लौकिकीकरण और धर्मनिरपेक्षता (Secularisation)
लौकिकीकरण क्या है, भारतीय धर्मनिरपेक्षता पश्चिमी मॉडल से कैसे अलग है, प्रस्तावना में 'धर्मनिरपेक्ष' कब जुड़ा, और पृथकतावादी साम्प्रदायिकता क्या है: हल PYQ के साथ।
- लौकिकीकरण
- धर्मनिरपेक्षता
- सैद्धांतिक दूरी
- प्रस्तावना
- 42वाँ संशोधन
- पृथकतावादी साम्प्रदायिकता
सिलेबस में
RPSC सिलेबस (09-01-2026), पेपर I, इकाई III, भाग क (समाजशास्त्र): "Changes in contemporary Indian society and culture: secularisation, urbanisation, modernisation and globalisation." इस पृष्ठ पर लौकिकीकरण है; शहरीकरण और आधुनिकीकरण के अलग पृष्ठ हैं, और वैश्वीकरण पर इस श्रृंखला के अलग पृष्ठ पर चर्चा है।
इस विषय को क्यों पढ़ें
याद रखें
- संकलित छह पेपरों (2013-2024) में चार प्रश्न इस विषय के निकट हैं: 2013 (प्रस्तावना का 'धर्मनिरपेक्ष' शब्द), 2016 (धर्मनिरपेक्षता क्या है), 2018 (लौकिकीकरण से धर्म में परिवर्तन; 5 अंक) और 2024 (पृथकतावादी साम्प्रदायिकता)। यह 2013-2024 के पेपरों में देखा गया रुझान है, आधिकारिक अंक-योजना नहीं।
- तीन 2 अंक के प्रश्न हैं और एक 5 अंक का। 2 अंक में एक परिभाषा और एक तथ्य, 5 अंक में परिवर्तन के चार-पाँच बिंदु: यही ढाँचा इस पृष्ठ के हल उत्तरों में है।
- लौकिकीकरण (समाजशास्त्र) और धर्मनिरपेक्षता (संविधान और राजनीति) दो अलग बातें हैं। यह भेद अंकों के लिए महत्त्वपूर्ण है, इसलिए पृष्ठ में दोनों अलग हैं।
दो शब्द, दो दायरे
पहले दो शब्दों का भेद साफ़ कर लें। लौकिकीकरण (secularisation) समाजशास्त्र का शब्द है: इसमें समाज, संस्थाओं और व्यक्ति के जीवन में धर्म का प्रभाव और अधिकार घटता है और लौकिक, यानी सांसारिक, कारणों का स्थान बढ़ता है। धर्मनिरपेक्षता (secularism) राज्य और धर्म के संबंध का सिद्धांत है, जो संविधान और राजनीतिक सिद्धांत की भाषा में आता है। 2018 का 5 अंक का प्रश्न पहले शब्द पर था, 2016 और 2013 के 2 अंक के प्रश्न दूसरे पर।
NCERT (कक्षा 12) के अनुसार पश्चिम में लौकिकीकरण का अर्थ प्रायः धर्म के प्रभाव का घटना रहा है, और इसके सूचक हैं: धार्मिक संगठनों से जुड़ाव का स्तर, उन संगठनों का सामाजिक-भौतिक प्रभाव, और धार्मिक विश्वासों का स्तर। वही अध्याय भारत के संदर्भ में लौकिकीकरण को जाति के साथ भी जोड़ता है (जाति का लौकिकीकरण), जिसका ब्योरा 'जाति और वर्ग के बदलते आयाम' पृष्ठ पर है।
एक सरल उदाहरण: किसी गाँव में लोग पहले हर बीमारी का इलाज केवल झाड़-फूँक से कराते थे और अब अस्पताल जाते हैं, तो यह समाज के स्तर पर लौकिकीकरण का संकेत है, भले उसी गाँव में त्योहार पहले जितनी धूमधाम से मनते हों। यह उदाहरण काल्पनिक है और केवल समझाने के लिए है। इसके विपरीत, राज्य किसी मंदिर, मस्जिद या गिरजे को राज्य-धर्म घोषित न करे, यह धर्मनिरपेक्षता की बात है। दोनों को अलग-अलग उदाहरणों से समझाने पर उत्तर साफ़ बनता है।
लौकिकीकरण से धर्म में क्या बदलता है
लौकिकीकरण का असर अलग-अलग क्षेत्रों में अलग रूप में दिखता है। यहाँ चार बिंदु 2018 के प्रश्न 'लौकिकीकरण ने धर्म में क्या परिवर्तन किए' के उत्तर की रीढ़ हैं। ये चारों बिंदु विश्लेषण हैं, किसी एक पाठ का उद्धरण नहीं; हर बिंदु एक-दो पंक्तियों में लिखिए।
पहला, धर्म का सार्वजनिक दायरा सिकुड़ता है: शिक्षा, क़ानून और प्रशासन जैसे क्षेत्र धार्मिक संस्थाओं के हाथ से निकलकर राज्य की संस्थाओं में आते हैं। दूसरा, धार्मिक अनुष्ठानों का स्वरूप बदलता है: कुछ अनुष्ठान सरल, छोटे या प्रतीकात्मक होते हैं और व्यक्ति पर निर्भर होने लगते हैं। तीसरा, धार्मिक अधिकार का केंद्र बदलता है: पुरोहित या धर्मगुरु की अंतिम सत्ता पर प्रश्न उठते हैं और व्यक्ति के विवेक का महत्त्व बढ़ता है। चौथा, धर्म का राजनीतिक और सामाजिक उपयोग भी बदल सकता है: कई बार पहचान की राजनीति में धर्म नए रूप में लौटता है, इसलिए लौकिकीकरण का अर्थ धर्म का अंत नहीं। NCERT भी दर्ज करता है कि हाल के वर्षों में दुनिया भर में धार्मिक चेतना और संघर्ष बढ़े हैं, और भारत में अनुष्ठानों के लौकिक पक्ष (मेल-जोल, परिवार की हैसियत का प्रदर्शन) भी हैं।
भारतीय धर्मनिरपेक्षता: सैद्धांतिक दूरी
NCERT की राजनीतिक सिद्धांत की पुस्तक के अनुसार भारतीय धर्मनिरपेक्षता पश्चिमी मॉडल की नक़ल नहीं है। पुस्तक दोनों मॉडलों की तुलना करती है: पश्चिमी समझ में राज्य और धर्म के बीच कठोर पृथक्करण को आदर्श माना जाता है, जबकि भारतीय मॉडल में राज्य धर्मों से 'सैद्धांतिक दूरी' (principled distance) रखता है। यानी राज्य किसी धर्म को राज्य-धर्म नहीं बनाता, पर वह सभी समुदायों के बराबर सम्मान के लिए ज़रूरत पड़ने पर हस्तक्षेप भी कर सकता है। पुस्तक अतातुर्क के तुर्की का उदाहरण देकर बताती है कि एक कठोर, राज्य-प्रेरित लौकिकीकरण भी संभव है और भारतीय मॉडल उससे भिन्न है।
इसी की झलक सर्वोच्च न्यायालय के 25 नवंबर 2024 के आदेश में मिलती है। आदेश के अनुसार राज्य न किसी धर्म का समर्थन करता है और न किसी धर्म को मानने के लिए दंडित करता है, और उसमें अनुच्छेद 14, 15, 16, 25, 26, 29, 30 और 44 का उल्लेख है। अनुच्छेदों की सूची याद करना अनिवार्य नहीं है; पर इतना समझिए कि समानता, भेदभाव-निषेध, धार्मिक स्वतंत्रता, अल्पसंख्यक अधिकार और समान नागरिक संहिता का निर्देश, ये सब धर्मनिरपेक्षता के ढाँचे से जुड़े हैं।
पश्चिमी और भारतीय मॉडल
| कसौटी | पश्चिमी मॉडल (NCERT के अनुसार) | भारतीय मॉडल |
|---|---|---|
| राज्य और धर्म का संबंध | कठोर पृथक्करण | सैद्धांतिक दूरी: न समर्थन, न शत्रुता |
| हस्तक्षेप | आम तौर पर नहीं | सुधार या समानता के लिए संभव, जैसे अस्पृश्यता पर रोक |
| समुदायों के अधिकार | व्यक्ति पर ज़ोर | व्यक्ति के साथ अल्पसंख्यक और समुदाय के अधिकार भी (अनुच्छेद 25, 26, 29, 30) |
| तुर्की का उदाहरण | राज्य-प्रेरित कठोर लौकिकीकरण की मिसाल (अतातुर्क) | भारत का तरीक़ा इससे भिन्न बताया गया है |
'सैद्धांतिक दूरी' शब्द NCERT के अध्याय से है; तालिका की अंतिम पंक्ति उसी चर्चा का संक्षेप है।
प्रस्तावना में 'धर्मनिरपेक्ष': 1976
संविधान की प्रस्तावना में 'धर्मनिरपेक्ष' शब्द 42वें संशोधन अधिनियम, 1976 की धारा 2 से जोड़ा गया। अधिनियम के पाठ के अनुसार प्रस्तावना का "SOVEREIGN DEMOCRATIC REPUBLIC" पद बदलकर "SOVEREIGN SOCIALIST SECULAR DEMOCRATIC REPUBLIC" हुआ, और साथ में "unity and integrity" वाला पद भी आया। इस अधिनियम को अनुमति 18 दिसंबर 1976 को मिली। इसलिए 2013 के प्रश्न का तथ्य-आधारित उत्तर यह है कि यह शब्द मूल प्रस्तावना में नहीं था, 1976 में जोड़ा गया, और राज्य के किसी धर्म को न अपनाने तथा सभी धर्मों से समान व्यवहार के अर्थ में प्रयुक्त है।
सर्वोच्च न्यायालय के आदेश (25 नवंबर 2024) के अनुसार केशवानंद भारती (1973, 13 जजों की पीठ) और एस.आर. बोम्मई (1994, 9 जजों की पीठ) में धर्मनिरपेक्षता को संविधान के मूल ढाँचे का हिस्सा माना गया; आदेश इस्माइल फ़ारुक़ी का भी उल्लेख करता है, जिसमें कहा गया है कि राज्य कोई धर्म नहीं रखता। परीक्षा में यह जोड़ना अच्छा रहता है कि संशोधन ने शब्द जोड़ा, और न्यायालय ने धर्मनिरपेक्षता को मूल ढाँचे का हिस्सा माना है; यह आदेश के पाठ का सार है।
पृथकतावादी साम्प्रदायिकता
पृथकतावादी साम्प्रदायिकता (separatist communalism) का सरल अर्थ है: धार्मिक पहचान के आधार पर अलग राजनीतिक व्यवस्था की माँग, जैसे अलग निर्वाचक मंडल या अलग राजनीतिक अधिकार। यह सामान्य समझ पर आधारित परिभाषा है। संविधान निर्माण में इसका एक स्पष्ट उदाहरण है: NCERT के अनुसार 27 अगस्त 1947 को संविधान सभा में पृथक निर्वाचक मंडल पर बहस हुई, जिसमें पोकर बहादुर ने उनके पक्ष में तर्क दिया, जबकि सरदार पटेल ने इसे 'ज़हर' कहा और गोविंद बल्लभ पंत ने भी विरोध किया।
यह बहस दिखाती है कि संविधान-निर्माताओं में पहचान और साझा नागरिकता के प्रश्न पर तीखा मतभेद था; पटेल का 'ज़हर' शब्द उसी की गंभीरता बताता है। यह निष्कर्ष विश्लेषण है। 2 अंक के उत्तर में परिभाषा और यही एक उदाहरण पर्याप्त है।
संविधान में धर्मनिरपेक्षता के सहारे
धर्मनिरपेक्षता को संविधान के कई प्रावधान साथ-साथ थामते हैं, और परीक्षा में इन्हें समूह में याद रखना काम आता है। अनुच्छेद 14, 15 और 16 समानता और भेदभाव-निषेध से जुड़े हैं: क़ानून के सामने सब बराबर, धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं, और सार्वजनिक रोज़गार में समान अवसर। अनुच्छेद 25 और 26 धार्मिक स्वतंत्रता और धार्मिक संस्थाओं के प्रबंध से जुड़े हैं। अनुच्छेद 29 और 30 अल्पसंख्यकों के सांस्कृतिक और शैक्षणिक अधिकारों से, और अनुच्छेद 44 समान नागरिक संहिता के निदेश से। सर्वोच्च न्यायालय के 25 नवंबर 2024 के आदेश में इन्हीं अनुच्छेदों का ज़िक्र है।
इस सूची से एक व्यावहारिक बात निकलती है: भारतीय धर्मनिरपेक्षता में व्यक्ति के अधिकार (14, 15, 16, 25) और समुदाय के अधिकार (26, 29, 30) साथ-साथ हैं, और राज्य के लिए एक सुधारात्मक निदेश (44) भी। यह NCERT की 'सैद्धांतिक दूरी' वाली चर्चा से मेल खाता है। अनुच्छेदों का क्रम याद करना कठिन लगे तो तीन समूह बनाइए: समानता (14-16), धार्मिक स्वतंत्रता (25-26), अल्पसंख्यक (29-30), और अंत में 44 को अलग रखिए।
समाज और राज्य: दो चालें
लौकिकीकरण और धर्मनिरपेक्षता भारतीय समाज में दो अलग चाल से चलते हैं, और यह अंतर दस अंक के उत्तर में अच्छा विश्लेषण बन सकता है। समाज के स्तर पर आधुनिक शिक्षा, विज्ञान, नगरीकरण और रोज़गार के नए अवसरों से धार्मिक जीवन के कुछ पहलू बदले हैं: पेशा-चयन में पुरोहिताई पर निर्भरता घटी है, और कई अनुष्ठान छोटे हुए हैं। साथ ही त्योहार, यात्राएँ और धार्मिक आयोजन सार्वजनिक जीवन में प्रबल हैं। यानी लौकिकीकरण का एक पक्ष है, पर वह एकतरफ़ा नहीं। यह तुलना विश्लेषण है, किसी आँकड़े से नहीं निकली, इसलिए उत्तर में 'देखा जा सकता है' जैसे शब्द रखिए।
राज्य के स्तर पर संविधान का ढाँचा स्पष्ट है, पर व्यवहार में टकराव आते हैं: धार्मिक संस्थाओं के प्रबंध, सुधार-क़ानून और अल्पसंख्यक अधिकारों के प्रश्न बार-बार बहस में आते हैं। सैद्धांतिक दूरी इन्हीं प्रश्नों का उत्तर देने का सिद्धांत है: जहाँ सुधार या समानता का प्रश्न हो, वहाँ राज्य हस्तक्षेप कर सकता है, पर किसी धर्म का पक्ष नहीं लेता। इस वाक्य को 'पक्षपात बनाम हस्तक्षेप' के भेद के रूप में उत्तर में रखिए।
उत्तर-लेखन: तैयार वाक्य
2 अंक के प्रश्नों के लिए तीन तैयार वाक्य रखिए। पहला, लौकिकीकरण: 'समाज में धर्म का प्रभाव घटना और लौकिक कारणों का बढ़ना।' दूसरा, धर्मनिरपेक्षता: 'राज्य का न किसी धर्म का समर्थन, न किसी को दंड; सभी से समान व्यवहार।' तीसरा, पृथकतावादी साम्प्रदायिकता: 'धार्मिक पहचान पर अलग राजनीतिक व्यवस्था की माँग; उदाहरण 27 अगस्त 1947 की बहस।' तीनों 15 शब्दों के आसपास आते हैं।
5 अंक के प्रश्न में चार-पाँच बिंदु और एक निष्कर्ष-पंक्ति चाहिए। 10 अंक में परिभाषा, भारतीय मॉडल की विशेषता, प्रस्तावना का तथ्य (42वाँ संशोधन, 1976), न्यायालय का आदेश और विश्लेषणात्मक निष्कर्ष, पाँचों के लिए जगह बनती है। हर तथ्य के साथ वर्ष लिखिए, क्योंकि तारीख़ वाले कथन उत्तर को विश्वसनीय बनाते हैं।
चारों शब्द: एक नज़र में
परीक्षा में सबसे आम गड़बड़ी तब होती है जब विद्यार्थी चारों शब्दों, लौकिकीकरण, धर्मनिरपेक्षता, साम्प्रदायिकता और पंथनिरपेक्षता को एक-दूसरे की जगह लिख देते हैं। इन्हें अलग रखने का सरल तरीक़ा: लौकिकीकरण समाज में धर्म का घटता प्रभाव है, धर्मनिरपेक्षता राज्य का धर्मों से संबंध है, साम्प्रदायिकता धार्मिक पहचान पर टिकी राजनीति है, और पृथकतावादी साम्प्रदायिकता उसी का वह रूप है जो अलग राजनीतिक अधिकार माँगता है। 'पंथनिरपेक्षता' हिंदी में 'secularism' का ही दूसरा अनुवाद है, इसलिए प्रश्न में जो शब्द हो, उसी का प्रयोग उत्तर में कीजिए।
अंत में याद रखिए कि लौकिकीकरण और धर्मनिरपेक्षता का संबंध एकदिशीय नहीं है। एक धर्मनिरपेक्ष राज्य में भी समाज अत्यंत धार्मिक हो सकता है, और लौकिक होता समाज भी राज्य के स्तर पर धर्म से बँधा रह सकता है। भारत इसका उदाहरण है: समाज में धर्म की भूमिका प्रबल है, पर राज्य का संविधान धर्मनिरपेक्ष है। यह विश्लेषण है और दस अंक के उत्तरों में अच्छा निष्कर्ष बनता है।
धर्मनिरपेक्षता: संविधान की यात्रा
27 अगस्त 1947
संविधान सभा में पृथक निर्वाचक मंडल पर बहस (NCERT)
1973
केशवानंद भारती (13 जज): धर्मनिरपेक्षता मूल ढाँचे में (2024 के आदेश में उल्लेख)
18 दिसंबर 1976
42वें संशोधन को अनुमति: प्रस्तावना में 'धर्मनिरपेक्ष'
1994
बोम्मई (9 जज): धर्मनिरपेक्षता मूल ढाँचे का हिस्सा
25 नवंबर 2024
बलराम सिंह आदेश: राज्य न समर्थन करता, न दंडित
मुख्य तथ्य
- 42वाँ संशोधन
- अधिनियम, 1976 की धारा 2; अनुमति 18 दिसंबर 1976; 'SECULAR' और 'SOCIALIST' जुड़े
- केशवानंद भारती
- 1973; 13 जजों की पीठ (2024 के आदेश के अनुसार)
- बोम्मई
- 1994; 9 जजों की पीठ; वर्ष 2024 के आदेश के अनुसार
- बलराम सिंह आदेश
- 25 नवंबर 2024, 2024 INSC 893
- पृथक निर्वाचक मंडल
- 27 अगस्त 1947 की बहस; पोकर बहादुर पक्ष में; पटेल और पंत विरोध में (NCERT)
- सैद्धांतिक दूरी
- भारतीय मॉडल की NCERT की अवधारणा
- सिलेबस की पंक्ति
- RPSC सिलेबस, 09-01-2026, पेपर I, इकाई III (क)
परीक्षा में आम ग़लतियाँ
याद रखें
- लौकिकीकरण और धर्मनिरपेक्षता को एक मान लेना। पहला समाज में धर्म का घटता प्रभाव है, दूसरा राज्य और धर्म का संबंध।
- कहना कि प्रस्तावना में 'धर्मनिरपेक्ष' शब्द शुरू से था। यह 42वें संशोधन अधिनियम, 1976 से जोड़ा गया।
- भारतीय धर्मनिरपेक्षता को 'धर्म-विरोधी' लिख देना। NCERT के अनुसार इसमें सैद्धांतिक दूरी है: राज्य समर्थन नहीं करता, पर सभी धर्मों के समान सम्मान के लिए हस्तक्षेप कर सकता है।
- पृथकतावादी साम्प्रदायिकता के उत्तर में केवल परिभाषा देना। 27 अगस्त 1947 की संविधान सभा की बहस का एक उदाहरण जोड़िए।
- लौकिकीकरण का अर्थ 'धर्म का अंत' लिख देना। धर्म का सार्वजनिक प्रभाव घटता है; पहचान की राजनीति में वह नए रूप में लौट भी सकता है।
- तिथि या पीठ की संख्या याद के भरोसे लिख देना। केशवानंद (1973, 13 जज) और बोम्मई (1994, 9 जज) की जोड़ी याद रखिए।
केस स्टडी: संविधान सभा में पृथक निर्वाचक मंडल की बहस, 27 अगस्त 1947
केस स्टडीजब पहचान की राजनीति और साझा नागरिकता आमने-सामने आए
स्वतंत्रता से कुछ ही दिन बाद संविधान सभा ने अल्पसंख्यकों के प्रतिनिधित्व पर चर्चा की। यह केस NCERT के इतिहास की पुस्तक और बहस के पाठ पर टिका है।
- प्रश्न
- क्या अल्पसंख्यकों के लिए अलग निर्वाचक मंडल बने, या सभी नागरिक साझा निर्वाचन से चुनें?
- तर्क-वितर्क
- NCERT के अनुसार पोकर बहादुर ने पृथक निर्वाचक मंडल के पक्ष में तर्क दिया, जबकि सरदार पटेल ने इसे 'ज़हर' कहा और गोविंद बल्लभ पंत ने भी विरोध किया।
सीख
पृथकतावादी साम्प्रदायिकता का उदाहरण पूछा जाए तो इस बहस का हवाला दीजिए: परिभाषा के साथ 27 अगस्त 1947 और बहस का एक-दो पंक्तियों का सार।
अभ्यास: तीन काल्पनिक राज्य-कार्यों को कसौटी पर रखिए
हल सहित उदाहरणक्या यह धर्मनिरपेक्ष ढाँचे के अनुकूल है?
दिया है
- कार्य 1: राज्य एक अस्पताल बनवाता है जो सभी धर्मों के लोगों को समान सेवा देता है।
- कार्य 2: राज्य घोषित करता है कि एक धर्म 'राज्य का धर्म' होगा।
- कार्य 3: राज्य किसी नागरिक को केवल इसलिए दंडित करता है कि वह अमुक धर्म को मानता है।
- 1कसौटी 25 नवंबर 2024 के आदेश के अनुसार राज्य न किसी धर्म का समर्थन करता है, न धर्म मानने के लिए दंडित करता है।
- 2कार्य 1 अनुकूल: सेवा सबको समान है, किसी धर्म का समर्थन नहीं।
- 3कार्य 2 प्रतिकूल: यह एक धर्म का समर्थन है। इस्माइल फ़ारुक़ी का उल्लेख बताता है कि राज्य कोई धर्म नहीं रखता।
- 4कार्य 3 प्रतिकूल: धर्म मानने के लिए दंड आदेश में वर्जित है।
निष्कर्ष: तीन में से दो कार्य कसौटी पर खरे नहीं उतरते। कार्य काल्पनिक हैं; उत्तर में 'उदाहरण के लिए' कहकर लिखिए, और कसौटी का हवाला न्यायालय के आदेश से दीजिए।
पिछले वर्षों के प्रश्न (हल)
2024RAS मुख्य परीक्षापेपर I2 अंक
'Separatist Communalism'
आदर्श उत्तर
धार्मिक पहचान पर अलग राजनीतिक व्यवस्था की माँग; जैसे 1947 में पृथक निर्वाचक मंडल की बहस।
2018RAS मुख्य परीक्षापेपर I5 अंक
लौकिकीकरण ने धर्म में क्या परिवर्तन किये हैं?
आदर्श उत्तर
लौकिकीकरण से धर्म का सार्वजनिक दायरा सिकुड़ा; शिक्षा, क़ानून और प्रशासन राज्य की संस्थाओं में आए। अनुष्ठान सरल और व्यक्तिगत हुए, और पुरोहित की सत्ता पर प्रश्न उठे। व्यक्ति के विवेक का महत्त्व बढ़ा। पर पहचान की राजनीति में धर्म नए रूप में लौटा, इसलिए यह धर्म का अंत नहीं।
2016RAS मुख्य परीक्षापेपर I2 अंक
धर्म-निरपेक्षता से आप क्या समझते हैं?
आदर्श उत्तर
राज्य का धर्मों से संबंध: न समर्थन, न दंड; सभी से समान व्यवहार; सैद्धांतिक दूरी।
2013RAS मुख्य परीक्षापेपर I2 अंक
भारतीय संविधान की प्रस्तावना में उल्लेखित 'धर्मनिरपेक्ष' शब्द की परिभाषा दें।
आदर्श उत्तर
राज्य का कोई धर्म नहीं; सभी से समान व्यवहार। शब्द 42वें संशोधन, 1976 से जुड़ा।
अभ्यास प्रश्न
अभ्यास प्रश्नलगभग 15 शब्द
लौकिकीकरण क्या है?
आदर्श उत्तर
समाज और व्यक्ति के जीवन में धर्म का प्रभाव घटना और लौकिक कारणों का महत्त्व बढ़ना।
अभ्यास प्रश्नलगभग 50 शब्द
भारतीय धर्मनिरपेक्षता पश्चिमी मॉडल से कैसे भिन्न है?
आदर्श उत्तर
NCERT के अनुसार पश्चिमी मॉडल में राज्य और धर्म का कठोर पृथक्करण है, जबकि भारतीय मॉडल में सैद्धांतिक दूरी है। राज्य किसी धर्म का समर्थन नहीं करता, पर सभी समुदायों के बराबर सम्मान और सुधार के लिए हस्तक्षेप कर सकता है। अनुच्छेद 25, 26, 29, 30 में समुदायों के अधिकार भी जुड़े हैं।
अभ्यास प्रश्नलगभग 100 शब्द
प्रस्तावना में 'धर्मनिरपेक्ष' शब्द और भारतीय धर्मनिरपेक्षता पर टिप्पणी कीजिए।
आदर्श उत्तर
'धर्मनिरपेक्ष' शब्द 42वें संशोधन अधिनियम, 1976 की धारा 2 से प्रस्तावना में जोड़ा गया; अनुमति 18 दिसंबर 1976 को मिली। सर्वोच्च न्यायालय के 25 नवंबर 2024 के आदेश के अनुसार केशवानंद भारती (1973) और बोम्मई (1994) में धर्मनिरपेक्षता को मूल ढाँचे का हिस्सा माना गया। आदेश के अनुसार राज्य न किसी धर्म का समर्थन करता है, न धर्म मानने के लिए दंडित करता है। NCERT के अनुसार भारतीय मॉडल सैद्धांतिक दूरी पर टिका है, जो पश्चिमी कठोर पृथक्करण से भिन्न है। अतः यह शब्द भावना को स्पष्ट करता है, नई भावना नहीं गढ़ता।
अभ्यास प्रश्नलगभग 15 शब्द
साम्प्रदायिकता और लौकिकीकरण में एक अंतर बताइए।
आदर्श उत्तर
साम्प्रदायिकता धार्मिक पहचान पर टिकी राजनीति है; लौकिकीकरण समाज में धर्म का घटता प्रभाव।
उत्तर कैसे लिखें (5 अंक, 50 शब्द)
भूमिका
प्रश्न: "लौकिकीकरण ने धर्म में क्या परिवर्तन किये हैं?" पहले वाक्य में परिभाषा, फिर चार-पाँच परिवर्तन।
मुख्य भाग
- सार्वजनिक दायरा सिकुड़ा: शिक्षा, क़ानून, प्रशासन राज्य की संस्थाओं में
- अनुष्ठान सरल और व्यक्तिगत
- धार्मिक अधिकार पर प्रश्न; विवेक का महत्त्व
- पहचान की राजनीति में धर्म का नया रूप
- संबंध: समाज धार्मिक, राज्य धर्मनिरपेक्ष (भारत)
निष्कर्ष
निष्कर्ष: लौकिकीकरण धर्म का अंत नहीं, उसकी भूमिका का पुनर्गठन है; भारत में समाज और राज्य के स्तर पर यह अलग-अलग दिखता है।
अतिरिक्त मूल्य
- सैद्धांतिक दूरी (NCERT) की एक पंक्ति
- 1976 के 42वें संशोधन की तारीख़, 18 दिसंबर 1976
त्वरित पुनरावृत्ति
- लौकिकीकरण: समाज में धर्म का घटता प्रभाव; धर्मनिरपेक्षता: राज्य का धर्मों से संबंध
- भारतीय मॉडल: सैद्धांतिक दूरी (NCERT); पश्चिमी: कठोर पृथक्करण
- प्रस्तावना: 42वाँ संशोधन अधिनियम, 1976; अनुमति 18 दिसंबर 1976
- केशवानंद 1973 (13 जज); बोम्मई 1994 (9 जज): मूल ढाँचा
- 25 नवंबर 2024: राज्य न समर्थन करता, न दंडित
- पृथकतावादी साम्प्रदायिकता: अलग राजनीतिक व्यवस्था की माँग; 27 अगस्त 1947 की बहस
- चार शब्द अलग रखिए: लौकिकीकरण, धर्मनिरपेक्षता, साम्प्रदायिकता, पृथकतावादी साम्प्रदायिकता
याद रखने योग्य शब्द
- लौकिकीकरण
- धर्मनिरपेक्षता
- सैद्धांतिक दूरी
- 42वाँ संशोधन
- प्रस्तावना
- पृथक निर्वाचक मंडल
- साम्प्रदायिकता