मुख्य सामग्री पर जाएं

दीर्घ संधि

दीर्घ संधि स्वर संधि का पहला भेद है। जब एक ही परिवार के दो स्वर आमने-सामने आते हैं तो वे मिलकर उसी परिवार का दीर्घ स्वर बना देते हैं। इस पेज पर इसके नियम, पहचान और 37 शब्दों की सूची संधि विच्छेद सहित दी गई है।

29 सितंबर 2026 को सत्यापित

1. दीर्घ संधि — एक ही परिवार के दो स्वर मिलकर लंबे हो जाते हैं

नियम सीधा है — यदि एक ही जाति के दो स्वर आमने-सामने आ जाएँ, चाहे वे छोटे हों या बड़े, तो दोनों मिलकर उसी जाति का दीर्घ (लंबा) स्वर बन जाते हैं। सोचिए, दो एक जैसी ध्वनियाँ साथ आएँ तो जीभ दो बार मेहनत क्यों करे — वह एक ही ध्वनि को खींचकर काम चला लेती है। यही दीर्घ संधि है।

सूत्र रूप में: अ/आ + अ/आ = आ, इ/ई + इ/ई = ई, उ/ऊ + उ/ऊ = ऊ। यहाँ चारों जोड़ संभव हैं — छोटा+छोटा, छोटा+बड़ा, बड़ा+छोटा, बड़ा+बड़ा — और परिणाम हर हाल में वही दीर्घ स्वर रहेगा।

दीर्घ संधि के नियम और उनका रूप

पहला स्वरदूसरा स्वरमिलकर बनेगानमूना
अअआधर्म + अर्थ = धर्मार्थ
अआआदेव + आलय = देवालय
आअआविद्या + अर्थी = विद्यार्थी
आआआमहा + आत्मा = महात्मा
इइईकवि + इंद्र = कवींद्र
इईईगिरि + ईश = गिरीश
ईईईनदी + ईश = नदीश
उउऊभानु + उदय = भानूदय
उऊऊलघु + ऊर्मि = लघूर्मि
ऊउऊवधू + उत्सव = वधूत्सव

दीर्घ संधि — अ और आ के मेल से बने शब्द

  • धर्मार्थधर्म + अर्थ
  • परमार्थपरम + अर्थ
  • देवालयदेव + आलय
  • शिवालयशिव + आलय
  • हिमालयहिम + आलय
  • पुस्तकालयपुस्तक + आलय
  • विद्यालयविद्या + आलयदोनों ओर आ-परिवार का स्वर है
  • रत्नाकररत्न + आकर
  • सूर्यास्तसूर्य + अस्त
  • नराधमनर + अधम
  • शरणार्थीशरण + अर्थी
  • स्वाधीनस्व + अधीन
  • रामावतारराम + अवतार
  • प्रश्नावलीप्रश्न + आवली
  • रेखांकितरेखा + अंकित
  • हिमाच्छादितहिम + आच्छादित
  • विद्यार्थीविद्या + अर्थी
  • महात्मामहा + आत्मा
  • दयानंददया + आनंद
  • सेवार्थसेवा + अर्थ

दीर्घ संधि — इ, ई तथा उ, ऊ के मेल से बने शब्द

  • कवींद्रकवि + इंद्र
  • मुनींद्रमुनि + इंद्र
  • रवींद्ररवि + इंद्र
  • गिरीशगिरि + ईश
  • हरीशहरि + ईश
  • कपीशकपि + ईश
  • मुनीशमुनि + ईश
  • अभीष्टअभि + इष्ट
  • प्रतीक्षाप्रति + ईक्षा
  • परीक्षापरि + ईक्षा
  • अतीवअति + इव
  • भानूदयभानु + उदय
  • गुरूपदेशगुरु + उपदेश
  • लघूर्मिलघु + ऊर्मि
  • सिंधूर्मिसिंधु + ऊर्मि
  • वधूत्सववधू + उत्सव
  • मधूत्सवमधु + उत्सव

दीर्घ संधि में यह गलती न कीजिए

'महात्मा' का विच्छेद 'महात् + मा' नहीं होता, 'महा + आत्मा' होता है। जुड़े शब्द के बीच में जहाँ लंबी आ की मात्रा दिखे, वहीं संधि हुई है — उससे आगे-पीछे नहीं। इसी तरह 'गिरीश' को 'गिरी + श' न तोड़िए, सही रूप 'गिरि + ईश' है, क्योंकि ईश का अर्थ स्वामी है और वही अर्थ में जुड़ रहा है।

इस भाग के अभ्यास प्रश्न

प्रश्न 1

'हिमालय' का संधि विच्छेद है —

  1. Aहिम + लय
  2. Bहिम + आलय
  3. Cहिमाल + य
  4. Dहिमा + लय

व्याख्या

यहाँ 'हिम' के अंत में अ और 'आलय' के आरंभ में आ है। एक ही जाति के दो स्वर मिलने पर दीर्घ आ बनता है, इसलिए यह दीर्घ संधि है।

प्रश्न 2

'कवींद्र' में कौन-सी संधि है?

  1. Aवृद्धि संधि
  2. Bयण् संधि
  3. Cदीर्घ संधि
  4. Dगुण संधि

व्याख्या

'कवि + इंद्र' में इ और इ — एक ही जाति के दो स्वर मिले, इसलिए दीर्घ ई बना। यह दीर्घ संधि है।