समास: भेद, पहचान और विग्रह — Patwari नोट्स
समास दो या अधिक शब्दों को मिलाकर एक नया, संक्षिप्त शब्द बनाने की प्रक्रिया है। परीक्षाओं में अक्सर गद्यांश से जोड़कर या सीधे शब्द देकर समास पहचानने के प्रश्न पूछे जाते हैं, और सबसे ज्यादा उलझन द्वंद्व व कर्मधारय, तथा तत्पुरुष व बहुव्रीहि में होती है।
- कक्षा 6-8 स्तर की गहराई
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समास क्या है?
जब दो या अधिक शब्द आपस में मिलकर एक नया, संक्षिप्त और सार्थक शब्द बनाते हैं तथा उनके बीच की विभक्ति (कारक-चिह्न) का लोप हो जाता है, तो इस प्रक्रिया को समास कहते हैं। बने हुए नए शब्द को समस्त पद या सामासिक शब्द कहा जाता है, और उसे मूल रूप में वापस अलग-अलग शब्दों में लिखना समास-विग्रह कहलाता है — जैसे 'राजपुत्र' का विग्रह है 'राजा का पुत्र'।
समास में सामान्यतः दो पद होते हैं — पूर्वपद (पहला शब्द) और उत्तरपद (दूसरा शब्द)। हिंदी व्याकरण में समास के छह प्रमुख भेद माने जाते हैं: अव्ययीभाव, तत्पुरुष, कर्मधारय, द्विगु, द्वंद्व और बहुव्रीहि।
समास और संधि को अक्सर एक-दूसरे से जोड़कर देखा जाता है क्योंकि दोनों में शब्द छोटे और संक्षिप्त होते हैं, पर दोनों की प्रक्रिया अलग है। संधि में दो वर्णों (ध्वनियों) के पास-पास आने पर उनमें ध्वनि-परिवर्तन होता है (जैसे विद्या + आलय = विद्यालय, जहाँ आ+आ मिलकर आ बना), जबकि समास में दो पूरे शब्दों (पदों) के बीच केवल विभक्ति (कारक-चिह्न) का लोप होता है, ध्वनि नहीं बदलती (राजा का पुत्र = राजपुत्र)। कई सामासिक शब्दों में समास और संधि दोनों प्रक्रियाएँ एक साथ भी हो सकती हैं, जैसे 'विद्यालय' शब्द में पहले संधि (विद्या+आलय) होती है और फिर वह एक स्वतंत्र शब्द के रूप में समास के उदाहरणों में भी गिना जा सकता है — इसलिए परीक्षा में इन दोनों में अंतर स्पष्ट होना जरूरी है। परीक्षा में अक्सर यही दोनों प्रक्रियाएँ मिलाकर भ्रम पैदा किया जाता है, इसलिए वर्ण-स्तर के परिवर्तन (संधि) और पद-स्तर के लोप (समास) को हमेशा अलग-अलग जाँचें।
समास के छह भेद
| भेद | पहचान | उदाहरण व विग्रह |
|---|---|---|
| अव्ययीभाव समास | पूर्वपद अव्यय होता है, समस्त पद भी अव्यय (क्रिया-विशेषण) की तरह प्रयुक्त होता है | यथाशक्ति = शक्ति के अनुसार |
| तत्पुरुष समास | उत्तरपद प्रधान; बीच की विभक्ति का लोप | राजपुत्र = राजा का पुत्र |
| कर्मधारय समास | एक पद विशेषण और दूसरा विशेष्य, या एक उपमान और दूसरा उपमेय | नीलकमल = नीला कमल |
| द्विगु समास | पूर्वपद संख्यावाची और समस्त पद किसी समूह/समाहार का बोध कराए | नवरत्न = नौ रत्नों का समूह |
| द्वंद्व समास | दोनों पद प्रधान; विग्रह में 'और/या/अथवा' आता है, प्रायः योजक चिह्न (-) से जुड़ते हैं | माता-पिता = माता और पिता |
| बहुव्रीहि समास | दोनों पद मिलकर किसी तीसरे (अन्य) अर्थ की ओर संकेत करें | दशानन = दस मुखों वाला अर्थात् रावण |
कर्मधारय-द्विगु और तत्पुरुष-बहुव्रीहि में अंतर कैसे करें
कर्मधारय और द्विगु दोनों में पहला पद विशेषण जैसा दिखता है, इसलिए भ्रम होता है। पहचान यह है — द्विगु में पूर्वपद हमेशा संख्यावाची (एक, दो, नौ, चार...) होता है और अर्थ किसी समूह/समाहार का निकलता है (त्रिलोक = तीन लोकों का समूह)। कर्मधारय में पूर्वपद गुणवाचक विशेषण होता है, संख्या नहीं (नीलकमल = नीला कमल, यहाँ 'समूह' का भाव नहीं है)।
तत्पुरुष और बहुव्रीहि में भी समान भ्रम होता है क्योंकि दोनों में विभक्ति का लोप दिखता है। अंतर यह है — तत्पुरुष में समस्त पद का अर्थ अपने ही दोनों पदों तक सीमित रहता है (राजपुत्र यानी राजा का पुत्र ही, कोई तीसरा अर्थ नहीं)। बहुव्रीहि में समस्त पद किसी तीसरे व्यक्ति/वस्तु का विशेषण बन जाता है — जैसे 'पीतांबर' का शाब्दिक अर्थ 'पीले वस्त्र' है, पर व्यवहार में यह 'पीले वस्त्र धारण करने वाले' अर्थात् श्रीकृष्ण के लिए प्रयुक्त होता है — तीसरा अर्थ ही असली अर्थ है।
एक और उपयोगी जाँच यह है कि विग्रह करने पर वाक्य किस तरह पूरा होता है। तत्पुरुष में विग्रह के बाद भी दोनों पद अपने मूल अर्थ में ही रहते हैं (राजा का पुत्र = राजा + पुत्र, कोई तीसरा भाव नहीं जुड़ता), जबकि बहुव्रीहि में विग्रह के बाद भी वाक्य अधूरा लगता है जब तक 'वह' या 'जिसका/जिसकी' जोड़कर तीसरे व्यक्ति की ओर इशारा न किया जाए (जैसे 'दस मुख हैं जिसके' = वह रावण)। इसी तरह द्वंद्व और द्विगु में भी विग्रह करते समय ध्यान रखें कि द्वंद्व में हर पद स्वतंत्र संज्ञा रहता है, जबकि द्विगु में विग्रह के बाद 'का समूह' या 'का समाहार' जैसा शब्द अनिवार्य रूप से जुड़ता है।
हर भेद के दो-दो अतिरिक्त उदाहरण
| भेद | उदाहरण 1 | उदाहरण 2 |
|---|---|---|
| अव्ययीभाव समास | आजीवन = जीवन भर | प्रतिवर्ष = हर वर्ष |
| तत्पुरुष समास | गंगाजल = गंगा का जल | रसोईघर = रसोई के लिए घर |
| कर्मधारय समास | महापुरुष = महान पुरुष | कमलनयन = कमल जैसे नयन |
| द्विगु समास | सप्ताह = सात दिनों का समूह | चौराहा = चार राहों का समूह |
| द्वंद्व समास | अन्न-जल = अन्न और जल | राजा-रानी = राजा और रानी |
| बहुव्रीहि समास | लंबोदर = लंबा है उदर जिसका, अर्थात् गणेश | त्रिनेत्र = तीन नेत्रों वाला, अर्थात् शिव |
परीक्षाओं में अक्सर एक ही तरह के उदाहरण दोहराए जाते हैं, इसलिए हर भेद के 2-3 उदाहरण याद रखना पर्याप्त है।
याद रखने की ट्रिक / परीक्षा टिप
अगर दो शब्द योजक चिह्न (-) से जुड़े हों और विग्रह में 'और' आता हो (जैसे फल-फूल, हानि-लाभ, जीव-जंतु), तो बिना सोचे द्वंद्व समास मान लें — यह पैटर्न परीक्षाओं में बार-बार दोहराया जाता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
समास के कितने भेद होते हैं?+
हिंदी व्याकरण में समास के छह प्रमुख भेद माने जाते हैं — अव्ययीभाव, तत्पुरुष, कर्मधारय, द्विगु, द्वंद्व और बहुव्रीहि।
समास और संधि में क्या अंतर है?+
संधि में दो वर्णों के मेल से ध्वनि-परिवर्तन होता है, जबकि समास में दो या अधिक पूरे शब्दों के मेल से नया शब्द बनता है और विभक्ति का लोप होता है।
द्वंद्व समास को कैसे पहचानें?+
जिस सामासिक शब्द के दोनों पद बराबर महत्व के हों और विग्रह करने पर बीच में 'और', 'या' या 'अथवा' आए, वह द्वंद्व समास है — जैसे माता-पिता, सुख-दुख।
समास में पूर्वपद और उत्तरपद किसे कहते हैं?+
समस्त पद में पहले आने वाले शब्द को पूर्वपद और दूसरे शब्द को उत्तरपद कहते हैं। किस समास में कौन-सा पद प्रधान है (पूर्वपद या उत्तरपद), यही समास का भेद तय करने में मदद करता है।