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पेपर I · इकाई III (A)

साइबर अपराध और सोशल मीडिया का प्रभाव

साइबर अपराध की परिभाषा और प्रकार, IT अधिनियम के दंड, श्रेया सिंघल निर्णय, NCRB आँकड़े और सोशल मीडिया के समाज पर प्रभाव, उत्तर-लेखन की दृष्टि से।

  • साइबर अपराध
  • IT अधिनियम
  • श्रेया सिंघल
  • सोशल मीडिया
3 अक्टूबर 2026 को सत्यापित

सिलेबस में

RPSC सिलेबस (09-01-2026), पेपर I, इकाई III, भाग A: "Issues related to family and marriage, elderly people and disabled in present Indian society; impact of cyber crime and social media on Indian society." इस पृष्ठ पर साइबर अपराध और सोशल मीडिया है; परिवार-विवाह, बुज़ुर्ग और दिव्यांग के अलग पृष्ठ हैं।

इस विषय को क्यों पढ़ें

याद रखें

  • 2013 में "साइबर अपराध को परिभाषित करें" पेपर III में 2 अंक में पूछा गया था; परिभाषा सटीक और छोटी लिखें।
  • विषय बार-बार चर्चा में रहता है और उत्तर तब मज़बूत बनता है जब आप IT अधिनियम की धाराएँ और NCRB के आँकड़े साथ दें।
  • सिलेबस में "सोशल मीडिया" साफ़ लिखा है, इसलिए पूरे उत्तर में अपराध के साथ सोशल मीडिया के अच्छे-बुरे प्रभाव का संतुलन दिखाएँ।

पहले सरल भाषा में: ताला बदला, पर चोर भी बदल गए

पुराने समय में चोरी का मतलब था कि कोई रात को दीवार फाँदकर आता था। आज वही चोर आपके फ़ोन पर एक लिंक भेजता है, आप उस पर क्लिक करते हैं और बैंक खाता ख़ाली हो जाता है। चोर कमरे में नहीं आया, पर नुक़सान असली हुआ। साइबर अपराध (cyber crime) की यही ख़ासियत है: अपराधी अदृश्य है, भौगोलिक सीमा नहीं मानता और एक साथ हज़ारों लोगों को निशाना बना सकता है। (यह समझाने के लिए गढ़ा गया दृश्य है, किसी वास्तविक घटना का वर्णन नहीं।)

सिलेबस का वाक्य है "impact of cyber crime and social media on Indian society"। इसलिए तैयारी के दो हिस्से हैं: साइबर अपराध क्या है और कितना फैला है, तथा सोशल मीडिया समाज को किस तरह बदल रहा है। दोनों में उत्तर तब अच्छा बनता है जब आप अच्छे और बुरे, दोनों पहलू और क़ानूनी ढाँचा संतुलन से लिखें।

साइबर अपराध की परिभाषा

गृह मंत्रालय के राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल के अनुसार साइबर अपराध कोई भी ऐसा ग़ैरक़ानूनी कार्य है जिसमें अपराध करने या उसे सुगम बनाने के लिए कंप्यूटर, संचार-उपकरण या कंप्यूटर नेटवर्क का उपयोग हुआ हो। परिभाषा में दो रूप दिखते हैं: जब कंप्यूटर या नेटवर्क अपराध का "साधन" हो (जैसे ऑनलाइन ठगी) और जब वह अपराध का "निशाना" हो (जैसे किसी प्रणाली में अनधिकृत घुसपैठ)।

एक ध्यान देने की बात: सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 में "साइबर अपराध" की अलग से कोई परिभाषा नहीं है। अधिनियम धारा 2 में साइबर सुरक्षा (cyber security), डेटा और साइबर कैफ़े जैसी शब्दावली परिभाषित करता है और अध्याय IX तथा XI में अपराध और दंड बताता है। इसलिए परिभाषा लिखते समय "MHA पोर्टल के अनुसार" कहना सुरक्षित है, "IT एक्ट के अनुसार" नहीं।

पोर्टल अपराधों के प्रकारों की सूची भी देता है, जिनमें बाल यौन शोषण सामग्री (धारा 67B), साइबर बुलिंग, साइबर स्टॉकिंग, साइबर ग्रूमिंग और ऑनलाइन नौकरी-धोखाधड़ी शामिल हैं। उत्तर में तीन-चार प्रकार नाम से गिना देना अंक बढ़ाता है।

साइबर अपराध के प्रमुख प्रकार

आर्थिक अपराध: फ़िशिंग (नक़ली संदेश या लिंक से पासवर्ड या OTP हड़पना), ऑनलाइन नौकरी या निवेश धोखाधड़ी, और छद्मवेश से ठगी। इसके लिए IT अधिनियम की धारा 66C (पहचान की चोरी) और 66D (छद्मवेश से ठगी) लगती हैं।

व्यक्ति के विरुद्ध अपराध: साइबर बुलिंग, पीछा करना (cyber stalking), निजी तस्वीरें बिना अनुमति फैलाना। निजता भंग पर धारा 66E है, और अश्लील सामग्री पर धारा 67 तथा 67A है; बच्चों से जुड़ी सामग्री पर धारा 67B।

राष्ट्र के विरुद्ध अपराध: साइबर आतंकवाद, जिसकी धारा 66F है और जिसमें आजीवन कारावास तक की सज़ा है; महत्त्वपूर्ण सूचना-ढाँचे पर हमले और जासूसी भी इसी श्रेणी में आते हैं। (श्रेणी-वर्गीकरण उत्तर-लेखन की सुविधा के लिए है।)

याद रखने की युक्ति: "धन, व्यक्ति, राष्ट्र"। धन के विरुद्ध ठगी, व्यक्ति के विरुद्ध निजता और उत्पीड़न, और राष्ट्र के विरुद्ध आतंकवाद। परीक्षा में हर श्रेणी का एक उदाहरण और एक धारा लिख देने से उत्तर संक्षिप्त होकर भी पूरा लगता है, और शब्द-सीमा के भीतर अधिक सामग्री समा जाती है।

सोशल मीडिया का प्रभाव: दोनों पहलू (विश्लेषण)

सोशल मीडिया ने समाज को जोड़ा भी है और तोड़ा भी। सकारात्मक पक्ष: दूर-दराज़ के गाँव को सीधी आवाज़ मिली, शिकायतें तुरंत प्रशासन तक पहुँचती हैं, आपदा के समय सूचना और सहायता तेज़ी से फैलती है, छोटे उद्यमियों और कारीगरों को बाज़ार मिला, और सामाजिक आंदोलनों को संगठित करना आसान हुआ। यह निष्कर्ष विश्लेषण है, किसी एक आधिकारिक दस्तावेज़ का कथन नहीं।

नकारात्मक पक्ष: अफ़वाह और फ़र्ज़ी ख़बरें (fake news) बहुत तेज़ी से फैलती हैं, जिनसे सांप्रदायिक तनाव और भीड़-हिंसा का ख़तरा बनता है। ऑनलाइन बदनामी, ट्रोलिंग और साइबर बुलिंग से किशोर और स्त्रियाँ विशेष रूप से प्रभावित होती हैं। लगातार स्क्रीन-उपयोग से परिवार में बातचीत घटती है और युवाओं में तुलना और चिंता बढ़ती है। निजी डेटा का दुरुपयोग और ठगी भी इसी प्लेटफ़ॉर्म-संस्कृति से जुड़े हैं।

सामाजिक संरचना पर प्रभाव: परंपरागत गेट-कीपर (संपादक, बुज़ुर्ग, गाँव का मुखिया) की भूमिका कमज़ोर हुई है, क्योंकि हर व्यक्ति प्रकाशक बन सकता है। इससे सूचना का लोकतंत्रीकरण हुआ, पर सत्यापन की ज़िम्मेदारी अब व्यक्ति पर आ गई है। जो परिवार डिजिटल रूप से कम साक्षर हैं, उनके बुज़ुर्ग और ग्रामीण स्त्रियाँ ठगी का आसान निशाना बनते हैं, इसलिए डिजिटल साक्षरता सुरक्षा का हिस्सा है।

IT अधिनियम, 2000 के प्रमुख दंड-प्रावधान

धाराविषयअधिकतम सज़ा / जुर्माना
66कंप्यूटर संबंधी अपराध3 वर्ष या 5 लाख रुपये तक जुर्माना, या दोनों
66Cपहचान की चोरी3 वर्ष और 1 लाख रुपये तक
66Dकंप्यूटर संसाधन से छद्मवेश द्वारा ठगी3 वर्ष और 1 लाख रुपये तक
66Eनिजता का उल्लंघन3 वर्ष या 2 लाख रुपये तक, या दोनों
66Fसाइबर आतंकवादआजीवन कारावास तक
67अश्लील सामग्री का प्रकाशनपहली बार 3 वर्ष और 5 लाख; दोबारा 5 वर्ष और 10 लाख
67Aयौन रूप से स्पष्ट सामग्रीपहली बार 5 वर्ष और 10 लाख; दोबारा 7 वर्ष
67Bबच्चों से जुड़ी सामग्रीपहली बार 5 वर्ष और 10 लाख; दोबारा 7 वर्ष और 10 लाख

धारा 66A रद्द है।

क़ानूनी ढाँचा और न्यायिक हस्तक्षेप

IT अधिनियम, 2000 साइबर अपराधों का मुख्य क़ानून है और 2008 में संशोधित हुआ। इसमें धारा 66 कंप्यूटर संबंधी अपराधों के लिए 3 वर्ष तक की सज़ा या 5 लाख रुपये तक जुर्माना (या दोनों) रखती है; 66C और 66D में 3 वर्ष और 1 लाख रुपये तक जुर्माना है; 66E में 3 वर्ष या 2 लाख रुपये तक; 66F में आजीवन कारावास तक; 67 में पहली बार 3 वर्ष और 5 लाख रुपये तथा दोबारा 5 वर्ष और 10 लाख रुपये; 67A में 5 वर्ष और 10 लाख रुपये तथा दोबारा 7 वर्ष।

सोशल मीडिया और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संदर्भ में श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ (24 मार्च 2015) महत्त्वपूर्ण है। सर्वोच्च न्यायालय ने धारा 66A (आपत्तिजनक संदेश भेजने पर दंड) को पूरी तरह रद्द कर दिया, क्योंकि यह अनुच्छेद 19(1)(क) का उल्लंघन करती थी और अनुच्छेद 19(2) के अंतर्गत उचित प्रतिबंध के रूप में नहीं बचती थी। न्यायालय ने धारा 69A (वेबसाइट ब्लॉक करने की शक्ति) को सुरक्षा-उपायों के साथ वैध माना और धारा 79 को सीमित अर्थ में पढ़ने का निर्देश दिया। India Code पर अधिनियम के पाठ में भी इस निर्णय का उल्लेख टिप्पणी के रूप में है।

इसका सबक यह है कि सोशल मीडिया पर अपराध और अभिव्यक्ति के बीच रेखा खींचना कठिन है। अस्पष्ट शब्दों वाला क़ानून (जैसे "असुविधा" या "चिढ़") अभिव्यक्ति को दबा सकता है, इसलिए अपराध की परिभाषा स्पष्ट होनी चाहिए (विश्लेषण)।

साइबर अपराध के पंजीकृत मामले (NCRB, देशभर में)

पंजीकृत मामले

भारत में मामले

  • 202152,974
  • 202265,893
  • 202386,420

राजस्थान में मामले

  • 20211,504
  • 20221,833
  • 20232,435
वर्षभारत में मामलेराजस्थान में मामले
202152,9741,504
202265,8931,833
202386,4202,435

2021 से 2023 में राष्ट्रीय संख्या में लगभग 63 प्रतिशत की वृद्धि (गणना: 86,420 / 52,974)।

साइबर अपराध के सामाजिक प्रभाव और उपाय (विश्लेषण)

आर्थिक नुक़सान के साथ मनोवैज्ञानिक चोट भी होती है: पीड़ित शर्म के कारण रिपोर्ट नहीं करता, इसलिए वास्तविक संख्या दर्ज संख्या से बड़ी हो सकती है। परिवारों में भरोसा घटता है, और बच्चों-किशोरों पर ऑनलाइन उत्पीड़न का असर पढ़ाई और व्यवहार पर पड़ता है।

उपायों को तीन स्तरों पर लिखें: व्यक्ति (मज़बूत पासवर्ड, OTP किसी से साझा न करना, अजनबी लिंक न खोलना), समाज (डिजिटल साक्षरता, अभिभावक-बच्चों में संवाद, स्कूल-स्तर की जागरूकता) और राज्य (शीघ्र रिपोर्टिंग तंत्र, प्रशिक्षित जाँच-एजेंसियाँ, प्लेटफ़ॉर्म की जवाबदेही और स्पष्ट क़ानून)। यहाँ राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल का नाम उदाहरण के रूप में लिख सकते हैं, जिस पर नागरिक ऑनलाइन शिकायत दर्ज कर सकते हैं।

साइबर अपराध की विशिष्ट विशेषताएँ (विश्लेषण)

साधारण अपराध से साइबर अपराध को अलग करने वाली चार बातें उत्तर में लिखी जा सकती हैं। पहली, सीमाहीनता: अपराधी राजस्थान के किसी गाँव में बैठे व्यक्ति को किसी दूसरे राज्य या देश से निशाना बना सकता है, इसलिए जाँच में अधिकार-क्षेत्र की उलझन आती है। दूसरी, गुमनामी: नक़ली खाते, मोबाइल नंबर और एन्क्रिप्टेड ऐप अपराधी की पहचान कठिन बनाते हैं। तीसरी, पैमाना: एक ही संदेश लाखों लोगों तक एक साथ पहुँच सकता है, इसलिए एक अपराधी बहुत से पीड़ित बना सकता है। चौथी, साक्ष्य की नाज़ुकता: डिजिटल सबूत मिटाए या बदले जा सकते हैं, इसलिए उन्हें तुरंत सुरक्षित करना ज़रूरी है।

इन्हीं विशेषताओं के कारण पुलिस के लिए सामान्य गश्त या मौक़ा-मुआयना जैसे पुराने तरीक़े काफ़ी नहीं रहते, और विशेष प्रशिक्षण, तकनीकी प्रयोगशालाएँ तथा तेज़ रिपोर्टिंग तंत्र चाहिए।

स्त्रियों, बच्चों और बुज़ुर्गों पर विशेष असर (विश्लेषण)

साइबर अपराध का असर सभी पर बराबर नहीं पड़ता। स्त्रियाँ निजी तस्वीरों के दुरुपयोग, पीछा करने और ऑनलाइन उत्पीड़न का सबसे अधिक सामना करती हैं, और सामाजिक लांछन के डर से कई बार शिकायत ही नहीं करतीं। बच्चे और किशोर गेमिंग, चैट और सोशल मीडिया के रास्ते ग्रूमिंग और बुलिंग का शिकार हो सकते हैं, इसीलिए IT अधिनियम की धारा 67B बच्चों से जुड़ी सामग्री पर अलग प्रावधान करती है। बुज़ुर्ग और कम डिजिटल साक्षर लोग ठगी, जैसे नक़ली बैंक-कॉल या "डिजिटल अरेस्ट" की धमकी, के आसान निशाने बनते हैं।

सामाजिक संरचना की दृष्टि से यह दिखाता है कि तकनीक पुरानी असमानताओं, यानी लिंग, उम्र और शिक्षा के भेद, को नए रूप में दोहरा सकती है। इसलिए नीति में सुरक्षा के साथ पहुँच और साक्षरता की बात भी साथ चलनी चाहिए।

सोशल मीडिया और परिवार, विवाह तथा समाज के रिश्ते (विश्लेषण)

सोशल मीडिया का असर परिवार और विवाह जैसे सिलेबस के दूसरे विषयों तक भी पहुँचता है। संयुक्त परिवार के सदस्य अलग शहरों में रहकर भी वीडियो कॉल से जुड़े रहते हैं, जो दूरी का दर्द घटाता है; दूसरी ओर एक ही घर में बैठे लोग अपनी-अपनी स्क्रीन में खोए रहते हैं और आमने-सामने की बातचीत घटती है। विवाह-संबंधी वेबसाइट और ऐप ने जाति और क्षेत्र की सीमाओं के पार साथी चुनने का दायरा बढ़ाया है, पर वहाँ धोखाधड़ी और नक़ली प्रोफ़ाइल का ख़तरा भी रहता है।

राजनीतिक और सामाजिक चेतना के स्तर पर सोशल मीडिया ने साधारण नागरिक को सवाल पूछने का मंच दिया है, पर इसी मंच पर ध्रुवीकरण और भीड़-मानसिकता भी बनती है। उत्तर में "दोधारी तलवार" जैसी उपमा देकर दोनों पहलू बताना और अंत में समाधान लिखना बेहतर अंक दिलाता है।

साइबर अपराध और उसका सामाजिक असर

साइबर अपराध और सोशल मीडिया

अपराध के प्रकार

  • आर्थिक ठगी (66C, 66D)
  • निजता भंग (66E)
  • अश्लील सामग्री (67, 67A, 67B)
  • साइबर आतंकवाद (66F)

सोशल मीडिया: लाभ

  • जनता की आवाज़
  • आपदा-सूचना
  • छोटे व्यवसाय

सोशल मीडिया: हानि

  • अफ़वाह
  • ट्रोलिंग
  • निजता का हनन

उपाय

  • डिजिटल साक्षरता
  • रिपोर्टिंग पोर्टल
  • स्पष्ट क़ानून
उत्तर में इन चार शाखाओं में से हर एक से कम से कम एक बिंदु लिखें (विश्लेषण)।

मुख्य तथ्य

साइबर अपराध की परिभाषा
कंप्यूटर, संचार-उपकरण या नेटवर्क के उपयोग से किया या सुगम बनाया गया ग़ैरक़ानूनी कार्य (MHA पोर्टल)
पंजीकृत मामले (भारत)
52,974 (2021), 65,893 (2022), 86,420 (2023)
पंजीकृत मामले (राजस्थान)
1,504 (2021), 1,833 (2022), 2,435 (2023)
धारा 66C और 66D
3 वर्ष और 1 लाख रुपये तक जुर्माना
धारा 66E
3 वर्ष या 2 लाख रुपये तक, या दोनों
धारा 66F (साइबर आतंकवाद)
आजीवन कारावास तक
धारा 67 और 67A
67: 3 वर्ष और 5 लाख (दोबारा 5 वर्ष, 10 लाख); 67A: 5 वर्ष और 10 लाख (दोबारा 7 वर्ष)
श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ
24 मार्च 2015; धारा 66A रद्द, 69A वैध, 79 सीमित

राजस्थान का पहलू

राजस्थान में साइबर अपराध के पंजीकृत मामले 1,504 (2021), 1,833 (2022) और 2,435 (2023) रहे, यानी दो वर्ष में लगभग 62 प्रतिशत की बढ़त (PIB, 17 मार्च 2026; गृह मंत्रालय का राज्य सभा उत्तर, 3 दिसंबर 2025; देखा गया: 2 अक्टूबर 2026)।

परीक्षा में आम ग़लतियाँ

याद रखें

  • IT अधिनियम में "साइबर अपराध" की परिभाषा बता देना; वहाँ अलग परिभाषा नहीं है। "MHA पोर्टल के अनुसार" लिखें।
  • धारा 66A को चालू मान लेना: यह 2015 में पूरी तरह रद्द हो चुकी है।
  • धारा 69A को भी रद्द बता देना: न्यायालय ने इसे सुरक्षा-उपायों के साथ वैध माना।
  • आँकड़ों में अपराध-वृद्धि और पंजीकरण-वृद्धि का फ़र्क़ न बताना; दर्ज संख्या जागरूकता से भी बढ़ती है।
  • केवल अपराध लिखना और सोशल मीडिया के सकारात्मक पक्ष भूल जाना।