मुख्य सामग्री पर जाएं
समाजशास्त्र · पेपर I · इकाई III (क)

वर्ग की अवधारणा (Concept of Class)

वर्ग क्या है, मार्क्स और वेबर उसे कैसे अलग-अलग देखते हैं, और जाति से उसका अंतर किस कसौटी पर लिखें: एक पृष्ठ में हल PYQ के साथ।

  • वर्ग
  • मार्क्स
  • वेबर
  • प्रतिष्ठा-समूह
  • जीवन-अवसर
  • जाति बनाम वर्ग
  • खुली और बंद व्यवस्था
3 अक्टूबर 2026 को सत्यापित

सिलेबस में

RPSC सिलेबस (09-01-2026), पेपर I, इकाई III, भाग क (समाजशास्त्र): "Sociological thought in Indian society: Concept of caste and class; changing dimensions of caste and class in Indian society." इस पृष्ठ पर वर्ग की अवधारणा और जाति से उसका अंतर है; जाति का अलग पृष्ठ और दोनों के बदलते आयामों का अलग पृष्ठ इसी श्रृंखला में है।

इस विषय को क्यों पढ़ें

याद रखें

  • संकलित छह पेपरों (2013, 2016, 2018, 2021, 2023, 2024) में वर्ग की मूल अवधारणा पर एक ही सीधा प्रश्न मिला: 2016 का 5 अंक का 'जाति और वर्ग में अंतर कीजिये।' यह 2013-2024 के पेपरों में देखा गया रुझान है, आधिकारिक अंक-योजना नहीं।
  • 'अंतर कीजिये' वाले प्रश्न में अंक तालिका-जैसी तुलना पर मिलते हैं: कम से कम तीन कसौटियाँ और हर कसौटी पर दोनों पक्ष। इस पृष्ठ की तुलना-तालिका उसी ढाँचे में है।
  • वर्ग की समझ अगले पृष्ठ (जाति और वर्ग के बदलते आयाम) की नींव है: वहाँ OBC, आरक्षण और राजनीति के प्रश्न इसी अवधारणा पर टिके हैं।

वर्ग क्या है

एक ही गाँव में दो परिवार सोचिए। एक के पास पचास बीघा ज़मीन है, दूसरे के पास अपना खेत नहीं और वह दिहाड़ी पर काम करता है। दोनों का पहनावा, बैंक में खाता, बच्चों की पढ़ाई और बीमारी में इलाज की क्षमता अलग होगी। यह फ़र्क़ आमदनी, संपत्ति और अवसरों का है, और समाजशास्त्र में इसी फ़र्क़ के आधार पर बने समूहों को वर्ग (class) कहा जाता है। सरल शब्दों में वर्ग लोगों का वह समूह है जिसकी आर्थिक स्थिति, यानी संपत्ति, आय और पेशे से मिलने वाले अवसर, लगभग समान हैं। जाति की तरह वर्ग में सदस्यता जन्म पर पक्की नहीं होती: मेहनत, शिक्षा, नौकरी या कारोबार से कोई ऊपर चढ़ सकता है और धन खोने पर नीचे भी आ सकता है।

इसलिए वर्ग को अक्सर 'खुली व्यवस्था' और जाति को 'बंद व्यवस्था' कहा जाता है। पर परीक्षा में एक सावधानी रखिए: खुली का मतलब यह नहीं कि हर किसी को बराबर मौक़ा है। NCERT के अनुसार भारत में जाति और वर्ग में मोटा सहसंबंध है, यानी ऊँची जातियों के पास औसतन अधिक संपत्ति और शिक्षा रही है; पर यह संबंध पूर्ण नहीं है, क्योंकि ऊँची मानी गई जातियों में भी ग़रीबी है और निचली मानी गई जातियों में भी संपन्न लोग उभरे हैं।

मार्क्स: उत्पादन के साधन और वर्ग-संघर्ष

वर्ग की सबसे प्रसिद्ध व्याख्या कार्ल मार्क्स और फ़्रेडरिक एंगेल्स की है। Communist Manifesto (1848) में उन्होंने लिखा कि समाज अधिकाधिक "दो बड़े शत्रु-शिविरों" में बँट रहा है, यानी बुर्जुआ (bourgeoisie) और सर्वहारा (proletariat)। यह वाक्य मूल पाठ के दो अलग प्रकाशनों में मिलता है, और इसी का सार विद्यार्थी याद रखते हैं: वर्ग का आधार आर्थिक है, और वर्गों के हित टकराते हैं। जो उत्पादन के साधनों का स्वामी है और जिसे श्रम ख़रीदना है, उसका हित उस मज़दूर से टकराता है जिसे अपना श्रम बेचना है।

मार्क्स के अनुसार इसी टकराव, यानी वर्ग-संघर्ष, से समाज में बदलाव आता है। आधुनिक भारत में इसका मोटा रूप ज़मींदार और बटाईदार, मालिक और मज़दूर, महाजन और कर्ज़दार जैसे रिश्तों में दिखता है। परीक्षा-उत्तर में यह जोड़ना अच्छा रहता है कि मार्क्सवादी दृष्टि आर्थिक पहलू पर ज़ोर देती है, इसलिए प्रतिष्ठा और सत्ता जैसे दूसरे पहलू उसमें कम जगह पाते हैं। यह विश्लेषण है, किसी पाठ की पंक्ति नहीं।

वेबर: वर्ग, प्रतिष्ठा और दल

मैक्स वेबर ने वर्ग को अकेले आर्थिक आधार पर नहीं छोड़ा। उनके निबंध Class, Status, Party के अनुवाद में कहा गया है कि वर्ग, प्रतिष्ठा-समूह (status group) और दल, तीनों सत्ता के वितरण की परिघटनाएँ हैं। वर्ग-स्थिति (class situation) बाज़ार-स्थिति (market situation) से बनती है, यानी आप बाज़ार में क्या बेचने की स्थिति में हैं, और उससे आपके जीवन-अवसर (life chances) कैसे तय होते हैं। इसी निबंध में प्रतिष्ठा का अलग आयाम है: प्रतिष्ठा-समूह सम्मान और जीवन-शैली पर बनते हैं, भले उनकी संपत्ति बराबर न हो।

तीनों को एक साथ रखने से तस्वीर साफ़ होती है। वर्ग का संबंध धन और बाज़ार से है, प्रतिष्ठा का सम्मान और जीवन-शैली से, और दल का राजनीतिक संगठन से। यही कारण है कि भारतीय समाज के विद्यार्थी वेबर को जाति समझने में भी उपयोगी पाते हैं: जाति में प्रतिष्ठा का आयाम बहुत प्रबल है, इसलिए उसे केवल आर्थिक वर्ग कहना अधूरा होगा। वेबर स्वयं इसी निबंध के एक अंश ("Ethnic Segregation and Caste") में लिखते हैं कि जब प्रतिष्ठा-भेद के परिणाम पूरी तरह निकलते हैं, तब प्रतिष्ठा-समूह एक बंद "जाति" (caste) बन जाता है, जिसमें भेद केवल रीति और क़ानून से नहीं, अनुष्ठान से भी सुरक्षित रहते हैं: निचली मानी गई जाति से शारीरिक स्पर्श को अनुष्ठानिक अशुद्धि समझा जाता है। इसलिए जाति को प्रतिष्ठा के निकट रखना वेबर के पाठ से भी जुड़ता है; भारत के किसी विशेष समाज पर इसे लागू करना विश्लेषण है।

मार्क्स और वेबर: एक नज़र में

कसौटीमार्क्सवेबर
वर्ग का आधारउत्पादन के साधनों से संबंधबाज़ार-स्थिति और जीवन-अवसर
मुख्य वर्ग (उदाहरण)बुर्जुआ और सर्वहारा, दो बड़े शिविरवर्ग-स्थिति के कई स्तर; वर्ग के साथ प्रतिष्ठा और दल अलग आयाम
समाज का विश्लेषणआर्थिक पहलू पर ज़ोर, वर्ग-संघर्षबहु-आयामी: वर्ग, प्रतिष्ठा और दल, तीनों सत्ता से जुड़े
मूल पाठCommunist Manifesto, 1848Class, Status, Party; अंग्रेज़ी अनुवाद Gerth और Mills, 1946

दोनों कथन ऊपर बताए गए पाठों से हैं; 'ज़ोर' वाली पंक्ति संक्षेपण (विश्लेषण) है।

भारत में वर्ग: भूमि-संबंध से समझिए

भारत में वर्ग को देखने के लिए एक कसौटी काम आती है: भूमि-संबंध। NCERT के ग्रामीण अध्याय में बताया गया है कि कृषि-संरचना में जाति और वर्ग साथ चलते हैं: भूमि-स्वामी, काश्तकार और खेतिहर मज़दूर के रूप में भूमि से संबंध अलग-अलग होते हैं। उसी अध्याय में यह भी दर्ज है कि ब्राह्मण प्रायः बड़े भूस्वामी नहीं रहे, जबकि प्रभु जातियाँ, जैसे जाट, मराठा और वोक्कालिगा, भूस्वामी रहीं। यानी जाति के अनुष्ठानिक दर्जे और आर्थिक वर्ग का क्रम एक-सा नहीं है, और यही बात जाति और वर्ग के अंतर वाले उत्तर की सबसे ठोस दलील है।

NCERT का सामाजिक असमानता वाला अध्याय भी यही कहता है कि जाति-वर्ग का सहसंबंध मौजूद है पर वह एक-एक का नहीं। अनुसूचित जाति और जनजाति में ग़रीबी का अनुपात अधिक रहा, पर उनके भीतर भी स्तर-भेद है और सबसे ऊपर के कुछ लोग शिक्षा और नौकरी के सहारे आगे बढ़े। इससे वर्ग को अलग से समझना ज़रूरी हो जाता है: जाति का नाम जानने से आर्थिक स्थिति का अंदाज़ा लगता है, पर पक्के तौर पर नहीं।

ग्रामीण वर्ग-संरचना में बदलाव

ग्रामीण वर्ग-संरचना स्थिर नहीं रही। NCERT के ग्रामीण अध्याय के अनुसार ज़मींदारी की समाप्ति और भूमि-सुधारों ने ज़मींदार और काश्तकार के पुराने रिश्ते को बदला, और हरित क्रांति के बाद खेती में नई तरह की आर्थिक विभिन्नता उभरी: जिनके पास पूँजी और ज़मीन थी, वे नई तकनीक का अधिक लाभ उठा सके, जबकि छोटे किसान और भूमिहीन मज़दूर पीछे रहे। इस तरह वर्ग का अंतर कुछ इलाक़ों में और स्पष्ट हुआ। यह अध्याय का सार है।

इस बदलाव का सबक़ यह है कि वर्ग गतिशील है। एक ही जाति के भीतर कुछ परिवार भूस्वामी बने और कुछ मज़दूर रहे, इसलिए 'जाति' का नाम जानकर यह नहीं कह सकते कि पूरी जाति एक ही आर्थिक वर्ग में है। परीक्षा में इसे 'जाति के भीतर वर्ग-विभाजन' कहकर लिखा जा सकता है; यह विश्लेषण है, पर इसका आधार NCERT का यही कथन है कि जाति और वर्ग का संबंध पूर्ण नहीं।

उत्तर-लेखन की रणनीति

वर्ग के प्रश्न में दो अंक और पाँच अंक के उत्तर अलग तरह से लिखे जाते हैं। दो अंक (15 शब्द) में एक परिभाषा और एक विशेषता चाहिए: 'वर्ग संपत्ति, आय और पेशे पर बना अपेक्षाकृत खुला समूह है; इसकी सदस्यता जन्म से पक्की नहीं।' पाँच अंक (50 शब्द) में अंतर वाला प्रश्न तीन-चार कसौटियों पर चलता है, और विचारक का नाम, जैसे मार्क्स या वेबर, केवल तब आए जब प्रश्न उसकी माँग करे। दस अंक (100 शब्द) में परिभाषा, मार्क्स और वेबर का एक-एक वाक्य, भारतीय उदाहरण और जाति से संबंध, चारों के लिए जगह बनती है।

एक अभ्यास: किसी भी अवधारणा के उत्तर से पहले तीन शब्द काग़ज़ पर लिखिए: परिभाषा, उदाहरण, संबंध। फिर हर शब्द पर एक वाक्य। इस पृष्ठ के सभी हल उत्तर इसी ढाँचे पर बने हैं और शब्द-सीमा के भीतर हैं।

भारतीय विद्वान: बेतेई

आंद्रे बेतेई (André Béteille) की पुस्तक Caste, Class and Power: Changing Patterns of Stratification in a Tanjore Village (1965) तमिलनाडु के तंजौर क्षेत्र के एक गाँव में जाति, वर्ग और सत्ता के आपसी संबंध और उनके बदलते स्वरूप का अध्ययन है। परीक्षा में बस इतना लिखना सुरक्षित है कि बेतेई ने जाति, वर्ग और सत्ता को अलग-अलग आयाम माना और एक गाँव के उदाहरण से उनके आपसी संबंध की जाँच की।

यहाँ एक सुझाव: उत्तर में एक विद्वान का एक नाम पर्याप्त है, जैसे मार्क्स या वेबर, और उसके साथ भारतीय उदाहरण। अधिक नाम गिनाने पर तथ्य में चूक का ख़तरा बढ़ता है, और परीक्षक उदाहरण की सटीकता को नामों की संख्या से ऊपर रखता है।

जाति और वर्ग: अंतर की कसौटियाँ

'जाति और वर्ग में अंतर' का उत्तर तालिका की तरह लिखा जा सकता है। पाँच अंक के लिए तीन से चार कसौटियाँ काफ़ी हैं। नीचे की तालिका मार्क्स-वेबर और NCERT के सहसंबंध वाले बिंदु पर टिकी है; जहाँ पंक्ति संक्षेपण है, वहाँ 'विश्लेषण' लिखा है।

जाति बनाम वर्ग

जाति

सदस्यताजन्म से तय; बदली नहीं जा सकती

विवाहअंतर्विवाह: विवाह अपनी जाति में

आधारशुद्धता-अशुद्धता का अनुष्ठानिक पदानुक्रम (NCERT)

बनावटबंद व्यवस्था; ऊपर-नीचे का क्रम पारंपरिक

चेतना और संगठनजाति-पंचायत, जाति-संगठन

संबंधएक-दूसरे से जुड़े, पर अलग: ऊँची जाति में ग़रीब और निचली जाति में संपन्न मिलते हैं (NCERT)

वर्ग

सदस्यताआय, संपत्ति और पेशे से बनती है; बदल सकती है (कठिनाई के साथ)

विवाहविवाह पर औपचारिक रोक नहीं; वर्ग में विवाह की प्रवृत्ति हो सकती है पर बाध्यता नहीं

आधारआर्थिक: संपत्ति, आय, बाज़ार-स्थिति (मार्क्स, वेबर)

बनावटअपेक्षाकृत खुली; गतिशीलता संभव

चेतना और संगठनवर्ग-चेतना, श्रमिक संघ, किसान संगठन (विश्लेषण)

संबंधजाति से मोटा सहसंबंध, पूर्ण नहीं

पाँच अंक के लिए तीन पंक्तियाँ चुनिए: सदस्यता, आधार और गतिशीलता।

आगे की बात: दोनों साथ चलते हैं

इस तुलना को बहुत कठोर मत बनाइए। असली समाज में दोनों साथ चलते हैं। शहरी, औद्योगिक और पेशे-आधारित जीवन में वर्ग की भूमिका बढ़ी है, पर जाति का प्रभाव मिटा नहीं है, और अगले पृष्ठ में देखिए कि राजनीति में दोनों कैसे गुँथे हैं। उत्तर के अंत में एक पंक्ति रखिए: 'व्यवहार में जाति और वर्ग एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं, इसलिए आज दोनों को साथ पढ़ना उपयोगी है।'

एक और बात जो तालिका में नहीं आती: जाति और वर्ग पर बहस में 'अन्याय की जड़' कहाँ है, इस पर मतभेद रहा है। कुछ विचारक जाति को मूल कारण मानते हैं, कुछ वर्ग को, और कई दोनों को एक साथ देखने के पक्षधर हैं। उत्तर में किसी एक विद्वान को इस मत का श्रेय देना हो तो मूल पाठ से पक्का करके ही लिखिए; नाम के बिना केवल यह लिखना सुरक्षित है कि बहस मौजूद है।

वर्ग की अवधारणा: एक झलक

वर्ग

आधार

संपत्ति, आय, बाज़ार-स्थिति

  • उत्पादन के साधन (मार्क्स)
  • जीवन-अवसर (वेबर)

खुलापन

जन्म पक्का नहीं, गतिशीलता संभव

  • शिक्षा और पेशा
  • संपत्ति का घटना-बढ़ना

संघर्ष

हितों का टकराव

  • बुर्जुआ बनाम सर्वहारा
  • भारत में मालिक-मज़दूर संबंध

जाति से संबंध

सहसंबंध है, पूर्ण नहीं

  • ऊँची जाति में ग़रीबी
  • निचली जाति में संपन्नता
चार शाखाएँ: आधार, खुलापन, संघर्ष और जाति से संबंध।

मुख्य तथ्य

मार्क्स-एंगेल्स का ग्रंथ
Communist Manifesto, 1848: "two great hostile camps", Bourgeoisie और Proletariat
वेबर के तीन आयाम
वर्ग, प्रतिष्ठा-समूह (status group) और दल; तीनों सत्ता के वितरण की परिघटनाएँ
वेबर के लेख का अंग्रेज़ी अनुवाद
Gerth और Mills (सं.), From Max Weber: Essays in Sociology, 1946
बेतेई की पुस्तक
Caste, Class and Power, University of California Press, 1965
जाति-वर्ग का संबंध (NCERT)
मोटा सहसंबंध, पूर्ण नहीं; ब्राह्मण प्रायः बड़े भूस्वामी नहीं
सिलेबस की पंक्ति
RPSC सिलेबस, 09-01-2026, पेपर I, इकाई III (क)

परीक्षा में आम ग़लतियाँ

याद रखें

  • 'अंतर कीजिये' में केवल एक कसौटी लिखकर छोड़ देना। पाँच अंक के लिए तीन-चार कसौटियाँ तालिका या बिंदुओं में दीजिए।
  • वर्ग को केवल 'अमीर और ग़रीब' लिख देना। मार्क्स की कसौटी उत्पादन के साधनों से संबंध है और वेबर की बाज़ार-स्थिति तथा जीवन-अवसर।
  • जाति और वर्ग को बिल्कुल अलग मान लेना। NCERT के अनुसार दोनों में मोटा सहसंबंध है, इसलिए अंत में उनके संबंध की एक पंक्ति ज़रूर लिखें।
  • 'वर्ग में गतिशीलता पूरी तरह स्वतंत्र है' लिख देना। गतिशीलता संभव है, पर संपत्ति और शिक्षा जैसे संसाधन सबके पास समान नहीं होते।
  • विचारक का नाम बिना पाठ के जोड़ देना। जिस कथन का स्रोत याद न हो, उसे बिना नाम के सामान्य कथन की तरह लिखें।
  • मार्क्स और वेबर को मिला देना। मार्क्स के लिए आधार उत्पादन के साधन और संघर्ष हैं; वेबर के लिए वर्ग, प्रतिष्ठा और दल तीन अलग आयाम।