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पृष्ठ 4.3

स्थितप्रज्ञ

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RAS मुख्य परीक्षा, पत्र II, इकाई I, बिंदु 4: "Ethics of Bhagavad Geeta and its role in administration" (भगवद्गीता की नैतिकता और प्रशासन में उसकी भूमिका)

  • जनवरी 2026 के पाठ्यक्रम के अनुसार अद्यतन
  • पढ़ने का समय: लगभग 10 मिनट
2 अक्टूबर 2026 को सत्यापित

परीक्षा-भार (2018-2024 के प्रश्नों के आधार पर)

सीधा प्रश्न एक: 2021 भाग क Q1 (2 अंक), "स्थित प्रज्ञ" की संकल्पना की प्रशासनिक भूमिका। 2018 और 2023-2024 में नाम से नहीं आया। 2018 भाग क में भावनात्मक बुद्धि (EI) का प्रश्न आया था, जो इस विषय से जुड़ता है (यह हमारा जोड़ है)।

30 सेकंड का सार

याद रखें

  • अर्जुन 2.54 में पूछते हैं: जिसकी बुद्धि स्थिर है, वह कैसे बोलता, बैठता और चलता है? 2.55 से 2.72 तक के 18 श्लोक उत्तर हैं।
  • शब्द-अर्थ: प्रज्ञा = विवेक या समझ; स्थित = टिकी हुई। यानी जिसका विवेक सुख-दुख, प्रशंसा-निंदा और दबाव में डगमगाता नहीं।
  • लक्षण: कामनाओं से बेपरवाह और भीतर से संतुष्ट (2.55); दुख में उद्विग्न नहीं, सुख में लालसा नहीं; राग, भय और क्रोध से मुक्त (2.56); अच्छे-बुरे में न हर्ष, न द्वेष (2.57); इंद्रियों पर संयम (2.58, 2.61)।
  • 2.62-63 बताते हैं कि चिंतन से आसक्ति, फिर कामना, क्रोध, मोह, स्मृति-भ्रम और विवेक-नाश तक का क्रम बनता है। प्रशासनिक चूकें अक्सर इसी सीढ़ी से उतरती हैं।
  • प्रशासन में: संकट में शांति, वस्तुनिष्ठ निर्णय और अहं-रहित सेवा (2.71)। भावनात्मक बुद्धि से तुलना प्रायः होती है, पर वह व्याख्या है।

भाग क के लिए छोटे उत्तर (15 शब्द तक)

याद रखें

  • प्रश्न (असली PYQ, 2021, पत्र II, भाग क, 2 अंक): "प्रशासनिक कर्त्तव्य के निर्वहन में 'स्थित प्रज्ञ' की संकल्पना की भूमिका को स्पष्ट कीजिए।"
  • उत्तर: स्थितप्रज्ञ दबाव और प्रशंसा-निंदा में विवेक स्थिर रखता है; इससे निर्णय निष्पक्ष रहते हैं।
  • क्रोध, भय और लालसा से मुक्त अधिकारी संकट में शांत रहकर सही निर्णय लेता है।
  • गीता 2.55-72 के लक्षण: समत्व, संयम, अनासक्ति और अहंकार-शून्यता।

1. प्रसंग: अर्जुन का प्रश्न

मूल पंक्ति (2.54): "स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव। स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम्॥"

गांधी (अनासक्तियोग, खंड 10) लिखते हैं कि दूसरा अध्याय युद्ध के नियम नहीं सिखाता, "tells us how a perfected man is to be known"। अनुवाद-भेद: गांधी का अनुवाद "the man whose understanding is secure" है, शास्त्री का शंकर-अनुवाद "steady knowledge"।

2. लक्षण और कार्यालय का व्यवहार (हमारी व्याख्या)

श्लोकगीता का लक्षणकार्यालय में व्यवहार
2.55सब कामनाएँ छोड़कर आत्मा में ही संतुष्टअपनी तृप्ति के लिए बाहरी लाभ, पद या प्रशंसा पर निर्भर नहीं
2.56दुख में उद्विग्न नहीं, सुख में लालसा नहीं; राग-भय-क्रोध से मुक्तआलोचना और संकट में स्थिर; दबाव में भी निर्णय साफ़
2.57शुभ-अशुभ पाकर न हर्ष, न द्वेषसफलता पर अहंकार नहीं, विफलता पर दोषारोपण नहीं
2.58, 2.61कछुए की तरह इंद्रियों को समेट लेना; संयमप्रलोभन और आवेग पर नियंत्रण
2.64-65राग-द्वेष से मुक्त होकर विषयों में विचरना; प्रसन्नता में बुद्धि स्थिरशांत मन से निर्णय की गुणवत्ता बढ़ती है
2.70समुद्र में नदियाँ आती रहती हैं, पर वह उफनता नहींमाँगों और दबावों की बाढ़ में भी अडिग
2.71कामनाएँ छोड़कर निर्मम और निरहंकार"मेरा विभाग, मेरा श्रेय" का भाव नहीं; सेवा-भाव

2.70 की मूल पंक्ति: "आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत्।"

2.71 की मूल पंक्ति: "निर्ममो निरहङ्कारः स शान्तिमधिगच्छति।"

3. क्रोध की सीढ़ी (2.62-63)

मूल पंक्तियाँ: "ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते। सङ्गात्सञ्जायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥ क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः। स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥"

क्रम: विषयों का चिंतन → आसक्ति → कामना → क्रोध → मोह → स्मृति-भ्रम → बुद्धि-नाश → पतन।

प्रशासनिक पढ़त (हमारी): किसी व्यक्ति या परिणाम पर अटके रहने से निर्णय में आसक्ति आती है; बाधा आने पर क्रोध; क्रोध में नियम, प्रशिक्षण और पूर्व-अनुभव "भूल" जाते हैं (स्मृति-भ्रम); तब अनुपात और विवेक खो जाता है। इसलिए रोक सबसे पहली कड़ी पर लगानी है।

शंकर के भाष्य में "बुद्धि-नाश" का अर्थ है सही और गलत का भेद करने की क्षमता का चले जाना (शास्त्री का अनुवाद)।

4. संयम केवल बाहरी नहीं

2.59 पर गांधी की टिप्पणी (यंग इंडिया, 22 दिसंबर 1927): उपवास आदि आत्म-संयम के साधन हैं, पर "if physical fasting is not accompanied by mental fasting, it is bound to end in hypocrisy and consequent disaster." प्रशासन में पढ़त: नियम के पालन का दिखावा काफ़ी नहीं; मन का अनुशासन भी चाहिए।

5. स्थितप्रज्ञ का अर्थ भावहीन होना नहीं

शंका: क्या यह संवेदनहीन अधिकारी का आदर्श है? उत्तर: गीता का आदर्श करुणा के साथ समता है। 6.32 में योगी वह है जो "आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति" यानी दूसरों के सुख-दुख को अपने जैसा देखता है; 12.13 में गुण हैं "अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च" (सब प्राणियों से द्वेष-रहित, मित्र-भाव वाला और करुण)। (श्लोक-पाठ से निकली हमारी व्याख्या)

व्यवहार: भावना को पहचानो, पर निर्णय उसके अधीन मत होने दो।

6. आधुनिक संबंध और सीमाएँ

भावनात्मक बुद्धि (EI): आत्म-नियंत्रण और सहानुभूति में समानता प्रायः बताई जाती है। अंतर: गीता का आधार आत्म-संतोष का दार्शनिक आदर्श (2.55) है, EI एक मनोवैज्ञानिक कौशल-ढाँचा है। यह तुलना व्याख्या है।

ब्राह्मी स्थिति (2.72): अंतिम श्लोक आध्यात्मिक लक्ष्य की भाषा में है; प्रशासन के उत्तर में गुणों पर बल दीजिए, मोक्ष की भाषा पर नहीं।

व्यावहारिक कठिनाई: आदर्श ऊँचा है। व्यवहार के औज़ार: निर्णय से पहले ठहराव, जाँच-सूची, सहकर्मी से परामर्श, क्रोध में लिखित आदेश न देना (हमारे सुझाव)।

वास्तविक उदाहरण

इसरो, SLV-3, 1979-80: विफलता और सफलता में संतुलन.

10 अगस्त 1979 को पहला प्रक्षेपण विफल हुआ; 18 जुलाई 1980 को दूसरा सफल रहा और रोहिणी उपग्रह कक्षा में पहुँचा। कलाम (तब परियोजना निदेशक) ने बाद में बताया कि विफलता पर प्रेस-वार्ता में इसरो अध्यक्ष सतीश धवन ने मिशन की ज़िम्मेदारी स्वयं ली, और 1980 की सफलता पर कलाम को आगे रखकर प्रेस से बात करवाई; कलाम के शब्दों में नेता विफलता अपने ऊपर लेता है और सफलता टीम को देता है।

स्रोत: कलाम का भाषण (सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र में विद्यार्थियों के नाम; भारत के राष्ट्रपति की वेबसाइट पर) और "नॉलेज एट वार्टन" में उनका साक्षात्कार। कलाम के शब्द पुनर्कथन हैं, शब्दशः उद्धरण की तरह न लिखें। यह गीता का हवाला नहीं, 2.57 की भावना का उदाहरण है (हमारी व्याख्या): शुभ-अशुभ पाकर न अहंकार, न दोषारोपण।

उत्तर में प्रयोग: "जैसे 1979 की विफलता में सतीश धवन ने ज़िम्मेदारी ली और 1980 की सफलता में टीम के नेता को आगे रखा।"

गांधी की चेतावनी (1927)

मन का उपवास न हो तो बाहरी संयम पाखंड में बदलता है (यंग इंडिया, 22 दिसंबर 1927; अनासक्तियोग, देसाई संस्करण में उद्धृत)।

उत्तर में कैसे लगाएँ

परिभाषा (स्थित = टिकी, प्रज्ञा = विवेक) → दो या तीन लक्षण (2.56, 2.57) → 2.62-63 की सीढ़ी → प्रशासनिक प्रयोग → एक उदाहरण।

विचारक और उद्धरण

नामविचारप्रयोग-योग्य पंक्ति
गीता 2.54अर्जुन का प्रश्न"स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव।"
गीता 2.56समता में अविचलता"दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः।"
गीता 2.62-63क्रोध की सीढ़ी"क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः।"
महात्मा गांधीदूसरा अध्याय "पूर्ण पुरुष" का परिचय"tells us how a perfected man is to be known" (अनासक्तियोग, खंड 10)
महात्मा गांधीमन का संयम"if physical fasting is not accompanied by mental fasting, it is bound to end in hypocrisy and consequent disaster." (यंग इंडिया, 22 दिसंबर 1927, देसाई के संस्करण में उद्धृत)

चित्र: प्रवाह: क्रोध की सीढ़ी

चिंतन

सीढ़ी के आठ पायदान (ऊपर से नीचे)

आसक्ति

कामना

क्रोध

मोह

स्मृति-भ्रम

बुद्धि-नाश

पतन

यहीं रोकिए: ठहराव, जाँच-सूची, परामर्श

पहले पायदान के पास एक रोक का चिह्न

स्थितप्रज्ञ: समत्व, संयम, निरहंकार → स्थिर विवेक

दाईं ओर उलटा तीर

निकट संबंधी, 2018, पत्र II, भाग क (2 अंक): भावनात्मक बुद्धि (EI) पर प्रश्न (हमारे प्रश्न-संग्रह में गीता से अलग विषय के रूप में दर्ज); स्थितप्रज्ञ के लक्षण उसके उत्तर में मूल्य-वृद्धि बन सकते हैं।

पहले इसी अवधारणा का प्रश्न: 2018, 2023, 2024 में "स्थितप्रज्ञ" नाम से कोई प्रश्न नहीं; केवल 2021 में।

आम गलतियाँ

याद रखें

  • स्थितप्रज्ञ को "भावहीन" या "उदासीन" व्यक्ति बता देना। गीता का आदर्श करुणा के साथ समता है (6.32, 12.13)।
  • केवल "शांत रहना" लिखना और विवेक की स्थिरता, इंद्रिय-संयम और अनासक्ति के लक्षण न बताना; कोई श्लोक-संख्या न देना।
  • 2.72 की मोक्ष-भाषा दोहराना और प्रशासनिक प्रयोग छोड़ देना।

आत्म-जाँच (5 प्रश्न)

याद रखें

  • "स्थितप्रज्ञ" शब्द का अर्थ क्या है और अर्जुन ने कौन-सा प्रश्न पूछा?
  • 2.56 और 2.57 के दो-दो लक्षण बताइए।
  • 2.62-63 की क्रोध की सीढ़ी के चरण लिखिए।
  • गांधी "मानसिक उपवास" से क्या समझाते हैं?
  • स्थितप्रज्ञ और भावहीनता में क्या अंतर है?