केस 9.13: शादी की घोड़ी
- काल्पनिक केस
- कठिनाई
- कठिन
- पाठ्यक्रम बिंदु
- 6: नैतिक चिंतक, व्यवहार में (अंबेडकर और संवैधानिक नैतिकता)
- परखे जाने वाले मूल्य और कानून
- संवैधानिक नैतिकता, समानता और गरिमा, कानून का शासन बनाम लोक-व्यवस्था का दबाव; अनुच्छेद 14, 15, 17 और 21; अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 (सामान्य उल्लेख)
उदाहरण (काल्पनिक)शादी की घोड़ी
सुनंदा राजस्थान के एक जिले में उपखंड मजिस्ट्रेट हैं। एक गाँव में अनुसूचित जाति के एक परिवार में विवाह है और दूल्हा बारात में घोड़ी पर बैठकर निकलना चाहता है। गाँव के कुछ लोग (सभी नहीं), जो स्थानीय रूप से प्रभावशाली समूह के हैं, कहते हैं कि "यहाँ यह परंपरा नहीं रही" और चेतावनी देते हैं कि बारात पर पथराव हो सकता है। थाना प्रभारी सलाह देता है, "बारात रात को निकाल लें, या घोड़ी की जगह गाड़ी से चलें। इससे झगड़ा टल जाएगा और आप पर कोई आँच नहीं आएगी।" दूल्हे का परिवार डरा हुआ है और कहता है, "हम झगड़ा नहीं चाहते, पर यह हमारा हक है।" गाँव में पहले कोई बड़ी हिंसा नहीं हुई है और अधिकांश लोग शांति चाहते हैं। बारात परसों है। स्थानीय खबरों में बात फैल चुकी है और दोनों ओर के कुछ युवक ऑनलाइन गरमागरम संदेश डाल रहे हैं। सुनंदा के पास दो पुलिस टुकड़ियाँ उपलब्ध हैं और थाना प्रभारी योग्य पर सतर्क स्वभाव के हैं।
- हितधारक
- दूल्हे का परिवार (सबसे कमज़ोर पक्ष), गाँव का प्रभावशाली समूह, गाँव के अन्य लोग, थाना प्रभारी और पुलिस, सुनंदा, प्रशासन।
- मुद्दा
- समानता और गरिमा का अधिकार तथा कानून का शासन बनाम "शांति" के नाम पर झुकने का दबाव। संवैधानिक नैतिकता बनाम स्थानीय सामाजिक रीति।
- विकल्प
- क. रात में या गाड़ी से बारात निकलवाकर "समझौता" करवाना (झगड़ा टलता है; पर भेदभाव को मान्यता, अधिकार छोड़ना, भविष्य के लिए गलत संदेश)। ख. बिना संवाद के पूरे गाँव पर निषेधाज्ञा और अग्रिम गिरफ़्तारियाँ लगाकर भारी बल से बारात निकलवाना (अधिकार सुरक्षित; पर पूरा गाँव शत्रु बनता है, तनाव और अविश्वास बढ़ता है, संवाद का अवसर जाता है)। ग. परिवार को बारात निर्धारित समय और ढंग से निकालने का भरोसा और सुरक्षा देना, पर्याप्त पुलिस बल तैनात करना, प्रभावशाली समूह के बुज़ुर्गों से कानूनी स्थिति और परिणाम पर संवाद, बाधा डालने पर कानूनी कार्रवाई की स्पष्ट चेतावनी और ज़रूरत पर कार्रवाई (कठिन; पर अधिकार और शांति दोनों)।
- सर्वश्रेष्ठ
- ग। अंबेडकर ने 4 नवंबर 1948 को संविधान सभा में कहा था कि संवैधानिक नैतिकता कोई स्वाभाविक भाव नहीं है, उसे विकसित करना पड़ता है। अनुच्छेद 14 और 15 समानता देते हैं, अनुच्छेद 17 अस्पृश्यता समाप्त करता है, अनुच्छेद 21 गरिमा देता है; अत्याचार निवारण अधिनियम, 1989 ऐसे दबाव की स्थिति में लागू हो सकता है।
सीख
कार्रवाई: अल्प: लिखित सुरक्षा-योजना, पुलिस तैनाती, दोनों पक्षों से संवाद, बाधा पर तुरंत कार्रवाई, घटना की रिकॉर्डिंग। दीर्घ: गाँव में सद्भाव समिति और जागरूकता, विद्यालयों में समानता की शिक्षा, ऐसी घटनाओं की निगरानी, वंचित परिवारों के लिए संपर्क-तंत्र।
अभ्यास प्रश्न
अभ्यास प्रश्नलगभग 100 शब्द
(10 अंक, 100 शब्द) सुनंदा को क्या करना चाहिए? पाँच चरणों के कार्ड से हल कीजिए।
आदर्श उत्तर
सबसे कमज़ोर हितधारक दूल्हे का परिवार है; प्रभावशाली समूह, गाँव के लोग और पुलिस भी जुड़े हैं। मुद्दा समानता और गरिमा के अधिकार बनाम "शांति" के नाम पर झुकने का है। रास्ते तीन हैं: रात में या गाड़ी से बारात, बिना संवाद भारी बल, या सुरक्षा के साथ बारात और संवाद। पहला अधिकार छोड़ना है; दूसरा तनाव और अविश्वास बढ़ाता है। मैं तीसरा चुनूँगी, क्योंकि अंबेडकर की संवैधानिक नैतिकता और अनुच्छेद 14, 17 तथा 21 समानता और गरिमा माँगते हैं। मैं पुलिस तैनात करूँगी, बुज़ुर्गों से संवाद करूँगी और बाधा पर कानून लागू करूँगी। दीर्घकाल में सद्भाव समिति बनाऊँगी।
अभ्यास प्रश्नलगभग 50 शब्द
(5 अंक, 50 शब्द) अंबेडकर की "संवैधानिक नैतिकता" का इस केस में अर्थ समझाइए।
आदर्श उत्तर
संवैधानिक नैतिकता का अर्थ है समाज की रीति से ऊपर संविधान के मूल्यों (समानता, गरिमा, न्याय) को रखना और उसे सीखना-सिखाना।
अभ्यास प्रश्नलगभग 50 शब्द
(5 अंक, 50 शब्द) ऐसी भेदभावपूर्ण प्रथाओं को घटाने के दीर्घकालिक उपाय बताइए।
आदर्श उत्तर
सद्भाव समिति, शिक्षा में समानता, निगरानी, वंचित परिवारों के लिए सहायता तंत्र।