मुख्य सामग्री पर जाएं
पृष्ठ 5.3

गांधीवादी नीतिशास्त्र में साधन और साध्य

Read this in English →

RAS मुख्य परीक्षा, पत्र II, इकाई I, बिंदु 5: "Gandhian ethics" (गांधीवादी नीतिशास्त्र)

  • जनवरी 2026 के पाठ्यक्रम के अनुसार अद्यतन
  • पढ़ने का समय: लगभग 10 मिनट
2 अक्टूबर 2026 को सत्यापित

परीक्षा-भार (2018-2024 के प्रश्नों के आधार पर)

1 प्रश्न, 2021 का 10 अंक का भाग ग ("Necessarily related, means cannot be separated from ends...")। यह विचार 2018 के भाग क के अहिंसा प्रश्न (पृष्ठ 5.2) के नीचे भी है। हमारे बैंक के इकाई I के 52 प्रश्नों में गांधी-नामित प्रश्न ये हैं: 2018 भाग क (अहिंसा) और भाग ख (पूँजी और श्रम), 2021 भाग ग (साधन-साध्य) और 2023 भाग ख (स्वराज), कुल 22 अंक; इनके अलावा दो प्रश्न अन्य बिंदुओं से साझा हैं (2023 भाग क, अहिंसा परमो धर्म; 2024 भाग ग, सर्वोदय)। इसलिए साधन-साध्य का छोटे रूप में दोहराव संभव है।

30 सेकंड का सार

याद रखें

  • गांधी ने साधन और साध्य को एक ही श्रृंखला माना: "Means and ends are convertible terms in my philosophy of life" (मेरे जीवन-दर्शन में साधन और साध्य एक-दूसरे में बदले जा सकने वाले शब्द हैं)।
  • उनकी उपमा बीज और वृक्ष की है: साधन और साध्य के बीच वैसा ही अटूट संबंध है। हम वही काटते हैं जो बोते हैं।
  • इसलिए अच्छा साध्य बुरे साधन को उचित नहीं ठहराता; परिणाम पर पद्धति की छाप रहती है।
  • अहिंसा साधन है, सत्य साध्य; साधन हमारी पहुँच में है, साध्य पर हमारा पूरा नियंत्रण नहीं।
  • प्रशासक के लिए: झूठी रिपोर्ट, रिश्वत या दबाव से पाया गया लक्ष्य असफलता है, क्योंकि वह उसी भरोसे को तोड़ता है जिसके लिए लक्ष्य था।

भाग क के लिए छोटे उत्तर (15 शब्द तक)

याद रखें

  • प्रश्न: "means are after all everything" से गांधी का क्या आशय था?
  • उत्तर: साध्य की गुणवत्ता पूरी तरह प्रयुक्त साधन की गुणवत्ता पर निर्भर करती है।
  • गांधी की उपमा: साधन और साध्य बीज और वृक्ष की तरह अविभाज्य हैं।
  • अहिंसा साधन है, सत्य साध्य; साधन सदा हमारी पहुँच में रहते हैं।

1. केंद्रीय दावा

परिवर्तनीय शब्द। "Means and ends are convertible terms in my philosophy of life" (यंग इंडिया, 26 दिसंबर 1946, द माइंड ऑफ़ महात्मा गांधी में संकलित)।

साधन ही सब कुछ। "They say 'means are after all means'. I would say 'means are after all everything'. As the means so the end. Indeed the Creator has given us control (and that too very limited) over means, none over the end. Realization of the goal is in exact proportion to that of the means. This is a proposition that admits of no exception" (यंग इंडिया, 17 जुलाई 1924, पृ. 236)। भाव: लोग कहते हैं साधन तो बस साधन है; मैं कहूँगा साधन ही सब कुछ है। जैसा साधन, वैसा साध्य। हमारा नियंत्रण साधन पर है, साध्य पर नहीं।

बीज और वृक्ष। "The means may be likened to a seed, the end to a tree; and there is just the same inviolable connection between the means and the end as there is between the seed and the tree... We reap exactly as we sow" (हिंद स्वराज, 1909, अध्याय 16)।

2. अच्छा साध्य हर साधन को उचित क्यों नहीं ठहराता

गांधी का अपना उदाहरण: कोई शैतान के द्वारा ईश्वर की पूजा नहीं कर सकता; यह "ignorant folly" (अज्ञानभरी मूर्खता) होगी (हिंद स्वराज, अध्याय 16)। बेईमान तरीका ईमानदार परिणाम नहीं दे सकता।

हिंद स्वराज अध्याय 16 यह भी कहता है कि अंग्रेज़ों ने हिंसा से अधिक मताधिकार पाया, पर इससे वे अपने कर्तव्य को बेहतर नहीं समझने लगे; वास्तविक अधिकार कर्तव्य-पालन से आते हैं। बल से जीता परिणाम टिकाऊ अधिकार नहीं।

गलत तरीके से अच्छी चीज़ पाने वाला दूसरों को भी गलत तरीका सिखाता है। तरीका नकल होता है; साध्य भुला दिया जाता है।

3. अहिंसा साधन है, सत्य साध्य

"Ahimsa and Truth are so intertwined that it is practically impossible to disentangle and separate them... Nevertheless, Ahimsa is the means; Truth is the end. Means to be means must always be within our reach, and so Ahimsa is our supreme duty. If we take care of the means, we are bound to reach the end sooner or later" (यरवदा मंदिर, अध्याय II)। गांधी का आशय: परिणाम पर हमारा हुक्म नहीं चलता, पर अपनी पद्धति पर चलता है; इसलिए पहले व्यक्ति को पद्धति से परखें।

4. व्यवहार में इसका अर्थ

संघर्ष के नियम। अहमदाबाद हड़ताल (1918) की गांधी की चार शर्तों में कभी हिंसा का सहारा न लेना और हड़ताल तोड़ने वालों को न सताना शामिल था (आत्मकथा, भाग V, अध्याय 20)।

साधन टूटे तो रुकें। 1922 में चौरी चौरा में भीड़ ने पुलिसकर्मियों को मार दिया, तो गांधी ने आंदोलन स्थगित कर दिया, क्योंकि साधन टूट गया था।

विरोधी के साथ स्पष्टता। तथ्य छिपाकर पाया साध्य सत्य-साध्य नहीं। खेड़ा (1918) तब समाप्त हुआ जब सरकार के आदेश से ग़रीब किसानों की वसूली स्थगित हुई; गांधी ने उसे मान लिया, पर लिखा कि उस अंत में वह "grace" (गरिमा) नहीं थी जो वे चाहते थे (आत्मकथा, भाग V, अध्याय 25)। उन्होंने साफ़ विजय का दावा करने के बजाय कमी खुलकर लिखी।

5. आपत्तियाँ और उत्तर

(हमारी व्यवस्था)

"राजनीति को परिणाम चाहिए।" उत्तर: गांधी ने नहीं कहा कि परिणाम मायने नहीं रखते; उन्होंने कहा कि परिणाम पद्धति पर निर्भर है, इसलिए बुरी पद्धति परिणाम को आगे चलकर बिगाड़ देती है।

"क्या यह अव्यावहारिक है?" उत्तर: जो साधन वे माँगते हैं (सच्चे अभिलेख, निष्पक्ष प्रक्रिया, संयम) वे सस्ते और उपलब्ध हैं; महँगा है तो धैर्य।

"अपराध रोकने के लिए बल का क्या?" उत्तर: तब भी वे कम से कम हानि माँगते हैं ("the path of least violence", हरिजन, 28 सितंबर 1934, देखें पृष्ठ 5.2)।

6. प्रशासक का प्रयोग

(हमारा अनुप्रयोग)

हर लक्ष्य को उसकी पद्धति से परखें: आँकड़े सही थे? प्रक्रिया निष्पक्ष थी? किसी को हानि या दबाव तो नहीं?

झूठे प्रमाणपत्र से पूरा दिखाया लक्ष्य, ईमानदार कारणों के साथ चूके लक्ष्य की फ़ाइल से बुरा है।

सूत्र: "क्या मैं यह बताने को तैयार हूँ कि मैंने यह कैसे किया?" (गांधीवादी प्रचार-कसौटी, हमारा शब्द)।

वास्तविक उदाहरण

अहमदाबाद मिल हड़ताल, 1918.

हड़ताल की सलाह देने से पहले गांधी ने मज़दूरों को "सफल हड़ताल की शर्तें" समझाईं: हिंसा नहीं, हड़ताल तोड़ने वालों को न सताना, दान पर निर्भर न रहना, और दृढ़ रहकर किसी अन्य ईमानदार श्रम से रोटी कमाना। हड़ताल 21 दिन चली; मज़दूर डगमगाए तो गांधी ने उपवास किया और फिर विवाद सुलझा (आत्मकथा, भाग V, अध्याय 20-21)। बात यह कि कारण उचित मज़दूरी का था और तरीका कारण जितना ही स्वच्छ।

चंपारण, 1917.

गांधी 18 अप्रैल 1917 को अदालत में पेश हुए और आदेश से बचने के बजाय दंड स्वीकार करने को तैयार रहे; फिर सरकारी जाँच समिति 11 जुलाई से 4 अक्टूबर 1917 तक बैठी (आत्मकथा, भाग V; PIB लेख, 7 अप्रैल 2017)। चंपारण कृषि अधिनियम 4 मार्च 1918 को आया। खुला साधन, टिकाऊ परिणाम।

चौरी चौरा, 1922.

4 फ़रवरी 1922 की भीड़-हिंसा के बाद आंदोलन वापस लिया गया (द्वितीयक स्रोत: विकिपीडिया)। इतने बड़े राष्ट्रीय साध्य को भी हिंसक साधन का बहाना नहीं बनने दिया गया।

डांडी, 1930.

नमक यात्रा की पहले से घोषणा हुई। गांधी ने शुरू होने से पहले वायसराय को पत्र लिखा और 12 मार्च को साबरमती से अपने ही आश्रम के निवासियों में से मुख्यतः चुने 78 यात्रियों के साथ चले, जो अहिंसा से बँधे थे, और 6 अप्रैल को नमक कानून तोड़ा (द्वितीयक स्रोत: विकिपीडिया, "Salt March")। योजनाबद्ध, अनुशासित, खुली।

उत्तर में कैसे लगाएँ

भाग ग की संरचना: कथन ("necessarily related..."), फिर हिंद स्वराज का बीज और वृक्ष, फिर दो उदाहरण, फिर प्रशासनिक प्रासंगिकता।

विचारक और उद्धरण

नामविचारप्रयोग-योग्य पंक्ति
महात्मा गांधीसाधन ही सब कुछ"means are after all everything. As the means so the end" (यंग इंडिया, 17 जुलाई 1924)
महात्मा गांधीबीज और वृक्ष"We reap exactly as we sow" (हिंद स्वराज, अध्याय 16)
महात्मा गांधीपरिवर्तनीय शब्द"Means and ends are convertible terms in my philosophy of life" (यंग इंडिया, 26 दिसंबर 1946)
महात्मा गांधीअहिंसा और सत्य"Ahimsa is the means; Truth is the end" (From Yeravda Mandir, अध्याय II)

चित्र: बीज और वृक्ष

साधन: सत्य, अहिंसा, निष्पक्ष प्रक्रिया

बायीं ओर: बीज, लेबल ।

अटूट संबंध (हिंद स्वराज, अध्याय 16)

ऊपर की ओर तीर: लेबल ।

साध्य: स्वराज, न्याय, भरोसा

दायीं ओर: वृक्ष, लेबल ।

छल, बल

नीचे: बुरा बीज () काँटेदार वृक्ष देता है। शीर्षक: ।

हम वही काटते हैं जो बोते हैं

पहले यह कैसे पूछा गया: एक बार, 10 अंक के भाग ग में (2021)। 5 अंक के रूप में बीज-वृक्ष का विचार और एक उदाहरण माँगा जाएगा।

आम गलतियाँ

याद रखें

  • यह लिखना कि गांधी परिणाम की परवाह नहीं करते थे; उन्होंने कहा कि साध्य साधन पर निर्भर है।
  • गांधी का स्रोत न देना; बीज और वृक्ष (हिंद स्वराज, अध्याय 16) या यंग इंडिया, 17 जुलाई 1924 अवश्य लिखें।
  • केवल अमूर्त बात करना; अहमदाबाद, चौरी चौरा या प्रशासनिक उदाहरण जोड़ें।

आत्म-जाँच (5 प्रश्न)

याद रखें

  • बीज और वृक्ष की उपमा कहाँ आती है?
  • पूरा कीजिए: "means are after all _____"।
  • गांधी की अहिंसा-सत्य की जोड़ी में साधन कौन है और साध्य कौन?
  • चौरी चौरा के बाद गांधी ने आंदोलन क्यों स्थगित किया?
  • प्रशासन में "स्वच्छ साधन" का एक उदाहरण दीजिए।