संधि: स्वर, व्यंजन और विसर्ग संधि — Patwari नोट्स
इस पेज पर संधि की परिभाषा, स्वर संधि के पाँचों भेद, व्यंजन और विसर्ग संधि के प्रमुख नियम तथा संधि-विच्छेद की आम गलतियाँ उदाहरण सहित दी गई हैं। नियम पक्के हों तो यह टॉपिक परीक्षा में सबसे जल्दी हल होने वाले प्रश्नों में से एक बन जाता है।
- कक्षा 6–8 स्तर
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संधि क्या है?
दो निकटवर्ती वर्णों (ध्वनियों) के मेल से जो परिवर्तन होता है, उसे संधि कहते हैं; जैसे विद्या + आलय = विद्यालय। संधि किए हुए शब्द को फिर से उसके मूल खंडों में अलग करना संधि-विच्छेद कहलाता है। संधि और समास में अंतर याद रखें: संधि में वर्णों का मेल होता है और विच्छेद में '+' लगता है, जबकि समास में पदों (शब्दों) का मेल होता है और विग्रह में कारक चिह्न या 'और' आदि जुड़ते हैं।
संधि के तीन भेद हैं — स्वर संधि (स्वर + स्वर), व्यंजन संधि (व्यंजन + स्वर/व्यंजन, या स्वर + व्यंजन) और विसर्ग संधि (विसर्ग + स्वर/व्यंजन)। हिंदी में संधि वाले अधिकांश शब्द तत्सम (संस्कृत से आए) हैं, इसलिए इसके नियम संस्कृत व्याकरण पर आधारित हैं।
स्वर संधि के पाँच भेद
| भेद | नियम | उदाहरण (विच्छेद) |
|---|---|---|
| दीर्घ संधि | अ/आ + अ/आ = आ; इ/ई + इ/ई = ई; उ/ऊ + उ/ऊ = ऊ | विद्यालय (विद्या + आलय), न्यूनाधिक (न्यून + अधिक), रवीन्द्र (रवि + इन्द्र), भानूदय (भानु + उदय) |
| गुण संधि | अ/आ + इ/ई = ए; अ/आ + उ/ऊ = ओ; अ/आ + ऋ = अर् | नरेन्द्र (नर + इन्द्र), महेश (महा + ईश), सूर्योदय (सूर्य + उदय), महर्षि (महा + ऋषि) |
| वृद्धि संधि | अ/आ + ए/ऐ = ऐ; अ/आ + ओ/औ = औ | सदैव (सदा + एव), एकैक (एक + एक), वनौषधि (वन + औषधि), जलौघ (जल + ओघ) |
| यण् संधि | इ/ई + भिन्न स्वर = य्; उ/ऊ + भिन्न स्वर = व्; ऋ + भिन्न स्वर = र् | इत्यादि (इति + आदि), व्यक्ति (वि + अक्ति), अध्ययन (अधि + अयन), स्वागत (सु + आगत), पित्राज्ञा (पितृ + आज्ञा) |
| अयादि संधि | ए + भिन्न स्वर = अय्; ऐ = आय्; ओ = अव्; औ = आव् | नयन (ने + अन), गायक (गै + अक), पवन (पो + अन), पावक (पौ + अक) |
पहचान का सूत्र: विच्छेद के पहले खंड के अंत में 'इ/उ/ऋ' और अगले में दूसरा स्वर हो तो यण्; 'ए/ऐ/ओ/औ' हो तो अयादि।[स्रोत 1]
व्यंजन संधि के प्रमुख नियम
| नियम | उदाहरण (विच्छेद) |
|---|---|
| वर्ग का पहला वर्ण (क्, च्, ट्, त्, प्) + स्वर या घोष वर्ण → उसी वर्ग का तीसरा वर्ण | दिगंबर (दिक् + अंबर), वागीश (वाक् + ईश), जगदीश (जगत् + ईश), सदाचार (सत् + आचार) |
| पहला/तीसरा वर्ण + न/म → उसी वर्ग का पाँचवाँ वर्ण | जगन्नाथ (जगत् + नाथ), उन्नति (उत् + नति), वाङ्मय (वाक् + मय) |
| त्/द् + ल → ल्ल | तल्लीन (तत् + लीन), उल्लास (उत् + लास) |
| त्/द् + च/छ → च्च/च्छ; + ज → ज्ज; + श → च्छ; + ह → द्ध | उच्चारण (उत् + चारण), सज्जन (सत् + जन), उच्छ्वास (उत् + श्वास), उद्धार (उत् + हार) |
| म् + क से भ तक का व्यंजन → अनुस्वार या उसी वर्ग का पंचम वर्ण; म् + य, र, ल, व, श, ष, स, ह → अनुस्वार; म् + म → म्म | संसार (सम् + सार), संकल्प (सम् + कल्प), सम्मान (सम् + मान) |
| सम् + कृ से बने शब्द → बीच में 'स्' का आगम | संस्कृति (सम् + कृति), संस्कार (सम् + कार) |
| स्वर + छ → बीच में च् का आगम (च्छ) | विच्छेद (वि + छेद), परिच्छेद (परि + छेद) |
| अ/आ से भिन्न स्वर के बाद स → ष | अभिषेक (अभि + सेक), विषम (वि + सम) |
| ऋ, र, ष के बाद न → ण (बीच में वर्जित वर्ण न हों) | परिणाम (परि + नाम), प्रमाण (प्र + मान) |
विसर्ग संधि के प्रमुख नियम
| नियम | उदाहरण (विच्छेद) |
|---|---|
| अः + घोष व्यंजन (वर्ग का 3, 4, 5वाँ वर्ण, य र ल व ह) → ओ | मनोबल (मनः + बल), यशोदा (यशः + दा), मनोयोग (मनः + योग) |
| इः/उः + स्वर या घोष व्यंजन → र् | निराशा (निः + आशा), निर्धन (निः + धन), दुर्गुण (दुः + गुण), आशीर्वाद (आशीः + वाद) |
| विसर्ग + च/छ → श्; + त/थ → स् | निश्चल (निः + चल), दुश्चरित्र (दुः + चरित्र), नमस्ते (नमः + ते), निस्तेज (निः + तेज) |
| इः/उः + क/प → ष् | निष्कपट (निः + कपट), दुष्कर (दुः + कर), निष्पाप (निः + पाप) |
| निः + र → नी (विसर्ग लुप्त, स्वर दीर्घ) | नीरोग (निः + रोग), नीरस (निः + रस) |
निः/दुः वाले शब्द — निर्, निस्, निश्, निष्, नी — सब विसर्ग संधि हैं; अगले वर्ण से तय होता है कि कौन-सा रूप बनेगा।
परीक्षा के लिए सावधानियाँ
हर शब्द में संधि नहीं होती। प्रत्यय जुड़कर बने शब्दों (सभ्य + ता = सभ्यता, मानव + ता = मानवता) में संधि नहीं मानी जाती — 'सभ्यता' जैसे शब्दों पर यही गलती अक्सर परीक्षा में देखने को मिलती है। इसलिए यण् वाले विकल्प में यह जाँचें कि विच्छेद में सचमुच इ/उ/ऋ के बाद भिन्न स्वर आता है या नहीं।
विच्छेद में हलंत का ध्यान रखें: 'सम + सार' और 'सम् + सार' अलग हैं; मूल खंड सम्, उत् (उपसर्ग), तत्, सत् हलंत वाले और दुः, निः विसर्ग वाले हैं। 'संस्कृति' में स् का आगम होता है, पर विच्छेद सम् + कृति ही लिखा जाता है — स् अलग खंड नहीं बनता।
एक शब्द में एक से अधिक खंड हों तो सबसे पहले मूल शब्द पहचानें: 'न्यूनाधिक' = न्यून + अधिक (दीर्घ); 'महोत्सव' = महा + उत्सव (गुण); 'अत्यधिक' = अति + अधिक (यण्)। उच्चारण धीरे-धीरे करने से भी जोड़ सुनाई दे जाता है।
याद रखने की ट्रिक / परीक्षा टिप
स्वर संधि का क्रम याद रखें — 'दी-गु-वृ-य-अ' (दीर्घ, गुण, वृद्धि, यण्, अयादि)। विच्छेद में इ/उ/ऋ के बाद भिन्न स्वर हो और शब्द में आधे अक्षर के साथ 'य/व/र' दिखे (व्यक्ति, स्वागत, पित्राज्ञा) तो यण्; 'अय/आय/अव/आव' दिखे (नयन, गायक, पवन, पावक) तो अयादि। और विच्छेद के विकल्पों में पहले हलंत वाला मूल खंड (सम्, उत्, तत्) खोजें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
संधि के कितने भेद होते हैं?+
संधि के तीन भेद हैं — स्वर संधि, व्यंजन संधि और विसर्ग संधि। स्वर संधि के पाँच उपभेद हैं: दीर्घ, गुण, वृद्धि, यण् और अयादि।
संधि और समास में क्या अंतर है?+
संधि में दो वर्णों के मेल से परिवर्तन होता है (विद्या + आलय = विद्यालय), जबकि समास में दो या अधिक शब्दों को संक्षिप्त करके एक पद बनाया जाता है (राजा का पुत्र = राजपुत्र)।
यण् संधि की पहचान कैसे करें?+
जब इ/ई, उ/ऊ या ऋ के बाद कोई भिन्न स्वर आए और वे क्रमशः य्, व्, र् में बदल जाएँ, तो यण् संधि होती है — जैसे इति + आदि = इत्यादि, सु + आगत = स्वागत।