मुख्य सामग्री पर जाएं
पेपर I · इकाई III (A)

भ्रष्टाचार: परिभाषा, कारण, क़ानून और उपाय

भ्रष्टाचार और राजनीतिक भ्रष्टाचार की परिभाषा, कारण, प्रभाव, 2018 का संशोधन, लोकपाल, CPI और एक न्यायिक उदाहरण, उत्तर-लेखन की दृष्टि से।

  • भ्रष्टाचार
  • PC अधिनियम 2018
  • लोकपाल
  • चुनावी बॉन्ड
3 अक्टूबर 2026 को सत्यापित

सिलेबस में

RPSC सिलेबस (09-01-2026), पेपर I, इकाई III, भाग A: "Challenges and issues before Indian society: dowry, divorce, corruption, poverty, prostitution, unemployment and drug addiction." इस पृष्ठ पर भ्रष्टाचार है; दहेज और ग़रीबी के अलग पृष्ठ हैं।

इस विषय को क्यों पढ़ें

याद रखें

  • 2013 में पेपर III में "सरकारी संस्थाओं में भ्रष्टाचार के कारण" और 2021 में पेपर I में "राजनीतिक भ्रष्टाचार की परिभाषा" (दोनों 2 अंक) पूछे गए; यानी 2013-2024 के पेपरों में देखा गया रुझान परिभाषा और कारण पर है।
  • परिभाषा लिखते समय ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की पंक्ति और कारण लिखते समय चार समूह (संस्थागत, कार्मिक, राजनीतिक, सामाजिक) काम आते हैं।
  • 10 अंक के उत्तर में 2018 का संशोधन और चुनावी बॉन्ड निर्णय जैसे वास्तविक उदाहरण उत्तर को ठोस बनाते हैं।

पहले सरल भाषा में: खिड़की पर बैठे बाबू की कहानी

मान लीजिए किसी व्यक्ति को राशन कार्ड बनवाना है। आवेदन सही है, कागज़ात पूरे हैं, फिर भी खिड़की पर बैठा कर्मचारी कहता है कि "फ़ाइल आगे बढ़वाने के लिए कुछ ख़र्चा लगेगा।" सेवा उस व्यक्ति का हक़ थी, पर अब उसके लिए क़ीमत माँगी जा रही है। यही भ्रष्टाचार (corruption) की जड़ है: जिसे जनता की सेवा की ज़िम्मेदारी दी गई, वह उसी पद का इस्तेमाल अपने फ़ायदे के लिए करता है। (यह समझाने के लिए गढ़ा गया दृश्य है, किसी वास्तविक घटना का वर्णन नहीं।)

इस उदाहरण से तीन बातें निकलती हैं जो परीक्षा के उत्तर की रीढ़ बन सकती हैं: पद की शक्ति, उसका निजी लाभ के लिए दुरुपयोग, और आम नागरिक पर उसका बोझ। इन तीनों को जोड़कर लिखा गया पहला अनुच्छेद परीक्षक को शुरू में ही बता देता है कि आप विषय को समझते हैं। आगे परिभाषा, प्रकार, कारण, प्रभाव, क़ानून और संस्थाएँ इसी क्रम में दी गई हैं।

भ्रष्टाचार की परिभाषा

ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल (Transparency International) भ्रष्टाचार को "सौंपी गई शक्ति का निजी लाभ के लिए दुरुपयोग" (abuse of entrusted power for private gain) कहती है। यह परिभाषा इसलिए उपयोगी है कि इसमें केवल रिश्वत नहीं आती; भाई-भतीजावाद, पद का दुरुपयोग और सार्वजनिक संसाधनों की हेराफेरी भी इसी में समाती हैं।

राजनीतिक भ्रष्टाचार (political corruption), जिसे 2021 में पूछा गया, की परिभाषा भी इसी संस्था की शब्दावली में मिलती है: राजनीतिक निर्णयकर्ताओं द्वारा, जो अपने पद का दुरुपयोग करके अपनी सत्ता, प्रतिष्ठा और संपत्ति बनाए रखना चाहते हैं, नीतियों, संस्थाओं और प्रक्रिया-नियमों में हेरफेर, ख़ासकर संसाधनों के आवंटन और वित्त-पोषण में। यानी यहाँ मुद्दा केवल छोटी रिश्वत का नहीं, पूरे नीतिगत फ़ैसले के रुख़ को मोड़ने का है।

भ्रष्टाचार के प्रकार (विश्लेषण)

उत्तर लिखते समय भ्रष्टाचार को दो स्तरों पर बाँटना सुविधाजनक है। यह वर्गीकरण उत्तर-लेखन के लिए है, किसी एक सरकारी दस्तावेज़ का नहीं।

प्रशासनिक या छोटा भ्रष्टाचार (petty): दैनिक सेवाओं, जैसे लाइसेंस, प्रमाण-पत्र या राशन, में रिश्वत। राजनीतिक या बड़ा भ्रष्टाचार (grand): नीति-निर्माण, ठेकों, चुनावी चंदे और संसाधन-आवंटन से जुड़ा। दोनों एक-दूसरे को बढ़ावा देते हैं: ऊपर का भ्रष्टाचार नीचे के कर्मचारियों को यह संकेत देता है कि व्यवस्था में नियम ढीले हैं।

एक और उपयोगी भेद है: कुछ मामलों में रिश्वत काम को "तेज़" करवाने के लिए दी जाती है, जबकि कुछ में ग़लत काम को "सही" ठहराने के लिए। पहले में नागरिक स्वयं को पीड़ित मानता है, दूसरे में वह भागीदार भी है। इसी भेद के कारण 2018 के संशोधन ने देने वाले की ज़िम्मेदारी भी तय की और मजबूर किए गए व्यक्ति के लिए अलग रास्ता रखा। उत्तर में यह भेद बताने से आप क़ानून की मंशा तक पहुँचते दिखते हैं, केवल धाराएँ रटते नहीं।

भ्रष्टाचार के कारण: 2013 का प्रश्न (विश्लेषण)

2013 में "सरकारी संस्थाओं में भ्रष्टाचार के मुख्य कारण" पूछा गया था। कारणों को चार समूहों में लिखें।

संस्थागत कारण: अत्यधिक विवेकाधिकार और जटिल प्रक्रियाएँ, जिनसे "तेज़ काम के लिए पैसा" का रास्ता बनता है; अपारदर्शिता, यानी सूचना का नागरिक तक न पहुँचना; और जवाबदेही-तंत्र की कमज़ोरी। कार्मिक कारण: कम वेतन और असंतोष, पदस्थापन और पदोन्नति में हेराफेरी की संभावना। राजनीतिक कारण: राजनीतिक संरक्षण, चुनावी ख़र्च के लिए धन की ज़रूरत और दंड का भय कम होना। सामाजिक कारण: रिश्वत को "सामान्य" मानने की प्रवृत्ति, शिकायत करने का डर, और न्याय-प्रक्रिया की धीमी गति।

इनमें "धीमी न्याय-प्रक्रिया" का बिंदु विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है, क्योंकि जब दंड मिलने में वर्षों लगें तो रोकथाम की ताक़त घट जाती है। यह भी देखें कि NCRB के अनुसार 2022 में राज्य भ्रष्टाचार-निरोधक ब्यूरो में पंजीकृत 4,139 मामलों में से 2,883 ट्रैप मामले थे, यानी पकड़ने का अधिकतर काम रंगे हाथ पकड़ने वाली कार्रवाई से होता है, पर दोषसिद्ध केवल 852 व्यक्ति हुए।

भ्रष्टाचार के कारणों का वर्गीकरण (विश्लेषण)

श्रेणीउदाहरण
संस्थागतअत्यधिक विवेकाधिकार, अपारदर्शिता, कमज़ोर जवाबदेही
कार्मिककम वेतन और असंतोष, पदस्थापन में हेराफेरी
राजनीतिकराजनीतिक संरक्षण, चुनावी चंदे की ज़रूरत
सामाजिकरिश्वत की सामान्यता, शिकायत का डर, धीमी न्याय-प्रक्रिया

यह तालिका उत्तर-लेखन की सुविधा के लिए है; यह किसी आधिकारिक वर्गीकरण का उद्धरण नहीं।

भ्रष्टाचार के प्रभाव (विश्लेषण)

भ्रष्टाचार का सबसे पहला प्रभाव ग़रीब पर पड़ता है, क्योंकि उसके पास रिश्वत देने की क्षमता कम है और उसकी सेवा अटक जाती है; इसलिए यह ग़रीबी और असमानता से जुड़ा है। दूसरा प्रभाव शासन पर भरोसे का घटना है: जब लोग मान लें कि बिना रिश्वत काम नहीं होता, तो संस्थाओं की साख गिरती है। तीसरा, आर्थिक प्रभाव: सार्वजनिक धन ग़लत हाथों में जाता है और निवेश का वातावरण बिगड़ता है। चौथा, नैतिक प्रभाव: ईमानदार कर्मचारी हतोत्साहित होते हैं और समाज में "सब चलता है" की संस्कृति बनती है।

अंतरराष्ट्रीय धारणा के स्तर पर, ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल के भ्रष्टाचार बोध सूचकांक (CPI) 2025 में भारत को 39 अंक मिले और वह 182 देशों में 91वें स्थान पर रहा। यह सूचकांक धारणा पर आधारित है, इसलिए इसे वास्तविक भ्रष्टाचार की सीधी माप नहीं, बल्कि विशेषज्ञों और व्यापार-जगत की धारणा का संकेतक मानना चाहिए (विश्लेषण)।

क़ानूनी ढाँचा: भ्रष्टाचार निवारण (संशोधन) अधिनियम, 2018

मूल अधिनियम भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 है, जिसमें 2018 में बड़ा संशोधन हुआ (अधिनियम 16 ऑफ़ 2018, राष्ट्रपति की स्वीकृति 26 जुलाई 2018)। उसकी मुख्य बातें: धारा 2(d) में "अनुचित लाभ" (undue advantage) की परिभाषा आई, जिसका अर्थ वैध पारिश्रमिक के अतिरिक्त कोई भी लाभ है, और अधिनियम स्पष्ट करता है कि यह लाभ केवल धन तक सीमित नहीं। धारा 7 में लोक सेवक द्वारा रिश्वत लेने पर 3 से 7 वर्ष तक कारावास और जुर्माना है।

धारा 8 रिश्वत देने को भी अपराध बनाती है: 7 वर्ष तक कारावास या जुर्माना या दोनों। पर जो व्यक्ति रिश्वत देने के लिए मजबूर किया गया हो, वह सात दिन के भीतर रिपोर्ट कर दे तो वह इस अपराध से बचता है। धारा 9 वाणिज्यिक संगठनों पर दायित्व डालती है, और धारा 17A जाँच शुरू करने से पहले पूर्व अनुमति की व्यवस्था करती है। मुक़दमे को दो वर्ष में पूरा करने का प्रावधान है, जिसे बढ़ाया जा सकता है, पर कुल अवधि सामान्यतः चार वर्ष से अधिक नहीं होनी चाहिए। धारा 13 में आपराधिक कदाचार पर 4 से 10 वर्ष तक कारावास है।

आलोचक कहते हैं कि पूर्व अनुमति की व्यवस्था जाँच को धीमा या सीमित कर सकती है, जबकि समर्थकों का तर्क है कि इससे ईमानदार अधिकारी निर्णय लेने में झूठे मामलों से बचते हैं। दोनों पक्ष लिखना उत्तर को संतुलित बनाता है (विश्लेषण)।

भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (2018 संशोधन) की प्रमुख धाराएँ

धाराविषयमुख्य प्रावधान
2(d)अनुचित लाभवैध पारिश्रमिक के अतिरिक्त कोई भी लाभ; केवल धन तक सीमित नहीं
7लोक सेवक द्वारा रिश्वत लेना3 से 7 वर्ष कारावास और जुर्माना
8रिश्वत देना7 वर्ष तक कारावास या जुर्माना या दोनों; मजबूर व्यक्ति सात दिन में रिपोर्ट करे तो छूट
9वाणिज्यिक संगठनवाणिज्यिक संगठन की ज़िम्मेदारी
13आपराधिक कदाचार4 से 10 वर्ष कारावास
17Aजाँच से पूर्व अनुमतिजाँच शुरू करने से पहले अनुमति की व्यवस्था

धारा 13 का दंड मूल अधिनियम की धारा 13(2) से है, 2018 के संशोधन-पाठ से नहीं।

संस्थाएँ और पारदर्शिता के उपाय (विश्लेषण)

लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, 2013 केंद्र में लोकपाल और राज्यों में लोकायुक्त की व्यवस्था करता है, ताकि लोक सेवकों के विरुद्ध भ्रष्टाचार की शिकायतों की स्वतंत्र जाँच हो सके। केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC) सरकारी विभागों में सतर्कता का शीर्ष निकाय है। सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 नागरिक को सूचना माँगने का अधिकार देकर पारदर्शिता बढ़ाता है।

इन संस्थाओं की सीमाएँ भी साथ लिखें: स्वतंत्रता, संसाधन और जाँच की गति। उपाय तीन स्तर पर सोचें: निवारक (सरल प्रक्रिया, ई-गवर्नेंस, पारदर्शिता), दंडात्मक (तेज़ अभियोजन, संपत्ति की ज़ब्ती) और सामाजिक (नागरिक चेतना, शिकायत करने वाले की सुरक्षा)।

समाजशास्त्रीय दृष्टि: भ्रष्टाचार केवल क़ानून का प्रश्न क्यों नहीं (विश्लेषण)

समाजशास्त्र के विद्यार्थी के रूप में भ्रष्टाचार को केवल अपराध की तरह नहीं, सामाजिक व्यवहार की तरह भी देखना चाहिए। भारतीय समाज में नातेदारी और बिरादरी के रिश्ते बहुत मज़बूत हैं, और व्यक्ति पर अपने परिवार और समुदाय की अपेक्षाएँ रहती हैं। जब किसी पद पर बैठा व्यक्ति इन अपेक्षाओं के दबाव में अपने रिश्तेदार को लाभ पहुँचाता है, तो वह औपचारिक नियम और सामाजिक दायित्व के बीच फँसता है। यही भाई-भतीजावाद की जड़ है।

इसी तरह उपहार देने और शुभकामना के रूप में कुछ देने की सामाजिक परंपरा और रिश्वत के बीच की रेखा धुँधली हो जाती है। इसलिए कई बार लोग रिश्वत को "व्यवहार" या "सुविधा-शुल्क" जैसे नरम शब्दों में ढक लेते हैं, जिससे उसकी स्वीकार्यता बढ़ती है। भ्रष्टाचार तभी टिकता है जब देने वाले और लेने वाले, दोनों को लगे कि इसमें जोखिम कम और लाभ अधिक है; इसलिए सामाजिक अस्वीकृति और क़ानूनी दंड, दोनों साथ चलने चाहिए। (यह विश्लेषण है, किसी एक अध्ययन का निष्कर्ष नहीं।)

नागरिक की भूमिका और शिकायतकर्ता की सुरक्षा (विश्लेषण)

भ्रष्टाचार-रोधी तंत्र केवल सरकार के भरोसे नहीं चल सकता। नागरिक के पास तीन बड़े हथियार हैं: सूचना माँगना, शिकायत दर्ज करना और रिश्वत देने से इनकार करना। 2018 के संशोधन ने रिश्वत देने को भी अपराध बनाकर सामान्य नागरिक की ज़िम्मेदारी बढ़ाई, पर साथ ही मजबूर व्यक्ति को सात दिन में रिपोर्ट करने पर राहत भी दी, ताकि शिकायत करने वाला ख़ुद फँसने से न डरे।

फिर भी व्यवहार में शिकायत करने वाले को परेशान किए जाने का डर रहता है, इसलिए ऐसे व्यक्ति की पहचान और सुरक्षा, शिकायतों का तेज़ निपटारा और जवाबदेह अधिकारी की सार्वजनिक सूचना जैसे उपाय असर बढ़ाते हैं। उत्तर में नागरिक की भूमिका का एक अनुच्छेद दर्शाता है कि आप समस्या को केवल सरकार का नहीं, समाज का भी मानते हैं।

छोटा और बड़ा भ्रष्टाचार: प्रभाव में अंतर (विश्लेषण)

छोटा भ्रष्टाचार आम नागरिक को रोज़ सताता है, इसलिए उसकी चर्चा अधिक होती है, पर बड़ा भ्रष्टाचार नीतियों को ही मोड़ देता है और उसका असर पूरे समाज पर पड़ता है, जैसे ठेकों में हेराफेरी से बनी सड़क या पुल की गुणवत्ता का गिरना। इसलिए नियंत्रण के उपाय दोनों के लिए अलग होने चाहिए: छोटे भ्रष्टाचार के लिए सरल प्रक्रिया, समयबद्ध सेवा और ऑनलाइन आवेदन; बड़े के लिए पारदर्शी निविदा, स्वतंत्र जाँच एजेंसियाँ और राजनीतिक वित्त-पोषण में खुलापन।

भ्रष्टाचार: कारण से उपाय तक

भ्रष्टाचार

कारण

  • विवेकाधिकार
  • अपारदर्शिता
  • राजनीतिक संरक्षण
  • धीमी न्याय-प्रक्रिया

प्रभाव

  • ग़रीब पर बोझ
  • भरोसे में कमी
  • आर्थिक नुक़सान

क़ानून

  • PC अधिनियम 2018
  • लोकपाल अधिनियम 2013
  • धारा 17A

उपाय

  • ई-गवर्नेंस
  • RTI
  • शिकायतकर्ता की सुरक्षा
चार शाखाओं से उत्तर का ढाँचा बनता है (विश्लेषण)।

मुख्य तथ्य

भ्रष्टाचार (TI)
सौंपी गई शक्ति का निजी लाभ के लिए दुरुपयोग
राजनीतिक भ्रष्टाचार (TI)
सत्ता, प्रतिष्ठा और संपत्ति बनाए रखने के लिए नीतियों और संसाधन-आवंटन में हेरफेर
CPI 2025 में भारत
39 अंक; 182 देशों में 91वाँ
PC (संशोधन) अधिनियम 2018
अधिनियम 16, स्वीकृति 26 जुलाई 2018
धारा 7 और धारा 8
धारा 7: 3 से 7 वर्ष; धारा 8: 7 वर्ष तक (मजबूर व्यक्ति सात दिन में रिपोर्ट करे तो छूट)
मुक़दमे की समय-सीमा
2 वर्ष; बढ़ाने पर कुल सामान्यतः 4 वर्ष से अधिक नहीं
राज्य ACB मामले
4,139 (2022) बनाम 3,745 (2021); 2,883 ट्रैप; 4,993 गिरफ़्तार; 852 दोषसिद्ध
चुनावी बॉन्ड निर्णय
15 फ़रवरी 2024; योजना असंवैधानिक

परीक्षा में आम ग़लतियाँ

याद रखें

  • भ्रष्टाचार को केवल रिश्वत मान लेना; परिभाषा में पद की शक्ति का दुरुपयोग केंद्र में है।
  • CPI को वास्तविक भ्रष्टाचार की माप बताना; यह धारणा-आधारित सूचकांक है।
  • धारा 8 में केवल लेने वाले को अपराधी बताना; 2018 के बाद देने वाला भी अपराधी है (मजबूर व्यक्ति के लिए अपवाद के साथ)।
  • लोकपाल को केवल क़ानून का नाम लिखकर छोड़ देना; संस्था की भूमिका और सीमा, दोनों लिखें।
  • राजनीतिक और प्रशासनिक भ्रष्टाचार को एक जैसा लिखना; दोनों के स्तर और उपाय अलग हैं।