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समाजशास्त्र · पेपर I · इकाई III (क)

जाति की अवधारणा (Concept of Caste)

जाति क्या है, उसके लक्षण क्या हैं, और घुर्ये, आंबेडकर तथा श्रीनिवास उसे कैसे देखते हैं: एक ही पृष्ठ पर, हल PYQ के साथ।

  • जाति
  • अंतर्विवाह
  • खंडीय विभाजन
  • पदानुक्रम
  • प्रभु जाति
  • घुर्ये
  • आंबेडकर
  • श्रीनिवास
3 अक्टूबर 2026 को सत्यापित

सिलेबस में

RPSC सिलेबस (09-01-2026), पेपर I, इकाई III, भाग क (समाजशास्त्र): "Sociological thought in Indian society: Concept of caste and class; changing dimensions of caste and class in Indian society." इस पृष्ठ पर जाति की अवधारणा है; वर्ग, तथा जाति और वर्ग के बदलते आयामों के अलग पृष्ठ हैं।

इस विषय को क्यों पढ़ें

याद रखें

  • संकलित छह पेपरों (2013, 2016, 2018, 2021, 2023, 2024) में से तीन में जाति की मूल अवधारणा पर सीधा प्रश्न आया: 2018 (2 अंक, अंतर्विवाह), 2021 (2 अंक असमानता; 5 अंक प्रभु जाति) और 2023 (5 अंक खंडीय विभाजन)। यह 2013-2024 के पेपरों में देखा गया रुझान है, आधिकारिक अंक-योजना नहीं।
  • चारों प्रश्न एक ही कसौटी पर बने हैं: कोई एक लक्षण (अंतर्विवाह, खंडीय विभाजन, असमानता) या किसी विचारक की अवधारणा (श्रीनिवास की प्रभु जाति)। इसलिए लक्षणों को विचारक के नाम से जोड़कर याद करें।
  • 2 अंक में 15 शब्द और 5 अंक में 50 शब्द मिलते हैं। पहले वाक्य में परिभाषा, दूसरे में उदाहरण या विचारक: इस पृष्ठ के हल उत्तर इसी ढाँचे में हैं।

पहले सरल भाषा में: जन्म के साथ मिला 'डिब्बा'

मान लीजिए आपको जन्म के साथ ही एक रेल का डिब्बा थमा दिया गया है। आप किस डिब्बे में बैठेंगे, यह आपने नहीं चुना। उसी डिब्बे के लोगों से आपका रिश्ता-नाता जुड़ेगा, उन्हीं में आपका ब्याह होगा, किसके साथ बैठकर खाना है यह भी तय होगा, और परिवार का पुश्तैनी काम भी उसी डिब्बे से बँधा होगा। सबसे अजीब बात यह कि डिब्बे बराबर नहीं हैं। कोई आगे का एसी डिब्बा है, कोई पीछे का भीड़भरा। और आप डिब्बा बदल भी नहीं सकते। जाति (caste) की व्यवस्था को समझने के लिए यह तस्वीर काम की है, हालाँकि समाजशास्त्र इसे इतनी सरलता से नहीं कहता।

समाजशास्त्र की भाषा में जाति एक ऐसा सामाजिक समूह है जिसकी सदस्यता जन्म से तय होती है, जिसमें विवाह अपने ही समूह के भीतर होता है (अंतर्विवाह, endogamy), जिसके खान-पान और मेल-जोल के नियम बँधे होते हैं, जिसे परंपरा से कोई पेशा मिला होता है, और जो बाक़ी जातियों के साथ ऊँच-नीच की एक सीढ़ी में बैठी होती है। NCERT की कक्षा 12 की पुस्तक में जाति के लक्षण ठीक इसी तरह गिनाए गए हैं: जन्म, विवाह-नियम, भोजन-नियम, पदानुक्रम, उप-विभाजन और पेशे से जुड़ाव।

वर्ण और जाति: पहले इन दोनों को अलग कीजिए

जाति के बारे में बोलते समय दो शब्द बार-बार आते हैं: वर्ण और जाति। NCERT के अनुसार सबसे प्रचलित व्याख्या यह है कि वर्ण पूरे भारत पर लागू होने वाला चार भागों का मोटा वर्गीकरण है, जबकि जाति क्षेत्रीय या स्थानीय स्तर का बारीक उप-वर्गीकरण है, जिसमें सैकड़ों और हज़ारों जातियाँ और उप-जातियाँ आती हैं। यानी चार वर्ण पूरे देश में एक-से हैं, पर जातियों का क्रम एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में बदल जाता है। परीक्षा में यह अंतर लिखना अक्सर काम आता है।

यह भी याद रखना चाहिए कि जाति-व्यवस्था सदा एक जैसी नहीं रही। NCERT बताता है कि चार वर्णों का वर्गीकरण लगभग तीन हज़ार वर्ष पुराना माना जाता है, पर अपने आरंभिक चरण में, यानी लगभग 900 से 500 ईसा पूर्व के उत्तर-वैदिक दौर में, यह कहीं अधिक लचीला था: विभाजन चार ही थे, बहुत विस्तृत या कठोर नहीं थे, और जन्म से तय नहीं होते थे; एक वर्ग से दूसरे में जाना संभव और काफ़ी आम था। जन्म पर आधारित कठोर रूप उत्तर-वैदिक काल के बाद के दौर में बना। इसलिए यह मान लेना कि तीन हज़ार साल तक एक ही व्यवस्था चलती रही, NCERT के शब्दों में भ्रामक है।

अंग्रेज़ी राज में भी जाति बदली। NCERT के अनुसार 1901 की जनगणना में, जिसकी निगरानी हर्बर्ट रिज़्ले ने की, जातियों के सामाजिक क्रम को दर्ज करने की कोशिश हुई। इसके बाद अलग-अलग जातियों के प्रतिनिधियों ने जनगणना आयुक्त को सैकड़ों याचिकाएँ भेजकर ऊँचे दर्जे का दावा किया और उसके पक्ष में ऐतिहासिक और शास्त्रीय प्रमाण दिए। अनेक विद्वान मानते हैं कि जाति को गिनने और सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज करने से स्वयं संस्था बदल गई: पहले पहचानें अधिक तरल थीं, गिने जाने के बाद वे कठोर होने लगीं।

वर्ण बनाम जाति

वर्ण (varna)

स्तरअखिल भारतीय, मोटा वर्गीकरण

संख्याचार प्रमुख विभाजन

क्रमपूरे देश में समान

लचीलापनआरंभिक रूप में लचीला; जन्म से तय नहीं था

जाति (jati)

स्तरक्षेत्रीय या स्थानीय, बारीक वर्गीकरण

संख्यासैकड़ों-हज़ारों जातियाँ और उप-जातियाँ

क्रमक्षेत्र-दर-क्षेत्र बदलता है, विशेषकर बीच की जातियों का क्रम

लचीलापनउत्तर-वैदिक काल के बाद जन्म से कठोरता से तय

आधार: NCERT कक्षा 12, भारतीय समाज, अध्याय 3

घुर्ये के छह लक्षण

जाति के लक्षणों की सबसे अधिक पूछी जाने वाली सूची समाजशास्त्री जी.एस. घुर्ये (G.S. Ghurye) की है। अपनी पुस्तक Caste and Race in India (1932) में उन्होंने कहा कि जब हिंदू समाज आधुनिक अधिकार-कर्तव्य की सोच से अछूता था और जाति के दर्शन से चलता था, तब उसके छह प्रमुख लक्षण पहचाने जा सकते हैं। नीचे की तालिका में हर लक्षण का सरल अर्थ और एक उदाहरण है, जिसे आप 15 या 50 शब्दों के उत्तर में सीधे उतार सकते हैं।

घुर्ये के छह लक्षण एक नज़र में

क्रमलक्षणसरल अर्थउदाहरण या संकेत
1समाज का खंडीय विभाजन (segmental division)समाज बंद इकाइयों में बँटा; सदस्यता जन्म से, चयन से नहीं; स्थिति धन से नहीं, जाति की परंपरागत प्रतिष्ठा सेहर जाति का अपना जीवन, पंचायत और नियम
2पदानुक्रम (hierarchy)जातियाँ ऊपर से नीचे एक क्रम में, हर समूह का तय स्थानशुद्धता-अशुद्धता की सीढ़ी
3भोजन और सामाजिक व्यवहार पर प्रतिबंधकौन किसके साथ खाए, पिए, उठे-बैठे, यह तयसाथ भोजन या पानी साझा करने की रोक
4नागरिक और धार्मिक निर्योग्यताएँ तथा विशेषाधिकारअलग-अलग वर्गों के लिए अलग अधिकार और रोकमंदिर या सार्वजनिक कुएँ में प्रवेश पर रोक, दंड में भेद
5पेशे के चयन में प्रतिबंधपेशा पुश्तैनी माना गया; दूसरा पेशा अपनाना अनुचितपुजारी का काम केवल ब्राह्मण का; चमड़े का काम निम्न माना गया
6विवाह पर प्रतिबंधविवाह अपने समूह के भीतरअंतर्विवाह; उप-जाति तक की सीमा

आधार: Ghurye, Caste and Race in India (1932), अध्याय 1; NCERT से तुलना की गई। घुर्ये स्वयं कहते हैं कि पेशे के नियम सब पर कड़ाई से लागू नहीं थे: खेती, व्यापार, मज़दूरी और सैनिक सेवा जैसे काम 'किसी के भी' माने जाते थे।

NCERT की छह-सूची घुर्ये से थोड़ी भिन्न है, पर भाव लगभग वही है: (1) जाति जन्म से तय होती है, (2) विवाह के कड़े नियम और अंतर्विवाह, (3) भोजन और भोजन-साझेदारी के नियम, (4) अनेक जातियाँ एक पदानुक्रम में, (5) जातियों के भीतर उप-जातियाँ, यानी खंडीय संगठन, और (6) पेशे से परंपरागत जुड़ाव, जिसमें एक पेशा केवल उसी जाति के लिए माना जाता था। परीक्षा में अपनी सूची चुनकर उसके साथ विचारक का नाम लिखिए; दोनों सूचियाँ मिलाकर न लिखें।

यहाँ एक सैद्धांतिक बात भी जोड़ी जा सकती है। NCERT के अनुसार जाति-व्यवस्था को दो सिद्धांतों के मेल के रूप में समझा जा सकता है: पहला भेद और अलगाव का, जिसमें हर जाति दूसरी से अलग और सख़्ती से पृथक है; दूसरा समग्रता और पदानुक्रम का, जिसमें ये अलग जातियाँ अकेले नहीं, एक बड़ी व्यवस्था के हिस्से के रूप में ऊँच-नीच की सीढ़ी पर बैठी हैं। पदानुक्रम का आधार शुद्धता और अशुद्धता का भेद है: जो जाति पवित्र के निकट मानी गई उसकी प्रतिष्ठा ऊँची, जो दूर या विरोधी मानी गई उसकी नीची।

आंबेडकर का दृष्टिकोण: अंतर्विवाह ही जाति का सार

डॉ. बी.आर. आंबेडकर ने 9 मई 1916 को न्यूयॉर्क के कोलंबिया विश्वविद्यालय में डॉ. ए.ए. गोल्डनवाइज़र की मानवविज्ञान संगोष्ठी में अपना पत्र 'Castes in India: Their Mechanism, Genesis and Development' पढ़ा, जो मई 1917 में Indian Antiquary में छपा। उन्होंने सेनार्ट, नेसफ़ील्ड, रिज़्ले और केतकर की जाति-परिभाषाओं की परख करने के बाद अपना निष्कर्ष रखा: "Endogamy is the only characteristic that is peculiar to caste", यानी अंतर्विवाह ही वह लक्षण है जो केवल जाति का है।

उनके तर्क का सार सरल है। जाति मूलतः आबादी का ऐसा बँटवारा है जिसमें हर इकाई को बाक़ी में घुलने से अंतर्विवाह की प्रथा रोकती है। इसलिए अगर यह दिखा दिया जाए कि अंतर्विवाह कैसे बना रहता है, तो जाति का पूरा तंत्र समझ में आ जाता है। फिर वे सवाल उठाते हैं कि बंद समूह में पति-पत्नी की संख्या का संतुलन कैसे बना रहे। पति की मृत्यु से 'अतिरिक्त स्त्री' और पत्नी की मृत्यु से 'अतिरिक्त पुरुष' पैदा होता है, जो बाहर विवाह कर अंतर्विवाह तोड़ सकता है। उनके अनुसार इसी समस्या से तीन प्रथाएँ जुड़ीं: सती, विधवा पर थोपा गया वैधव्य और बाल-विवाह।

इस दृष्टि में खान-पान के प्रतिबंध मूल कारण नहीं हैं। नेसफ़ील्ड को जवाब देते हुए आंबेडकर लिखते हैं कि उन्होंने 'परिणाम को कारण' समझ लिया: जाति स्वयं में बंद इकाई है, इसलिए उसके भीतर ही मेल-जोल और भोजन सीमित रहता है, और यह निषेध बाद में धार्मिक रूप ले लेता है। इसीलिए 2018 के प्रश्न "जाति एक अंतर्विवाही समूह है, कैसे?" का सबसे सटीक उत्तर आंबेडकर और NCERT, दोनों के सहारे दिया जा सकता है।

श्रीनिवास की प्रभु जाति: गाँव में जाति कैसे काम करती है

जाति केवल पुस्तकों में नहीं, गाँव की ज़मीन पर भी दिखती है। एम.एन. श्रीनिवास ने मैसूर के पास रामपुरा गाँव के अध्ययन पर आधारित लेख 'The Dominant Caste in Rampura' (American Anthropologist, खंड 61, अंक 1, पृष्ठ 1-16, 1959) में प्रभु जाति (dominant caste) की अवधारणा रखी। प्रभु जाति वह जाति है जो किसी क्षेत्र में आर्थिक और राजनीतिक रूप से हावी हो और स्थानीय समाज पर दबदबा रखे। श्रीनिवास की कसौटियाँ तीन हैं: (1) पर्याप्त मात्रा में कृषि-भूमि का स्वामित्व, (2) संख्या-बल, और (3) स्थानीय अनुष्ठानिक पदानुक्रम में ऊँचा स्थान। बाद के विश्लेषणों में इनके साथ पश्चिमी शिक्षा, नौकरियाँ और राजनीतिक संपर्क जोड़े जाते हैं, जो आधुनिक अवसरों की ताक़त बताते हैं।

NCERT इस अवधारणा को ज़मीन के रिश्तों से जोड़ता है। उसके अनुसार स्वतंत्रता के बाद आंशिक भूमि-सुधारों में उन बीच की जातियों को भू-अधिकार मिले जो खेती का प्रबंध तो करती थीं पर स्वयं जोतती नहीं थीं। बड़ी संख्या के कारण उन्हें सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के दौर में राजनीतिक ताक़त भी मिली और वे गाँवों में 'प्रभु' जातियाँ बन गईं। NCERT के उदाहरण हैं: बिहार-उत्तर प्रदेश के यादव, कर्नाटक के वोक्कालिगा, आंध्र के रेड्डी और कम्मा, महाराष्ट्र के मराठा, पंजाब-हरियाणा-पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाट और गुजरात के पाटीदार। ध्यान रहे कि प्रभुता सर्वोच्च अनुष्ठानिक प्रतिष्ठा का नाम नहीं है: NCERT के अनुसार अधिकांश क्षेत्रों में सबसे ऊँची जाति ब्राह्मण बड़ी भूस्वामी नहीं होती, इसलिए ग्रामीण भूमि-संरचना से बाहर रह जाती है।

जाति और असमानता: संविधान तक की कहानी

जाति असमानता का उदाहरण क्यों है, यह 2021 के 2 अंक के प्रश्न का सार था। इसका उत्तर इसकी बनावट में है: पदानुक्रम में हर जाति का स्थान तय है, ऊँची जाति को प्रतिष्ठा और संसाधन अधिक, नीची को कम; पदानुक्रम का आधार शुद्धता-अशुद्धता है; और निचले छोर पर अस्पृश्यता है, जिसे NCERT 'जाति-व्यवस्था का अत्यंत क्रूर पक्ष' कहता है। उसके अनुसार अस्पृश्यता के तीन आयाम हैं: बहिष्करण, अपमान-अधीनता और शोषण; जैसे सार्वजनिक जल-स्रोतों और सामूहिक पूजा-उत्सवों से रोक, और प्रायः बेगार या कम मज़दूरी।

संविधान और क़ानून इसी असमानता के विरुद्ध खड़े हुए। अनुच्छेद 17 अस्पृश्यता को समाप्त करता है और उसके किसी भी रूप में आचरण को वर्जित करता है; अस्पृश्यता से उपजी किसी निर्योग्यता को लागू करना क़ानून के अनुसार दंडनीय अपराध है। सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग इसे दो क़ानूनों के सहारे लागू करता है: नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1955 और अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989। NCERT का एक सबक़ भी याद रखिए: बार-बार क़ानून बनना यही दिखाता है कि अकेले क़ानून से सामाजिक प्रथा समाप्त नहीं होती।

अंत में एक संतुलन की बात। NCERT के अनुसार आधुनिक उद्योग, शहरीकरण और व्यक्तिवादी विचारों ने जाति की कुछ कठोर प्रथाएँ ढीली कीं, पर विवाह के क्षेत्र में, यानी अंतर्विवाह में, जाति सबसे मज़बूत रही। इसलिए आज की जाति को केवल 'मिटती हुई परंपरा' कहना भी अधूरा है और 'जस की तस' कहना भी। इस बदलाव का विस्तार इस श्रृंखला के 'जाति और वर्ग के बदलते आयाम' वाले पृष्ठ में है।

जाति का नक्शा

जाति

जन्म

सदस्यता चयन से नहीं, जन्म से

  • बदली नहीं जा सकती
  • निष्कासन संभव

अंतर्विवाह

आंबेडकर: जाति का अनन्य लक्षण

  • विवाह अपने समूह में
  • अतिरिक्त स्त्री-पुरुष की समस्या

खंडीय विभाजन

घुर्ये का पहला लक्षण

  • जाति में उप-जातियाँ
  • हर समूह का अपना जीवन

पदानुक्रम

शुद्धता-अशुद्धता की सीढ़ी

  • ऊँच-नीच का क्रम
  • अस्पृश्यता निचले छोर पर

प्रतिबंध

भोजन, मेल-जोल, पेशा

  • भोजन-साझेदारी की रोक
  • पुश्तैनी पेशा

प्रभु जाति

श्रीनिवास: भूमि, संख्या, अनुष्ठानिक स्थान

  • गाँव में दबदबा
  • मताधिकार से राजनीतिक ताक़त
जाति के छह पहलू एक साथ: याद रखने के लिए ऊपर से घड़ी की दिशा में पढ़ें।

मुख्य तथ्य

आंबेडकर का पत्र
'Castes in India', Columbia की संगोष्ठी में 9 मई 1916 को पढ़ा गया; Indian Antiquary, मई 1917
आंबेडकर का वाक्य
"Endogamy is the only characteristic that is peculiar to caste" (1916)
घुर्ये के लक्षण
छह; Caste and Race in India, 1932
श्रीनिवास की कसौटियाँ
भूमि, संख्या, स्थानीय अनुष्ठानिक पदानुक्रम में उच्च स्थान; लेख 1959, अमेरिकन एंथ्रोपोलॉजिस्ट 61(1): 1-16
प्रभु जातियों के उदाहरण (NCERT)
यादव, वोक्कालिगा, रेड्डी, कम्मा, मराठा, जाट, पाटीदार; स्रोत: NCERT 2026-27 पुनर्मुद्रण
अस्पृश्यता-निषेध
अनुच्छेद 17 (1950); नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम 1955; अत्याचार निवारण अधिनियम 1989
सिलेबस की पंक्ति
RPSC सिलेबस, 09-01-2026, पेपर I, इकाई III (क)

परीक्षा में आम ग़लतियाँ

याद रखें

  • वर्ण और जाति को एक मान लेना। वर्ण चार का अखिल भारतीय मोटा वर्गीकरण है; जाति क्षेत्रीय और बारीक। दोनों का अंतर एक पंक्ति में लिखें।
  • आंबेडकर के नाम से सभी लक्षण गिना देना। उनका ज़ोर अंतर्विवाह पर है और वे भोजन-प्रतिबंध को उसका परिणाम कहते हैं। छह लक्षणों की सूची घुर्ये की है; दोनों को अलग रखें।
  • प्रभु जाति को 'सबसे ऊँची जाति' लिख देना। श्रीनिवास की कसौटी भूमि, संख्या और स्थानीय अनुष्ठानिक स्थान की है; NCERT के अनुसार ब्राह्मण प्रायः बड़े भूस्वामी नहीं होते।
  • जाति के लक्षणों को 'आज का तथ्य' लिख देना। घुर्ये का वर्णन पारंपरिक रूप का है; NCERT के अनुसार कई कड़ी प्रथाएँ ढीली पड़ी हैं, पर अंतर्विवाह सबसे टिकाऊ है।
  • 2 अंक के उत्तर में लंबी भूमिका लिखना। 15 शब्दों की सीमा में पहली पंक्ति में परिभाषा या लक्षण और दूसरी में एक विचारक या उदाहरण दीजिए।
  • केवल जाति-आधारित विभाजन लिखकर छोड़ देना। असमानता का प्रश्न हो तो पदानुक्रम, अस्पृश्यता और अनुच्छेद 17 तक पहुँचिए।