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समाजशास्त्र · पेपर I · इकाई III (क)

पुरुषार्थ: धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष

भारतीय सामाजिक चिंतन के चार जीवन-लक्ष्य: क्या हैं, ग्रंथ क्या कहते हैं, और आज कहाँ काम आते हैं।

  • धर्म
  • अर्थ
  • काम
  • मोक्ष
  • त्रिवर्ग
  • संतुलन
3 अक्टूबर 2026 को सत्यापित

सिलेबस में

RPSC सिलेबस (09-01-2026), पेपर I, इकाई III, भाग क (समाजशास्त्र): "Concepts related to Indian social system: doctrine of Karma, Dharma, Purushartha and Ashram system." इस पृष्ठ पर पुरुषार्थ है; कर्म, धर्म और आश्रम व्यवस्था के अलग पृष्ठ हैं।

इस विषय को क्यों पढ़ें

याद रखें

  • सिलेबस की यह पंक्ति सीधे नाम लेकर पुरुषार्थ को पढ़ने को कहती है, पर संकलित छह पेपरों (2013, 2016, 2018, 2021, 2023, 2024) में पेपर I के समाजशास्त्र खंड में पुरुषार्थ पर सीधा प्रश्न नहीं मिला। इसलिए यह पृष्ठ अवधारणा समझने और 2 या 5 अंक के प्रश्न की तैयारी के लिए है।
  • पुरुषार्थ पर प्रश्न 2023 के पेपर II (नीतिशास्त्र इकाई) में प्रश्न 3 के रूप में आ चुका है। यानी यही अवधारणा समाजशास्त्र और नीतिशास्त्र, दोनों जगह से पूछी जा सकती है; दोनों के कोण अलग रखें (2013-2024 के पेपरों में देखा गया)।
  • आश्रम व्यवस्था के प्रश्न (2016, 2018) इसी चिंतन से निकले हैं। पुरुषार्थ समझ लेंगे तो आश्रम के प्रश्न का उत्तर "किस आश्रम में कौन-सा पुरुषार्थ प्रधान" वाली कड़ी से और गहरा बन जाता है।

पहले सरल भाषा में: एक विद्यार्थी का दिन

सोचिए, एक युवा अधिकारी-प्रशिक्षु का दिन। सुबह वह नियमों और ईमानदारी से काम करने का संकल्प लेता है। दिन में वह वेतन कमाता है ताकि घर चल सके। शाम को वह परिवार और मित्रों के साथ हँसता-खेलता है, अपनी पसंद के शौक पूरे करता है। और रात को कभी-कभी सोचता है कि इन सबके बाद मन को स्थायी शांति कहाँ मिलेगी। (यह समझाने के लिए गढ़ा गया दृश्य है।) भारतीय परंपरा ने इन्हीं चार तरह की चाहतों को नाम दिया और इन्हें जीवन के लक्ष्य कहा: धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष।

अब परीक्षा के लिए सटीक परिभाषा। पुरुषार्थ (Purushartha) का अर्थ है वह उद्देश्य जिसे मनुष्य पाने योग्य मानकर प्रयत्न करता है; भारतीय सामाजिक चिंतन में चार पुरुषार्थ बताए गए हैं: धर्म (नैतिक-सामाजिक कर्तव्य), अर्थ (धन, संसाधन और जीविका के साधन), काम (इच्छाओं और सुख की पूर्ति) और मोक्ष (बंधन से मुक्ति, आत्मिक शांति)। इनमें पहले तीन को त्रिवर्ग कहा जाता है।

चार पुरुषार्थ एक नज़र में

पुरुषार्थसरल अर्थकिस क्षेत्र से जुड़ाअकेला रह जाए तो ख़तराआज का उदाहरण
धर्मनैतिक और सामाजिक कर्तव्य, सही आचरणआचार, कानून, परिवार और समाज के प्रति दायित्वकर्तव्य निभाने पर ज़ोर पर जीविका और सुख की उपेक्षाईमानदारी से सेवा करने वाला अधिकारी
अर्थधन, संपदा और जीविका के साधनरोज़गार, उद्योग, राजकाज का आर्थिक पक्षलोभ, शोषण, भ्रष्टाचाररोज़गार और बचत की कोशिश
कामइच्छा, सुख, संबंध और सौंदर्य की चाहपरिवार, कला, मनोरंजनभोग-प्रवृत्ति, असंयमपरिवार के साथ समय, शौक
मोक्षबंधनों से मुक्ति, आत्मिक शांतिआध्यात्मिक साधना, आंतरिक संतोषसंसार के दायित्वों से पलायनलालच से दूरी, मन की शांति

यह तालिका अवधारणा को सरल करने के लिए हमारी बनाई है; परिभाषाएँ ग्रंथों के सामान्य अर्थ पर आधारित हैं।

ग्रंथों में पुरुषार्थ: त्रिवर्ग से चतुर्वर्ग तक

प्राचीन ग्रंथों में पहले तीन लक्ष्यों का साथ-साथ ज़िक्र मिलता है, जिसे त्रिवर्ग कहा गया। ग्रंथ के अनुसार मनुस्मृति (2.224) में परम कल्याण पर अलग-अलग मत गिनाए गए हैं: कोई धर्म और अर्थ को श्रेष्ठ कहता है, कोई काम और अर्थ को, कोई केवल धर्म को, कोई केवल अर्थ को; पर निष्कर्ष में तीनों के समुच्चय को ही श्रेष्ठ बताया गया है।

अर्थशास्त्र (कौटिल्य) के पहले अधिकरण के सातवें अध्याय में संयमी राजा के जीवन की चर्चा है। वहाँ कहा गया है कि वह धर्म और अर्थ का विरोध न करते हुए अपनी इच्छाओं का सेवन करे (कांगले क्रमांक 1.7.3), और धर्म, अर्थ तथा काम, इन तीनों को परस्पर जुड़ा मानकर समान रूप से साधे। इसका भाव यह है कि इच्छाओं की पूर्ति वर्जित नहीं, पर वह नैतिक और आर्थिक मर्यादा में हो। इसी ग्रंथ में एक अन्य स्थान (9.7.60, कांगले क्रमांक) पर इन तीनों को "त्रिवर्ग" कहा गया है: अर्थ, धर्म और काम। यह पुरुषार्थ की संतुलन-दृष्टि का सटीक उदाहरण है।

परवर्ती परंपरा में इन तीन के साथ मोक्ष को जोड़कर चार पुरुषार्थ (चतुर्वर्ग) कहा गया। इसका अर्थ यह नहीं कि पहले तीन छोड़ दिए गए; परवर्ती व्याख्याओं में मोक्ष को जीवन का अंतिम उद्देश्य और धर्म को शेष तीनों का नियामक माना गया है। मोक्ष कब और किस ग्रंथ में चौथे लक्ष्य के रूप में जुड़ा, इसका सटीक काल-क्रम परीक्षा के लिए ज़रूरी नहीं; उत्तर में केवल "परवर्ती परंपरा में" लिखना सुरक्षित है।

चार लक्ष्य, चार सवाल: उत्तर में कैसे जोड़ें

परीक्षक अक्सर "पुरुषार्थ" को केवल नाम-गिनती तक सीमित नहीं रखता; वह देखता है कि आपने चारों के बीच का रिश्ता समझा या नहीं। इसे चार सवालों से याद कीजिए। पहला, क्या करना चाहिए? इसका उत्तर धर्म देता है: आचरण की मर्यादा और कर्तव्य। दूसरा, जीवन चलाने को क्या चाहिए? इसका उत्तर अर्थ है: जीविका, संपदा, राज्य-कोष तक। तीसरा, जीवन में रस और सुख कहाँ से आए? इसका उत्तर काम है: इच्छा, संबंध, कला। चौथा, इन सबके बाद अंतिम शांति कहाँ? इसका उत्तर मोक्ष है।

मनुस्मृति (2.224) का तर्क इसी जगह काम आता है। वहाँ परम कल्याण की अलग-अलग जोड़ियाँ गिनाने के बाद कहा गया है कि असल बात तीनों का समुच्चय है। यानी उस ग्रंथ की दृष्टि में अकेला धर्म, अकेला अर्थ या अकेला काम पर्याप्त नहीं। अर्थशास्त्र का राजा-संबंधी अंश भी यही बात शासक की भाषा में कहता है: इच्छाएँ हों, पर धर्म और अर्थ से टकराकर नहीं।

उत्तर लिखते समय एक सरल क्रम अपनाइए: परिभाषा, चारों का एक-एक पंक्ति में अर्थ, धर्म का नियामक होना, ग्रंथ का एक संदर्भ, आधुनिक प्रासंगिकता और अंत में आलोचना की एक पंक्ति। यह क्रम 2, 5 और 10 अंक, तीनों में काम आता है; बस 2 अंक में केवल पहली दो चीज़ें और 10 अंक में पूरा क्रम लिखिए। ध्यान रहे कि चारों लक्ष्यों को "ऊँचे-नीचे" की सीढ़ी की तरह नहीं, साथ चलने वाले पहियों की तरह लिखना है, और आश्रम व्यवस्था से जोड़ने की बात (विश्लेषण) के रूप में ही लिखी जाए।

चारों के बीच संबंध: ऊँच-नीच नहीं, संतुलन

पुरुषार्थ को कभी "चार में से एक चुनो" की तरह नहीं पढ़ना चाहिए। परंपरा की दृष्टि में चारों साथ चलते हैं, जैसे चार पहियों की गाड़ी में एक भी पहिया निकल जाए तो चाल बिगड़ती है। धर्म दिशा तय करता है, अर्थ गाड़ी का ईंधन है, काम गाड़ी का आनंद है और मोक्ष गंतव्य है। (यह समझाने के लिए उपमा है, ग्रंथ का कथन नहीं।)

धर्म का नियामक होना परीक्षा का सबसे अच्छा बिंदु है। अर्थ और काम की उपेक्षा नहीं की गई, पर उन्हें धर्म की सीमा में रखने की बात बार-बार आती है। इसी कारण समाजशास्त्र की दृष्टि में पुरुषार्थ एक आदर्श-मूलक (normative) ढाँचा है: यह बताता है कि व्यक्ति को कैसे जीना चाहिए, यह नहीं कि सब लोग वास्तव में कैसे जीते हैं (विश्लेषण)।

यह ढाँचा आश्रम व्यवस्था से जुड़ता है: ब्रह्मचर्य में धर्म और ज्ञान की तैयारी, गृहस्थ में अर्थ और काम का मर्यादित पालन, और बाद के आश्रमों में मोक्ष की ओर झुकाव (विश्लेषण; ग्रंथों में इसके अलग-अलग रूप हैं)।

चतुर्वर्ग का नक्शा

पुरुषार्थ

धर्म

नैतिक कर्तव्य; शेष तीनों का नियामक

  • आचरण की मर्यादा
  • सामाजिक दायित्व

अर्थ

जीविका और संसाधन

  • धन, संपदा
  • लोभ से सावधानी

काम

इच्छा और सुख

  • परिवार, संबंध
  • असंयम से सावधानी

मोक्ष

मुक्ति और आंतरिक शांति

  • आसक्ति का त्याग
  • पलायन नहीं
पहले तीन मिलकर त्रिवर्ग हैं; चौथा लक्ष्य मोक्ष इन्हें दिशा देता है (परंपरा की व्याख्या)।

आधुनिक जीवन में प्रासंगिकता और सीमाएँ

पहलूप्रासंगिकतासीमा या आलोचना
नैतिक ढाँचासार्वजनिक सेवा में धर्म (कर्तव्य-बोध) और ईमानदारी का आधारधर्म की व्याख्या समय और समाज के अनुसार बदलती रही; सबके लिए एक जैसी नहीं रही
जीवन-संतुलनकमाई, परिवार और मन की शांति के बीच संतुलन; तनाव कम करने का तरीक़ाव्यवहार में सबके पास चारों को पाने के बराबर अवसर नहीं हैं
विकास की सोचआर्थिक विकास और नैतिकता को साथ रखने का तर्ककाम और अर्थ पर ज़ोर आज उपभोक्तावाद की ओर भी जा सकता है
समाज-व्यवस्थाआश्रम और कर्तव्य की व्यवस्था से जीवन-चरणों की समझयह मूलतः आदर्श है, सामाजिक यथार्थ का सीधा वर्णन नहीं (विश्लेषण)

आधुनिक प्रासंगिकता और आलोचना, दोनों लिखने से उत्तर संतुलित बनता है।

मुख्य तथ्य

पुरुषार्थ की संख्या
चार: धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष; धर्म "जीवन के चार लक्ष्यों" में से एक (Britannica)
त्रिवर्ग
धर्म, अर्थ, काम; मनुस्मृति 2.224: धर्म-अर्थ, काम-अर्थ, केवल धर्म, केवल अर्थ के मत गिनाकर "तीनों का समुच्चय" श्रेष्ठ
काम का नियंत्रण
अर्थशास्त्र, अधिकरण 1, अध्याय 7 (कांगले 1.7.3): धर्म और अर्थ का विरोध न करते हुए इच्छाओं का सेवन; तीनों परस्पर जुड़े
अर्थशास्त्र में त्रिवर्ग
अर्थशास्त्र 9.7.60 (कांगले क्रमांक): अर्थ, धर्म और काम की "त्रिवर्ग" के रूप में गणना (IDSA मोनोग्राफ में उद्धृत)
सिलेबस की पंक्ति
RPSC सिलेबस, 09-01-2026, पेपर I, इकाई III (क)

नीतिशास्त्र में भी पुरुषार्थ आया है

2023 के पेपर II (नीतिशास्त्र इकाई) में प्रश्न 3 पुरुषार्थ पर पूछा गया था। इस पृष्ठ में उसे हल नहीं किया गया क्योंकि वह नीतिशास्त्र की श्रृंखला का हिस्सा है। वहाँ कोण यह होता है कि पुरुषार्थ प्रशासनिक निर्णयों में नैतिकता कैसे लाता है; यहाँ कोण समाजशास्त्रीय है कि पुरुषार्थ भारतीय सामाजिक व्यवस्था की अवधारणा के रूप में क्या है।

परीक्षा में आम ग़लतियाँ

याद रखें

  • पुरुषार्थ को केवल "मोक्ष" तक सीमित कर देना: चारों लक्ष्य साथ पढ़ें; त्रिवर्ग सांसारिक है और मोक्ष चौथा।
  • "अर्थ" को केवल रुपये-पैसे तक रखना: व्यापक रूप में यह जीविका और संसाधन है, और परंपरा में उसकी भी नैतिक सीमा है।
  • "काम" को केवल यौन-इच्छा समझ लेना: व्यापक अर्थ में यह इच्छा, सुख, कला और संबंध की चाह है; उत्तर में संक्षेप में इच्छा-पूर्ति लिखें।
  • परंपरा को वर्तमान तथ्य की तरह लिखना: "ग्रंथ के अनुसार" या "परंपरा में माना गया" लिखें, और आलोचना की एक पंक्ति ज़रूर जोड़ें।
  • श्लोक-संख्या या ग्रंथ का नाम याद के भरोसे लिखना: पक्का न हो तो ग्रंथ का नाम न लिखें; ग़लत संदर्भ नकारात्मक असर डालता है।