वर-रूप में बदलें (जैसे 'कि' = क् + इ, 'पू' = प् + ऊ)। बिना मात्रा वाले व्यंजन में 'अ' स्वर जोड़ें। संयुक्ताक्षर (जैसे क्ष, त्र, ज्ञ, श्र) को उनके दोनों घटक व्यंजनों और अंत में लगे स्वर में तोड़ें — जैसे 'क्षमा' = क् + ष् + अ + म् + आ।

सबसे ज्यादा गलती 'ऋ' को लेकर होती है — यह एक स्वतंत्र स्वर है, इसे 'र् + इ' के रूप में तोड़ना गलत है। जैसे 'वृक्ष' का सही वर्ण-विच्छेद है व् + ऋ + क् + ष् + अ (न कि व् + र् + इ + क् + ष् + अ), और 'मनोवृत्ति' में 'वृ' को व् + ऋ ही लिखा जाएगा, व् + र् नहीं।

शब्दकोश-क्रम (वर्णानुक्रम) कैसे तय होता है

मूल नियम
शब्दों की तुलना बाएँ से दाएँ, अक्षर-दर-अक्षर होती है; पहले अलग पड़ने वाला अक्षर क्रम तय करता है।
मात्रा-क्रम
बिना मात्रा (अ) → आ → इ → ई → उ → ऊ → ऋ → ए → ऐ → ओ → औ के क्रम में शब्द आते हैं।
संयुक्ताक्षर की स्थिति
जैसे 'प्र' (प् + र) उसी अक्षर के सामान्य मात्रा-रूपों (प, पा, पि, पी...) के बाद आता है।
उदाहरण
पश्चिम (प) → पृथ्वी (पृ) → प्रकृति (प्रक) → प्रयोजन (प्रय) — यही क्रम परीक्षाओं में अक्सर पूछा जाता है।

याद रखने की ट्रिक / परीक्षा टिप

वर्ण-विच्छेद में जहाँ भी 'ऋ' की मात्रा (ृ) दिखे, उसे हमेशा स्वतंत्र स्वर 'ऋ' लिखें, कभी 'र्' नहीं — परीक्षा में यह सबसे आम ट्रैप है और लगभग हर बार एक विकल्प इसी गलती पर आधारित होता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

हिंदी में कुल कितने स्वर और व्यंजन हैं?+

हिंदी में 11 स्वर तथा 33 मूल व्यंजन माने जाते हैं। इनके अलावा 2 द्विगुण व्यंजन (ड़, ढ़) और 4 संयुक्त व्यंजन (क्ष, त्र, ज्ञ, श्र) भी वर्णमाला का हिस्सा हैं।

'ऋ' को वर्ण-विच्छेद में कैसे लिखें?+

'ऋ' एक स्वतंत्र स्वर है, इसे हमेशा 'ऋ' के रूप में ही लिखें — 'र् + इ' के रूप में तोड़ना गलत माना जाता है।

स्पर्श, अंतःस्थ और ऊष्म व्यंजन में क्या अंतर है?+

स्पर्श व्यंजन (क-वर्ग से प-वर्ग) उच्चारण में जीभ का पूरा स्पर्श किसी अंग से होता है; अंतःस्थ (य, र, ल, व) में आंशिक स्पर्श होता है; ऊष्म (श, ष, स, ह) में हवा रगड़ के साथ निकलती है।

अनुस्वार और अनुनासिक में क्या अंतर है?+

अनुस्वार (ं) नासिक्य व्यंजन-ध्वनि है (जैसे गंगा), जबकि अनुनासिक (ँ) शुद्ध स्वर की नासिक्य ध्वनि है (जैसे चाँद, हँसी)। दोनों की बिंदी/चंद्रबिंदु देखकर वर्तनी में भेद किया जाता है।

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