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पेपर I · इकाई III (A)

ग़रीबी: अर्थ, माप, कारण और संस्कृति-ग़रीबी

ग़रीबी का अर्थ, तीन माप-पद्धतियाँ, कारण, संस्कृति-ग़रीबी की अवधारणा, राजस्थान और उत्तर-लेखन की दृष्टि से।

  • ग़रीबी
  • MPI
  • संस्कृति-ग़रीबी
  • NFSA
3 अक्टूबर 2026 को सत्यापित

सिलेबस में

RPSC सिलेबस (09-01-2026), पेपर I, इकाई III, भाग A: "Challenges and issues before Indian society: dowry, divorce, corruption, poverty, prostitution, unemployment and drug addiction." इस पृष्ठ पर ग़रीबी है; दहेज और भ्रष्टाचार के अलग पृष्ठ हैं।

इस विषय को क्यों पढ़ें

याद रखें

  • 2023 के पेपर में "संस्कृति-ग़रीबी" (Culture of Poverty) 2 अंक में पूछा गया; ऑस्कर लुईस और Five Families (1959) का नाम लिखना ही बुनियादी अंक दिलाता है।
  • तीन माप-पद्धतियाँ (तेंदुलकर, MPI, विश्व बैंक) का फ़र्क़ जानने वाला उत्तर औसत उत्तरों से अलग दिखता है।
  • राजस्थान का उदाहरण, कि बहुआयामी ग़रीबी में सबसे तेज़ गिरावट वाले राज्यों में यह शामिल है, उत्तर को स्थानीय आधार देता है।

पहले सरल भाषा में: भूख की रेखा और ग़रीबी की रेखा

एक गाँव की कल्पना कीजिए जहाँ दो परिवार हैं। पहले परिवार के पास रोज़ पेट भरने लायक़ अनाज है, पर बच्चों के लिए स्कूल की फ़ीस, पक्का घर या बीमारी के इलाज की गुंजाइश नहीं। दूसरे परिवार के पास दोनों वक़्त का खाना भी पक्का नहीं। दोनों को हम "ग़रीब" कहेंगे, पर उनकी ग़रीबी की गहराई अलग है। ग़रीबी को मापने के सारे तरीक़े इसी सवाल से जूझते हैं: क्या हम केवल आमदनी देखें या पूरे जीवन-स्तर को? (यह समझाने के लिए गढ़ा गया दृश्य है, किसी वास्तविक परिवार का वर्णन नहीं।)

सिलेबस की पंक्ति "challenges and issues before Indian society: ... poverty" है, इसलिए परीक्षा में अर्थ, माप, कारण, सामाजिक प्रभाव, उपाय और संस्कृति-ग़रीबी की अवधारणा, तीनों स्तरों की तैयारी चाहिए। 2023 में 2 अंक का प्रश्न "संस्कृति-ग़रीबी" पर आया था।

इस पृष्ठ को पढ़ते समय हर आँकड़े के साथ तीन बातें साथ-साथ याद रखें: किस संस्था ने बताया, किस वर्ष का है और किस पैमाने पर आधारित है। यही तीन बातें अंतर करती हैं कि उत्तर तथ्य की तरह पढ़ा जाए या अनुमान की तरह, और परीक्षक को पद्धति की समझ का संकेत भी देती हैं।

ग़रीबी का अर्थ: निरपेक्ष, सापेक्ष और बहुआयामी

निरपेक्ष ग़रीबी (absolute poverty) वह स्थिति है जब कोई व्यक्ति जीवन की न्यूनतम आवश्यकताएँ, यानी भोजन, कपड़ा, आश्रय, पूरी नहीं कर पाता। इसे मापने के लिए एक तय "ग़रीबी रेखा" बनाई जाती है और उससे नीचे के लोग ग़रीब माने जाते हैं। सापेक्ष ग़रीबी (relative poverty) में व्यक्ति की तुलना समाज के औसत जीवन-स्तर से होती है: वह इतना कम पाता है कि समाज की सामान्य गतिविधियों में हिस्सा नहीं ले पाता।

बहुआयामी ग़रीबी (multidimensional poverty) मानती है कि ग़रीबी केवल आमदनी की कमी नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन-स्तर में एक साथ वंचना है। भारत का राष्ट्रीय बहुआयामी ग़रीबी सूचकांक (MPI) नीति आयोग तैयार करता है और NFHS सर्वेक्षणों पर आधारित है। इसमें स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन-स्तर के संकेतकों को साथ जोड़ा जाता है, इसलिए यह देखता है कि घर में पोषण, स्कूली शिक्षा, स्वच्छता और रसोई-ईंधन जैसी चीज़ें हैं या नहीं।

भारत में माप: तीन नज़रिए एक नज़र में

भारत में ग़रीबी के तीन अलग तरह के आँकड़े चर्चा में रहते हैं और परीक्षा में इन्हें गड्डमड्ड नहीं करना चाहिए, क्योंकि पद्धतियाँ अलग हैं और सीधी तुलना भ्रामक हो सकती है। यह सावधानी विश्लेषण है, पर बहुत उपयोगी है।

पहला, तेंदुलकर पद्धति (आमदनी या उपभोग-व्यय पर आधारित रेखा)। योजना आयोग ने 2011-12 के लिए ग़रीबी का अनुपात 21.9 प्रतिशत बताया, जिसमें ग्रामीण 25.7 प्रतिशत और शहरी 13.7 प्रतिशत थे, और कुल लगभग 26.93 करोड़ लोग ग़रीबी रेखा से नीचे थे। इस पद्धति में रेखा ग्रामीण क्षेत्र में 816 रुपये और शहरी क्षेत्र में 1,000 रुपये प्रति व्यक्ति प्रति माह थी।

दूसरा, राष्ट्रीय बहुआयामी ग़रीबी सूचकांक (MPI)। नीति आयोग की समीक्षा के अनुसार बहुआयामी ग़रीबी का अनुपात 2015-16 के 24.85 प्रतिशत से घटकर 2019-21 में 14.96 प्रतिशत रह गया, और 13.5 करोड़ लोग इससे बाहर आए; ग्रामीण क्षेत्र में यह 32.59 प्रतिशत से 19.28 प्रतिशत हुआ। यह आँकड़ा NFHS-4 और NFHS-5 पर आधारित है। जनवरी 2024 के चर्चा-पत्र के अनुसार 2013-14 के अनुमानित 29.17 प्रतिशत से 2022-23 के अनुमानित 11.28 प्रतिशत तक की गिरावट में लगभग 24.82 करोड़ लोग बाहर आए; यहाँ ध्यान दें कि 2013-14 और 2022-23 के आँकड़े प्रवृत्ति पर आधारित अनुमान हैं, सर्वेक्षण के नहीं।

तीसरा, विश्व बैंक का अंतरराष्ट्रीय मानक। जून 2025 की रिपोर्ट के अनुसार 3.00 डॉलर प्रतिदिन (2021 की क्रय-शक्ति समता पर) की रेखा से अत्यधिक ग़रीबी का अनुपात 2011-12 के 27.1 प्रतिशत से घटकर 2022-23 में 5.3 प्रतिशत रहा, यानी लगभग 26.9 करोड़ लोगों की कमी।

तीन माप-पद्धतियों की तुलना

आधार

तेंदुलकर (योजना आयोग)उपभोग-व्यय पर आधारित रेखा: 816 रुपये ग्रामीण, 1,000 रुपये शहरी प्रति माह

राष्ट्रीय MPI (नीति आयोग)स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन-स्तर के संकेतक; NFHS-4 और NFHS-5

विश्व बैंक अत्यधिक ग़रीबी3.00 डॉलर प्रतिदिन, 2021 क्रय-शक्ति समता

मुख्य आँकड़ा

तेंदुलकर (योजना आयोग)2011-12 में 21.9% (ग्रामीण 25.7%, शहरी 13.7%)

राष्ट्रीय MPI (नीति आयोग)24.85% (2015-16) से 14.96% (2019-21)

विश्व बैंक अत्यधिक ग़रीबी27.1% (2011-12) से 5.3% (2022-23)

पद्धतियाँ अलग हैं, इसलिए सीधी तुलना न करें।

ग़रीबी के कारण (विश्लेषण)

ग़रीबी के कारणों को चार समूहों में लिखें। यह वर्गीकरण उत्तर-लेखन की सुविधा के लिए है।

आर्थिक कारण: रोज़गार के सीमित अवसर, कृषि पर अत्यधिक निर्भरता और कम उत्पादकता, असंगठित क्षेत्र में कम और अनियमित आय, और महँगाई। सामाजिक कारण: जाति और लिंग के आधार पर भेदभाव जो अवसर बाँटता है, कम साक्षरता और कौशल, और बड़े परिवार। संस्थागत कारण: संसाधनों (भूमि, ऋण, बाज़ार) तक असमान पहुँच, योजनाओं के लाभ का रिसाव और भ्रष्टाचार। प्राकृतिक और क्षेत्रीय कारण: सूखा, बाढ़ और पिछड़े क्षेत्र; राजस्थान जैसे शुष्क राज्य में वर्षा-आधारित खेती का जोखिम इसका उदाहरण है।

दुष्चक्र की धारणा भी लिखने योग्य है: कम आय से कम पोषण, कम पोषण से कमज़ोर स्वास्थ्य और कम शिक्षा, और उससे फिर कम आय। यह चक्र पीढ़ियों तक चल सकता है।

ग़रीबी के कारणों का वर्गीकरण (विश्लेषण)

श्रेणीउदाहरण
आर्थिकबेरोज़गारी, कम उत्पादकता, असंगठित क्षेत्र, महँगाई
सामाजिकजाति, लिंग-भेद, निरक्षरता, बड़े परिवार
संस्थागतभूमि और ऋण तक असमान पहुँच, लाभ-रिसाव, भ्रष्टाचार
प्राकृतिक-क्षेत्रीयसूखा, बाढ़, पिछड़े क्षेत्र

यह तालिका उत्तर-लेखन की सुविधा के लिए है; यह किसी आधिकारिक वर्गीकरण का उद्धरण नहीं।

संस्कृति-ग़रीबी (Culture of Poverty): 2023 का प्रश्न

संस्कृति-ग़रीबी की अवधारणा अमेरिकी मानवशास्त्री ऑस्कर लुईस ने अपनी पुस्तक Five Families (1959) में दी। उनके अनुसार ग़रीबी केवल धन की कमी नहीं है; लंबे समय तक ग़रीबी में रहने वाले समूहों में एक विशिष्ट उपसंस्कृति (subculture) विकसित हो जाती है, जो उनकी परिस्थितियों के प्रति एक अनुकूलन है। इसकी पहचान लाचारी, निर्भरता, हाशियाकरण और शक्तिहीनता की भावना से होती है, और यह समाजीकरण द्वारा अगली पीढ़ी तक पहुँचती है।

इस अवधारणा की आलोचना भी परीक्षा-योग्य है। आलोचकों के अनुसार यह "पीड़ित को ही दोषी ठहराने" (blaming the victim) की ओर ले जाती है, क्योंकि ग़रीबी का कारण ग़रीबों के मूल्यों में खोज लेती है, जबकि अवसरों और संरचना की कमी को कम महत्त्व देती है। इसलिए उत्तर में लिखें: अवधारणा उपयोगी है, पर संरचनात्मक कारणों के साथ मिलाकर ही समझी जानी चाहिए (विश्लेषण)।

ग़रीबी के सामाजिक प्रभाव और उपाय (विश्लेषण)

ग़रीबी का असर परिवार से राष्ट्र तक जाता है। परिवार में कुपोषण, बाल-श्रम और बच्चों की पढ़ाई का रुकना, विवाह जैसे फ़ैसलों पर आर्थिक दबाव; समाज में अपराध, पलायन और बस्तियों का विस्तार; और राष्ट्र में मानव-पूँजी की कमी और असमानता। कमज़ोर समूह, यानी महिलाएँ, दलित, आदिवासी और दिव्यांग, इसके सबसे अधिक शिकार हैं।

उपायों में आर्थिक वृद्धि के साथ वितरण का ध्यान, रोज़गार और कौशल, शिक्षा और स्वास्थ्य पर निवेश तथा सामाजिक सुरक्षा शामिल हैं। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (NFSA), 2013 (अध्यादेश जुलाई 2013 में; अधिनियम सितंबर 2013 में), ग्रामीण क्षेत्र की 75 प्रतिशत और शहरी क्षेत्र की 50 प्रतिशत तक आबादी (कुल लगभग 67 प्रतिशत) को प्रति व्यक्ति प्रति माह 5 किलोग्राम अनाज का अधिकार देता है। इसका महत्त्व यह है कि भोजन अब कल्याण की दया नहीं, क़ानूनी अधिकार है।

ग़रीबी किन पर सबसे भारी पड़ती है (विश्लेषण)

ग़रीबी सब पर एक जैसी नहीं पड़ती। जिन परिवारों की मुखिया स्त्री है, जिन समुदायों को सामाजिक भेदभाव का सामना करना पड़ा है, भूमिहीन खेत-मज़दूर, असंगठित क्षेत्र के दिहाड़ी कामगार और दिव्यांग व्यक्ति, इन सबके लिए ग़रीबी के साथ अवसरों की कमी भी जुड़ जाती है। इसीलिए समाजशास्त्र में ग़रीबी का अध्ययन जाति, वर्ग और लिंग के साथ जोड़कर किया जाता है।

ग्रामीण और शहरी ग़रीबी का स्वरूप भी अलग है। गाँव में ग़रीबी का रिश्ता भूमि, मौसम और खेती से है; शहर में रोज़गार की अस्थिरता, झुग्गी-बस्ती और किराये का दबाव मुख्य हैं। तेंदुलकर आँकड़ों में भी ग्रामीण अनुपात शहरी से ऊँचा था (25.7 बनाम 13.7 प्रतिशत), और नीति आयोग की 2023 की समीक्षा के अनुसार MPI में ग्रामीण अनुपात 32.59 से 19.28 प्रतिशत तक गिरा।

ग़रीबी उन्मूलन के दो दृष्टिकोण: वृद्धि बनाम वितरण (विश्लेषण)

ग़रीबी घटाने की बहस में दो दृष्टिकोण आम तौर पर आमने-सामने रखे जाते हैं। पहला कहता है कि तेज़ आर्थिक वृद्धि से रोज़गार और आमदनी बढ़ेगी, जिसका लाभ धीरे-धीरे नीचे तक पहुँचेगा। दूसरा कहता है कि केवल वृद्धि काफ़ी नहीं; सीधे लक्षित कार्यक्रम, जैसे अनाज की क़ानूनी गारंटी, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएँ, ग़रीबों तक पहुँचाने होंगे। सबसे अच्छा उत्तर दोनों को पूरक बताता है: वृद्धि संसाधन बनाती है और वितरण यह सुनिश्चित करता है कि वे सही हाथों तक पहुँचें।

राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम इसी दूसरे दृष्टिकोण का उदाहरण है, क्योंकि इसमें लाभ पात्र परिवार का क़ानूनी हक़ है। दूसरी ओर, MPI के आँकड़े दिखाते हैं कि पोषण, स्कूली शिक्षा के वर्षों, स्वच्छता और रसोई-ईंधन जैसे संकेतकों में सुधार ने गिरावट में बड़ा योगदान दिया, यानी केवल आमदनी नहीं, सेवाओं तक पहुँच भी मायने रखती है (नीति आयोग का चर्चा-पत्र, जनवरी 2024)।

संस्कृति-ग़रीबी बनाम संरचनात्मक व्याख्या (विश्लेषण)

संस्कृति-ग़रीबी की बहस को समझने का सरल तरीक़ा एक उदाहरण है। मान लीजिए किसी बस्ती के बच्चे स्कूल बीच में छोड़ देते हैं। संस्कृति-ग़रीबी की दृष्टि कहेगी कि वहाँ शिक्षा के प्रति उदासीनता की उपसंस्कृति बन गई है और उसे बदलने की ज़रूरत है। संरचनात्मक दृष्टि कहेगी कि आसपास अच्छे स्कूल नहीं हैं, पढ़ाई का ख़र्च परिवार नहीं उठा सकता और पढ़ने के बाद नौकरी मिलने की आशा भी कम है, इसलिए बच्चों का व्यवहार उनकी परिस्थितियों के प्रति एक तर्कसंगत प्रतिक्रिया है। (यह गढ़ा गया उदाहरण है, किसी वास्तविक बस्ती का वर्णन नहीं।)

परीक्षा में दोनों दृष्टियों का एक-एक वाक्य लिखकर निष्कर्ष में कहना कि नीति को दोनों स्तरों पर काम करना होगा, यानी अवसर और सेवाएँ देना तथा सामाजिक जागरूकता और आत्मविश्वास बढ़ाना, उत्तर को संतुलित बनाता है।

ग़रीबी और अन्य सामाजिक चुनौतियों का रिश्ता (विश्लेषण)

सिलेबस की सूची में ग़रीबी के साथ दहेज, तलाक़, भ्रष्टाचार, बेरोज़गारी और नशा भी हैं, और ये एक-दूसरे से जुड़े हैं। ग़रीबी से बेरोज़गारी और नशे की संभावना बढ़ती है; भ्रष्टाचार कल्याण-योजनाओं का लाभ ग़रीब तक पहुँचने से रोकता है; और दहेज जैसी प्रथाएँ ग़रीब परिवार पर क़र्ज़ का बोझ डालती हैं। उत्तर में इन कड़ियों का एक वाक्य लिखने से आपका विश्लेषण पूरे सिलेबस से जुड़ा हुआ दिखता है।

ग़रीबी के माप की समयरेखा

  1. 2011-12

    तेंदुलकर: 21.9%, 816 और 1,000 रुपये की रेखा

  2. 2013

    राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (अध्यादेश जुलाई; अधिनियम सितंबर)

  3. 2015-16

    MPI: 24.85% (NFHS-4)

  4. 2019-21

    MPI: 14.96% (NFHS-5)

  5. 2022-23

    विश्व बैंक: अत्यधिक ग़रीबी 5.3%; नीति आयोग का अनुमान 11.28% (MPI)

अलग पद्धतियों के आँकड़े एक ही रेखा पर रखे गए हैं, पर उनकी सीधी तुलना नहीं की जा सकती (विश्लेषण)।

मुख्य तथ्य

संस्कृति-ग़रीबी
ऑस्कर लुईस, Five Families (1959)
तेंदुलकर 2011-12
21.9% (ग्रामीण 25.7%, शहरी 13.7%); लगभग 26.93 करोड़
ग़रीबी रेखा 2011-12
816 रुपये ग्रामीण; 1,000 रुपये शहरी (प्रति व्यक्ति प्रति माह)
MPI 2015-16 से 2019-21
24.85% से 14.96%; 13.5 करोड़ बाहर
नीति आयोग 2024
29.17% (2013-14, अनुमानित) से 11.28% (2022-23, अनुमानित); 24.82 करोड़ बाहर
विश्व बैंक अत्यधिक ग़रीबी
27.1% (2011-12) से 5.3% (2022-23); 3.00 डॉलर प्रतिदिन, 2021 PPP
NFSA (2013)
ग्रामीण 75%, शहरी 50% (लगभग 67%); 5 किग्रा प्रति माह

राजस्थान का पहलू

नीति आयोग के जनवरी 2024 के चर्चा-पत्र के अनुसार 2015-16 से 2019-21 के बीच बहुआयामी ग़रीबी के अनुपात में सबसे तेज़ गिरावट उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, ओडिशा और राजस्थान में देखी गई। 2013-14 से 2022-23 के अनुमानों में ग़रीबों की संख्या में सबसे बड़ी कमी उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान में रही; राजस्थान में लगभग 1.87 करोड़ (चौथा स्थान)। तेंदुलकर पद्धति से 2011-12 में राजस्थान की ग़रीबी लगभग 14.7 प्रतिशत थी (PIB, 23 जुलाई 2013)। देखा गया: 2 अक्टूबर 2026।

परीक्षा में आम ग़लतियाँ

याद रखें

  • तेंदुलकर, MPI और विश्व बैंक के आँकड़ों की सीधी तुलना करना; पद्धति अलग है, इसलिए हर आँकड़े के साथ संस्था और वर्ष लिखें।
  • MPI को आमदनी की रेखा समझ लेना: यह स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन-स्तर के संकेतकों पर आधारित है।
  • 2013-14 और 2022-23 के MPI आँकड़ों को सर्वेक्षण का नतीजा बताना: ये प्रवृत्ति पर आधारित अनुमान हैं।
  • संस्कृति-ग़रीबी में केवल परिभाषा लिखना; आलोचना (blaming the victim) जोड़ने से अंक बढ़ते हैं।
  • ऑस्कर लुईस को समाजशास्त्री लिखना: वे मानवशास्त्री (anthropologist) थे।