मुख्य सामग्री पर जाएं
समाजशास्त्र · पेपर I · इकाई III (क)

नशे की लत (Drug Addiction): पुनर्बलन सिद्धांत, आँकड़े, NDPS Act और नशा मुक्त भारत

नशे की लत का अर्थ, पुनर्बलन सिद्धांत, राष्ट्रीय सर्वेक्षण 2018 के आँकड़े, NDPS Act और नशा मुक्त भारत अभियान, उत्तर-लेखन की दृष्टि से।

  • पुनर्बलन सिद्धांत
  • NDPS Act
  • NMBA
  • अनुच्छेद 47
3 अक्टूबर 2026 को सत्यापित

सिलेबस में

RPSC सिलेबस (09-01-2026), पेपर I, इकाई III, भाग क (समाजशास्त्र): "Challenges and issues before Indian society: dowry, divorce, corruption, poverty, prostitution, unemployment and drug addiction." इस पृष्ठ पर नशे की लत (drug addiction) है; दहेज, तलाक़, भ्रष्टाचार, ग़रीबी, वेश्यावृत्ति और बेरोज़गारी के अलग पृष्ठ हैं।

इस विषय को क्यों पढ़ें

याद रखें

  • 2024 के पेपर I (प्रश्न 31, 2 अंक) में "Reinforcement theory of drug abuse" पूछा गया था। यानी परीक्षक नशे को केवल "बुरी आदत" की जगह सीखने और मनोविज्ञान के सिद्धांत से समझाने की अपेक्षा रखते हैं। बाक़ी संकलित पेपरों (2013, 2016, 2018, 2021, 2023) में सीधा प्रश्न नहीं मिला (2013-2024 के पेपरों में देखा गया)।
  • सबसे उपयोगी तैयारी तीन परतों की है: सिद्धांत (क्यों लत लगती है), आँकड़े और क़ानून (समस्या कितनी बड़ी है और NDPS Act क्या कहता है) और नीति (नशा मुक्त भारत अभियान, उपचार)।
  • इस विषय में सज़ा से ज़्यादा उपचार की भाषा चाहिए: NDPS Act की धारा 64A जैसे प्रावधान दिखाते हैं कि क़ानून भी नशेड़ी को रोगी की तरह देखने की गुंजाइश रखता है।

पहले सरल भाषा में: चाय की आदत से बीमारी तक

कई लोग रोज़ सुबह चाय पीते हैं। एक दिन चाय न मिले तो सिर भारी लगता है और चिड़चिड़ाहट होती है। यह छोटी-सी निर्भरता है। अब सोचिए कि कोई पदार्थ इतना असर करे कि उसके बिना शरीर और मन दोनों बेचैन हों, मात्रा बढ़ाते जाना पड़े और नुक़सान दिखने पर भी आदमी रुक न पाए। यहाँ बात आदत से आगे बढ़कर बीमारी बन जाती है।

इसलिए नशे की लत (drug addiction) को केवल इच्छा-शक्ति की कमी कहना ग़लत है। अमेरिका की राष्ट्रीय नशा-दुरुपयोग संस्था (NIDA) इसे दीर्घकालिक रोग कहती है, जिसमें नशे की तलब और सेवन बाध्यकारी हो जाते हैं और हानिकारक परिणामों के बावजूद जारी रहते हैं। इसी कारण यह रोग दोबारा लौट भी सकता है (relapse), और इलाज में धैर्य चाहिए।

मुख्य शब्द: उपयोग, हानिकारक उपयोग और निर्भरता

राष्ट्रीय सर्वेक्षण में तीन शब्द तय किए गए हैं। "वर्तमान उपयोग" (current use) का अर्थ है पिछले 12 महीनों में एक बार भी सेवन। "हानिकारक उपयोग" (harmful use) का अर्थ है वर्तमान उपयोग के साथ WHO के ASSIST पैमाने पर 4 से 26 अंक (शराब के लिए 11 से 26) और पिछले तीन महीनों में सेवन का कोई हानिकारक परिणाम। "निर्भरता" (dependence) का अर्थ है वर्तमान उपयोग के साथ ASSIST में 26 से अधिक अंक। हानिकारक उपयोग और निर्भरता को मिलाकर "क्वांटम ऑफ़ वर्क" कहा गया है, यानी वे लोग जिन्हें पेशेवर मदद चाहिए।

NIDA के अनुसार लंबे सेवन से मस्तिष्क की प्रतिक्रिया घटती है, जिसे सहनशीलता (tolerance) कहते हैं। इसलिए व्यक्ति पहले जैसा असर पाने के लिए मात्रा बढ़ाता है, और धीरे-धीरे दूसरी चीज़ों से, जैसे खाने या मेल-जोल से, उसे आनंद कम मिलने लगता है।

पुनर्बलन सिद्धांत (reinforcement theory): 2024 में पूछा गया प्रश्न

सीखने के मनोविज्ञान में पुनर्बलन (reinforcement) का अर्थ है ऐसा परिणाम जो किसी व्यवहार के दोहराए जाने की संभावना बढ़ाए। यह विचार थॉर्नडाइक (Edward Thorndike) के "प्रभाव के नियम" (law of effect) पर टिका है, जिसे बी. एफ़. स्किनर (B. F. Skinner) ने संक्रियात्मक अनुबंधन (operant conditioning) के रूप में आगे बढ़ाया। OpenStax की पाठ्यपुस्तक के अनुसार स्किनर का मानना था कि व्यवहार इस बात से प्रेरित होता है कि उसके बाद क्या परिणाम मिलता है। यहाँ "सकारात्मक" का अर्थ कुछ जोड़ना है और "नकारात्मक" का अर्थ कुछ हटाना है, अच्छा या बुरा नहीं।

इसे नशे पर लगाने पर तस्वीर साफ़ होती है। पहला, सकारात्मक पुनर्बलन: NIDA के अनुसार अधिकांश नशीले पदार्थ मस्तिष्क के "इनाम परिपथ" (reward circuit) में डोपामाइन की बाढ़ ला देते हैं, जिससे उल्लास होता है और ऐसे सुखद पर नुक़सानदेह व्यवहार का पुनर्बलन होता है, इसलिए व्यक्ति उसे बार-बार दोहराता है। दूसरा, नकारात्मक पुनर्बलन (विश्लेषण): जब नशे से कोई अप्रिय स्थिति हटती है, जैसे तनाव, अकेलापन या सेवन छोड़ने की बेचैनी, तब उससे राहत देने वाला व्यवहार भी मज़बूत होता है। तीसरा, सहनशीलता मात्रा बढ़ाती है और चक्र कसता जाता है।

इस सिद्धांत की उपयोगिता उपचार में दिखती है: यदि सेवन के साथ मिलने वाले इनाम को कम किया जाए, वैकल्पिक स्वस्थ इनाम (खेल, काम, रिश्ते) दिए जाएँ और राहत के दूसरे तरीक़े सिखाए जाएँ, तो व्यवहार का चक्र टूट सकता है (विश्लेषण)। इसकी सीमा यह है कि यह अकेला सिद्धांत लत की जटिलता नहीं समझाता; जैविक, सामाजिक और पारिवारिक कारण भी साथ रहते हैं।

नशे की लत को समझाने वाले दृष्टिकोण (विश्लेषण)

दृष्टिकोणमुख्य विचारउत्तर में कैसे जोड़ें
पुनर्बलन/सीखने का दृष्टिकोणसेवन का इनाम (उल्लास) या राहत व्यवहार को दोहराने की संभावना बढ़ाते हैं2024 का प्रश्न; सकारात्मक और नकारात्मक पुनर्बलन अलग लिखें
जैविक दृष्टिकोणइनाम परिपथ और डोपामाइन, सहनशीलता, जोखिम-कारकों में आनुवंशिक पक्षNIDA का हवाला; "कोई एक कारक नहीं" वाली बात
सामाजिक दृष्टिकोणसाथी-समूह, परिवार का माहौल, उपलब्धता, ग़रीबी और बेरोज़गारीसमाजशास्त्र के प्रश्न में सबसे ज़्यादा अंक यहीं
मनोवैज्ञानिक दबावतनाव, अवसाद और आघात से बचने की कोशिशरोकथाम में परामर्श और मानसिक स्वास्थ्य सेवा से जोड़ें

समस्या कितनी बड़ी है: राष्ट्रीय सर्वेक्षण के आँकड़े

सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय (MoSJE) के लिए नई दिल्ली के AIIMS के राष्ट्रीय औषधि निर्भरता उपचार केंद्र (NDDTC) ने देश का पहला व्यापक राष्ट्रीय सर्वेक्षण किया। रिपोर्ट के अनुसार सर्वेक्षण 36 राज्यों और केंद्र-शासित प्रदेशों के 186 ज़िलों के घरों में दिसंबर 2017 से अक्टूबर 2018 के बीच हुआ, इसमें 4,73,569 व्यक्तियों से बातचीत हुई, और रिपोर्ट फ़रवरी 2019 में जारी हुई। इसमें 10 से 75 वर्ष की जनसंख्या शामिल है। इसके साथ नशे पर निर्भर 72,642 लोगों का अलग सर्वेक्षण (RDS) 135 ज़िलों में हुआ।

नतीजे बताते हैं कि शराब सबसे आम नशा है: 14.6% जनसंख्या (लगभग 16 करोड़) इसका सेवन करती है, और पुरुषों में यह 27.3% तथा महिलाओं में 1.6% है। भाँग-गाँजा-चरस जैसे कैनबिस का उपयोग 2.8% (लगभग 3.1 करोड़) लोग करते हैं, जिनमें भाँग लगभग 2% (2.2 करोड़) और गाँजा-चरस लगभग 1.2% (1.3 करोड़) है। अफ़ीम-वर्ग (ओपिओइड) का उपयोग 2.1% (लगभग 2.26 करोड़) लोग करते हैं; इनमें हेरोइन 1.14%, फ़ार्मास्यूटिकल ओपिओइड 0.96% और अफ़ीम (डोडा-फुक्की सहित) 0.52% है।

समस्या-ग्रस्त उपयोग (हानिकारक या निर्भर) के अनुमान चिंताजनक हैं: शराब में लगभग 5.7 करोड़ लोग, कैनबिस में लगभग 25 लाख और ओपिओइड में लगभग 77 लाख (जनसंख्या का 0.70%)। शामक दवाओं (बिना पर्ची) का वर्तमान उपयोग 1.08% (लगभग 1.18 करोड़) है। साँस से लेने वाले पदार्थों (inhalants) में बच्चों और किशोरों में उपयोग (1.17%) वयस्कों (0.58%) से अधिक है।

राष्ट्रीय सर्वेक्षण 2018 (रिपोर्ट 2019) के मुख्य आँकड़े, 10-75 वर्ष

पदार्थउपयोगकर्ता (लगभग)समस्या-ग्रस्त या निर्भर (लगभग)अन्य बात
शराब14.6% (16 करोड़)5.7 करोड़ (5.2%); निर्भर 2.9 करोड़ (2.7%)पुरुष 27.3%, महिला 1.6%
कैनबिस (भाँग, गाँजा, चरस)2.8% (3.1 करोड़)लगभग 25 लाख निर्भरभाँग 2.2 करोड़; गाँजा-चरस 1.3 करोड़
ओपिओइड (अफ़ीम, हेरोइन, दवाएँ)2.1% (2.26 करोड़)लगभग 77 लाख (0.70%)हेरोइन सबसे आम (1.14%)
शामक (बिना पर्ची)1.08% (1.18 करोड़)4.6 लाख (लगभग)साँस वाले पदार्थ: कुल 0.7%, बच्चों में 1.17%
कोकीन, ATS, भ्रम-कारीकोकीन 0.10%, ATS 0.18%, भ्रम-कारी 0.12%संख्याएँ बहुत कमछोटे हिस्से के लोग

उपचार की खाई और उसका मतलब (विश्लेषण)

रिपोर्ट के अनुसार शराब-निर्भर लोगों में लगभग 38 में से केवल एक ने कभी इलाज या मदद पाई, और अवैध नशे के निर्भर लोगों में हर चार में से एक ने। भर्ती-उपचार तक पहुँच और भी कम है: शराब-निर्भर 180 में से एक और अवैध नशे के निर्भर 20 में से एक को। इसका अर्थ है कि समस्या का बड़ा हिस्सा आज भी उपचार के दायरे से बाहर है, और कलंक तथा सेवाओं की कमी दोनों बड़ी बाधाएँ हैं।

आँकड़े पुराने हैं (2018 का क्षेत्र-कार्य), इसलिए उत्तर में "राष्ट्रीय सर्वेक्षण 2018 के अनुसार" लिखना सही रहेगा, "आज इतने लोग" नहीं। किसी नए राष्ट्रीय सर्वेक्षण का आँकड़ा इस पृष्ठ पर सत्यापित नहीं है।

कारण और परिणाम (विश्लेषण)

कारण परतों में समझें। व्यक्तिगत स्तर पर जिज्ञासा, तनाव, अवसाद, कम आत्म-सम्मान और आनुवंशिक संवेदनशीलता है। सामाजिक स्तर पर साथी-समूह का दबाव, नशे की आसान उपलब्धता और परिवार का तनावपूर्ण माहौल है। संरचनात्मक स्तर पर बेरोज़गारी, ग़रीबी, शहरीकरण का अकेलापन और सीमावर्ती या तस्करी-मार्ग वाले इलाक़े हैं। PIB के नशा मुक्त भारत दस्तावेज़ में भी आनुवंशिक संवेदनशीलता, मानसिक स्वास्थ्य की स्थितियाँ और बाल उपेक्षा जैसे बिगड़े पारिवारिक माहौल को जोखिम बढ़ाने वाले कारक बताया गया है।

परिणाम व्यक्ति, परिवार और समाज तीनों पर हैं। व्यक्ति में स्वास्थ्य की गिरावट, मानसिक रोग और काम करने की क्षमता का ह्रास होता है। परिवार में हिंसा, क़र्ज़ और टूटते संबंध दिखते हैं। समाज में अपराध, सड़क-दुर्घटनाएँ, उत्पादकता का नुक़सान और नशे के कारोबार में अपराध-जाल बनते हैं। PIB के दस्तावेज़ के अनुसार नशे का युवाओं पर विशेष असर है और यह अपराध-दर बढ़ाने, पारस्परिक संबंध बिगाड़ने और आर्थिक अवसर सीमित करने जैसे परिणाम लाता है।

क़ानूनी ढाँचा: संविधान और NDPS Act, 1985

संविधान का अनुच्छेद 47 राज्य के नीति-निदेशक तत्वों में कहता है कि राज्य पोषण और जीवन-स्तर ऊपर उठाने तथा जन-स्वास्थ्य सुधारने को अपने प्राथमिक कर्तव्यों में मानेगा और विशेष रूप से औषधीय उद्देश्य के सिवा नशीले पेयों और स्वास्थ्य के लिए हानिकारक नशीली औषधियों के उपभोग के निषेध के लिए प्रयास करेगा। यह प्रवर्तनीय अधिकार नहीं, पर नीति की दिशा है।

मुख्य क़ानून नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रॉपिक सबस्टेंसेज़ अधिनियम, 1985 (NDPS Act, अधिनियम संख्या 61 सन् 1985) है। राजपत्र-पाठ के अनुसार विधेयक को 16 सितंबर 1985 को राष्ट्रपति की स्वीकृति मिली और यह 14 नवंबर 1985 से लागू हुआ। धारा 8 औषधीय या वैज्ञानिक उद्देश्य के सिवा नशीली दवाओं और मनःप्रभावी पदार्थों की खेती, उत्पादन, क़ब्ज़ा, बिक्री, ख़रीद, परिवहन और उपयोग जैसे कार्यों को प्रतिबंधित करती है।

सेवन (consumption) धारा 27 के तहत अपराध है। राजस्व विभाग (वित्त मंत्रालय) के अनुसार कुछ पदार्थों के सेवन पर एक वर्ष तक और अन्य सभी के लिए छह माह तक के कारावास का प्रावधान है। परंतु धारा 64A के अनुसार जो नशेड़ी (addict) धारा 27 या अल्प मात्रा के अपराधों में आरोपित है और स्वेच्छा से सरकार या स्थानीय निकाय द्वारा संचालित या मान्य संस्था में नशामुक्ति का इलाज कराता है, वह अभियोजन से मुक्ति पाता है। शर्त यह है कि पूरा इलाज न कराने पर यह छूट वापस ली जा सकती है। धारा 71 सरकार को नशेड़ियों की पहचान, उपचार, शिक्षा, पुनर्वास और सामाजिक पुनःस्थापन के केंद्र खोलने की शक्ति देती है।

नीति और कार्यक्रम: NAPDDR और नशा मुक्त भारत अभियान

सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय ने नशे की माँग घटाने के लिए राष्ट्रीय कार्य-योजना (National Action Plan for Drug Demand Reduction, NAPDDR) 2018 से 2025 की अवधि के लिए बनाई। इसमें स्कूल-कॉलेज-विश्वविद्यालयों में जागरूकता, माता-पिता के साथ कार्यशालाएँ, समुदाय-आधारित सहकर्मी-नेतृत्व वाले हस्तक्षेप, उपचार सुविधाएँ और सेवा-प्रदाताओं की क्षमता-वृद्धि शामिल है।

नशा मुक्त भारत अभियान (NMBA) 15 अगस्त 2020 को शुरू हुआ। PIB के 2020 के उत्तर के अनुसार शुरुआत में यह 272 सबसे प्रभावित ज़िलों में था, जिन्हें नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) की सूचना और मंत्रालय के राष्ट्रीय सर्वेक्षण के निष्कर्षों से चुना गया था। मई 2025 के PIB दस्तावेज़ के अनुसार अब यह सभी ज़िलों तक फैल गया है। अभियान की रणनीति तीन-आयामी है: आपूर्ति पर नियंत्रण (NCB), माँग घटाने और जागरूकता (सामाजिक न्याय मंत्रालय) और उपचार व पुनर्वास (स्वास्थ्य मंत्रालय)। ज़िला स्तर पर कलेक्टर या मजिस्ट्रेट की अध्यक्षता में "नशा मुक्त समितियाँ" स्थानीय कार्य-योजना बनाती हैं।

PIB (6 मई 2025) के अनुसार 4 मई 2025 तक 15.58 करोड़ से अधिक लोगों (5.20 करोड़ युवा और 3.30 करोड़ महिलाएँ) को जागरूक किया गया, 27.76 लाख से अधिक व्यक्तियों का उपचार हुआ, 730 से अधिक निःशुल्क केंद्र और 10,000 से अधिक मास्टर वॉलंटियर हैं। निःशुल्क राष्ट्रीय हेल्पलाइन 14446 प्राथमिक परामर्श और तुरंत रेफ़रल देती है। मंत्रालय के सहायता-प्राप्त संस्थानों में एकीकृत पुनर्वास केंद्र (IRCA), सहकर्मी-नेतृत्व वाले हस्तक्षेप (CPLI) और आउटरीच व ड्रॉप-इन केंद्र (ODIC) हैं।

नशे की लत: चक्र और हस्तक्षेप

नशे की लत

सिद्धांत

क्यों लगती है

  • पुनर्बलन: उल्लास और राहत
  • इनाम परिपथ, सहनशीलता
  • साथी-समूह, परिवार, तनाव

आँकड़े

राष्ट्रीय सर्वेक्षण 2018

  • शराब 14.6%, कैनबिस 2.8%
  • ओपिओइड 2.1%
  • उपचार की खाई

क़ानून

अनुच्छेद 47, NDPS 1985

  • धारा 8, 27
  • धारा 64A: उपचार पर छूट
  • धारा 71: उपचार केंद्र

नीति

NAPDDR और NMBA

  • तीन-आयामी रणनीति
  • ज़िला नशा मुक्त समितियाँ
  • हेल्पलाइन 14446
सिद्धांत से आँकड़ों और क़ानून तक की कड़ी जोड़ने पर 2 अंक का उत्तर भी गहरा लगता है (विश्लेषण)।

मुख्य तथ्य

राष्ट्रीय सर्वेक्षण
2018 में क्षेत्र-कार्य, रिपोर्ट फ़रवरी 2019; 36 राज्य/केंद्र-शासित प्रदेश, 186 ज़िले, 4,73,569 व्यक्ति; आयु 10-75 वर्ष
शराब, कैनबिस, ओपिओइड
क्रमशः 14.6% (16 करोड़), 2.8% (3.1 करोड़), 2.1% (2.26 करोड़)
ओपिओइड की समस्या
लगभग 77 लाख लोगों को मदद चाहिए (0.70%)
NDPS Act, 1985
अधिनियम 61 सन् 1985; स्वीकृति 16 सितंबर 1985; प्रवर्तन 14 नवंबर 1985
धारा 27 और 64A
सेवन पर अधिकतम एक वर्ष या छह माह का कारावास; स्वेच्छा से इलाज कराने वाले नशेड़ी को छूट (धारा 64A)
NMBA
15 अगस्त 2020; 272 ज़िलों से शुरू; तीन-आयामी रणनीति; हेल्पलाइन 14446
NMBA की पहुँच (4 मई 2025 तक)
15.58 करोड़ जागरूक; 27.76 लाख का उपचार; 730+ निःशुल्क केंद्र
नीति-निदेशक तत्व
अनुच्छेद 47: हानिकारक नशीली औषधियों के उपभोग के निषेध का प्रयास
अंतिम जाँच
सर्वेक्षण, NDPS पाठ और PIB से मिलान: 2 अक्टूबर 2026; NDPS की धारा 27 की जुर्माना-राशियाँ और संशोधन-स्थिति इस पृष्ठ पर जानबूझकर नहीं दी गई हैं

राजस्थान का पहलू (केंद्र की रिपोर्ट से)

राष्ट्रीय सर्वेक्षण की रिपोर्ट (MoSJE और AIIMS का NDDTC, फ़रवरी 2019) के अनुसार ओपिओइड-समस्या वाले लगभग 77 लाख लोगों में से आधे से अधिक कुछ ही राज्यों में हैं, जिनमें राजस्थान भी गिना गया है। रिपोर्ट के शीर्ष दस राज्यों के चार्ट में राजस्थान के लिए 3.1 लाख का आँकड़ा है। यह राज्य सरकार का नहीं, केंद्र की रिपोर्ट का आँकड़ा है और 2018 के सर्वेक्षण पर आधारित है। राजस्थान के किसी नए आधिकारिक आँकड़े की पुष्टि इस पृष्ठ पर नहीं की गई है। (रिपोर्ट से मिलान: 2 अक्टूबर 2026।)

परीक्षा में आम ग़लतियाँ

याद रखें

  • पुनर्बलन को केवल "इनाम" समझ लेना: नकारात्मक पुनर्बलन का मतलब सज़ा नहीं है, बल्कि कुछ अप्रिय हटाने से व्यवहार का मज़बूत होना है। सज़ा (punishment) अलग है।
  • लत को इच्छा-शक्ति की कमी लिख देना: NIDA के अनुसार यह दीर्घकालिक, दोबारा लौटने वाला रोग है; उत्तर में रोग-दृष्टि और उपचार की बात रखें।
  • सर्वेक्षण के आँकड़ों को "आज की स्थिति" की तरह लिखना: इन्हें "राष्ट्रीय सर्वेक्षण 2018 (रिपोर्ट 2019) के अनुसार" लिखें।
  • NDPS की सज़ाएँ या जुर्माने याद के भरोसे लिखना: पक्का न हो तो केवल धारा का विषय लिखें (धारा 27 सेवन, 64A उपचार पर छूट)।
  • नशे को केवल क़ानून-व्यवस्था की समस्या बताना: रोकथाम, उपचार और पुनर्वास भी साथ रखें, जैसा NMBA की तीन-आयामी रणनीति है।