परिचय
रोज़गार भारत की अर्थव्यवस्था और समाज दोनों के केंद्र में है, और RAS प्रारंभिक परीक्षा में यह विषय लगभग हर वर्ष किसी न किसी रूप में पूछा जाता है — कभी परिभाषाओं के रूप में (संगठित बनाम असंगठित, औपचारिक बनाम अनौपचारिक), कभी मापन तंत्र के रूप में (PLFS, LFPR, WPR, UR), और कभी नीतिगत ढांचे के रूप में (मनरेगा, चार श्रम संहिताएं, स्किल इंडिया, स्टार्टअप इंडिया)। यह विषय "गरीबी और बेरोजगारी" से जुड़े एक सहयोगी विषय से अलग है — वहां गरीबी रेखा, गरीबी-मापन समितियां और बेरोजगारी के पांच कारण (प्रच्छन्न, मौसमी, संरचनात्मक, चक्रीय, घर्षणात्मक) कवर किए गए हैं। यह गाइड विशेष रूप से रोज़गार की संरचना, उसके मापन की सरकारी प्रणाली, और रोज़गार-सृजन से जुड़ी प्रमुख नीतियों — मनरेगा, श्रम संहिताएं, कौशल विकास, स्टार्टअप इंडिया, गिग अर्थव्यवस्था और जनांकिकीय लाभांश की चुनौती — पर केंद्रित है।
मुख्य अवधारणाएं
1. रोज़गार की संरचना — संगठित बनाम असंगठित क्षेत्र
भारत में रोज़गार को समझने की पहली कसौटी यह है कि वह किस तरह के उद्यम में हो रहा है। संगठित क्षेत्र (Organised Sector) उन प्रतिष्ठानों को कहते हैं जो सरकार के पास पंजीकृत हैं, श्रम कानूनों के दायरे में आते हैं (जैसे फैक्ट्री अधिनियम, कंपनी अधिनियम), नियमित रूप से रिकॉर्ड रखते हैं, और अपने कर्मचारियों को भविष्य निधि, ग्रेच्युटी, नियमित वेतन तथा सवेतन अवकाश जैसी सामाजिक सुरक्षा सुविधाएं देते हैं — जैसे सरकारी विभाग, बड़ी निजी कंपनियां और पंजीकृत फैक्ट्रियां। इसके विपरीत, असंगठित क्षेत्र (Unorganised Sector) में वे छोटे उद्यम, स्वरोजगार गतिविधियां और घरेलू उद्योग आते हैं जो पंजीकृत नहीं हैं, श्रम कानूनों के प्रभावी दायरे से बाहर हैं, और जहां रोजगार की सुरक्षा, निश्चित वेतन या सामाजिक सुरक्षा की गारंटी नहीं होती — जैसे रेहड़ी-पटरी वाले, घरेलू कामगार, छोटे किसान और असंगठित निर्माण मजदूर। असंगठित क्षेत्र उद्यमों पर राष्ट्रीय आयोग (NCEUS), जिसकी अध्यक्षता अर्जुन सेनगुप्ता ने की थी, ने 2004 में अनुमान लगाया था कि भारत के कुल कार्यबल का लगभग 90% असंगठित क्षेत्र में कार्यरत है — यह आंकड़ा आज भी परीक्षाओं में सबसे अधिक उद्धृत किया जाता है।
2. औपचारिक बनाम अनौपचारिक रोज़गार
संगठित/असंगठित का वर्गीकरण उद्यम के आधार पर होता है, जबकि औपचारिक (Formal) बनाम अनौपचारिक (Informal) रोज़गार का वर्गीकरण व्यक्तिगत श्रमिक के आधार पर होता है — यानी यह देखा जाता है कि उस विशेष कर्मचारी को लिखित अनुबंध, भविष्य निधि, सवेतन अवकाश और अन्य सामाजिक सुरक्षा लाभ मिल रहे हैं या नहीं, चाहे वह किसी भी तरह के उद्यम में काम कर रहा हो। इसका व्यावहारिक अर्थ यह है कि संगठित क्षेत्र के भीतर भी बड़ी संख्या में श्रमिक अनौपचारिक स्थिति में काम कर सकते हैं — जैसे किसी पंजीकृत फैक्ट्री में ठेके पर (कॉन्ट्रैक्ट लेबर के रूप में) रखा गया श्रमिक, जिसे भविष्य निधि या नौकरी की सुरक्षा नहीं मिलती। PLFS के आंकड़े लगातार दिखाते हैं कि भारत के गैर-कृषि कार्यबल का एक बड़ा हिस्सा संगठित प्रतिष्ठानों में काम करते हुए भी अनौपचारिक रोजगार की श्रेणी में आता है, जिसे नीति निर्धारण की दृष्टि से "संगठित क्षेत्र में अनौपचारिकीकरण" कहा जाता है।
3. LFPR, WPR और UR — रोज़गार मापने के तीन मूल सूचक
भारत की श्रम-बाजार सांख्यिकी तीन परस्पर-संबंधित किंतु अलग-अलग सूचकों पर आधारित है। श्रम बल भागीदारी दर (Labour Force Participation Rate - LFPR) कार्य-योग्य आयु की कुल जनसंख्या में उन लोगों का प्रतिशत है जो या तो रोजगार में हैं या सक्रिय रूप से रोजगार की तलाश कर रहे हैं — अर्थात कुल श्रम बल (नियोजित + बेरोजगार) का जनसंख्या से अनुपात। श्रमिक जनसंख्या अनुपात (Worker Population Ratio - WPR) कुल जनसंख्या में वास्तव में नियोजित लोगों का प्रतिशत बताता है। बेरोजगारी दर (Unemployment Rate - UR) श्रम बल में उन लोगों का प्रतिशत है जो काम की तलाश में हैं पर उन्हें काम नहीं मिल रहा — अर्थात यह जनसंख्या के सापेक्ष नहीं, बल्कि श्रम बल के सापेक्ष मापी जाती है। एक व्यक्ति जो न तो काम कर रहा है और न ही सक्रिय रूप से काम खोज रहा है (जैसे पूर्णकालिक छात्र या गृहिणी जो नौकरी नहीं ढूंढ रही), उसे श्रम बल से बाहर माना जाता है और वह इन तीनों में से किसी भी दर की गणना को सीधे प्रभावित नहीं करता।
4. PLFS — रोज़गार-बेरोजगारी मापने की वर्तमान प्रणाली
भारत में रोजगार और बेरोजगारी के आधिकारिक अनुमान सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) के अंतर्गत राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) द्वारा किए जाने वाले आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (Periodic Labour Force Survey - PLFS) से आते हैं, जो 2017 में शुरू किया गया था। पुराने पांच-वर्षीय NSSO रोजगार-बेरोजगारी राउंड के विपरीत, PLFS निरंतर आधार पर चलता है — ग्रामीण भारत के लिए वार्षिक अनुमान और शहरी भारत के लिए त्रैमासिक अनुमान जारी करता है, ताकि नीति-निर्माताओं को अधिक ताज़ा और बार-बार अद्यतन होने वाला डेटा मिल सके। हाल के PLFS वार्षिक आंकड़ों के अनुसार (2023-24), अखिल भारतीय LFPR लगभग 60% और बेरोजगारी दर लगभग 3.2% रही, जबकि महिला श्रम बल भागीदारी दर (Female LFPR) 2017-18 के बाद से लगातार बढ़ते हुए 2023-24 में लगभग 41.7% तक पहुंच गई — यह वृद्धि परीक्षा में बार-बार पूछी जाने वाली एक महत्वपूर्ण प्रवृत्ति है।
5. मनरेगा — ग्रामीण रोजगार की कानूनी गारंटी
महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (MGNREGA) मूल रूप से 2005 में राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (NREGA) के नाम से पारित हुआ था और 2009 में महात्मा गांधी के नाम पर इसका नामकरण किया गया। यह ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा क्रियान्वित एक मांग-आधारित योजना है, जो प्रत्येक ग्रामीण परिवार को, जिसके वयस्क सदस्य अकुशल शारीरिक श्रम करने को तैयार हों, प्रति वित्तीय वर्ष कम से कम 100 दिन के रोजगार का कानूनी अधिकार प्रदान करती है — यदि 15 दिनों के भीतर काम उपलब्ध नहीं कराया जाता, तो लाभार्थी बेरोजगारी भत्ते का हकदार हो जाता है। योजना की प्रमुख विशेषताओं में विकेंद्रीकृत कार्यान्वयन (ग्राम पंचायतों के माध्यम से नियोजन), महिलाओं के लिए कम से कम एक-तिहाई भागीदारी का आरक्षण, 15 दिनों के भीतर मजदूरी भुगतान (देरी होने पर मुआवजा), तथा अनिवार्य सामाजिक अंकेक्षण (Social Audit) शामिल हैं। मनरेगा को अक्सर "रोजगार का सुरक्षा जाल" कहा जाता है, क्योंकि कृषि मंदी, महामारी अथवा प्राकृतिक आपदा जैसे झटकों के समय यह ग्रामीण मांग को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है — जैसा कोविड-19 महामारी के दौरान इसकी मांग में हुई भारी वृद्धि से स्पष्ट हुआ।
6. चार श्रम संहिताएं (2019-2020) — श्रम कानूनों का सरलीकरण
भारत में दशकों से लागू लगभग 29 केंद्रीय श्रम कानूनों को सरल, समेकित और आधुनिक बनाने के लिए संसद ने 2019 और 2020 में चार श्रम संहिताएं पारित कीं। वेतन संहिता, 2019 (Code on Wages) ने न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, मजदूरी भुगतान अधिनियम, बोनस भुगतान अधिनियम और समान पारिश्रमिक अधिनियम जैसे कानूनों को समेकित किया और सभी क्षेत्रों व श्रमिकों के लिए एक राष्ट्रव्यापी न्यूनतम मजदूरी की अवधारणा पेश की। औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 (Industrial Relations Code) ने ट्रेड यूनियन अधिनियम, औद्योगिक नियोजन (स्थायी आदेश) अधिनियम तथा औद्योगिक विवाद अधिनियम को समेकित किया, और छंटनी/तालाबंदी के लिए सरकारी अनुमति की अनिवार्यता की सीमा को 100 से बढ़ाकर 300 श्रमिकों वाले प्रतिष्ठानों तक कर दिया। सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 (Code on Social Security) ने भविष्य निधि अधिनियम, कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम, प्रसूति लाभ अधिनियम और उपदान भुगतान अधिनियम सहित नौ कानूनों को समेकित किया, और पहली बार गिग व प्लेटफॉर्म श्रमिकों को सामाजिक सुरक्षा के दायरे में औपचारिक रूप से शामिल किया। व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्यशर्तें संहिता, 2020 (OSH Code) ने फैक्ट्री अधिनियम, ठेका श्रम अधिनियम और खान अधिनियम सहित तेरह कानूनों को समेकित कर कार्यस्थल पर सुरक्षा और स्वास्थ्य मानकों को एकीकृत किया। चूंकि श्रम समवर्ती सूची का विषय है, इसलिए इन संहिताओं के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए राज्यों को भी अपने-अपने नियम अधिसूचित करने होते हैं, जिस कारण इनका पूर्ण कार्यान्वयन अभी भी लंबित है।
7. कौशल विकास — स्किल इंडिया मिशन और PMKVY
भारत के जनांकिकीय लाभांश को उत्पादक रोजगार में बदलने के लिए 2014 में कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्रालय (MSDE) की स्थापना की गई, और 15 जुलाई 2015 (विश्व युवा कौशल दिवस) को प्रधानमंत्री द्वारा स्किल इंडिया मिशन का शुभारंभ किया गया, जिसका लक्ष्य लाखों युवाओं को उद्योग-प्रासंगिक कौशल में प्रशिक्षित करना है। इस मिशन के अंतर्गत प्रमुख योजना प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना (PMKVY) है, जो अल्पकालिक कौशल प्रशिक्षण देकर प्रमाणन पूर्ण करने पर श्रमिकों को मौद्रिक प्रोत्साहन देती है तथा पूर्व अनुभव की मान्यता (Recognition of Prior Learning - RPL) के माध्यम से पहले से कार्यरत अकुशल/अर्ध-कुशल श्रमिकों के कौशल को प्रमाणित भी करती है। यह योजना अपने चौथे संस्करण (PMKVY 4.0, 2023 में शुरू) तक पहुंच चुकी है और अब इसे स्किल इंडिया डिजिटल प्लेटफॉर्म से जोड़ा गया है। कौशल प्रशिक्षण की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए 2018 में राष्ट्रीय व्यावसायिक शिक्षा एवं प्रशिक्षण परिषद (NCVET) को एक एकीकृत नियामक के रूप में स्थापित किया गया, जबकि राष्ट्रीय शिक्षुता प्रोत्साहन योजना (NAPS) उद्योगों में औपचारिक शिक्षुता (Apprenticeship) को बढ़ावा देती है।
8. स्टार्टअप इंडिया और स्वरोजगार
16 जनवरी 2016 को शुरू किया गया स्टार्टअप इंडिया अभियान स्वरोजगार और उद्यमिता के माध्यम से रोजगार सृजन का प्रमुख नीतिगत स्तंभ है। इसका नोडल विभाग उद्योग संवर्धन एवं आंतरिक व्यापार विभाग (DPIIT) है, और इसके तहत मान्यता-प्राप्त स्टार्टअप्स को तीन वर्ष तक आयकर छूट, स्व-प्रमाणन की सुविधा, आसान निकास (Easy Exit) प्रावधान, तथा भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक (SIDBI) द्वारा प्रबंधित ₹10,000 करोड़ के फंड ऑफ फंड्स (Fund of Funds for Startups - FFS) से वित्तीय सहयोग जैसी सुविधाएं मिलती हैं। इसके अतिरिक्त, प्रारंभिक चरण के स्टार्टअप्स के लिए 2021 में स्टार्टअप इंडिया सीड फंड योजना शुरू की गई। परिणामस्वरूप भारत आज संयुक्त राज्य अमेरिका और चीन के बाद विश्व का तीसरा सबसे बड़ा स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र (Startup Ecosystem) बन चुका है, जिसमें सौ से अधिक यूनिकॉर्न (एक अरब डॉलर से अधिक मूल्यांकन वाले स्टार्टअप) शामिल हैं — यह वृद्धि प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से लाखों नई नौकरियों के सृजन से जुड़ी है।
9. गिग अर्थव्यवस्था और जनांकिकीय लाभांश की चुनौती
ऐप-आधारित प्लेटफॉर्मों (जैसे राइड-हेलिंग, फूड डिलीवरी और ई-कॉमर्स लॉजिस्टिक्स) के उदय से भारत में गिग अर्थव्यवस्था (Gig Economy) तेजी से बढ़ी है। नीति आयोग के एक अनुमान के अनुसार 2020-21 में लगभग 77 लाख गिग श्रमिक थे, जिनके 2029-30 तक बढ़कर लगभग 2.35 करोड़ होने का अनुमान है — यह भारत के कुल गैर-कृषि कार्यबल का करीब 4.1% होगा। सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 ने पहली बार "गिग श्रमिक" और "प्लेटफॉर्म श्रमिक" को कानूनी रूप से परिभाषित किया और उनके लिए सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का मार्ग प्रशस्त किया, जबकि e-श्रम पोर्टल (2021) असंगठित एवं गिग श्रमिकों का राष्ट्रीय डेटाबेस तैयार करता है। इन नीतिगत प्रयासों के बावजूद बड़ी चुनौती बनी हुई है — भारत की जनसांख्यिकीय संरचना अपेक्षाकृत युवा है (औसत आयु लगभग 28-29 वर्ष) और अनुमान है कि यह जनांकिकीय लाभांश (Demographic Dividend) की खिड़की लगभग 2055-56 तक खुली रहेगी, लेकिन इस लाभांश को वास्तविक आर्थिक लाभ में बदलने के लिए हर वर्ष लाखों नई नौकरियां सृजित करनी होंगी। आर्थिक वृद्धि के बावजूद रोजगार वृद्धि की धीमी गति — जिसे अक्सर "जॉबलेस ग्रोथ" कहा जाता है — तथा विनिर्माण क्षेत्र में रोजगार की सीमित हिस्सेदारी, दोनों ही भारत की रोजगार नीति के सामने सबसे बड़ी चुनौतियां बनी हुई हैं।
महत्वपूर्ण तथ्य
- NCEUS (अर्जुन सेनगुप्ता समिति, 2004) के अनुमान के अनुसार भारत के लगभग 90% कार्यबल असंगठित क्षेत्र में कार्यरत है।
- संगठित/असंगठित वर्गीकरण उद्यम-आधारित है; औपचारिक/अनौपचारिक वर्गीकरण श्रमिक-आधारित है — संगठित प्रतिष्ठान में भी श्रमिक अनौपचारिक हो सकता है (जैसे ठेका श्रमिक)।
- LFPR = श्रम बल (नियोजित + बेरोजगार) ÷ कार्य-योग्य जनसंख्या; WPR = नियोजित लोग ÷ कुल जनसंख्या; UR = बेरोजगार ÷ श्रम बल।
- PLFS 2017 से NSO (MoSPI) द्वारा संचालित; ग्रामीण अनुमान वार्षिक, शहरी अनुमान त्रैमासिक।
- PLFS 2023-24: अखिल भारतीय LFPR ~60%, बेरोजगारी दर ~3.2%, महिला LFPR ~41.7% (2017-18 से निरंतर वृद्धि)।
- मनरेगा (मूल नाम NREGA, 2005; 2009 में नामकरण) प्रति परिवार प्रति वित्त वर्ष 100 दिन के अकुशल रोजगार की कानूनी गारंटी देता है; ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा क्रियान्वित।
- चार श्रम संहिताएं (2019-20) लगभग 29 केंद्रीय श्रम कानूनों को समेकित करती हैं: वेतन संहिता, औद्योगिक संबंध संहिता, सामाजिक सुरक्षा संहिता, तथा OSH संहिता।
- सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 ने पहली बार गिग व प्लेटफॉर्म श्रमिकों को कानूनी परिभाषा और सामाजिक सुरक्षा के दायरे में शामिल किया।
- स्किल इंडिया मिशन 15 जुलाई 2015 को शुरू हुआ; प्रमुख योजना PMKVY (अब संस्करण 4.0); नियामक निकाय NCVET (2018)।
- स्टार्टअप इंडिया 16 जनवरी 2016 को शुरू हुआ; नोडल विभाग DPIIT; भारत विश्व का तीसरा सबसे बड़ा स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र।
- नीति आयोग अनुमान: गिग श्रमिक 2020-21 में ~77 लाख से बढ़कर 2029-30 तक ~2.35 करोड़ होने का अनुमान।
परीक्षा टिप्स
- संगठित/असंगठित (उद्यम आधार) और औपचारिक/अनौपचारिक (श्रमिक आधार) को कभी एक-दूसरे का पर्याय न मानें — दोनों अलग कसौटियों पर आधारित हैं।
- LFPR, WPR और UR के हर के आधार अलग-अलग हैं: LFPR और WPR का हर जनसंख्या है, जबकि UR का हर श्रम बल है — यह अंतर संख्यात्मक प्रश्नों में निर्णायक होता है।
- चारों श्रम संहिताओं के नाम और उनके द्वारा समेकित प्रमुख पुराने कानूनों को याद रखें; विशेष रूप से यह याद रखें कि गिग/प्लेटफॉर्म श्रमिकों की सामाजिक सुरक्षा सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 से जुड़ी है, न कि औद्योगिक संबंध संहिता से।
- मनरेगा से जुड़े संख्यात्मक तथ्य याद रखें — 100 दिन की गारंटी, 15 दिन में मजदूरी भुगतान अथवा मुआवजा, महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण।
- स्किल इंडिया (MSDE, PMKVY) और स्टार्टअप इंडिया (DPIIT) के नोडल मंत्रालय/विभाग को न उलझाएं — दोनों अलग मंत्रालयों के अंतर्गत आते हैं।
वाक्य याद रखें — "वेतन औद्योगिक ने समाज को सुरक्षित रखा": वेतन = वेतन संहिता (न्यूनतम मजदूरी, बोनस), औद्योगिक = औद्योगिक संबंध संहिता (ट्रेड यूनियन, छंटनी), समाज = सामाजिक सुरक्षा संहिता (PF, ESI, गिग/प्लेटफॉर्म श्रमिक), सुरक्षित = व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्यशर्तें संहिता — यानी OSH कोड (फैक्ट्री, ठेका श्रम, खान)।
ये दो अलग वर्गीकरण हैं, जिन्हें अक्सर एक ही मान लिया जाता है — लेकिन ये अलग-अलग सवालों के जवाब देते हैं। संगठित बनाम असंगठित यह बताता है कि श्रमिक किस तरह के उद्यम में काम कर रहा है — क्या वह उद्यम पंजीकृत है, श्रम कानूनों के दायरे में है और नियमित रिकॉर्ड रखता है या नहीं। औपचारिक बनाम अनौपचारिक यह बताता है कि उस विशेष श्रमिक को व्यक्तिगत रूप से लिखित अनुबंध, भविष्य निधि और सामाजिक सुरक्षा लाभ मिल रहे हैं या नहीं। इसीलिए एक पंजीकृत, संगठित फैक्ट्री में काम करने वाला ठेका श्रमिक "संगठित क्षेत्र में अनौपचारिक श्रमिक" कहलाता है — वह उद्यम की दृष्टि से संगठित क्षेत्र में है, लेकिन अपनी नियुक्ति की शर्तों की दृष्टि से अनौपचारिक है। त्वरित पहचान: प्रश्न में "उद्यम/प्रतिष्ठान" का उल्लेख हो तो संगठित/असंगठित सोचें; "व्यक्तिगत अनुबंध/लाभ" का उल्लेख हो तो औपचारिक/अनौपचारिक सोचें।
प्रश्न 1. संगठित और असंगठित क्षेत्र के वर्गीकरण का मुख्य आधार क्या है, और NCEUS (2004) ने भारत के असंगठित कार्यबल का अनुमान कितना लगाया था?
✅ वर्गीकरण इस आधार पर होता है कि उद्यम पंजीकृत है या नहीं, श्रम कानूनों के दायरे में आता है या नहीं, और नियमित सामाजिक सुरक्षा लाभ देता है या नहीं। अर्जुन सेनगुप्ता की अध्यक्षता वाले NCEUS ने 2004 में अनुमान लगाया था कि भारत के कुल कार्यबल का लगभग 90% असंगठित क्षेत्र में कार्यरत है।
प्रश्न 2. एक पंजीकृत फैक्ट्री में ठेके पर रखा गया श्रमिक, जिसे भविष्य निधि या नौकरी की सुरक्षा नहीं मिलती, उसे किस श्रेणी में रखा जाएगा?
✅ वह संगठित क्षेत्र में अनौपचारिक श्रमिक कहलाएगा — उद्यम की दृष्टि से संगठित क्षेत्र में होते हुए भी, अपनी नियुक्ति की शर्तों (कोई लिखित स्थायी अनुबंध, कोई भविष्य निधि) के कारण उसे अनौपचारिक माना जाता है।
प्रश्न 3. LFPR, WPR और UR में से किसका हर (Denominator) श्रम बल है, न कि कुल जनसंख्या?
✅ बेरोजगारी दर (UR) का हर श्रम बल है (बेरोजगार ÷ श्रम बल × 100)। LFPR और WPR दोनों का हर कार्य-योग्य कुल जनसंख्या है।
प्रश्न 4. सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 ने रोजगार से जुड़ी किस नई श्रेणी के श्रमिकों को पहली बार कानूनी रूप से परिभाषित किया, और यह कितने पुराने कानूनों को समेकित करती है?
✅ इसने पहली बार गिग श्रमिकों और प्लेटफॉर्म श्रमिकों को कानूनी रूप से परिभाषित करते हुए उन्हें सामाजिक सुरक्षा के दायरे में शामिल किया। यह भविष्य निधि अधिनियम, कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम, प्रसूति लाभ अधिनियम और उपदान भुगतान अधिनियम सहित नौ पुराने कानूनों को समेकित करती है।
प्रश्न 5. मनरेगा के अंतर्गत यदि किसी पात्र परिवार को आवेदन के 15 दिनों के भीतर काम उपलब्ध नहीं कराया जाता, तो उसे क्या अधिकार प्राप्त होता है?
✅ उस परिवार को बेरोजगारी भत्ता पाने का कानूनी अधिकार प्राप्त हो जाता है, क्योंकि मनरेगा हर पात्र ग्रामीण परिवार को प्रति वित्तीय वर्ष कम से कम 100 दिन के अकुशल रोजगार की मांग-आधारित कानूनी गारंटी देता है।
सारांश
भारत में रोजगार को समझने के लिए दो स्वतंत्र वर्गीकरणों को साथ रखना जरूरी है — उद्यम-आधारित संगठित/असंगठित विभाजन और श्रमिक-आधारित औपचारिक/अनौपचारिक विभाजन — जिनके मेल से ही "संगठित क्षेत्र में अनौपचारिक रोजगार" जैसी वास्तविकता समझ आती है। रोजगार-बेरोजगारी का आधिकारिक मापन अब NSO के आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (PLFS) के माध्यम से होता है, जो LFPR, WPR और UR जैसे सूचकों के आधार पर ग्रामीण भारत के लिए वार्षिक और शहरी भारत के लिए त्रैमासिक अनुमान देता है। नीतिगत मोर्चे पर, मनरेगा ग्रामीण रोजगार की कानूनी गारंटी देता है, चार श्रम संहिताएं (वेतन, औद्योगिक संबंध, सामाजिक सुरक्षा और OSH) 29 पुराने श्रम कानूनों को समेकित करती हैं, स्किल इंडिया और PMKVY कार्यबल को उद्योग-प्रासंगिक कौशल से जोड़ते हैं, तथा स्टार्टअप इंडिया और तेजी से बढ़ती गिग अर्थव्यवस्था स्वरोजगार व नए तरह के रोजगार के अवसर पैदा कर रहे हैं। इन सबके केंद्र में भारत की जनांकिकीय लाभांश की चुनौती है — एक अपेक्षाकृत युवा आबादी को उत्पादक, अच्छी गुणवत्ता वाले रोजगार से जोड़ने की जिम्मेदारी, जिसके सीमित समय-सीमा में पूरा न होने का जोखिम RAS प्रारंभिक परीक्षा के लिए इस विषय को निरंतर प्रासंगिक बनाए रखता है।
⚡ त्वरित रिवीजन — One-Liners
- •GDP = C + I + G + (X−M); यह एक वर्ष में देश की सीमा के भीतर उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं का मौद्रिक मूल्य है।
- •भारत की पहली पंचवर्षीय योजना 1951-56 में 'हैरोड-डोमर' मॉडल पर आधारित थी।
- •RBI की स्थापना 1 अप्रैल 1935 को हुई; 1949 में राष्ट्रीयकरण; मुख्यालय मुंबई।
- •भारत में GST 1 जुलाई 2017 से लागू; 101वें संशोधन (2016)।
- •GDP = देश की भौगोलिक सीमा के भीतर एक वर्ष में उत्पादित अंतिम वस्तुओं/सेवाओं का बाजार मूल्य।