कोलबर्ग का नैतिक विकास सिद्धांत (Kohlberg's Theory)
कोलबर्ग का सिद्धांत बताता है कि व्यक्ति नैतिक निर्णय एक निश्चित क्रम में विकसित 3 स्तरों व 6 चरणों से गुजरते हुए सीखता है। REET में यह टॉपिक स्तर-चरण के नाम, क्रम व परिभाषा पर सीधे प्रश्न पूछता है, इसलिए क्रमबद्ध व स्पष्ट समझ अंक दिलाने में सबसे कारगर है।
- REET 2024 में 1 प्रश्न
- L1+L2 स्तर
- 7 मिनट पढ़ें
REET में यह टॉपिक कैसे पूछा जाता है
2024 में कोलबर्ग सिद्धांत से 1 प्रश्न पूछा गया, जिसमें छठे चरण (सार्वभौमिक नैतिक सिद्धांत अभिविन्यास) की पहचान करनी थी। ऐसे प्रश्नों में अक्सर किसी चरण की परिभाषा या विशेषता देकर उसका सही नाम पहचानने, या स्तर-चरण का सही मिलान करने को कहा जाता है — इसलिए हर चरण का नाम व मुख्य विचार सटीक याद होना ज़रूरी है।
कोलबर्ग का नैतिक विकास सिद्धांत
लॉरेंस कोलबर्ग (Lawrence Kohlberg) ने पियाजे के नैतिक विकास विचार को आगे बढ़ाते हुए यह सिद्धांत दिया कि व्यक्ति नैतिक निर्णय एक निश्चित क्रम में विकसित तीन स्तरों व छह चरणों से गुजरते हुए सीखता है। इसका आधार काल्पनिक नैतिक दुविधाओं (जैसे प्रसिद्ध 'हाइंज दुविधा') पर व्यक्तियों की प्रतिक्रियाओं का विश्लेषण था — सही या गलत उत्तर नहीं, बल्कि उत्तर के पीछे के तर्क का स्तर मायने रखता था।
प्रसिद्ध 'हाइंज दुविधा' में एक व्यक्ति के सामने यह स्थिति रखी जाती है कि उसकी पत्नी की जान बचाने वाली महँगी दवा वह खरीद नहीं सकता — क्या उसे वह दवा चुरा लेनी चाहिए? कोलबर्ग के लिए यह मायने नहीं रखता था कि उत्तरदाता 'हाँ' कहता है या 'नहीं', बल्कि यह मायने रखता था कि वह अपने उत्तर का औचित्य किस आधार पर देता है — दंड के भय पर, सामाजिक स्वीकृति पर, कानून पर, या मानव जीवन के सार्वभौमिक महत्व पर। इसी तर्क-आधार से कोलबर्ग ने छह चरण पहचाने।
3 स्तर और 6 चरण
| स्तर | चरण | मुख्य आधार |
|---|---|---|
| स्तर 1: पूर्व-परंपरागत (Preconventional) | चरण 1 — आज्ञापालन व दंड अभिविन्यास | दंड से बचना ही सही-गलत का आधार है |
| स्तर 1: पूर्व-परंपरागत | चरण 2 — व्यक्तिवादी/स्वार्थ अभिविन्यास | अपने हित व पारस्परिक लाभ के आधार पर निर्णय |
| स्तर 2: परंपरागत (Conventional) | चरण 3 — पारस्परिक सामंजस्य / 'अच्छा बालक' अभिविन्यास | दूसरों की स्वीकृति व अच्छे संबंध बनाए रखना |
| स्तर 2: परंपरागत | चरण 4 — कानून व व्यवस्था अभिविन्यास | समाज के नियम व कानून का पालन, व्यवस्था बनाए रखना |
| स्तर 3: उत्तर-परंपरागत (Postconventional) | चरण 5 — सामाजिक अनुबंध व वैयक्तिक अधिकार अभिविन्यास | कानून सामाजिक समझौता है, बदला जा सकता है; व्यक्तिगत अधिकार महत्वपूर्ण |
| स्तर 3: उत्तर-परंपरागत | चरण 6 — सार्वभौमिक नैतिक सिद्धांत अभिविन्यास | न्याय, मानव अधिकार व गरिमा जैसे सार्वभौमिक सिद्धांतों पर आधारित निर्णय, भले ही कानून से टकराव हो — यह चरण अत्यंत दुर्लभ माना जाता है |
कोलबर्ग के 3 स्तर और 6 चरण — एक नज़र में
कोलबर्ग का नैतिक विकास
स्तर 1: पूर्व-परंपरागत
- चरण 1 — आज्ञापालन व दंड अभिविन्यास
- चरण 2 — व्यक्तिवादी/स्वार्थ अभिविन्यास
स्तर 2: परंपरागत
- चरण 3 — पारस्परिक सामंजस्य / 'अच्छा बालक'
- चरण 4 — कानून व व्यवस्था अभिविन्यास
स्तर 3: उत्तर-परंपरागत
- चरण 5 — सामाजिक अनुबंध व वैयक्तिक अधिकार
- चरण 6 — सार्वभौमिक नैतिक सिद्धांत (अत्यंत दुर्लभ)
ध्यान देने योग्य बिंदु
- आधार शोध पद्धति
- काल्पनिक नैतिक दुविधाओं (जैसे हाइंज दुविधा) पर बालकों-किशोरों की प्रतिक्रियाओं का विश्लेषण[स्रोत 1]
- मुख्य जोर
- उत्तर नहीं, बल्कि उस उत्तर के पीछे दिए गए तर्क (reasoning) का स्तर मायने रखता है, चाहे व्यक्ति ने 'हाँ' कहा हो या 'नहीं'
- क्रम
- अधिकांश व्यक्ति आयु के साथ चरण 1 से आगे बढ़ते हैं, पर बहुत कम लोग ही चरण 6 तक पहुँच पाते हैं; अधिकांश वयस्क परंपरागत स्तर (चरण 3-4) पर ही स्थिर हो जाते हैं
- आलोचना
- सिद्धांत को अत्यधिक पश्चिमी/पुरुष-केंद्रित मानने की आलोचना हुई; कैरल गिलिगन (Carol Gilligan) ने तर्क दिया कि यह सिद्धांत 'देखभाल व संबंध' आधारित नैतिक तर्क (ethics of care) को पर्याप्त महत्व नहीं देता
कक्षा में इसका उपयोग
| स्तर/चरण | कक्षा में उदाहरण |
|---|---|
| चरण 1-2 (प्राथमिक कक्षाएँ) | छोटे बच्चे नियम इसलिए मानते हैं ताकि डांट न पड़े या पुरस्कार मिले — शिक्षक स्पष्ट, सुसंगत परिणाम बताएँ |
| चरण 3-4 (उच्च प्राथमिक/माध्यमिक) | छात्र सहपाठियों की स्वीकृति व कक्षा-नियमों का पालन कर 'अच्छा छात्र' दिखना चाहते हैं — समूह चर्चा व नैतिक दुविधा-आधारित गतिविधियाँ कारगर होती हैं |
| चरण 5-6 (किशोरावस्था के बाद) | छात्र न्याय व अधिकारों पर सवाल उठाने लगते हैं — शिक्षक खुली बहस व वास्तविक जीवन के नैतिक मुद्दों पर चर्चा करा सकते हैं |
शिक्षक के लिए इस सिद्धांत का महत्व
कक्षा-प्रबंधन में कोलबर्ग के सिद्धांत की समझ शिक्षक को यह तय करने में मदद करती है कि किस आयु-वर्ग के छात्रों के लिए किस तरह की अनुशासन-रणनीति कारगर होगी। छोटे बच्चों के साथ सिर्फ 'यह नियम है' कहना पर्याप्त हो सकता है, पर बड़े छात्रों के साथ नियम के पीछे के तर्क व उसके सामाजिक महत्व को समझाना अधिक प्रभावी रहता है, क्योंकि वे परंपरागत या उससे आगे के तर्क-स्तर की ओर बढ़ रहे होते हैं। इसके अलावा, नैतिक शिक्षा (Value Education) की कक्षाओं में दुविधा-आधारित चर्चा-पद्धति सीधे कोलबर्ग के शोध-तरीके से प्रेरित है और REET सिलेबस में मूल्य-शिक्षा के प्रश्नों से भी जुड़ती है।
यह ध्यान रखना भी जरूरी है कि नैतिक विकास के चरण उम्र के साथ स्वतः या स्वचालित रूप से आगे नहीं बढ़ते — बल्कि सामाजिक अनुभव, चर्चा के अवसर व दूसरों के दृष्टिकोण समझने के मौके इस विकास को गति देते हैं। इसीलिए विद्यालय में सहयोगात्मक गतिविधियाँ (जैसे समूह-कार्य, वाद-विवाद, भूमिका-निर्वहन) न केवल शैक्षणिक बल्कि नैतिक विकास के लिए भी उतनी ही महत्वपूर्ण मानी जाती हैं। REET में कई बार यह भी पूछा जाता है कि किस शिक्षण-पद्धति से उच्च स्तर का नैतिक तर्क सर्वाधिक विकसित होता है, और इसका सामान्य उत्तर सदैव 'चर्चा व तर्क-वितर्क आधारित पद्धति' ही होता है, न कि केवल रटवाना या दंड। परीक्षा की दृष्टि से यह भी याद रखें कि प्रत्येक स्तर में ठीक दो चरण होते हैं, इसलिए स्तर व चरण-संख्या को जोड़े में याद रखने से भ्रम नहीं होता।
त्वरित रिवीज़न बिंदु
- कुल स्तर
- 3 (पूर्व-परंपरागत, परंपरागत, उत्तर-परंपरागत)
- कुल चरण
- 6 (हर स्तर में 2-2 चरण)
- सर्वोच्च चरण
- चरण 6 — सार्वभौमिक नैतिक सिद्धांत अभिविन्यास
- शोध पद्धति
- काल्पनिक नैतिक दुविधाओं (हाइंज दुविधा) पर आधारित साक्षात्कार
स्तर याद रखने की ट्रिक
छह चरणों को दो-दो के जोड़े में याद करें: पूर्व-परंपरागत (दंड, स्वार्थ) → परंपरागत (अच्छा बालक, कानून-व्यवस्था) → उत्तर-परंपरागत (सामाजिक अनुबंध, सार्वभौमिक सिद्धांत)। ध्यान रहे, चरण 6 ही 'सार्वभौमिक न्याय' वाला चरण है।
REET 2024 में पूछे गए प्रश्न (हल सहित)
प्रश्न 6
कोल्बर्ग के नैतिक विकास के चरणों के अनुसार, कौन-सा चरण व्यक्तिगत अधिकारों और न्याय के सार्वभौमिक सिद्धान्तों पर केन्द्रित है ?
- Aआज्ञापालन अभिविन्यास
- Bसामाजिक अनुबन्ध अभिविन्यास
- Cकानून और व्यवस्था अभिविन्यास
- Dसार्वभौमिक नैतिक सिद्धान्त अभिविन्यास
व्याख्या
कोहलबर्ग के उत्तर-परम्परागत (Post-conventional) स्तर का अंतिम (छठा) चरण सार्वभौमिक नैतिक सिद्धान्त अभिविन्यास है, जिसमें व्यक्ति न्याय, मानव अधिकार और गरिमा जैसे सार्वभौमिक सिद्धान्तों के आधार पर निर्णय लेता है, भले ही वे कानून से टकराएँ। सामाजिक अनुबन्ध अभिविन्यास (चरण 5) भी व्यक्तिगत अधिकारों पर बल देता है, परंतु 'न्याय के सार्वभौमिक सिद्धान्त' छठे चरण की विशेषता है, इसलिए (D) सही है।
अभ्यास प्रश्न
प्रश्न 1
कोलबर्ग के सिद्धांत में कुल कितने चरण (stages) हैं?
- A4
- B5
- C6
- D8
व्याख्या
कोलबर्ग के नैतिक विकास सिद्धांत में 3 स्तर हैं, प्रत्येक स्तर में 2-2 चरण, यानी कुल 6 चरण हैं।
प्रश्न 2
'आज्ञापालन व दंड अभिविन्यास' कोलबर्ग के किस चरण की विशेषता है?
- Aचरण 1
- Bचरण 3
- Cचरण 5
- Dचरण 6
व्याख्या
चरण 1 (पूर्व-परंपरागत स्तर) में बालक दंड से बचने के आधार पर सही-गलत का निर्णय करता है।
प्रश्न 3
'कानून व व्यवस्था अभिविन्यास' किस स्तर के अंतर्गत आता है?
- Aपूर्व-परंपरागत
- Bपरंपरागत
- Cउत्तर-परंपरागत
- Dइनमें से कोई नहीं
व्याख्या
कानून व व्यवस्था अभिविन्यास (चरण 4) परंपरागत स्तर का हिस्सा है, जिसमें व्यक्ति समाज के नियम व व्यवस्था बनाए रखने को प्राथमिकता देता है।
प्रश्न 4
कोलबर्ग ने अपने अध्ययन के लिए किस तरह की सामग्री का प्रयोग किया?
- Aबुद्धि परीक्षण
- Bकाल्पनिक नैतिक दुविधाएँ (जैसे हाइंज दुविधा)
- Cव्यक्तित्व प्रश्नावली
- Dस्मृति परीक्षण
व्याख्या
कोलबर्ग ने काल्पनिक नैतिक दुविधाओं पर बालकों-किशोरों की प्रतिक्रियाओं का विश्लेषण कर अपना सिद्धांत विकसित किया।
प्रश्न 5
कोलबर्ग के सिद्धांत की सबसे प्रमुख आलोचना क्या है?
- Aयह केवल शारीरिक विकास पर आधारित है
- Bयह सिद्धांत पाश्चात्य/पुरुष-केंद्रित दृष्टिकोण पर अत्यधिक निर्भर माना गया
- Cइसमें कोई चरण नहीं है
- Dयह केवल शैशवावस्था पर लागू होता है
व्याख्या
आलोचकों ने कहा कि कोलबर्ग का सिद्धांत मुख्यतः पुरुष प्रतिभागियों पर आधारित होने से पाश्चात्य/पुरुष-केंद्रित नैतिक तर्क को अधिक महत्व देता है।
प्रश्न 6
कक्षा में शिक्षक छात्रों में उच्च स्तर का नैतिक तर्क विकसित करना चाहता है। इसके लिए सबसे उपयुक्त रणनीति क्या होगी?
- Aकेवल नियम रटवाना
- Bवास्तविक जीवन की नैतिक दुविधाओं पर चर्चा व बहस कराना
- Cनियम तोड़ने पर तुरंत दंड देना
- Dनैतिकता पर कोई चर्चा न करना
व्याख्या
नैतिक दुविधाओं पर चर्चा व तर्क-वितर्क छात्रों को उच्च चरणों (सामाजिक अनुबंध, सार्वभौमिक सिद्धांत) की ओर सोचने के लिए प्रेरित करता है।
प्रश्न 7
चरण 6 (सार्वभौमिक नैतिक सिद्धांत अभिविन्यास) किस स्तर के अंतर्गत आता है?
- Aपूर्व-परंपरागत
- Bपरंपरागत
- Cउत्तर-परंपरागत
- Dकोई स्तर नहीं
व्याख्या
चरण 5 व 6 दोनों उत्तर-परंपरागत (Postconventional) स्तर में आते हैं।
प्रश्न 8
प्राथमिक कक्षा के अधिकांश छोटे बच्चे सामान्यतः किस स्तर के नैतिक तर्क में होते हैं?
- Aउत्तर-परंपरागत
- Bपूर्व-परंपरागत
- Cसार्वभौमिक
- Dकोई भी नहीं
व्याख्या
छोटे बच्चे सामान्यतः दंड से बचने या पुरस्कार पाने (पूर्व-परंपरागत स्तर) के आधार पर नैतिक निर्णय लेते हैं।
प्रश्न 9
'सामाजिक अनुबंध अभिविन्यास' (चरण 5) और 'सार्वभौमिक नैतिक सिद्धांत' (चरण 6) में मुख्य अंतर क्या है?
- Aचरण 5 में कानून को समाज का समझौता माना जाता है जबकि चरण 6 में सार्वभौमिक न्याय-सिद्धांतों को कानून से भी ऊपर रखा जाता है
- Bदोनों में कोई अंतर नहीं
- Cचरण 5 शैशवावस्था में होता है
- Dचरण 6 में केवल दंड का भय होता है
व्याख्या
चरण 5 में व्यक्ति कानून को बदले जा सकने वाला सामाजिक समझौता मानता है, जबकि चरण 6 में व्यक्ति न्याय व मानव गरिमा के सार्वभौमिक सिद्धांतों को कानून से भी ऊपर रखते हुए निर्णय लेता है।
प्रश्न 10
कोलबर्ग का सिद्धांत मूलतः किस मनोवैज्ञानिक के नैतिक विकास संबंधी विचारों का विस्तार माना जाता है?
- Aबी.एफ. स्किनर
- Bजीन पियाजे
- Cसिगमंड फ्रायड
- Dजॉन वाटसन
व्याख्या
कोलबर्ग ने पियाजे के नैतिक विकास सम्बन्धी प्रारंभिक विचारों को आगे बढ़ाकर अपना विस्तृत सिद्धांत प्रस्तुत किया।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
कोलबर्ग के नैतिक विकास सिद्धांत में कितने स्तर व चरण होते हैं?+
कोलबर्ग के सिद्धांत में 3 स्तर हैं, और प्रत्येक स्तर में 2-2 चरण, यानी कुल 6 चरण हैं।
कोलबर्ग ने अपना सिद्धांत किस पर आधारित किया?+
कोलबर्ग ने काल्पनिक नैतिक दुविधाओं (जैसे हाइंज दुविधा) पर बालकों-किशोरों की प्रतिक्रियाओं के विश्लेषण से अपना सिद्धांत विकसित किया।
REET में कोलबर्ग सिद्धांत से किस तरह के प्रश्न आते हैं?+
REET में प्रायः किसी चरण की परिभाषा देकर उसका नाम पहचानने या स्तर-चरण का मिलान करने वाले प्रश्न पूछे जाते हैं।
कोलबर्ग व पियाजे के नैतिक विकास सिद्धांत में क्या संबंध है?+
कोलबर्ग ने पियाजे के प्रारंभिक नैतिक विकास विचारों को आगे बढ़ाकर एक अधिक विस्तृत, 6-चरणीय सिद्धांत प्रस्तुत किया।
'हाइंज दुविधा' क्या है और कोलबर्ग का सिद्धांत किस आयु-वर्ग पर लागू होता है?+
यह कोलबर्ग द्वारा प्रयुक्त एक काल्पनिक नैतिक स्थिति है, जिसमें एक व्यक्ति के सामने अपनी पत्नी की जान बचाने के लिए महँगी दवा चुराने या न चुराने का प्रश्न रखा जाता है, ताकि उसके नैतिक तर्क का स्तर पहचाना जा सके। यह सिद्धांत बाल्यावस्था से लेकर वयस्कता तक — पूरे जीवनकाल में नैतिक तर्क के विकास पर लागू होता है।
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आधिकारिक स्रोत
बदलाव लॉग
- 16 सितंबर 2026 — पेज प्रकाशित — तथ्य स्वतंत्र रूप से जाँचे गए