भ्रष्टाचार: परिभाषा, कारण, क़ानून और उपाय
भ्रष्टाचार और राजनीतिक भ्रष्टाचार की परिभाषा, कारण, प्रभाव, 2018 का संशोधन, लोकपाल, CPI और एक न्यायिक उदाहरण, उत्तर-लेखन की दृष्टि से।
- भ्रष्टाचार
- PC अधिनियम 2018
- लोकपाल
- चुनावी बॉन्ड
सिलेबस में
RPSC सिलेबस (09-01-2026), पेपर I, इकाई III, भाग A: "Challenges and issues before Indian society: dowry, divorce, corruption, poverty, prostitution, unemployment and drug addiction." इस पृष्ठ पर भ्रष्टाचार है; दहेज और ग़रीबी के अलग पृष्ठ हैं।
इस विषय को क्यों पढ़ें
याद रखें
- 2013 में पेपर III में "सरकारी संस्थाओं में भ्रष्टाचार के कारण" और 2021 में पेपर I में "राजनीतिक भ्रष्टाचार की परिभाषा" (दोनों 2 अंक) पूछे गए; यानी 2013-2024 के पेपरों में देखा गया रुझान परिभाषा और कारण पर है।
- परिभाषा लिखते समय ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की पंक्ति और कारण लिखते समय चार समूह (संस्थागत, कार्मिक, राजनीतिक, सामाजिक) काम आते हैं।
- 10 अंक के उत्तर में 2018 का संशोधन और चुनावी बॉन्ड निर्णय जैसे वास्तविक उदाहरण उत्तर को ठोस बनाते हैं।
पहले सरल भाषा में: खिड़की पर बैठे बाबू की कहानी
मान लीजिए किसी व्यक्ति को राशन कार्ड बनवाना है। आवेदन सही है, कागज़ात पूरे हैं, फिर भी खिड़की पर बैठा कर्मचारी कहता है कि "फ़ाइल आगे बढ़वाने के लिए कुछ ख़र्चा लगेगा।" सेवा उस व्यक्ति का हक़ थी, पर अब उसके लिए क़ीमत माँगी जा रही है। यही भ्रष्टाचार (corruption) की जड़ है: जिसे जनता की सेवा की ज़िम्मेदारी दी गई, वह उसी पद का इस्तेमाल अपने फ़ायदे के लिए करता है। (यह समझाने के लिए गढ़ा गया दृश्य है, किसी वास्तविक घटना का वर्णन नहीं।)
इस उदाहरण से तीन बातें निकलती हैं जो परीक्षा के उत्तर की रीढ़ बन सकती हैं: पद की शक्ति, उसका निजी लाभ के लिए दुरुपयोग, और आम नागरिक पर उसका बोझ। इन तीनों को जोड़कर लिखा गया पहला अनुच्छेद परीक्षक को शुरू में ही बता देता है कि आप विषय को समझते हैं। आगे परिभाषा, प्रकार, कारण, प्रभाव, क़ानून और संस्थाएँ इसी क्रम में दी गई हैं।
भ्रष्टाचार की परिभाषा
ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल (Transparency International) भ्रष्टाचार को "सौंपी गई शक्ति का निजी लाभ के लिए दुरुपयोग" (abuse of entrusted power for private gain) कहती है। यह परिभाषा इसलिए उपयोगी है कि इसमें केवल रिश्वत नहीं आती; भाई-भतीजावाद, पद का दुरुपयोग और सार्वजनिक संसाधनों की हेराफेरी भी इसी में समाती हैं।
राजनीतिक भ्रष्टाचार (political corruption), जिसे 2021 में पूछा गया, की परिभाषा भी इसी संस्था की शब्दावली में मिलती है: राजनीतिक निर्णयकर्ताओं द्वारा, जो अपने पद का दुरुपयोग करके अपनी सत्ता, प्रतिष्ठा और संपत्ति बनाए रखना चाहते हैं, नीतियों, संस्थाओं और प्रक्रिया-नियमों में हेरफेर, ख़ासकर संसाधनों के आवंटन और वित्त-पोषण में। यानी यहाँ मुद्दा केवल छोटी रिश्वत का नहीं, पूरे नीतिगत फ़ैसले के रुख़ को मोड़ने का है।
भ्रष्टाचार के प्रकार (विश्लेषण)
उत्तर लिखते समय भ्रष्टाचार को दो स्तरों पर बाँटना सुविधाजनक है। यह वर्गीकरण उत्तर-लेखन के लिए है, किसी एक सरकारी दस्तावेज़ का नहीं।
प्रशासनिक या छोटा भ्रष्टाचार (petty): दैनिक सेवाओं, जैसे लाइसेंस, प्रमाण-पत्र या राशन, में रिश्वत। राजनीतिक या बड़ा भ्रष्टाचार (grand): नीति-निर्माण, ठेकों, चुनावी चंदे और संसाधन-आवंटन से जुड़ा। दोनों एक-दूसरे को बढ़ावा देते हैं: ऊपर का भ्रष्टाचार नीचे के कर्मचारियों को यह संकेत देता है कि व्यवस्था में नियम ढीले हैं।
एक और उपयोगी भेद है: कुछ मामलों में रिश्वत काम को "तेज़" करवाने के लिए दी जाती है, जबकि कुछ में ग़लत काम को "सही" ठहराने के लिए। पहले में नागरिक स्वयं को पीड़ित मानता है, दूसरे में वह भागीदार भी है। इसी भेद के कारण 2018 के संशोधन ने देने वाले की ज़िम्मेदारी भी तय की और मजबूर किए गए व्यक्ति के लिए अलग रास्ता रखा। उत्तर में यह भेद बताने से आप क़ानून की मंशा तक पहुँचते दिखते हैं, केवल धाराएँ रटते नहीं।
भ्रष्टाचार के कारण: 2013 का प्रश्न (विश्लेषण)
2013 में "सरकारी संस्थाओं में भ्रष्टाचार के मुख्य कारण" पूछा गया था। कारणों को चार समूहों में लिखें।
संस्थागत कारण: अत्यधिक विवेकाधिकार और जटिल प्रक्रियाएँ, जिनसे "तेज़ काम के लिए पैसा" का रास्ता बनता है; अपारदर्शिता, यानी सूचना का नागरिक तक न पहुँचना; और जवाबदेही-तंत्र की कमज़ोरी। कार्मिक कारण: कम वेतन और असंतोष, पदस्थापन और पदोन्नति में हेराफेरी की संभावना। राजनीतिक कारण: राजनीतिक संरक्षण, चुनावी ख़र्च के लिए धन की ज़रूरत और दंड का भय कम होना। सामाजिक कारण: रिश्वत को "सामान्य" मानने की प्रवृत्ति, शिकायत करने का डर, और न्याय-प्रक्रिया की धीमी गति।
इनमें "धीमी न्याय-प्रक्रिया" का बिंदु विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है, क्योंकि जब दंड मिलने में वर्षों लगें तो रोकथाम की ताक़त घट जाती है। यह भी देखें कि NCRB के अनुसार 2022 में राज्य भ्रष्टाचार-निरोधक ब्यूरो में पंजीकृत 4,139 मामलों में से 2,883 ट्रैप मामले थे, यानी पकड़ने का अधिकतर काम रंगे हाथ पकड़ने वाली कार्रवाई से होता है, पर दोषसिद्ध केवल 852 व्यक्ति हुए।
भ्रष्टाचार के कारणों का वर्गीकरण (विश्लेषण)
| श्रेणी | उदाहरण |
|---|---|
| संस्थागत | अत्यधिक विवेकाधिकार, अपारदर्शिता, कमज़ोर जवाबदेही |
| कार्मिक | कम वेतन और असंतोष, पदस्थापन में हेराफेरी |
| राजनीतिक | राजनीतिक संरक्षण, चुनावी चंदे की ज़रूरत |
| सामाजिक | रिश्वत की सामान्यता, शिकायत का डर, धीमी न्याय-प्रक्रिया |
यह तालिका उत्तर-लेखन की सुविधा के लिए है; यह किसी आधिकारिक वर्गीकरण का उद्धरण नहीं।
भ्रष्टाचार के प्रभाव (विश्लेषण)
भ्रष्टाचार का सबसे पहला प्रभाव ग़रीब पर पड़ता है, क्योंकि उसके पास रिश्वत देने की क्षमता कम है और उसकी सेवा अटक जाती है; इसलिए यह ग़रीबी और असमानता से जुड़ा है। दूसरा प्रभाव शासन पर भरोसे का घटना है: जब लोग मान लें कि बिना रिश्वत काम नहीं होता, तो संस्थाओं की साख गिरती है। तीसरा, आर्थिक प्रभाव: सार्वजनिक धन ग़लत हाथों में जाता है और निवेश का वातावरण बिगड़ता है। चौथा, नैतिक प्रभाव: ईमानदार कर्मचारी हतोत्साहित होते हैं और समाज में "सब चलता है" की संस्कृति बनती है।
अंतरराष्ट्रीय धारणा के स्तर पर, ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल के भ्रष्टाचार बोध सूचकांक (CPI) 2025 में भारत को 39 अंक मिले और वह 182 देशों में 91वें स्थान पर रहा। यह सूचकांक धारणा पर आधारित है, इसलिए इसे वास्तविक भ्रष्टाचार की सीधी माप नहीं, बल्कि विशेषज्ञों और व्यापार-जगत की धारणा का संकेतक मानना चाहिए (विश्लेषण)।
क़ानूनी ढाँचा: भ्रष्टाचार निवारण (संशोधन) अधिनियम, 2018
मूल अधिनियम भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 है, जिसमें 2018 में बड़ा संशोधन हुआ (अधिनियम 16 ऑफ़ 2018, राष्ट्रपति की स्वीकृति 26 जुलाई 2018)। उसकी मुख्य बातें: धारा 2(d) में "अनुचित लाभ" (undue advantage) की परिभाषा आई, जिसका अर्थ वैध पारिश्रमिक के अतिरिक्त कोई भी लाभ है, और अधिनियम स्पष्ट करता है कि यह लाभ केवल धन तक सीमित नहीं। धारा 7 में लोक सेवक द्वारा रिश्वत लेने पर 3 से 7 वर्ष तक कारावास और जुर्माना है।
धारा 8 रिश्वत देने को भी अपराध बनाती है: 7 वर्ष तक कारावास या जुर्माना या दोनों। पर जो व्यक्ति रिश्वत देने के लिए मजबूर किया गया हो, वह सात दिन के भीतर रिपोर्ट कर दे तो वह इस अपराध से बचता है। धारा 9 वाणिज्यिक संगठनों पर दायित्व डालती है, और धारा 17A जाँच शुरू करने से पहले पूर्व अनुमति की व्यवस्था करती है। मुक़दमे को दो वर्ष में पूरा करने का प्रावधान है, जिसे बढ़ाया जा सकता है, पर कुल अवधि सामान्यतः चार वर्ष से अधिक नहीं होनी चाहिए। धारा 13 में आपराधिक कदाचार पर 4 से 10 वर्ष तक कारावास है।
आलोचक कहते हैं कि पूर्व अनुमति की व्यवस्था जाँच को धीमा या सीमित कर सकती है, जबकि समर्थकों का तर्क है कि इससे ईमानदार अधिकारी निर्णय लेने में झूठे मामलों से बचते हैं। दोनों पक्ष लिखना उत्तर को संतुलित बनाता है (विश्लेषण)।
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (2018 संशोधन) की प्रमुख धाराएँ
| धारा | विषय | मुख्य प्रावधान |
|---|---|---|
| 2(d) | अनुचित लाभ | वैध पारिश्रमिक के अतिरिक्त कोई भी लाभ; केवल धन तक सीमित नहीं |
| 7 | लोक सेवक द्वारा रिश्वत लेना | 3 से 7 वर्ष कारावास और जुर्माना |
| 8 | रिश्वत देना | 7 वर्ष तक कारावास या जुर्माना या दोनों; मजबूर व्यक्ति सात दिन में रिपोर्ट करे तो छूट |
| 9 | वाणिज्यिक संगठन | वाणिज्यिक संगठन की ज़िम्मेदारी |
| 13 | आपराधिक कदाचार | 4 से 10 वर्ष कारावास |
| 17A | जाँच से पूर्व अनुमति | जाँच शुरू करने से पहले अनुमति की व्यवस्था |
धारा 13 का दंड मूल अधिनियम की धारा 13(2) से है, 2018 के संशोधन-पाठ से नहीं।
संस्थाएँ और पारदर्शिता के उपाय (विश्लेषण)
लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, 2013 केंद्र में लोकपाल और राज्यों में लोकायुक्त की व्यवस्था करता है, ताकि लोक सेवकों के विरुद्ध भ्रष्टाचार की शिकायतों की स्वतंत्र जाँच हो सके। केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC) सरकारी विभागों में सतर्कता का शीर्ष निकाय है। सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 नागरिक को सूचना माँगने का अधिकार देकर पारदर्शिता बढ़ाता है।
इन संस्थाओं की सीमाएँ भी साथ लिखें: स्वतंत्रता, संसाधन और जाँच की गति। उपाय तीन स्तर पर सोचें: निवारक (सरल प्रक्रिया, ई-गवर्नेंस, पारदर्शिता), दंडात्मक (तेज़ अभियोजन, संपत्ति की ज़ब्ती) और सामाजिक (नागरिक चेतना, शिकायत करने वाले की सुरक्षा)।
समाजशास्त्रीय दृष्टि: भ्रष्टाचार केवल क़ानून का प्रश्न क्यों नहीं (विश्लेषण)
समाजशास्त्र के विद्यार्थी के रूप में भ्रष्टाचार को केवल अपराध की तरह नहीं, सामाजिक व्यवहार की तरह भी देखना चाहिए। भारतीय समाज में नातेदारी और बिरादरी के रिश्ते बहुत मज़बूत हैं, और व्यक्ति पर अपने परिवार और समुदाय की अपेक्षाएँ रहती हैं। जब किसी पद पर बैठा व्यक्ति इन अपेक्षाओं के दबाव में अपने रिश्तेदार को लाभ पहुँचाता है, तो वह औपचारिक नियम और सामाजिक दायित्व के बीच फँसता है। यही भाई-भतीजावाद की जड़ है।
इसी तरह उपहार देने और शुभकामना के रूप में कुछ देने की सामाजिक परंपरा और रिश्वत के बीच की रेखा धुँधली हो जाती है। इसलिए कई बार लोग रिश्वत को "व्यवहार" या "सुविधा-शुल्क" जैसे नरम शब्दों में ढक लेते हैं, जिससे उसकी स्वीकार्यता बढ़ती है। भ्रष्टाचार तभी टिकता है जब देने वाले और लेने वाले, दोनों को लगे कि इसमें जोखिम कम और लाभ अधिक है; इसलिए सामाजिक अस्वीकृति और क़ानूनी दंड, दोनों साथ चलने चाहिए। (यह विश्लेषण है, किसी एक अध्ययन का निष्कर्ष नहीं।)
नागरिक की भूमिका और शिकायतकर्ता की सुरक्षा (विश्लेषण)
भ्रष्टाचार-रोधी तंत्र केवल सरकार के भरोसे नहीं चल सकता। नागरिक के पास तीन बड़े हथियार हैं: सूचना माँगना, शिकायत दर्ज करना और रिश्वत देने से इनकार करना। 2018 के संशोधन ने रिश्वत देने को भी अपराध बनाकर सामान्य नागरिक की ज़िम्मेदारी बढ़ाई, पर साथ ही मजबूर व्यक्ति को सात दिन में रिपोर्ट करने पर राहत भी दी, ताकि शिकायत करने वाला ख़ुद फँसने से न डरे।
फिर भी व्यवहार में शिकायत करने वाले को परेशान किए जाने का डर रहता है, इसलिए ऐसे व्यक्ति की पहचान और सुरक्षा, शिकायतों का तेज़ निपटारा और जवाबदेह अधिकारी की सार्वजनिक सूचना जैसे उपाय असर बढ़ाते हैं। उत्तर में नागरिक की भूमिका का एक अनुच्छेद दर्शाता है कि आप समस्या को केवल सरकार का नहीं, समाज का भी मानते हैं।
छोटा और बड़ा भ्रष्टाचार: प्रभाव में अंतर (विश्लेषण)
छोटा भ्रष्टाचार आम नागरिक को रोज़ सताता है, इसलिए उसकी चर्चा अधिक होती है, पर बड़ा भ्रष्टाचार नीतियों को ही मोड़ देता है और उसका असर पूरे समाज पर पड़ता है, जैसे ठेकों में हेराफेरी से बनी सड़क या पुल की गुणवत्ता का गिरना। इसलिए नियंत्रण के उपाय दोनों के लिए अलग होने चाहिए: छोटे भ्रष्टाचार के लिए सरल प्रक्रिया, समयबद्ध सेवा और ऑनलाइन आवेदन; बड़े के लिए पारदर्शी निविदा, स्वतंत्र जाँच एजेंसियाँ और राजनीतिक वित्त-पोषण में खुलापन।
भ्रष्टाचार: कारण से उपाय तक
भ्रष्टाचार
कारण
- विवेकाधिकार
- अपारदर्शिता
- राजनीतिक संरक्षण
- धीमी न्याय-प्रक्रिया
प्रभाव
- ग़रीब पर बोझ
- भरोसे में कमी
- आर्थिक नुक़सान
क़ानून
- PC अधिनियम 2018
- लोकपाल अधिनियम 2013
- धारा 17A
उपाय
- ई-गवर्नेंस
- RTI
- शिकायतकर्ता की सुरक्षा
मुख्य तथ्य
- भ्रष्टाचार (TI)
- सौंपी गई शक्ति का निजी लाभ के लिए दुरुपयोग
- राजनीतिक भ्रष्टाचार (TI)
- सत्ता, प्रतिष्ठा और संपत्ति बनाए रखने के लिए नीतियों और संसाधन-आवंटन में हेरफेर
- CPI 2025 में भारत
- 39 अंक; 182 देशों में 91वाँ
- PC (संशोधन) अधिनियम 2018
- अधिनियम 16, स्वीकृति 26 जुलाई 2018
- धारा 7 और धारा 8
- धारा 7: 3 से 7 वर्ष; धारा 8: 7 वर्ष तक (मजबूर व्यक्ति सात दिन में रिपोर्ट करे तो छूट)
- मुक़दमे की समय-सीमा
- 2 वर्ष; बढ़ाने पर कुल सामान्यतः 4 वर्ष से अधिक नहीं
- राज्य ACB मामले
- 4,139 (2022) बनाम 3,745 (2021); 2,883 ट्रैप; 4,993 गिरफ़्तार; 852 दोषसिद्ध
- चुनावी बॉन्ड निर्णय
- 15 फ़रवरी 2024; योजना असंवैधानिक
परीक्षा में आम ग़लतियाँ
याद रखें
- भ्रष्टाचार को केवल रिश्वत मान लेना; परिभाषा में पद की शक्ति का दुरुपयोग केंद्र में है।
- CPI को वास्तविक भ्रष्टाचार की माप बताना; यह धारणा-आधारित सूचकांक है।
- धारा 8 में केवल लेने वाले को अपराधी बताना; 2018 के बाद देने वाला भी अपराधी है (मजबूर व्यक्ति के लिए अपवाद के साथ)।
- लोकपाल को केवल क़ानून का नाम लिखकर छोड़ देना; संस्था की भूमिका और सीमा, दोनों लिखें।
- राजनीतिक और प्रशासनिक भ्रष्टाचार को एक जैसा लिखना; दोनों के स्तर और उपाय अलग हैं।
केस स्टडी: चुनावी बॉन्ड और राजनीतिक वित्त-पोषण की पारदर्शिता
केस स्टडीएसोसिएशन फ़ॉर डेमोक्रेटिक रिफ़ॉर्म्स बनाम भारत संघ (2024 INSC 113)
राजनीतिक भ्रष्टाचार की परिभाषा में वित्त-पोषण का प्रश्न शामिल है। चुनावी बॉन्ड योजना में दानदाता की पहचान गोपनीय रखी जा सकती थी, और यह सवाल सर्वोच्च न्यायालय तक पहुँचा कि क्या इससे मतदाता का जानने का अधिकार प्रभावित होता है।
- निर्णय की तिथि
- 15 फ़रवरी 2024: सर्वोच्च न्यायालय ने योजना को असंवैधानिक घोषित किया (LiveLaw और Supreme Court Observer)।
- आधार
- न्यायालय के अनुसार योजना मतदाताओं के सूचना के अधिकार, यानी अनुच्छेद 19(1)(क), का उल्लंघन करती थी।
- निर्देश
- भारतीय स्टेट बैंक को बॉन्ड जारी करना रोकने का और चुनाव आयोग को आँकड़े 13 मार्च तक प्रकाशित करने का निर्देश दिया गया।
सीख
कार्य-उदाहरण: NCRB आँकड़ों से प्रतिशत निकालना
हल सहित उदाहरणराज्य ACB के 2022 के मामले
दिया है
- आँकड़े वास्तविक हैं (NCRB, Crime in India 2022)।
- 2022 में 4,139 मामले, 2021 में 3,745।
- 2022 में ट्रैप मामले 2,883।
- 1चरण 1: वृद्धि 4,139 - 3,745 = 394 मामले अधिक।
- 2चरण 2: प्रतिशत वृद्धि 394 / 3,745 लगभग 0.105, यानी 10.5 प्रतिशत, जो NCRB के कथन से मेल खाता है।
- 3चरण 3: ट्रैप का हिस्सा 2,883 / 4,139 लगभग 0.697, यानी 69.7 प्रतिशत; यानी लगभग 7 में से 10 मामले रंगे हाथ पकड़ने वाली कार्रवाइयाँ थीं।
निष्कर्ष: सरल गणना से उत्तर में आँकड़ा वज़नदार लगता है और विश्लेषण (अधिकतर कार्रवाई ट्रैप पर निर्भर) की ओर ले जाता है.
पिछले वर्षों के प्रश्न (हल सहित)
2021RAS मुख्य परीक्षापेपर I2 अंक
राजनीतिक भ्रष्टाचार को परिभाषित कीजिए। (Define political corruption.)
आदर्श उत्तर
राजनीतिक निर्णयकर्ताओं द्वारा सत्ता, प्रतिष्ठा और संपत्ति बनाए रखने के लिए नीतियों और संसाधन-आवंटन में हेरफेर।
2013RAS मुख्य परीक्षापेपर III2 अंक
सरकारी संस्थाओं में भ्रष्टाचार के मुख्य कारण क्या हैं? (What are the basic causes of corruption in Government agencies?)
आदर्श उत्तर
अत्यधिक विवेकाधिकार, कम जवाबदेही, अपारदर्शिता, कम वेतन, राजनीतिक संरक्षण, लचर निगरानी और धीमी न्याय-प्रक्रिया।
अभ्यास के प्रश्न
अभ्यास प्रश्नलगभग 15 शब्द
भ्रष्टाचार की परिभाषा लिखिए।
आदर्श उत्तर
सौंपी गई शक्ति का निजी लाभ के लिए दुरुपयोग भ्रष्टाचार है (ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की परिभाषा)।
अभ्यास प्रश्नलगभग 50 शब्द
भ्रष्टाचार निवारण (संशोधन) अधिनियम, 2018 की मुख्य विशेषताएँ बताइए।
आदर्श उत्तर
2018 के संशोधन में अनुचित लाभ की परिभाषा जुड़ी। धारा 7 में रिश्वत लेने पर 3 से 7 वर्ष की सज़ा है। धारा 8 में रिश्वत देना भी अपराध बना; मजबूर व्यक्ति सात दिन में रिपोर्ट करे तो छूट है। धारा 17A में जाँच से पूर्व अनुमति है।
अभ्यास प्रश्नलगभग 100 शब्द
भारत में भ्रष्टाचार के कारणों, प्रभावों और नियंत्रण के उपायों की विवेचना कीजिए।
आदर्श उत्तर
भ्रष्टाचार शक्ति का निजी लाभ के लिए दुरुपयोग है। इसके कारण संस्थागत (अत्यधिक विवेकाधिकार, अपारदर्शिता, कमज़ोर जवाबदेही), राजनीतिक (संरक्षण, चुनावी चंदा) और सामाजिक (रिश्वत की सामान्यता, धीमी न्याय-प्रक्रिया) हैं।
प्रभाव में ग़रीब पर अधिक बोझ, शासन पर भरोसे की कमी और आर्थिक नुक़सान शामिल हैं। CPI 2025 में भारत 182 देशों में 91वें स्थान पर रहा।
उपायों में PC अधिनियम 2018, लोकपाल अधिनियम 2013, ई-गवर्नेंस और RTI शामिल हैं। चुनावी बॉन्ड निर्णय (2024) दिखाता है कि राजनीतिक वित्त-पोषण में पारदर्शिता भी ज़रूरी है। साथ ही शिकायतकर्ता की सुरक्षा और तेज़ अभियोजन आवश्यक हैं।
उत्तर कैसे लिखें (10 अंक, 100 शब्द)
भूमिका
प्रश्न: "भारत में भ्रष्टाचार के कारण और नियंत्रण के उपाय बताइए।" पहले वाक्य में TI की परिभाषा दें।
मुख्य भाग
- प्रकार: प्रशासनिक (छोटा) और राजनीतिक (बड़ा)
- कारण: संस्थागत, कार्मिक, राजनीतिक, सामाजिक
- प्रभाव: ग़रीब पर बोझ, भरोसे में कमी; CPI 2025: 39 अंक, 91वाँ स्थान
- क़ानून: PC अधिनियम 2018 (धारा 7, 8, 17A), लोकपाल अधिनियम 2013
- उदाहरण: चुनावी बॉन्ड निर्णय 15 फ़रवरी 2024; ACB के 2022 के आँकड़े
निष्कर्ष
निष्कर्ष: क़ानून और संस्थाएँ ज़रूरी हैं, पर भ्रष्टाचार तभी घटेगा जब पारदर्शिता, तेज़ दंड और नागरिक चेतना साथ चलें।
अतिरिक्त मूल्य
- TI की दोनों परिभाषाएँ
- CPI की धारणा-आधारित प्रकृति
- धारा 17A पर दोनों पक्ष
त्वरित पुनरावृत्ति
- भ्रष्टाचार = सौंपी गई शक्ति का निजी लाभ के लिए दुरुपयोग (TI)
- राजनीतिक भ्रष्टाचार = सत्ता, प्रतिष्ठा, संपत्ति बनाए रखने के लिए नीतियों और संसाधन-आवंटन में हेरफेर
- कारण: संस्थागत, कार्मिक, राजनीतिक, सामाजिक
- PC (संशोधन) अधिनियम 2018: धारा 7 (3-7 वर्ष), 8 (देना भी अपराध, 7 दिन में रिपोर्ट पर छूट), 17A (पूर्व अनुमति); मुक़दमा 2 से 4 वर्ष
- CPI 2025: भारत 39 अंक, 91वाँ
- ACB 2022: 4,139 मामले, 2,883 ट्रैप, 852 दोषसिद्ध
- चुनावी बॉन्ड: ADR बनाम भारत संघ, 15 फ़रवरी 2024
याद रखने योग्य शब्द
- भ्रष्टाचार
- राजनीतिक भ्रष्टाचार
- अनुचित लाभ
- धारा 17A
- लोकपाल
- CPI
- चुनावी बॉन्ड
- ट्रैप मामले