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पेपर I · इकाई III · भाग ग

लेखा मानक (Accounting Standards): अर्थ, उद्देश्य, निर्माण-प्रक्रिया और AS बनाम Ind AS

लेखा मानकों का अर्थ, उद्देश्य, निर्माण-प्रक्रिया, कानूनी आधार और AS बनाम Ind AS।

  • लेखा मानक
  • ASB और NFRA
  • धारा 133
  • AS बनाम Ind AS
3 अक्टूबर 2026 को सत्यापित

सिलेबस में

RPSC सिलेबस (09-01-2026), पेपर I, इकाई III, भाग ग: "Accounting Standards: basic knowledge." इस पृष्ठ पर लेखा मानकों का अर्थ, उद्देश्य, निर्माण-प्रक्रिया, कानूनी आधार और AS बनाम Ind AS है; मानकों की सूची और लागू होने की स्थिति अगले पृष्ठ (accounting-standards-applicability) पर है।

इस विषय को क्यों पढ़ें

याद रखें

  • सिलेबस में "basic knowledge" लिखा है, यानी गहरी तकनीकी जानकारी नहीं, पर मूल बातें स्पष्ट चाहिए: मानक क्या है, कौन बनाता है, कंपनियों पर कैसे बाध्यकारी होता है, और AS तथा Ind AS में क्या अंतर है।
  • उपलब्ध पेपरों (2013, 2016, 2018, 2021, 2023, 2024) में लेखा मानकों पर सीधा प्रश्न नहीं आया। पर लेखांकन खंड में 2-अंक के परिभाषा-प्रश्न नियमित आते हैं, इसलिए "लेखा मानक क्या है" और "उसके उद्देश्य" जैसे प्रश्न की तैयारी रखना सुरक्षित है। यह अनुमान है, पैटर्न का दावा नहीं।
  • AS और Ind AS का भ्रम आम है। इस पृष्ठ की तुलना-तालिका और अगले पृष्ठ की सूची साथ पढ़ें।

सरल भाषा में: लेखा मानक क्या है

बाज़ार में एक किलो चावल का मतलब हर दुकान पर एक ही वज़न होता है, क्योंकि बाट-माप के मानक तय हैं। यदि हर दुकानदार अपना किलो खुद तय करे, तो ग्राहक के लिए तुलना ही असंभव हो जाए। लेखांकन में यही काम लेखा मानक (Accounting Standard) करते हैं। NIOS के अनुसार "मानक" ऐसा अनुशासन है जो मार्गदर्शन और मूल्यांकन के पैमाने, दोनों देता है; मार्गदर्शन के रूप में यह लेखांकन की एकसमान प्रथाएँ और तकनीकें देता है।

परीक्षा-योग्य परिभाषा: लेखा मानक वे नियम-कायदे हैं जो वित्तीय विवरणों में किसी विशेष मद (जैसे वस्तु-सूची, राजस्व, मूल्यह्रास) को कैसे दर्ज, मापा और दिखाया जाए, इसकी एकसमान पद्धति तय करते हैं। कंपनी अधिनियम 2013 की धारा 2(2) के अनुसार (ICAI द्वारा उद्धृत) "लेखा मानक" का अर्थ है कंपनियों या कंपनियों के वर्ग के लिए धारा 133 में उल्लिखित लेखांकन के मानक या उनके परिशिष्ट।

उद्देश्य और लाभ

ICAI की अध्ययन-सामग्री के अनुसार लेखा मानकों का उद्देश्य अलग-अलग लेखा-नीतियों और प्रथाओं को एकरूप करके वित्तीय विवरणों की तुलना में आने वाली बाधा हटाना और उनकी विश्वसनीयता बढ़ाना है। इसके तीन व्यावहारिक लाभ निकलते हैं।

पहला, तुलना-योग्यता। जब सभी कंपनियाँ वस्तु-सूची, राजस्व या पट्टे का हिसाब एक ही मानक से करती हैं, तब निवेशक दो कंपनियों के लाभ की तुलना कर पाता है। दूसरा, विश्वसनीयता। ICAI के शब्दों में मानक हितधारकों को विश्वसनीय और तुलना-योग्य लेखा-आँकड़े देते हैं और निवेशकों को अधिक सुविचारित आर्थिक निर्णय लेने में सक्षम बनाते हैं। तीसरा, जवाबदेही। मानक होने से अंकेक्षक के पास एक कसौटी रहती है जिस पर वह राय देता है, और निदेशकों को भी बताना पड़ता है कि मानकों का पालन हुआ या नहीं।

विश्लेषण: मानकों का एक अप्रत्यक्ष लाभ यह भी है कि सरकारी और नियामक संस्थाओं को अलग-अलग ढंग से बने आँकड़ों का मिलान नहीं करना पड़ता। यह बिंदु स्रोतों में सीधे नहीं है, इसलिए उत्तर में इसे "इस प्रकार समझा जा सकता है" के साथ लिखें।

मानक कौन बनाता है और कैसे

भारत में मानक-निर्माण की ज़िम्मेदारी ICAI (भारतीय चार्टर्ड अकाउंटेंट्स संस्थान) के लेखा मानक बोर्ड (Accounting Standards Board, ASB) की है। NIOS के अनुसार ICAI ने ASB का गठन अप्रैल 1977 में किया; ICAI की अपनी सामग्री भी कहती है कि ASB 1977 से मानक-निर्माण में लगा है। NIOS बताता है कि ASB का मुख्य काम उन क्षेत्रों को पहचानना है जहाँ एकरूपता चाहिए, और सरकार, सार्वजनिक उपक्रमों, उद्योग तथा अन्य एजेंसियों के प्रतिनिधियों से चर्चा के बाद मसौदा तैयार करना है।

ICAI के अनुसार प्रक्रिया इस प्रकार चलती है: ASB मसौदा (exposure draft) जारी करता है, जनता की टिप्पणियाँ मँगाई जाती हैं, उन्हें शामिल करके ASB अंतिम मसौदा बनाता है, और उसे राष्ट्रीय वित्तीय रिपोर्टिंग प्राधिकरण (National Financial Reporting Authority, NFRA) को सिफ़ारिश के रूप में भेजता है। इसके बाद केंद्र सरकार, कॉर्पोरेट कार्य मंत्रालय (MCA) के माध्यम से, कंपनियों के लिए AS या Ind AS अधिसूचित करती है। जो संस्थाएँ कंपनी नहीं हैं, उनके लिए ICAI स्वयं AS जारी करता है। ICAI की टिप्पणी यह भी है कि NFRA का गठन कंपनी अधिनियम 2013 के अंतर्गत हुआ और उसने कंपनी अधिनियम 1956 के तहत बनी राष्ट्रीय लेखा मानक सलाहकार समिति (NACAS) का स्थान लिया।

यहाँ एक महत्त्वपूर्ण भेद है: जिसे ICAI तैयार करता है, वह तब तक कंपनियों पर कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं होता जब तक सरकार उसे धारा 133 के अंतर्गत अधिसूचित न करे। राजपत्र के नियमों में भी यही दिखता है: "लेखा मानक" की परिभाषा नियम में बाँधी गई है और नियम 3 बताता है कि कौन-सा मानक-समूह किस पर लागू होगा।

लेखा मानक कैसे बनते और अधिसूचित होते हैं

  1. ASB (ICAI)

    मसौदा तैयार

  2. जन-टिप्पणियाँ

    मसौदे पर सुझाव

  3. ASB अंतिम मसौदा

    सुझाव शामिल

  4. NFRA

    सिफ़ारिश की जाँच

  5. MCA अधिसूचना

    धारा 133 के अंतर्गत

  6. कंपनियों पर लागू

    AS या Ind AS

ICAI अध्याय 1 के आधार पर; गैर-कंपनी इकाइयों के लिए ICAI स्वयं AS जारी करता है।

कानूनी आधार: धाराएँ जो मानकों को बाध्यकारी बनाती हैं

ICAI की अध्ययन-सामग्री चार धाराएँ गिनाती है जो मानकों को कानूनी बल देती हैं। धारा 133: केंद्र सरकार ICAI की सिफ़ारिश पर, NFRA से परामर्श और उसकी सिफ़ारिशों की जाँच के बाद, लेखा मानक निर्धारित कर सकती है; इसी शक्ति से 2015 के नियम बने। धारा 129: वित्तीय विवरण कंपनी की स्थिति का सही और निष्पक्ष चित्र दें, धारा 133 के मानकों का पालन करें और अनुसूची III के प्रारूप में बनें। धारा 134(5)(क): निदेशकों के उत्तरदायित्व-कथन में यह बताना होता है कि लागू मानकों का पालन हुआ और महत्त्वपूर्ण विचलन की उचित व्याख्या दी गई है। धारा 143: अंकेक्षक को राय देनी होती है कि वित्तीय विवरण लेखा मानकों के अनुरूप हैं या नहीं।

NIOS के अनुसार शुरुआत में मानक सिफ़ारिश-स्वरूप थे; जब उनके लाभ और प्रासंगिकता के प्रति जागरूकता बनी, तब उन्हें सभी कंपनियों के लिए अनिवार्य किया गया। यदि कोई कंपनी मानक का पालन न करे, तो उसे विचलन का कारण और उसका वित्तीय प्रभाव बताना पड़ता है। यही कारण है कि मानकों का पालन केवल "अच्छी प्रथा" नहीं, वैधानिक अपेक्षा है।

AS से Ind AS तक: बदलाव की ज़रूरत क्यों पड़ी

ICAI के अनुसार पुराने AS कई नई जटिलताओं को स्पष्टता और पूर्णता से नहीं सँभाल पाते थे। उसकी सूची में शामिल हैं: जटिल वित्तीय लिखत (वैकल्पिक या अनिवार्य रूप से परिवर्तनीय शेयर और डिबेंचर), विदेशी मुद्रा बॉन्ड में अंतर्निहित डेरिवेटिव, समूह का पुनर्गठन, अधिग्रहण, विलय और विभाजन, डिजिटल अर्थव्यवस्था के जटिल राजस्व-मॉडल, कर्मचारी स्टॉक-आधारित पारिश्रमिक, जटिल कर-प्रावधान और शेयरधारकों को प्रतिफल देने के विविध तरीके। साथ ही AS में प्रकटीकरण की अपेक्षाएँ सीमित मानी गईं, विशेषकर राजस्व, संबद्ध पक्ष के लेन-देन, खंड-रिपोर्टिंग और व्यावसायिक संयोजन के बारे में।

इसी पृष्ठभूमि में कॉर्पोरेट कार्य मंत्रालय ने 16 फरवरी 2015 की अधिसूचना G.S.R. 111(E) से कंपनी (भारतीय लेखा मानक) नियम, 2015 जारी किए। ICAI स्पष्ट करता है कि Ind AS अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय रिपोर्टिंग मानकों (IFRS) से मिलाए गए (converged) मानक हैं। वे IFRS की तरह सिद्धांत-आधारित (principles-based) हैं और भारतीय परिपाटी के अनुसार कुछ अपवाद (carve-outs) रखते हैं, इसलिए Ind AS और IFRS एक नहीं हैं।

AS और Ind AS: मुख्य अंतर

आधारAS (पुराने)Ind AS
आधार-ढाँचाभारतीय परिपाटी पर आधारित, ICAI द्वारा विकसितIFRS से मिलाए गए, भारतीय अपवादों सहित (ICAI)
अधिसूचनाकंपनी (लेखा मानक) नियम, 2006 का अनुबंध (राजपत्र नियम 3(2))कंपनी (भारतीय लेखा मानक) नियम, 2015 का अनुबंध (G.S.R. 111(E))
किन परInd AS के दायरे से बाहर की कंपनियाँ; ICAI के अनुसार SMC और गैर-कंपनी इकाइयाँ भीनियम 4 में बताई श्रेणियाँ (नेटवर्थ, सूचीबद्धता, समूह-संबंध के आधार पर)
प्रकृति (ICAI)जटिल लेन-देन पर सीमित मार्गदर्शन; सीमित प्रकटीकरणसिद्धांत-आधारित; अधिक विस्तृत प्रकटीकरण
क्रमांकनAS 1, AS 2 आदि ICAI की श्रृंखलाअंतर्राष्ट्रीय लेखा मानकों (IAS) के क्रमांक वही रखे गए (Ind AS 1, 2, 7...), IFRS के लिए 101 से आगे की श्रृंखला (Ind AS 101, 115...) (ICAI)

ICAI अध्याय 1 और राजपत्र (2015) के आधार पर। "प्रकृति" पंक्ति ICAI की सीमाओं वाली सूची से ली गई है; किस कंपनी पर कौन-सा लागू है, यह अगले पृष्ठ पर है।

मानक, अवधारणा और कानून: तीनों में फ़र्क

विद्यार्थी अक्सर अवधारणा, मानक और कानून को एक ही चीज़ समझ बैठते हैं। सीधा भेद यह है: अवधारणा लेखांकन की बुनियादी मान्यता है (जैसे चालू व्यवसाय या उपार्जन), जो पूरे हिसाब का आधार बनाती है। मानक किसी विशेष मद पर विस्तृत नियम है (जैसे वस्तु-सूची या राजस्व)। कानून वह धारा या नियम है जो बताता है कि मानक का पालन अनिवार्य है और विवरण किस प्रारूप में होंगे। एक उदाहरण से समझें: "संपत्ति पर मूल्यह्रास लगेगा" यह चालू व्यवसाय की अवधारणा से निकलता है; मूल्यह्रास की गणना कैसे हो, यह संबंधित मानक बताता है; और उस मानक का पालन करना कंपनी अधिनियम की धारा 129 के कारण अनिवार्य है।

इस क्रम को याद रखने का आसान तरीका सीढ़ी है। सबसे नीचे अवधारणाएँ हैं, उनके ऊपर मानक, और सबसे ऊपर कानून जो पूरे ढाँचे को बाध्यकारी बनाता है। इन तीनों के मेल को GAAP पृष्ठ पर सामान्य ढाँचे के रूप में समझाया गया है।

कुछ मानकों का काम: एक नज़र

मानकों की पूरी सूची अगले पृष्ठ पर है; यहाँ कुछ मानकों का काम NIOS के वर्णन के अनुसार देख लें। AS 1 वित्तीय विवरणों में महत्त्वपूर्ण लेखा-नीतियों के प्रकटीकरण से संबंधित है। AS 2 वस्तु-सूची के मूल्यांकन के सिद्धांत बताता है। AS 3 नकदी प्रवाह विवरण से जुड़ा है, जो किसी अवधि में संस्था के स्रोतों और उपयोगों का सार देता है। AS 9 लाभ-हानि विवरण में राजस्व की मान्यता के सिद्धांत तय करता है। AS 16 उधार-लागत से संबंधित है, यानी संपत्ति की खरीद के लिए लिए गए ऋण के ब्याज को संपत्ति की लागत में जोड़ने (capitalisation) का नियम। AS 20 प्रति-अंश आय की गणना और प्रस्तुति बताता है।

इनमें से किसी एक या दो मानकों को परीक्षा की दृष्टि से अच्छी तरह तैयार रखें, ताकि "उदाहरण सहित" माँगे जाने पर उत्तर में एक ठोस मानक का नाम और उसका काम लिखा जा सके।

Ind AS का क्रमांक कैसे चलता है

ICAI की सामग्री बताती है कि अंतर्राष्ट्रीय लेखा मानक समिति (IASC) 1973 में बनी, जिसका उद्देश्य वित्तीय रिपोर्टिंग की अलग-अलग प्रथाओं में सामंजस्य लाना था। उसके जारी मानक "अंतर्राष्ट्रीय लेखा मानक" (IAS) कहलाए और 1 से क्रमबद्ध गिने गए, जैसे IAS 1, IAS 2। NIOS भी IASC का गठन 1973 में बताता है। ICAI के अनुसार 1 जुलाई 2000 को IASB बनने के बाद जारी मानक IFRS कहलाए और उनकी नई गिनती 1 से शुरू हुई।

भारत में Ind AS का क्रमांक इसी ढाँचे की नकल करता है। IAS के मानकों को वही नंबर मिले: IAS 1 के लिए Ind AS 1 (वित्तीय विवरणों की प्रस्तुति)। IFRS के लिए 101 से आगे की श्रृंखला रखी गई: IFRS 1 के लिए Ind AS 101। यह छोटी बात परीक्षा में काम की है, क्योंकि "Ind AS 115" जैसा नाम देखकर आप समझ सकते हैं कि वह IFRS-आधारित मानक है।

मानकों की सीमाएँ और आलोचना

हर मानक भी कुछ निर्णय की गुंजाइश छोड़ता है। NCERT कक्षा 12 बताती है कि वित्तीय विवरण दर्ज तथ्यों, लेखांकन अवधारणाओं और व्यक्तिगत निर्णयों का मिश्रण होते हैं; मूल्यह्रास की दर और संदिग्ध ऋण की व्यवस्था जैसे अनुमान प्रबंधन की राय पर टिके हैं। इसलिए मानकों के बावजूद दो कंपनियों के आँकड़े पूरी तरह एक जैसे नहीं हो सकते, और अंकेक्षक की भूमिका ज़रूरी रहती है।

दूसरी सीमा लागत-आधार की है: जहाँ मानक ऐतिहासिक लागत पर चलने को कहते हैं, वहाँ तुलन-पत्र आज के बाज़ार-मूल्य से हट सकता है। तीसरी, मानकों को समय के साथ बदलना पड़ता है। ICAI स्वयं लिखता है कि IFRS का अभिसरण (convergence) एक निरंतर चलने वाली पहल है और IASB नियमित रूप से नए या संशोधित IFRS जारी करता है, इसलिए Ind AS में भी संशोधन होते रहते हैं।

मुख्य तथ्य

ASB की स्थापना
अप्रैल 1977 (ICAI का लेखा मानक बोर्ड)
मानकों की अधिसूचना
केंद्र सरकार, MCA के माध्यम से, NFRA की सिफ़ारिश के बाद (धारा 133)
NFRA
कंपनी अधिनियम 2013 के अंतर्गत गठित; NACAS का उत्तराधिकारी
Ind AS नियम
कंपनी (भारतीय लेखा मानक) नियम, 2015; G.S.R. 111(E), 16-02-2015
Ind AS बनाम IFRS
IFRS से मिलाए गए, पर समान नहीं
मानक के पालन की जाँच
धारा 134(5)(क) निदेशकों का कथन; धारा 143 अंकेक्षक की राय
अंतिम जाँच
2 अक्टूबर 2026

परीक्षा में आम ग़लतियाँ

याद रखें

  • ICAI के बनाए मानक को स्वतः कानूनी बाध्यकारी बता देना: कंपनियों पर बाध्यता सरकार की अधिसूचना (धारा 133) से आती है।
  • Ind AS को IFRS का हू-ब-हू अनुवाद लिखना: Ind AS में भारतीय अपवाद हैं।
  • ASB की स्थापना का वर्ष 1977 की जगह भ्रमवश 1973 लिख देना: 1973 अंतर्राष्ट्रीय लेखा मानक समिति (IASC) का वर्ष है, ASB का नहीं।
  • मानकों की संख्या पक्की संख्या में लिखना: समय के साथ मानक जुड़े और बदले हैं, इसलिए नाम और स्वरूप पर ज़ोर दें।
  • NFRA और ICAI की भूमिका उलट देना: मसौदा ICAI का ASB बनाता है, सिफ़ारिश NFRA की जाँच से गुज़रती है और अधिसूचना सरकार करती है।

पिछले प्रश्नों के बारे में

उपलब्ध पेपरों (2013, 2016, 2018, 2021, 2023, 2024) में लेखा मानकों पर सीधा प्रश्न नहीं आया, इसलिए इस पृष्ठ पर पिछले वर्ष का कोई प्रश्न नहीं है। अभ्यास प्रश्न नीचे हैं और वे अपने बनाए प्रश्न हैं।