मुख्य सामग्री पर जाएं
पृष्ठ 2.6

शुभ (Good) और सद्गुण (Virtue)

Read this in English →

RAS मुख्य परीक्षा, पत्र II, इकाई I, बिंदु 2: नैतिक अवधारणाएँ, "शुभ और सद्गुण की अवधारणा" (Concept of good and virtue)

  • जनवरी 2026 के पाठ्यक्रम के अनुसार अद्यतन
  • पढ़ने का समय: लगभग 10 मिनट
2 अक्टूबर 2026 को सत्यापित

परीक्षा-भार (2018-2024 के प्रश्नों के आधार पर)

1 प्रश्न, भाग ग (10 अंक): 2024 Q11, "What is the meaning of 'Good'?..."। संबंधित (पृष्ठ 6.1 और 6.2): 2023 Q1 (प्लेटो के प्रमुख गुण, 2 अंक) और 2024 Q4 (मध्यमान के रूप में सद्गुण, 2 अंक)।

30 सेकंड का सार

याद रखें

  • शुभ वह है जो वांछनीय, हितकर और प्रशंसनीय है: साधनात्मक शुभ (जैसे धन), स्वतः शुभ (जैसे ज्ञान, सत्य) और परम शुभ (summum bonum)।
  • प्रमुख दृष्टियाँ: प्लेटो (शुभ का रूप), अरस्तू (यूडेमोनिया), उपयोगितावाद (अधिकतम हित), मूर (शुभ अपरिभाष्य), कठोपनिषद (श्रेय बनाम प्रेय)।
  • सद्गुण चरित्र की स्थायी अच्छाई है; अरस्तू के अनुसार आदत से बनता है और अति तथा अभाव के बीच के मध्यमान पर टिकता है।
  • शुभ लक्ष्य है, सद्गुण उसे पाने की चरित्र-शक्ति: एक के बिना दूसरा अधूरा।
  • 2024 का प्रश्न "आपकी शुभ की समझ से अच्छे प्रशासन की संरचना कैसे बने?" माँगता है, इसलिए अपनी एक स्पष्ट परिभाषा तैयार रखिए।

भाग क के लिए छोटे उत्तर (15 शब्द तक)

याद रखें

  • प्रश्न (हमारा अभ्यास): शुभ और सद्गुण में एक अंतर बताइए।
  • उत्तर: शुभ वांछनीय लक्ष्य या मूल्य है; सद्गुण उसे पाने वाली चरित्र की स्थायी शक्ति।
  • अरस्तू: नैतिक सद्गुण आदत से बनते हैं और अति-अभाव के मध्यमान पर टिकते हैं।
  • कठोपनिषद: श्रेय कल्याणकारी है, प्रेय केवल प्रिय; विवेकी श्रेय चुनता है।

1. शुभ का अर्थ

जो वांछनीय, हितकर और प्रशंसनीय है। नीतिशास्त्र में प्रश्न उठता है: आखिर "अच्छा" क्या है? दो प्रयोग समझिए: साधनात्मक शुभ (किसी और लक्ष्य के लिए उपयोगी, जैसे धन) और स्वतः शुभ (अपने-आप में काम्य, जैसे सुख, ज्ञान, सत्य)। जो सबसे ऊपर का शुभ है, उसे परम शुभ (summum bonum) कहा जाता है।

2. शुभ पर कुछ प्रमुख दृष्टियाँ

प्लेटो: शुभ का रूप (Form of the Good) सर्वोच्च है, जिससे अन्य सब वस्तुएँ मूल्यवान बनती हैं।

अरस्तू: परम शुभ यूडेमोनिया है, यानी विवेक और सद्गुण के अनुसार सार्थक, सुखमय जीवन।

उपयोगितावाद: वह कर्म शुभ है जो अधिकतम लोगों का अधिकतम हित करे (बेंथम, मिल)।

जी.ई. मूर: Principia Ethica (1903) में तर्क कि "शुभ" अपरिभाष्य और सरल है; इसे सुख या इच्छा जैसे प्राकृतिक गुणों से परिभाषित करना भूल (प्राकृतिक भ्रांति) है।

भारतीय परंपरा: कठोपनिषद (1.2.1 से आगे) में यम नचिकेता को श्रेय (कल्याणकारी) और प्रेय (प्रिय, सुखद) का भेद सिखाते हैं; श्रेय चुनने वाला कल्याण पाता है। (गांधी के सर्वोदय और गीता के लोकसंग्रह पर पृष्ठ 4.1 से 5.6 में।)

3. सद्गुण

चरित्र की वह स्थायी अच्छाई जो व्यक्ति को सही आचरण की ओर प्रवृत्त करती है।

अरस्तू: नैतिक सद्गुण आदत से बनते हैं और अति तथा अभाव के बीच के संतुलित मार्ग (मध्यमान) पर स्थित होते हैं। उदाहरण: साहस, कायरता और उतावलेपन के बीच। उचित मध्यमान पहचानने के लिए व्यावहारिक विवेक चाहिए।

प्लेटो: रिपब्लिक (पुस्तक IV) में चार प्रमुख गुण: प्रज्ञा, साहस, संयम और न्याय। (विस्तार पृष्ठ 6.1 में।)

भारतीय चिंतन: सत्य, अहिंसा, करुणा, संयम जैसे गुण सद्गुण माने गए हैं।

4. शुभ और सद्गुण का रिश्ता

शुभ लक्ष्य या मूल्य है; सद्गुण उसे पाने और निभाने की चरित्र-शक्ति। बिना शुभ की समझ सद्गुण दिशाहीन है और बिना सद्गुण शुभ केवल विचार।

5. शुभ की मेरी समझ और अच्छा प्रशासन (उत्तर-निर्माण के लिए)

एक व्यावहारिक ढाँचा जो दूसरी दृष्टियों का मेल करे: शुभ वह है जो मानवीय गरिमा सुरक्षित रखते हुए अधिकतम लोगों का हित करे और न्याय के साथ करे। इससे प्रशासन की संरचना यों बनती है:

1. उद्देश्य: नीतियाँ सार्वजनिक हित और कमज़ोर के कल्याण को लक्ष्य बनाएँ।

2. प्रक्रिया: साधन भी शुभ हों: पारदर्शिता, निष्पक्षता, विधिसम्मत कार्य।

3. व्यक्ति: अधिकारी में सद्गुण: ईमानदारी, साहस, संयम, न्याय, करुणा और विवेक; भर्ती और प्रशिक्षण में इनका स्थान।

4. संस्था: जवाबदेही, शिकायत-निवारण और आचार-संहिता जैसी व्यवस्थाएँ, ताकि सद्गुण केवल व्यक्ति की किस्मत पर न टिके।

5. मूल्यांकन: परिणाम और प्रक्रिया, दोनों की जाँच, और "श्रेय बनाम प्रेय" की कसौटी: क्या लोकप्रिय निर्णय दीर्घकालीन हित के भी अनुकूल है?

6. प्रशासन कोण

अक्सर कठिन चुनाव "प्रेय" (तुरंत लोकप्रिय, आसान) और "श्रेय" (दीर्घकालीन कल्याणकारी) के बीच होता है। सीमित बजट में दिखावटी उद्घाटनों के बजाय पेयजल या स्वास्थ्य सेवा पर निवेश श्रेय का उदाहरण हो सकता है।

वास्तविक उदाहरण

सर एम. विश्वेश्वरैया, 1903 से 1955 तक (सद्गुण और दक्षता का मेल)

खड़कवासला बाँध पर पेटेंट-प्राप्त स्वचालित द्वार (पहली बार 1903); कृष्णराज सागर बाँध के मुख्य अभियंता; 1912-1918 मैसूर के दीवान; 1955 में भारत रत्न। जन-हित के लक्ष्य (शुभ) के लिए तकनीकी दक्षता और सेवा-निष्ठा (सद्गुण) का उदाहरण।

स्रोत: विकिपीडिया (M. Visvesvaraya): 1903, खड़कवासला, कृष्णराज सागर, 1912-1918, 1955। तिथियाँ लिखने से पहले किसी जीवनी-स्रोत में मिला लें। सावधानी: "सद्गुण" शब्द की यह व्याख्या हमारा प्रयोग है।

उत्तर में कैसे लगाएँ

(2024 जैसे प्रश्न में) पहले शुभ के अर्थ और भेद, फिर एक-दो दृष्टियाँ (प्लेटो/अरस्तू/श्रेय-प्रेय), फिर "मेरी समझ" की एक पंक्ति और उसके पाँच प्रशासनिक आयाम।

विचारक और उद्धरण

नामविचारप्रयोग-योग्य पंक्ति
प्लेटोशुभ का रूप; चार गुणरिपब्लिक (पुस्तक IV): प्रज्ञा, साहस, संयम और न्याय
अरस्तूयूडेमोनिया; सद्गुण = आदत + मध्यमानभाव: नैतिक सद्गुण आदत से बनते हैं और अति व अभाव के बीच स्थित हैं
जी.ई. मूरशुभ अपरिभाष्यPrincipia Ethica (1903): "शुभ" को प्राकृतिक गुणों से परिभाषित करना प्राकृतिक भ्रांति
कठोपनिषदश्रेय बनाम प्रेययम नचिकेता को श्रेय और प्रेय का भेद बताते हैं (1.2.1 से आगे; भाव, शब्दशः उद्धरण नहीं)

चित्र: तारा और दो मार्ग

शुभ (लक्ष्य)

केंद्र: का तारा

चारों ओर चार द्वार: प्रज्ञा · साहस · संयम · न्याय

प्रेय

नीचे दो मार्ग: (सुगम, अल्पकालीन) और (कठिन, दीर्घकालीन)

श्रेय

लोकप्रिय निर्णय दीर्घकालीन हित के अनुकूल है या नहीं?

उनके बीच कसौटी

संबंधित, पृष्ठ 6.1 और 6.2 में: 2023 Q1, "What are cardinal virtues according to Plato?" (भाग क, 2 अंक) और 2024 Q4, "Explain Virtue as a mean." (भाग क, 2 अंक)।

पहले इसी अवधारणा का प्रश्न: "शुभ" का सीधा प्रश्न केवल 2024 में आया; सद्गुण पर दो भाग-क के प्रश्न (प्लेटो 2023, अरस्तू 2024) आए।

आम गलतियाँ

याद रखें

  • "शुभ" की केवल परिभाषा लिखना; 2024 जैसे प्रश्न में अपनी समझ से प्रशासन की संरचना जोड़ना ज़रूरी है।
  • श्रेय-प्रेय को केवल दर्शन के रूप में लिखना; एक प्रशासनिक उदाहरण (जल बनाम दिखावा) के बिना उत्तर अधूरा रहता है।
  • सद्गुण को केवल व्यक्ति का गुण मान लेना; संस्थाएँ (जवाबदेही, आचार-संहिता) उसे सहारा देती हैं।

आत्म-जाँच (5 प्रश्न)

याद रखें

  • साधनात्मक शुभ, स्वतः शुभ और परम शुभ में अंतर बताइए।
  • अरस्तू के अनुसार सद्गुण कैसे बनते हैं और मध्यमान का उदाहरण दीजिए।
  • प्लेटो के चार गुण कौन-से हैं और वे किस ग्रंथ में हैं?
  • मूर की "प्राकृतिक भ्रांति" एक वाक्य में लिखिए।
  • "शुभ की मेरी समझ" के पाँच प्रशासनिक आयाम गिनाइए।