दिव्यांग: मुद्दे, क़ानून और योजनाएँ
दिव्यांगता की अवधारणा, जनगणना 2011 के आँकड़े, मुख्य मुद्दे, RPwD अधिनियम 2016, UNCRPD और योजनाएँ, उत्तर-लेखन की दृष्टि से।
- दिव्यांग
- RPwD अधिनियम 2016
- सुगम्य भारत
- UNCRPD
सिलेबस में
RPSC सिलेबस (09-01-2026), पेपर I, इकाई III, भाग A: "Issues related to family and marriage, elderly people and disabled in present Indian society; impact of cyber crime and social media on Indian society." इस पृष्ठ पर दिव्यांग हैं; बुज़ुर्ग, साइबर अपराध और सोशल मीडिया के अलग पृष्ठ हैं।
इस विषय को क्यों पढ़ें
याद रखें
- सिलेबस में "disabled in present Indian society" साफ़ लिखा है, पर संकलित प्रश्न-बैंक (2013-2024) में इस पर सीधा प्रश्न दर्ज नहीं है। अनुमानित प्रश्नों के लिए सामाजिक मॉडल, RPwD अधिनियम और आँकड़े तैयार रखें।
- RPwD अधिनियम की चार संख्याएँ (7 से 21 श्रेणियाँ, 40%, 4% नौकरी, 5% उच्च शिक्षा) किसी भी उत्तर को ठोस बना देती हैं।
- 10 अंक के प्रश्न में अधिकार-आधारित दृष्टिकोण (UNCRPD से RPwD तक) लिखना परंपरागत "कल्याण" वाले उत्तरों से उत्तर को अलग करता है।
पहले सरल भाषा में: दीवार दिव्यांगता है या सीढ़ी?
मान लीजिए एक पहिया-कुर्सी वाली छात्रा को स्कूल जाना है। स्कूल की पहली मंज़िल पर कक्षा है और वहाँ तक केवल सीढ़ियाँ जाती हैं। इस स्थिति में असली रुकावट छात्रा की चलने की क्षमता है या वह सीढ़ी, जिसके साथ रैंप नहीं बनाया गया? एक दृष्टि कहती है कि समस्या व्यक्ति के शरीर में है; दूसरी कहती है कि समस्या उस वातावरण में है जो हर किसी को ध्यान में रखकर नहीं बना। आधुनिक सोच, जिसमें UNCRPD और भारतीय क़ानून शामिल हैं, दूसरी दृष्टि की ओर झुकती है। (यह समझाने के लिए गढ़ा गया दृश्य है, किसी वास्तविक स्कूल का वर्णन नहीं।)
सिलेबस की पंक्ति में "elderly people and disabled in present Indian society" है। इस पृष्ठ में दिव्यांगता की अवधारणा, आँकड़े, मुद्दे, क़ानूनी और योजनागत ढाँचा और उत्तर-लेखन की रणनीति क्रम से दी गई है। संकलित बैंक में इस विषय का कोई सीधा PYQ दर्ज नहीं है, पर विषय सिलेबस में साफ़ लिखा है, इसलिए इसे तैयार रखना ज़रूरी है।
तैयारी का सरल तरीक़ा यह है कि हर उत्तर में चार चीज़ें रखें: एक आँकड़ा, एक मुद्दा, एक क़ानूनी प्रावधान और एक सुझाव। इस ढाँचे से 2, 5 या 10 अंक, किसी भी शब्द-सीमा में उत्तर बन जाता है, बस कितने बिंदु लिखने हैं यह सीमा तय करती है।
अवधारणा: चिकित्सकीय और सामाजिक मॉडल (विश्लेषण)
दिव्यांगता को समझने के दो प्रमुख मॉडल हैं। चिकित्सकीय मॉडल (medical model) दिव्यांगता को व्यक्ति की शारीरिक या मानसिक कमी मानता है, जिसका इलाज या पुनर्वास होना चाहिए। सामाजिक मॉडल (social model) कहता है कि दिव्यांगता व्यक्ति की क्षमता और समाज की बाधाओं, यानी भवन, परिवहन, रवैये और नियमों, के टकराव से पैदा होती है। इसलिए समाधान केवल इलाज में नहीं, वातावरण को सुगम बनाने और भेदभाव हटाने में है।
इस बदलाव का भारतीय क़ानून में दिखना ख़ास बात है। 1995 के क़ानून की जगह लेने वाला दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम (RPwD Act), 2016 दिव्यांगता को अधिकारों के ढाँचे में रखता है, और इसमें श्रेणियों की संख्या 7 से बढ़ाकर 21 की गई। यह अधिनियम 19 अप्रैल 2017 से लागू हुआ।
चिकित्सकीय और सामाजिक मॉडल की तुलना (विश्लेषण)
चिकित्सकीय मॉडल
समस्या कहाँ हैव्यक्ति के शरीर या मन में
समाधानइलाज और पुनर्वास
व्यक्ति की भूमिकानिष्क्रिय प्राप्तकर्ता
क़ानूनी झुकावदया और कल्याण
सामाजिक मॉडल
समस्या कहाँ हैसमाज की बाधाओं और रवैये में
समाधानवातावरण को सुगम बनाना, भेदभाव हटाना
व्यक्ति की भूमिकाअधिकार-धारक और निर्णयकर्ता
क़ानूनी झुकावअधिकार और समानता
यह तुलना उत्तर-लेखन की सुविधा के लिए है; यह किसी एक आधिकारिक दस्तावेज़ का उद्धरण नहीं।
भारत में दिव्यांगों की संख्या
जनगणना 2011 के अनुसार भारत में 2.68 करोड़ दिव्यांग व्यक्ति हैं, जो कुल आबादी (लगभग 121 करोड़) का 2.21 प्रतिशत हैं। इनमें लगभग 1.50 करोड़ पुरुष और 1.18 करोड़ स्त्रियाँ हैं। जनगणना 2011 में आठ प्रकार की दिव्यांगता गिनी गई, जबकि 2001 की जनगणना में पाँच प्रकार थे।
ध्यान रखें कि जनगणना में कम प्रकार गिने गए और बाद का क़ानून 21 श्रेणियाँ मानता है, इसलिए आँकड़ों की व्याप्ति अलग-अलग हो सकती है। इसी वजह से कई विशेषज्ञ वास्तविक संख्या को जनगणना के आँकड़े से अधिक मानते हैं; यह टिप्पणी विश्लेषण है, किसी एक सरकारी कथन का उद्धरण नहीं।
उत्तर में आँकड़े देते समय "जनगणना 2011 के अनुसार" लिखना न भूलें, क्योंकि अगली जनगणना के आँकड़े आने पर संख्या बदल सकती है। साथ ही 2.21 प्रतिशत जैसे आँकड़े का अर्थ यह है कि हर सौ में से औसतन दो से कुछ अधिक व्यक्ति दिव्यांग हैं, यानी यह कोई छोटा अल्पसंख्यक समूह नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की आबादी है।
दिव्यांगों के सामने मुख्य मुद्दे (विश्लेषण)
मुद्दों को पाँच भागों में लिखना उत्तर को व्यवस्थित रखता है। यह वर्गीकरण उत्तर-लेखन की सुविधा के लिए है।
पहला, सुगम्यता की कमी: सार्वजनिक भवन, परिवहन और सूचना-प्रणालियाँ सबके अनुकूल नहीं बनी हैं। दूसरा, शिक्षा और रोज़गार में बाधाएँ: स्कूलों में सहायक सामग्री और प्रशिक्षित शिक्षकों की कमी तथा नियोक्ताओं में पूर्वाग्रह। तीसरा, सामाजिक रवैया: दया या बोझ का भाव, जिससे व्यक्ति की अपनी स्वायत्तता दब जाती है। चौथा, आर्थिक निर्भरता: कम आय और सहायक उपकरणों की लागत। पाँचवाँ, दोहरा नुक़सान: दिव्यांग स्त्रियाँ और ग्रामीण दिव्यांग लिंग और स्थान के कारण अतिरिक्त पिछड़ेपन का सामना करते हैं।
सुगम्यता को तीन आयामों में समझना उपयोगी है: भौतिक (रैंप, लिफ़्ट, सुगम शौचालय), सूचनात्मक (ब्रेल, सांकेतिक भाषा, स्क्रीन-रीडर के अनुकूल वेबसाइट) और व्यवहारगत (लोगों का नज़रिया)। सुगम्य भारत अभियान के तीन स्तंभ (निर्मित वातावरण, परिवहन, ICT) मुख्यतः भौतिक और सूचनात्मक आयामों पर केंद्रित हैं, जबकि व्यवहारगत आयाम शिक्षा और जागरूकता से बदलता है। इसलिए एक संतुलित उत्तर में तीनों का उल्लेख होना चाहिए।
क़ानूनी ढाँचा: RPwD अधिनियम, 2016
दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 के मुख्य प्रावधान याद रखने लायक़ हैं। इसने दिव्यांगता की श्रेणियाँ 7 से 21 कीं। "बेंचमार्क दिव्यांगता" (benchmark disability) उसे कहते हैं जिसमें दिव्यांगता 40 प्रतिशत या उससे अधिक हो (धारा 2(r)); आरक्षण और कुछ विशेष लाभ इसी श्रेणी के लिए हैं। सरकारी नौकरियों में आरक्षण 3 से बढ़ाकर 4 प्रतिशत किया गया (धारा 34) और उच्च शिक्षा के संस्थानों में 3 से बढ़ाकर 5 प्रतिशत (धारा 32)। केंद्रीय नियम 15 जून 2017 को अधिसूचित हुए।
संस्थागत ढाँचे में मुख्य आयुक्त और राज्य आयुक्त की व्यवस्था है, और हर ज़िले में विशेष न्यायालय का प्रावधान है। अधिनियम की एक महत्त्वपूर्ण बात यह है कि इसके अपराधों के लिए विशेष न्यायालयों की व्यवस्था की गई, ताकि अधिकारों का उल्लंघन केवल प्रशासनिक मामला न रहे।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत ने दिव्यांगजन अधिकार अभिसमय (UNCRPD) पर 30 मार्च 2007 को हस्ताक्षर किए और 1 अक्टूबर 2007 को अनुसमर्थन किया। अधिनियम इसी प्रतिबद्धता को घरेलू क़ानून में उतारता है (विश्लेषण)।
RPwD अधिनियम 2016 एक नज़र में
| बिंदु | प्रावधान |
|---|---|
| लागू होने की तिथि | 19 अप्रैल 2017 |
| श्रेणियाँ | 7 (1995 का अधिनियम) से बढ़कर 21 |
| बेंचमार्क दिव्यांगता | 40% या अधिक (धारा 2(r)) |
| सरकारी नौकरी में आरक्षण | 3% से 4% (धारा 34) |
| उच्च शिक्षा में आरक्षण | 3% से 5% (धारा 32) |
| केंद्रीय नियम | 15 जून 2017 |
| विशेष न्यायालय | हर ज़िले में |
योजनाएँ और कार्यक्रम
सुगम्य भारत अभियान (Accessible India Campaign) 3 दिसंबर 2015 को शुरू हुआ, जिसके तीन स्तंभ हैं: निर्मित वातावरण (भवन), परिवहन और सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी (ICT)। विशिष्ट दिव्यांगता पहचान-पत्र (UDID) परियोजना दिव्यांगों का एक राष्ट्रीय डेटाबेस और एक ही पहचान-पत्र बनाने का प्रयास है, ताकि लाभ पाने के लिए बार-बार प्रमाणीकरण न करना पड़े।
आय-सहायता के स्तर पर राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम (NSAP) की इंदिरा गांधी राष्ट्रीय दिव्यांगता पेंशन योजना (IGNDPS) 18 से 79 वर्ष के गंभीर या बहु-दिव्यांगता वाले BPL व्यक्तियों को 300 रुपये प्रति माह (80 वर्ष और अधिक पर 500 रुपये) देती है। राज्य प्रायः इस राशि में अपनी ओर से और जोड़ते हैं (विश्लेषण)।
परिवार और समाज पर प्रभाव: दिव्यांगता का सामाजिक पक्ष (विश्लेषण)
दिव्यांगता केवल व्यक्ति की नहीं, पूरे परिवार की स्थिति बदल देती है। देखभाल की ज़िम्मेदारी अक्सर परिवार की स्त्रियों पर आती है, जिससे उनकी अपनी शिक्षा या रोज़गार प्रभावित होता है। आमदनी घटने और इलाज या सहायक उपकरणों का ख़र्च बढ़ने से परिवार ग़रीबी की ओर खिसक सकता है। इस तरह दिव्यांगता और ग़रीबी एक-दूसरे को मज़बूत करने वाला चक्र बना सकती हैं।
सामाजिक स्तर पर कलंक (stigma) सबसे भारी बोझ है। कुछ जगह दिव्यांगता को पिछले जन्म का फल या परिवार की "कमी" माना जाता है, जिससे दिव्यांग बच्चों को घर में छिपाकर रखा जाता है और स्कूल नहीं भेजा जाता। विवाह के अवसर भी सीमित रहते हैं, ख़ासकर स्त्रियों के लिए। परिवर्तन तब आता है जब परिवार दिव्यांगता को शर्म नहीं, सहयोग की आवश्यकता की तरह देखता है।
दिव्यांग स्त्रियाँ और ग्रामीण दिव्यांग: दोहरा नुक़सान (विश्लेषण)
दिव्यांग स्त्रियाँ लिंग और दिव्यांगता, दोनों के कारण अतिरिक्त बाधा झेलती हैं। उन्हें शिक्षा, स्वास्थ्य-सेवा और रोज़गार में पुरुष दिव्यांगों से भी कम अवसर मिलते हैं, और शोषण का जोखिम अधिक रहता है। जनगणना 2011 के अनुसार दिव्यांगों में पुरुष लगभग 1.50 करोड़ और स्त्रियाँ लगभग 1.18 करोड़ हैं, पर संख्या का यह अंतर अपने आप में स्थिति नहीं बताता; यह देखना ज़रूरी है कि स्त्रियों की गिनती और पहचान कितनी हो पाती है।
ग्रामीण क्षेत्रों में चिकित्सा, पुनर्वास-केंद्र, सुगम परिवहन और विशेष शिक्षक कम हैं, इसलिए सेवाओं तक पहुँचने के लिए दिव्यांग व्यक्ति को लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। यही कारण है कि प्रमाण-पत्र और पहचान-पत्र (UDID) जैसी व्यवस्थाएँ ग्रामीण स्तर तक सुलभ होनी चाहिए, वरना अधिकार काग़ज़ पर ही रह जाते हैं।
समावेशी शिक्षा और रोज़गार (विश्लेषण)
समावेशी शिक्षा (inclusive education) का अर्थ है कि दिव्यांग बच्चे अलग स्कूलों में भेजे जाने के बजाय सामान्य कक्षाओं में पढ़ें, और स्कूल उनके लिए ज़रूरी बदलाव करे, जैसे रैंप, सुगम शौचालय, ब्रेल या बड़े अक्षरों की सामग्री और प्रशिक्षित शिक्षक। इससे बच्चों के बीच शुरू से ही सहज संबंध बनते हैं और पूर्वाग्रह घटते हैं।
रोज़गार में आरक्षण महत्त्वपूर्ण है, पर अकेला काफ़ी नहीं। जब तक कार्यस्थल सुगम न हो, सहायक तकनीक न मिले और सहकर्मियों का रवैया सहयोगी न हो, तब तक आरक्षित पद भरे नहीं जाते या व्यक्ति टिकता नहीं। इसलिए आरक्षण के साथ "उचित सुविधा" (reasonable accommodation) की धारणा जोड़कर लिखें, जो अधिकार-आधारित दृष्टि की पहचान है। यानी नियोक्ता से अपेक्षा है कि वह व्यक्ति की ज़रूरत के अनुसार कार्यस्थल में उचित बदलाव करे, बशर्ते वह अत्यधिक बोझ न बने।
भाषा और रवैये का महत्त्व (विश्लेषण)
शब्द रवैया बनाते हैं। "विकलांग" शब्द में कमी का भाव है, इसलिए "दिव्यांग" जैसे शब्द चलन में आए, और क़ानून की भाषा में "दिव्यांगजन" का प्रयोग है। पर आलोचकों का कहना है कि केवल शब्द बदलने से रवैया नहीं बदलता; असली बदलाव तब है जब नीति और व्यवहार दोनों में समान अवसर दिखें। उत्तर में यह संतुलित टिप्पणी लिखना एक अलग आयाम जोड़ता है।
सुझाव और आगे की राह (विश्लेषण)
उत्तर के अंत में तीन तरह के सुझाव लिखें। नीतिगत: सुगम्यता के नियमों का समयबद्ध पालन और उसकी सार्वजनिक निगरानी। सामाजिक: स्कूलों और परिवारों में दिव्यांगता के प्रति संवेदनशीलता, "दया" की जगह "अधिकार" की भाषा। आर्थिक: कौशल-प्रशिक्षण, सहायक उपकरणों तक पहुँच और नियोक्ताओं को प्रोत्साहन। इन तीनों के साथ दिव्यांग व्यक्तियों को निर्णय-प्रक्रिया में शामिल करने का सिद्धांत जोड़ें, जो अभिसमय की भावना भी है।
दिव्यांगता पर दृष्टिकोण का विकास
1995
पुराना क़ानून; 7 श्रेणियाँ
2007
UNCRPD पर हस्ताक्षर (30 मार्च) और अनुसमर्थन (1 अक्टूबर)
2011
जनगणना: 2.68 करोड़ दिव्यांग, 2.21%
2015
सुगम्य भारत अभियान (3 दिसंबर)
2017
RPwD अधिनियम 2016 लागू (19 अप्रैल); 21 श्रेणियाँ
मुख्य तथ्य
- जनगणना 2011
- 2.68 करोड़ दिव्यांग; कुल आबादी का 2.21%
- RPwD अधिनियम 2016
- 19 अप्रैल 2017 से लागू; श्रेणियाँ 7 से 21
- बेंचमार्क दिव्यांगता
- 40% या अधिक (धारा 2(r))
- नौकरियों में आरक्षण (धारा 34)
- 3% से बढ़कर 4%
- उच्च शिक्षा में आरक्षण (धारा 32)
- 3% से बढ़कर 5%
- सुगम्य भारत अभियान
- 3 दिसंबर 2015; तीन स्तंभ: निर्मित वातावरण, परिवहन, ICT
- UNCRPD
- हस्ताक्षर 30 मार्च 2007; अनुसमर्थन 1 अक्टूबर 2007
- IGNDPS पेंशन
- 18 से 79 वर्ष, गंभीर या बहु-दिव्यांगता, BPL; 300 रुपये प्रति माह (80+ पर 500)
परीक्षा में आम ग़लतियाँ
याद रखें
- श्रेणियों की संख्या 7 और 21 को उलट देना: 1995 में 7 थीं, 2016 के अधिनियम में 21 हैं।
- आरक्षण के प्रतिशत गड़बड़ करना: नौकरी 4% (धारा 34) और उच्च शिक्षा 5% (धारा 32)।
- आरक्षण को सभी दिव्यांगों के लिए बताना: यह केवल बेंचमार्क दिव्यांगता (40% या अधिक) पर लागू है।
- जनगणना 2011 में 21 श्रेणियाँ गिनी गई थीं, ऐसा लिखना; वहाँ आठ प्रकार थे।
- केवल कल्याणकारी (दया वाले) स्वर में लिखना; अधिकार-आधारित भाषा में लिखें।
केस स्टडी: एक कल्पित ज़िले में सुगम्यता का ऑडिट
उदाहरण (काल्पनिक)सीढ़ी से रैंप तक
यह समझाने के लिए गढ़ा गया उदाहरण है; किसी वास्तविक ज़िले या कार्यालय का वर्णन नहीं है। इसका उद्देश्य दिखाना है कि सुगम्य भारत अभियान के तीन स्तंभ व्यवहार में कैसे दिखते हैं।
- निर्मित वातावरण
- ज़िला कार्यालय की पहली मंज़िल पर आवेदन-खिड़की है, पर रैंप नहीं है। सुधार: रैंप, सुगम शौचालय और ज़मीनी मंज़िल पर खिड़की।
- परिवहन
- ज़िले की बस में पहिया-कुर्सी चढ़ाने की व्यवस्था नहीं है। सुधार: निचले तल की बसें और स्टॉप पर सुगम मंच।
- सूचना और संचार
- वेबसाइट पर स्क्रीन-रीडर के अनुकूल पाठ और फ़ॉर्म नहीं हैं। सुधार: सुगम वेबसाइट और सांकेतिक भाषा में सूचना।
सीख
कार्य-उदाहरण: आरक्षण की गणना (कल्पित रिक्तियाँ)
हल सहित उदाहरणधारा 34 के 4 प्रतिशत की गिनती
दिया है
- प्रतिशत वास्तविक हैं (RPwD अधिनियम, 3% से 4%); रिक्तियों की संख्या कल्पित है।
- एक विभाग में सीधी भर्ती की 200 रिक्तियाँ हैं।
- 1चरण 1: पहले का हिस्सा 3 प्रतिशत के पुराने स्तर पर 200 x 3/100 = 6 पद।
- 2चरण 2: अब का हिस्सा 4 प्रतिशत पर 200 x 4/100 = 8 पद, यानी 2 पद अधिक।
- 3चरण 3: उत्तर में लिखें आरक्षण केवल बेंचमार्क दिव्यांगता (40% या अधिक) वाले व्यक्तियों के लिए है, इसलिए उत्तर में "40% या अधिक" शर्त साथ लिखें।
निष्कर्ष: संख्याओं का यह सरल रूपांतरण परिवर्तन के प्रभाव को स्पष्ट दिखाता है.
अभ्यास के प्रश्न
अभ्यास प्रश्नलगभग 15 शब्द
बेंचमार्क दिव्यांगता से क्या अभिप्राय है?
आदर्श उत्तर
RPwD अधिनियम में बेंचमार्क दिव्यांगता वह है जिसमें दिव्यांगता 40 प्रतिशत या उससे अधिक हो।
अभ्यास प्रश्नलगभग 50 शब्द
दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 की प्रमुख विशेषताएँ बताइए।
आदर्श उत्तर
अधिनियम 19 अप्रैल 2017 से लागू हुआ और 1995 के क़ानून की जगह ली। इसमें श्रेणियाँ 7 से बढ़कर 21 हुईं। बेंचमार्क दिव्यांगता 40 प्रतिशत या अधिक है। नौकरियों में आरक्षण 4 प्रतिशत और उच्च शिक्षा में 5 प्रतिशत है। हर ज़िले में विशेष न्यायालय का प्रावधान है।
अभ्यास प्रश्नलगभग 100 शब्द
भारतीय समाज में दिव्यांगों की समस्याओं और उनके समाधान की विवेचना कीजिए।
आदर्श उत्तर
जनगणना 2011 के अनुसार भारत में 2.68 करोड़ दिव्यांग हैं, जो आबादी का 2.21 प्रतिशत हैं। उनके सामने सुगम्यता की कमी, शिक्षा और रोज़गार में बाधाएँ, सामाजिक पूर्वाग्रह और आर्थिक निर्भरता प्रमुख समस्याएँ हैं। दिव्यांग स्त्रियों को दोहरा नुक़सान होता है।
समाधान के लिए RPwD अधिनियम 2016 अधिकार-आधारित ढाँचा देता है, जिसमें 21 श्रेणियाँ, नौकरी में 4 प्रतिशत और उच्च शिक्षा में 5 प्रतिशत आरक्षण है। सुगम्य भारत अभियान सुगम्यता पर काम करता है। इसके साथ कौशल-प्रशिक्षण, सहायक उपकरण, समावेशी शिक्षा और समाज में संवेदनशीलता भी ज़रूरी है। अंततः लक्ष्य दया नहीं, समान अवसर और गरिमा है।
उत्तर कैसे लिखें (10 अंक, 100 शब्द)
भूमिका
प्रश्न: "भारतीय समाज में दिव्यांगों के मुद्दे और उनके निवारण के उपाय बताइए।" पहले वाक्य में चिकित्सकीय बनाम सामाजिक मॉडल का एक वाक्य दें।
मुख्य भाग
- आँकड़ा: जनगणना 2011, 2.68 करोड़ (2.21%)
- मुद्दे: सुगम्यता, शिक्षा-रोज़गार, सामाजिक रवैया, आर्थिक निर्भरता, दोहरा नुक़सान
- क़ानून: RPwD 2016 (21 श्रेणियाँ; 40% बेंचमार्क; 4% और 5% आरक्षण); UNCRPD (2007)
- योजनाएँ: सुगम्य भारत अभियान (2015), UDID, IGNDPS
- सुझाव: नीतिगत, सामाजिक, आर्थिक
निष्कर्ष
निष्कर्ष: दिव्यांगता व्यक्ति की कमी नहीं, समाज की बाधाओं का परिणाम है; इन्हें हटाना ही असली सशक्तीकरण है।
अतिरिक्त मूल्य
- सामाजिक मॉडल की भाषा
- चारों संख्याएँ: 21, 40%, 4%, 5%
- दिव्यांग स्त्रियों का दोहरा नुक़सान
त्वरित पुनरावृत्ति
- जनगणना 2011: 2.68 करोड़ (2.21%); पुरुष लगभग 1.50 करोड़, स्त्रियाँ 1.18 करोड़; 8 प्रकार गिने गए (2001 में 5)
- चिकित्सकीय मॉडल: व्यक्ति में कमी; सामाजिक मॉडल: समाज की बाधाएँ
- RPwD अधिनियम 2016: 19 अप्रैल 2017 से लागू; 7 से 21 श्रेणियाँ; नियम 15 जून 2017
- बेंचमार्क दिव्यांगता 40% या अधिक (धारा 2(r)); नौकरी 4% (धारा 34); उच्च शिक्षा 5% (धारा 32)
- सुगम्य भारत अभियान: 3 दिसंबर 2015; तीन स्तंभ
- UNCRPD: हस्ताक्षर 30 मार्च 2007, अनुसमर्थन 1 अक्टूबर 2007
- IGNDPS: 300 रुपये प्रति माह (18-79 वर्ष, गंभीर या बहु-दिव्यांगता, BPL; 80+ पर 500)
याद रखने योग्य शब्द
- दिव्यांग
- बेंचमार्क दिव्यांगता
- सामाजिक मॉडल
- RPwD अधिनियम
- सुगम्य भारत अभियान
- UNCRPD
- UDID
- IGNDPS