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पृष्ठ 5.4

न्यासिता सिद्धांत (ट्रस्टीशिप)

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RAS मुख्य परीक्षा, पत्र II, इकाई I, बिंदु 5: "Gandhian ethics" (गांधीवादी नीतिशास्त्र)

  • जनवरी 2026 के पाठ्यक्रम के अनुसार अद्यतन
  • पढ़ने का समय: लगभग 10 मिनट
2 अक्टूबर 2026 को सत्यापित

परीक्षा-भार (2018-2024 के प्रश्नों के आधार पर)

1 प्रश्न, 2018 का 5 अंक का भाग ख (Q9, "Labour is capital and the living capital is inexhaustible...", महात्मा गांधी के संदर्भ में पूँजी और श्रम)। न्यासिता पर नाम लेकर अब तक प्रश्न नहीं आया, इसलिए इस पर भाग ख या ग संभव है।

30 सेकंड का सार

याद रखें

  • न्यासिता: व्यक्ति की ईमानदार ज़रूरतों से अधिक संपत्ति समाज की है, और स्वामी उसे जनता के न्यासी (ट्रस्टी) के रूप में रखता है।
  • गांधी: "what belongs to me is the right to an honourable livelihood, no better than that enjoyed by millions of others. The rest of my wealth belongs to the community" (मेरा केवल सम्मानजनक आजीविका का अधिकार है, जो लाखों लोगों से बेहतर नहीं; शेष संपत्ति समुदाय की है)।
  • यह अहिंसक अर्थशास्त्र है: वे पूँजीवाद को "almost, if not quite, as much as the most advanced Socialist" (लगभग उतना ही जितना सबसे उन्नत समाजवादी) समाप्त करना चाहते थे, पर बल से नहीं, हृदय-परिवर्तन से।
  • राज्य नियमन कर सकता है (कमीशन, सीमा), और कानून नीचे से उठना चाहिए; वे केंद्रीकृत राज्य की शक्ति से भी डरते थे।
  • प्रशासक के लिए: व्यापार से ईमानदार व्यवहार, दान के बदले कोई रियायत नहीं, और सार्वजनिक संसाधन न्यास की तरह।

भाग क के लिए छोटे उत्तर (15 शब्द तक)

याद रखें

  • प्रश्न: गांधीवादी चिंतन में न्यासिता क्या है?
  • उत्तर: ज़रूरत से अधिक संपत्ति समाज की है; स्वामी केवल उसका न्यासी है।
  • गांधी पूँजी और श्रम में मेल चाहते थे, हृदय-परिवर्तन से, वर्ग-संघर्ष से नहीं।
  • गांधी का मंत्र: "त्याग कर भोगो", यानी अधिशेष समाज के लिए लगाओ।

1. सिद्धांत

"Supposing I have come by a fair amount of wealth, either by way of legacy, or by means of trade and industry, I must know that all that wealth does not belong to me; what belongs to me is the right to an honourable livelihood, no better than that enjoyed by millions of others. The rest of my wealth belongs to the community and must be used for the welfare of the community" (हरिजन, 3 जून 1939, पृ. 145)। भाव: वसीयत या व्यापार से मिली संपत्ति सारी मेरी नहीं; मेरा हक केवल सम्मानजनक आजीविका का है, बाकी समुदाय की। मज़दूर के पास भी अपना कुछ है: "काम करने की शक्ति"।

2. मंत्र और मूल विचार

"Earn your crores by all means. But understand that your wealth is not yours; it belongs to the people. Take what you require for your legitimate needs, and use the remainder for society" (हरिजन, 1 फ़रवरी 1942, पृ. 20)। वे इसे सर्वश्रेष्ठ मंत्र कहते हैं: "Enjoy thy wealth by renouncing it" (त्याग करके भोगो; उनका रूपांतर ईशोपनिषद् के श्लोक 1 का: "तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्")।

मूल: ईश्वर रोज़ रचता है, जमा नहीं करता; इसलिए जिसके पास ज़रूरत से अधिक है वह ईश्वर की प्रजा का न्यासी है (हरिजन, 23 फ़रवरी 1947, पृ. 39)।

अस्तेय से कड़ी: "whoever appropriates more than the minimum that is really necessary for him is guilty of theft" (जो अपनी वास्तविक न्यूनतम ज़रूरत से अधिक रखता है, वह चोरी का दोषी है) (आश्रम अवलोकन-व्रत, पृ. 58, Ashram Observances in Action)।

3. बलपूर्वक संपत्ति क्यों नहीं ली जाए?

"75 per cent voluntarily given is better than 100 per cent surrendered at the point of bayonet" (हरिजन, 1 जून 1935, पृ. 121-22; पियरे सेरेसोल से बातचीत)।

"My theory of trusteeship is no make-shift, certainly no camouflage... No other theory is compatible with non-violence" (हरिजन, 16 दिसंबर 1939, पृ. 376)।

यदि स्वामी न्यासी की तरह न चलें तो "we shall have to deprive them of their possessions through the State with the minimum exercise of violence" (हमें राज्य के द्वारा, कम से कम हिंसा के साथ, उनसे संपत्ति ले लेनी होगी) (द मॉडर्न रिव्यू, अक्टूबर 1935, पृ. 412)। यानी अंतिम उपाय राज्य की कार्रवाई है, पर न्यूनतम हिंसा से।

4. राज्य और कानून की भूमिका

स्वामी "stewardship of their possessions" (संपत्ति की देखरेख) रखेंगे और अपनी प्रतिभा से संपत्ति बढ़ाएँगे, "not for their own sakes, but for the sake of the nation"। राज्य "regulate the rate of commission" (कमीशन की दर तय करेगा), और उनके बच्चे न्यासिता के "only if they proved their fitness" (योग्यता सिद्ध करने पर ही) उत्तराधिकारी होंगे (हरिजन, 31 मार्च 1946, पृ. 63-64)।

कानून "will not be imposed from above. It will have to come from below" (ऊपर से नहीं थोपा जाएगा; नीचे से आएगा), ग्राम पंचायतों से शुरू होकर (उसी अंश में)।

पर वे राज्य-शक्ति से भी डरते थे: "the violence of private ownership is less injurious than the violence of the State" (निजी स्वामित्व की हिंसा राज्य की हिंसा से कम हानिकारक है) (मॉडर्न रिव्यू, अक्टूबर 1935)।

"व्यावहारिक न्यासिता सूत्र" (किशोरलाल मशरूवाला और नरहरि पारीख ने तैयार किया, गांधी ने कुछ परिवर्तन किए; बाद में हरिजन, 25 अक्टूबर 1952 में प्रकाशित): वह निजी संपत्ति को केवल उतना मानता है जितना "permitted by society for its own welfare" (समाज अपने कल्याण के लिए अनुमति दे), विधायी नियमन को नहीं रोकता, अधिकतम आय की सीमा सुझाता है, और कहता है कि उत्पादन का स्वरूप "social necessity and not by personal whim or greed" (सामाजिक आवश्यकता से, निजी मनमानी या लोभ से नहीं) तय होगा।

5. पूँजी और श्रम: 2018 के प्रश्न की पंक्ति

यंग इंडिया, 14 जनवरी 1932, पृ. 178 में (तिथि और पृष्ठ नवजीवन के "ट्रस्टीशिप" संकलन के अनुसार; यह प्रश्नोत्तर के रूप में दिया उत्तर है) गांधी बताते हैं कि अर्थशास्त्री और पूँजीपति सर डैनियल हैमिल्टन के अनुसार धातु का टुकड़ा पूँजी मानना गलत है; "it is labour that is capital, and that living capital is inexhaustible" (श्रम ही पूँजी है, और वह जीवित पूँजी अक्षय है)। गांधी जोड़ते हैं: "It is upon that law that we have been working in the Labour Union at Ahmedabad."

गांधी की पद्धति: श्रम संगठित और त्यागी हो; "capital is perfectly helpless without labour" (श्रम के बिना पूँजी असहाय है); श्रम जब "नहीं" कहना चाहे तो बिना प्रतिशोध "नहीं" कहे; श्रम पूँजी हड़पकर "सबसे बुरे अर्थ में" पूँजीपति न बन जाए।

2018 के प्रश्न का पाठ मिला-जुला है। उसका पहला वाक्य ("Labour is capital...") हैमिल्टन का विचार है जिसे गांधी ने उद्धृत किया (ऊपर)। दूसरा भाग यंग इंडिया, 8 जनवरी 1925, पृ. 10 में गांधी के शब्दों से मिलता है: "I am for the establishment of right relations between capital and labour... I do not wish for the supremacy of the one over the other" (संकलन Selections from Gandhi के अनुसार)। "equitable" परचे का अपना शब्द है। उत्तर में 1925 वाली पंक्ति और हैमिल्टन वाली पंक्ति स्रोत के साथ उद्धृत करें, और परचे के वाक्य को गांधी का एक अक्षरशः उद्धरण न बताएँ।

6. क्या न्यासिता संभव है? आलोचना और उत्तर

(हमारी व्यवस्था)

आलोचना: यह सदिच्छा पर टिका है, स्वामी शायद ही स्वेच्छा से देते हैं, कानूनी दाँत नहीं। उत्तर: गांधी ने कहा कि कितने लोग निभाते हैं यह "immaterial" (अप्रासंगिक) है; यह आस्था का प्रश्न है, और कानून बाद में आ सकता है (वैधानिक न्यासिता)।

आलोचना: शंकरराव देव ने पूछा: पहले करोड़ों कमाना ही क्यों? गांधी ने उत्तर दिया कि संपत्ति शुद्ध साधनों से भी आ सकती है (जैसे संयोग से हीरा मिलना), और कमाई ईमानदार होनी चाहिए (हरिजन, 22 फ़रवरी 1942)।

आधुनिक गूँज (द्वितीयक): कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 135 उस कंपनी से, जो पिछले वर्ष की तीन सीमाओं में से कोई एक पार करती हो (निवल मूल्य 500 करोड़ रुपये या अधिक, कारोबार 1,000 करोड़ या अधिक, या शुद्ध लाभ 5 करोड़ या अधिक), पिछले तीन वर्षों के औसत शुद्ध लाभ का कम से कम 2 प्रतिशत कॉर्पोरेट सामाजिक दायित्व (CSR) पर खर्च कराती है (अधिनियम के एक विधिक सार के अनुसार)। यह उसी विचार का कानूनी रूप है, पर गांधी का सिद्धांत नहीं।

7. प्रशासक का अनुप्रयोग

(हमारा अनुप्रयोग)

पद का न्यास: सार्वजनिक धन, भूमि और शक्तियाँ न्यास में रखी हैं; आप जनता के संसाधनों के न्यासी हैं।

उपहार के बदले रियायत नहीं। व्यवसाय का दान या CSR प्रस्ताव कभी नरमी या जल्दी मंज़ूरी नहीं खरीद सकता।

दोनों पक्षों के प्रति निष्पक्ष। श्रम-विवाद में अहमदाबाद की तरह सुलह और पंचनिर्णय अपनाएँ।

व्यापार की इच्छा का सदुपयोग। CSR निधि को पारदर्शी, अंकेक्षित माध्यमों से सार्वजनिक ज़रूरतों के लिए आमंत्रित करें।

कराची कांग्रेस, 1931.

कांग्रेस प्रस्ताव (बिंदु 10, व्यय और वेतन) में कहा गया कि विशेष रूप से नियुक्त विशेषज्ञों आदि को छोड़कर राज्य का कोई सेवक एक निश्चित सीमा से ऊपर वेतन न पाए, जो "should not ordinarily exceed Rs. 500 per month" (सामान्यतः 500 रुपये प्रतिमाह से अधिक न हो) (स्रोत: constitutionofindia.net)। यह अति-लाभ पर सीमा के उसी विचार का प्रारंभिक सार्वजनिक रूप है।

कंपनी अधिनियम, 2013, धारा 135.

आधुनिक कानूनी गूँज, ऊपर बताई गई (द्वितीयक स्रोत)।

चंपारण, 1917.

बागान मालिकों के पास भूमि और शक्ति थी; उपाय जाँच और 4 मार्च 1918 के चंपारण कृषि अधिनियम से आया, ज़ब्ती से नहीं (PIB लेख, 7 अप्रैल 2017)।

उत्तर में कैसे लगाएँ

परिभाषा (स्वामी न्यासी), उद्धरण, अहिंसा से कड़ी, राज्य की भूमिका, और अंत में CSR या अहमदाबाद।

विचारक और उद्धरण

नामविचारप्रयोग-योग्य पंक्ति
महात्मा गांधीसिद्धांत"The rest of my wealth belongs to the community and must be used for the welfare of the community" (हरिजन, 3 जून 1939)
महात्मा गांधीमंत्र"Earn your crores by all means... use the remainder for society" (हरिजन, 1 फ़रवरी 1942)
महात्मा गांधीअहिंसक आधार"No other theory is compatible with non-violence" (हरिजन, 16 दिसंबर 1939)
महात्मा गांधीस्वैच्छिक बेहतर"75 per cent voluntarily given is better than 100 per cent surrendered at the point of bayonet" (हरिजन, 1 जून 1935)
महात्मा गांधी (सर डैनियल हैमिल्टन को उद्धृत करते हुए)श्रम ही पूँजी"it is labour that is capital, and that living capital is inexhaustible" (यंग इंडिया, 14 जनवरी 1932)

चित्र: न्यास का त्रिकोण

स्वामी (न्यासी)

शीर्ष: ।

श्रमिक और समाज (लाभार्थी)

नीचे बायीं ओर: । नीचे दायीं ओर: ।

राज्य (कमीशन, सीमा का नियमन; कानून नीचे से)

अधिशेष कल्याण के लिए

तीर: स्वामी से समाज: । राज्य से स्वामी: । समाज से राज्य: ।

नियमन, उत्तराधिकार की योग्यता

कानून पंचायतों से उठे

पद्धति: हृदय-परिवर्तन, अहिंसा, वर्ग-संघर्ष नहीं

बीच का लेबल: ।

पहले यह कैसे पूछा गया: एक बार (2018, भाग ख), पूँजी और श्रम पर; इसलिए न्यासिता किसी अन्य रूप में पूछे जाने की संभावना है (हमारा मत)।

आम गलतियाँ

याद रखें

  • न्यासिता को असीम निजी संपत्ति का समर्थन बताना; गांधी हृदय-परिवर्तन से पूँजीवाद समाप्त करना चाहते थे और राज्य-नियमन भी मानते थे।
  • इसे केवल दान लिखना; यह स्वामित्व का सिद्धांत है, जिसका कानून नीचे से आएगा।
  • अहिंसा या अहमदाबाद का उल्लेख न करना; हमेशा अहिंसा और 1918 की हड़ताल से जोड़ें।

आत्म-जाँच (5 प्रश्न)

याद रखें

  • धनी व्यक्ति के उचित हिस्से पर गांधी की परिभाषा बताइए (हरिजन, 3-6-1939)।
  • धनी लोगों के लिए गांधी का मंत्र क्या था?
  • उन्होंने ज़ब्ती से स्वैच्छिक दान को बेहतर क्यों माना?
  • उन्होंने राज्य को क्या भूमिका दी?
  • न्यासिता से मिलता एक आधुनिक कानून बताइए और उसका अंतर।