तलाक़ (Divorce): क़ानूनी आधार, निर्णय और सामाजिक पक्ष
तलाक़ की अवधारणा, हिंदू विवाह अधिनियम के आधार और धारा 13B, तीन सर्वोच्च न्यायालय निर्णय, तीन तलाक़ का कानून और NFHS-5 के आँकड़े।
- तलाक़
- आपसी सहमति
- अनुच्छेद 142
- तीन तलाक़
- न्यायिक पृथक्करण
सिलेबस में
RPSC सिलेबस (09-01-2026), पेपर I, इकाई III, भाग क (समाजशास्त्र): "Challenges and issues before Indian society: dowry, divorce, corruption, poverty, prostitution, unemployment and drug addiction." इस पृष्ठ पर तलाक़ है; दहेज, भ्रष्टाचार, ग़रीबी आदि के अलग पृष्ठ हैं।
इस विषय को क्यों पढ़ें
याद रखें
- संकलित छह पेपरों (2013, 2016, 2018, 2021, 2023, 2024) में पेपर I के समाजशास्त्र खंड में तलाक़ पर सीधा प्रश्न नहीं मिला। फिर भी सिलेबस की पंक्ति में उसका नाम है, इसलिए यह पृष्ठ क़ानूनी आधारों, सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों और सामाजिक पक्ष के साथ 2, 5 और 10 अंक के उत्तरों की तैयारी के लिए है।
- इस पंक्ति से आया पास का प्रश्न दहेज पर है (2023 में 2 अंक: दहेज प्रथा के दोष)। यानी "चुनौतियाँ" वाली पंक्ति में सामाजिक समस्या और क़ानून, दोनों का कोण पूछा जा सकता है (2013-2024 के पेपरों में देखा गया)।
- तलाक़ का विषय निर्णयों से भरा है: Amardeep Singh (2017), Shayara Bano (2017) और Shilpa Sailesh (2023)। परीक्षक आँकड़ा या निर्णय नाम और वर्ष के साथ माँगे तो उत्तर तुरंत वज़नदार हो जाता है।
पहले सरल भाषा में: गाँठ और उसका खोलना
शादी को गाँठ मान लीजिए, जो पूरे समाज की साक्षी में बाँधी जाती है। यदि गाँठ इतनी कसी रह जाए कि दम घुटने लगे, तो उसे खोलने का कोई सभ्य रास्ता चाहिए। तलाक़ (Divorce) वही रास्ता है: एक वैध विवाह को न्यायालय के आदेश से समाप्त करना। इसे केवल "रिश्ता टूटना" कहना ग़लत है, क्योंकि पति-पत्नी अलग रहने लगें तब भी क़ानून की निगाह में विवाह तब तक चलता है, जब तक न्यायालय डिक्री न दे।
समाज इसे इतनी गंभीरता से इसलिए लेता है कि विवाह टूटने का असर केवल दो लोगों पर नहीं पड़ता। बच्चे, दोनों के परिवार, संपत्ति, भरण-पोषण और समाज में प्रतिष्ठा, सब प्रभावित होते हैं। इसी कारण क़ानून ने तलाक़ को आसान भी नहीं बनाया और असंभव भी नहीं: सीमित आधार, कुछ प्रतीक्षा-अवधियाँ और सुलह के प्रयास रखे गए हैं।
परीक्षा के लिए एक पंक्ति: तलाक़ (विवाह-विच्छेद) न्यायालय की डिक्री से वैध विवाह का अंत है, जिससे दोनों पक्ष दोबारा विवाह करने के लिए स्वतंत्र हो जाते हैं। यह परिभाषा हमारा संक्षिप्त रूप है; क़ानूनी शब्द अधिनियम की धाराओं में है।
तलाक़, पृथक्करण और विवाह का शून्य होना: चार अलग अवधारणाएँ
परीक्षा में इन चार शब्दों का घालमेल सबसे आम है, इसलिए पहले इन्हें अलग कर लीजिए। दांपत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना (restitution of conjugal rights) हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 9 में है: जब एक पक्ष बिना उचित कारण के दूसरे का साथ छोड़ दे, तो पीड़ित पक्ष ज़िला न्यायालय में साथ रहने का आदेश माँग सकता है। धारा 10 में न्यायिक पृथक्करण (judicial separation) है: इसमें साथ रहने की बाध्यता तो ख़त्म हो जाती है, पर विवाह क़ायम रहता है। धारा 13 में तलाक़ है, जिसमें विवाह समाप्त होता है।
चौथी अवधारणा विवाह को शून्य या शून्यकरणीय घोषित कराना है। धारा 11 में कुछ शर्तों (जैसे पहले से जीवित जीवनसाथी, निषिद्ध नातेदारी या सपिंड संबंध) का उल्लंघन होने पर विवाह शून्य है। धारा 12 में कुछ आधारों (जैसे नपुंसकता, बल या छल से ली गई सहमति) पर विवाह शून्यकरणीय है। यहाँ विवाह को शुरू से अवैध माना जाता है या रद्द कराया जाता है; तलाक़ में वैध विवाह बाद में समाप्त होता है। यह अंतर उत्तर में एक पंक्ति में लिख देना चाहिए।
चार अवधारणाएँ: अंतर
| अवधारणा | धारा (हिंदू विवाह अधिनियम) | विवाह का क्या होता है | पुनर्विवाह |
|---|---|---|---|
| दांपत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना | 9 | विवाह क़ायम; साथ रहने का आदेश | नहीं |
| न्यायिक पृथक्करण | 10 | विवाह क़ायम; साथ रहने की बाध्यता समाप्त | नहीं |
| शून्य या शून्यकरणीय विवाह | 11 और 12 | विवाह शून्य या रद्द कराया जाता है | विवाह रद्द होने पर |
| तलाक़ | 13 और 13B | वैध विवाह की डिक्री से समाप्ति | हाँ, धारा 15 के अनुसार |
तलाक़ के आधार: हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13
धारा 13(1) में पति या पत्नी, कोई भी, इन आधारों पर तलाक़ की याचिका दे सकता है। पहला, विवाह के बाद जीवनसाथी के अलावा किसी से स्वेच्छा से यौन संबंध। दूसरा, क्रूरता। तीसरा, अभित्याग (desertion), यानी याचिका से ठीक पहले कम-से-कम दो वर्ष तक लगातार छोड़ देना। चौथा, दूसरे धर्म में धर्म-परिवर्तन। पाँचवाँ, असाध्य विकृत-चित्तता या ऐसा मानसिक विकार कि याचिकाकर्ता से उसके साथ रहने की अपेक्षा नहीं की जा सकती। छठा, संक्रामक रूप का यौन रोग। सातवाँ, किसी धार्मिक संप्रदाय में प्रवेश कर संसार का त्याग। आठवाँ, सात वर्ष या अधिक से लापता, जिसके बारे में स्वाभाविक रूप से सूचना पाने वालों को भी पता न हो।
धारा 13(1क) में एक अलग आधार है: न्यायिक पृथक्करण की डिक्री के बाद एक वर्ष या अधिक तक साथ रहना फिर से शुरू न हुआ हो, या दांपत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना की डिक्री के बाद एक वर्ष या अधिक तक पुनर्स्थापना न हुई हो। धारा 13(2) में पत्नी के कुछ अतिरिक्त आधार हैं: कानून लागू होने से पहले पति का दोबारा विवाह, पति द्वारा बलात्कार, गुदा-मैथुन या पशु-गमन का दोषी होना, भरण-पोषण की डिक्री या आदेश के बाद एक वर्ष तक साथ रहना फिर से शुरू न होना, और यह कि 15 वर्ष की आयु से पहले हुए विवाह को उसने 15 से 18 वर्ष की आयु के बीच अस्वीकार कर दिया।
धारा 13क के अनुसार जिन याचिकाओं में तलाक़ माँगा गया हो, न्यायालय परिस्थितियों को देखकर, कुछ आधारों को छोड़कर, तलाक़ की जगह न्यायिक पृथक्करण भी दे सकता है। यह एक संतुलन है: हर विवाद का अंतिम समाधान तलाक़ ही हो, ज़रूरी नहीं।
तलाक़ के आधार: एक नज़र में
| श्रेणी | आधार | टिप्पणी |
|---|---|---|
| दोनों पक्षों के लिए धारा 13(1) | व्यभिचार, क्रूरता, 2 वर्ष का अभित्याग | सबसे अधिक चर्चित आधार |
| दोनों पक्षों के लिए धारा 13(1) | धर्म-परिवर्तन, संसार का त्याग | विशेष विवाह अधिनियम में नहीं |
| दोनों पक्षों के लिए धारा 13(1) | मानसिक विकार, संक्रामक यौन रोग, 7 वर्ष से लापता | विशेष विवाह अधिनियम में भी |
| धारा 13(1क) | पृथक्करण या पुनर्स्थापना की डिक्री के बाद 1 वर्ष तक सुलह नहीं | दोनों के लिए |
| केवल पत्नी, धारा 13(2) | बलात्कार आदि; भरण-पोषण के बाद 1 वर्ष; 15 वर्ष से पहले विवाह का अस्वीकार | कुछ आधार केवल पुराने विवाहों पर |
| विशेष विवाह अधिनियम धारा 27 | 7 वर्ष या अधिक कारावास भुगतना | हिंदू विवाह अधिनियम में नहीं |
तालिका हमारा संक्षेप है; पूरे शब्द अधिनियम में देखिए।
आपसी सहमति से तलाक़: धारा 13B
आपसी सहमति से तलाक़ (divorce by mutual consent) सबसे सुलझा रास्ता है, क्योंकि इसमें दोष सिद्ध नहीं करना पड़ता। धारा 13B(1) में दोनों पक्ष मिलकर ज़िला न्यायालय में याचिका देते हैं, इस आधार पर कि वे एक वर्ष या उससे अधिक से अलग रह रहे हैं, साथ नहीं रह पाए और आपसी सहमति से विवाह समाप्त करना चाहते हैं। धारा 13B(2) के अनुसार याचिका के छह माह से पहले नहीं और अठारह माह के बाद नहीं, दोनों पक्षों के संयुक्त प्रस्ताव पर, यदि याचिका वापस न ली गई हो, तो न्यायालय सुनवाई और जाँच के बाद तलाक़ की डिक्री दे देता है।
यह छह से अठारह महीने का अंतर सोचने के लिए है: इसे "cooling off" अवधि कहा जाता है। विशेष विवाह अधिनियम की धारा 28 में भी यही एक वर्ष और छह से अठारह माह की व्यवस्था है। 1976 के संशोधन के उद्देश्य-कथन के अनुसार छह माह की यह अवधि पहले के एक वर्ष से घटाई गई थी (विशेष विवाह अधिनियम के उद्देश्य-कथन में उल्लेख)।
दो और बाधाएँ याद रखिए। धारा 14 के अनुसार विवाह के एक वर्ष के भीतर तलाक़ की याचिका स्वीकार नहीं होती, हालाँकि असाधारण कठिनाई या असाधारण दुराचरण के मामले में न्यायालय अनुमति दे सकता है। धारा 21B में प्रयास यह है कि याचिका का निपटारा नोटिस की तामील से छह माह में हो। विशेष विवाह अधिनियम की धारा 29 में भी पहले एक वर्ष की यही रोक है।
सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय: प्रतीक्षा-अवधि से अपूरणीय विघटन तक
पहला निर्णय Amardeep Singh बनाम Harveen Kaur (12 सितंबर 2017) है। न्यायमूर्ति आदर्श कुमार गोयल और उदय उमेश ललित की पीठ ने कहा कि धारा 13B(2) की छह माह की अवधि निर्देशात्मक (directory) है, अनिवार्य नहीं, इसलिए न्यायालय उसे छोड़ सकता है। पर चार शर्तें हैं: एक वर्ष की पृथकता और छह माह की अवधि, दोनों पहले प्रस्ताव से पहले ही पूरी हो चुकी हों; मध्यस्थता और सुलह के सभी प्रयास विफल रहे हों; पक्षों ने गुज़ारा-भत्ता और बच्चे की अभिरक्षा जैसे मुद्दे वास्तव में सुलझा लिए हों; और प्रतीक्षा से केवल पीड़ा बढ़ेगी। पहले प्रस्ताव के एक सप्ताह बाद छूट का आवेदन दिया जा सकता है।
दूसरा निर्णय Shilpa Sailesh बनाम Varun Sreenivasan (1 मई 2023) है, जिसे पाँच न्यायाधीशों की संविधान पीठ (न्यायमूर्ति कौल, खन्ना, ओका, नाथ और माहेश्वरी) ने दिया, न्यायमूर्ति संजीव खन्ना के लिखे निर्णय में। पीठ ने कहा कि अनुच्छेद 142 के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय पक्षों में समझौता होने पर दूसरे प्रस्ताव की प्रक्रिया से बँधे बिना आपसी सहमति से तलाक़ दे सकता है, और विवाह के पूर्ण तथा अपूरणीय विघटन (irretrievable breakdown) पर, भले दूसरा पक्ष विरोध करे, तलाक़ देने का विवेकाधिकार भी रखता है। यह शक्ति सावधानी और संतुलन के साथ प्रयोग होनी है।
यहाँ एक ज़रूरी सावधानी: "अपूरणीय विघटन" हिंदू विवाह अधिनियम में तलाक़ का आधार अभी लिखित रूप में नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय इसे अनुच्छेद 142 की अपनी विशेष शक्ति से लागू करता है; ज़िला न्यायालय इस आधार पर तलाक़ नहीं दे सकते। उत्तर में इस भेद को लिखना आपकी समझ दिखाता है।
मुस्लिम महिलाएँ और तीन तलाक़
मुस्लिम समुदाय में विवाह-विच्छेद का तरीक़ा हिंदू विवाह अधिनियम से नहीं, उनके निजी क़ानून से चलता है। इस संदर्भ का मुख्य निर्णय Shayara Bano बनाम भारत संघ (22 अगस्त 2017) है, जिसमें पाँच न्यायाधीशों की पीठ ने 3:2 के बहुमत से तलाक़-ए-बिद्दत, यानी एक बार में तीन तलाक़, को रद्द कर दिया। न्यायमूर्ति नरीमन और ललित ने 1937 के अधिनियम की धारा 2 को तीन तलाक़ को मान्यता देने की हद तक अनुच्छेद 13(1) के अंतर्गत शून्य ठहराया, "मनमाना" होने के आधार पर।
इसके बाद संसद ने मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) अधिनियम, 2019 बनाया। PIB के तथ्य-पत्र के अनुसार यह एक बार में तीन बार तलाक़ बोलने से हुए तलाक़ को शून्य और अवैध घोषित करता है और पति के लिए तीन वर्ष तक का कारावास तथा जुर्माना रखता है; पीड़ित महिला को बच्चों की अभिरक्षा और निर्वाह-भत्ते का अधिकार भी मिलता है। राज्यसभा ने इसे 30 जुलाई 2019 को पारित किया।
परीक्षा के लिए दो वाक्य याद रखिए: न्यायालय ने तीन तलाक़ रद्द किया (2017), और संसद ने उसे अपराध बनाकर क़ानून से सुरक्षित किया (2019)। यह उदाहरण बताता है कि सामाजिक सुधार न्यायपालिका और विधायिका, दोनों के सहयोग से हुआ।
सामाजिक पक्ष: कारण, प्रभाव और उपाय (विश्लेषण)
तलाक़ के कारण अक्सर बहुस्तरीय होते हैं: आपसी तालमेल की कमी, आर्थिक दबाव, घरेलू हिंसा, विवाह के बाद अपेक्षाओं का टकराव, परिवार का अनुचित हस्तक्षेप, और स्त्रियों में बढ़ती आत्मनिर्भरता व अधिकार-बोध। ये कारण सर्वेक्षण से सिद्ध नहीं होते, इसलिए इन्हें हमारी समाजशास्त्रीय व्याख्या की तरह लिखिए, आँकड़े की तरह नहीं।
प्रभाव दोतरफ़ा हैं। एक ओर यह हिंसक या असहनीय विवाह से निकलने का क़ानूनी रास्ता है, जो विशेषकर महिलाओं की सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है। दूसरी ओर बच्चों पर मानसिक असर, महिलाओं की आर्थिक असुरक्षा और सामाजिक कलंक जैसी चुनौतियाँ हैं। इसीलिए न्यायालयों ने पहले मध्यस्थता और सुलह के प्रयासों पर ज़ोर दिया है (Amardeep Singh की शर्तों में यह साफ़ है)।
उपाय के रूप में विवाह-पूर्व परामर्श, पारिवारिक न्यायालयों में मध्यस्थता, महिलाओं की आर्थिक सुरक्षा और स्पष्ट भरण-पोषण व अभिरक्षा के नियम गिने जा सकते हैं। उत्तर में हमेशा संतुलन रखिए: तलाक़ को केवल "सामाजिक विघटन" कहना भी अधूरा है और केवल "आज़ादी" कहना भी।
राजस्थान का पहलू
NFHS-5 (2019-21) की राजस्थान रिपोर्ट के अनुसार 15-49 वर्ष की महिलाओं में तलाक़शुदा, अलग रह रही या परित्यक्त महिलाएँ मिलाकर 0.7% हैं और इसी आयु के पुरुषों में 0.6%। भारत रिपोर्ट में महिलाओं के लिए तलाक़शुदा 0.3%, अलग रह रही 0.7% और परित्यक्त 0.1% हैं, यानी जोड़ने पर लगभग 1.1% (यह जोड़ हमारी गणना है)। ये भारत सरकार (स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय) के सर्वेक्षण-अनुमान हैं और 15-49 वर्ष की सभी महिलाओं पर आधारित हैं, केवल विवाहित महिलाओं पर नहीं; पहुँच की तिथि 2 अक्टूबर 2026।
NFHS-5 (2019-21): 15-49 वर्ष की महिलाओं की वैवाहिक स्थिति (प्रतिशत)
| स्थिति | भारत | राजस्थान |
|---|---|---|
| कभी विवाहित नहीं | 23.6 | 24.6 |
| वर्तमान में विवाहित | 72.0 | 71.5 |
| विधवा | 3.1 | 2.3 |
| तलाक़शुदा / अलग रह रही / परित्यक्त | 0.3 / 0.7 / 0.1 (अलग-अलग) | 0.7 (मिलाकर) |
भारत रिपोर्ट में तीनों स्थितियाँ अलग दिखाई गई हैं; राजस्थान रिपोर्ट में मिलाकर। 'गौना न होने वाली विवाहिता' की श्रेणी तालिका में अलग है, इसलिए कुल 100% नहीं बैठता।
तलाक़ का नक्शा
तलाक़
संबंधित अवधारणाएँ
हिंदू विवाह अधिनियम
- धारा 9: पुनर्स्थापना
- धारा 10: न्यायिक पृथक्करण
- धारा 11 और 12: शून्य और शून्यकरणीय
आधार
धारा 13
- व्यभिचार, क्रूरता, अभित्याग (2 वर्ष)
- धर्म-परिवर्तन, मानसिक विकार, रोग
- पत्नी के अतिरिक्त आधार 13(2)
आपसी सहमति
धारा 13B और विशेष विवाह धारा 28
- 1 वर्ष अलग रहना
- दूसरा प्रस्ताव 6 से 18 महीने
- Amardeep 2017: अवधि निर्देशात्मक
न्यायालय
निर्णय
- Shilpa Sailesh 2023: अनुच्छेद 142
- Shayara Bano 2017: तीन तलाक़ रद्द
- 2019 का अधिनियम
आपसी सहमति से तलाक़: चरण
विवाह के 1 वर्ष बाद
धारा 14: अपवाद छोड़कर इससे पहले याचिका नहीं
1 वर्ष से अलग रहना
धारा 13B(1) की शर्त
संयुक्त याचिका (पहला प्रस्ताव)
ज़िला न्यायालय में दोनों मिलकर
6 से 18 महीने के भीतर
दूसरा प्रस्ताव; अवधि छोड़ी जा सकती है (Amardeep 2017)
सुनवाई और डिक्री
न्यायालय संतुष्ट हो तो तलाक़ की डिक्री
मुख्य तथ्य
- तलाक़ के आधार
- हिंदू विवाह अधिनियम धारा 13(1), 13(1क), 13(2); विशेष विवाह अधिनियम धारा 27
- आपसी सहमति
- 1 वर्ष की पृथकता; दूसरा प्रस्ताव 6 माह के बाद और 18 माह के भीतर (धारा 13B; विशेष विवाह धारा 28)
- पहले वर्ष की रोक
- धारा 14 (हिंदू विवाह अधिनियम) और धारा 29 (विशेष विवाह अधिनियम): विवाह के 1 वर्ष के भीतर याचिका नहीं, असाधारण कठिनाई के अपवाद सहित
- Amardeep Singh
- 12 सितंबर 2017; धारा 13B(2) की 6 माह की अवधि निर्देशात्मक; चार शर्तें
- Shilpa Sailesh
- 1 मई 2023; पाँच न्यायाधीश; अनुच्छेद 142 के अंतर्गत अपूरणीय विघटन पर तलाक़ का विवेक; क़ानूनी आधार नहीं
- Shayara Bano
- 22 अगस्त 2017; 3:2 के बहुमत से तीन तलाक़ (तलाक़-ए-बिद्दत) रद्द
- मुस्लिम महिला अधिनियम, 2019
- एक बार में तीन तलाक़ शून्य और अवैध; 3 वर्ष तक का कारावास और जुर्माना; राज्यसभा से पारित 30 जुलाई 2019
- NFHS-5, भारत (महिलाएँ 15-49)
- तलाक़शुदा 0.3%, अलग रह रही 0.7%, परित्यक्त 0.1% (2019-21)
- NFHS-5, राजस्थान (महिलाएँ 15-49)
- तलाक़शुदा, अलग रह रही और परित्यक्त मिलाकर 0.7% (2019-21)
- सिलेबस की पंक्ति
- RPSC सिलेबस, 09-01-2026, पेपर I, इकाई III (क)
परीक्षा में आम ग़लतियाँ
याद रखें
- "अपूरणीय विघटन" को हिंदू विवाह अधिनियम का तलाक़-आधार लिख देना। वह क़ानून में आधार नहीं है; सर्वोच्च न्यायालय उसे अनुच्छेद 142 की अपनी शक्ति से लागू करता है (Shilpa Sailesh, 2023)।
- Amardeep Singh में छह माह की अवधि को "ख़त्म कर दिया" बताना। न्यायालय ने उसे अनिवार्य नहीं, निर्देशात्मक कहा और शर्तों के साथ छोड़ने की छूट दी।
- न्यायिक पृथक्करण और तलाक़ को एक बताना। पृथक्करण में विवाह क़ायम रहता है और पुनर्विवाह नहीं हो सकता।
- आपसी सहमति में "दो वर्ष" लिख देना। शर्त एक वर्ष की पृथकता है; दूसरे प्रस्ताव की खिड़की छह से अठारह माह है।
- तीन तलाक़ पर केवल 2019 का अधिनियम लिख देना। 2017 के निर्णय का संदर्भ भी लिखिए, और याद रखिए कि 2019 का अधिनियम पति को कारावास का प्रावधान देता है।
- NFHS के "तलाक़शुदा" प्रतिशत को तलाक़ की दर बता देना। वह 15-49 वर्ष की सभी महिलाओं में उस स्थिति की हिस्सेदारी है, तलाक़ों की वार्षिक दर नहीं।
केस स्टडी: संविधान पीठ का 2023 का निर्णय
केस स्टडीShilpa Sailesh बनाम Varun Sreenivasan
यह वास्तविक निर्णय है (सर्वोच्च न्यायालय, संविधान पीठ, 2023)।
- तारीख़ और पीठ
- 1 मई 2023 को पाँच न्यायाधीशों की संविधान पीठ (संजय किशन कौल, संजीव खन्ना, अभय एस. ओका, विक्रम नाथ, जे.के. माहेश्वरी) ने निर्णय दिया; निर्णय न्यायमूर्ति संजीव खन्ना ने लिखा।
- प्रश्न
- क्या अनुच्छेद 142 के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13B(2) की छह माह की अवधि को छोड़ या घटा सकता है? दूसरा प्रश्न: क्या वह विवाह के पूर्ण और अपूरणीय विघटन के आधार पर, दूसरे पक्ष के विरोध के बावजूद, तलाक़ दे सकता है?
- निर्णय
- पीठ ने दोनों प्रश्नों का उत्तर हाँ में दिया। अनुच्छेद 142(1) के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय समझौते की स्थिति में दूसरे प्रस्ताव की प्रक्रिया से बँधे बिना आपसी सहमति से तलाक़ दे सकता है, और जब तथ्य दिखाएँ कि विवाह पूरी तरह विफल हो चुका और साथ रहने की कोई संभावना नहीं, तब "पूर्ण न्याय" के लिए अपूरणीय विघटन पर भी विवाह भंग कर सकता है।
- सीमा
- यह शक्ति सावधानी से, Amardeep Singh और Amit Kumar में बताए कारकों को ध्यान में रखकर प्रयोग होनी है, और न्यायालय को विरोध कर रहे पक्ष की स्थिति भी संतुलित करनी है। निर्णय हिंदू विवाह अधिनियम में अपूरणीय विघटन को आधार के रूप में जोड़ता नहीं है।
सीख
उत्तर में निर्णय का नाम, तारीख़, अनुच्छेद 142 और "क़ानूनी आधार नहीं, पर सर्वोच्च न्यायालय का विवेक" का भेद लिखिए। इससे प्रश्न की गहराई दिखती है।
कार्य-उदाहरण: आपसी सहमति से तलाक़ की समय-रेखा निकालना (कल्पित)
हल सहित उदाहरणतिथियों की गणना
दिया है
- यह उदाहरण समझाने के लिए गढ़ा गया है; पात्र और तिथियाँ वास्तविक नहीं हैं।
- एक दंपती का विवाह 5 जनवरी 2023 को हुआ। वे 1 फ़रवरी 2024 से अलग रह रहे हैं और हिंदू विवाह अधिनियम के अंतर्गत आपसी सहमति से तलाक़ चाहते हैं। पहली याचिका की सबसे पहली वैध तिथि और बाद की समय-सीमा निकालनी है।
- 1चरण 1: धारा 14 की जाँच विवाह को एक वर्ष पूरा हुआ 5 जनवरी 2024 को, इसलिए सामान्यतः याचिका उसके बाद दी जा सकती है। यह रोक यहाँ बाधा नहीं।
- 2चरण 2: धारा 13B(1) की जाँच एक वर्ष की पृथकता 1 फ़रवरी 2024 से 1 फ़रवरी 2025 को पूरी होती है। इसलिए पहली संयुक्त याचिका 1 फ़रवरी 2025 के बाद दी जा सकती है। मान लीजिए वह 10 फ़रवरी 2025 को दी गई।
- 3चरण 3: दूसरे प्रस्ताव की खिड़की धारा 13B(2) के अनुसार दूसरा प्रस्ताव याचिका के छह माह से पहले नहीं और अठारह माह के बाद नहीं: 10 अगस्त 2025 से 10 अगस्त 2026 के बीच।
- 4चरण 4: छूट का विकल्प Amardeep Singh (2017) के अनुसार यदि सुलह के प्रयास विफल हों और सभी मुद्दे सुलझ गए हों, तो छह माह की अवधि छोड़ने के लिए पहले प्रस्ताव के एक सप्ताह बाद (यानी 17 फ़रवरी 2025 के बाद) आवेदन दिया जा सकता है; छूट न्यायालय के विवेक पर है।
निष्कर्ष: निष्कर्ष: सामान्य क्रम में डिक्री की पात्रता का समय 10 अगस्त 2025 से 10 अगस्त 2026 के बीच है। उत्तर में तिथि-गणना के साथ धारा और निर्णय का नाम लिखें।
अभ्यास प्रश्न
अभ्यास प्रश्नलगभग 15 शब्द
आपसी सहमति से तलाक़ क्या है?
आदर्श उत्तर
दोनों पक्षों की संयुक्त याचिका पर, एक वर्ष अलग रहने के बाद, न्यायालय का तलाक़ (धारा 13B)।
अभ्यास प्रश्नलगभग 50 शब्द
न्यायिक पृथक्करण और तलाक़ में अंतर बताइए।
आदर्श उत्तर
न्यायिक पृथक्करण में साथ रहने की बाध्यता समाप्त हो जाती है, पर विवाह क़ायम रहता है और पुनर्विवाह संभव नहीं। तलाक़ में न्यायालय की डिक्री से विवाह समाप्त होता है और दोनों पक्ष पुनर्विवाह के लिए स्वतंत्र हो जाते हैं। हिंदू विवाह अधिनियम में पृथक्करण धारा 10 में और तलाक़ धारा 13 में है।
अभ्यास प्रश्नलगभग 100 शब्द
तलाक़ के क़ानूनी आधारों और सर्वोच्च न्यायालय के हाल के निर्णयों का मूल्यांकन कीजिए।
आदर्श उत्तर
हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13 में व्यभिचार, क्रूरता, दो वर्ष का अभित्याग, मानसिक विकार जैसे आधार हैं; धारा 13B में आपसी सहमति से, एक वर्ष की पृथकता और छह से अठारह माह की खिड़की के साथ। Amardeep Singh (2017) ने छह माह की अवधि निर्देशात्मक कही, और Shilpa Sailesh (2023) की संविधान पीठ ने अनुच्छेद 142 के अंतर्गत अपूरणीय विघटन पर तलाक़ का विवेक माना, पर यह क़ानूनी आधार नहीं है। Shayara Bano (2017) और 2019 के अधिनियम ने तीन तलाक़ समाप्त किया। अतः क़ानून सुलह और अधिकार के बीच संतुलन बना रहा है।
उत्तर कैसे लिखें (10 अंक, 100 शब्द)
भूमिका
प्रश्न: "भारत में तलाक़ के क़ानूनी ढाँचे और सामाजिक प्रभाव की विवेचना कीजिए।" पहले वाक्य में परिभाषा: न्यायालय की डिक्री से वैध विवाह की समाप्ति।
मुख्य भाग
- क़ानूनी ढाँचा: हिंदू विवाह अधिनियम धारा 13, 13B; विशेष विवाह अधिनियम धारा 27 और 28
- समयावधि: धारा 14 (1 वर्ष), 13B (1 वर्ष की पृथकता, 6 से 18 माह)
- न्यायिक विकास: Amardeep Singh (2017), Shilpa Sailesh (2023), Shayara Bano (2017); 2019 का अधिनियम
- सामाजिक प्रभाव: महिलाओं की सुरक्षा बनाम बच्चों और आर्थिक असुरक्षा की चुनौती (विश्लेषण)
- आँकड़ा: NFHS-5 में तलाक़शुदा और अलग रह रही महिलाओं का हिस्सा कम; दर नहीं
निष्कर्ष
निष्कर्ष: तलाक़ को सुलह के प्रयासों, सुरक्षित भरण-पोषण और बच्चों के हित के साथ संतुलित करने वाली नीति ही समाज और व्यक्ति, दोनों के हित में है।
अतिरिक्त मूल्य
- अपूरणीय विघटन: क़ानून में आधार नहीं, अनुच्छेद 142 का विवेक
- निर्णय का नाम और वर्ष एक साथ लिखना
त्वरित पुनरावृत्ति
- तलाक़ = न्यायालय की डिक्री से वैध विवाह की समाप्ति; धारा 9, 10, 11-12, 13 के अलग अर्थ
- धारा 13(1): व्यभिचार, क्रूरता, 2 वर्ष का अभित्याग, धर्म-परिवर्तन, मानसिक विकार, रोग, संन्यास, 7 वर्ष से लापता
- 13(1क): पृथक्करण या पुनर्स्थापना के बाद 1 वर्ष; 13(2): पत्नी के अतिरिक्त आधार
- विशेष विवाह अधिनियम धारा 27: 7 वर्ष कारावास का आधार (हिंदू विवाह अधिनियम में नहीं)
- धारा 13B: 1 वर्ष की पृथकता; दूसरा प्रस्ताव 6 माह के बाद, 18 माह के भीतर
- धारा 14: विवाह के 1 वर्ष के भीतर याचिका नहीं; धारा 21B: 6 माह में निपटारे का प्रयास
- Amardeep Singh, 12-9-2017: 6 माह की अवधि निर्देशात्मक; चार शर्तें
- Shilpa Sailesh, 1-5-2023: संविधान पीठ; अनुच्छेद 142; अपूरणीय विघटन; क़ानूनी आधार नहीं
- Shayara Bano, 22-8-2017: 3:2; तीन तलाक़ रद्द; 2019 का अधिनियम: शून्य और अवैध, 3 वर्ष तक कारावास
- NFHS-5 (2019-21): राजस्थान में तलाक़शुदा, अलग रह रही और परित्यक्त महिलाएँ मिलाकर 0.7% (15-49 वर्ष)
याद रखने योग्य शब्द
- तलाक़
- आपसी सहमति
- धारा 13B
- अपूरणीय विघटन
- अनुच्छेद 142
- तीन तलाक़
- न्यायिक पृथक्करण