प्रशासकों के लिए गांधीवादी मार्गदर्शन: तावीज़-कसौटी और लोकसेवकों की संहिता
RAS मुख्य परीक्षा, पत्र II, इकाई I, बिंदु 5: "Gandhian ethics" (प्रशासन में अनुप्रयोग के साथ)
- जनवरी 2026 के पाठ्यक्रम के अनुसार अद्यतन
- पढ़ने का समय: लगभग 12 मिनट
परीक्षा-भार (2018-2024 के प्रश्नों के आधार पर)
अब तक इस पर अलग प्रश्न नहीं आया। यह पृष्ठ असली गांधी प्रश्नों (स्वराज 2023, न्यासिता 2018, साधन-साध्य 2021, अहिंसा 2018 और 2023) के नीचे आने वाले बिंदुओं को जोड़ता है, और "प्रशासन में गांधीवादी नीतिशास्त्र" पर किसी भी 10 अंक के प्रश्न के लिए तैयार अनुप्रयोग-खंड देता है।
30 सेकंड का सार
याद रखें
- तावीज़-कसौटी: जिस सबसे ग़रीब और कमज़ोर व्यक्ति का चेहरा आपने देखा हो, उसे याद करें और पूछें कि आपका कदम उसके किसी काम आएगा या नहीं। यह गांधी को आरोपित (attributed) है; नीचे स्रोत-टिप्पणी देखें।
- मंत्रियों की संहिता (हरिजन, 1938-1948): पद सेवा है, निजी लाभ की आशा नहीं; "साहब लोग" जैसा जीवन नहीं; आलोचना स्वीकारें; वचन निभाएँ; मंत्री जनता के सेवक हैं।
- सादगी और सीमाएँ: 1931 के कराची कांग्रेस प्रस्ताव में सुझाव था कि (विशेष विशेषज्ञों आदि को छोड़कर) राज्य के किसी सेवक का वेतन सामान्यतः 500 रुपये प्रतिमाह से अधिक न हो।
- सात सामाजिक पाप (यंग इंडिया, 22 अक्टूबर 1925 में गांधी द्वारा प्रकाशित): श्रम के बिना संपत्ति, विवेक के बिना सुख, चरित्र के बिना ज्ञान, नैतिकता के बिना वाणिज्य, मानवता के बिना विज्ञान, त्याग के बिना धर्म, सिद्धांत के बिना राजनीति।
- आज के आचरण नियम इनकी गूँज हैं: सत्यनिष्ठा, कमज़ोर वर्ग के प्रति संवेदनशीलता, योग्यता, निष्पक्षता, जनहित में निर्णय।
भाग क के लिए छोटे उत्तर (15 शब्द तक)
याद रखें
- प्रश्न: सार्वजनिक निर्णयों के लिए गांधी का तावीज़ क्या है?
- उत्तर: सबसे ग़रीब का चेहरा याद करें; पूछें कि कदम उसके काम आएगा या नहीं।
- गांधी ने मंत्रियों से कहा: पद सेवा है, निजी लाभ की आशा नहीं।
- गांधी के "सात सामाजिक पापों" में सिद्धांत बिना राजनीति और नैतिकता बिना वाणिज्य हैं।
1. तावीज़-कसौटी (आरोपित)
शब्द। "Whenever you are in doubt, or when the self becomes too much with you, apply the following test: Recall the face of the poorest and the weakest man whom you may have seen, and ask yourself if the step you contemplate is going to be of any use to him... Then you will find your doubts and self melting away." भाव: जब संदेह हो या अहं हावी हो, तब सबसे ग़रीब और कमज़ोर व्यक्ति का चेहरा याद करें और पूछें कि आपका कदम उसके काम आएगा या नहीं; आपके संदेह और अहं पिघल जाएँगे।
स्रोत-टिप्पणी (महत्वपूर्ण)। यह पाठ नवजीवन ट्रस्ट के गांधी के चुने हुए लेखन (Selected Works) के संस्करण की प्रस्तावना (श्रीमन्नारायण) में मिलता है। प्रस्तावना पियारेलाल की Mahatma Gandhi: The Last Phase, खंड 2 (1958), पृ. 65 का हवाला देती है। गांधी के अपने लेखन में दिनांकित मूल नहीं मिलता, इसलिए इस पृष्ठ में इसे गांधी को आरोपित कहा गया है। उत्तर में लिखें "गांधी का तावीज़ (आरोपित; पियारेलाल)"। इसकी तिथि न लिखें।
लंबा रूप। एक लंबा रूप (यह पूछना कि कदम से उसे अपने जीवन और भाग्य पर नियंत्रण मिलेगा या नहीं, और अंत में "स्वराज") बहुत प्रचलित है, पर वह केवल ब्लॉगों में मिलता है। उसे गांधी के शब्द बताकर न लिखें; स्रोत वाला छोटा रूप प्रयोग करें।
प्रयोग कैसे। इसे निर्णय की कसौटी की तरह लें: योजना की रचना, बजट के चुनाव, कठिन फ़ाइल, या ऐसा मामला जहाँ अहं (महत्वाकांक्षा, भय, श्रेय) ज़ोर से बोल रहा हो।
2. मंत्रियों की संहिता (हरिजन, 1938-1948)
(द माइंड ऑफ़ महात्मा गांधी में संकलित)
"The holding of any office in the Congress Government must be in the spirit of service without the slightest expectation of personal gain" (हरिजन, 3 सितंबर 1938, पृ. 242)।
"...the ministers cannot live as sahib log nor use for private work facilities provided by Government for official duties" (हरिजन, 29 सितंबर 1946, पृ. 333)।
"Ministers should not be sensitive [to public criticism]... The critics expect much more from these chosen servants of the people than from others in the way of simplicity, courage, honesty and industry" (हरिजन, 21 सितंबर 1947, पृ. 325)।
"They should never promise what they cannot do. Once a promise is made, it must be kept at all cost" (हरिजन, 14 दिसंबर 1947, पृ. 467)।
"The ministers are [the people's] servants. They can do nothing against the express wishes of the people. They will not stay in office a day longer than the people wish" (हरिजन, 4 जनवरी 1948, पृ. 495)।
ये मंत्रियों के लिए कहे गए थे, पर भाव हर लोकसेवक पर लागू होता है (हमारा अनुप्रयोग)।
3. सादगी और सार्वजनिक वेतन की सीमा
1931 का कराची कांग्रेस प्रस्ताव (मौलिक अधिकार और कर्तव्य), बिंदु 10: "No servant of the State, other than specially employed experts and the like, shall be paid above a certain fixed figure, which should not ordinarily exceed Rs. 500 per month" (स्रोत: constitutionofindia.net)।
गांधी का न्यासिता विचार (पृष्ठ 5.4) माँगता है कि अधिकतम आय सीमित हो और न्यूनतम तथा अधिकतम आय का अंतर घटे (हरिजन, 25 अक्टूबर 1952)।
4. सात सामाजिक पाप
(द्वितीयक टिप्पणी: सूची गांधी ने 22 अक्टूबर 1925 को यंग इंडिया में प्रकाशित की; वह एक पत्र-लेखक की ओर से आई थी और छह महीने पहले इंग्लैंड में एफ़. एल. डोनाल्डसन के एक उपदेश से लगभग मिलती है, द्वितीयक स्रोत: विकिपीडिया)। इसलिए "गांधी द्वारा प्रकाशित" लिखें, "गांधी द्वारा रचित" नहीं।
श्रम के बिना संपत्ति · विवेक के बिना सुख · चरित्र के बिना ज्ञान · नैतिकता के बिना वाणिज्य · मानवता के बिना विज्ञान · त्याग के बिना धर्म · सिद्धांत के बिना राजनीति।
प्रशासक इन्हें जोड़ सकते हैं: श्रम के बिना संपत्ति (भ्रष्टाचार), चरित्र के बिना ज्ञान (प्रतिभाशाली पर बेईमान अधिकारी), सिद्धांत के बिना राजनीति (पक्षपात)।
5. आचरण नियम गांधी की कहाँ गूँज हैं
(केंद्रीय सिविल सेवा (आचरण) नियम, 1964, 31.12.2014 तक संशोधित; राजस्थान सिविल सेवा (आचरण) नियम, 1971 में वही मूल कर्तव्य हैं (नियम 3(1)(i) पूर्ण निष्ठा, 3(1)(ii) कर्तव्यपरायणता, 3(2)(ii) लिखित निर्देश), पर यह लंबी सूची नहीं; खंड-संख्या उद्धृत करने से पहले राजस्थान का वर्तमान पाठ देख लें)
| गांधीवादी विचार | नियम 3 (आचरण नियम) |
|---|---|
| निजी लाभ के बिना सेवा | 3(1)(xv): पद का दुरुपयोग कर स्वयं, परिवार या मित्रों के लिए लाभ न लेना |
| ईमानदारी और नैतिकता | 3(1)(i), (vi): पूर्ण सत्यनिष्ठा; उच्च नैतिक मानक और ईमानदारी |
| सबसे ग़रीब पहले (तावीज़) | 3(1)(x): जनता के प्रति संवेदनशीलता, विशेषकर कमज़ोर वर्ग; 3(1)(xvii): निष्पक्षता, "विशेषकर ग़रीब और वंचित वर्गों" के प्रति |
| जनहित, संसाधनों का सावधान प्रयोग | 3(1)(xii): निर्णय केवल जनहित में, संसाधन "कुशलता, प्रभावशीलता और मितव्ययिता" से |
| योग्यता, कृपा नहीं | 3(1)(xvi): चुनाव और सिफ़ारिशें केवल योग्यता पर |
| आदेश लिखित (स्पष्टता, ईमानदारी) | 3(2)(iii)-(iv): अधिकारी के निर्देश सामान्यतः लिखित; मौखिक निर्देश की लिखित पुष्टि |
| अनुशासन | 3(1)(xix): अनुशासन और वैध आदेशों का पालन |
6. सीमाएँ और संतुलन
(हमारा नोट)
गांधी का मार्गदर्शन नैतिक कम्पास है, नियमों का विकल्प नहीं; कानून और प्रक्रिया का प्रयोग करें, और जहाँ नियम विवेक के लिए जगह छोड़ें वहाँ तावीज़ का।
तावीज़ का अर्थ यह नहीं कि कानून के ऊपर सदा ग़रीब को रखें; अर्थ यह है कि वैध विकल्पों में से चुनते समय सबसे कमज़ोर पर प्रभाव तौलें।
कुछ स्रोत पुराने हैं और राजनेताओं को संबोधित हैं; यहाँ वे सादृश्य से लागू किए गए हैं।
वास्तविक उदाहरण
कराची, 1931.
प्रस्ताव की वेतन-सीमा (ऊपर) राज्य सेवकों के लिए सादे जीवन के आदर्श का प्रारंभिक सार्वजनिक कथन है।
चंपारण, 1917.
गांधी किसानों के पास गए, उनके बयान दर्ज किए, आदेश से बचने के बजाय दंड स्वीकारने को तैयार रहे (अदालत में पेशी 18 अप्रैल 1917), और जाँच से 4 मार्च 1918 का चंपारण कृषि अधिनियम आया (PIB लेख, 7 अप्रैल 2017; आत्मकथा, भाग V)। यह सबसे कमज़ोर को पहले रखने का व्यावहारिक उदाहरण है।
अहमदाबाद, 1918.
मिल-मालिकों से निकट संबंध के बावजूद गांधी ने आत्मकथा (भाग V, अध्याय 22) में स्वीकार किया कि उनका उपवास "was not free from a grave defect" (गंभीर दोष से मुक्त नहीं था), क्योंकि मालिकों से उनकी निकटता उनके निर्णय को प्रभावित कर सकती थी। उन्होंने अपने संभावित प्रभाव को ईमानदारी से दर्ज किया; हितों के टकराव के प्रति यह संवेदनशीलता अपनाने योग्य है।
व्यवहार में संहिता (राजस्थान)
तावीज़ लागू करने वाले किसी नामित राजस्थानी अधिकारी का प्रलेखित उदाहरण यहाँ नहीं दिया गया है; ऐसा दावा न करें।
उत्तर में कैसे लगाएँ
तावीज़ (आरोपित के रूप में), मंत्रियों की संहिता की एक पंक्ति, एक आचरण नियम, और एक उदाहरण।
विचारक और उद्धरण
| नाम | विचार | प्रयोग-योग्य पंक्ति |
|---|---|---|
| महात्मा गांधी (आरोपित; पियारेलाल, 1958) | तावीज़ | "Recall the face of the poorest and the weakest man whom you may have seen, and ask yourself if the step you contemplate is going to be of any use to him" |
| महात्मा गांधी | पद में सेवा | "The holding of any office... must be in the spirit of service without the slightest expectation of personal gain" (हरिजन, 3 सितंबर 1938) |
| महात्मा गांधी | वचन | "Once a promise is made, it must be kept at all cost" (हरिजन, 14 दिसंबर 1947) |
| महात्मा गांधी | जनता के सेवक | "The ministers are [the people's] servants" (हरिजन, 4 जनवरी 1948) |
| कराची कांग्रेस 1931 | वेतन-सीमा | "...should not ordinarily exceed Rs. 500 per month" |
चित्र: निर्णय की कीप
लेने का निर्णय (योजना, फ़ाइल, बजट)
शीर्ष: ।
क्या वैध और ईमानदार है? (आचरण नियम)
कीप चरण 1: । चरण 2: । चरण 3: । चरण 4: ।
क्या साधन ईमानदार हैं? (पृष्ठ 5.3)
तावीज़: क्या यह सबसे ग़रीब और कमज़ोर के काम आएगा?
क्या मैं इसे सार्वजनिक रूप से समझा सकता हूँ?
निर्णय; कारण दर्ज करें
नीचे: ।
इस सटीक विषय पर अब तक कोई अलग असली PYQ नहीं। संबंधित असली PYQ: 2018 भाग क (अहिंसा), 2018 भाग ख (पूँजी और श्रम), 2021 भाग ग (साधन-साध्य), 2023 भाग ख (स्वराज), 2024 भाग ग (उपयोगितावाद, सर्वोदय और लोक-संग्रह)। सटीक शब्दों के लिए पृष्ठ 5.2 से 5.5 देखें।
पहले यह कैसे पूछा गया: गांधी 2018, 2021, 2023 और 2024 में लंबे प्रश्नों के रूप में आए हैं; "प्रशासन में अनुप्रयोग" का प्रश्न अगला स्वाभाविक कदम है (हमारा मत)।
आम गलतियाँ
याद रखें
- तावीज़ का लंबा "will he gain anything... Swaraj" रूप निश्चित गांधी-पाठ बताकर उद्धृत करना; स्रोत वाला छोटा रूप लिखें और "आरोपित" कहें।
- यह लिखना कि गांधी ने सात सामाजिक पाप "लिखे"; लिखें कि उन्होंने सूची यंग इंडिया (22 अक्टूबर 1925) में प्रकाशित की।
- मंत्रियों की संहिता को कानून बताना; यह गांधी के कथनों का संकलन है, कानून नहीं।
आत्म-जाँच (5 प्रश्न)
याद रखें
- तावीज़ को एक पंक्ति में और उसकी स्रोत-टिप्पणी बताइए।
- मंत्रियों की संहिता की दो पंक्तियाँ तिथियों सहित बताइए।
- कराची प्रस्ताव ने राज्य सेवकों के वेतन पर क्या सुझाया?
- सात सामाजिक पापों में से तीन बताइए।
- तावीज़ को एक आचरण नियम से मिलाइए।
काल्पनिक केस
उदाहरण (काल्पनिक)काल्पनिक केस (Hypothetical case)
सुनीता ज़िला कलेक्टर है। ज़िले में इस वर्ष विकास के लिए 40 करोड़ रुपये उपलब्ध हैं। स्थानीय व्यापारी और कुछ नेता व्यस्त स्टेशन चौक पर फ़्लाईओवर (38 करोड़) की माँग करते हैं, जिससे हज़ारों कार-चालकों के कुछ मिनट बचेंगे। 45 किलोमीटर दूर पहाड़ी खंड के आदिवासी ढाणों में न सर्वमौसमी सड़क है, न छत वाला स्कूल, न सुरक्षित पेयजल; इन तीनों ज़रूरतों को ठीक करने का खर्च लगभग 36 करोड़ है।
- हितधारक
- सुनीता, व्यापारी वर्ग और कार-चालक, आदिवासी ढाणों के लोग (बच्चे, महिलाएँ, बुज़ुर्ग), स्थानीय नेता, अभियांत्रिकी और वित्त विभाग, राज्य सरकार।
- मुद्दा और टकराते मूल्य
- कई लोगों को दिखने वाला लाभ बनाम कम और कमज़ोर लोगों की अत्यावश्यक बुनियादी ज़रूरतें; लोकप्रियता और दबाव बनाम समता और न्याय। मूल्य: सर्वोदय (अंतिम व्यक्ति पहले), सत्यनिष्ठा, निष्पक्षता, जनहित (आचरण नियम 3(1)(x), (xii), (xvii))।
- तीन विकल्प
- (क) फ़्लाईओवर बनाना। लाभ: प्रभावशाली वर्ग प्रसन्न, दिखती समस्या हल। हानि: बुनियादी ज़रूरतें अधूरी और शक्तिशाली को तरजीह; मानव-कल्याण की दृष्टि से कम मूल्य। (ख) केवल आदिवासी ढाणों पर खर्च करना और यातायात की समस्या को छोड़ देना। लाभ: बुनियादी ज़रूरतें पूरी। हानि: वास्तविक शहरी समस्या बनी रहती है; विरोध बढ़ सकता है। (ग) तावीज़ और पारदर्शी मूल्यांकन लगाना: इस वर्ष आदिवासी ढाणों का पैकेज पहले रखना (पानी, स्कूल भवन, फिर सड़क), फ़्लाईओवर के लिए अन्य निधि या चरणबद्ध वित्त खोजना (जैसे राज्य का सड़क बजट, अगले वर्ष का आवंटन, या कम लागत का डिज़ाइन), और कारण सार्वजनिक रूप से समझाना। लाभ: समता और ईमानदारी, यातायात की समस्या का रास्ता भी। हानि: अभी कुछ नाराज़गी; समझाने का परिश्रम।
- सर्वोत्तम विकल्प और समर्थक मूल्य
- विकल्प (ग)। समर्थक मूल्य: तावीज़-कसौटी (क्या यह सबसे ग़रीब के काम आएगा?), सर्वोदय, सत्यनिष्ठा, पारदर्शिता। यह "ग़रीब बनाम शहर" नहीं: यह पहले ज़रूरी चीज़ें हैं।
सीख
कदम: अल्पकालिक: ज़िला योजना समिति को प्रति रुपये लाभ और पहुँचे लोगों की संख्या की तुलना का नोट देना; जलापूर्ति और स्कूल भवन शुरू करना; राज्य से फ़्लाईओवर के चरणों का अनुरोध करना। दीर्घकालिक: प्रकाशित प्राथमिकता-नियम (बुनियादी ज़रूरतें पहले), योजना के लिए ग्राम सभा से इनपुट, अंतिम-छोर की कमियों की वार्षिक रिपोर्ट, और डिज़ाइन की समीक्षा ताकि फ़्लाईओवर बाद में किफ़ायत से बन सके।
अभ्यास प्रश्न
अभ्यास प्रश्नलगभग 50 शब्द
गांधी के तावीज़ की व्याख्या कीजिए और प्रशासन में उसका उपयोग बताइए।
आदर्श उत्तर
गांधी को आरोपित तावीज़ कहता है: संदेह में सबसे ग़रीब और कमज़ोर देखे हुए व्यक्ति का चेहरा याद करें और पूछें कि आपका कदम उसके किसी काम आएगा या नहीं, तब संदेह और अहं मिटेंगे। यह स्वार्थ रोकता है और कमज़ोर को पहले रखता है; योजना-रचना और बजट-चुनाव में मार्गदर्शक है।
अभ्यास प्रश्नलगभग 100 शब्द
गांधीवादी विचार आज भी लोकसेवकों का मार्गदर्शन करते हैं। उदाहरण सहित चर्चा कीजिए।
आदर्श उत्तर
गांधी का मार्गदर्शन व्यावहारिक है: सेवा करें, शासन नहीं। उनकी मंत्री-संहिता पद को "निजी लाभ की तनिक आशा के बिना" सेवा कहती है और सादगी, आलोचना की स्वीकृति और निभाए गए वचन माँगती है। उन्हें आरोपित तावीज़ पूछता है कि कदम सबसे ग़रीब के काम आएगा या नहीं। उनका साधन-साध्य नियम ईमानदार प्रक्रिया माँगता है, जैसा अहमदाबाद (1918) में दिखा। आचरण नियम 3(1)(x), (xv) और (xvii) इनकी गूँज हैं। ये कानून के साथ चलने वाला कम्पास हैं, विकल्प नहीं; ये स्वार्थ, पक्षपात और दबाव रोकते हैं और सर्वोदय को हर योजना की व्यावहारिक कसौटी बनाते हैं, खासकर बजट-चुनाव में।
यह उत्तर कैसे लिखें
भूमिका
पद को सेवा मानने वाला गांधी का दृष्टिकोण
मुख्य भाग
- तावीज़, मंत्रियों की संहिता, सादगी, आचरण नियमों का मेल, एक उदाहरण
निष्कर्ष
कानून के साथ नैतिक कम्पास
अतिरिक्त मूल्य
- हरिजन 3-9-1938, 14-12-1947; कराची 1931; आचरण नियम 3(1)(xv), (xvii)
एक पेज में दोहराव
- तावीज़ (आरोपित; पियारेलाल 1958 पृ. 65; दिनांकित मूल नहीं मिला)
- सबसे ग़रीब और कमज़ोर का चेहरा
- मंत्री-संहिता: सेवा (H 3.9.1938), साहब लोग नहीं (H 29.9.1946), आलोचना (H 21.9.1947), वचन (H 14.12.1947), सेवक (H 4.1.1948)
- कराची 1931 रु. 500
- सात सामाजिक पाप (YI 22.10.1925, गांधी द्वारा प्रकाशित)
- आचरण नियम 3(1)(i), (vi), (x), (xii), (xv), (xvi), (xvii), (xix); 3(2)(iii)-(iv)
- चंपारण 1917
- अहमदाबाद 1918 हितों के टकराव पर स्पष्टता
- केस: कलेक्टर सुनीता, फ़्लाईओवर बनाम आदिवासी ढाणे, विकल्प (ग) तावीज़ और चरणबद्धता।