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समाजशास्त्र · पेपर I · इकाई III (क)

धर्म (Dharma): अर्थ, स्वधर्म, आलोचना और मौलिक कर्तव्य

धर्म का अर्थ और स्रोत, सामान्य और विशेष धर्म, सर्वोच्च न्यायालय का 1996 का निर्णय और संविधान के मौलिक कर्तव्य।

  • धर्म
  • स्वधर्म
  • राजधर्म
  • मौलिक कर्तव्य
  • धर्मराज्य
3 अक्टूबर 2026 को सत्यापित

सिलेबस में

RPSC सिलेबस (09-01-2026), पेपर I, इकाई III, भाग क (समाजशास्त्र): "Concepts related to Indian social system: doctrine of Karma, Dharma, Purushartha and Ashram system." इस पृष्ठ पर धर्म है; कर्म, पुरुषार्थ और आश्रम व्यवस्था के अलग पृष्ठ हैं।

इस विषय को क्यों पढ़ें

याद रखें

  • संकलित छह पेपरों (2013, 2016, 2018, 2021, 2023, 2024) में पेपर I के समाजशास्त्र खंड में धर्म पर सीधा प्रश्न नहीं मिला, फिर भी सिलेबस की पंक्ति में उसका नाम है। यह पृष्ठ परिभाषा, स्रोत और आलोचना के साथ 2, 5 या 10 अंक के उत्तर की तैयारी के लिए है।
  • धर्म से जुड़े प्रश्न अन्य इकाइयों में आए हैं: 2016 के पेपर III (नीतिशास्त्र-रूप खंड) में "कर्त्तव्य की परिभाषा" और "गीता के अनुसार परधर्म"। ये यहाँ हल नहीं किए गए; वे नीतिशास्त्र की श्रृंखला के हैं (2013-2024 के पेपरों में देखा गया)।
  • परीक्षक के लिए सबसे बड़ी कसौटी यह है कि आप धर्म को "रिलिजन" के बराबर न रख दें। उत्तर में "धर्म = कर्तव्य और धारण करने वाला नियम" का स्पष्ट भेद अंक दिलाता है।

पहले सरल भाषा में: रेल की पटरी

रेलगाड़ी तभी चलती है जब वह पटरी पर रहे। पटरी उसकी आज़ादी नहीं छीनती, बल्कि उसे मंज़िल तक पहुँचाने का रास्ता देती है। धर्म (Dharma) को ऐसे ही समझिए: वह नियम और कर्तव्य का वह ढाँचा है जो व्यक्ति और समाज को टूटने से बचाकर चलने लायक़ बनाता है।

संस्कृत में धर्म शब्द "धृ" धातु से बना माना जाता है, जिसका अर्थ है धारण करना, थामना। सर्वोच्च न्यायालय के एक निर्णय में माधवाचार्य की यह परिभाषा उद्धृत है: जो धारण करता है, वही धर्म है। निर्णय में यह भी लिखा है कि धर्म वह है जो इस लोक में सबकी प्रगति और कल्याण को थामे रखता है। इसी कारण परीक्षा में धर्म की परिभाषा "धारण करने वाला नियम" से शुरू करना अच्छा रहता है।

रोज़मर्रा का उदाहरण लीजिए। एक डॉक्टर का धर्म है इलाज करना और रोगी की गोपनीयता रखना; एक शिक्षक का धर्म है पढ़ाना और निष्पक्ष रहना; एक कलेक्टर का धर्म है क़ानून के अनुसार प्रजा की सेवा। यहाँ "धर्म" का अर्थ मंदिर या पूजा नहीं, अपनी भूमिका का कर्तव्य है।

धर्म का अर्थ: रिलिजन से अलग, कर्तव्य से जुड़ा

अंग्रेज़ी का "Religion" पूजा-पद्धति, ईश्वर और संप्रदाय के अर्थ में चलता है। धर्म इससे कहीं व्यापक है। सर्वोच्च न्यायालय ने A.S. Narayana Deekshitulu बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (19 मार्च 1996) में, न्यायमूर्ति एम. रामा जोइस की पुस्तक का हवाला देते हुए, कहा कि धर्म में हर वह सदाचरण शामिल है जो व्यक्ति और समाज के पालन-पोषण और कल्याण के लिए ज़रूरी है। निर्णय के अनुसार धर्म व्यक्ति के आचरण को इस तरह नियंत्रित करता है कि दूसरों के हित की रक्षा हो, और साथ ही समाज पर यह कर्तव्य डालता है कि वह अपने सामाजिक और राजनीतिक संस्थानों से व्यक्ति की रक्षा करे। संक्षेप में धर्म व्यक्ति और समाज के पारस्परिक दायित्वों का नियमन है।

इसी निर्णय में यह भी कहा गया कि संदर्भ बदलने पर धर्म का अर्थ बदलता है। जब धर्म शब्द राजा या राज्य के कर्तव्य के संदर्भ में आता है, तो वह संवैधानिक विधि (राजधर्म) का अर्थ देता है। "धर्मराज्य" का मतलब न्यायालय के अनुसार विधि का शासन है, धार्मिक शासन या धर्मतंत्र नहीं।

परीक्षा के लिए तीन परतें याद रखिए। पहली, नैतिक कर्तव्य (जैसे सत्य, क्षमा)। दूसरी, भूमिका-आधारित कर्तव्य (जैसे शिक्षक, राजा, गृहस्थ का धर्म)। तीसरी, व्यापक विधि और सामाजिक व्यवस्था। तीनों में समान तत्व है: दूसरों के प्रति और समाज के प्रति दायित्व।

धर्म और रिलिजन: मोटा अंतर

बिंदुधर्म (Dharma)रिलिजन (Religion)
मूल भावधारण करना; कर्तव्य और नियमईश्वर में आस्था और पूजा-पद्धति
दायराव्यक्ति, परिवार, राज्य, समाज, सबमुख्यतः आस्था का क्षेत्र
स्वरूपभूमिका और परिस्थिति के अनुसार बदलता हैसंप्रदाय के सिद्धांत से तय
राज्य से संबंधराजधर्म = शासक का कर्तव्य; सर्वोच्च न्यायालय: धर्मराज्य = विधि का शासनसंविधान में अनुच्छेद 25 आस्था की स्वतंत्रता देता है

तालिका हमारा संक्षिप्त ढाँचा है; पहली पंक्ति और अंतिम स्तंभ सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय और संविधान पर आधारित हैं।

प्राचीन ग्रंथों में धर्म: स्रोत और लक्षण

मनुस्मृति धर्म के स्रोत गिनाती है। 2.6 में कहा गया कि सम्पूर्ण वेद धर्म का मूल है। 2.12 में चार प्रमाण गिनाए गए: वेद, स्मृति, सदाचार और अपनी अंतरात्मा की संतुष्टि। ध्यान दीजिए कि चौथा प्रमाण "अपनी अंतरात्मा की प्रियता" है, यानी धर्म केवल ग्रंथ-आधारित नहीं, विवेक-आधारित भी माना गया। श्लोक 2.6 में भी वेद के साथ वेदज्ञों की स्मृति और शील, साधुओं का आचार और अपनी आत्मा की संतुष्टि गिनाई गई है।

मनुस्मृति 6.92 में धर्म के दस लक्षण गिनाए गए हैं: धृति (धैर्य), क्षमा, दम (संयम), अस्तेय (चोरी न करना), शौच (पवित्रता), इंद्रिय-निग्रह, धी (विवेक), विद्या, सत्य और अक्रोध। इन्हें सब पर लागू होने वाला सामान्य धर्म कहा जा सकता है। ये गुण किसी जाति, पद या संप्रदाय के लिए नहीं, मनुष्य मात्र के लिए गिनाए गए हैं (विश्लेषण)। लोकसेवक के लिए अस्तेय, सत्य और अक्रोध सीधे सत्यनिष्ठा और संयम से जुड़ते हैं।

गीता में धर्म दो रूपों में आता है। पहला स्वधर्म: 3.35 कहती है कि अपने धर्म का पालन भले दोषयुक्त हो, दूसरे के धर्म का भली-भाँति पालन करने से बेहतर है; दूसरे का धर्म भयावह है। 2.31 में अर्जुन को उसकी क्षत्रिय-भूमिका की याद दिलाई गई है कि धर्मयुक्त युद्ध से बढ़कर उसके लिए कुछ नहीं। दूसरा रूप धर्म की रक्षा: 4.7 कहती है कि जब-जब धर्म की हानि और अधर्म का उत्थान होता है, तब परमात्मा स्वयं प्रकट होते हैं।

सामान्य धर्म और विशेष धर्म: परंपरागत वर्गीकरण

वर्गअर्थउदाहरणविश्लेषण
सामान्य धर्मसब मनुष्यों पर लागू नैतिक गुणमनुस्मृति 6.92 के दस लक्षण: सत्य, क्षमा, अक्रोध आदिआज के "सार्वभौमिक मूल्य" के निकट
विशेष (स्व) धर्मभूमिका और स्थिति के अनुसार कर्तव्यशिक्षक, राजा, गृहस्थ, विद्यार्थी का कर्तव्य; गीता 3.35आधुनिक भाषा में "व्यावसायिक आचार" से मेल
राजधर्मशासक और राज्य का कर्तव्यसर्वोच्च न्यायालय ने इसे संवैधानिक विधि के अर्थ में पढ़ाआज के "लोकसेवक का कर्तव्य" से तुलना

वर्गीकरण परंपरागत है; "विश्लेषण" वाला स्तंभ हमारी व्याख्या है, किसी ग्रंथ का कथन नहीं।

धर्म और समाज की व्यवस्था

समाजशास्त्र की दृष्टि से धर्म की धारणा तीन काम करती है (विश्लेषण)। पहला, वह सामाजिक भूमिकाओं को कर्तव्य का रूप देती है: कौन किसके प्रति क्या उत्तरदायी है। दूसरा, वह आचरण पर नैतिक नियंत्रण रखती है, जैसे क़ानून के बाहर भी "क्या उचित है" का बोध। तीसरा, वह समाज को एक साझा नैतिक भाषा देती है, जिसमें "धर्म" और "अधर्म" का भेद सब समझते हैं।

यहाँ कर्म, धर्म और पुरुषार्थ की कड़ी देखिए। पुरुषार्थ के चार लक्ष्यों में धर्म पहला है और अर्थ तथा काम पर अंकुश रखता है (पुरुषार्थ के पृष्ठ पर विस्तार)। कर्म वह कार्य है जो धर्म के अनुसार किया या न किया जाए। इसलिए धर्म "क्या करना चाहिए", कर्म "क्या किया गया" और पुरुषार्थ "किस लक्ष्य के लिए" का उत्तर है। यह तीन-शब्दों का सूत्र उत्तर में सारांश के काम आता है (विश्लेषण)।

वर्णाश्रम धर्म की चर्चा में एक सतर्कता चाहिए। परंपरा में स्वधर्म को वर्ण और आश्रम से जोड़ा गया, यानी जन्म और अवस्था के आधार पर अलग कर्तव्य। आलोचकों के अनुसार इस जन्म-आधारित बँटवारे ने ऊँच-नीच को वैधता दी (विश्लेषण)। आज संविधान जन्म-आधारित भेद को स्वीकार नहीं करता; इसलिए स्वधर्म को आधुनिक भाषा में "अपनी भूमिका का सर्वश्रेष्ठ निर्वाह" के रूप में पढ़ना ज़्यादा उपयोगी और सुरक्षित है।

आधुनिक भारत में धर्म: संविधान का कर्तव्य-बोध

संविधान ने "धर्म" शब्द का वही अर्थ तो नहीं लिया, पर कर्तव्य का विचार लिया है। अनुच्छेद 51A, जो 42वें संशोधन (1976) से 3 जनवरी 1977 को जुड़ा, नागरिक के मौलिक कर्तव्य गिनाता है। इनमें संविधान और उसके आदर्शों का सम्मान (क), बंधुत्व की भावना और महिलाओं की गरिमा के विरुद्ध प्रथाओं का त्याग (ङ), संमिश्र संस्कृति की धरोहर का सम्मान (च), वैज्ञानिक दृष्टिकोण और सुधार की भावना (ज) शामिल हैं। खंड (ट) 86वें संशोधन (2002) से जुड़ा और 1 अप्रैल 2010 से लागू माना गया है: छह से चौदह वर्ष के बच्चों को शिक्षा के अवसर देना माता-पिता या संरक्षक का कर्तव्य है।

इसे पढ़ने का एक तरीक़ा यह है कि प्राचीन "सामान्य धर्म" का आधुनिक रूप मौलिक कर्तव्यों में दिखता है (विश्लेषण)। फ़र्क़ यह है कि 51A में कर्तव्य न्यायालय से सीधे लागू कराने योग्य अधिकार की तरह नहीं हैं; वे नैतिक और नागरिक दायित्व का स्पष्ट पाठ हैं। अनुच्छेद 25 अलग से आस्था की स्वतंत्रता देता है, यानी संविधान "रिलिजन" और "कर्तव्य" को अलग-अलग रखता है।

इसीलिए सर्वोच्च न्यायालय का यह कथन उपयोगी है कि धर्म का अर्थ धार्मिक शासन नहीं, विधि का शासन है। यह वाक्य उत्तर में धर्म और धर्मनिरपेक्षता के बीच का भ्रम दूर करता है: धर्मनिरपेक्ष राज्य में भी "धर्म" को कर्तव्य और विधि के अर्थ में समझा जा सकता है।

धर्म, क़ानून और नैतिकता: तीन अलग पर जुड़े क्षेत्र

एक ट्रैफ़िक सिग्नल की मिसाल लीजिए। लाल बत्ती पर रुकना क़ानून है, क्योंकि न रुकने पर चालान कटेगा। रुककर किसी बुज़ुर्ग को सड़क पार कराना क़ानून नहीं माँगता, पर नैतिकता माँगती है। पारंपरिक धर्म की धारणा इन दोनों को समेट लेती है: उसमें दंडनीय नियम भी हैं और विवेक से निभाने वाले कर्तव्य भी। यही कारण है कि सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय में धर्म को आध्यात्मिक, नैतिक, व्यक्तिगत और दीवानी, फ़ौजदारी तथा संवैधानिक विधि, इन सब विषयों के लिए व्यापक शब्द कहा गया है।

आधुनिक राज्य में इन क्षेत्रों का बँटवारा साफ़ है। क़ानून राज्य बलपूर्वक लागू करता है, नैतिकता व्यक्ति के विवेक पर छोड़ी जाती है, और आस्था का क्षेत्र अनुच्छेद 25 के अधीन स्वतंत्रता का है। फिर भी तीनों एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं। जब समाज का नैतिक बोध बदलता है, तो क़ानून बदलता है, जैसे महिलाओं की गरिमा के विरुद्ध प्रथाओं के प्रति दृष्टिकोण का बदलना (अनुच्छेद 51A(ङ) में यह कर्तव्य रूप में दर्ज है)।

परीक्षा में यह भेद उपयोगी है। "धर्म और क़ानून" पर प्रश्न आए तो लिखिए कि प्राचीन धर्म ने क़ानून, नैतिकता और कर्तव्य को एक साथ रखा, पर आधुनिक संविधानवाद ने उन्हें अलग किया और रिलिजन को निजी स्वतंत्रता का विषय माना (विश्लेषण)।

लोकसेवक का धर्म: राजधर्म से प्रशासनिक कर्तव्य तक

न्यायालय के निर्णय में राजधर्म को शासक का कर्तव्य और संवैधानिक विधि बताया गया है। इसे आज के प्रशासन पर लगाइए तो अर्थ निकलता है कि सत्ता कोई निजी संपत्ति नहीं, बल्कि प्रजा के प्रति निभाया जाने वाला दायित्व है (विश्लेषण)। एक ज़िला कलेक्टर जब राहत-कार्य में बिना भेदभाव के सबको बराबर सामग्री पहुँचाता है, तो वह आधुनिक भाषा में अपना राजधर्म निभा रहा होता है।

लोकसेवक के लिए धर्म की कसौटियाँ तीन हैं। पहली, पद का कर्तव्य: नियम के अनुसार और निष्पक्ष होकर कार्य। दूसरी, सार्वभौमिक नैतिक गुण: सत्य, अस्तेय और अक्रोध जैसे गुण, जो मनुस्मृति के दस लक्षणों में आते हैं। तीसरी, संवैधानिक कर्तव्य: संविधान और उसके संस्थानों का सम्मान। तीनों में टकराव दिखे, तो संविधान और विधि को अंतिम कसौटी रखना ही उचित है, क्योंकि वही सबके लिए समान और बाध्यकारी है (विश्लेषण)।

यहाँ पेपर II की नीतिशास्त्र इकाई से एक अंतर समझ लीजिए। समाजशास्त्र में धर्म को सामाजिक व्यवस्था की अवधारणा के रूप में समझाया जाता है, जबकि नीतिशास्त्र में प्रश्न यह होता है कि धर्म की कसौटी पर कोई प्रशासनिक निर्णय कैसे परखा जाए। इस पृष्ठ में पहला कोण है; दूसरा कोण नीतिशास्त्र के पृष्ठों में आता है।

धर्म की आलोचना और आधुनिक पाठ

परंपरागत धारणाआलोचनाआधुनिक पाठ (विश्लेषण)
स्वधर्म: अपनी भूमिका का पालनजन्म-आधारित भूमिकाएँ ऊँच-नीच को वैध ठहराती हैंभूमिका का चुनाव और योग्यता, कर्तव्य का निर्वाह
धर्म: ग्रंथ और परंपरा आधारितनए सामाजिक प्रश्नों पर परिवर्तन के प्रति कठोरताविवेक (मनु 2.12 का "आत्मतुष्टि") और संवैधानिक मूल्य
धर्म और रिलिजन का घालमेलअल्पसंख्यक और आस्था-विहीन नागरिकों को बाहर कर देनाअनुच्छेद 25 आस्था की स्वतंत्रता; धर्म = कर्तव्य और विधि

तालिका हमारा विश्लेषण है; इसे "आलोचनात्मक मूल्यांकन" वाले उत्तर में उपयोग कीजिए।

धर्म का नक्शा

धर्म (Dharma)

अर्थ

धारण करने वाला नियम

  • कर्तव्य
  • नैतिक नियम
  • विधि और व्यवस्था

सामान्य धर्म

मनुस्मृति 6.92

  • धृति, क्षमा, दम
  • अस्तेय, शौच, इंद्रिय-निग्रह
  • धी, विद्या, सत्य, अक्रोध

गीता

स्वधर्म और धर्म-रक्षा

  • 3.35 स्वधर्म
  • 2.31 क्षत्रिय का धर्म
  • 4.7 धर्म की हानि

आज का रूप

संविधान

  • अनुच्छेद 51A मौलिक कर्तव्य
  • अनुच्छेद 25 आस्था की स्वतंत्रता
  • सर्वोच्च न्यायालय 1996

समय-रेखा: जिन तारीख़ों और निर्णयों से प्रश्न बनते हैं

  1. 1976

    42वाँ संशोधन: अनुच्छेद 51A, मौलिक कर्तव्य; 3 जनवरी 1977 से लागू

  2. 19 मार्च 1996

    सर्वोच्च न्यायालय: A.S. Narayana Deekshitulu बनाम आंध्र प्रदेश; धर्म का व्यापक अर्थ

  3. 2002

    86वाँ संशोधन: 51A(k); 1 अप्रैल 2010 से लागू

तारीख़ों के साथ संशोधन की संख्या जोड़कर याद कीजिए।

मुख्य तथ्य

सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय
A.S. Narayana Deekshitulu बनाम आंध्र प्रदेश राज्य, 19 मार्च 1996; पीठ के. रामास्वामी और बी.एल. हंसारिया
धर्मराज्य
निर्णय के अनुसार विधि का शासन, धार्मिक शासन नहीं
गीता 3.35
स्वधर्म का पालन श्रेयस्कर
गीता 4.7
धर्म की हानि पर परमात्मा का प्राकट्य
गीता 2.31
क्षत्रिय के लिए धर्मयुक्त युद्ध से बढ़कर कुछ नहीं (अर्जुन को स्वधर्म की याद)
मनुस्मृति 6.92
धर्म के दस लक्षण: धृति, क्षमा, दम, अस्तेय, शौच, इंद्रिय-निग्रह, धी, विद्या, सत्य, अक्रोध
मनुस्मृति 2.6
वेद धर्म का मूल; साथ में वेदज्ञों की स्मृति और शील, सज्जनों का आचार, आत्मतुष्टि
मनुस्मृति 2.12
चार प्रमाण: वेद, स्मृति, सदाचार, आत्मतुष्टि
अनुच्छेद 51A
42वें संशोधन 1976 से (3-1-1977); खंड (ट) 86वें संशोधन 2002 से (1-4-2010)
अनुच्छेद 25
अंतःकरण की स्वतंत्रता और धर्म को मानने, आचरण करने और प्रचार करने का अधिकार (लोक-व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के अधीन)
सिलेबस की पंक्ति
RPSC सिलेबस, 09-01-2026, पेपर I, इकाई III (क)

परीक्षा में आम ग़लतियाँ

याद रखें

  • धर्म को केवल "रिलिजन" या "पूजा-पद्धति" लिख देना। धर्म का मूल अर्थ धारण करने वाला नियम और कर्तव्य है।
  • स्वधर्म को केवल जाति या वर्ण का कर्तव्य बता देना। गीता में वह भूमिका और स्वभाव से जुड़ा है; आलोचना और आधुनिक पाठ दोनों लिखिए।
  • मनुस्मृति के दस लक्षणों में से नाम गड़बड़ा देना। "धृति क्षमा दम अस्तेय शौच इंद्रिय-निग्रह धी विद्या सत्य अक्रोध" क्रम से याद करें।
  • अनुच्छेद 51A को "राज्य के नीति-निदेशक तत्त्व" में गिन लेना। यह भाग IVक में नागरिकों के मौलिक कर्तव्य हैं, और 42वें संशोधन से जुड़ा है।
  • सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय का वर्ष या नाम याद न होने पर भी लिख देना। न पक्का हो तो केवल "सर्वोच्च न्यायालय ने कहा" लिखिए।
  • गीता के उन श्लोकों की संख्या लिखना जिनका पाठ पक्का न हो। इस पृष्ठ में 2.31, 3.35 और 4.7 स्रोत से मिलाकर दिए गए हैं; दूसरे श्लोक तभी लिखिए जब संख्या और पाठ पर पूरा भरोसा हो।