विवाह (Marriage): रूप, क़ानून और बाल विवाह की रोकथाम
विवाह के रूप और क़ानून, शारदा अधिनियम से बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम तक, सर्वोच्च न्यायालय का 2024 का निर्णय और NFHS-5 के आँकड़े; 2021 का प्रश्न हल सहित।
- विवाह
- शारदा अधिनियम
- बाल विवाह
- हिंदू विवाह अधिनियम
- विशेष विवाह अधिनियम
सिलेबस में
RPSC सिलेबस (09-01-2026), पेपर I, इकाई III, भाग क (समाजशास्त्र): "Issues related to family and marriage, elderly people and disabled in present Indian society." इस पृष्ठ पर विवाह है; परिवार, तलाक़, बुज़ुर्ग और दहेज के अलग पृष्ठ हैं।
इस विषय को क्यों पढ़ें
याद रखें
- संकलित छह पेपरों (2013, 2016, 2018, 2021, 2023, 2024) में विवाह पर एक प्रश्न मिला: 2021 के पेपर I में 2 अंक (15 शब्द) का "शारदा एक्ट क्या है?"। वह नीचे हल किया गया है। यानी परीक्षक कभी-कभी विवाह को क़ानून की खिड़की से पूछता है (2013-2024 के पेपरों में देखा गया)।
- इसी कारण यह पृष्ठ केवल विवाह की परिभाषा तक सीमित नहीं है। उसमें बाल विवाह रोकने के क़ानूनों की समय-रेखा, हिंदू विवाह अधिनियम और विशेष विवाह अधिनियम की तुलना और 2024 का सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय भी है, जो ज़िला प्रशासन की भूमिका से जुड़ता है।
- राजस्थान के लिए NFHS-5 के बाल विवाह के आँकड़े भी दिए गए हैं, क्योंकि राज्य के संदर्भ वाले प्रश्न सिलेबस की अन्य पंक्तियों में आते हैं।
पहले सरल भाषा में: दो परिवारों की गाँठ
शादी के कार्ड पर दो नाम छपते हैं, पर गाँव में निमंत्रण दो परिवारों को जाता है। दूल्हे का परिवार और दुल्हन का परिवार, दोनों नई नातेदारी (kinship) में बँधते हैं। समाजशास्त्र विवाह को इसी रूप में देखता है: दो व्यक्तियों का निजी रिश्ता, जिसे समाज मान्यता देता है और जिससे परिवार, संपत्ति, बच्चों की वैधता और नातेदारी के नियम तय होते हैं।
NCERT के अनुसार विवाह इतिहास में बहुत भिन्न रूपों में मिला है और अलग-अलग समाजों में उसने अलग काम किए हैं। यहाँ तक कि जीवनसाथी चुनने के तरीक़े में भी "आश्चर्यजनक विविधता" है। परीक्षा के लिए एक पंक्ति: विवाह वह सामाजिक रूप से स्वीकृत संस्था है जो दो व्यक्तियों के संबंध को नातेदारी, उत्तराधिकार और संतान की वैधता के नियमों से जोड़ती है। यह परिभाषा समाजशास्त्रीय समझ से हमारा संक्षिप्त रूप है।
एक और बात: भारत में विवाह निजी क़ानूनों और नागरिक क़ानूनों दोनों से चलता है। संविधान की सातवीं अनुसूची की समवर्ती सूची (सूची III) में प्रविष्टि 5 "विवाह और विवाह-विच्छेद" की है, इसलिए संसद और राज्य विधानमंडल, दोनों इस पर क़ानून बना सकते हैं।
विवाह के रूप: साथियों की संख्या और चुनाव के नियम
NCERT विवाह के रूपों को दो आधारों पर बाँटता है: कितने साथी, और कौन किससे विवाह कर सकता है। साथियों की संख्या के आधार पर दो रूप हैं: एकविवाह (monogamy) और बहुविवाह (polygamy)। एकविवाह में एक समय में एक ही पति और एक ही पत्नी होती है। NCERT ने स्पष्ट लिखा है कि जहाँ बहुविवाह की अनुमति भी है, वहाँ भी व्यवहार में एकविवाह ही अधिक प्रचलित है। एकविवाह के भीतर पुनर्विवाह वाला रूप क्रमिक एकविवाह (serial monogamy) कहलाता है, जिसमें व्यक्ति मृत्यु या तलाक़ के बाद दोबारा विवाह कर सकता है, पर एक समय में एक ही जीवनसाथी रखता है।
बहुविवाह के दो प्रकार हैं: बहुपत्नीत्व (polygyny), यानी एक पति और दो या अधिक पत्नियाँ, और बहुपतित्व (polyandry), यानी एक पत्नी और दो या अधिक पति। NCERT के अनुसार जहाँ आर्थिक परिस्थितियाँ कठोर हों, वहाँ बहुपतित्व समाज की एक प्रतिक्रिया हो सकता है, क्योंकि ऐसे में एक पुरुष पत्नी और बच्चों का पालन नहीं कर पाता और अत्यंत निर्धनता में समूह अपनी जनसंख्या सीमित रखने का दबाव भी महसूस करता है।
दूसरा आधार चुनाव के नियम का है। अंतर्विवाह (endogamy) में व्यक्ति को अपने ही सांस्कृतिक रूप से परिभाषित समूह, जैसे जाति, के भीतर विवाह करना होता है; बहिर्विवाह (exogamy) उसका उल्टा है, यानी अपने समूह के बाहर, जैसे गोत्र या कुल। NCERT बताता है कि उत्तर भारत के कुछ भागों में ग्राम-बहिर्विवाह प्रचलित है, जिसमें बेटियों का विवाह दूर के गाँवों में किया जाता था। इसका एक उद्देश्य यह माना गया कि वधू नए घर में बिना मायके के हस्तक्षेप के घुलमिल सके, और दूरी तथा पितृवंशीय असमान संबंध के कारण विवाहित बेटियाँ माता-पिता से कम मिल पाती थीं। लोकगीतों में विदाई की पीड़ा इसी का भाव है।
साथी का चयन भी अलग-अलग समाजों में अलग है। कुछ में माता-पिता और रिश्तेदार तय करते हैं, कुछ में व्यक्ति अपेक्षाकृत स्वतंत्र हैं। NCERT विद्यार्थियों से पूछता है कि क्या वैवाहिक विज्ञापन देखकर लगता है कि अंतर्विवाह आज भी प्रचलित नियम है। उत्तर में इस प्रश्न को खुला विश्लेषण बनाइए: जाति के भीतर चयन की प्रवृत्ति बनी हुई है, पर शिक्षा और शहरीकरण के साथ चयन की स्वतंत्रता की बहस भी बढ़ी है (विश्लेषण)।
विवाह के रूप: एक नज़र में
| आधार | रूप | अर्थ | टिप्पणी |
|---|---|---|---|
| साथियों की संख्या | एकविवाह (monogamy) | एक समय में एक पति और एक पत्नी | बहुविवाह की अनुमति वाले समाज में भी व्यवहार में अधिक (NCERT) |
| साथियों की संख्या | क्रमिक एकविवाह | पुनर्विवाह, पर एक समय में एक ही साथी | मृत्यु या तलाक़ के बाद |
| साथियों की संख्या | बहुपत्नीत्व (polygyny) | एक पति, कई पत्नियाँ | बहुविवाह का एक रूप |
| साथियों की संख्या | बहुपतित्व (polyandry) | एक पत्नी, कई पति | कठोर आर्थिक परिस्थिति की प्रतिक्रिया हो सकती है (NCERT) |
| चुनाव का नियम | अंतर्विवाह (endogamy) | अपने समूह (जाति आदि) के भीतर | जाति के संदर्भ में प्रमुख |
| चुनाव का नियम | बहिर्विवाह (exogamy) | अपने समूह के बाहर | उत्तर भारत में ग्राम-बहिर्विवाह (NCERT) |
वर्गीकरण और अर्थ NCERT कक्षा 11 अध्याय 3 से; टिप्पणी के कुछ अंश हमारे संक्षेप हैं।
शास्त्रीय परंपरा: आठ विवाह-रूप
मनुस्मृति (3.21) में आठ प्रकार के विवाह गिनाए गए हैं: ब्राह्म, दैव, आर्ष, प्राजापत्य, आसुर, गांधर्व, राक्षस और पैशाच। श्लोक में आठवें, यानी पैशाच को सबसे निम्न (अधम) कहा गया है। परीक्षा में आठों के नाम क्रम से लिख देना पर्याप्त होता है; प्रत्येक की व्याख्या तभी लिखिए जब प्रश्न माँगे।
इस वर्गीकरण को पढ़ने का आधुनिक तरीक़ा यह है कि वह विवाह में सहमति, दबाव और लेन-देन के पहलुओं को अलग-अलग रखता है (विश्लेषण)। उदाहरण के लिए गांधर्व विवाह पारस्परिक चयन की परंपरा का संकेत है, जबकि बलपूर्वक या छल से हुए विवाह को निम्न माना गया। यह तुलना विशेष विवाह अधिनियम की सहमति-आधारित भावना से जुड़ सकती है, पर किसी प्राचीन रूप को आज के क़ानून के बराबर नहीं ठहराना चाहिए।
आज का क़ानूनी ढाँचा: हिंदू विवाह अधिनियम और विशेष विवाह अधिनियम
भारत में विवाह के क़ानून धर्म और रूप के अनुसार अलग-अलग हैं। हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के बारे में विशेष विवाह अधिनियम का उद्देश्य-कथन बताता है कि वह 18 मई 1955 को क़ानून बना। यह अधिनियम हिंदुओं, बौद्धों, जैनों और सिखों पर लागू होता है, और उन अन्य लोगों पर भी जो मुसलमान, ईसाई, पारसी या यहूदी नहीं हैं, जब तक वे यह सिद्ध न कर दें कि वे हिंदू विधि, प्रथा या रिवाज़ से शासित नहीं थे।
इस अधिनियम की धारा 5 में विवाह की शर्तें हैं: दोनों में से किसी का जीवित जीवनसाथी न हो, कोई भी वैध सहमति देने में अक्षम न हो, दूल्हे ने 21 वर्ष और दुल्हन ने 18 वर्ष पूरे कर लिए हों, पक्ष निषिद्ध नातेदारी की डिग्री या सपिंड में न हों (जब तक रीति-रिवाज़ इसकी अनुमति न दें)। धारा 7 के अनुसार विवाह दोनों में से किसी भी पक्ष के रीति-रिवाज़ से हो सकता है; जहाँ रीति में सप्तपदी (अग्नि के सामने दूल्हा-दुल्हन के संयुक्त सात कदम) शामिल है, वहाँ सातवाँ कदम पूरा होने पर विवाह पूर्ण और बाध्यकारी हो जाता है। धारा 8 में राज्य सरकार विवाह-पंजीकरण के नियम बना सकती है, और चाहे तो उसे अनिवार्य भी कर सकती है।
विशेष विवाह अधिनियम, 1954, जो 1 जनवरी 1955 से लागू हुआ, किसी भी दो व्यक्तियों के लिए है, चाहे उनका धर्म कुछ भी हो। इसमें वैवाहिक अधिकारी के पास नोटिस देना पड़ता है; नोटिस देने वाले पक्षों में से किसी एक को ज़िले में कम-से-कम 30 दिन रहना ज़रूरी है। नोटिस के प्रकाशन के बाद 30 दिन तक आपत्ति की जा सकती है, और आपत्ति न हो या ख़ारिज हो जाए तो विवाह संपन्न हो सकता है। इस अधिनियम की धारा 4 में भी पुरुष के लिए 21 और स्त्री के लिए 18 वर्ष की शर्त है। इसकी धारा 15 के अंतर्गत अन्य रूपों में हुए विवाह का भी पंजीकरण हो सकता है, यदि दोनों पक्षों ने 21 वर्ष पूरे कर लिए हों और अन्य शर्तें पूरी हों।
हिंदू विवाह अधिनियम और विशेष विवाह अधिनियम: तुलना
हिंदू विवाह अधिनियम, 1955
लागूहिंदू, बौद्ध, जैन, सिख और कुछ अन्य (धारा 2 की शर्तों के साथ)
न्यूनतम आयुदूल्हा 21, दुल्हन 18 (धारा 5)
रूपपक्षों के रीति-रिवाज़; सप्तपदी हो तो सातवें कदम पर पूर्ण (धारा 7)
नोटिसअनिवार्य नहीं
पंजीकरणराज्य सरकार के नियमों से; अनिवार्य भी किया जा सकता है (धारा 8)
विशेष विवाह अधिनियम, 1954
लागूकिसी भी दो व्यक्तियों पर, धर्म की परवाह किए बिना
न्यूनतम आयुपुरुष 21, स्त्री 18 (धारा 4)
रूपवैवाहिक अधिकारी के समक्ष; नोटिस और आपत्ति की प्रक्रिया
नोटिस30 दिन का निवास, नोटिस और 30 दिन की आपत्ति-अवधि
पंजीकरणअधिनियम के भीतर ही (विशेषकर धारा 15 में अन्य रूपों के विवाह का)
तालिका हमारा संक्षेप है।
शारदा अधिनियम से बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम तक: 2021 का प्रश्न
पहले नाम समझिए। "शारदा एक्ट" बाल विवाह निरोधक अधिनियम (Child Marriage Restraint Act), 1929 का लोकप्रिय नाम है। PIB की टिप्पणी के अनुसार इससे पहले 19वीं सदी में राजा राममोहन राय, ईश्वरचंद्र विद्यासागर और ज्योतिराव फुले जैसे सुधारकों के अभियान थे, जिनसे सहमति-आयु अधिनियम, 1891 बना। 1929 के अधिनियम ने विवाह की न्यूनतम आयु लड़की के लिए 14 और लड़के के लिए 18 वर्ष तय की।
स्वतंत्रता के बाद ये सीमाएँ बढ़ाई गईं। 1929 के अधिनियम के पाठ में दर्ज है कि लड़की की आयु बाद में संशोधन अधिनियम 41 सन् 1949 से 14 से 15 की गई (PIB की टिप्पणी इसे 1948 का संशोधन लिखती है; अधिनियम का अपना पाठ 1949 बताता है, इसलिए परीक्षा में वर्ष लिखना ज़रूरी न हो तो "स्वतंत्रता के बाद" लिखें)। 1978 के संशोधन से यह सीमा लड़कियों के लिए 18 और लड़कों के लिए 21 वर्ष कर दी गई। हिंदू विवाह अधिनियम के पाठ में भी "Child Marriage Restraint (Amendment) Act, 1978 (2 of 1978)" का उल्लेख है। अंत में बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम, 2006 (संख्या 6 सन् 2007) आया, जिसने 1929 के अधिनियम को निरस्त किया (धारा 21)। यह 1 नवंबर 2007 से लागू हुआ। नाम का फ़र्क़ देखिए: पुराना अधिनियम "निरोध" (रोकना, restrain) था, नया "प्रतिषेध" (निषिद्ध करना, prohibit); इसमें रोकथाम के साथ पीड़ित को राहत भी है।
2 अंक के उत्तर के लिए तीन चीज़ें लिखिए: नाम (बाल विवाह निरोधक अधिनियम, 1929), मुख्य प्रावधान (न्यूनतम आयु: लड़की 14, लड़का 18), और यह कि उसे 2006 के अधिनियम ने बदल दिया। बाक़ी विवरण 5 या 10 अंक के उत्तरों के लिए हैं।
बाल विवाह क़ानून: समय-रेखा और आयु-सीमा
| वर्ष | अधिनियम या घटना | लड़की / लड़का (न्यूनतम आयु) | टिप्पणी |
|---|---|---|---|
| 1891 | सहमति-आयु अधिनियम (Age of Consent Act) | आयु-सीमा यहाँ उल्लेखित नहीं | सुधारकों के अभियान का फल (PIB) |
| 1929 | बाल विवाह निरोधक अधिनियम (शारदा) | 14 / 18 | 2021 का PYQ |
| 1949 | संशोधन अधिनियम 41 सन् 1949 | 15 / 18 | लड़की की आयु 14 से 15 (अधिनियम का पाठ; PIB ने इसे 1948 लिखा है) |
| 1978 | संशोधन (अधिनियम 2 सन् 1978) | 18 / 21 | आज की आयु-सीमा |
| 2006 (अधिनियम 6 सन् 2007; लागू 1-11-2007) | बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम | 18 / 21 | 1929 का अधिनियम निरस्त (धारा 21) |
बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम, 2006: परीक्षा के लिए मुख्य प्रावधान
अधिनियम की धारा 2(क) में "बच्चा" उसे कहा गया है जिस पुरुष ने 21 वर्ष और जिस स्त्री ने 18 वर्ष पूरे नहीं किए। धारा 3 के अनुसार हर बाल विवाह बच्चे के विकल्प पर शून्यकरणीय (voidable) है, यानी वह स्वतः अवैध नहीं होता; जो पक्ष विवाह के समय बच्चा था, वही ज़िला न्यायालय में विवाह को शून्य घोषित कराने की याचिका (decree of nullity) दे सकता है, और वह भी वयस्क होने के दो वर्ष पूरे होने से पहले। अगर याचिकाकर्ता नाबालिग है तो याचिका उसके संरक्षक या अगले मित्र के माध्यम से बाल विवाह प्रतिषेध अधिकारी के साथ दी जा सकती है।
धारा 4 में न्यायालय स्त्री पक्ष को भरण-पोषण और निवास का आदेश दे सकता है। धारा 5 में बच्चों की अभिरक्षा और भरण-पोषण होता है, जहाँ बच्चे का कल्याण सर्वोपरि रखा गया है। धारा 6 के अनुसार विवाह रद्द हो जाए तब भी ऐसे विवाह से जन्मे या गर्भ में आए बच्चे वैध माने जाते हैं। धारा 12 कुछ स्थितियों में विवाह को शून्य घोषित करती है: जब बच्चे को अभिभावक की देखरेख से बहला-फुसलाकर या ज़बरदस्ती ले जाया जाए, बेचा जाए, या विवाह के बाद बेचा या तस्करी की जाए।
दंड-प्रावधान भी याद कीजिए। धारा 9: 18 वर्ष से ऊपर का पुरुष जो बाल विवाह करे, उसे अधिकतम दो वर्ष का कठोर कारावास या अधिकतम एक लाख रुपये जुर्माना या दोनों। धारा 10: जो बाल विवाह कराए या करवाने में सहयोग दे, उसे अधिकतम दो वर्ष कठोर कारावास और जुर्माना, जब तक वह यह सिद्ध न कर दे कि उसके पास यह मानने का कारण था कि विवाह बाल विवाह नहीं है। धारा 11: जो माता-पिता, संरक्षक या अन्य व्यक्ति विवाह को बढ़ावा दे, होने दे या उसे रोकने में लापरवाही करे, उसे भी अधिकतम दो वर्ष कठोर कारावास और जुर्माना; किसी महिला को कारावास का दंड नहीं। धारा 15 के अनुसार इस अधिनियम के अपराध संज्ञेय और अजमानतीय हैं।
रोकथाम का ढाँचा प्रशासन से जुड़ता है। धारा 13 में प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट या महानगर मजिस्ट्रेट बाल विवाह रोकने के लिए निषेधाज्ञा (injunction) जारी करता है; तात्कालिक स्थिति में बिना नोटिस दिए अंतरिम निषेधाज्ञा भी दे सकता है। धारा 13(4) के अनुसार अक्षय तृतीया जैसे दिनों पर सामूहिक बाल विवाह रोकने के लिए ज़िला मजिस्ट्रेट को बाल विवाह प्रतिषेध अधिकारी माना जाता है, और धारा 13(5) में वह उचित उपाय और न्यूनतम आवश्यक बल का प्रयोग कर सकता है। धारा 16 में राज्य सरकार बाल विवाह प्रतिषेध अधिकारियों की नियुक्ति करती है।
बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम: धाराएँ एक नज़र में
| धारा | विषय | मुख्य बिंदु |
|---|---|---|
| 2(क) | बच्चा | पुरुष 21 से कम, स्त्री 18 से कम |
| 3 | शून्यकरणीय विवाह | बच्चे के विकल्प पर; वयस्कता के दो वर्ष पूरे होने से पहले याचिका |
| 4 और 5 | भरण-पोषण, निवास, अभिरक्षा | स्त्री पक्ष को; बच्चों की अभिरक्षा में कल्याण सर्वोपरि |
| 6 | बच्चों की वैधता | विवाह रद्द होने पर भी वैध |
| 9, 10, 11 | दंड | अधिकतम दो वर्ष कठोर कारावास और/या जुर्माना ₹1 लाख तक; महिला को कारावास नहीं (धारा 11, 13(10)) |
| 12 | शून्य विवाह | अपहरण, बलपूर्वक, बिक्री या तस्करी की स्थिति में |
| 13 | निषेधाज्ञा | मजिस्ट्रेट; अक्षय तृतीया जैसे दिनों पर ज़िला मजिस्ट्रेट |
| 15 | अपराध की प्रकृति | संज्ञेय और अजमानतीय |
| 16 | बाल विवाह प्रतिषेध अधिकारी | राज्य सरकार की अधिसूचना से नियुक्त |
'बच्चा' की परिभाषा अधिनियम में है, इसलिए धारा 2(क) का हवाला दीजिए।
राजस्थान का पहलू
NFHS-5 (2019-21) की राजस्थान फ़ैक्ट शीट के अनुसार 20-24 वर्ष की महिलाओं में 25.4% का विवाह 18 वर्ष से पहले हुआ, जबकि भारत में यह 23.3% है। NFHS-4 (2015-16) में राजस्थान का आँकड़ा 35.4% था, यानी 10 प्रतिशत अंक की गिरावट। 25-29 वर्ष के पुरुषों में 21 वर्ष से पहले विवाह राजस्थान में 28.2% और भारत में 17.7% है। ये भारत सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के सर्वेक्षण-अनुमान हैं, राज्य सरकार के नहीं; पहुँच की तिथि 2 अक्टूबर 2026। (विश्लेषण: गिरावट के बावजूद राजस्थान का आँकड़ा राष्ट्रीय औसत से ऊँचा है; UNFPA के विश्लेषण-पत्र में भी राजस्थान उन आठ राज्यों में है जहाँ बाल विवाह राष्ट्रीय औसत से अधिक है।)
बाल विवाह के आँकड़े: भारत की प्रगति
NFHS के आँकड़े प्रगति और चुनौती दोनों दिखाते हैं। UNFPA के विश्लेषण-पत्र के अनुसार भारत में 20-24 वर्ष की महिलाओं में बाल विवाह 2005-06 में 47.4% था, 2015-16 में 26.8% और 2019-21 में 23.3%। यानी एक दशक में 21 प्रतिशत अंक की और उसके बाद के पाँच वर्ष में 3.5 प्रतिशत अंक की गिरावट आई। राष्ट्रीय औसत में सुधार के साथ-साथ राज्य-वार अंतर बना हुआ है।
इन आँकड़ों का सही उपयोग यह है कि दोनों बातें साथ लिखी जाएँ: कुल गिरावट और स्थानीय अंतर। ग़लती यह है कि सिर्फ़ "बाल विवाह घटा" या सिर्फ़ "बाल विवाह बहुत है" लिख दिया जाए। 2024 के अंत में केंद्र सरकार ने "बाल विवाह मुक्त भारत" अभियान 27 नवंबर 2024 को शुरू किया, जिसे PIB की टिप्पणी में बाल विवाह उन्मूलन के राष्ट्रीय संकल्प के रूप में बताया गया है।
विवाह का नक्शा
विवाह
रूप
NCERT
- एकविवाह, बहुविवाह
- अंतर्विवाह, बहिर्विवाह
- मनु के आठ रूप
क़ानून
समवर्ती सूची प्रविष्टि 5
- हिंदू विवाह अधिनियम, 1955
- विशेष विवाह अधिनियम, 1954
- बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम, 2006
बाल विवाह
शारदा से PCMA तक
- 1929: 14 / 18
- 1978: 18 / 21
- PCMA: शून्यकरणीय, दंड, निषेधाज्ञा
प्रशासन
रोकथाम पहले
- बाल विवाह प्रतिषेध अधिकारी
- ज़िला मजिस्ट्रेट: अक्षय तृतीया
- सर्वोच्च न्यायालय 2024
समय-रेखा: विवाह से जुड़े क़ानून और निर्णय
1891
सहमति-आयु अधिनियम (PIB)
1929
बाल विवाह निरोधक अधिनियम (शारदा): 14 / 18
1 जनवरी 1955
विशेष विवाह अधिनियम, 1954 लागू
18 मई 1955
हिंदू विवाह अधिनियम क़ानून बना
1978
संशोधन: 18 / 21
1 नवंबर 2007
बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम लागू (राजपत्र 10 जनवरी 2007)
18 अक्टूबर 2024
सर्वोच्च न्यायालय: बाल विवाह पर दिशानिर्देश
27 नवंबर 2024
बाल विवाह मुक्त भारत अभियान की शुरुआत (PIB)
मुख्य तथ्य
- शारदा अधिनियम
- बाल विवाह निरोधक अधिनियम, 1929; न्यूनतम आयु लड़की 14, लड़का 18 वर्ष
- वर्तमान आयु-सीमा
- लड़की 18, लड़का 21 वर्ष (1978 के संशोधन से; PCMA 2006 धारा 2(क) में)
- PCMA 2006
- संख्या 6 सन् 2007; राजपत्र 10 जनवरी 2007; लागू 1 नवंबर 2007; 1929 का अधिनियम निरस्त
- बाल विवाह की स्थिति
- शून्यकरणीय (voidable), बच्चे के विकल्प पर; याचिका वयस्कता के दो वर्ष पूरे होने से पहले (धारा 3)
- दंड
- धाराएँ 9, 10, 11: अधिकतम दो वर्ष कठोर कारावास और/या अधिकतम ₹1 लाख; धारा 15: संज्ञेय, अजमानतीय
- सर्वोच्च न्यायालय
- 18 अक्टूबर 2024, 2024 INSC 790: रोकथाम, सुरक्षा, दंड का क्रम; कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक का उत्तरदायित्व
- NFHS-5, राजस्थान
- 20-24 वर्ष की महिलाओं में 18 से पहले विवाह 25.4% (NFHS-4: 35.4%); भारत 23.3% (2019-21)
- हिंदू विवाह अधिनियम
- 18 मई 1955 को क़ानून बना; धारा 5: दूल्हा 21, दुल्हन 18; धारा 7: सप्तपदी
- विशेष विवाह अधिनियम
- 1 जनवरी 1955 से लागू; किसी भी दो व्यक्तियों के लिए; 30 दिन का नोटिस और आपत्ति-अवधि
- मनुस्मृति 3.21
- आठ विवाह-रूप: ब्राह्म, दैव, आर्ष, प्राजापत्य, आसुर, गांधर्व, राक्षस, पैशाच
- समवर्ती सूची
- प्रविष्टि 5: विवाह और विवाह-विच्छेद
- सिलेबस की पंक्ति
- RPSC सिलेबस, 09-01-2026, पेपर I, इकाई III (क)
परीक्षा में आम ग़लतियाँ
याद रखें
- बाल विवाह को "शून्य" (void) लिख देना। सामान्यतः वह शून्यकरणीय है, यानी बच्चे के विकल्प पर रद्द होता है; शून्य केवल धारा 12 की स्थितियों में और निषेधाज्ञा के उल्लंघन में (धारा 14)।
- शारदा अधिनियम की आयु 18 और 21 लिख देना। वह 1978 के संशोधन के बाद की आयु है; 1929 के अधिनियम में लड़की 14 और लड़का 18।
- शारदा अधिनियम को 2006 के अधिनियम का नाम बता देना। 2006 का अधिनियम अलग है और उसने 1929 वाले को निरस्त किया।
- बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम को "2006" और "2007" में उलझा देना। अधिनियम-संख्या 6 सन् 2007 है और राजपत्र में तिथि 10 जनवरी 2007; लागू होना 1 नवंबर 2007।
- विवाह के क़ानून को एक ही क़ानून बता देना। हिंदू विवाह अधिनियम और विशेष विवाह अधिनियम अलग हैं।
- राजस्थान का आँकड़ा बिना वर्ष और स्रोत के लिखना। "NFHS-5, 2019-21, 25.4%" की तरह पूरा लिखिए।
केस स्टडी: सर्वोच्च न्यायालय का 2024 का निर्णय और ज़िला प्रशासन
केस स्टडीSociety for Enlightenment and Voluntary Action बनाम भारत संघ
यह वास्तविक निर्णय है; निर्णय का पाठ Indian Kanoon पर उपलब्ध है और PIB की टिप्पणी में भी इसका उल्लेख है।
- तारीख़ और पीठ
- 18 अक्टूबर 2024 को मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने रिट याचिका (सिविल) 1234/2017 में निर्णय दिया (2024 INSC 790)।
- दिशा
- निर्णय के अनुसार दिशानिर्देशों की दिशा यह है: रोकथाम को सुरक्षा से पहले और सुरक्षा को दंड से पहले रखा जाए। न्यायालय ने कहा कि अभियोजन हतोत्साहित नहीं है, पर केवल अभियोजन बढ़ाना काफ़ी नहीं।
- अधिकारी
- राज्य और संघ राज्य क्षेत्र ज़िला-स्तर पर ऐसे अधिकारी नियुक्त करें जो केवल बाल विवाह प्रतिषेध अधिकारी का काम करें, अन्य ज़िम्मेदारियों से अलग। यदि अधिकारी को संसाधन की कमी लगे तो राज्य महिला एवं बाल विकास मंत्रालय तीन महीने में आकलन कर उसे पूरा करे।
- कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक
- ज़िले के कलेक्टरों और पुलिस अधीक्षकों को भी बाल विवाह रोकने का उत्तरदायित्व दिया गया। सामूहिक विवाहों पर विशेष ध्यान, जहाँ सरकारी या पुलिस अधिकारियों की उपस्थिति अनजाने में विवाह को वैधता दे सकती है; कार्रवाई न करने पर संबंधित अधिकारियों पर प्रशासनिक और अनुशासनात्मक कार्रवाई।
- मजिस्ट्रेट
- धारा 13 में अधिकार-प्राप्त मजिस्ट्रेटों को स्वतः संज्ञान से निषेधाज्ञा जारी करने को कहा गया, विशेषकर "शुभ दिनों" पर।
सीख
उत्तर में "रोकथाम, सुरक्षा, फिर दंड" का क्रम लिखने से बाल विवाह पर प्रशासन की भूमिका का आधुनिक दृष्टिकोण दिखता है; और लोकसेवक के रूप में कलेक्टर की जवाबदेही का बिंदु जुड़ता है।
कार्य-उदाहरण: बाल विवाह की सूचना पर कार्रवाई और समय-सीमा (कल्पित)
हल सहित उदाहरणएक कल्पित स्थिति में कदम-दर-कदम
दिया है
- यह उदाहरण समझाने के लिए गढ़ा गया है; पात्र और तिथियाँ वास्तविक नहीं हैं।
- सुनीता का जन्म 10 मार्च 2008 को हुआ। मान लीजिए उसका विवाह 12 नवंबर 2024 को होने की सूचना एक अध्यापिका को पहले से मिल जाती है। कार्रवाई और बाद की समय-सीमा देखनी है।
- 1चरण 1: आयु जाँचिए 12 नवंबर 2024 को सुनीता 16 वर्ष 8 महीने की है। अधिनियम की धारा 2(क) में 18 वर्ष से कम की स्त्री "बच्चा" है, इसलिए यह बाल विवाह होगा।
- 2चरण 2: रोकथाम के रास्ते कोई भी व्यक्ति जानकारी दे सकता है (धारा 13(2))। मजिस्ट्रेट को आवेदन पर निषेधाज्ञा जारी करनी है; तत्काल स्थिति में बिना नोटिस अंतरिम निषेधाज्ञा भी संभव है। निषेधाज्ञा के उल्लंघन में किया गया विवाह प्रारंभ से शून्य (धारा 14)।
- 3चरण 3: यदि विवाह हो गया सुनीता 10 मार्च 2026 को 18 वर्ष की होगी। धारा 3(3) के अनुसार विवाह को शून्य घोषित कराने की याचिका उसकी वयस्कता के दो वर्ष पूरे होने से पहले, यानी 10 मार्च 2028 से पहले, ज़िला न्यायालय में देनी होगी।
- 4चरण 4: राहतें न्यायालय धारा 4 के अंतर्गत भरण-पोषण और निवास, धारा 5 में बच्चों की अभिरक्षा, और धारा 3(4) के अंतर्गत विवाह में मिले उपहार लौटाने का आदेश दे सकता है। धारा 6 के कारण यदि बच्चा हुआ तो वह वैध रहेगा।
निष्कर्ष: निष्कर्ष: रोकथाम सबसे अच्छी राह है, पर विवाह हो जाए तो भी समय-सीमा (वयस्कता से दो वर्ष) और राहतें अधिनियम में हैं। उत्तर में इन्हें क्रम से लिखिए।
पिछले वर्षों के प्रश्न (हल सहित)
2021RAS मुख्य परीक्षापेपर I2 अंक
What is 'Sharda Act'? / 'शारदा एक्ट' क्या है?
आदर्श उत्तर
बाल विवाह निरोधक अधिनियम, 1929: न्यूनतम आयु लड़की 14, लड़का 18 वर्ष; 2006 के अधिनियम से निरस्त।
अभ्यास प्रश्न
अभ्यास प्रश्नलगभग 15 शब्द
अंतर्विवाह और बहिर्विवाह में अंतर बताइए।
आदर्श उत्तर
अंतर्विवाह में विवाह अपने समूह (जाति) के भीतर होता है, बहिर्विवाह में समूह के बाहर।
अभ्यास प्रश्नलगभग 50 शब्द
बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम, 2006 के मुख्य प्रावधान लिखिए।
आदर्श उत्तर
अधिनियम में लड़की 18 और लड़का 21 वर्ष से कम "बच्चा" है। बाल विवाह बच्चे के विकल्प पर शून्यकरणीय है। भरण-पोषण, अभिरक्षा और बच्चों की वैधता का प्रावधान है। अधिकतम दो वर्ष कारावास और एक लाख रुपये जुर्माना है। मजिस्ट्रेट निषेधाज्ञा देते हैं, और अपराध संज्ञेय तथा अजमानतीय हैं।
अभ्यास प्रश्नलगभग 100 शब्द
भारत में बाल विवाह रोकने में क़ानून और प्रशासन की भूमिका का मूल्यांकन कीजिए।
आदर्श उत्तर
बाल विवाह रोकने का क़ानूनी ढाँचा 1929 के शारदा अधिनियम से 2006 के बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम तक विकसित हुआ है। अब लड़की की न्यूनतम आयु 18 और लड़के की 21 वर्ष है, बाल विवाह शून्यकरणीय है, और अपराध संज्ञेय तथा अजमानतीय हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने 18 अक्टूबर 2024 को रोकथाम को सुरक्षा और दंड से पहले रखा और ज़िला-स्तर पर समर्पित अधिकारी तथा कलेक्टर-पुलिस अधीक्षक की जवाबदेही तय की। NFHS-5 में भारत का आँकड़ा 23.3% और राजस्थान का 25.4% है। अतः क़ानून के साथ शिक्षा और सामुदायिक जागरूकता भी ज़रूरी है।
उत्तर कैसे लिखें (10 अंक, 100 शब्द)
भूमिका
प्रश्न: "भारत में बाल विवाह रोकने के क़ानून और उनकी चुनौतियों की विवेचना कीजिए।" पहले वाक्य में अर्थ: 18 वर्ष से कम की लड़की और 21 से कम के लड़के का विवाह।
मुख्य भाग
- क़ानून: शारदा अधिनियम 1929 (14/18) से PCMA 2006 (18/21)
- प्रावधान: शून्यकरणीय विवाह, भरण-पोषण, दंड, धारा 13 निषेधाज्ञा, संज्ञेय और अजमानतीय
- प्रशासन: बाल विवाह प्रतिषेध अधिकारी, ज़िला मजिस्ट्रेट, सर्वोच्च न्यायालय 2024 (रोकथाम, सुरक्षा, दंड)
- आँकड़ा: NFHS-5: भारत 23.3%, राजस्थान 25.4% (वर्ष और स्रोत सहित)
- चुनौती: सामाजिक स्वीकृति, निगरानी, संसाधन
निष्कर्ष
निष्कर्ष: क़ानून और प्रशासन के साथ शिक्षा, सामुदायिक जागरूकता और लड़कियों के अवसर बढ़ाने से ही बाल विवाह घटेगा।
अतिरिक्त मूल्य
- "रोकथाम, सुरक्षा, दंड" का क्रम
- एक आँकड़ा और एक निर्णय नाम व वर्ष के साथ
त्वरित पुनरावृत्ति
- विवाह = सामाजिक रूप से स्वीकृत संस्था; समवर्ती सूची प्रविष्टि 5
- रूप: एकविवाह, क्रमिक एकविवाह, बहुपत्नीत्व, बहुपतित्व; अंतर्विवाह और बहिर्विवाह
- मनुस्मृति 3.21: आठ विवाह-रूप
- हिंदू विवाह अधिनियम: 18-5-1955; धारा 5 (21/18), धारा 7 (सप्तपदी), धारा 8 (पंजीकरण)
- विशेष विवाह अधिनियम: लागू 1-1-1955; किसी भी दो व्यक्तियों के लिए; 30 दिन नोटिस
- शारदा अधिनियम = बाल विवाह निरोधक अधिनियम 1929: 14/18
- 1978: 18/21; PCMA 2006 (6 सन् 2007; लागू 1-11-2007) ने 1929 का अधिनियम निरस्त किया
- बाल विवाह शून्यकरणीय; याचिका वयस्कता के दो वर्ष के भीतर (धारा 3)
- दंड: अधिकतम 2 वर्ष कठोर कारावास और/या ₹1 लाख; संज्ञेय, अजमानतीय
- सर्वोच्च न्यायालय 18-10-2024: रोकथाम, सुरक्षा, दंड; कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक की जवाबदेही
- NFHS-5: भारत 23.3%, राजस्थान 25.4% (20-24 वर्ष की महिलाएँ, 18 से पहले विवाह)
याद रखने योग्य शब्द
- विवाह
- शारदा अधिनियम
- बाल विवाह
- शून्यकरणीय
- हिंदू विवाह अधिनियम
- विशेष विवाह अधिनियम
- अंतर्विवाह