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समाजशास्त्र · पेपर I · इकाई III (क)

तलाक़ (Divorce): क़ानूनी आधार, निर्णय और सामाजिक पक्ष

तलाक़ की अवधारणा, हिंदू विवाह अधिनियम के आधार और धारा 13B, तीन सर्वोच्च न्यायालय निर्णय, तीन तलाक़ का कानून और NFHS-5 के आँकड़े।

  • तलाक़
  • आपसी सहमति
  • अनुच्छेद 142
  • तीन तलाक़
  • न्यायिक पृथक्करण
3 अक्टूबर 2026 को सत्यापित

सिलेबस में

RPSC सिलेबस (09-01-2026), पेपर I, इकाई III, भाग क (समाजशास्त्र): "Challenges and issues before Indian society: dowry, divorce, corruption, poverty, prostitution, unemployment and drug addiction." इस पृष्ठ पर तलाक़ है; दहेज, भ्रष्टाचार, ग़रीबी आदि के अलग पृष्ठ हैं।

इस विषय को क्यों पढ़ें

याद रखें

  • संकलित छह पेपरों (2013, 2016, 2018, 2021, 2023, 2024) में पेपर I के समाजशास्त्र खंड में तलाक़ पर सीधा प्रश्न नहीं मिला। फिर भी सिलेबस की पंक्ति में उसका नाम है, इसलिए यह पृष्ठ क़ानूनी आधारों, सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों और सामाजिक पक्ष के साथ 2, 5 और 10 अंक के उत्तरों की तैयारी के लिए है।
  • इस पंक्ति से आया पास का प्रश्न दहेज पर है (2023 में 2 अंक: दहेज प्रथा के दोष)। यानी "चुनौतियाँ" वाली पंक्ति में सामाजिक समस्या और क़ानून, दोनों का कोण पूछा जा सकता है (2013-2024 के पेपरों में देखा गया)।
  • तलाक़ का विषय निर्णयों से भरा है: Amardeep Singh (2017), Shayara Bano (2017) और Shilpa Sailesh (2023)। परीक्षक आँकड़ा या निर्णय नाम और वर्ष के साथ माँगे तो उत्तर तुरंत वज़नदार हो जाता है।

पहले सरल भाषा में: गाँठ और उसका खोलना

शादी को गाँठ मान लीजिए, जो पूरे समाज की साक्षी में बाँधी जाती है। यदि गाँठ इतनी कसी रह जाए कि दम घुटने लगे, तो उसे खोलने का कोई सभ्य रास्ता चाहिए। तलाक़ (Divorce) वही रास्ता है: एक वैध विवाह को न्यायालय के आदेश से समाप्त करना। इसे केवल "रिश्ता टूटना" कहना ग़लत है, क्योंकि पति-पत्नी अलग रहने लगें तब भी क़ानून की निगाह में विवाह तब तक चलता है, जब तक न्यायालय डिक्री न दे।

समाज इसे इतनी गंभीरता से इसलिए लेता है कि विवाह टूटने का असर केवल दो लोगों पर नहीं पड़ता। बच्चे, दोनों के परिवार, संपत्ति, भरण-पोषण और समाज में प्रतिष्ठा, सब प्रभावित होते हैं। इसी कारण क़ानून ने तलाक़ को आसान भी नहीं बनाया और असंभव भी नहीं: सीमित आधार, कुछ प्रतीक्षा-अवधियाँ और सुलह के प्रयास रखे गए हैं।

परीक्षा के लिए एक पंक्ति: तलाक़ (विवाह-विच्छेद) न्यायालय की डिक्री से वैध विवाह का अंत है, जिससे दोनों पक्ष दोबारा विवाह करने के लिए स्वतंत्र हो जाते हैं। यह परिभाषा हमारा संक्षिप्त रूप है; क़ानूनी शब्द अधिनियम की धाराओं में है।

तलाक़, पृथक्करण और विवाह का शून्य होना: चार अलग अवधारणाएँ

परीक्षा में इन चार शब्दों का घालमेल सबसे आम है, इसलिए पहले इन्हें अलग कर लीजिए। दांपत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना (restitution of conjugal rights) हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 9 में है: जब एक पक्ष बिना उचित कारण के दूसरे का साथ छोड़ दे, तो पीड़ित पक्ष ज़िला न्यायालय में साथ रहने का आदेश माँग सकता है। धारा 10 में न्यायिक पृथक्करण (judicial separation) है: इसमें साथ रहने की बाध्यता तो ख़त्म हो जाती है, पर विवाह क़ायम रहता है। धारा 13 में तलाक़ है, जिसमें विवाह समाप्त होता है।

चौथी अवधारणा विवाह को शून्य या शून्यकरणीय घोषित कराना है। धारा 11 में कुछ शर्तों (जैसे पहले से जीवित जीवनसाथी, निषिद्ध नातेदारी या सपिंड संबंध) का उल्लंघन होने पर विवाह शून्य है। धारा 12 में कुछ आधारों (जैसे नपुंसकता, बल या छल से ली गई सहमति) पर विवाह शून्यकरणीय है। यहाँ विवाह को शुरू से अवैध माना जाता है या रद्द कराया जाता है; तलाक़ में वैध विवाह बाद में समाप्त होता है। यह अंतर उत्तर में एक पंक्ति में लिख देना चाहिए।

चार अवधारणाएँ: अंतर

अवधारणाधारा (हिंदू विवाह अधिनियम)विवाह का क्या होता हैपुनर्विवाह
दांपत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना9विवाह क़ायम; साथ रहने का आदेशनहीं
न्यायिक पृथक्करण10विवाह क़ायम; साथ रहने की बाध्यता समाप्तनहीं
शून्य या शून्यकरणीय विवाह11 और 12विवाह शून्य या रद्द कराया जाता हैविवाह रद्द होने पर
तलाक़13 और 13Bवैध विवाह की डिक्री से समाप्तिहाँ, धारा 15 के अनुसार

तलाक़ के आधार: हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13

धारा 13(1) में पति या पत्नी, कोई भी, इन आधारों पर तलाक़ की याचिका दे सकता है। पहला, विवाह के बाद जीवनसाथी के अलावा किसी से स्वेच्छा से यौन संबंध। दूसरा, क्रूरता। तीसरा, अभित्याग (desertion), यानी याचिका से ठीक पहले कम-से-कम दो वर्ष तक लगातार छोड़ देना। चौथा, दूसरे धर्म में धर्म-परिवर्तन। पाँचवाँ, असाध्य विकृत-चित्तता या ऐसा मानसिक विकार कि याचिकाकर्ता से उसके साथ रहने की अपेक्षा नहीं की जा सकती। छठा, संक्रामक रूप का यौन रोग। सातवाँ, किसी धार्मिक संप्रदाय में प्रवेश कर संसार का त्याग। आठवाँ, सात वर्ष या अधिक से लापता, जिसके बारे में स्वाभाविक रूप से सूचना पाने वालों को भी पता न हो।

धारा 13(1क) में एक अलग आधार है: न्यायिक पृथक्करण की डिक्री के बाद एक वर्ष या अधिक तक साथ रहना फिर से शुरू न हुआ हो, या दांपत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना की डिक्री के बाद एक वर्ष या अधिक तक पुनर्स्थापना न हुई हो। धारा 13(2) में पत्नी के कुछ अतिरिक्त आधार हैं: कानून लागू होने से पहले पति का दोबारा विवाह, पति द्वारा बलात्कार, गुदा-मैथुन या पशु-गमन का दोषी होना, भरण-पोषण की डिक्री या आदेश के बाद एक वर्ष तक साथ रहना फिर से शुरू न होना, और यह कि 15 वर्ष की आयु से पहले हुए विवाह को उसने 15 से 18 वर्ष की आयु के बीच अस्वीकार कर दिया।

धारा 13क के अनुसार जिन याचिकाओं में तलाक़ माँगा गया हो, न्यायालय परिस्थितियों को देखकर, कुछ आधारों को छोड़कर, तलाक़ की जगह न्यायिक पृथक्करण भी दे सकता है। यह एक संतुलन है: हर विवाद का अंतिम समाधान तलाक़ ही हो, ज़रूरी नहीं।

तलाक़ के आधार: एक नज़र में

श्रेणीआधारटिप्पणी
दोनों पक्षों के लिए धारा 13(1)व्यभिचार, क्रूरता, 2 वर्ष का अभित्यागसबसे अधिक चर्चित आधार
दोनों पक्षों के लिए धारा 13(1)धर्म-परिवर्तन, संसार का त्यागविशेष विवाह अधिनियम में नहीं
दोनों पक्षों के लिए धारा 13(1)मानसिक विकार, संक्रामक यौन रोग, 7 वर्ष से लापताविशेष विवाह अधिनियम में भी
धारा 13(1क)पृथक्करण या पुनर्स्थापना की डिक्री के बाद 1 वर्ष तक सुलह नहींदोनों के लिए
केवल पत्नी, धारा 13(2)बलात्कार आदि; भरण-पोषण के बाद 1 वर्ष; 15 वर्ष से पहले विवाह का अस्वीकारकुछ आधार केवल पुराने विवाहों पर
विशेष विवाह अधिनियम धारा 277 वर्ष या अधिक कारावास भुगतनाहिंदू विवाह अधिनियम में नहीं

तालिका हमारा संक्षेप है; पूरे शब्द अधिनियम में देखिए।

आपसी सहमति से तलाक़: धारा 13B

आपसी सहमति से तलाक़ (divorce by mutual consent) सबसे सुलझा रास्ता है, क्योंकि इसमें दोष सिद्ध नहीं करना पड़ता। धारा 13B(1) में दोनों पक्ष मिलकर ज़िला न्यायालय में याचिका देते हैं, इस आधार पर कि वे एक वर्ष या उससे अधिक से अलग रह रहे हैं, साथ नहीं रह पाए और आपसी सहमति से विवाह समाप्त करना चाहते हैं। धारा 13B(2) के अनुसार याचिका के छह माह से पहले नहीं और अठारह माह के बाद नहीं, दोनों पक्षों के संयुक्त प्रस्ताव पर, यदि याचिका वापस न ली गई हो, तो न्यायालय सुनवाई और जाँच के बाद तलाक़ की डिक्री दे देता है।

यह छह से अठारह महीने का अंतर सोचने के लिए है: इसे "cooling off" अवधि कहा जाता है। विशेष विवाह अधिनियम की धारा 28 में भी यही एक वर्ष और छह से अठारह माह की व्यवस्था है। 1976 के संशोधन के उद्देश्य-कथन के अनुसार छह माह की यह अवधि पहले के एक वर्ष से घटाई गई थी (विशेष विवाह अधिनियम के उद्देश्य-कथन में उल्लेख)।

दो और बाधाएँ याद रखिए। धारा 14 के अनुसार विवाह के एक वर्ष के भीतर तलाक़ की याचिका स्वीकार नहीं होती, हालाँकि असाधारण कठिनाई या असाधारण दुराचरण के मामले में न्यायालय अनुमति दे सकता है। धारा 21B में प्रयास यह है कि याचिका का निपटारा नोटिस की तामील से छह माह में हो। विशेष विवाह अधिनियम की धारा 29 में भी पहले एक वर्ष की यही रोक है।

सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय: प्रतीक्षा-अवधि से अपूरणीय विघटन तक

पहला निर्णय Amardeep Singh बनाम Harveen Kaur (12 सितंबर 2017) है। न्यायमूर्ति आदर्श कुमार गोयल और उदय उमेश ललित की पीठ ने कहा कि धारा 13B(2) की छह माह की अवधि निर्देशात्मक (directory) है, अनिवार्य नहीं, इसलिए न्यायालय उसे छोड़ सकता है। पर चार शर्तें हैं: एक वर्ष की पृथकता और छह माह की अवधि, दोनों पहले प्रस्ताव से पहले ही पूरी हो चुकी हों; मध्यस्थता और सुलह के सभी प्रयास विफल रहे हों; पक्षों ने गुज़ारा-भत्ता और बच्चे की अभिरक्षा जैसे मुद्दे वास्तव में सुलझा लिए हों; और प्रतीक्षा से केवल पीड़ा बढ़ेगी। पहले प्रस्ताव के एक सप्ताह बाद छूट का आवेदन दिया जा सकता है।

दूसरा निर्णय Shilpa Sailesh बनाम Varun Sreenivasan (1 मई 2023) है, जिसे पाँच न्यायाधीशों की संविधान पीठ (न्यायमूर्ति कौल, खन्ना, ओका, नाथ और माहेश्वरी) ने दिया, न्यायमूर्ति संजीव खन्ना के लिखे निर्णय में। पीठ ने कहा कि अनुच्छेद 142 के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय पक्षों में समझौता होने पर दूसरे प्रस्ताव की प्रक्रिया से बँधे बिना आपसी सहमति से तलाक़ दे सकता है, और विवाह के पूर्ण तथा अपूरणीय विघटन (irretrievable breakdown) पर, भले दूसरा पक्ष विरोध करे, तलाक़ देने का विवेकाधिकार भी रखता है। यह शक्ति सावधानी और संतुलन के साथ प्रयोग होनी है।

यहाँ एक ज़रूरी सावधानी: "अपूरणीय विघटन" हिंदू विवाह अधिनियम में तलाक़ का आधार अभी लिखित रूप में नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय इसे अनुच्छेद 142 की अपनी विशेष शक्ति से लागू करता है; ज़िला न्यायालय इस आधार पर तलाक़ नहीं दे सकते। उत्तर में इस भेद को लिखना आपकी समझ दिखाता है।

मुस्लिम महिलाएँ और तीन तलाक़

मुस्लिम समुदाय में विवाह-विच्छेद का तरीक़ा हिंदू विवाह अधिनियम से नहीं, उनके निजी क़ानून से चलता है। इस संदर्भ का मुख्य निर्णय Shayara Bano बनाम भारत संघ (22 अगस्त 2017) है, जिसमें पाँच न्यायाधीशों की पीठ ने 3:2 के बहुमत से तलाक़-ए-बिद्दत, यानी एक बार में तीन तलाक़, को रद्द कर दिया। न्यायमूर्ति नरीमन और ललित ने 1937 के अधिनियम की धारा 2 को तीन तलाक़ को मान्यता देने की हद तक अनुच्छेद 13(1) के अंतर्गत शून्य ठहराया, "मनमाना" होने के आधार पर।

इसके बाद संसद ने मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) अधिनियम, 2019 बनाया। PIB के तथ्य-पत्र के अनुसार यह एक बार में तीन बार तलाक़ बोलने से हुए तलाक़ को शून्य और अवैध घोषित करता है और पति के लिए तीन वर्ष तक का कारावास तथा जुर्माना रखता है; पीड़ित महिला को बच्चों की अभिरक्षा और निर्वाह-भत्ते का अधिकार भी मिलता है। राज्यसभा ने इसे 30 जुलाई 2019 को पारित किया।

परीक्षा के लिए दो वाक्य याद रखिए: न्यायालय ने तीन तलाक़ रद्द किया (2017), और संसद ने उसे अपराध बनाकर क़ानून से सुरक्षित किया (2019)। यह उदाहरण बताता है कि सामाजिक सुधार न्यायपालिका और विधायिका, दोनों के सहयोग से हुआ।

सामाजिक पक्ष: कारण, प्रभाव और उपाय (विश्लेषण)

तलाक़ के कारण अक्सर बहुस्तरीय होते हैं: आपसी तालमेल की कमी, आर्थिक दबाव, घरेलू हिंसा, विवाह के बाद अपेक्षाओं का टकराव, परिवार का अनुचित हस्तक्षेप, और स्त्रियों में बढ़ती आत्मनिर्भरता व अधिकार-बोध। ये कारण सर्वेक्षण से सिद्ध नहीं होते, इसलिए इन्हें हमारी समाजशास्त्रीय व्याख्या की तरह लिखिए, आँकड़े की तरह नहीं।

प्रभाव दोतरफ़ा हैं। एक ओर यह हिंसक या असहनीय विवाह से निकलने का क़ानूनी रास्ता है, जो विशेषकर महिलाओं की सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है। दूसरी ओर बच्चों पर मानसिक असर, महिलाओं की आर्थिक असुरक्षा और सामाजिक कलंक जैसी चुनौतियाँ हैं। इसीलिए न्यायालयों ने पहले मध्यस्थता और सुलह के प्रयासों पर ज़ोर दिया है (Amardeep Singh की शर्तों में यह साफ़ है)।

उपाय के रूप में विवाह-पूर्व परामर्श, पारिवारिक न्यायालयों में मध्यस्थता, महिलाओं की आर्थिक सुरक्षा और स्पष्ट भरण-पोषण व अभिरक्षा के नियम गिने जा सकते हैं। उत्तर में हमेशा संतुलन रखिए: तलाक़ को केवल "सामाजिक विघटन" कहना भी अधूरा है और केवल "आज़ादी" कहना भी।

राजस्थान का पहलू

NFHS-5 (2019-21) की राजस्थान रिपोर्ट के अनुसार 15-49 वर्ष की महिलाओं में तलाक़शुदा, अलग रह रही या परित्यक्त महिलाएँ मिलाकर 0.7% हैं और इसी आयु के पुरुषों में 0.6%। भारत रिपोर्ट में महिलाओं के लिए तलाक़शुदा 0.3%, अलग रह रही 0.7% और परित्यक्त 0.1% हैं, यानी जोड़ने पर लगभग 1.1% (यह जोड़ हमारी गणना है)। ये भारत सरकार (स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय) के सर्वेक्षण-अनुमान हैं और 15-49 वर्ष की सभी महिलाओं पर आधारित हैं, केवल विवाहित महिलाओं पर नहीं; पहुँच की तिथि 2 अक्टूबर 2026।

NFHS-5 (2019-21): 15-49 वर्ष की महिलाओं की वैवाहिक स्थिति (प्रतिशत)

स्थितिभारतराजस्थान
कभी विवाहित नहीं23.624.6
वर्तमान में विवाहित72.071.5
विधवा3.12.3
तलाक़शुदा / अलग रह रही / परित्यक्त0.3 / 0.7 / 0.1 (अलग-अलग)0.7 (मिलाकर)

भारत रिपोर्ट में तीनों स्थितियाँ अलग दिखाई गई हैं; राजस्थान रिपोर्ट में मिलाकर। 'गौना न होने वाली विवाहिता' की श्रेणी तालिका में अलग है, इसलिए कुल 100% नहीं बैठता।

तलाक़ का नक्शा

तलाक़

संबंधित अवधारणाएँ

हिंदू विवाह अधिनियम

  • धारा 9: पुनर्स्थापना
  • धारा 10: न्यायिक पृथक्करण
  • धारा 11 और 12: शून्य और शून्यकरणीय

आधार

धारा 13

  • व्यभिचार, क्रूरता, अभित्याग (2 वर्ष)
  • धर्म-परिवर्तन, मानसिक विकार, रोग
  • पत्नी के अतिरिक्त आधार 13(2)

आपसी सहमति

धारा 13B और विशेष विवाह धारा 28

  • 1 वर्ष अलग रहना
  • दूसरा प्रस्ताव 6 से 18 महीने
  • Amardeep 2017: अवधि निर्देशात्मक

न्यायालय

निर्णय

  • Shilpa Sailesh 2023: अनुच्छेद 142
  • Shayara Bano 2017: तीन तलाक़ रद्द
  • 2019 का अधिनियम

आपसी सहमति से तलाक़: चरण

  1. विवाह के 1 वर्ष बाद

    धारा 14: अपवाद छोड़कर इससे पहले याचिका नहीं

  2. 1 वर्ष से अलग रहना

    धारा 13B(1) की शर्त

  3. संयुक्त याचिका (पहला प्रस्ताव)

    ज़िला न्यायालय में दोनों मिलकर

  4. 6 से 18 महीने के भीतर

    दूसरा प्रस्ताव; अवधि छोड़ी जा सकती है (Amardeep 2017)

  5. सुनवाई और डिक्री

    न्यायालय संतुष्ट हो तो तलाक़ की डिक्री

क्रम स्रोत-पाठ पर आधारित है; वास्तविक मामले में दस्तावेज़ और अदालत की प्रक्रिया अलग हो सकती है।

मुख्य तथ्य

तलाक़ के आधार
हिंदू विवाह अधिनियम धारा 13(1), 13(1क), 13(2); विशेष विवाह अधिनियम धारा 27
आपसी सहमति
1 वर्ष की पृथकता; दूसरा प्रस्ताव 6 माह के बाद और 18 माह के भीतर (धारा 13B; विशेष विवाह धारा 28)
पहले वर्ष की रोक
धारा 14 (हिंदू विवाह अधिनियम) और धारा 29 (विशेष विवाह अधिनियम): विवाह के 1 वर्ष के भीतर याचिका नहीं, असाधारण कठिनाई के अपवाद सहित
Amardeep Singh
12 सितंबर 2017; धारा 13B(2) की 6 माह की अवधि निर्देशात्मक; चार शर्तें
Shilpa Sailesh
1 मई 2023; पाँच न्यायाधीश; अनुच्छेद 142 के अंतर्गत अपूरणीय विघटन पर तलाक़ का विवेक; क़ानूनी आधार नहीं
Shayara Bano
22 अगस्त 2017; 3:2 के बहुमत से तीन तलाक़ (तलाक़-ए-बिद्दत) रद्द
मुस्लिम महिला अधिनियम, 2019
एक बार में तीन तलाक़ शून्य और अवैध; 3 वर्ष तक का कारावास और जुर्माना; राज्यसभा से पारित 30 जुलाई 2019
NFHS-5, भारत (महिलाएँ 15-49)
तलाक़शुदा 0.3%, अलग रह रही 0.7%, परित्यक्त 0.1% (2019-21)
NFHS-5, राजस्थान (महिलाएँ 15-49)
तलाक़शुदा, अलग रह रही और परित्यक्त मिलाकर 0.7% (2019-21)
सिलेबस की पंक्ति
RPSC सिलेबस, 09-01-2026, पेपर I, इकाई III (क)

परीक्षा में आम ग़लतियाँ

याद रखें

  • "अपूरणीय विघटन" को हिंदू विवाह अधिनियम का तलाक़-आधार लिख देना। वह क़ानून में आधार नहीं है; सर्वोच्च न्यायालय उसे अनुच्छेद 142 की अपनी शक्ति से लागू करता है (Shilpa Sailesh, 2023)।
  • Amardeep Singh में छह माह की अवधि को "ख़त्म कर दिया" बताना। न्यायालय ने उसे अनिवार्य नहीं, निर्देशात्मक कहा और शर्तों के साथ छोड़ने की छूट दी।
  • न्यायिक पृथक्करण और तलाक़ को एक बताना। पृथक्करण में विवाह क़ायम रहता है और पुनर्विवाह नहीं हो सकता।
  • आपसी सहमति में "दो वर्ष" लिख देना। शर्त एक वर्ष की पृथकता है; दूसरे प्रस्ताव की खिड़की छह से अठारह माह है।
  • तीन तलाक़ पर केवल 2019 का अधिनियम लिख देना। 2017 के निर्णय का संदर्भ भी लिखिए, और याद रखिए कि 2019 का अधिनियम पति को कारावास का प्रावधान देता है।
  • NFHS के "तलाक़शुदा" प्रतिशत को तलाक़ की दर बता देना। वह 15-49 वर्ष की सभी महिलाओं में उस स्थिति की हिस्सेदारी है, तलाक़ों की वार्षिक दर नहीं।