दहेज प्रथा
दहेज का अर्थ, कारण, दुष्परिणाम और क़ानूनी ढाँचा (1961 का अधिनियम, BNS, साक्ष्य अधिनियम), NCRB आँकड़ों के साथ, उत्तर-लेखन की दृष्टि से।
- दहेज
- दहेज मृत्यु
- BNS 80 और 85
- दहेज निषेध अधिनियम
सिलेबस में
RPSC सिलेबस (09-01-2026), पेपर I, इकाई III, भाग A: "Challenges and issues before Indian society: dowry, divorce, corruption, poverty, prostitution, unemployment and drug addiction." इस पृष्ठ पर केवल दहेज है; तलाक़, भ्रष्टाचार और ग़रीबी के अलग पृष्ठ हैं।
इस विषय को क्यों पढ़ें
याद रखें
- 2023 के पेपर में "दहेज प्रथा के दोष" 2 अंक में पूछा गया; ऐसे प्रश्न में पूरे अंक के लिए दोषों के तीन स्तर (स्त्री, परिवार, समाज) लिखना ही काफ़ी है।
- यह विषय समाजशास्त्र और क़ानून, दोनों में काम आता है: BNS की धारा 80 और 85 तथा भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की धारा 118 लिखने से उत्तर तुरंत ठोस दिखता है।
- आँकड़े वर्ष-दर-वर्ष लगभग स्थिर हैं (दहेज मृत्यु हर वर्ष 6,000 से अधिक), इसलिए 2021-2023 के आँकड़े याद रखना एक पंक्ति में उत्तर को वज़न देता है।
पहले सरल भाषा में: शादी का रिश्ता, सौदे की शर्त नहीं
मान लीजिए किसी गाँव में दो परिवार बेटी का रिश्ता तय कर रहे हैं। लड़के वाले चुपचाप कहते हैं कि "हमें कुछ नहीं चाहिए, बस आप अपनी बेटी को जो देना चाहें दे दें।" पर साथ ही यह भी बता देते हैं कि पड़ोस के घर में बहू के साथ कार आई थी। यह इशारा असल में माँग है, बस मीठे शब्दों में कही गई। यही दहेज (dowry) की सबसे आम तस्वीर है: विवाह जैसा पवित्र रिश्ता लेन-देन की शर्त बन जाता है, और लड़की का परिवार इसे चुकाने में बँध जाता है। (यह समझाने के लिए गढ़ा गया दृश्य है, किसी वास्तविक घटना का वर्णन नहीं।)
समाजशास्त्र में दहेज को केवल एक बुराई मानकर छोड़ना ठीक नहीं; परीक्षा में अंक तब मिलते हैं जब आप बता सकें कि यह कैसे पैदा हुई, कैसे टिकी रही, क़ानून ने क्या किया और क़ानून के बावजूद यह क्यों बची है। इस पृष्ठ का क्रम यही है: अर्थ, कारण, दुष्परिणाम, क़ानूनी ढाँचा, और आँकड़े।
दहेज का अर्थ और क़ानूनी परिभाषा
दहेज निषेध अधिनियम, 1961 की धारा 2 के अनुसार दहेज वह संपत्ति या मूल्यवान प्रतिभूति है जो विवाह के संबंध में एक पक्ष दूसरे पक्ष को, या विवाह के किसी पक्ष के माता-पिता या किसी अन्य व्यक्ति को, विवाह के समय, उससे पहले या बाद में, प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से देता है या देना स्वीकार करता है। इस परिभाषा में एक अपवाद है: जिन लोगों पर मुस्लिम वैयक्तिक विधि लागू होती है, उनके लिए मेहर (dower or mahr) दहेज नहीं माना जाता।
यहाँ दो बातें परीक्षा के लिए ध्यान देने योग्य हैं। पहली, परिभाषा "देने" तक सीमित नहीं है; "देना स्वीकार करना" भी इसमें आता है, यानी वादा करना भी अपराध की परिधि में है। दूसरी, परिभाषा केवल नक़द रक़म की बात नहीं करती, इसलिए गहने, वाहन, फ़र्नीचर और संपत्ति सब इसके दायरे में हैं। विवाह के समय बिना किसी माँग के दिए गए उपहार, यदि नियमानुसार सूची में दर्ज हों, धारा 3(2) के अंतर्गत अपवाद हैं; पर सूची का यह अपवाद माँगे गए दहेज को वैध नहीं बनाता।
विद्यार्थी अक्सर दहेज और उपहार को गड्डमड्ड कर देते हैं। कसौटी यह है कि लेन-देन स्वेच्छा से हुआ या शर्त के रूप में। बेटी को स्नेहवश दिया गया उपहार और माँग के दबाव में दिया गया सामान, देखने में एक जैसे हो सकते हैं, पर क़ानून की नज़र में पहला उपहार है और दूसरा अपराध। इसी तरह विवाह के बाद ससुराल की ओर से नई माँग आए तो वह भी "विवाह के संबंध में" ही गिनी जाती है। उत्तर में यह भेद दो पंक्तियों में लिख दें तो परिभाषा वाला हिस्सा पूरा दिखता है।
दहेज निषेध अधिनियम 1961 की प्रमुख धाराएँ
| धारा | विषय | मुख्य प्रावधान |
|---|---|---|
| 2 | दहेज की परिभाषा | विवाह के संबंध में दी या देने के लिए स्वीकार की गई संपत्ति; मेहर शामिल नहीं |
| 3 | दहेज देना या लेना | कम से कम 5 वर्ष कारावास, कम से कम 15,000 रुपये या दहेज का मूल्य (जो अधिक हो) जुर्माना |
| 4 | दहेज माँगना | 6 माह से 2 वर्ष कारावास, 10,000 रुपये तक जुर्माना |
| 5 | दहेज का समझौता | शून्य |
| 6 | दहेज पर महिला का अधिकार | तीन माह में महिला को हस्तांतरण |
| 8A | सबूत का भार | आरोपी पर |
| 8B | दहेज निषेध अधिकारी | राज्य सरकार द्वारा नियुक्ति |
दहेज की जड़ें: यह प्रथा क्यों बनी और क्यों टिकी रही
दहेज के कारण एक अकेली वजह में नहीं समेटे जा सकते। इन्हें चार समूहों में रखकर लिखना उत्तर को व्यवस्थित बनाता है। (यह वर्गीकरण उत्तर-लेखन की सुविधा के लिए है, किसी एक सरकारी दस्तावेज़ का वर्गीकरण नहीं।)
सामाजिक कारण: पितृसत्तात्मक परिवार-व्यवस्था में बेटी को "पराया धन" माना जाता है, इसलिए विवाह के बाद वह मायके की संपत्ति में हिस्से की दावेदार नहीं समझी जाती। दहेज को इसी हिस्से का "पहले से दिया गया रूप" कहकर सही ठहराया जाता है। विवाह में जाति और बिरादरी की सीमा बहुत कठोर होने से योग्य वर चुनने का दायरा छोटा हो जाता है, और छोटे बाज़ार में "क़ीमत" बढ़ती है।
आर्थिक कारण: सरकारी नौकरी, विदेश में रोज़गार या स्थायी आमदनी वाले वर की माँग अधिक है, और वर की "योग्यता" के साथ दहेज की रक़म जुड़ने लगती है। उपभोक्तावाद ने इसमें नई चीज़ें जोड़ीं: जो कभी बर्तन और कपड़ों तक था, वह अब गाड़ी और ज़मीन तक पहुँच जाता है।
सांस्कृतिक और प्रतिष्ठा-संबंधी कारण: दहेज देना और लेना कई जगह परिवार की हैसियत दिखाने का तरीक़ा बन गया है। जो परिवार दहेज नहीं लेता, उसे कई बार "कमज़ोर" समझ लिया जाता है। इसी प्रदर्शन-प्रवृत्ति के कारण शिक्षित और संपन्न परिवारों में भी यह प्रथा खुलकर या दबे रूप में चलती रहती है।
मनोवैज्ञानिक और संस्थागत कारण: लड़की के परिवार को डर रहता है कि पूरा दहेज न देने पर बेटी को ससुराल में ताने या हिंसा सहनी पड़ेगी। शिकायत करने से रिश्ता टूटने और "बदनामी" का डर भी चुप्पी बढ़ाता है। इसलिए क़ानून होने पर भी अधिकतर मामले तब सामने आते हैं जब हालात बहुत बिगड़ चुके हों।
दहेज के दुष्परिणाम (2023 में पूछे गए 'दोष' की तैयारी)
2023 के पेपर में "दहेज प्रथा के दोष" पूछा गया था। जवाब में दोषों को परिवार, स्त्री और समाज, तीन स्तरों पर रखने से कोई बिंदु छूटता नहीं।
स्त्री के स्तर पर: वधू-उत्पीड़न, शारीरिक और मानसिक हिंसा, और अंतिम रूप में दहेज मृत्यु। जिस घर में बेटी का विवाह "बोझ" माना जाए, वहाँ बेटी की शिक्षा और स्वास्थ्य पर ख़र्च कम होने की आशंका रहती है, और कन्या-भ्रूण हत्या जैसी प्रवृत्तियों की एक वजह भी यही सोच बनती है।
परिवार के स्तर पर: क़र्ज़, ज़मीन-जायदाद की बिक्री और बचत का ख़त्म होना। कई बार छोटे भाई-बहनों की पढ़ाई का पैसा बड़ी बहन के विवाह में चला जाता है। विवाह के बाद भी माँगें थमती नहीं, इसलिए आर्थिक दबाव एकबारगी नहीं, लगातार बना रहता है।
समाज के स्तर पर: विवाह का व्यावसायीकरण, भ्रष्टाचार की प्रवृत्ति (काला धन खपाने का ज़रिया), और स्त्री की समाज में निम्न स्थिति का पुनरुत्पादन। यही कारण है कि दहेज को केवल निजी बुराई नहीं, लैंगिक असमानता का संस्थागत रूप कहा जाता है।
क़ानूनी ढाँचा: 1961 का अधिनियम, BNS और साक्ष्य अधिनियम
दहेज निषेध अधिनियम, 1961 इस विषय का मूल क़ानून है। इसकी धारा 3 दहेज देने, लेने या देने-लेने में सहायता करने पर कम से कम 5 वर्ष का कारावास और कम से कम 15,000 रुपये या दहेज के मूल्य में से जो अधिक हो, उतना जुर्माना तय करती है; न्यायालय "पर्याप्त और विशेष कारण" दर्ज करके इससे कम सज़ा भी दे सकता है। धारा 4 दहेज माँगने को अलग अपराध मानती है: 6 माह से 2 वर्ष तक कारावास और 10,000 रुपये तक जुर्माना। धारा 5 कहती है कि दहेज देने-लेने का कोई भी समझौता शून्य है। धारा 6 के अनुसार यदि दहेज किसी अन्य के पास पहुँचा है, तो उसे तीन माह में महिला को हस्तांतरित करना होगा। धारा 8A में सबूत का भार आरोपी पर डाला गया है, और धारा 8B राज्य सरकार को दहेज निषेध अधिकारी नियुक्त करने की शक्ति देती है। इस अधिनियम के अपराध अजमानतीय और अशमनीय हैं।
दंड-संहिता की जगह अब भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 है, जो 1 जुलाई 2024 से लागू हुई। उसकी धारा 80 दहेज मृत्यु का अपराध है: विवाह के 7 वर्ष के भीतर यदि किसी स्त्री की जलने या शारीरिक चोट से, या असामान्य परिस्थितियों में मृत्यु होती है और यह दिखे कि मृत्यु से ठीक पहले दहेज की माँग को लेकर पति या उसके रिश्तेदारों ने उसके साथ क्रूरता या उत्पीड़न किया था, तो इसे दहेज मृत्यु माना जाता है और सज़ा कम से कम 7 वर्ष से लेकर आजीवन कारावास तक है। धारा 85 कहती है कि पति या पति का रिश्तेदार किसी स्त्री के साथ क्रूरता करे तो 3 वर्ष तक का कारावास और जुर्माना होगा; धारा 86 में क्रूरता की परिभाषा दी गई है। गृह मंत्रालय के मार्च 2026 के संसदीय उत्तर में भी यही बताया गया है कि ये धाराएँ पूर्व की IPC धारा 304B और 498A की जगह हैं, और 7 वर्ष की सीमा बढ़ाने का कोई प्रस्ताव नहीं है।
न्यायालय में सबूत के स्तर पर भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की धारा 118 दहेज मृत्यु की उपधारणा देती है: यदि दिखाया जाए कि स्त्री की मृत्यु से ठीक पहले उसके साथ दहेज की माँग पर क्रूरता हुई थी, तो न्यायालय मानेगा कि आरोपी ने दहेज मृत्यु की है। यह पहले साक्ष्य अधिनियम की धारा 113B में था। इसका तर्क सरल है: घर की चारदीवारी के भीतर गवाह नहीं मिलते, इसलिए सबूत का बोझ बदला गया।
BNS में दहेज से जुड़े प्रावधान
| धारा | अपराध | सज़ा |
|---|---|---|
| 80 | दहेज मृत्यु (विवाह के 7 वर्ष के भीतर) | कम से कम 7 वर्ष, आजीवन तक |
| 85 | पति या रिश्तेदार द्वारा स्त्री से क्रूरता | 3 वर्ष तक कारावास और जुर्माना |
| 86 | क्रूरता की परिभाषा | परिभाषा-धारा, सज़ा नहीं |
क़ानून के बावजूद दहेज क्यों बचा है? (विश्लेषण)
अधिनियम के 60 से अधिक वर्ष बाद भी यह सामाजिक बुराई जारी है, और इसके कारण क़ानून की कमज़ोरी से ज़्यादा समाज की स्वीकृति में हैं। यह निष्कर्ष विश्लेषण है, किसी आधिकारिक रिपोर्ट का कथन नहीं।
पहला, दहेज लेने और देने वाले दोनों अपराधी हैं, इसलिए देने वाला पक्ष अक्सर रिपोर्ट नहीं करता। दूसरा, पारिवारिक संपत्ति में बेटी के क़ानूनी हक़ की जानकारी और उसे माँगने का साहस कम है। तीसरा, विवाह-बाज़ार में लड़की की आर्थिक आत्मनिर्भरता की कमी उसे समझौते के लिए मजबूर करती है। चौथा, प्रशासनिक रूप से दहेज निषेध अधिकारी की भूमिका कम दिखाई देती है, जबकि धारा 8B इसकी व्यवस्था करती है।
समाधान भी इन्हीं बिंदुओं से निकलते हैं: बेटियों की शिक्षा और रोज़गार, संपत्ति में हिस्से के अधिकार का वास्तविक उपयोग, बिना दहेज और सादे विवाह का सामाजिक सम्मान, और शिकायत करने वाली महिला को सुरक्षा और काउंसलिंग।
दहेज का चक्र
पितृसत्ता और कन्या-अवमूल्यन
बेटी को पराया धन मानना, संपत्ति में हिस्सा नहीं
वर की 'क़ीमत'
नौकरी और प्रतिष्ठा से जुड़ी माँग
दहेज का लेन-देन
नक़द, गहने, वाहन, संपत्ति
उत्पीड़न और माँगों की दूसरी किश्त
क्रूरता, BNS धारा 85
दहेज मृत्यु
BNS धारा 80, साक्ष्य अधिनियम धारा 118
मुख्य तथ्य
- दहेज निषेध अधिनियम
- 1961; धारा 3: कम से कम 5 वर्ष कारावास, कम से कम 15,000 रुपये या दहेज के मूल्य का जुर्माना
- दहेज माँगने की सज़ा (धारा 4)
- 6 माह से 2 वर्ष, 10,000 रुपये तक जुर्माना
- दहेज का समझौता (धारा 5)
- शून्य
- दहेज मृत्यु, BNS धारा 80
- विवाह के 7 वर्ष के भीतर; कम से कम 7 वर्ष, आजीवन तक
- क्रूरता, BNS धारा 85
- 3 वर्ष तक कारावास और जुर्माना
- BNS का प्रवर्तन
- 1 जुलाई 2024
- साक्ष्य अधिनियम 2023, धारा 118
- दहेज मृत्यु की उपधारणा (पूर्व धारा 113B)
- दहेज मृत्यु (NCRB)
- 6,753 (2021), 6,450 (2022), 6,156 (2023)
- दहेज निषेध अधिनियम के मामले
- 13,568 (2021), 13,479 (2022), 15,489 (2023)
परीक्षा में आम ग़लतियाँ
याद रखें
- दहेज और स्त्रीधन को एक मान लेना: स्त्रीधन महिला की अपनी संपत्ति है; दहेज वह है जो विवाह के संबंध में माँग या शर्त के रूप में दिया-लिया जाए।
- दहेज मृत्यु की 7 वर्ष की सीमा भूल जाना, या सज़ा केवल "आजीवन" लिख देना; सही है कम से कम 7 वर्ष, आजीवन तक।
- IPC की 304B और 498A लिखना: अब BNS में ये धाराएँ 80 और 85 हैं; परीक्षा में दोनों संख्याएँ साथ लिखना सुरक्षित है।
- दोष लिखते समय केवल स्त्री का उत्पीड़न लिखना; परिवार के क़र्ज़ और समाज के स्तर के दोष भी जोड़ें।
- आँकड़ों में दहेज मृत्यु और दहेज निषेध अधिनियम के मामलों को मिला देना; ये दो अलग श्रेणियाँ हैं।
केस स्टडी: एक कल्पित परिवार में माँग से दहेज मृत्यु तक का चक्र
उदाहरण (काल्पनिक)विवाह के बाद की 'दूसरी किश्त'
यह समझाने के लिए गढ़ा गया उदाहरण है; किसी वास्तविक परिवार या मामले का वर्णन नहीं है। इसका उद्देश्य दिखाना है कि क़ानून के कौन से प्रावधान किस चरण पर लागू होते हैं।
- विवाह से पहले
- वर-पक्ष इशारे में माँग रखता है और वधू-पक्ष कर्ज़ लेकर सहमत हो जाता है। 1961 के अधिनियम की धारा 3 और 4 के अनुसार यह लेन-देन और माँग दोनों अपराध हैं; धारा 5 के अनुसार ऐसा समझौता शून्य है।
- विवाह के बाद
- नई माँगें आती हैं और स्त्री को ताने तथा मार-पीट सहनी पड़ती है। यह BNS की धारा 85 और 86 (क्रूरता) के दायरे में आता है, जिसमें 3 वर्ष तक कारावास और जुर्माना है।
- विवाह के 7 वर्ष के भीतर मृत्यु
- यदि स्त्री की असामान्य परिस्थितियों में मृत्यु हो जाए और दिखे कि उससे ठीक पहले दहेज की माँग पर उत्पीड़न हुआ था, तो BNS की धारा 80 लगती है और साक्ष्य अधिनियम की धारा 118 के अंतर्गत न्यायालय दहेज मृत्यु की उपधारणा करता है।
सीख
कार्य-उदाहरण: धारा 3 का जुर्माना और 7 वर्ष की गिनती (कल्पित आँकड़े)
हल सहित उदाहरणदो छोटे हिसाब जो उत्तर में काम आते हैं
दिया है
- यह उदाहरण समझाने के लिए गढ़ा गया है; रक़म और तारीख़ें वास्तविक नहीं हैं।
- मामला 1: दहेज का मूल्य 4,00,000 रुपये है।
- मामला 2: विवाह 10 मार्च 2020 को हुआ और स्त्री की मृत्यु 5 मार्च 2027 को हुई।
- 1चरण 1: जुर्माना तय करें धारा 3 में जुर्माना 15,000 रुपये और दहेज के मूल्य, दोनों में से जो अधिक हो, उतना है। यहाँ मूल्य 4,00,000 रुपये अधिक है, इसलिए न्यूनतम जुर्माना 4,00,000 रुपये होगा, और कारावास कम से कम 5 वर्ष।
- 2चरण 2: 7 वर्ष की गिनती विवाह की तारीख़ 10 मार्च 2020 से 7 वर्ष 10 मार्च 2027 को पूरे होते हैं। मृत्यु 5 मार्च 2027 को है, यानी 7 वर्ष के भीतर, इसलिए धारा 80 के लिए अन्य शर्तें पूरी होने पर मामला दहेज मृत्यु की श्रेणी में आ सकता है।
- 3चरण 3: उत्तर में लिखने का तरीक़ा उत्तर में लिखें: "कम से कम 5 वर्ष कारावास और जुर्माना (15,000 रुपये या दहेज का मूल्य, जो अधिक हो)" और "विवाह के 7 वर्ष के भीतर मृत्यु पर BNS धारा 80, कम से कम 7 वर्ष से आजीवन तक"।
निष्कर्ष: संख्याएँ सही स्थान पर रखने से 2 या 5 अंक के उत्तर में भी विषय की पकड़ दिखती है.
पिछले वर्षों के प्रश्न (हल सहित)
2023RAS मुख्य परीक्षापेपर I2 अंक
Demerits of the Dowry System (दहेज प्रथा के दोष/कमियां)
आदर्श उत्तर
कन्या-अवमूल्यन, वधू-उत्पीड़न, दहेज-हत्या, परिवार पर आर्थिक बोझ, कर्ज़ और स्त्री की समाज में निम्न स्थिति।
अभ्यास के प्रश्न
अभ्यास प्रश्नलगभग 15 शब्द
दहेज के दो दुष्परिणाम लिखिए।
आदर्श उत्तर
वधू-उत्पीड़न (दहेज मृत्यु तक) और परिवार पर क़र्ज़ का बोझ दहेज के दो प्रमुख दुष्परिणाम हैं।
अभ्यास प्रश्नलगभग 50 शब्द
दहेज निषेध अधिनियम, 1961 की मुख्य धाराओं का उल्लेख कीजिए।
आदर्श उत्तर
अधिनियम की धारा 2 दहेज परिभाषित करती है। धारा 3 में दहेज देने या लेने पर कम से कम 5 वर्ष कारावास और 15,000 रुपये या दहेज के मूल्य का जुर्माना है। धारा 4 में माँगने पर 6 माह से 2 वर्ष का दंड है। धारा 5 के अनुसार दहेज का समझौता शून्य है।
अभ्यास प्रश्नलगभग 100 शब्द
दहेज प्रथा के कारणों और इसे रोकने के उपायों की विवेचना कीजिए।
आदर्श उत्तर
दहेज के कारण सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक हैं। पितृसत्ता में बेटी को पराया धन माना जाता है, सरकारी नौकरी वाले वर की माँग अधिक है और दहेज प्रतिष्ठा का प्रदर्शन बन गया है। शिकायत से बदनामी का डर भी चुप्पी बढ़ाता है।
उपायों में क़ानूनी और सामाजिक दोनों स्तर आते हैं। दहेज निषेध अधिनियम 1961, BNS की धारा 80 और 85 तथा साक्ष्य अधिनियम की धारा 118 मौजूद हैं, पर इनका प्रभाव शिकायत पर निर्भर है। इसलिए बेटियों की शिक्षा और रोज़गार, संपत्ति में हिस्से के अधिकार का उपयोग, दहेज निषेध अधिकारियों की सक्रियता और सादे विवाह को सम्मान देना ज़रूरी है।
उत्तर कैसे लिखें (10 अंक, 100 शब्द)
भूमिका
प्रश्न: "दहेज प्रथा के कारण, दुष्परिणाम और क़ानूनी उपाय बताइए।" पहले दो वाक्यों में परिभाषा दें: विवाह के संबंध में दी या स्वीकार की गई संपत्ति; मेहर बाहर।
मुख्य भाग
- कारण: पितृसत्ता, वर की माँग, प्रतिष्ठा का प्रदर्शन, शिकायत का डर
- दुष्परिणाम: स्त्री (उत्पीड़न, दहेज मृत्यु), परिवार (क़र्ज़), समाज (विवाह का व्यावसायीकरण)
- क़ानून: 1961 का अधिनियम (धारा 3 और 4), BNS धारा 80 और 85, साक्ष्य अधिनियम धारा 118
- आँकड़े: दहेज मृत्यु 6,156 (2023, NCRB/MHA)
- सुझाव: बेटियों की शिक्षा और संपत्ति-अधिकार, दहेज निषेध अधिकारी की सक्रियता
निष्कर्ष
निष्कर्ष: क़ानून हर चरण पर है, असली बदलाव तब होगा जब समाज दहेज को प्रतिष्ठा के बजाय अपराध माने।
अतिरिक्त मूल्य
- BNS और पुरानी IPC धाराओं का साथ उल्लेख
- 7 वर्ष की सीमा और धारा 118 की उपधारणा
- NCRB के तीन वर्षों के आँकड़े
त्वरित पुनरावृत्ति
- दहेज = विवाह के संबंध में दी या देने के लिए स्वीकार की गई संपत्ति; मेहर शामिल नहीं (धारा 2)
- धारा 3: कम से कम 5 वर्ष और 15,000 रुपये या दहेज का मूल्य (जो अधिक); धारा 4: 6 माह से 2 वर्ष, 10,000 रुपये तक
- धारा 5: समझौता शून्य; 6: तीन माह में महिला को हस्तांतरण; 8A: सबूत का भार आरोपी पर; 8B: दहेज निषेध अधिकारी
- BNS (1 जुलाई 2024): धारा 80 दहेज मृत्यु (7 वर्ष), 85 क्रूरता (3 वर्ष तक), 86 परिभाषा
- साक्ष्य अधिनियम 2023 धारा 118: उपधारणा (पूर्व 113B)
- दहेज मृत्यु: 6,753 (2021), 6,450 (2022), 6,156 (2023)
याद रखने योग्य शब्द
- दहेज
- मेहर
- दहेज मृत्यु
- क्रूरता
- उपधारणा
- धारा 80
- धारा 85
- दहेज निषेध अधिकारी