नैतिक दुविधा और नैतिक द्वंद्व (Ethical and Moral Dilemma)
RAS मुख्य परीक्षा, पत्र II, इकाई I, बिंदु 7: "Ethical concerns, dilemmas and challenges in administration" (प्रशासन में नैतिक चिंताएँ, दुविधाएँ और चुनौतियाँ)
- जनवरी 2026 के पाठ्यक्रम के अनुसार अद्यतन
- पढ़ने का समय: लगभग 15 मिनट
परीक्षा-भार (2018-2024 के प्रश्नों के आधार पर)
बिंदु 7 के सीधे 2 प्रश्न (12 अंक): 2021 भाग क Q3 (2 अंक) और 2023 भाग ग Q13 (10 अंक)। दो और प्रश्न "दुविधा" से जुड़े हैं पर दूसरे बिंदु के नीचे गिने गए: 2018 भाग ग Q11 (गीता और अर्जुन की दुविधा, पृष्ठ 4.5) और 2021 भाग ग Q12 (नैतिक निर्णय बनाम प्रशासनिक निर्णय)। यानी 2018, 2021, 2023 में दुविधा किसी न किसी रूप में आई; 2024 में नहीं।
30 सेकंड का सार
याद रखें
- दुविधा वह स्थिति है जिसमें हर विकल्प की कोई कीमत है। नैतिक दुविधा में दो सही कर्तव्य या मूल्य टकराते हैं और एक को निभाने में दूसरा छूटता है।
- कठिन चुनाव और दुविधा एक नहीं हैं। लालच के सामने सही-गलत साफ़ दिखता है; दुविधा में "सही बनाम सही" होता है।
- चार आम प्रकार (किडर): सच बनाम निष्ठा, व्यक्ति बनाम समुदाय, तात्कालिक बनाम दीर्घकालिक, न्याय बनाम दया। प्रशासन में इनमें "नियम बनाम करुणा" जुड़ जाता है।
- हल के लिए तीन चश्मे: परिणाम, नियम-कर्तव्य और देखभाल (सबके साथ वह करो जो अपने साथ चाहो)। साथ में छह कदम: तथ्य, हितधारक, टकराते मूल्य, विकल्प, परीक्षा, निर्णय और लिखित कारण।
- अच्छा उत्तर "अंतरात्मा की सुनो" पर नहीं रुकता। वह कानून, कारण, अभिलेख और बाद की समीक्षा तक जाता है।
भाग क के लिए छोटे उत्तर (15 शब्द तक)
याद रखें
- प्रश्न (असली PYQ, 2021, भाग क Q3): What do you understand by ethical dilemma?
- उत्तर: दो वैध मूल्यों के बीच ऐसा चुनाव जहाँ एक निभाने पर दूसरा छूट जाता है।
- नैतिक द्वंद्व में दो नैतिक माँगें टकराती हैं और व्यक्ति दोनों पूरी नहीं कर सकता।
- समाधान: तथ्य, हितधारक, मूल्य, विकल्प, तीन चश्मों से परीक्षा, फिर लिखित कारण सहित निर्णय।
1. अर्थ और शब्द
दुविधा (dilemma): ऐसा चुनाव जिसमें हर विकल्प के साथ कुछ खोना पड़ता है।
नैतिक द्वंद्व (moral dilemma), सख्त अर्थ में: स्टैनफ़ोर्ड एनसाइक्लोपीडिया ऑफ़ फ़िलॉसफ़ी (मैककोनेल) के अनुसार: व्यक्ति से दो (या अधिक) कर्म करने की अपेक्षा है; वह हर एक कर सकता है; पर दोनों साथ नहीं कर सकता। असली (genuine) द्वंद्व में कोई भी माँग दूसरी से कमज़ोर सिद्ध नहीं होती।
नैतिक दुविधा (ethical dilemma): आम तौर पर पेशे या पद की भूमिका में दो मूल्यों, नियमों या कर्तव्यों का टकराव। कई पुस्तकें दोनों शब्द एक ही अर्थ में बरतती हैं। परीक्षा के लिए हमारी कामचलाऊ भेद-रेखा (RPSC की नहीं): "द्वंद्व" अंतरात्मा के स्तर का है; "दुविधा" भूमिका और संहिता के स्तर की। उत्तर में पहले कह दें कि आप किस अर्थ में लिख रहे हैं।
पछतावे का अवशेष (moral residue): सही निर्णय के बाद भी जो कसक रहती है। यह संकेत है कि दोनों पक्षों में सचमुच कुछ मूल्यवान था।
दुविधा नहीं क्या है: (क) प्रलोभन, जहाँ सही रास्ता साफ़ है पर कठिन; (ख) साधारण लागत-लाभ, जहाँ कोई मूल्य दाँव पर नहीं; (ग) अज्ञान, जहाँ तथ्य जुटाने से हल निकल आता है।
2. प्रकार
(क) संरचना के आधार पर (SEP):
| भेद | आशय |
|---|---|
| ज्ञानमूलक (epistemic) बनाम तात्त्विक (ontological) | पहले में हमें पता नहीं कि कौन-सी माँग भारी है; दूसरे में सचमुच कोई माँग दूसरी को नहीं दबाती (असली दुविधा) |
| स्वयं-जनित बनाम परिस्थिति-जनित | पहले में अपनी ही गलती से फँसे (जैसे दो टकराते वादे); दूसरे में बिना दोष के |
| कर्तव्य-दुविधा बनाम निषेध-दुविधा | पहले में दो काम करने हैं पर साथ नहीं हो सकते; दूसरे में हर संभव रास्ता निषिद्ध है |
(ख) किडर के चार नमूने (How Good People Make Tough Choices):
| नमूना | प्रशासनिक उदाहरण |
|---|---|
| सच बनाम निष्ठा | वरिष्ठ की चूक पर सच बोलें या साथ दें |
| व्यक्ति बनाम समुदाय | एक परिवार की ज़रूरत बनाम पूरे गाँव की योजना |
| तात्कालिक बनाम दीर्घकालिक | आज का राहत-वितरण बनाम कल की वित्तीय अनुशासन |
| न्याय बनाम दया | नियम की कठोरता बनाम किसी गरीब की मजबूरी |
(ग) प्रशासन में आम रूप (हमारी सूची, याद रखने के लिए): नियम बनाम करुणा · वरिष्ठ का आदेश बनाम जनहित · गोपनीयता बनाम पारदर्शिता · राजनीतिक निर्देश बनाम तटस्थता · निजी बनाम पेशेवर नैतिकता (पृष्ठ 7.5) · AI की सिफ़ारिश बनाम अंतरात्मा (पृष्ठ 7.6) · नैतिक निर्णय बनाम प्रशासनिक निर्णय (2021 भाग ग Q12)।
3. प्रशासन में दुविधाएँ क्यों उठती हैं
संविधान के मूल्य अनेक हैं (स्वतंत्रता, समानता, न्याय) और कभी-कभी आपस में खिंचते हैं; संसाधन कम हैं; विवेकाधिकार है; आदेश श्रेणी-क्रम से आते हैं; और नियम हर स्थिति का पूर्वानुमान नहीं कर पाते।
4. हल की रूपरेखा
तीन चश्मे (किडर):
परिणाम-आधारित (ends-based): किस विकल्प से कुल मिलाकर सबसे अधिक भला और सबसे कम हानि होगी? (उपयोगितावाद, पृष्ठ 6.4)
नियम-आधारित (rule-based): कौन-सा विकल्प उस सिद्धांत पर चलता है जिसे मैं सब पर लागू करना चाहूँगा? (कांट, पृष्ठ 6.3; कर्तव्यवाद)
देखभाल-आधारित (care-based): यदि मैं उनकी जगह होता तो मुझे क्या चाहिए होता? (सुनहरा नियम)
छह कदम (हमारी विधि, RAS केस-विधि कार्ड से मेल खाती):
1. तथ्य: क्या सचमुच दुविधा है, या सूचना की कमी है? पहले तथ्य पक्के करें।
2. हितधारक: कौन प्रभावित होगा? सबसे कमज़ोर कौन है?
3. टकराते मूल्य और नियम: कौन-से दो (या अधिक) मूल्य, कानून या आचरण-नियम खिंच रहे हैं?
4. विकल्प: कम से कम तीन, जिनमें एक "तीसरा रास्ता" हो जो दोनों मूल्यों को आंशिक रूप से बचाए।
5. परीक्षा: हर विकल्प को तीनों चश्मों से, और चार सवालों से जाँचें: क्या यह कानूनसम्मत है? क्या मैं इसे नागरिक या अखबार के सामने समझा सकता हूँ? क्या यह अनुपात में है? क्या इसे पलटा जा सकता है?
6. निर्णय, अभिलेख, समीक्षा: निर्णय लें, कारण लिखें, लागू करें, और बाद में देखें कि क्या सीखा।
व्यवहार के नियम: कानून पहले आता है (आदेश अवैध हो तो मौखिक आदेश लिखित में पुष्ट कराएँ: CCS आचरण नियम 3(2)(iv); गंभीर अवैधता पर ऊपर लिखित में सूचित करें)। भावना के नाम पर कानून न तोड़ें, नियम के नाम पर मानवीयता न छोड़ें। वेबर (1919) की भाषा में: आस्था की नैतिकता और उत्तरदायित्व की नैतिकता, दोनों साथ चाहिए (पृष्ठ 6.6)। डी. के. बसु (18 दिसंबर 1996) में सर्वोच्च न्यायालय ने जानकारी निकलवाने के नाम पर भी यातना को अस्वीकार किया: यह नियम-आधारित चश्मे का न्यायिक उदाहरण है (पृष्ठ 6.6)।
5. गीता और दुविधा (2018 भाग ग Q11 का संकेत)
अर्जुन अपने को "धर्म के विषय में मोहित चित्त वाला" कहता है (2.7) और पूछता है कि निश्चित कल्याणकारी मार्ग क्या है। कृष्ण आदेश नहीं थोपते; बुद्धि-योग समझाते हैं और अंत में कहते हैं: "पूरी तरह विचार करके फिर जैसा चाहो वैसा करो" (18.63)। प्रशासक के लिए सीख: दुविधा में पहले मोह और आसक्ति हटाएँ, कर्तव्य का स्पष्ट बोध करें, फल की चिंता कम और लोकहित का ध्यान अधिक रखें। पूरा उत्तर-सूत्र पृष्ठ 4.5 पर है। ध्यान रहे, 18.66 में समर्पण भी सिखाया गया है, इसलिए यह न लिखें कि गीता असीमित निजी चुनाव का समर्थन करती है (व्याख्या)।
6. नैतिक तनाव का छोटा बॉक्स (2018 भाग ख Q8 के लिए)
2018 के भाग ख Q8 ("What are the main causes of mental stress in an administrator according to you? Explain.", 5 अंक) का मुख्य स्थान व्यवहार इकाई है: पत्र III इकाई III, "Burnout, stress and coping at workplace" (पाठ्यक्रम पंक्ति के अनुसार)। फिर भी नैतिकता वाला हिस्सा यहाँ उपयोगी है:
नैतिक पीड़ा (moral distress): एंड्रयू जेमटन (1984, Nursing Practice: The Ethical Issues) के अनुसार "सही क्या है यह जानते हुए ऐसी स्थिति में होना जिसमें उसे करना लगभग असंभव हो"।
प्रशासक के तनाव के नैतिक स्रोत (हमारी सूची): दुविधाएँ और टकराते आदेश; राजनीतिक या वरिष्ठ का दबाव; तबादले और प्रतिशोध का डर; संसाधनों की कमी के बीच जनता की अपेक्षा; लंबे घंटे और निर्णय का अकेलापन।
निपटने के उपाय: निर्णय के कारण लिखकर रखना (अभिलेख से मन हल्का और स्थिति सुरक्षित), विश्वस्त सहकर्मी या मार्गदर्शक से चर्चा, लिखित आदेश की माँग, कार्य-सीमा तय करना, और व्यवस्था-स्तर पर प्रशिक्षण।
पाठ्य-पुस्तकीय विचार-प्रयोग (घटनाएँ नहीं)
हाइंज़ की दुविधा (लॉरेंस कोह्लबर्ग का नैतिक-विकास में प्रयुक्त उदाहरण: जान बचाने के लिए चोरी?); ट्रॉली समस्या (फ़िलिपा फ़ुट, 1967; नाम जूडिथ थॉमसन, 1976); "दरवाज़े पर हत्यारा" (कांट, 1797: झूठ बोलने पर कांट की कठोरता)। इन्हें सिद्धांत समझाने में प्रयोग करें, इतिहास की तरह नहीं।
उत्तर में कैसे लगाएँ
परिभाषा (दो वैध मूल्यों का टकराव) → एक प्रकार (किडर) → तीन चश्मे और छह कदम → एक वास्तविक उदाहरण (पेत्रोव या बसु) → निर्णय और कारण लिखने की बात।
विचारक और उद्धरण
| नाम | विचार | प्रयोग-योग्य पंक्ति |
|---|---|---|
| स्टैनफ़ोर्ड एनसाइक्लोपीडिया ऑफ़ फ़िलॉसफ़ी (मैककोनेल) | नैतिक द्वंद्व की परिभाषा | "the agent is required to do each of two (or more) actions; the agent can do each of the actions; but the agent cannot do both (or all) of the actions" |
| महात्मा गांधी | कर्तव्यों के टकराव में भीतर की आवाज़ | "The 'still small voice' within you must always be the final arbiter when there is a conflict of duty." (यंग इंडिया, 4 अगस्त 1920) |
| भगवद्गीता 18.63 | पूरा सोचो, फिर चुनो | "Reflect fully on this ... and then act as you wish." (व्याख्या के लिए पृष्ठ 7.6 और 4.5) |
| रशवर्थ किडर | चार नमूने, तीन सिद्धांत | सच बनाम निष्ठा, व्यक्ति बनाम समुदाय, तात्कालिक बनाम दीर्घकालिक, न्याय बनाम दया (How Good People Make Tough Choices, 1995; संशोधित संस्करण 2009) |
| मैक्स वेबर (1919) | आस्था और उत्तरदायित्व की नैतिकता | दोनों साथ चाहिए (विस्तार पृष्ठ 6.6) |
चित्र: समाधान-प्रवाह
दुविधा दिखी: दो वैध मूल्य टकरा रहे हैं
नोड (धूसर)
1 तथ्य पक्के करें, 2 हितधारक पहचानें (सबसे कमज़ोर कौन?)
तीर नीचे। नोड (नीला)
3 टकराते मूल्य और नियम लिखें, 4 कम से कम तीन विकल्प, एक 'तीसरा रास्ता'
तीर नीचे। नोड (नीला)
परिणाम
तीर नीचे। त्रिकोण (नारंगी): तीन कोने: · · ; बीच में
नियम-कर्तव्य
देखभाल
कानूनसम्मत? अखबार के सामने समझा सकूँ? अनुपात में? पलटने योग्य?
6 निर्णय, लिखित कारण, लागू करें
तीर नीचे। नोड (हरा)
समीक्षा और सीख; पछतावे का अवशेष स्वीकारें
तीर नीचे। नोड (नेवी)
कानून पहले; भावना के नाम पर नियम नहीं टूटता, नियम के नाम पर मानवीयता नहीं छूटती।
पाद-पट्टी
पहले इसी अवधारणा का प्रश्न: 2018 में गीता के सहारे (भाग ग), 2021 में 2 अंक की परिभाषा और नैतिक-बनाम-प्रशासनिक निर्णय (भाग ग), 2023 में नैतिक द्वंद्व और निजी बनाम पेशेवर नैतिकता (भाग ग)। 2024 में नहीं। हमारा अनुमान (RPSC की सूचना नहीं): अगला कोण हितों का टकराव, AI या सूचना-देने वाले का हो सकता है।
आम गलतियाँ
याद रखें
- हर कठिन चुनाव को "दुविधा" कह देना; प्रलोभन और दुविधा का भेद न लिखना।
- "अंतरात्मा की सुनें" लिखकर रुक जाना; कानून, कारण और लिखित अभिलेख की बात न करना।
- परिभाषा लिखकर रुकना; समाधान की रूपरेखा या एक वास्तविक उदाहरण न देना। 2 अंक के प्रश्न में बहुत लंबा लिखना भी गलती है।
आत्म-जाँच (5 प्रश्न)
याद रखें
- नैतिक दुविधा की परिभाषा 15 शब्दों में लिखिए।
- किडर के चार नमूने कौन-से हैं?
- तीन चश्मे कौन-से हैं और प्रत्येक किस विचारधारा से जुड़ा है?
- दुविधा और प्रलोभन में क्या फ़र्क है?
- पेत्रोव (1983) का पाठ एक वाक्य में लिखिए।
वास्तविक उदाहरण
केस स्टडीस्टैनिस्लाव पेत्रोव, 26 सितंबर 1983
सोवियत प्रारंभिक-चेतावनी प्रणाली ने मिसाइल-हमले की सूचना दी; ड्यूटी अधिकारी पेत्रोव ने उसे झूठी चेतावनी माना और आगे नहीं बढ़ाया। बाद में पता चला कि वह उपग्रह-प्रणाली की त्रुटि थी।
सीख
प्रोटोकॉल बनाम विवेक की दुविधा में सोचा-समझा विवेक अंतिम जाँच बना (विस्तार पृष्ठ 7.6)।
केस स्टडीडी. के. बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य, 18 दिसंबर 1996
सुरक्षा और जाँच की ज़रूरत बनाम व्यक्ति की गरिमा की दुविधा में न्यायालय ने नियम-आधारित पक्ष चुना: हिरासत में यातना नहीं।
सीख
कुछ रेखाएँ परिणाम के हिसाब से नहीं लाँघी जातीं (स्रोत: पृष्ठ 6.6 की जाँच)।
काल्पनिक केस
उदाहरण (काल्पनिक)काल्पनिक केस (Hypothetical case)
पश्चिमी राजस्थान के एक ज़िले की तहसील में मार्च में अचानक ओलावृष्टि से खड़ी फ़सल चौपट हो गई। तहसीलदार हेमंत के पास ग्राम सेवक की सूची है: 40 परिवार, जिनके पास घर में अनाज नहीं बचा। नियम कहता है कि फ़सल-हानि का मुआवज़ा पटवारी की गिरदावरी (खेत-सर्वे) रिपोर्ट के बाद ही दिया जा सकता है, और सर्वे दल 20 दिन तक नहीं पहुँच सकता। परिवार भूखे हैं; ऊपर से "सूची के आधार पर भुगतान कर दो" का दबाव भी है।
- हितधारक
- 40 परिवार (अधिक संवेदनशील: विधवाएँ, बुज़ुर्ग, बच्चे), तहसीलदार, ग्राम सेवक और पटवारी, अन्य किसान जो सूची में नहीं हैं, उपखंड अधिकारी और कलेक्टर, सरकारी खज़ाना और लेखा-परीक्षा।
- मुद्दा और टकराते मूल्य
- दया, मानवीयता और तात्कालिक राहत बनाम नियम की पालना, ईमानदारी, निष्पक्षता और धन की जवाबदेही। यह "न्याय बनाम दया" और "तात्कालिक बनाम दीर्घकालिक" का मेल है।
- तीन विकल्प
- (क) सूची के आधार पर सीधे मुआवज़ा बाँट देना। लाभ: तुरंत राहत। हानि: बिना सत्यापन भुगतान, गलत लाभार्थी या छूटे हुए पात्र, लेखा-आपत्ति और अधिकारी की व्यक्तिगत जवाबदेही। (ख) बीस दिन सर्वे की प्रतीक्षा करना। लाभ: नियम पूरी तरह निभा। हानि: भूखे परिवारों की अनदेखी, मानवीय विफलता। (ग) तीसरा रास्ता: मुआवज़ा नहीं, पर तत्काल मानवीय राहत (अनाज की आपात व्यवस्था, उपलब्ध राहत-प्रावधानों के भीतर और उपखंड अधिकारी या कलेक्टर की लिखित स्वीकृति से), साथ में सात दिन के भीतर त्वरित संयुक्त सत्यापन (पटवारी, ग्राम सेवक, फ़ोटो-साक्ष्य, ग्राम-सभा में सूची का पाठ) और मुआवज़ा सत्यापन के बाद ही। लाभ: भूख और नियम दोनों सधे। हानि: अतिरिक्त काम, कुछ देरी, कुछ पात्र की सूची से छूट की आशंका जो सत्यापन में सुधरेगी।
- सर्वोत्तम विकल्प और समर्थक मूल्य
- विकल्प (ग)। चश्मे: परिणाम (भूख टली, गड़बड़ी रुकी), नियम (मुआवज़ा नियम से), देखभाल (मैं उनकी जगह होता तो भूखा नहीं छोड़ा जाना चाहता)। मूल्य: करुणा के साथ जवाबदेही, पारदर्शिता। CCS आचरण नियम 3(2)(iv) की भावना से आदेश लिखित में लें और कारण दर्ज करें।
सीख
कदम: अल्पकालिक: उपखंड अधिकारी को लिखित सूचना और स्वीकृति, राहत का वितरण-रजिस्टर, सात दिन की सत्यापन-समय-सारिणी, ग्राम-सभा में सूची। दीर्घकालिक: आपदा के बाद "त्वरित आकलन" की मानक प्रक्रिया (फ़ोटो, सरपंच-सत्यापित सूची), आपात राहत के लिए पूर्व-स्वीकृत सीमा, शिकायत-खिड़की, और हर आपदा के बाद सीख की समीक्षा।
अभ्यास प्रश्न
अभ्यास प्रश्नलगभग 50 शब्द
प्रशासक के सामने आने वाली नैतिक दुविधाओं के मुख्य प्रकार बताइए। किन्हीं दो का उदाहरण दीजिए।
आदर्श उत्तर
प्रशासक की दुविधाएँ मोटे तौर पर चार तरह की हैं: सच बनाम निष्ठा, व्यक्ति बनाम समुदाय, तात्कालिक बनाम दीर्घकालिक, और न्याय बनाम दया। वरिष्ठ की चूक पर बोलना या चुप रहना सच-निष्ठा की दुविधा है; बिना सर्वे राहत देना नियम और करुणा की। हल के लिए तथ्य, कानून और लिखित कारण चाहिए।
अभ्यास प्रश्नलगभग 100 शब्द
नैतिक दुविधा क्या है? ऐसी दुविधा हल करने की वह रूपरेखा समझाइए जो एक ज़िला अधिकारी अपना सकता है।
आदर्श उत्तर
नैतिक दुविधा वह स्थिति है जिसमें दो वैध कर्तव्य या मूल्य टकराते हैं और एक निभाने पर दूसरा छूटता है; प्रलोभन में सही रास्ता साफ़ होता है। ज़िला अधिकारी छह कदम अपना सकता है: तथ्य, हितधारक, टकराते मूल्य और नियम, तीन विकल्प, परीक्षा, निर्णय। परीक्षा तीन चश्मों से हो: परिणाम, नियम-कर्तव्य और देखभाल; साथ में कानूनसम्मत और नागरिक को समझाने योग्य होना देखें। कारण लिखें, बाद में समीक्षा करें। पेत्रोव (1983) और बसु (1996) बताते हैं कि विवेक और नियम कठिन चुनाव में दिशा देते हैं। भावना से कानून न टूटे, नियम से मानवीयता न छूटे।
अभ्यास प्रश्नलगभग 50 शब्द
"What are the main causes of mental stress in an administrator according to you? Explain."
आदर्श उत्तर
प्रशासक के मानसिक तनाव के मुख्य कारण: अत्यधिक काम और लंबे घंटे, राजनीतिक या वरिष्ठ का दबाव, तबादले और प्रतिशोध का डर, सीमित संसाधनों में बड़ी जन-अपेक्षाएँ। नैतिक दुविधाएँ नैतिक पीड़ा बढ़ाती हैं: सही जानना पर करना कठिन पाना। उपाय: लिखित आदेश, कारणों का अभिलेख, मार्गदर्शक से चर्चा, कार्य-सीमा और प्रशिक्षण।
पिछले असली प्रश्न
2021पत्र II, भाग क, Q32 अंक
What do you understand by ethical dilemma?
2023पत्र II, भाग ग, Q1310 अंक
What do you mean by moral dilemma? Should personal ethics take precedence over professional ethics in a situation of moral conflict? (पहला भाग इसी पृष्ठ से, दूसरा पृष्ठ 7.5 से)
2018पत्र II, भाग ग, Q1110 अंक
How does Bhagwad Gita resolve dilemma of Arjun in the face of crisis? As an administrator how will you apply the tenets of Geeta when confronted with administrative dilemma? (उत्तर-सूत्र पृष्ठ 4.5)
2021निकट संबंधीपत्र II, भाग ग, Q1210 अंक
Explain the factors essential in 'Ethical decision' making. In case of ethical decision being against to administrative decision, how will you harmonise them? Explain with examples.
2018सीमा-रेखा का प्रश्नपत्र II, भाग ख, Q85 अंक
What are the main causes of mental stress in an administrator according to you? Explain. यह मुख्यतः व्यवहार इकाई का विषय है (पत्र III इकाई III); ऊपर का नैतिक-तनाव बॉक्स उसका नैतिक पहलू देता है।
यह उत्तर कैसे लिखें
भूमिका
दो वैध मूल्यों का टकराव, प्रलोभन से भेद
मुख्य भाग
- प्रकार, तीन चश्मे, छह कदम, कानून पहले
निष्कर्ष
कारण लिखकर निर्णय
अतिरिक्त मूल्य
- गांधी की भीतर की आवाज़, गीता 18.63, पेत्रोव या बसु
एक पेज में दोहराव
- दुविधा = दो वैध मूल्यों का टकराव
- प्रलोभन ≠ दुविधा
- नैतिक द्वंद्व (SEP): दोनों कर सकता है, साथ नहीं
- पछतावे का अवशेष
- किडर: सच/निष्ठा, व्यक्ति/समुदाय, तात्कालिक/दीर्घकालिक, न्याय/दया
- तीन चश्मे: परिणाम, नियम, देखभाल
- छह कदम: तथ्य, हितधारक, मूल्य, विकल्प (तीसरा रास्ता), परीक्षा, निर्णय-अभिलेख-समीक्षा
- कानून पहले; मौखिक आदेश लिखित में (CCS 3(2)(iv))
- वेबर 1919
- बसु 18.12.1996
- पेत्रोव 26.9.1983
- गांधी 4.8.1920
- गीता 2.7, 18.63 (पृष्ठ 4.5)
- जेमटन 1984 नैतिक पीड़ा
- PYQ: 2021 क Q3, 2023 ग Q13, 2018 ग Q11, 2021 ग Q12, 2018 ख Q8
- केस: तहसीलदार हेमंत, ओलावृष्टि, आपात राहत + सात दिन में सत्यापन।